सोमवार, 26 दिसंबर 2011

जीना क्या अजी प्यार बिना ....जीवन में नहीं कुछ भी इसके सिवा दोस्तों


आशा भोसले, किशोर कुमार और साथियों की आवाज़ों में राहुल देव बर्मन की यह कम्पोज़िशन बनी थी मजरूह सुलतानपुरी के बोलों पर। १९८० की इस फ़िल्म में ऋषी कपूर और नीतू सिंह की हिट जोड़ी नज़र आई थी। वैसे यह फ़िल्म 'खेल खेल में', 'दूसरा आदमी', 'रफ़ू चक्कर' जैसी फ़िल्मों की तरह सुपरहिट तो नहीं थी और न ही फ़िल्म के अन्य गीतों नें लोगों के दिलों में कुछ ख़ास जगह बनाई, पर फ़िल्म का यह शीर्षक गीत ख़ूब चला था।

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 817/2011/257

'आओ झूमें गायें' शृंखला की सातवीं कड़ी में आज एक बार फिर से प्यार-मोहब्बत की बातें। जीवन में प्यार-मोहब्बत का बड़ा महत्व है। यूं तो प्यार कई तरह के हो सकते हैं जैसे कि माँ-बाप का अपने बच्चों से या बच्चों का माँ-बाप से, भाई-भाई और भाई-बहन का प्यार, और फिर पशु-पक्षी और प्रकृति के लिए प्यार भी लोगों में देखी जा सकती है। पर प्यार-मोहब्बत के ज़िक्र से जिस प्यार का अर्थ निकलता है, वह है एक लड़का और एक लड़की के बीच का प्यार, महबूब-महबूबा का प्यार, पति-पत्नी का प्यार। इस प्यार के लिए कहा जाता है कि जीवन में जिसे यह प्यार नसीब नहीं हुआ, वह बड़ा ही अभागा होता है। इस प्यार का अनुभव ही कुछ ऐसा होता है कि जीवन की तमाम अनुभूतियों में शायद यह सबसे सुन्दर अनुभूति है। और पहले पहले प्यार के अनुभव के तो कहने ही क्या! आप में से जिसने भी यह अनुभव किया है, वो मेरी बात को महसूस कर पा रहे होंगे। हिन्दी फ़िल्मों में भी अक्सर यही कहा गया है कि प्यार से बढ़ कर कुछ भी नहीं है। धन, दौलत, शोहरत ये सब फीके हैं प्यार-मोहब्बत के आगे। वैसे इस बात पर बहस भी होती आई है। अक्सर हमने फ़िल्मों में यह देखा है कि जहाँ युवा पीढ़ी प्यार-मोहब्बत को ज़्यादा तवज्जु देते हैं, वहीं उनके माता-पिता इसके ख़िलाफ़ हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि ये सब बेकार की बातें हैं जो युवक-युवतियों को ग़लत राह पर ले जाते हैं। हमारे गुरुजनों की बातों को बिल्कुल नकार तो नहीं दिया जा सकता क्योंकि ऐसा अक्सर देखा गया है। पर ख़ुशनसीब हैं वो लोग जिन्हें सच्चा प्यार मिलता है, और जिनके प्यार को प्यार मिलता है, क्योंकि एक तरफ़ा प्यार के क़िस्सों की भी कोई कमी नहीं।

आज का जो गीत हमने चुना है, वह है फ़िल्म 'धन दौलत' का, "जीना क्या अजी प्यार बिना, जीवन के यही चार दिना, धन-दौलत बिना चले मगर, ज़िन्दगी ना चले यार बिना"। आशा भोसले, किशोर कुमार और साथियों की आवाज़ों में राहुल देव बर्मन की यह कम्पोज़िशन बनी थी मजरूह सुलतानपुरी के बोलों पर। १९८० की इस फ़िल्म में ऋषी कपूर और नीतू सिंह की हिट जोड़ी नज़र आई थी। वैसे यह फ़िल्म 'खेल खेल में', 'दूसरा आदमी', 'रफ़ू चक्कर' जैसी फ़िल्मों की तरह सुपरहिट तो नहीं थी और न ही फ़िल्म के अन्य गीतों नें लोगों के दिलों में कुछ ख़ास जगह बनाई, पर फ़िल्म का यह शीर्षक गीत ख़ूब चला था। विनोद शाह निर्मित और हरिश शाह निर्देशित इस फ़िल्म की कहानी प्यार-मोहब्बत और धन-दौलत के इर्द-गिर्द घूमती है। फ़िल्म का नायक ग़रीब है और नायिका अमीर। दोनों की शादी में जब लड़की का पिता दीवार बन कर सामने खड़ा हो जाता है, तब नायक ठान लेता है कि वो अमीर बन कर ही नायिका का हाथ माँगने आएगा। लेकिन जब वो बेहद अमीर बन कर वापस आता है नायिका का हाथ माँगने, तो होने वाले ससुर जी तो ख़ुश होकर राज़ी हो जाते हैं, पर नायिका शादी से इन्कार कर देती है क्योंकि नायक नें ग़लत तरीकों का इस्तमाल कर धन दौलत कमाया है। अब नायक को दो में से एक राह चुनना है - या तो ग़लत तरीकों से कमाये धन-दौलत में डूबा रहे या फिर अपनी नायिका से शादी कर सामान्य जीवन व्यतीत करे। तो आइए जीवन में धन दौलत से बढ़ कर प्यार के महत्व को समझाता यह सुनें और ज़रा अपने क़दमों को थिरकने की भी अनुमति दें।



मित्रों, ये आपके इस प्रिय कार्यक्रम "ओल्ड इस गोल्ड" की अंतिम शृंखला है, ८०० से भी अधिक एपिसोडों तक चले इस यादगार सफर में हमें आप सबका जी भर प्यार मिला, सच कहें तो आपका ये प्यार ही हमारी प्रेरणा बना और हम इस मुश्किल काम को इस अंजाम तक पहुंचा पाये. बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम सदा अपनी यादों में सहेज कर रखेंगें. पहले एपिसोड्स से लेकर अब तक कई साथी हमसे जुड़े कुछ बिछड़े भी पर कारवाँ कभी नहीं रुका, पहेलियाँ भी चली और कभी ऐसा नहीं हुआ कि हमें विजेता नहीं मिला हो. इस अंतिम शृंखला में हम अपने सभी नए पुराने साथियों से ये गुजारिश करेंगें कि वो भी इस श्रृखला से जुडी अपनी कुछ यादें हम सब के साथ शेयर करें....हमें वास्तव में अच्छा लगेगा, आप सब के लिखे हुए एक एक शब्द हम संभाल संभाल कर रखेंगें, ये वादा है.

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें +91-9811036346 (सजीव सारथी) या +91-9878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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