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Thursday, May 23, 2013

‘कारवाँ सिने संगीत का’


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 45

कारवाँ सिने-संगीत का

फिल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत : ‘मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ...’



 
भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1935 की फिल्मों में संगीत की स्थिति पर चर्चा आरम्भ कर रहे हैं। 



के. सी. डे
1935 वर्ष को हिंदी सिने-संगीत के इतिहास का एक स्मरणीय वर्ष माना जाएगा। संगीतकार रायचंद बोराल ने, अपने सहायक और संगीतकार पंकज मल्लिक के साथ मिलकर ‘न्यू थिएटर्स’ में प्लेबैक पद्धति, अर्थात पार्श्वगायन की शुरुआत की। पर्दे के बाहर रेकॉर्ड कर बाद में पर्दे पर फ़िल्माया गया पहला गीत था फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का, और वह गीत था के. सी. डे का गाया “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा”। इसी फ़िल्म का अन्य गीत “मन की आँखें खोल बाबा” भी के. सी. डे के गाये लोकप्रिय गीतों में से एक है। इन गीतों से पार्श्वगायन की शुरुआत ज़रूर हुई, पर सही मायने में इन्हें प्लेबैक्ड गीत नहीं कहा जा सकता क्योंकि के. सी. डे के गाये इन गीतों को उन्हीं पर फ़िल्माया गया था। इन गीतों को सुन कर साफ़ महसूस होता है कि इससे पहले के गीतों से इन प्री-रेकॉर्डेड गीतों के स्तर में कितना अंतर है। इस फ़िल्म में सहगल का गाया “अंधे की लाठी तू ही है” और उमा शशि का गाया “प्रेम कहानी सखी सुनत सुहाये चोर चुराये माल” तथा पहाड़ी सान्याल व उमा शशि का गाया युगल गीत “मोरी प्रेम की नैया चली जल में” भी फ़िल्म के चर्चित गाने थे। ‘धूप छाँव’ के गीतकार थे पंडित सुदर्शन। प्लेबैक तकनीक के आने के बाद भी कई वर्षों तक बहुत से अभिनेता गीत गाते रहे, फिर धीरे धीरे अभिनेता और गायक की अलग लग श्रेणी बन गई। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘धूप छाँव’ का गीत- “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा...” सुनवाते हैं। यह गीत के.सी. डे का गाया और उन्हीं पर फिल्माया गया था।


फिल्म धूप छाँव : ‘तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा...’ : के.सी. डे


पारुल घोष
‘धूप छाँव’ में ही पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति का गाया एक गीत था “मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ”, जो सही अर्थ में पहला प्लेबैक गीत था। इस तरह से इन तीन गायिकाओं को फ़िल्म-संगीत की प्रथम पार्श्वगायिकाएँ होने का गौरव प्राप्त है। हरमन्दिर सिंह ‘हमराज़’ को दिए एक साक्षात्कार में सुप्रभा सरकार ने पार्श्वगायन की शुरुआत से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया था – “उन्होंने (सुप्रभा सरकार ने) बताया कि फ़िल्मों में उनका प्रवेश 13 वर्ष की आयु में तत्कालीन अभिनेत्री लीला देसाई के भाई के प्रयत्नों से हुआ था। सन्‍ 1935 में जब ‘न्यू थिएटर्स’ द्वारा ‘जीवन मरण’ (बंगला) तथा ‘दुश्मन’ (हिन्दी) का निर्माण शुरु हुआ तब पार्श्वगायन पद्धति का प्रथम उपयोग इसी फ़िल्म में किया जाना था परन्तु फ़िल्म की शूटिंग्‍ के समय, एक दृश्य में पेड़ से नीचे कूदते समय नायिका लीला देसाई की टाँग टूट गई और फ़िल्म का निर्माण रुक गया। इसी बीच फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का निर्माण शुरु हुआ। निर्देशक नितिन बोस ने पहले तो सुप्रभा जे की आवाज़ को नामंज़ूर ही कर दिया था, लेकिन एक समूह गीत में सुप्रभा, हरिमती और पारुल घोष की आवाज़ों में रेकॉर्ड किया गया जो कि बाद में प्रथम पार्श्व गीत के रूप में जाना गया।” उधर पंकज मल्लिक ने भी अपनी आत्मकथा में पार्श्वगायन की शुरुआत का दिल्चस्प वर्णन किया है। पंकज राग लिखित किताब ‘धुनों की यात्रा’ से प्राप्त जानकारी के अनुसार – “नितिन बोस स्टुडिओ जाते समय अपनी कार से पंकज मल्लिक के घर से उन्हें लेते हुए जाते थे। एक दिन उनके घर के सामने कई बार हार्न देने पर भी पंकज मल्लिक नहीं मिकले, और काफ़ी देर बाद अपने पिता के बताने पर कि नितिन बोस उनकी बाहर कार में प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे हड़बड़ाते हुए बाहर आए और देरी का कारण बताते हुए कहा कि वे अपने मनपसंद अंग्रेज़ी गानों का रेकॉर्ड सुनते हुए गा रहे थे, इसी कारण हॉर्न की आवाज़ नहीं सुन सके। इसी बात पर नितिन बोस को विचार आया कि क्यों न इसी प्रकार पार्श्वगायन लाया जाए। उन्होंने बोराल से चर्चा की और अपने पूरे कौशल के साथ बोराल ने इस विचार को साकार करते हुए इसे ‘धूप छाँव’ में आज़माया।” अब हम आपको फिल्म ‘धूप छाँव’ का वह गीत सुनवाते हैं, जिसे भारतीय सिनेमा का पहला पार्श्वगीत माना गया।


फिल्म धूप छाँव : ‘मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ...’ : पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति


पारुल घोष सुप्रसिद्ध बांसुरीनवाज़ पंडित पन्नालाल घोष की बहन थीं। पारुल घोष की परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक से की हुई मेरी बातचीत में अपनी ‘दीदा’ (बांगला में नानी को दीदा कहते हैं) को याद करते हुए श्रुति ने कहा, “मैं पारुल दीदा की परपोती हूँ। वो मेरे पिताजी की माँ सुधा मुर्देश्वर जी की माँ थीं। मुझे बहुत बहुत गर्व महसूस होता है यह सोचकर कि मैं उनकी परपोती हूँ। मैं हमेशा सोचती हूँ कि काश मैं उनसे मिल पाती। मेरे पिता पंडित आनंद मुर्देश्वर और दादा पंडित देवेन्द्र मुर्देश्वर ने दीदा के बारे में बहुत कुछ बताया है और मेरे पिता जी ने तो मुझे उनके कई गाये हुए गीतों को सिखाया भी है, जो दीदा ने उन्हें उनके बचपन में सिखाया था। मैं उन गीतों के बारे में बहुत जज़्बाती हूँ और वो सब गीत मेरे दिल के बहुत बहुत करीब हैं। मुझे अफ़सोस है कि मैं दीदा से नहीं मिल सकी। काश कि मैं कुछ वर्ष पूर्व जन्म लेती! उनकी लम्बी बीमारी के बाद 13 अगस्त 1977 को बम्बई में निधन हो गया। जैसा कि मैंने बताया कि दादाजी, पिताजी और तमाम रिश्तेदारों से मैंने पारुल दीदा के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। हमेशा से ही उनकी एक बहुत ही सुंदर तस्वीर मेरे दिल में रही है। एक सुंदर बंगाली चेहरा और एक दिव्य आवाज़ की मालकिन। जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिताजी हमेशा कहते थे कि मेरी आवाज़ कुछ कुछ उन्हीं के जैसी है, और मैं यह बात सुन कर ख़ुश हो जाया करती थी। लेकिन अब मैं मानती हूँ कि दीदा के साथ मेरा कोई मुकाबला ही नहीं। वो स्वयं भगवान थीं।”

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, May 9, 2013

समाज-सुधार का दायित्व निभाती दो फिल्में


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 44

कारवाँ सिने-संगीत का
1934 की दो फिल्में : ‘चण्डीदास’ और ‘अमृत मन्थन’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1934 में ‘न्यू थिएटर्स’ की फिल्म ‘चण्डीदास’ और ‘प्रभात’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘अमृत मन्थन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इन फिल्मों ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध जनमानस को प्रेरित करने में अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया था। 

सहगल
1934 की सबसे चर्चित फ़िल्म थी ‘न्यू थिएटर्स’ की ‘चण्डीदास’। उमा शशि के साथ सहगल की जोड़ी बनी और इस फ़िल्म ने चारों तरफ़ कामयाबी के परचम लहरा दिए। भले ही सहगल के पहले के गीत भी काफ़ी लोकप्रिय हुए थे, पर सही मायने में सहगल को स्टार ‘चण्डीदास’ ने ही बनाया। इस फ़िल्म को इससे पहले बांगला में 1932 में न्यू थिएटर्स ने ही बनाया था। ‘चण्डीदास’ कहानी है एक वैष्णव पुजारी-कवि की जो एक निम्न जाति की धोबन से प्रेम कर बैठता है। संगीतकार आर. सी. बोराल ने “प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं” मुखड़े वाला सहगल और उमा शशि से जो युगल गीत गवाया था, वह मेरे ख़याल से फ़िल्म-संगीत के इतिहास का पहला सुपरहिट डुएट था। फ़िल्म के अन्य उल्लेखनीय गीतों में सहगल का “तड़पत बीते दिन रैन” और उमा शशि का “बसंत ऋतु आई आली फूल खिले डाले डाली” थे। पहाड़ी सान्याल ने भी इस फ़िल्म में गीत गाया था “छाई बसंत आई बसंत”। वैसे तो फ़िल्म के अधिकांश गीत भक्ति रस के थे, पर इन गीतों को सुन कर स्पष्ट पता लगता है कि फ़िल्मी गीत की शक्ल बदल रही थी। अब तक के गीत मूलत: शुद्ध शास्त्रीय संगीत या थिएटर संगीत पर आधारित हुआ करते थे, पर ‘चण्डीदास’ का संगीत आधुनिक फ़िल्म संगीत का ऐलान करता सुनाई दिया। ‘चण्डीदास’ के गीतों की ख़ासियत थी मंजीरा, खोल और मृदंग जैसे साज़ों का प्रयोग, जबकि अब तक केवल हारमोनियम और तबला ही सुनाई देते आ रहे थे। आग़ा हश्र कश्मीरी ने फ़िल्म के गीत लिखे। इसी वर्ष बोराल के संगीत में पहाड़ी सान्याल, पृथ्वीराज कपूर, सहगल, हुस्नबानो और उमा शशि अभिनीत ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई ‘डाकू मनसूर’। यह फ़िल्म उतनी नहीं चली और ना ही इसके गीत चले जो ज़्यादातर शायराना अंदाज़ के थे। बोराल ने प्रमथेश बरुआ निर्देशित फ़िल्म ‘रूपलेखा’ में भी संगीत दिया जिसमें सहगल का गाया “सब दिन होत न एक समान” बहुत लोकप्रिय हुआ था। लेकिन ‘डाकू मनसूर’ और ‘रूपलेखा’ के गीत ‘चण्डीदास’ के गीतों के आगे टिक न सके। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘चण्डीदास’ का सहगल और उमा शशि का गाया सर्वाधिक लोकप्रिय गीत ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ सुनवाते हैं।


फिल्म ‘चण्डीदास’ : ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ : कुन्दनलाल सहगल और उमा शशि 



बसन्त देसाई
कोल्हापुर से पूना स्थानांतरित होने के बाद ‘प्रभात’ ने अपना नया ‘साउण्ड-प्रूफ़ स्टुडिओ’ बनाया और 1934 में बनाई ‘अमृत मंथन’। यही वह फ़िल्म थी जिसके संगीत ने गायिका-अभिनेत्री शांता आप्टे और संगीतकार केशवराव भोले को रातों रात कामयाबी के शिखर पर बिठा दिया। हिंदू धर्म के अनैतिक क्रूरता के विरुद्ध आवाज़ उठाती इस फ़िल्म ने बम्बई के ‘कृष्णा टॉकीज़’ में ‘सिलवर जुबिली’ मनाई और लगातार 29 सप्ताह चली। शांता आप्टे की आवाज़ में फ़िल्म के दो यादगार गीत हैं “रात आई है नया रंग जमाने के लिए, लेके आराम का पैग़ाम ज़माने के लिए” और “कमसीनी में दिल पे ग़म का बाढ़ है”। केशवराव का संगीत इस फ़िल्म में प्रयोगधर्मी था। वसंत देसाई, जो आगे चलकर शांताराम के मुख्य संगीतकार बने, इस फ़िल्म में एक गीत गाया था “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो”। वसंत देसाई नायक बनने ‘प्रभात’ में शांताराम के पास आये थे, तो उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शांताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसंत देसाई ने एक मशहूर रेडिओ ब्रॉडकास्टर को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूंही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन, तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शांताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा, कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घंटे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ, ॠषी आश्रम के जैसा था 'प्रभात'। उनका हमेशा से ऐसा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस सेक्शन में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा सेक्शन हो या म्युज़िक डिपार्टमेण्ट। इसलिए आज मैं हर डिपार्टमेण्ट का काम जानता हूँ। मैं उनका ऐसिस्टैण्ट डिरेक्टर तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चंद्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" वापस आते हैं ‘अमृत मंथन’ पर, इस फ़िल्म ने व्ही. शांताराम को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा दिलवा दिया जो मनोरंजन के साथ साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है। इसके बाद शांताराम ने अपनी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सीख दी है। इस फ़िल्म में शांता आप्टे की उत्कृष्ट अभिनय के चलते फ़िल्म के विज्ञापन में लिखा गया- “Shanta Apte made 200000 persons shed tears at Krishna Talkies”. ‘अमृत मंथन’ का मराठी संस्करण महाराष्ट्र में ख़ूब चला तो इसके हिंदी संस्करण ने उत्तर भारत, पंजाब और लाहौर में धूम मचाई। आइए, अब इसी फिल्म का एक गीत “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...” बसन्त देसाई के स्वर में सुनते हैं।


फिल्म ‘अमृत मन्थन’ : ‘सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...’ : बसन्त देसाई



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, April 25, 2013

कारवाँ सिने-संगीत का : 1933 की दो उल्लेखनीय फिल्में



भारतीय सिनेमा के सौ साल – 42

कारवाँ सिने-संगीत का

वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ और हिमांशु राय की ‘कर्म’



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1933 में ‘वाडिया मूवीटोन’ के गठन और इसी संस्था द्वारा निर्मित फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इसके साथ ही देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत पहली ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म ‘कर्म’ की चर्चा भी कर रहे हैं।

1933 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन। वाडिया भाइयों, जे. बी. एच. वाडिया और होमी वाडिया, ने इस कंपनी के ज़रिए स्टण्ट और ऐक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु किया। दरअसल वाडिया भाइयों ने मूक फ़िल्मों के जौनर में ‘तूफ़ान मेल’ शीर्षक से एक लो-बजट थ्रिलर फ़िल्म बनाई थी, जिसे ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। इसी सफलता से प्रेरित होकर इन दो भाइयों ने ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन किया और इस बैनर तले पहली सवाक फ़िल्म ‘लाल-ए-यमन’ 1933 में प्रदर्शित की। ऐक्शन फ़िल्मों में ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है और इसी वजह से ‘वाडिया’ की फ़िल्मों में गीत-संगीत का पक्ष अन्य फ़िल्मों के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ करता था। ज़बरदस्ती गीत डालने से थ्रिलर फ़िल्मों की रोचकता में कमी आती है, इस बात का वाडिया भाइयों को पूरा अहसास था, इसीलिए इस कंपनी ने बाद के वर्षों में संगीत-प्रधान लघु फ़िल्मों का अलग से निर्माण किया।
फिरोज दस्तूर 

इन लघु फ़िल्मों के ज़रिए कई संगीतज्ञों ने लोकप्रियता भी हासिल की, जिनमें शामिल थे अहमद जान थिरकवा, सखावत हुसैन ख़ान, हबीब ख़ान, मलिका पुखराज, बाल गंधर्व, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और फ़िरोज़ दस्तूर। दस्तूर ने पहली बार ‘लाल-ए-यमन’ में संगीतकार जोसेफ़ डेविड के निर्देशन में गीत गाये जिनमें शामिल थे “अब नहीं धरत धीर”, “जाओ सिधारो फ़तेह पाओ”, “खालिक तोरी नजरिया”, “मशहूर थे जहाँ में जो”, “तसवीर-ए-ग़म बना हूँ” और “तोरी हरदम परवर आस” आदि। फ़िल्म के संगीतकार मास्टर मोहम्मद ने इस फ़िल्म में एक सूफ़ी फ़कीर की भूमिका निभाने के अतिरिक्त “गाफ़िल बंदे कुछ सोच ज़रा” गीत भी गाया। अब हम आपको फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ से फिरोज दस्तूर का गाया गीत- ‘मशहूर थे जहाँ में...’ सुनवाते हैं।


फिल्म लाल-ए-यमन : ‘मशहूर थे जहाँ में...’ : फिरोज दस्तूर



अभिनेत्री सरदार अख़्तर अभिनीत पहली फ़िल्म 1933 में बनी, ‘ईद का चांद’ शीर्षक से ‘सरोज मूवीटोन’ के बैनर तले। पिछले वर्ष की तरह सुंदर दास भाटिया का संगीत ‘सरोज’ की फ़िल्मों में सुनने को मिला। संवाद व गीतकार के रूप में अब्बास अली और एम. एस. शम्स ने इस फ़िल्म में काम किया था। हरिश्चन्द्र बाली, जो ख़ुद एक संगीतकार थे, सरदार अख़्तर के साथ फ़िल्म ‘नक्श-ए-सुलेमानी’ में अभिनय किया। सुंदर दास के ही संगीत में ‘सरोज’ की एक और उल्लेखनीय फ़िल्में रही ‘रूप बसंत’ जिसके गीतकार थे मुन्शी ‘शम्स’। इन सभी फ़िल्मों में गुजराती नाट्य जगत से आये गायक अशरफ़ ख़ान ने कई गीत गाये जो लोगों को ख़ूब भाये।

देविका रानी और हिमांशु रॉय 
‘कर्म’ पहली भारतीय बोलती फ़िल्म थी जिसका प्रदर्शन इंग्लैण्ड में हुआ था। इसके अंग्रेज़ी संस्करण का शीर्षक था ‘फ़ेट’। देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत यह फ़िल्म एक ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी जिसका प्रीमियर लंदन में 1933 के मई के महीने में हुआ था। इसका हिन्दी संस्करण 27 जनवरी, 1934 को बम्बई में रिलीज़ हुआ था। ‘कर्म’ के संगीतकार थे अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट, जिन्होंने देविका रानी से एक अंग्रेज़ी गीत “now the moon her light has shed” भी गवाया था। टैगोर ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाली देविका रानी, जिन्हें ‘फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इण्डियन स्क्रीन’ की उपाधि दी जाती है, लंदन के ‘रॉयल अकादमी ऑफ़ आर्ट ऐण्ड म्युज़िक’ गई थीं पढ़ाई के सिलसिले में। वहाँ उनकी मुलाक़ात हिमांशु राय से हुई और उनसे शादी कर ली। 1929 की मूक फ़िल्म ‘प्रपांच पाश’ में देविका रानी एक ‘फ़ैशन डिज़ाइनर’ के रूप में काम किया, जिसके लिए दुनिया भर में उनके काम को सराहा गया। ‘प्रपांच पाश’ और ‘कर्म’ के बाद देविका और हिमांशु भारत चले आये और 1934 में गठन किया ‘बॉम्बे टॉकीज़’ का। इस बैनर तले बहुत सारी कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ, बहुत से कलाकारों (जिनमें अभिनेता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार शामिल हैं) को ब्रेक दिया जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के स्तंभ कलाकार बने। फ़िल्म-संगीत को भी एक नया आयाम देने का श्रेय ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को दिया जा सकता है। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को पहली भारतीय ‘पब्लिक लिमिटेड “फ़िल्म” कंपनी’ होने का गौरव प्राप्त है। लीजिए, अब आप फिल्म ‘कर्म’ का एक दुर्लभ गीत सुनिए।


फिल्म कर्म : ‘मेरे हाथ में तेरा हाथ रहे...’ : संगीतकार - अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। 


शोध व आलेख सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, April 11, 2013

कृष्णचन्द्र डे और कुन्दनलाल सहगल की गायकी


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 41

कारवाँ सिने-संगीत का 

न्यू थिएटर्स की पूरन भगत और यहूदी की लड़की


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी न्यू थिएटर्स द्वारा १९३३ में निर्मित दो फिल्मों- पूरन भगत और यहूदी की लड़की के गीतों की चर्चा कर रहे हैं। 

लकत्ते की न्यू थिएटर्स ने १९३३ में तीन महत्वपूर्ण फ़िल्में बनाई – ‘पूरन भगत’, ‘राजरानी मीरा’, और ‘यहूदी की लड़की’। बोराल और सहगल की जोड़ी ने पुन: अपना जादू जगाया ‘पूरन भगत’ में। राग बिहाग और यमन-कल्याण पर आधारित “राधे रानी दे डारो ना” हो या “दिन नीके बीते जाते हैं सुमिरन कर पिया राम नाम”, फ़िल्म के सभी गीत, जो मूलत: भक्ति रस पर आधारित थे, लोकप्रिय हुए। वैसे सहगल इस फ़िल्म में नायक नहीं थे, सिर्फ़ उनके गाये गीत रखने के लिये उन्हें पर्दे पर उतारा गया था। “राधा रानी…” भजन संगीतकार रोशन के मनपसंद भजनों में से एक है, ऐसा उन्होंने एक रेडिओ कार्यक्रम में कहा था। कृष्ण चन्द्र डे, जो के. सी. डे के नाम से भी जाने गए, इस फ़िल्म में अभिनय और गायन प्रस्तुत किया। “जाओ जाओ हे मेरे साधु रहो गुरु के संग” और “क्या कारण है अब रोने का, जाये रात हुई उजियारा” जैसे गीत उन्हीं के गाये हुए थे। सहगल और के. सी डे की दो आवाज़ें एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग थीं। एक तरफ़ सहगल की कोमल मखमली आवाज़, तो दूसरी तरफ़ के. सी. डे की आवाज़ थी बुलंद। के. सी. डे के बारे में यह बताना ज़रूरी है कि वो आँखों से अंधे थे। कुछ लोग कहते हैं कि वो जनम से ही अंधे थे, जबकि कई लोगों का कहना है कि कड़ी धूप में पतंगबाज़ी करने से उनके आँखों की रोशनी जाती रही। उन्हें फिर ‘अंध-कवि’ की उपाधि दी गई। पार्श्वगायक मन्ना डे इन्हीं के भतीजे हैं। मन्ना डे ने सहगल और अपने चाचाजी का ज़िक्र एक रेडिओ कार्यक्रम में कुछ इस तरह से किया था - "सहगल साहब बहुत लोकप्रिय थे। मेरे सारे दोस्त जानते थे कि मेरे चाचा जी, के.सी. डे साहब के साथ उनका रोज़ उठना बैठना है। इसलिए उनकी फ़रमाइश पे मैंने सहगल साहब के कई गाने एक दफ़ा नहीं, बल्कि कई बार गाये होंगे। 'कॉलेज-फ़ंक्शन्स' में उनके गाये गाने गा कर मैंने कई बार इनाम भी जीते।" उधर ‘राजरानी मीरा’ बांगला फ़िल्म ‘मीरा’ का हिंदी रीमेक था, जिसमें पृथ्वीराज कपूर और पहाड़ी सान्याल सान्याल तो थे ही, साथ में दुर्गा खोटे को विशेष रूप से ‘प्रभात’ से कलकत्ता लाया गया था इस फ़िल्म के शीर्षक किरदार को निभाने के लिए। दुर्गा खोटे के गाये मीरा भजन तो थे ही, साथ में शास्त्रीय गायिका और पेशे से तवायफ़, इंदुबाला से भी कुछ गीत बोराल ने गवाये। लीजिए, के.सी. डे की आवाज़ में फिल्म ‘पूरन भगत का यह लोकप्रिय गीत सुनिए-

फिल्म पूरन भगत : “जाओ जाओ हे मेरे साधु रहो गुरु के संग” : कृष्ण चन्द्र डे


‘यहूदी की लड़की’ के माध्यम से एक ऐसे संगीतकार ने फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में क़दम रखा जिनके सुझाये फ़ॉरमेट पर हिंदी फ़िल्मी गीत आज तक बनती चली आई है। ये थे पंकज मल्लिक जिनकी संगीत-प्रतिभा का लोहा आज तक कलाकार मानते हैं, और फ़िल्म-संगीत के अगले दौर के संगीतकारों (उदाहरण: ओ. पी. नय्यर) के लिए भी वो प्रेरणास्रोत बने हैं। संगीतकार तुषार भाटिया ने एक बार मुझे बताया था कि भले ही आर. सी. बोराल न्यू थिएटर्स के प्रथम संगीतकार हुए, लेकिन उनकी रचनाओं में शुद्ध शास्त्रीय संगीत ही झलकती। फ़िल्म-संगीत को अपना स्वरूप प्रदान किया था पंकज मल्लिक ने, और यही स्वरूप आज तक चली आ रही है। रबीन्द्र-संगीत को पहली बार स्वरबद्ध करने और फ़िल्म-संगीत में उन्हें शामिल करने का श्रेय भी पंकज मल्लिक को ही जाता है। पंकज बाबू का पहला ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड १९२६ में विडिओफ़ोन कंपनी ने निकाला था। सवाक फ़िल्मों में संगीतकार बनने से पहले वो ‘इंटरनैशनल फ़िल्मक्राफ़्ट’ की मूक फ़िल्मों के प्रदर्शन के दौरान ‘लाइव ऑरकेस्ट्रा’ का संचालन करते थे। रेडिओ से भी ४०-४५ वर्ष का उनका गहरा नाता रहा। ‘यहूदी की लड़की’ में सहगल के गाए ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने” को पंकज मल्लिक ने राग भीमपलासी में स्वरबद्ध कर सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। रतनबाई का गाया “अपने मौला की जोगन बनूंगी” भी इस फ़िल्म का एक लोकप्रिय गीत था। अब हम आपको सहगल की आवाज़ में मिर्ज़ा गालिब की यही मशहूर गजल सुनवाते हैं।

फिल्म यहूदी की लड़की : “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने” : कुंदनलाल सहगल 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे आपको । सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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