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Friday, March 14, 2014

जुगनी उडी गुलाबी पंख लेकर इस होली पर

ताज़ा सुर ताल - 2014 - 10

दोस्तों इस रविवार को दुनिया भर में मनाया गया महिला दिवस. आज जो दो गीत हम आपके लिए चुनकर लेकर आये हैं वो भी नारी शक्ति के दो मुक्तलिफ़ रूप दर्शाने वाले हैं. पहला गीत है गुलाब गैंग  का...कलगी हरी है, चोंच गुलाबी, पूँछ है उसकी पीली हाय, रंग से हुई रंगीली रे चिड़िया, रंग से हुई रंगीली ... नेहा सरफ के लिखे इस खूबसूरत गीत में गौर कीजिये कि उन्होंने इस चिड़िया की चोंच गुलाबी  रंगी है, यही बदलते समय में नारी की हुंकार को दर्शाता है. वो अब दबी कुचली अबला बन कर नहीं बल्कि एक सबल और निर्भय पहचान के साथ अपनी जिंदगी संवारना चाहती है. शौमिक सेन के स्वरबद्ध इस गीत को आवाज़ दी है कौशकी चक्रवर्ति ने. गुलाब गैंग  में ९० के दशक की दो सुंदरियाँ, माधुरी दीक्षित और जूही चावला पहली बार एक साथ नज़र आयेगीं. फिल्म कैसी है ये आप देखकर बताएं, फिलहाल सुनिए ये गीत जो इस साल होली को एक नए रंग में रंगने वाली है. 
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कितने काफिले समय के/ धूल फांकते गुजरे हैं/ मेरी छाती से होकर/ मटमैली चुनर सी /बिछी रही आसमां पे मैं...
कोख में ही दबा दी गयी/ कितनी किलकारियां मेरी/ नरक का द्वार, ताडन को जाई,/ कुलटा, सती, देवी, डायन,/ जाने क्या क्या कहलाई मैं...जली, कटी, लड़ी मगर,/ चीखी भी, चिल्लाई भी मैं,
इन हाथों को, पखों में बदलने को,/जाने कितनी प्रसव वेदनाओं से,/ गुजरी हूँ मैं....अब उड़ने दो, उड़ने दो, उड़ने दो मुझे/ मैं आधी धरा हूँ तो,/ आधे आकाश को भी तो अपना, कहने दो मुझे.... 
कुछ ऐसे ही जज़्बात हैं हमारे अगले गीत में, जिसे गाया और स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने. शब्द रचे हैं अन्विता दास गुप्तन ने. फिल्म है Queen कंगना रानौत की ये फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आ रही है. अमित ने बेहद मुक्तलिफ़ रंग के गीत रचे हैं फिल्म के लिए, ये गीत भी उनमें से एक है. लीजिए मिलिए इस जुगनी  से जो पिंजरा तोड़ उड़ चली है नीले विशाल गगन में, अपनी नई पहचान ढूँढने. 

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Monday, October 22, 2012

जवां रिदम पर पुरानी तान छेड़ता स्टूडेंट ऑफ द ईअर का संगीत


प्लेबैक वाणी 

एक अरसे के बाद निर्देशन में उतरे हैं करण जौहर, और उनकी नयी फिल्म में न शाहरुख, न हृतिक, न काजोल, न रानी मुखर्जी. यानी बड़े सितारों से अलग उन्होंने चुने हैं एकदम नए नौजवान सितारे, अब देखना है कि इन नए घोड़ों के कन्धों पर करण एक और बड़ी हिट दे पायेंगें या नहीं. उनकी फिल्मों की सफलता का एक बड़ा श्रेय संगीत का रहा है. अब तक की उनकी हर फिल्म संगीत के लिहाज से जबरदस्त रही है. आईये देखें स्टूडेंट ऑफ द ईयर के संगीत का हाल, हमारी आज की चर्चा में.

अल्बम में संगीत है विशाल शेखर का और गीत लिखें हैं अन्विता दस गुप्तन ने. अल्बम की शुरुआत होती है ८० के दशक के यादगार हिट डिस्को दीवाने के रीमिक्स से. जैसे कि हमारे श्रोता वाकिफ होंगें कि किस तरह नाजिया हसन का ये लाजवाब डिस्को गीत एक दौर में हर जवां दिल की धडकन हुआ करता था. नाज़िया हसन के सफर का जिक्र हम अपनी सिरीस अधूरी रही जिनकी कहानियाँ में कर चुके हैं. किसी पुराने गीत को नए दौर के लिए कैसे फिर से जिंदा किया जा सकता है ये कोई विशाल शेखर से सीखे. डिस्को दीवाने का ये संस्करण बेहद ऊर्जात्मक है मगर फिर भी इसमें ८० के उस पुराने चार्म का स्वाद भी है. सुनिधि की आवाज़ नाज़िया की याद दिला देती है. बेनी ने उनका अच्छा साथ दिया है. डिस्को दीवाने कहे जाने के बाद वोइलन का वो रेवेर्स स्ट्रोक गजब लगता है. पुरानी यादों से सराबोर एक दमदार गीत जो दो पीढ़ियों को एक साथ जोड़ रहा है.

करण का मानना है कि बिना एक मेलोडियस रोमांटिक गीत के कोई भी अल्बम अधूरी ही रहती है. तो अगला गीत है इश्क वाला लव. मजरूह के लिखे पहला नशा गीत जैसी मासूमियत भरी है अन्विता ने इस गीत में. बेहद खूबसूरत शब्द और उसकी एक सरल मधुर धुन. युवा दिलों की धडकनें क्यों न धडकने लगे इसे सुनकर. शेखर, नीति और सलीम की आवाजों में इस मीठा मीठा सा गीत एक चितचोर है...

कुक्कड गीत शाहिद मल्लया की आवाज़ में है, जिन्होंने मौसम का खूबसूरत रोमांटिक गीत गाया था, ये गीत पारंपरिक पंजाबी गीतों जैसी ही है. कुछ नयापन इसमें नहीं है, पर छेड़ छाड से भरा होने के कारण अल्बम के बाकी गीतों से कुछ अलग अवश्य है.

अगला गीत राधा अल्बम के सबसे बेहतर गीतों में से एक है, राधा कृष्ण की रासलीला का एक नया ही अंदाज़ है यहाँ. बस डर इस बात का है कि कहीं धर्म के ठेकेदार राधा और कृष्ण के इस रूपांतरण को स्वीकार न कर पाए तो दिक्कत पेश आ सकती है. श्रेया की मस्त आवाज़ के साथ यहाँ है विशाल और शेखर भी, तो बहुत दिनों बाद सुरीली बयार लेकर आते हैं उदित नारायण भी. एक खिलखिलाता गीत जो हर उम्र के श्रोताओं को लुभा सकता है.

वेले गीत में विशाल और शेखर न सिर्फ संगीतकार है बल्कि मायिक के पीछे भी उन्हीं के स्वर हैं. एक और हिप हॉप और कदम थिरकाने वाला गीत, जो युवाओं को खास पसंद आएगा.

तो कुल मिलाकर करण अपनी तमाम पुरानी फिल्मों की तरह यहाँ भी संगीत के मामले में अव्वल साबित हुए हैं. फिल्म का संगीत विविधताओं से भरा है, और यहाँ सुरों के बेहद मुक्तलिफ़ रंग बिखरे हैं, युवाओं को लक्षित कर रचे इन गीतों में सुरीलापन भी है और आज के दौर की रिदमिक झनकार भी. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस अल्बम को ४.१ की रेटिंग



एक सवाल : क्या आप जानते हैं कि मूल डिस्को दीवाने में नाज़िया के साथ कौन गायक थे और वो नाजिया से किस तरह सम्बंधित थे ? बताईये टिप्पणियों के माध्यम से 

Tuesday, May 11, 2010

प्रीतम लाए हैं बदमाश कम्पनी वाली अय्याशी तो शंकर एहसान लॊय के साथ है धन्नो की हाउसफुल महफ़िल

ताज़ा सुर ताल १८/२०१०

सुजॊय - विश्व दीपक जी, साल २०१० के चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वह एक गीत अभी तक नहीं आ सका है जिसे इस साल का 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' कहा जा सकता हो। मेरे हिसाब से तो इस साल का संगीत कुछ ठंडा ठंडा सा चल रहा है। आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं आपकी बात से एक हद तक सहमत हूँ। फिर भी मुझे न जाने क्यों "रावण" के "रांझा-रांझा" से ढेर सारी उम्मीदें हैं। अभी तक जितने भी गाने इस साल आए हैं, यह गाना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। आगे क्या होगा, यह कहा तो नहीं जा सकता, लेकिन बस चार महीने में 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' का निर्णय कर देना तो जल्दीबाजी हीं होगी। इसलिए धैर्य रखिए.... मुझे पूरा विश्वास है कि बाकी के आठ महीनों में कुछ न कुछ कमाल तो ज़रूर हीं होगा, नहीं तो रावण है हीं। खैर ये बताईये कि आज हम किस फिल्म या फिर किन फ़िल्मों के गानों की चर्चा करने जा रहे हैं।

सुजॊय - आज हमने इस स्तंभ के लिए दो ऐसी फ़िल्मों के तीन-तीन गीत चुने हैं जो फ़िल्में हाल ही में प्रदर्शित हो चुकी हैं। ये दो फ़िल्में हैं 'बदमाश कंपनी' और 'हाउसफ़ुल'। हमने जब रावण के संगीत की समीक्षा की थी, तब हीं इन दो फिल्मों का ज़िक्र आया था, लेकिन ’रहमान’ के नाम के कारण रावण को तवज्जो देनी पड़ी। आज दो हफ़्तों के बाद हमें फिर से इन पर नज़र दौराने का मौका मिला है। तो हम इस समीक्षा की शुरूआत 'बदमाश कंपनी' के गीतों से करते हैं। इस फिल्म के रिव्यूज तो कुछ अच्छे नहीं सुनाई दे रहे। कहानी में भी ज़्यादा दम नहीं है, वही चार दोस्तों की शॊर्ट-कट वाले रस्ते में चलकर अमीर बनने की कहानी।

विश्व दीपक - शाहिद कपूर, अनुश्का, वीर दास और मेयांग चैंग इस फ़िल्म के चार मुख्य किरदार हैं। ध्यान देने वाली बात है कि मेयांग चैंग, जो कि पिछले साल 'इंडियन आइडल' के अच्छे गायकों में से एक रहे हैं, इस फ़िल्म में उनकी आवाज़ में कोई भी गीत नहीं है। मुझे यह बात थोड़ी खली ज़रूर। लेकिन क्या कर सकते हैं। निर्णय तो संगीतकार और निर्देशक का हीं होता है। वैसे आपको बता दें कि फ़िल्म में संगीत प्रीतम का है और शाहिद कपूर के साथ उनके गानें ख़ूब कामयाब रहे हैं जैसे कि 'जब वी मेट', 'किस्मत कनेक्शन', 'दिल बोले हड़िप्पा' आदि।

सुजॊय - शाहिद कपूर को अगर इस दौर का जम्पिंग जैक जीतेन्द्र कहा जाए तो गलत न होगा। और प्रीतम के थिरकन भरे गानों को वो अपनी दमदार डान्स से सार्थक बनाते भी हैं। 'बदमाश कंपनी' में भी तेज़ रीदम के कई गीत हैं। जैसे कि पहला गीत जो हम सुनवाने जा रहे हैं "चस्का चस्का लगा है"। सुनते हैं कृष्णा और साथियों की आवाज़ में यह गीत। इस गीत के बारे में यही कह सकते हैं कि विशाल भारद्वाज ने 'कमीने' के "ढैन ट नैन" में जिस तरह के जीवन शैली जीने वाले युवाओं को दर्शाया है, "चस्का" में वही कोशिश सुनाई देती है लेकिन यह गीत ख़ास असर नहीं करती, और एक बहुत ही एवरेज गीत है मेरे ख़याल में।

विश्व दीपक - गीत के अरैंजमेण्ट में ज़्यादा ध्यान दिया गया है और तेज़ रीदम के बीच कृष्णा की आवाज़ बैकग्राउंड में जैसे सुनाई देती है और ड्रम बीट्स ही फ़ोरग्राउंड पर पूरे गीत में छाए हुए हैं। फ़िल्म की गीतकारा अन्विता दत्त गुप्तन ने कोशिश तो अच्छी की है गुलज़ार साहब की तरह वही "ढैन ट नैन" वाला अंदाज़ लाने की, लेकिन वो उसमें कितनी सफल हुईं हैं, यह आप ख़ुद ही गीत को सुन कर निर्णय लीजिए। वैसे अगर आप मुझसे पूछें तो मुझे "ताजी/भाजी करारी है, भून के उतारी है, किस्मत गरमा-गरम" जैसे प्रयोग बेहद पसंद आते हैं। और इस लिहाज से मुझे इस गाने के बोल जबरदस्त तो नहीं कहूँगा लेकिन हाँ अच्छे जरूर लगे। चलिए तो सुनते हैं "चस्का"।

गीत: चस्का चस्का


सुजॊय - जब फ़िल्म की कहानी ही ऐसी है कि चार युवा जो ग़लत राह इख़्तियार कर अमीर बनने की कोशिश में लगे हैं एक आलीशान ज़िंदगी पाने की चाहत में, तो ऐसे में अगर फ़िल्म के किसी गीत का मुखड़ा हो "सर चढ़ी है ये अय्याशी", तो इसमें गीतकार को दोष देना ग़लत होगा। जी हाँ, इस फ़िल्म के एल्बम का पहला गीत ही है "अय्याशी"। के. के और साथियों का गाया हुआ गीत है। के. के ने अपनी रॊक शैली वाले अंदाज़ में इस गीत को बखूबी निभाया है। पहले भी मैंने कहा था, आज दोहरा रहा हूँ कि के.के एक ऐसे गायक हैं जिनकी चर्चा बहुत कम होती है, लेकिन वो अपने हर गीत में अपना १००% देते हैं। आजकल वैसे उनकी आवाज़ में 'काइट्स' का गीत "ज़िंदगी दो पल की" गली गली गूँज रहा है।

विश्व दीपक - जहाँ तक "अय्याशी" का सवाल है, प्रीतम की टेक्नो ईलेक्ट्रॊनिक धुनें गीत के बोलों पर हावी होते सुनाई देती हैं। हिप हॊप और 'डेथ रॊक मेटल' का मिला जुला संगम है इस गीत का संगीत। इस गीत का भाव फ़िल्म के कहानी के साथ जाता है और प्रोमोज़ भी इसी गीत के ज़रिए किया गया है कई दिनों तक। बहुत ज़्यादा इम्प्रेसिव तो नहीं कहेंगे, लेकिन कहानी के हिसाब से ठीक ठाक है।

गीत: अय्याशी


विश्व दीपक - और अब सूफ़ी रंग। आज के दौर का यह चलन बन चुका है कि हर फ़िल्मकार अपनी फ़िल्म में कम से कम एक सूफ़ियाना अंदाज़ का गीत डालने की कोशिश कर रहा है। 'बदमाश कंपनी' में भी प्रीतम ने राहत फ़तेह अली ख़ान से एक ऐसा ही गीत गवाया है, लेकिन पाश्चात्य संगीत के साथ सूफ़ी का ऐसा फ़्युज़न किया है कि गीत कुछ अलग ही शक्ल में सामने आता है। "फ़कीरा" को हम एक 'सूफ़ी-रॊक' गीत कह सकते हैं।

सुजॊय - इससे पहले प्रीतम के संगीत में फ़िल्म 'दे दना दन' में "रिश्ते नाते हंस के तोड़ दूँ" गीत गाया था राहत साहब ने, जिसमें एक सुकून एक मिठास थी। लेकिन इस गीत पर इतना ज़्यादा रॊक का रंग चढ़ा दिया गया है कि गीत की आत्मा कहीं खो सी गई है। यह भी मेरे ख़याल से एक ऐवरेज गीत है और राहत साहब जैसे गायक के होते हुए भी गाना दिल को ज़्यादा छू नहीं पाया। आगे आप सुनिए और बताइए कि आपको इस गीत के बारे में क्या कहना है।

गीत: फ़कीरा


विश्व दीपक - और अब आज की दूसरी फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' के तीन गीतों की बारी। अक्षय कुमार, अर्जुन रामपाल, रितेश देशमुख, दीपिका पादुकोन, लारा दत्ता, जिया ख़ान, चंकी पाण्डेय जैसे मल्टी स्टार कास्ट वाली यह हास्य फ़िल्म लोगों को पसंद आ रही है ऐसा सुनने में आया है। फ़िल्म में संगीत शंकर अहसान लॊय का है।

सुजॊय - यह फ़िल्म भले ही अपनी कॊमेडी की वजह से लोगों को आकर्षित कर रही है, लेकिन गीत संगीत में उतना दम नहीं है। यह इसलिए भी हो सकता है क्योंकि इस फिल्म में ऐसे गानों की हीं ज़रूरत है जो लोगों को थिरकाएँ। लोग इन गानों को भविष्य में याद रखते हैं या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। आपको याद होगा कि "हे बेबी" में भी इस तिकड़ी ने ऐसे हीं गाने दिए थे। तो इन गानों में से पहला गीत जो हम सुनने जा रहे हैं वह है "ओ गर्ल, यू आर माइन"। तरुण सागर, अलीसा मेनडॊन्सा और लॊय ने इस गीत को गाया है। गाने का रीदम कैची है, शुरुआती संगीत में जो हारमोनिका सुनाई देता है, वह भी पहली बार सुनने वाले को आकर्षित करता है। आजकल यही गीत हर टीवी चैनल और रेडियो चैनल पर सुनाई दे रहा है। और चलिए यहाँ भी इस गीत को सुना जाए शुरु से लेकर आख़िर तक।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, गाना तो हम सुन हीं लेंगे लेकिन क्या आपने ध्यान दिया कि "तरूण सागर" का नाम बेहद अनजाना तो कुछ-कुछ जाना-पहचाना-सा है। दर-असल तरूण पिछली साल के "सारेगामापा" में एक प्रतिभागी थे, विजयी तो नहीं हुए, लेकिन शंकर महादेवन की नज़रों में आ गए और फिर देखिए किस्मत उन्हें कहाँ से कहाँ ले गई। पहली हीं फिल्म में शंकर के लिए गाना कोई छोटी बात नहीं है। "ओ गर्ल" के बाद हम जो गाना सुनेंगे, उसमें भी एक नई गायिका हैं "रीतु पाठक"। तरूण जहाँ सारेगामापा के प्रतिभागी थे तो रीतु "इंडियन आईडल" की। शंकर-एहसान-लॊय ने इन दोनों गलाकारों को एक बहुत हीं मज़बूत मंच दिया है। मैं तो यही दुआ करता हूँ कि ये दोनों संगीत की दुनिया में बहुत आगे जाएँ और ऐसे हीं एक से बढकर एक गाने गाते रहें। हाँ तो अब सुनते हैं वो गीत:

गीत: ओ गर्ल यू आर माइन


सुजॊय - आजकल फ़िल्मी गीतों में बोलों के लिहाज़ से भी उतने ही प्रयोग हो रहे हैं जितने की संगीत में हो रहे हैं। आज से दस साल पहले तक शायद हीं किसी ने यह सोचा होगा कि "पप्पु काण्ट डान्स साला" जैसे मुखड़े भी कभी आ सकते हैं तो फिर अगर 'हाउसफ़ुल' में गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य लिखते हैं कि "वॊल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा" तो इसमें बहुत ज़्यादा हैरान होनेवाली बात नहीं है।

विश्व दीपक - इस गीत को गाया है रीतु पाठक(जिनका ज़िक्र हमने पहले हीं कर दिया है), नीरज श्रीधर और अलीसा मेन्डोन्सा(लॊय की सुपुत्री) ने। पिछले गीत की तरह यह भी एक पेप्पी नंबर है। हल्के फुल्के गीत शैली में ये दोनों गानें ही कैची हैं। 'बदमाश कंपनी' के गानों ने पेप्पी होते हुए भी जो असर नहीं किया था, शायद 'हाउसफ़ुल' के गीत उस मापदंड पर कुछ हद तक खरे उतर जाएँ।

सुजॊय - मुझे भी ऐसा लगा कि ये दोनों गीतों ने अपनी रीदम के बल पे कुछ हद तक आज के युवाओं को वश में किया है। आइए यह गीत भी सुन लेते हैं।

गीत: वॊल्युम कम कर पप्पा जाग जाएगा


विश्व दीपक - ’हाउसफ़ुल' एल्बम का मुख्य आकर्षण है अमिताभ बच्चन की 'लावारिस' फ़िल्म के मशहूर गीत "अपनी तो जैसे तैसे" का रिमिक्स वर्ज़न। गीत का शीर्षक रखा गया है "आपका क्या होगा (धन्नो रिमिक्स)"। लगता है अब यह नया स्टाइल भी चल पड़ेगा कि हर फ़िल्म में किसी पुराने गीत का रिमिक्स डाल दिया जाएगा। आपका क्या ख़याल है सुजॊय?

सुजॊय - हो सकता है। पिछले कुछ समय से रिमिक्स गानें बनाने की होड़ कुछ ख़त्म सी हो गई थी, अब हो सकता है कि इसके बाद फिर से एक बार रिमिक्स बनाने का सिलसिला शुरु हो जाए। इस विवाद पर न जाते हुए आपको यह बता दें कि किशोर दा के इस ऒरिजनल गीत को आवाज़ दी है मिका ने और साथ में हैं सुनिधि चौहान और साजिद ख़ान।

विश्व दीपक - विवाद का आपने ज़िक्र किया तो मैं कम से कम इतना बता दूँ कि विवाद वैसे भी शुरु हो गया है इस गीत को लेकर, ऐसा कहा जा रहा है कि निर्माता ने ऒरिजिनल गीत के कॊपीराइट्स उचित तरीके से हासिल नहीं किए हैं।

सुजॊय - "अपनी तो जैसे तैसे" गीत को लिखा था अंजान साहब ने। और अब इस गीत का रिकिक्स्ड वर्ज़न को लिखा है उन्ही के सुपुत्र गीतकर समीर ने। एक तरह से अपने पिता को श्रद्धांजलि ही हुई उनकी तरफ़ से। आइए सुनते हैं यह गीत और आज के 'ताज़ा सुर ताल' की चर्चा यहीं संपन्न करते हैं।

गीत: आपका क्या होगा (धन्नो)


"बदमाश कंपनी" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बदमाश कंपनी से प्रीतम और अन्विता दत्त गुप्तन पहली बार एक साथ आए हैं। प्रीतम के साथ इरशाद कामिल की जो जोड़ी है, वह कमाल करती है और हमें इस फिल्म में उसी जोड़ी की कमी खल गई। वैसे कोई बात नही, अगली फिल्म "राजनीति" में यह जोड़ी वापस आ रही है।

"हाउसफुल" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२
इस फिल्म के हमने तीन हीं गाने चुने हैं लेकिन हम यहाँ पर एक और गाने का ज़िक्र करना चाहेंगे। गाने के बोल हैं "आई डोंट नो व्हाट टू डू".. बोल कुछ अजीब से लगते हैं, लेकिन इस गाने में सुनिधि चौहान और शब्बीर कुमार (हाँ आपने सही सुना, ८० के दशक के सुपरहिट शब्बीर कुमार की आवाज़ है इस गाने में) ने सेन्सुअस और छेड़-छाड़ वाले गानों को एक नया अर्थ दिया है। इस गाने के कारण हीं हम इस एलबम को एक्स्ट्रा आधी रेटिंग दे रहे हैं। हमें खेद है कि हम ये गाना आपको सुनवा नहीं पाए, लेकिन आप इसे किसी भी तरह से सुनिएगा ज़रूर।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५२- जिस साल मेयांग चैंग 'ईंडियन आइडल' में भाग लिया था, उस साल इंडियन आइडल का ख़िताब किसने जीता था?

TST ट्रिविया # ५३- गीतकार अंजान ने फ़िल्म 'लावारिस' के लिए लिखा था "अपनी तो जैसे तैसे"। बताइए कि इस फ़िल्म में उनके अलावा और किन गीतकार ने गीत लिखे थे।

TST ट्रिविया # ५४- आज के 'ताज़ा सुर ताल' में में रितेश देशमुख, प्रीतम और मिका का अलग अलग ज़िक्र आया है। क्या आप कोई ऐसा गीत बता सकते हैं जिसमें इन तीनों का योगदान रहा हो?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'फ़िल्मफ़ेयर आर.डी. बर्मन अवार्ड' तथा सर्वश्रेष्ठ पार्श्व संगीत (बेस्ट बैकग्राउंड म्युज़िक) - ये दोनों पुरस्कार फ़िल्म 'देव-डी' के लिए।
२. फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में "लुका छुपी बहुत हुई सामने आ जाना"।
३. फ़िल्म 'वेक अप सिड' और गायिका कविता सेठ।

सीमा जी, आपके तीनों जवाब सहीं हैं। बधाई स्वीकारें!

Thursday, October 1, 2009

मेक ए विश...कह रहे हैं अमिताभ...इस दिवाली मांग ही डालिए कुछ अपने जिन्नी से

ताजा सुर ताल (26)

दोस्तों आज ताजा सुर ताल में मैं सजीव सारथी अकेला ही हूँ आपके स्वागत के लिए क्योंकि आपके प्रिय होस्ट सुजॉय दुर्गा पूजा की खुशियाँ अपने परिवार के साथ बांटने घर गए हुए है....खैर आज मैं जो गीत आपको सुनवाने जा रहा हूँ, वो एक "रैप" सोंग है, रैप यानी एक सधे हुए पेटर्न पर गीत की पंक्तियों को तेजी से बोलना, बरसों पहले अशोक कुमार ने फिल्म आशीर्वाद के लिए "रेलगाडी" गीत गाया था कुछ इसी अंदाज़ में, याद है न ?, पता नहीं उस ज़माने में इसे रैप ही कहते थे या कुछ और....पाश्चात्य संगीत की इस मशहूर संगीत परंपरा को हिन्दुस्तान में बाबा सहगल ने अपने "ठंडा ठंडा पानी" से लोकप्रिय बनाया..बाद में रहमान ने भी कुछ गीतों में रैप का इस्तेमाल किया....आजकल तो ये लगभग हर गीत का हिस्सा बन चूका है. आज कल लगभग हर दूसरे गीत हिप होप बनाने के लिए उसमें कुछ अंग्रेजी शब्दों का मायाजाल बुनकर उसे रैप शैली में गवा दिया जाता है. खैर हमने जो आज का गीत चुना है वो कोई मामूली रैप नहीं है..पूछिए क्यों ...

जी हाँ, ये रैप कोई इंसान नहीं बल्कि एक जिन्नी का है, "जिन्नी" ? अरे आप जिन्नी को भूल गए ? याद कीजिये बचपन में जब सुनते थे की अलादीन को जादूई चिराग मिला और उसमें से निकल एक जिन्न जो कहता है "क्या हुकम है मेरे आका"...सच बताइयेगा, क्या उस कहानी को सुनकर कभी आपने मन में नहीं आया कि काश हमें भी कोई जिन्नी मिलता... सच तो ये है कि हम सब पूरी जिंदगी असंभव से ख्वाब देखते है और सोचते हैं कि काश....और इस कोशिश कोशिश में एक दिन हम खुद ही एक जिन्नी बन जाते हैं, जो कभी अपने बच्चों की मुराद पूरी करता है कभी घर परिवार की.... हम सब में छुपा जिन्न हमारे अपनों को खुश देखने के लिए पूछता ही रहता है -."मेक ऐ विश...."

अलादीन और उसके जिन्नी की ये कहानी इस हद तक मशहूर है कि जब वाल्ट डिस्नी फिल्म्स ने जब इसका हिंदी संस्करण भारत में निकला तो बच्चों बड़ों ने इसे खूब सराहा, आपको याद होगा इस फिल्म में अलादीन की आवाज़ बने थे सोनू निगम, जिन्होंने अपनी भोली आवाज़ में संवाद बोलने के आलावा कुछ बढ़िया से गीत भी गाये थे, मगर वो एक एनीमेशन फिल्म थी, अब यही फिल्म वास्तविक कलाकारों को लेकर बनी है और जल्द ही प्रदर्शन में आने वाली है, इस दिवाली आप भी अपने बच्चों को खुश कर सकते हैं ये फिल्म दिखाकर...इस फिल्म में अलादीन बने हैं रितेश देशमुख. रितेश अलादीन के रूप में कितने जचते हैं ये तो मैं नहीं कह सकता, पर हाँ जो यहाँ जिन्न बने हैं उन पर मुझे पूरा भरोसा है कि उनका अभिनय और मात्र उनकी उपस्थिति ही काफी होगी फिल्म को दिलचस्प बनाने में. जी हाँ यहाँ आपके जिन्न हैं महा नायक अमिताभ बच्चन.

दोस्तों ये साल है २००९ और आपको बता दें की साल १९६९ में अमिताभ ने रुपहले परदे पर पहली बार अपने जलवे दिखाए थे फिल्म सात हिन्दुस्तानी में, यानी ये उनके करियर का ४० वां साल है, और आज ४० सालों के बाद भी हिंदी फिल्म जगत पर राज कर रहा है ये शहंशाह....वाह बच्चन साहब क्या कहने आपके. अक्सर उनके विशाल नायकीय व्यक्तित्व के आगे एक बात अक्सर हम भूल जाते हैं वो हैं उनकी दमदार आवाज़. "नीला आसमान सो गया..." जैसे दर्द से भरे गीत हों या, "मेरे अंगने में..." की अतिनाटकीयता या फिर "रंग बरसे" की मस्ती. अमिताभ की आवाज़ में वो जादू है कि उनके गाये मामूली से मामूली गीत को भी आप अनसुना नहीं कर सकते. ये भी एक अजीब इत्तेफाक है कि जब वो अपने चरम पर थे तब कुछ चुने हुए गीत कुछ चुने हुए संगीतकारों के लिए ही गाते थे. पर साठ पार करने के बाद तो उनके भीतर का गायक कुछ और जवान हो गया है, अब तो लगभग उनकी हर फिल्म में एक गीत अवश्य होता है उनकी अपनी आवाज़ में. इस नयी फिल्म अलादीन में गीत संगीत का जिम्मा संभाला है - विशाल शेखर और अन्विता दत्त गुप्तन ने और जाहिर है ये जिन्नी रैप है खुद अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज़ में और उनका साथ दिया है अनुष्का मनचंदा ने.

इसी माह अमिताभ बच्चन अपना जन्मदिन भी मनाएंगे, तो हम उन्हें अभी से शुभकामनाएं दिए देते है, जन्मदिन की भी और इस फिल्म अलादीन के लिए भी, कुछ सालों पहले बच्चों के दिल में अमिताभ ने ख़ास जगह बनायीं थी फिल्म "भूतनाथ" में एक भले भूत की भूमिका निभाकर. ये फिल्म मुझे और मेरे बच्चों को बेहद पसंद है, तो जाहिर है अलादीन से भी मुझे तो अच्छी ही उम्मीदें है, स्पेशल एफ्फेक्ट्स आदि भी अनूठे ही लग रहे हैं प्रोमोस देखकर. जहाँ तक संगीत की बात है इसी तरह की फिल्मों में अधिकतर गीत परिस्थितिजन्य होते है जो सुनने में कम देखने में अधिक भाते हैं. ये रैप गीत भी कुछ उसी तरह का है. इसलिए आज हम इस गीत को २.५ की रेटिंग दे रहे हैं...बाकी आप सुनकर बतायें कि आपको कैसी लगी "एंग्री यंग (?) मैन" की कूल आवाज़ इस गीत में...



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 2.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

चलते चलते
चलिए अब आप ने गीत सुन ही लिया है तो एक सवाल का जवाब भी दें, शर्त ये है कि आपने ईमानदारी से मात्र दो मिनट का समय लेकर निचे दिए गए वाक्य को पूरा करना है, जो भी जेहन में आये झट से लिख डालिए...क्योंकि जिन्नी के पास बहुत अधिक समत नहीं है....कौन जाने आपकी कोई मुराद इस बार पूरी ही हो जाए....वाक्य है -

जिन्नी - क्या हुक्म है मेरे आका? कौन सी आपकी तीन ख्वाहिशें ?
आप - जिन्नी मेरी तीन ख्वाहिशें ये है ______________

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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