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Wednesday, September 15, 2010

महफ़िल-ए-ग़ज़ल की १००वीं कड़ी में जगजीत सिंह लेकर आए हैं राजेन्द्रनाथ रहबर की "तेरे खुशबू में बसे खत"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१००

हंस ले 'रहबर` वो आये हैं,
रोने को तो उम्र पड़ी है

राजेन्द्रनाथ ’रहबर’ साहब के इस शेर की हीं तरह हम भी आपको खुश होने और खुशियाँ मनाने का न्यौता दे रहे हैं। जी हाँ, आज बात हीं कुछ ऐसी है। दर-असल आज महफ़िल-ए-ग़ज़ल उस मुकाम पर पहुँच गई है, जिसके बारे में हमने कभी भी सोचा नहीं था। जब हमने अपनी इस महफ़िल की नींव डाली थी, तब हमारा लक्ष्य बस यही था कि "आवाज़" पर "गीतों" के साथ-साथ "ग़ज़लों" को भी पेश किया जाए.. ग़ज़लों को भी एक मंच मुहैया कराया जाए.. यह मंच कितने दिनों तक बना रहेगा, वह हमारी मेहनत और आप सभी पाठकों/श्रोताओं के प्रोत्साहन पर निर्भर होना था। हमें आप पर पूरा भरोसा था, लेकिन अपनी मेहनत पर? शायद नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि महफ़िल की शुरूआत करने से पहले मैं ग़ज़लों का उतना बड़ा मुरीद नहीं था, जैसा अब हो चुका हूँ। हाँ, मैं ग़ज़लें सुनता जरूर था, लेकिन कभी भी ग़ज़लगो या शायर के बारे में पता करने की कोशिश नहीं की थी। इसलिए जब शुरूआत में सजीव जी ने मुझे यह जिम्मेवारी सौंपी तो मैंने उनसे कहा भी था कि मुझे इन सबके बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। तब उन्होंने कहा कि आप ग़ज़ल के साथ अपना कोई शेर और अपनी तरफ़ से कुछ बातें डाल दिया करें.. जिससे माहौल बनाने में मदद मिले। शायर/संगीतकार/गुलुकार के बारे में ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं, उनका बस नाम हीं काफी है। शुरू-शुरू में मैंने ऐसा हीं किया.. पहली ८ या १० महफ़िलों को अगर आप देखेंगे तो आपको मेरे शेर और मेरी उलुल-जुलुल बातों के हीं दर्शन होंगे। शुरू में तो हम एक महफ़िल में दो ग़ज़लें सुनाया करते थे और उस वक़्त हम ग़ज़लों के बोल महफ़िल में डालते भी नहीं थे, लेकिन जैसे-जैसे मैं महफ़िल लिखता गया, मेरी रूचि कलाकारों में बढने लगी.. और फिर एक ऐसा दिन आया, जब हमने महफ़िल के ढाँचे में बदलाव कर हीं दिया। अब महफ़िलें कलाकारों को समर्पित होने लगीं.. ग़ज़ल के साथ ग़ज़लगो और गुलुकार भी महफ़िल का अहम हिस्सा होने लगें। यही ढाँचा आजतक कायम है, बस इतना परिवर्तन आया है कि पहले हम महफ़िल सप्ताह में दो दिन (मंगलवार और वृहस्पतिवार को) पेश करते थे, लेकिन चूँकि अब हमें इतनी सारी जानकारियाँ इकट्ठा करनी होती थीं, इसलिए हमने दो दिन को कम करके एक हीं दिन(बुधवार को) कर दिया। इतना सब होने के बावजूद हमें लगता था कि महफ़िल ज्यादा से ज्यादा ६० या ६५ सप्ताह हीं पूरी करेगी, लेकिन यह आप सबकी दुआ और प्यार का हीं नतीजा है कि आज हम सौवीं कड़ी लेकर आप सबके सामने हाजिर हैं। तो हो जाए हम सबके लिए तालियाँ :)

अमूमन महफ़िल के अंत में हम उस दिन की ग़ज़ल सुनवाते हैं, लेकिन आज क्यों न इसी से शुरूआत कर ली जाए।

यूँ तो जगजीत सिंह जी महफ़िलों और मुशायरों में या फिर मंच पर "तेरे खुशबू" नज़्म का एक छोटा हिस्सा हीं गाते हैं, लेकिन चूँकि आज महफ़िल-ए-ग़ज़ल की १००वीं कड़ी है इसलिए हम आपके लिए लाए हैं पूरी की पूरी नज़्म। पढकर इसके अंदर छुपे गंगा के प्रवाह को महसूस कीजिए।

प्यार की आखिरी पूंजी भी लुटा आया हूँ,
अपनी हस्ती भी लगता है मिटा आया हूँ,
उम्र भर की जो कमाई थी वो गंवा आया हूँ,
तेरे खत आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।

तूने लिखा था जला दूँ मैं तिरी तहरीरें,
तूने चाहा था जला दूँ मैं तिरी तस्वीरें,
सोच लीं मैंने मगर और हीं कुछ तदबीरें,
तेरे खत आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।

तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे,
प्यार में डूबे हुए खत मैं जलाता कैसे,
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे,
तेरे खत आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।

जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा,
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाये रखा,
दीन जिनको जिन्हें ईमान बनाये रखा

जिनका हर लफ़्ज़ मुझे याद पानी की तरह,
याद थे मुझको जो पैगाम-ए-जुबानी की तरह,
मुझको प्यारे थे जो _____ निशानी की तरह

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिखे,
सालहा-साल मेरे नाम बराबर लिखे,
कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे

तेरे रूमाल तिरे खत तिरे छल्ले भी गए,
तेरी तस्वीरें तिरे शोख लिफ़ाफ़े भी गए,
एक युग खत्म हुआ, युग के फसाने भी गए,
तेरे खत आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।

कितना बेचैन उनको लेने को गंगाजल था,
जो भी धारा था उन्हीं के लिए वो बेकल था,
प्यार अपना भी तो गंगा की तरह निर्मल था,
तेरे खत आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।




आज माहौल अलग है, आज दिन दूसरा है... इसलिए आज अंदाज़ भी तो अलहदा होना चाहिए। तो फिर क्यों न आज के लिए जानकारियों के भारी-भरकम डोज़ को किनारे कर दिया जाए और बस ग़ज़ल की हीं बात हो। अभी हमने जगजीत सिंह जी की आवाज़ में राजेन्द्रनाथ रहबर साहब की लिखी नज़्म सुनी। अब हम आपको एक ऐसी ग़ज़ल पढवाते हैं जिसके मतले में रहबर साहब ने अपने जग्गु दादा का ज़िक्र किया है: (साभार: रविकांत ’अनमोल’.. ब्लॉग "तेरे खत")

तुम जन्नते कश्मीर हो तुम ताज महल हो
'जगजीत` की आवाज़ में ग़ालिब की ग़ज़ल हो

हर पल जो गुज़रता है वो लाता है तिरी याद
जो साथ तुझे लाये कोई ऐसा भी पल हो

होते हैं सफल लोग मुहब्बत में हज़ारों
ऐ काश कभी अपनी मुहब्बत भी सफल हो

उलझे ही चला जाता है उस ज़ुल्फ़ की मानिन्द
ऐ उक़दा-ए-दुशवारे मुहब्बत२ कभी हल हो

लौटी है नज़र आज तो मायूस हमारी
अल्लह करे दीदार तुम्हारा हमें कल हो

मिल जाओ किसी मोड़ पे इक रोज़ अचानक
गलियों में हमारा ये भटकना भी सफल हो


रहबर साहब की एक नज़्म और एक ग़ज़ल के बाद उनका हल्का-फुल्का परिचय और उनके कुछ शेर:

परिचय: राजेन्द्रनाथ रहबर का जन्म पंजाब के शकरगढ में (जो अब पाकिस्तान में है) ५ नवंबर १९३१ को हुआ था। मल्हार, तेरे ख़ुश्बू में बसे ख़त, और शाम ढल गई, याद आऊँगा... इनकी प्रमुख कृतियों में गिनी जाती हैं। हाल हीं में पंजाब के उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल (मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पुत्र) ने इन्हें शिरोमणी उर्दू साहित्यकार पुरस्कार से सम्मानित किया है। रहबर साहब की रचनाएं भारत के आम आदमी की ज़ुबान हैं, उसकी पहचान हैं। हम रहबर साहब के स्वस्थ एवं सुखद भविष्य की कामना करते हैं।

एक आम आदमी की दैनिक ज़िंदगी कैसी होती है, उसकी सोच कैसी होती है, उसके ख्वाब कैसे होते हैं.. अगर यह जानना हो तो रहबर साहब के शेरों से अच्छा कोई श्रोत शायद हीं होगा। आप खुद देखें:

सुबह सवेरे नूर के तड़के ख़ुश्बू सी हर जानिब फैली
फेरी वाले बाबा ने जब संत कबीर का दोहा गाया

तू कृष्ण ही ठहरा तो सुदामा का भी कुछ कर
काम आते हैं मुश्क़िल में फ़क़त यार पुराने

जब भी हमें मिलो ज़रा हंस कर मिला करो
देंगे फ़क़ीर तुम को दुआएं नई नई

एक दिन मैं ख़ुदा से पूछूं गा
क्या ग़रीबों का भी ख़ुदा है कोई

कुछ वक्त़ ने भी साथ हमारा नहीं दिया
कुछ आप की नज़र के सहारे भी कम मिले


चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "खटक" और शेर कुछ यूँ था-

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को
खटक-सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

हम फँसे हैं जिंदगी की सलाखों में
यहाँ दुश्मन भी मिलते हैं लाखों में
महफूज रहीं अब तक हमारी साँसें
पर खटक रही हैं उनकी आँखों में. (शन्नो जी)

फूल जिस डाली पे उगा करता है
शूल उस डाली पे खटक जाता है
फूल और शूल में इतना सा ही बस अन्तर है
इक मन में अटक जाता है इक तन में अटक जाता है। (अज्ञात)

न लुटता दिन को तो कब रात को यूं बेखबर सोता .
रहा खटका न चोरी का ,दुआ देते हैं राहजन को (ग़ालिब)

तेरी यादों को पलकों का चिलमन बना लिया
तेरे वादों को जीवन का आँगन बना लिया
जाने किस किस की आँख मैं खटकते रहे हैं हम
इक तुझे दोस्त बनाया तो जहान दुश्मन बना लिया (अवनींद्र जी)

पिछली महफ़िल में पहला कदम रखा प्रतीक महेश्वरी जी ने। प्रतीक जी, आपको हमारी महफ़िल पसंद आई.. इसके लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। हम पूरी कोशिश करेंगे कि आगे भी यह प्रयास इसी मेहनत और लगन के साथ जारी रखें। यूँ तो शन्नो जी प्रतीक जी के बाद महफ़िल में नज़र आईं, लेकिन चूँकि आपने गायब शब्द की शिनाख्त की, इसलिए आपको शान-ए-महफ़िल की पदवी से नवाज़ा जाता है। इक़बाल के बारे में पढकर जितना अचंभा आपको हुआ, उतना हीं पहली दफ़ा मुझे भी हुआ था, इसी लिए तो मैंने ९९वीं महफ़िल उन्हें समर्पित की, ताकि हम सब उन्हें सही से जान सकें। शरद जी, आपके स्वरचित शेरों की कमी खली। किसी दूसरे शायर के साथ-साथ अपनी रचना भी डाल दिया करें.. क्योंकि हमें उनका इंतज़ार रहता है। नीलम जी, इक़बाल की महफ़िल में ग़ालिब का शेर.. वाह! मज़ा आ गया.. इक़बाल को इससे बड़ी भेंट क्या होगी। इस शेर के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! अरविंद जी एवं महेन्द्र जी, हमें अच्छा लगा कि आपको हमारी कोशिश अच्छी लगी। आपने इसे "संग्रहनीय" कह दिया, हमें इससे ज्यादा क्या चाहिए! अवनींद्र जी, महफ़िल के अंत में आपके स्वरचित शेर ने महफ़िल के शम्मों को और भी रौशन कर दिया.. यह अलग बात है कि शम्मा भी आपके शेर के साथ हीं बुझी। लेकिन कुछ देर के लिए महफ़िल की रौनक बढी तो जरूर।

अब एक जरूरी सवाल आप सबों से: चूँकि महफ़िल अपनी १००वीं कड़ी तक पहुँच चुकी है, इसलिए हमारा ख्याल है कि कुछ दिनों या महिनों के लिए इसे विराम देना चाहिए। लेकिन हम कोई भी निर्णय आपसे पूछे बिना नहीं ले सकते। इसलिए टिप्पणियों के माध्यम से आप हमें अपने विचारों से अवगत जरूर कराईयेगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल (अगर आप चाहें) तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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