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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में (अंतिम भाग)

हम जिक्र कर रहे थे बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ फिल्मों का प्रतिष्टित हिंदी फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज द्वारा चुनी गयी सूची के आधार पर. कल हमने ५ फिल्में किस्मत, आवारा, अलबेला, देवदास, और मदर इंडिया की चर्चा की, आगे बढ़ते हैं -

६. प्यासा (१९५७) -गुरुदत्त इस फिल्म के निर्देशक और नायक थे. वहीदा रहमान, माला सिन्हा, जॉनी वाकर, और रहमान थे अन्य प्रमुख भूमिकाओं में. फिल्म के केंद्र में एक प्रतिभाशाली मगर असफल कवि की त्रासदी है जिसे मारा हुआ समझा जाने के बाद खूब बिकने लगता है. जीवित कवि दर दर भटक रहा है पर उसके मृत रूप की पूजा हो रही है. "ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती...", गीतकार शायर साहिर लुधियानवीं ने सुनिया की सच्चाईयों को अपनी कलम से नंगा किया और सचिन देव बर्मन ने अपने संगीत से इस कृति को अमर कर दिया. सुनिए इसी फिल्म से ये गीत -



७. मुग़ल - ए- आज़म (१९६०) - के आसिफ की इस एतिहासिक फिल्म को बनने में ९ साल लगे. अकबर बने पृथ्वी राज कपूर और शहजादे सलीम की भूमिका निभाई दिलीप कुमार ने. मधुबाला ने अपनी सुन्दरता और अदाकारी से अनारकली को परदे पर जिन्दा कर दिया. फिल्म के संवाद, अदाकारी, सेट संरचना, और सभी कलात्मक पक्ष बेहद सशक्त थे. संगीत था नौशाद साहब का. सुनते चलिए इस फिल्म का ये नायाब गीत -



८. गाईड (१९६५) - आर के नारायण के चर्चित अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित इस फिल्म के निर्देशक थे विजय आनंद. देव आनंद, वहीदा रहमान और किशोर साहू के अभिनय से सजी इस फिल्म में गजब की कशिश है, क्योंकि इसके पात्र आम फिल्मों की तरफ "ब्लैक" और "व्हाइट" नहीं हैं उनके किरदार में "ग्रे" शेड्स हैं जो उन्हें वास्तविक बनाते हैं. मूल लेखक को तो इस फिल्म ने संतुष्ट नहीं किया पर हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह एक मील का पत्थर थी. संगीत सचिन देव बर्मन का था, और इस फिल्म के संगीत की जितनी भी तारीफ की जाए कम है. सुनिए ये गीत -



९. शोले (1975) - सितारों से सजी इस फिल्म का निर्देशन किया था रमेश सिप्पी ने. धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन, हेमा मैलिनी, जया भादुडी, संजीव कुमार, के अलावा फिल्म में एक नए रूप में खलनायक ने जन्म लिया गब्बर सिंह के रूप में जिसे अपने अभिनय से यादकर कर दिया अमजद खान ने. सलीम जावेद सरीखे सिनेमा ने यहीं से सफलता का स्वाद चखा. फिल्म के हर छोटे बड़े किरदारों को आज तक याद किया जाता है उनके संवाद तक बेहद लोकप्रिय हैं आज भी. संगीत था राहुल देव बर्मन का. इसी फिल्म से ये गीत -



१०. हम आपके हैं कौन (१९९४) - एक बार फिर राजश्री वालों ने अपनी ही सफल फिल्म "नदिया के पार" को नए रूप में पेश किया. हिंसा और अश्लीलता से त्रसित हिंदी फिल्मों को इस साफ़ सुथरी पारिवारिक फिल्म ने नयी संजीवनी दे दी. लोग सपरिवार वापस सिनेमा घरों में जाने लगे. १५ गानों से भरी इस फिल्म अधिकतर बातें गीतों के माध्यम से ही कही गयी है. युवा निर्देशक सूरज भड्जात्या ने अपने बैनर की परम्पराओं को निभाते हुए मध्यम वर्गीय मूल्यों पर इस फिल्म का ताना बाना रचा. माधुरी दिक्षित ने अपनी अदाओं से सब के मन को मोह लिया, यहाँ तक कि मकबूल फ़िदा हुसैन को भी माधुरी फ़िदा हुसैन के नाम से जाना जाने लगा. राम लक्ष्मण का संगीत पारम्परिक और मधुर था. सुनिए ये गीत -



कल हमें कुछ पाठकों के विचार प्राप्त हुए. ज्ञानी मानन्धर ने जी ने जिन फिल्मों का जिक्र किया उनमें से बॉबी, दोस्ती, और अमर अकबर एंथोनी भी सफलता के लिहाज से और उन सभी कारणों से जिनका आपने जिक्र किया, निश्चित रूप से इस सूची के प्रबल दावेदार हैं. मेरे हिसाब से भी बॉबी और दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगें संगीत प्रधान रोमांटिक फिल्मों का प्रतिनिधित्व करती हैं. आचार्य जी ने भी बॉबी का जिक्र किया है. जंजीर भी एक सफलतम कृति है. पर जैसा कि हमने पहले भी बताया कि कोई भी सूची इस मामले में मुक्कमल नहीं हो सकती. नीरज गुरु ने भी हमें लिखा और बताया कि वो हिंदी की १०० श्रेष्ठ फिल्मों पर रिसर्च कर रहे हैं. उम्मीद करते है कि उस सूची में हम सब की प्रिय फिल्में अपना स्थान पाएंगीं.

विनोद जी ने फिल्म समीक्षक के नज़रिए से भी एक सूची बनायीं है. चलते चलते आईये एक नज़र डालें उस सूची पर भी. नीचा नगर (चेतन आनंद), जागते रहो (शम्भू मित्र), कागज़ के फूल (गुरु दत्त), भुवन शोम (मृणाल सेन), भूमिका और सूरज का सातवाँ घोड़ा (श्याम बेनेगल), दुविधा (मणि कॉल), तरंग (कुमार शहानी), तीसरी कसम (बासु भट्टाचार्य), और गर्म हवा (एम् एस सत्यु) विनोद की नज़र में समीक्षकों की टॉप १० फिल्में हैं.


मंगलवार, 16 सितंबर 2008

कोई ना रोको दिल की उड़ान को...

लता संगीत उत्सव की नई प्रस्तुति

प्रस्तावना: लता दीदी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ। लता दीदी की प्रसंशा में बहुत कुछ कहा गया है। फिर भी तारीफें अधूरी लगती हैं। मैंने दीदी के लिए सही शब्द ढूँढ़ने की कोशिश की तो शब्दकोष भी सोच में पड़ गया। कहते है, "लोग तमाम ऊँचाइयों तक पहुँचे हैं...पर जिस मुकाम तक लताजी पहुँची हैं...वहाँ तक कोई नहीं पहुँच सकता..." दीदी से रु-ब-रु होने का सौभाग्य तो अब तक प्राप्त नहीं हुआ, पर दीदी के गीत हमेशा साथ रहते है। लता दीदी वो कल्पवृक्ष हैं जो रंग-बिरंगी मीठे मधुर मनमोहक गीत-रूपी फूल बिखीरती रहती है. दीदी के देशभक्ति गीत सुनकर हौसले बुलंद होते हैं, अमर गाथा सुनकर आखों में पानी भर आता है, लोरी सुन कर ममता का एहसास होता है, खुशी के गीत सुनकर दिल को सुकून मिलता है, दर्द-भरे नगमे दिल की गहराई को छू जाते हैं, भजन सुनकर भक्ति भावना अपने शिखर तक पहुँचती है, और प्रेम गीत सुनकर लगता है जैसे प्रेमिका गा रही हो. जब भी लताजी के गीत सुनता हूँ तो मेरा दिल तो कहने लगता है ... "आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है..."


"कोई ना रोको दिल की उड़ान को..."



लता दीदी के साथ वहीदा रहमान
दीदी के हज़ारों गीतों में "...काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल" मेरी रूह को छू जाता है। गीत के बोल शैलेंद्र ने लिखे हैं और संगीत में पिरोया है एस॰ डी॰ बर्मन ने। मन की मुक्ति को और लताजी की महकती हुई आवाज़ को परदे पर बेहतरीन तौर से निभाया है रोजी यानी वहीदा रहमान ने। 1965 में नवकेतन इंटरनेशनल्स के बैनर तले बननी फिल्म गाइड, आर के लक्ष्मण के उपन्यास 'द गाइड' पर आधारित है। राजू यानी देव आनंद की एक साधारण गाइड से जैल तक, फिर एक सन्यासी से जीवन-मुक्ति तक की अजीब कहानी और रोजी का नृत्या-कला का दीवानापन हमें ज़िंदगी के तमाम पहलुओं से मुखातिर करता है.


इस फिल्म में नृत्या-कला की महानता को बड़ी ही सुंदर सरल और सहज तरीके से प्रस्तुत किया है। जब रोजी दुनियादारी के सारे बंधन तोड़कर अपने-आप को आज़ाद महसूस करती है तो झूमते हुए कहती है .. कोई ना रोको दिल की उड़ान को...दिल हो चला.. हा॰॰हा॰॰॰हा॰॰॰॰आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है. रोजी का मन आज़ाद होने का भाव शायद इससे अकचे शब्दों में बयान नहीं हो सकता था। वहीदा रहमान के चेहरे के हाव-भाव इस गीत में रंग भर देते हैं। बर्मन-दा ने इस गीत में ढोलकी का विशेष प्रयोग किया है...जिससे कि गीत की लय और भी सुरीली हो जाती है।


गीत की मिठास, गीत का एहसास, गीत का संदेश, और शब्दों की महत्ता को मुककमल करती है लता दीदी की मखमली आवाज़। दीदी अलाप से शुरू करती है ... "आऽ आ...काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल

कोई ना रोको दिल की उड़ान को, दिल हो चला
आज फिर जीने की तमन्ना हैं
आज फिर मरने का इरादा है..."


दीदी के आवाज़ की स्पष्टता और उच्चारण शफ़क-पानी की तरह साफ है. यही वजह हो सकती है की लोग दीदी को माँ सरस्वती भी कहते हैं. गीत उसी गति से आगे बढ़ता है..और दीदी गाती है:


गाइड फिल्म का पोस्टर
अपने ही बस में नहीं मैं, दिल हैं कहीं तो हूँ कहीं मैं
जाने क्या पा के मेरी जिंदगी ने, हँस कर कहा
आज फिर ...

मैं हूँ गुबार या तूफान हूँ, कोई बताए मैं कहा हूँ
डर हैं सफ़र में कहीं खो ना जाऊँ मैं, रस्ता नया
आज फिर ...

कल के अंधेरों से निकल के, देखा हैं आँखे मलते-मलते
फूल ही फूल जिंदगी बहार हैं, तय कर लिया
आज फिर ...


गाने के अंतिम स्वर को अलाप का रूप दिया है, जो लताजी की आवाज़ में और भी मीठा लगता है; जैसे:

...दिल वो चला आ आ आ आआ
...हँस कर कहा आ आ आ आआ
...रस्ता नया आ आ आ आआ
...तय कर लिया आ आ आ आआ


ये उन अनकहे शब्दों को दर्शता जो रोजी का मन और शैलेंद्र की कलम दोनों नहीं बता पाते..और फिर तुरंत "आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है..." लता दीदी का मानो जादू है.


बर्मन-दा संगीत तैयार करने से पहले हमेशा उस संगीत को तब तक सुनते थे जब तक कि उब ना जाए. किसी ने पूछा ऐसा क्यूँ, तो दादा ने अपनी बांग्ला-हिन्दी में कहा "...हम तुबतक सुनता है, जब तक हम बोर नहीं होता..अगर बोर हुआ तो हम गाना नही बोनाता" ... यकीन मानिए, हज़ारों बार सुन कर भी बोर होने का ख़याल तक नहीं आता. बल्कि ये गीत और लता दीदी की सुरीली तान, मन को सातवें आसमान तक पहुँचा देती है; मानो इससे अच्छा कुछ नहीं. या अरबी में "सुभान अल्लाह!"

गीत सुनें और वीडियो देखें


फिल्म से जुड़ी कुछ और बातें:

गाइड फिल्म हिन्दुस्तान की 25 महान फ़िल्मो में शामिल है. फिल्म इतनी मशहूर हुई कि इससे हॉलीवुड में फिर बनाया गया; जो कुछ ख़ास नहीं कर पाई. क्यूँकि बर्मन-दा का संगीत, देव आनंद और वहीदा रहमान का अभिनय, और लता दीदी की आवाज़ इस फिल्म से अलग होती है तो ये फिल्म महज़ एक उपन्यास ही बनी रहती है। फ़िल्मफेयर अवॉर्ड्स में इस फिल्म को 7 अवॉर्ड्स मिले. गाइड फिल्म का सदाबहार संगीत, संगीत—जगत में एक मिसाल बन चुका है.


दीदी के लिए दो शब्द:

बड़ा गर्व महसूस होता है ये जानकार की हम उसी धरती पर पैदा हुए जहाँ लताजी है। दीदी की आवाज़ सुनकर लगता है जैसे ज़िंदगी में सबकुछ हासिल हो गया। और मेरा दिल भी गाने लगता है... कोई ना रोको दिल की उड़ान को, दिल हो चला ....हा हा हाऽऽ आ; आज फिर जीने की तम्मना है..ऽ आज फिर मरने का इरादा है..."

लेखक के बारे में-
22 वर्षीय अनूप मनचलवार नागपुर, महाराष्ट्र के रहवासी है. साहित्य, समाज-सेवा, राजनीति, और कला में विशेष रूचि रखते हैं। इनके बारे में इतना कहना काफ़ी है कि ये लता दीदी के फैन है.
ईमेल-: manchalwar@gmail.com
पता- जानकी निवास, कोरदी रोड, मांकपुर, नागपुर – 440 030


अनूप द्वारा अभिकल्पित लता दीदी की स्लाइड

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