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रविवार, 20 सितंबर 2020

राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 480 : RAG ADANA





स्वरगोष्ठी – 480 में आज 

आसावरी थाट के राग – 2 : राग अड़ाना 

पण्डित जसराज से राग अड़ाना में एक रागदारी भक्ति-रचना और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत सुनिए 




पण्डित जसराज 

उस्ताद अमीर खाँ 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के जन्य राग अड़ाना का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए षाड़व-सम्पूर्ण जाति के राग अड़ाना का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में राग अड़ाना में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का कई फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग अड़ाना के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" से हसरत जयपुरी का लिखा और वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया शीर्षक गीत "झनक झनक पायल बाजे..." सुनवा रहे हैं, जिसे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने स्वर दिया है। 



राग अड़ाना, आसावरी थाट का जन्य राग है। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर कोमल और दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार वर्जित और अवरोह में वक्र प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। वीर रस के गीतों के लिए यह एक आदर्श राग है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अतिकोमल गान्धार स्वर का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, अर्थात इस राग के स्वर अधिकतर मध्य और तार सप्तक में चलते हैं। जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग अड़ाना, राग दीपक के आठ पुत्रों में से एक माना जाता है। इसे ‘रात की सारंग’ भी कहा जाता है। राग दरबारी कान्हड़ा और नायकी कान्हड़ा इसके समप्रकृति राग हैं। कान्हड़ा के अट्ठारह प्रकारों में यह भी एक प्रकार है, जिसका प्रचार अन्य प्रकारों की अपेक्षा अधिक है। राग अड़ाना के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको पण्डित जसराज के स्वरों में राग अड़ाना में निबद्ध एक भक्ति रचना; "माता कालिका..." यूट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत कर रहे हैं। 

राग अड़ाना : "माता कालिका महाकाल..." : पण्डित जसराज 


राग अड़ाना पर आधारित अनेक फिल्मी गीतों में से आज हमने एक ऐतिहासिक गीत का चयन किया है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का तीनताल में निबद्ध शीर्षक गीत "झनक झनक पायल बाजे..." राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। हसरत जयपुरी के इस गीत को सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने स्वर दिया है। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग अड़ाना : "झनक झनक पायल बाजे..." : उस्ताद अमीर खाँ और साथी : फिल्म - झनक झनक पायल बाजे 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 480वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1968 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात इस अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस विख्यात पार्श्वगायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 26 सितम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 482 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 478वें अंक में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी भ्रमित रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - आसावरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – हेमन्त कुमार 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जन्य राग अड़ाना का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए पण्डित जसराज के स्वरों में राग अड़ाना की एक रागदारी भक्ति-रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" से उस्ताद अमीर खाँ और साथियों के स्वर में वसन्त देसाई का संगीतबद्ध किया और हसरत जयपुरी का लिखा एक गीत "झनक झनक पायल बाजे..." प्रस्तुत किया। 

"स्वरगोष्ठी" के सहयोगी, फिल्मी गीतों में राग विषयक शोधकर्ता कन्हैयालाल पाण्डेय का पिछले दिनों दूरदर्शन की सेवानिवृत्त उपनिदेशक नीलम चतुर्वेदी ने साक्षात्कार  "मन की बात" किया था। इस अंक में हम वही साक्षात्कार आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। 


कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया
 राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 480 : RAG ADANA : 20 सितम्बर, 2020 



रविवार, 25 नवंबर 2018

राग दरबारी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 395 : RAG DARBARI KANHADA






स्वरगोष्ठी – 395 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 10 : राग दरबारी कान्हड़ा

आशा भोसले से फिल्म का एक गीत और पण्डित जसराज से राग दरबारी कान्हड़ा सुनिए





पण्डित जसराज
आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हमने राग दरबारी कान्हड़ा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में 1965 में प्रदर्शित फिल्म “काजल” से राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित एक भक्तिगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वर में राग दरबारी कान्हड़ा में निबद्ध शक्ति और बुद्धि की प्रतीक देवी दुर्गा की स्तुति भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग दरबारी कान्हड़ा का यह नामकरण अकबर के काल से प्रचलित हुआ। मध्यकालीन ग्रन्थों में राग का नाम दरबारी कान्हड़ा नहीं मिलता। इसके स्थान पर कर्नाट या शुद्ध कर्नाट नाम से यह राग प्रचलित था। तानसेन दरबार में अकबर के सम्मुख राग कर्नाट गाते थे, जो बादशाह और अन्य गुणी संगीत-प्रेमियों को खूब पसन्द आता था। राज दरबार का पसंदीदा राग होने से धीरे-धीरे राग का नाम दरबारी कान्हड़ा हो गया। प्राचीन नाम ‘कर्नाट’ परिवर्तित होकर ‘कान्हड़ा’ प्रचलित हो गया। वर्तमान में राग दरबारी कान्हड़ा आसावरी थाट का राग माना जाता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर सदा कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध लगते हैं। राग की जाति वक्र सम्पूर्ण होती है। अर्थात इस राग में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। मध्यरात्रि के समय यह राग अधिक प्रभावी लगता है। गान्धार स्वर आरोह और अवरोह दोनों में तथा धैवत स्वर केवल अवरोह में वक्र प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान अवरोह में धैवत को वर्जित करते हैं। तब राग की जाति सम्पूर्ण-षाडव हो जाती है। राग दरबारी का कोमल गान्धार अन्य सभी रागों के कोमल गान्धार से भिन्न होता है। राग का कोमल गान्धार स्वर अति कोमल होता है और आन्दोलित भी होता है। इस राग का चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक में किया जाता है। यह आलाप प्रधान राग है। इसमें विलम्बित आलाप और विलम्बित खयाल अत्यन्त प्रभावी लगते हैं। राग दरबारी कान्हड़ा को आधार बना कर फिल्मों के अनेक गीतों की रचना हुई है। इन्हीं में से एक गीत का चयन हमने आपके लिए किया है। आइए, आशा जी का गाया, फिल्म “काजल” का भक्तिगीत - “तोरा मन दर्पण कहलाए...” सुनते हैं। 1965 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार रवि ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित स्वरों में गीत को पिरोया है। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत के भक्तिरस का आप आस्वादन कीजिए।

राग दरबारी कान्हड़ा : ‘तोरा मन दर्पण कहलाए...’ : आशा भोसले : फिल्म – काजल


मध्यरात्रि के परिवेश को संवेदनशील बनाने और विनयपूर्ण पुकार की अभिव्यक्ति के लिए दरबारी कान्हड़ा एक उपयुक्त राग है। प्राचीन काल में कर्णाट नामक एक राग प्रचलित था। 1550 की राजस्थानी पेंटिंग में इस राग का नाम आया है। बाद में यह राग कानडा या कान्हड़ा नाम से प्रचलित हुआ। यह मान्यता है कि अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन ने कान्हड़ा के स्वरों में आंशिक परिवर्तन कर दरबार में गुणिजनों के बीच प्रस्तुत किया था, जो बादशाह अकबर को बहुत पसन्द आया और उन्होने ही इसका नाम दरबारी रख दिया था। आसावरी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग मध्यरात्रि और उसके बाद की अवधि में ही गाया-बजाया जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। अति कोमल गान्धार स्वर का आन्दोलन करते हुए प्रयोग इस राग की प्रमुख विशेषता होती है। यह अतिकोमल गान्धार अन्य रागों के गान्धार से भिन्न है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लगाए जाते हैं। राग के यथार्थ स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको राग दरबारी के भक्तिरस के पक्ष को रेखांकित करने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में शक्ति और बुद्धि की प्रतीक देवी दुर्गा की स्तुति सुनवाते हैं। आप यह रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग दरबारी : ‘जय जय श्री दुर्गे...’ : पण्डित जसराज




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 395वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 1 दिसम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 397वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 393वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म “भूमिका” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – प्रीति सागर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की दसवीं कड़ी में आपने राग दरबारी कान्हड़ा का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वर में एक भक्ति-रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार रवि द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “काजल” का एक गीत आशा भोसले की आवाज़ में सुना। आज के अंक में हम आपको एक शुभ सूचना देना चाहते हैं। हैदराबाद निवासी, संगीत शिक्षिका, “स्वरगोष्ठी” की नियमित पाठक और पहेली का नियमित उत्तर देने वाली सुश्री हरिणा माधवी ने अपने शिक्षण-कार्य के दौरान अनेक स्वरचित बन्दिशों का एक संकलन तैयार किया है, जिसके पुस्तक रूप में प्रकाशन के हमें सूचना मिली है। इस प्रकाशन का विस्तृत विवरण अपने पाठकों को हम शीघ्र ही उपलब्ध कराएंगे। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग दरबारी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 395 : RAG DARBARI KANHADA : 25 नवम्बर, 2018

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