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Friday, July 3, 2009

वो इश्क जो हमसे रूठ गया........महफ़िल-ए-जाविदा और "फ़रीदा"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२६

ब कुछ आपकी उम्मीद के जैसा हो, लेकिन ज्यादा कुछ आपकी उम्मीद से परे, तो किंकर्तव्यविमुढ होना लाज़िमी है। ऐसा हीं कुछ हमारे साथ हो रहा है। इस बात का हमें फ़ख्र है कि हम महफ़िल-ए-गज़ल में उन फ़नकारों की बातें करते हैं,जिनका मक़बूल होना उनका और हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और यही कारण है कि हमें अपने पाठकों और श्रोताओं से ढेर सारी उम्मीदें थीं और अभी भी हैं। और इन्हीं उम्मीदों के दम पर महफ़िल-ए-गज़ल की यह रौनक है। हमने सवालों का दौर यह सोचकर शुरू किया था कि पढने वालों की याददाश्त मांजने में हम सफल हो पाएँगे। पिछली कड़ी से शुरू की गई इस मुहिम का रंग-रूप देखकर कुछ खुशी हो रही है तो थोड़ा बुरा भी लग रहा है। खुशी का सबसे बड़ा सबब हैं "शरद जी" । जब तक उन्हें "एपिसोड" वाली कहानी समझ नहीं आई, तब तक उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हर बार जवाबों का पिटारा लेकर हीं हाज़िर हुए। हमें यह बात बताने में बड़ी खुशी हो रही है कि शरद जी ने पहली बार में हीं सही जवाब दे दिया और ४ अंकों के हक़दार हुए। चूँकि इनके अलावा कोई भी शख्स मैदान में नहीं उतरा इसलिए ३ अंक और २ अंकों वाले स्थान खाली हीं रहे। और यही बात है जो थोड़ी विचारणीय है। आखिर क्या कारण है कि हमारे पाठक फूर्ति नहीं दिखा रहे। भाई! कम से कम गज़लों को सुनने के बहाने हीं पिछली कड़ियों का एक चक्कर लगा लिया करें। कुछ भूली-बिसरी जानकारियाँ मिल जाएँगी और आपको इन सवालों का जवाब भी मिल जाएगा। इसी उम्मीद के साथ कि इस बार ज़्यादा लोग रूचि दिखाएँगे, आज की प्रक्रिया शुरू करते हैं। २५ वें से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) गुलज़ार के प्रिय एक फ़नकार जिन्होंने पंचम दा के लिए "दम मारो दम" और "चुरा लिया है" में गिटार बजाकर अपनी संगीत-यात्रा की शुरूआत की।
२) गुमनाम, क़ातिल, सरफ़रोश जैसी पाकिस्तानी फ़िल्मों में अपनी गायकी का हुनर दिखाने वाली इस फ़नकारा ने ज़नरल ज़िया उल हक़ के शासन के दौरान "फ़ैज़" के कई सारे क्रांतिकारी कलाम गाए।


इन सवालों के बाद अब आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल और गज़ल से जुड़ी फ़नकारा मानो एक दूसरे के पूरक हैं। जहाँ भी इस गज़ल का ज़िक्र होता है, वहाँ अनकहे हीं इन फ़नकारा का नाम ज़ाहिर हो जाता है और जहाँ भी इन फ़नकारा का नाम लिया जाता है, वहाँ इनके नाम को मुकम्मल करने के लिए इस गज़ल की चर्चा लाज़िमी हो जाती है। यूँ तो इन फ़नकारा का सबसे मक़बूल कलाम है "आज जाने की ज़िद्द ना करो" ,लेकिन अगर गज़ल की बात करें तो आज की गज़ल इनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त में सबसे ऊपर आएगी। "बुलबुल-ए-पंजाब" मुख्तार बेगम की छोटी बहन "फ़रीदा खानुम" को अगर "मल्लिका-ए-गज़ल" कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। और यकीं मानिए यह उपाधि कोई हमने यूँ हीं बातों-बातों में नहीं दे दी है, बल्कि हुनर-पसंद दुनिया इन्हें इसी नाम से जानती है। इनकी गज़ल-गायकी का अंदाज़ औरों से काफ़ी अलग है,इनकी आवाज़ में एक हल्का-सा भारीपन गज़लों के असर को कई गुना बढा देता है। यूँ तो गज़लें इनकी प्राथमिकता हैं, लेकिन गज़लों के अलावा भी इन्होंने कई सारे पंजाबी लोकगीत गाए हैं। कुछ गीत जो खासे चर्चित हुए,उनमें "बल्ले-बल्ले तोर पंजाबन दी" और "मैंने पाँव में पायल पहने हीं नहीं" ऊपर आते हैं। इन्होंने न सिर्फ़ उर्दू और पंजाबी में गज़लें गाई हैं, बल्कि "फारसी" और "पस्तो" भाषाओं पर भी इनका बराबर अधिकार रहा है। जहाँ तक पुरस्कारों की बात है तो हिन्दुस्तान में क्लासिकल और सेमि-क्लासिकल गानों वालों के लिए दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार "हाफ़िज़ अली खां अवार्ड" आज तक बस दो हीं पाकिस्तानियों के हिस्से में आया है। १९९६ में इस पुरस्कार से बाबा नुसरत फतेह अली खान को नवाज़ा गया था और सन् २००५ में "फ़रीदा खानुम" को इस पुरस्कार के लिए चुना गया , संयोग देखिए कि उसी साल जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के हाथों इन्हें "हिलाल-ए-इम्तियाज़" से नवाज़ा गया, जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा "सिविलियन" सम्मान है। "अमृतसर" में जन्मी, "कलकत्ता" में पली-बढी(कहीं-कहीं यह क्रम उल्टा भी दर्ज़ है, इसलिए यकीनन नहीं कह सकता) और बंटवारे के बाद "रावलपिंडी" में संगीत का नाम रौशन करने वाली इस मल्लिका ने विवाहोपरांत "लाहौर" को अपने घर के रूप में चुना और आज तक वहीं हैं। संगीत की साधना अभी भी जारी है। खुदा से यही दुआ है कि यह "रियाज़" कभी बंद न हो! आमीन!

यह तो हुई "फ़नकारा" की बात, अब ज़रा "शायर" से मुखातिब हुआ जाए। कभी-कभी कुछ ऐसे शायर हो जाते हैं(या फिर ज्यादातर ऐसे हीं होते हैं), जो भले हीं अपना नाम न कर पाए हों,लेकिन उनकी कोई न कोई गज़ल लोगों के जुबान पर जम हीं जाती है। आज के शायर की हक़ीक़त भी कुछ ऐसी हीं है। अंतर्जाल पर इनके बारे में ज्यादा सामग्री नहीं है और जो भी है वह बस इनके गज़लों की फ़ेहरिश्त मात्र है। "कभी साया है, कभी धूप मुकद्दर मेरा", "लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ", "सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं", "इतने दिनों के बाद तू आया है आज" और "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" -बस इतनी हीं गज़लें हैं जो इनके नाम के साथ दर्ज़ हैं। आज हम इन्हीं गज़लों में से एक "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" सुनाने जा रहे हैं। इस गज़ल के गज़लगो हैं जनाब "अतर नफ़ीस"। मुझे नहीं मालूम कि पाकिस्तान में इनका कैसा रूतबा है, लेकिन इस बात का यकीन दिला सकता हूँ कि इनकी इस गज़ल की मक़बूलियत कमाल की है। ज़रा इस गज़ल के बोलों पर ध्यान देंगे -" वो इश्क जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या, कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं , फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।" इस मतले में "महबूब" से जो शिकायत की गई है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। जनाब इस बात का शोक मना रहे हैं कि उनका इश्क उनसे रूठ गया है और इसलिए हाल बताने लायक कुछ बचा नहीं। लेकिन जब उनसे कोई इस बात की दरख्वास्त करता है कि इसी बात पर कोई शेर सुना दिया जाए, तो वो कहते हैं कि "रूठने" की इस प्रकिया में ना कोई "दिल टूटने का दर्द" चस्पां है और ना हीं कोई "मज़ेदार किस्सा" तो फिर शेर बनाएँ तो कैसे और अगर शेर बना भी लिया तो उसमें "सच्चाई" तो होगी नहीं। इसे अगर दूसरी तरह से समझे तो माज़रा यह बनता है कि "महबूब के रूठने के बाद उनकी ज़िंदगी में ना कोई मेहर है और ना हीं कोई कहर यानि कि जीने लायक कोई ज़िंदगी हीं नहीं बची, इसलिए इस बेमतलब की ज़िंदगी के ऊपर कोई सच्चा शेर कैसे सुनाया जा सकता है।" दोनों हीं अर्थों में "महबूब" से हिज्र को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया गया है। इस गज़ल के बाकी शेरों में भी ऐसा हीं अनोखापन है। इस गज़ल की ओर बढने से पहले क्यों ना हम "अतर" साहब का एक शेर देख लें:

ऐ सरापा रंग-ओ-निखत तू बता,
किस धनक से तेरा पैराहन बुनूँ।


चलिए अब थोड़ा भी देर किए बिना आज की गज़ल से रूबरू होते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या,
कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं, फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।

एक हिज़्र जो हमको ला-हक है, ता-देर उसे दुहराएँ क्या,
वो जहर जो दिल में उतार लिया, फिर उसके नाज़ उठाएँ क्या।

एक आग ग़म-ए-तन्हाई की, जो सारे बदन में फैल गई,
जब जिस्म हीं सारा जलता हो, फिर दामने-दिल को बचाएँ क्या।

हम नगमा-सरा कुछ गज़लों कें, हम सूरत-गर कुछ ख्वाबों के,
ये जज्बा-ए-शौक सुनाएँ क्या, कोई ख्वाब न हों तो बताएँ क्या।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मैं ____ भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

आपके विकल्प हैं -
a) दरिया, b) समंदर, c) साहिल, d) मांझी

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"शहर" और सही शेर कुछ यूं था -

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा...

इब्न-ए-इंशा के इस शेर को सबसे पहले सही पकडा एक बार फिर शरद जी ने, बधाई जनाब -

अब नए शहरों के जब नक्शे बनाए जाएंगे
हर गली बस्ती में कुछ मरघट दिखाए जाएंगे ।
गैर मुमकिन ये कि हम फुटपाथ पर भी चल सकें
क्योंकि हर फुटपाथ पर बिस्तर बिछाए जाएंगे ।

क्या बात है शरद जी, जहां के दर्द को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया है आपने।
दिशा जी महफ़िल में आईं तो ज़रूर, लेकिन गलत शब्द चुन लिया।
मिलिंद जी आपका स्वागत है महफ़िल-ए-गज़ल के इस मुहिम में। आपका शेर कुछ यूँ था:

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ानसा क्यों है ?
इस शहर में हर शक्स परेशानसा क्यों है?

अगली कोशिश में दिशा जी ने सही शब्द पकड़ा। कोई बात नहीं- देर आयद, दुरूस्त आयद:

इस शहर में हर कोइ अज़नबी लगता है
भीड़ में भी हर मंजर सूना दिखता है
कहूँ तो कहूँ किससे बात अपनी
मुझे हर शख्स यहाँ बहरा लगता है...

मन्जु जी, आपका भी स्वागत है..शब्द तो सही पकड़ा है आपने,लेकिन यही दरख्वास्त रहेगी कि देवनागरी में टंकण करें।
सुमित जी, आप तो हर बार कमाल कर जाते हैं। बस ये दो बार पोस्ट करने की अदा समझ नहीं आती :)

कोई दोस्त है न रकीब है ,
तेरा शहर कितना अजीब है

शुभान-अल्लाह!

मनु जी के तो हम फ़ैन हो गए हैं। वैसे भी हमारे वो बहुत काम आते हैं। मुख्यत: शब्दार्थ बताने के :)

वैसे उनके ये दो शेर भी काबिल-ए-तारीफ़ हैं:

हर मोड़ पे रुसवाइयों का दाम मिला है
पर शहर में तेरे बहुत आराम मिला है..

घर पे आते ही मेरा साया मुझ से यूं लिपटा,
अलग शहर में था दिन भर, अलग-अलग सा रहा..

पूजा जी! आप भी यूँ हीं आती रहिए और महफ़िल का आनंद उठाती रहिए........बस एक गिला है, आप आती तो हैं लेकिन कोई शेर नहीं सुनाती। भला ऐसा क्यों? अगली बार से ऐसा नहीं चलेगा।
बाकी सभी मित्रों से भी अनुरोध है कि महफ़िल की शमा जलाए रखने में हमारे साथ बने रहें। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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