Showing posts with label new years special. Show all posts
Showing posts with label new years special. Show all posts

Sunday, January 4, 2015

स्वागत नववर्ष 2015 : SWARGOSHTHI – 201 : RAG BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 201 में आज

मंगलध्वनि और राग भैरवी

मंगलवाद्य शहनाई-वादन से नववर्ष का अभिनन्दन




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी 201वें अंक से आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत चार वर्षों से हमें असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और सुगम संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत चार वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सभी सदस्यों- सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक और संज्ञा टण्डन के प्रति भी आभार प्रकट करता हूँ, जिनकी आहुतियाँ भी इस यज्ञ में होती हैं। आज पाँचवें वर्ष के इस प्रवेशांक में हम आपसे इस साप्ताहिक स्तम्भ के आरम्भ की कुछ स्मृतियों को बाँटेंगे। इसके साथ ही आज के इस अंक में शुभ अवसरों पर परम्परागत रूप से बजने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी। इसके अलावा राग भैरवी के स्वरों में पिरोया एक अर्थपूर्ण फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे, जिसे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित राजन मिश्र ने गाया है।




ठीक चार वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को इस स्तम्भ का शुभारम्भ किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक नया मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ हो गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों में संशोधन भी करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था-

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं, सुजॊय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग-अलग राग हमारे अलग-अलग 'चक्र' (ऊर्जा विंदु) को प्रभावित करते हैं। ये अलग-अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों-युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सब से महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबसे उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी-बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।...”

तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस पावन अवसर पर मंगल वाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मंगलध्वनि : राग भैरवी : शहनाई वादन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था- शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के 201वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों की कृतियों से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों-श्रोताओं ने सराहा। इसी बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की पारिवारिक और व्यावसायिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से ‘सुर संगम’ का पूर्ण दायित्व मेरे मित्रों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों-श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मुझे मिला, जो आज भी जारी है।

पिछले 200 अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में गत वर्ष के दौरान लगभग बारह संगीत-प्रेमियों ने सहभागिता की, जिनमें से चार प्रतिभागी नियमित थे। सभी प्रतिभागियों के पूरे वर्ष भर के प्राप्तांकों की गणना जारी है। अगले अंक में हम प्रथम तीन विजेताओं की घोषणा करेंगे। इस अंक में हम राग भैरवी पर चर्चा कर रहे हैं। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। आइए, इसी राग के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत सुनते हैं। यह गीत हमने 1985 की फिल्म ‘सुर संगम’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल और गीतकार बसन्त देव हैं। राग भैरवी पर आधारित जो गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन मिश्र ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ : फिल्म सुर संगम : पण्डित राजन मिश्र और कविता कृष्णमूर्ति




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 201 अंक की पहेली में आज हम आपको किसी गीत या संगीत का अंश नहीं सुनवा रहे हैं। आज की पहेली के दोनों प्रश्न ऊपर सुनवाए गए मंगलवाद्य शहनाई से सम्बन्धित है। उपरोक्त शहनाई वादन को एक बार पुनः ध्यान से सुनिए। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2015 की इस पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।

1 – इस वाद्य संगीत को सुन कर क्या आपको किसी लोकप्रिय भक्ति-गीत की प्रचलित धुन का अनुभव हो रहा है? यदि हाँ, तो उस गीत की आरम्भिक पंक्ति बताइए।

2 – यह भी बताइए कि यह भक्ति-काल के किस कवि / कवयित्री की रचना है? 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 203वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 199वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कुदरत’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ ने इस अंक के साथ पाँचवें वर्ष में प्रवेश किया है। नए वर्ष में हम आपके लिए कुछ नई श्रृंखलाएँ लेकर उपस्थित हो रहे हैं। हमारी आगामी श्रृंखलाएँ आपके सुझावों पर आधारित है। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


Friday, January 2, 2015

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड भाग - 2



नववर्ष विशेष

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड  - भाग 2 

The Unsung Melodies of 2014





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और नववर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ। स्वागत है आप सभी का साल 2015 की प्रथम प्रस्तुति में। आज हम वर्ष के दूसरे दिन आपके मनोरंजन के लिए हम लेकर आए हैं इस विशेष प्रस्तुति का दूसरा भाग। साल 2014 हिन्दी फ़िल्म-संगीत के लिए अच्छा ही कहा जा सकता है; अच्छा इस दृष्टि से कि इस वर्ष जनता को बहुत सारे हिट गीत मिले, जिन पर आज की युवा पीढ़ी ख़ूब थिरकी, डान्स क्लब की शान बने, FM चैनलों पर बार-बार लगातार ये गाने बजे। "बेबी डॉल", "जुम्मे की रात है", "मुझे प्यार ना मिले तो मर जावाँ", "पलट तेरा ध्यान किधर है", "आज ब्लू है पानी पानी", "तूने मारी एन्ट्री यार", "सैटरडे सैटरडे", "दिल से नाचे इण्डिया वाले", जैसे गीत तो जैसे सर चढ़ कर बोले साल भर। लेकिन इन धमाकेदार गीतों की चमक-दमक के पीछे गुमनाम रह गए कुछ ऐसे सुरीले नग़मे जिन्हें अगर लोकप्रियता मिलती तो शायद सुनने वालों को कुछ पलों के लिए सुकून मिलता। कुछ ऐसे ही कमचर्चित पर बेहद सुरीले और अर्थपूर्ण गीतों की हिट परेड लेकर हम उपस्थित हुए हैं आज की इस विशेष प्रस्तुति में। आज के इस अंक में प्रथम सात गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसन्द आएगी। सुनिए और अपनी राय दीजिए। 


7: "अखियाँ तिहारी..." (जल)

फ़िल्म ’जल’ पिछले साल की एक क्रिटिकली ऐक्लेम्ड फ़िल्म थी जिसे देश-विदेश के कई फ़िल्म महोत्सवों में कई पुरस्कार मिले। यहाँ राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला इस फ़िल्म को। इस फ़िल्म से फ़िल्म-संगीतकार बने गायक सोनू निगम। उनके साथ बिक्रम घोष ने इस फ़िल्म में संगीत दिया। फ़िल्म का शीर्षक गीत शुभा मुदगल की आवाज़ में है "जल दे", जिसमें सोनू और बिक्रम ने मारवा और पूरिया जैसे रागों के इस्तमाल के साथ-साथ दुर्लभ साज़ आरमेनियन डुडुक का भी प्रयोग किया जिसकी काफ़ी प्रशंसा हुई। इसी फ़िल्म में उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ साहब और सुज़ेन का गाया "अखियाँ तिहारी" गीत भी तारीफ़-ए-क़ाबिल है जिसे ख़ुद सोनू और बिक्रम ने ही लिखा भी है। यह सोचने वाली ही बात है कि क्यों नहीं चल पाते ऐसे गीत आज के बाज़ार में! ज़रा सुनिए तो इस गीत को!

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



6: "तू हँसे तो लगे जैसे कोई झरणा बहता है..." (कहीं है मेरा प्यार)

’विवाह’ और ’एक विवाह ऐसा भी’ से वापसी हुई थी संगीतकार रवीन्द्र जैन की। रवीन्द्र जैन का संगीत हमेशा उत्कृष्ट रहा है। व्यावसायिक्ता के चलते उन्होंने कभी अपने संगीत से समझौता नहीं किया, फिर चाहे उनके गाने चले या ना चले। 80 के दशक में जब फ़िल्म संगीत अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही थी, तब रवीन्द्र जैन उन चन्द गिने-चुने संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने फ़िल्म संगीत के स्तर को उपर बनाये रखने की भरपूर कोशिशें की। 2014 में उनके संगीत से सजी म्युज़िकल फ़िल्म आई ’कहीं है मेरा प्यार’। फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह पिट गई और फ़िल्म के गाने भी नज़रन्दाज़ हो गए। युं तो फ़िल्म के सभी गीत कर्णप्रिय हैं, पर जो गीत सबसे ज़्यादा दिलो-दिमाग़ पर हावी होता है वह है शान और श्रेया घोषाल का गाया रोमान्टिक युगल गीत "तू हँसे तो लगे जैसे कोई झरणा बहता है"। सुनिए इस गीत को और बह जाइए रवीन्द्र जैन के सुरीले धुनों में।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=S4vOyzH0mkM


5: "जो दिखते हो, वह लगते नहीं..." (क्या दिल्ली क्या लाहौर)

’क्या दिल्ली क्या लाहौर’ 2014 की फ़िल्म रही जो 1948 के हालातों के पार्श्व पर लिखी एक कहानी पर आधारित है। देश-विभाजन पर बनने वाली इस फ़िल्म की ख़ास बात यह है कि फ़िल्म के प्रस्तुतकर्ता के रूप में गुलज़ार का नाम नामावली में दिखाई देता है। गुलज़ार देश के बटवारे के हालातों से गुज़रे हैं, इसलिए उनसे बेहतर इस फ़िल्म के साथ बेहतर न्याय और कौन सकता था भला! करण अरोड़ा निर्मित इस फ़िल्म को निर्देशित किया नवोदित निर्देशक विजय राज़ जो इस फ़िल्म के नायक भी हैं। फ़िल्म के फ़र्स्ट लूक को वाघा सीमा पर प्रदर्शित किया गया था और 2  मई 2014 को पूरे विश्व में यह फ़िल्म रिलीज़ हुई। फ़िल्म को लोगों ने पसन्द ज़रूर किया पर बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म पिट गई। गुलज़ार के लिखे गीत, संदेश शान्डिल्य का संगीत भी दब कर रह गया। इस फ़िल्म के जिस गीत को हमने चुना है वह है पाकिस्तानी गायक शफ़क़त अमानत अली का गाया "जो दिखते हो वह लगते नहीं"। इस गीत के बारे में और क्या कहें, यही काफ़ी है कि इसे गुलज़ार ने लिखा है, सुनिए।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



4: "शामें डूबती हैं तेरे ख़यालों में..." (ख़्वाब)

Rahat & Shreya
’ख़्वाब’ ज़ैद अली ख़ान द्वारा निर्देशित व मोराद अली ख़ान निर्मित फ़िल्म है जिसमें नवदीप सिंह और सिमर मोतियानी मुख्य भूमिकाओं में हैं। फ़िल्म में संगीत दिया है संदीप चौटा और सज्जाद अली चान्दवानी ने। 28 मार्च 2014 के दिन सलमान ख़ान के हाथों इस फ़िल्म का म्युज़िक लौन्च भी फ़िल्म को डूबने से बचा नहीं पाया। फ़िल्म में केवल तीन गीत हैं, जिसमें शीर्षक गीत सोनू निगम की आवाज़ में है और संगीतकार हैं संदीप चौटा। पर जो गीत बेहतरीन है वह है राहत फ़तेह अली ख़ान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "शामेंडूबती हैं तेरे ख़यालों में"। राहत और श्रेया जब भी कभी साथ में गीत गाए हैं, वो सारे गाने कामयाब रहे हैं, और यह गीत भी कोई व्यतिक्रम नहीं है। बड़ा ही कोमल अंदाज़ में गाया हुआ यह गीत जैसे एक आस सी बंधा जाता है कि शायद फ़िल्म-संगीत का वह सुरीला दौर शायद फिर से वापस आ जाए। सुनिए यह गीत अगर आपने पहले कभी नहीं सुना है तो।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)


3: "अन्धेरों में ढूंढ़ते हैं टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी..." (Children of War)

मृत्युंजय देवरत निर्देशित ’Children of War’ फ़िल्म 1971 के बांगलादेश मुक्ति युद्ध के पार्श्व पर बनी फ़िल्म है। पहले फ़िल्म का शीर्षक ’The Bastard Child' रखा गया था पर IMPPA ने इस शीर्षक को स्वीकृति नहीं दी। फ़िल्म में संगीत था सिद्धान्त माथुर का। इस फ़िल्म को क्रिटिकल अक्लेम मिला है। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुभाष के झा ने लिखा है, "It is impossible to believe that this war epic has been directed by a first-time filmmaker. How can a virgin artiste conceive such a vivid portrait of the rape of a civilization?" गोपाल दत्त के लिखे और संगीतकार सिद्धान्त माथुर के ही गाए फ़िल्म का सबसे अच्छा गीत है "अन्धेरों में ढूंढ़ते हैं टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी", जिसे सुनना एक बेहद सुरीला अनुभव रहता है। दीपचन्दी ताल पर कम्पोज़ किया यह गीत शायद फ़िल्म की कहानी और कथन को अपने आप में समेट लेता है। सिद्धान्त की तरो-ताज़ी आवाज़ ने गीत में एक नया रंग भरा है जो शायद किसी स्थापित गायक की आवाज़ नहीं ला पाती। सुनिए और महसूस कीजिए किसी भी युद्द के दौरान बच्चों पर होने वाले शोषण और अत्याचार।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=6LZmULljq4s


2: "मारे नैनवा के बान..." (बाज़ार-ए-हुस्न)

यह वाकई बहुत ही सराहनीय बात है कि 2014 में भी कुछ फ़िल्मकार मुन्शी प्रेमचन्द की कहानी पर फ़िल्म बनाने का जस्बा रखते हैं। इसके लिए निर्माता ए. के. मिश्र की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। प्रेम्चन्द की उर्दू उपन्यास ’बाज़ार-ए-हुस्न’ पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनाई मिश्र जी ने जो 18 जुलाई 2014 को प्रदर्शित हुई। रेशमी घोष, जीत गोस्वामी, ओम पुरी और यशपाल शर्मा अभिनीत इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म में संगीत दिया है वरिष्ठ और सुरीले संगीतकार ख़य्याम ने। ख़य्याम साहब का संगीत हमेशा ही बड़ा सुकून देता आया है। ठहराव भरे उनके गीत जैसे कुछ पलों के लिए हमारे सारे तनाव दूर कर देते हैं। ’बाज़ार-ए-हुस्न’ के गीतों में भी ख़य्याम साहब का वही जादू सुनाई देता है। सुनिधि चौहान की आवाज़ में फ़िल्म का मुजरा "मारे नैनवा के बान" अपना छाप छोड़ जाती है; चल्ताऊ किस्म के मुजरे बनाने वालों के लिए यह मुजरा एक सबक है कि 2014 में भी स्तरीय मुजरा बनाया जा सकता है। आप भी सुनिए और मस्त हो जाइए इस मुजरे को सुनते हुए...

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=QEhI2-8NaPk


1: "जगावे सारी रैना..." (डेढ़ इश्क़िया)

Rekha Bhardwaj
विशाल भारद्वाज की फ़िल्म ’डेढ़ इश्क़िया’ को बॉक्स ऑफ़िस पर ख़ास सफलता नहीं मिली माधुरी दीक्षित और नसीरुद्दीन शाह जैसे मँझे हुए कलाकारों के होते हुए भी। फ़िल्म के गीत संगीत की बात करें तो "हमारी अटरिया" गीत के अलावा बाक़ी सभी गीतों का संगीत विशाल भारद्वाज ने ख़ुद ही तैयार किया है और बोल लिखे हैं गुलज़ार ने। रेखा भारद्वाज के गाए "हमारी अटरिया" दरसल बेग़म अख़्तर का गाया गीत है। राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में "दिल का मिज़ाज इश्क़िया" और "ज़बान जले है" अपनी जगह ठीक है, पर जो गीत स्तर के लिहाज़ से सबसे उपर है, वह है रेखा भार्द्वाज और बिरजु महाराज की आवाज़ों में "जगावे सारी रैना"। शास्त्रीय संगीत की छटा लिए इस गीत में बिरजु महाराज द्वारा गाया हुआ आलाप और ताल, और साथ में सितार और तबले की थाप इस गीत को निस्संदेह वर्ष का सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक बनाता है। क्यों नहीं आया यह गीत किसी भी काउन्ट-डाउन में? क्यों नहीं सुनाई दिया यह गीत किसी भी रेडियो चैनल पर? क्या "जुम्मे की रात है" जैसे गीतों को सुनने की ही रुचि शेष रह गई है आजकल? लीजिए इस गीत को सुनते हुए ज़रा मंथन कीजिए कि क्यों नहीं पब्लिसिटी मिल रही है इस स्तरीय गीतों को।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=WpXb61GsHEU 


तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति, आशा है आपको पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते आप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, January 1, 2015

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड - भाग 1



नववर्ष विशेष

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड  - भाग 1

The Unsung Melodies of 2014





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और नववर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ! स्वागत है आप सभी का साल 2015 की प्रथम प्रस्तुति में। आज वर्ष के पहले और दूसरे दिन आपके मनोरंजन के लिए हम लेकर आए हैं यह विशेष प्रस्तुति। साल 2014 हिन्दी फ़िल्म-संगीत के लिए अच्छा ही कहा जा सकता है; अच्छा इस दृष्टि से कि इस वर्ष जनता को बहुत सारे हिट गीत मिले, जिन पर आज की युवा पीढ़ी ख़ूब थिरकी, डान्स क्लब की शान बने, FM चैनलों पर बार-बार लगातार ये गाने बजे। "बेबी डॉल", "जुम्मे की रात है", "मुझे प्यार ना मिले तो मर जावाँ", "पलट तेरा ध्यान किधर है", "आज ब्लू है पानी पानी", "तूने मारी एन्ट्री यार", "सैटरडे सैटरडे", "दिल से नाचे इण्डिया वाले", जैसे गीत तो जैसे सर चढ़ कर बोले साल भर। लेकिन इन धमाकेदार गीतों की चमक धमक के पीछे गुमनाम रह गए कुछ ऐसे सुरीले नग़मे जिन्हें अगर लोकप्रियता मिलती तो शायद सुनने वालों को कुछ पलों के लिए सुकून मिलता। कुछ ऐसे ही कमचर्चित पर बेहद सुरीले और अर्थपूर्ण गीतों की हिट परेड लेकर हम उपस्थित हुए हैं आज की इस विशेष प्रस्तुति में। आज के इस अंक में अन्तिम सात गीत और कल के अंक में प्रथम सात गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसन्द आएगी। सुनिए और अपनी राय दीजिए।


14: "तेरे बिन हो ना सकेगा गुज़ारा" (परांठे वाली गली)

KK
जनवरी 2014 में प्रदर्शित फ़िल्मों में ’यारियाँ’ और ’जय हो’ की तरफ़ सबका ध्यान केन्द्रित रहा। इन दो फ़िल्मों के गीत-संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाई। इसी दौरान एक फ़िल्म आई ’परांठे वाले गली’ जो एक रोमान्टिक कॉमेडी फ़िल्म थी। सचिन गुप्ता निर्देशित तथा अनुज सक्सेना व नेहा पवार अभिनीत इस फ़िल्म में संगीत का दायित्व मिला विक्रम खजुरिआ और वसुन्धरा दास को। विक्रम द्वारा स्वरबद्ध के.के की आवाज़ में एक गीत था "तेरे बिन हो ना सकेगा गुज़ारा", जो सुनने में बेहद कर्णप्रिय है। यह गीत ना तो कभी सुनाई दिया और ना ही इसकी कोई चर्चा हुई। तो सुनिए यह गीत और आप ही निर्णय लीजिए कि आख़िर क्या कमी रह गई थी इस गीत में जो इसकी तरफ़ लोगों का ध्यान और कान नहीं गया।


 
(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



13: "ओ माँझी रे... आज तो भागे मनवा रे" (Strings of Passion)

संघामित्रा चौधरी निर्देशित फ़िल्म बनी ’Strings of Passion'। जैसा कि शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि यह एक संगीत-प्रधान विषय की फ़िल्म है। फ़िल्म की कहानी तीन चरित्र - नील, अमन और अमित की कहानी है जो ’Strings of Passion' नामक एक बैण्ड चलाते हैं, पर ड्रग्स, टूटे रिश्ते और ख़राब माँ-बाप की वजह से उन पर काले बादल मण्डलाने लगते हैं। देव सिकदार इस फ़िल्म के संगीतकार हैं। इस फ़िल्म का एक गीत "ओ माँझी रे... आज तो भागे मनवा रे" ज़रूर आपके मन को मोह लेगा। सुनिए यह गीत जो आधुनिक होते हुए भी लोक-शैली को अपने आप में समाये हुए है। देव सिकदार की तरो-ताज़ी और गंभीर आवाज़ में यह गीत जानदार बन पड़ा है।


(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



12: "शहर मेरा" (One by Two)

'One by Two' फ़िल्म कब आई कब गई पता भी नहीं चला। शंकर-अहसान-लॉय का संगीत होने के बावजूद फ़िल्म के गीतों पर भी किसी का ध्यान नहीं गया। इस फ़िल्म में Thomas Andrews का गाया एक गीत है "शहर मेरा"। व्हिसल, वायलिन, सैक्सोफ़ोन, पियानो और जैज़ के संगम से यह गीत एक अनोखा गीत बन पड़ा है। गायक के केअर-फ़्री अंदाज़ से गीत युवा-वर्ग को लुभाने में सक्षम हो सकती थी। पर फ़िल्म की असफलता इस गीत को साथ में ले डूबी। अगर आपने यह गीत पहले नहीं सुना है तो आज कम से कम एक बार ज़रूर सुनिए।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



11: "साँसों को जीने का इशारा मिल गया" (ज़िद)

नई पीढ़ी के गायकों में आजकल अरिजीत सिंह की आवाज़ सर चढ़ कर बोल रही है। उनकी पारस आवाज़ जिस किसी भी गीत को छू रही है, वही सोने में तबदील हो रही है। 2014 में अरिजीत के गाए सबसे कामयाब गीत ’हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ में "मैं तैनु समझावाँ जी" और ’मैं तेरा हीरो’ का शीर्षक गीत रहा है। अरिजीत की आवाज़ में एक कशिश है जो उन्हें भीड से अलग करती है। सेन्सुअस गीत उनकी आवाज़ में बड़े ही प्रभावशाली सिद्ध हुए हैं। इसी बात को ध्यान में रख कर फ़िल्म ’ज़िद’ के संगीतकार शरीब-तोशी ने उनसे इस फ़िल्म का एक सेन्सुअस गीत गवाया, जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया। इस गीत को सुन कर महेश भट्ट और इमरान हाश्मी की वो तमाम फ़िल्में याद आने लगती हैं जिनमें इस तरह के पुरुष आवाज़ वाले सेन्सुअस गीत हुआ करते थे। तो सुनिए यह गीत और खो जाइए इस गीत की मेलडी में।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



10: "सोनिए..." (Heartless)

Gaurav Dagaonkar
शेखर सुमन ने दूसरी बार अपने बेटे अध्ययन सुमन को लौंच करने के लिए फ़िल्म बनाई ’Heartless' पर इस बार भी क़िस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। फ़िल्म डूब गई और साथ ही डूब गया अध्ययन सुमन के हिट फ़िल्म पाने का सपना। इस फ़िल्म के संगीतकार गौरव दगाँवकर ने अच्छा काम किया, पर उनके संगीत की तरफ़ कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया गया। इस फ़िल्म में के.के का गाया एक गीत है "सोनिए" जिसे तवज्जो मिलनी चाहिए थी। गीत सुन कर के.के की ही आवाज़ में फ़िल्म ’अक्सर’ का गीत "सोनिए" याद आ जाती है, पर यह गीत बिल्कुल नया और अलग अंदाज़ का है। यूथ-अपील से भरपूर यह गीत अगर सफल होती तो यंग्‍ जेनरेशन को ख़ूब भाती इसमें कोई संदेह नहीं है। आप भी सुनिए और ख़ुद निर्णय लीजिए।



(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



9: "मुस्कुराने के बहाने ढूंढ़ती है ज़िन्दगी..." (अनुराधा)

कविता कृष्णमूर्ति एक ऐसी गायिका हैं जिनकी आवाज़ और गायकी उत्कृष्ट होने के बावजूद फ़िल्म संगीतकारों ने उनकी आवाज़ का सही-सही उपयोग नहीं किया। इसका क्या कारण है बताना मुश्किल है। पर जब भी कविता जी को कोई "अच्छा" गीत गाने का मौका मिला, उन्होंने सिद्ध किया कि मधुरता और गायकी में उनकी आवाज़ आज भी सर्वोपरि है। 2014 में एक फ़िल्म बनी ’अनुराधा’ जिसमें उनका गाया एक दार्शनिक गीत है "मुस्कुराने के बहाने ढूंढ़ती है ज़िन्दगी"। कम से कम साज़ों के इस्तमाल की वजह से उनकी आवाज़ खुल कर सामने आयी है इस गीत में और उनकी क्लासिकल मुड़कियों को भी साफ़-साफ़ सुनने का अनुभव होता है इस गीत में। शास्त्रीय रंग होते हुए भी एक आधुनिक अंदाज़ है इस गीत में, जिस वजह से हर जेनरेशन को भा सकता है यह गीत। काश कि इस फ़िल्म और इस गीत पर लोगों का ध्यान गया होता! अफ़सोस! ख़ैर, आज आप इस गीत को सुनिए....

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



8: "दिल आजकल मेरी सुनता नहीं..." (पुरानी जीन्स)

Ram Sampath
के.के की आवाज़ इस हिट परेड में बार-बार लौट कर आ रही है, इसी से यह सिद्ध होता है कि कुछ बरस पहले जिस तरह से वो एक अंडर-रेटेड गायक हुआ करते थे, आज भी आलम कुछ बदला नहीं है। के.के कभी लाइम-लाइट में नहीं आते, पर हर साल वो कुछ ऐसे सुरीले गीत गा जाते हैं जो अगर आज नहीं तो कुछ सालों बाद ज़रूर लोग याद करेंगे इनकी मेलडी के लिए। तनुज विरवानी पर फ़िल्माया "दिल आजकल मेरी सुनता नहीं" फ़िल्म ’पुरानी जीन्स’ का सबसे कर्णप्रिय गीत है। राम सम्पथ के संगीत निर्देशन में यह गीत एक बार फिर से युवा-वर्ग का गीत है जो पहले प्यार का वर्णन करने वाले गीतों की श्रेणी का गीत है। हर दौर में इस थीम पर गीत बने हैं और यह गीत इस नए दौर का प्रतिनिधि गीत बन सकता है। सुनते हैं यह गीत।


(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=5MNyvM3_yio 


तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति का पहला भाग। दूसरा भाग कल के अंक में प्रस्तुत किया जाएगा। आशा है आपको हमारी यह कोशिश पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते हाप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

Wednesday, December 31, 2014

नववर्ष विशेष: 1934 से 2014 -- 9 दशक, 9 गीत



नववर्ष विशेष

बीते नौ दशकों के नौ चुनिन्दा गीत और उनसे जुड़ी कुछ यादें

विदा 2014



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, आज साल 2014 का अंतिम दिन है। एक और साल बीत गया और एक और नया साल दरवाज़े पर दस्तक देने के लिए बेताब हो रहा है। फ़िल्म संगीत के इतिहास में आज जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो ध्यान आता है कि आठ दशक तो पूरे हो ही चुके हैं, नवे दशक के भी चार साल बीत चुके हैं। इस दशकों में फ़िल्म संगीत अनेक दौर से गुजरता गया और एक स्वरूप से दूसरे स्वरूप में ढलता गया। 2014 से पीछे की तरफ़ चलें तो 2004, 1994, 1984, 1974.... से लेकर 1934 तक के नौ दशकों का यह सुरीला सफ़र बड़ा ही सुहाना रहा। तो आज इस विशेष दिन के अवसर पर क्यों ना पिछले 9 दशकों के इन 9 सालों से 9 गीत चुन कर उनके साथ जुड़ी कुछ स्मृतियों को आपके सामने रखे जायें। तो आनन्द लीजिये आज की इस नववर्ष विशेष प्रस्तुति का, और साथ ही स्वीकार कीजिए नववर्ष की हमारी हार्दिक शुभकामनायें। 


1934: "प्रेम नगर में बनाऊंगी घर मैं" (चण्डीदास)

उमा शशि और कुन्दनलाल सहगल का गाया फ़िल्म 'चण्डीदास' का यह युगल गीत शायद फ़िल्म-संगीत इतिहास का पहला-पहला लोकप्रिय युगल गीत रहा। सहगल साहब के बारे में समय समय पर कई कलाकारों ने अपने अपने विचार व्यक्त किये हैं। उन्हीं में से एक हैं गायक तलत महमूद। सहगल साहब से अपनी मुलाक़ात को याद करते हुए तलत साहब ने कहा था - "मैं क्या बताऊँ आपको, मैं इस क़दर दीवाना था उनका अपने स्कूल के ज़माने में, अपने कॉलेज के ज़माने में, हमेशा उनके गाने गाता था, कभी ख़याल भी नहीं था कि कभी उनसे मुलाक़ात होगी। लेकिन जब 'न्यू थिएटर्स' में 1945 में मेरा दो साल का कॉनट्रैक्ट हुआ तो उनकी पिक्चर बन रही थी 'माइ सिस्टर'। तकरीबन उसके सारे गाने मेरे सामने पिक्चराइज़ हुए। कुछ तो काम था ही नहीं, सुबह से, उस ज़माने में स्टुडियो 9:15 बजे जाइये और 5 बजे आइये, जैसे ऑफ़िस का टाइम होता था। तो हम लोग स्टुडियो में होते थे, जब भी कोई गाना वगेरह होता था तो हम लोग वहाँ रहते थे, और मेरी ज़िन्दगी की सबसे हसीन-तरीन यादगार वह मुलाक़ात है सहगल साहब से जो मैं सोच भी नहीं सकता, आज भी मुझे यकीन नहीं आता है कि उनसे मेरी मुलाक़ात हुई थी क्योंकि वाक़ई उनको हम एक अजूबा समझते थे, और उनके साथ, ख़याल कीजियेगा, उनके साथ हमेशा पार्टियों में जाते थे, उनके घर पे जाते थे, बहुत पुर-मज़ाकयात भी थे और पार्टी की जान थे बिल्कुल! मगर यह होता था कि जब खाना वाना खा चुके होते थे तो औरतों को भेज दिया करते थे कि आप लोगों के लायक ये लतीफ़े नहीं हैं। तो औरतों को हमेशा एक तरफ़ कर देते थे, फिर मर्दों की पार्टी जमती थी। और फिर आप देखिये कि उसमें वाक़ई इस क़दर ख़ुशमिज़ाज आदमी थे, इतने नर्म-दिल कि अगर ज़रा सी भी तक़लीफ़ हो आपको तो सब काम करने को तैयार रहते थे। जो कुछ भी मैंने उनको देखा था थोड़े से अरसे में, उस से अंदाज़ा हो गया कि बेहतरीन क़िस्म के आदमी थे वो, और जिस वक़्त गाते थे ऐसा लगता था कि नूर की बारिश हो रही है।" तो आइये अब सुनते हैं उमा शशि और सहगल साहब का गाया 1934 का यह गीत-



1944: "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना" (रतन)

1944 का साल संगीतकार नौशाद के करीयर का ‘टर्निंग पॉयण्ट ईयर’ साबित हुआ। ‘जेमिनी पिक्चर्स’ के बैनर तले डी. एन. मधोक ने बनाई ‘रतन’ जिसके प्रदर्शित होते ही चारों तरफ़ धूम मच गई और नौशाद उस दौर के प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में शामिल हो गए। नौशाद ने इस फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से “अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना” गवाकर चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। नौशाद अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर संगीत में अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई आ गए थे। उनके संगीतकार बन जाने के बाद और सफलता हासिल कर लेने के बाद भी उनकी इस कामयाबी को सामाजिक कारणों से अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। उन्हीं के शब्दों में एक मज़ेदार क़िस्से का आनन्द लीजिए यहाँ पर – “ख़ैर, माँ का पैग़ाम आया कि शादी के लिए लड़की तय हो गई है, मैं घर आ जाऊँ। उस वक़्त मैं नौशाद बन चुका था। माँ ने कहा कि लड़की वाले सूफ़ी लोग हैं, इसलिए उनसे उन्होंने (नौशाद के पिता ने) यह नहीं कहा कि तुम संगीत का काम करते हो, बल्कि तुम दर्ज़ी का काम करते हो। मैंने सोचा कि संगीतकार से दर्ज़ी की इज़्ज़त ज़्यादा हो गई है! तो शादी में शामियाना लगाया गया, और बैण्ड वाले मेरे ही गाने बजाए जा रहे हैं और मैं दर्ज़ी बना बैठा हूँ। किसी ने फिर कहीं से कहा कि कौन ये सब बजा रहा है, सबको ख़राब कर रहा है? उस समय यही सब गाने चल रहे थे, “सावन के बादलों”, “अखियाँ मिलाके” वगैरह।”  चलिए अब आप भी आनन्द लीजिये इसी गीत का।



1954: "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने" (मिर्ज़ा ग़ालिब)

1950 के आसपास 40 के दशक की सिंगिंग्‍ सुपरस्टार सुरैया की शोहरत में कुछ कमी आने लगी ही थी कि सोहराब मोदी की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' ने एक बार फिर उन्हें सोहरत की बुलन्दी पर पहुँचा दिया। इस फ़िल्म में उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की मेहबूबा चौधवीं बेग़म का रोल अदा किया था। शायराना अन्दाज़ वाले पंडित नेहरु ने सुरैया को इस फ़िल्म के लिए शाबाशी दिया था। यह वह फ़िल्म है जिसकी पेशानी पर राष्ट्रपति पुरस्कार का तिलक लगाया गया था। इस ख़ूबसूरत मुहुर्त को याद करते हुए सुरैया ने कहा था - "ज़िन्दगी में कुछ मौक़े ऐसे आते हैं जिनपे इंसान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िन्दगी में भी एक मौक़ा ऐसा आया था जब फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को प्रेसिडेण्ट अवार्ड मिला और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ जहाँ हमने पंडित नेहरु जी के साथ यह फ़िल्म देखी थी। पंडित नेहरु हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली न समाती। इस वक़्त पंडित जी की याद के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश है "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने"।



1964: "कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों" (हक़ीक़त)

संगीतकार मदन मोहन के ऑफ़िशिअल वेबसाइट से 'हक़ीक़त' से जुड़ी कुछ बातें जानने को मिलती हैं। उस समय की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म थी 'हक़ीक़त'। युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनने वाली इस फ़िल्म में गीत-संगीत के लिए बहुत कम ही जगह थी। लेकिन "मैं यह सोच कर उसके दर से उठा था", "ज़रा सी आहट होती है", "खेलो ना मेरे दिल से", "होके मजबूर उसने मुझे बुलाया होगा" और "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों" जैसे कैफ़ी आज़्मी के लिखे गीतों को रच कर मदन मोहन ने अपने आप को सिद्ध किया। 'हक़ीक़त' ही वह फ़िल्म थी जिसने मदन मोहन में फिर एक बार अभिनय करने की लालसा उत्पन्न की। फ़िल्म 'परदा' के बन्द हो जाने पर मदन मोहन को अभिनय से दिलचस्पी चली गई थी। केवल 'मुनीमजी' और 'आँसू' में उन्होंने थोड़ा बहुत अभिनय किया। लेकिन जब चेतन आनन्द ने उन्हें 'हक़ीक़त' में एक रोल निभाने का मौका दिया तो वो उत्साहित हो उठे। उन्हीं के शब्दों में - "मैं इस ऑफ़र से इतना उत्साहित हुआ कि मैं दर्जनो उलझने एक तरफ़ रख कर, सारे काम जल्दी जल्दी निपटा कर दिल्ली के लिए प्लेन से रवाना हो गया। बाकी यूनिट उस समय लदाख के लिए निकल चुकी थी।" पहले ख़ुद आर्मी रह चुके मदन मोहन के दिल में फिर एक बार आर्मी यूनिफ़ॉर्म पहन कर आर्मी सोलजर का रोल निभाने का लालच था। लेकिन उनका यह सपना हक़ीक़त न हो सका। श्रीनगर में करीब करीब एक सप्ताह इन्तज़ार करने के बाद भी जब मौसम साफ़ नहीं हुआ, तो निराश होकर उन्हें बम्बई वापस लौटना पड़ा। "मैंने सोचा था कि इस ट्रिप से मैं कुछ यादगार लम्हे सहेज कर लाऊंगा, पर मेरे साथ वापस आया कुछ ऊनी कपड़े जिन्हें मैंने दिल्ली से खरीदा था उस सफ़र के लिए।"



1974: "मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया" (कोरा कागज़)

"यह गाना मेरी ज़िन्दगी का भी आइना है। मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। और शायद किशोर कुमार के साथ भी यही हुआ हो! क्योंकि इस गाने के रेकॉर्डिंग्‍ के दौरान उनकी आँखें आंसुओं से भीगे हुए थे। जब तक हम इस ज़िन्दगी को समझ पाते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और ज़िन्दगी ही गुज़र जाती है।" ये शब्द थे इस गीत के गीतकार एम. जी. हशमत के। और इसी गीत के निर्माण से जुड़ा हुआ एक मज़ेदार क़िस्से का ज़िक्र एक बार आनदजी भाई ने किया था। किशोर कुमार इस फ़िल्म की मूल कहानी को बांगला में पढ़ चुके थे, उन्हें फ़िल्म का अन्त मालूम था कि नायक-नायिका में मिलन हो जाता है। इसलिए किशोर दा ने फ़िल्म के निर्देशक अनिल गांगुली के सामने यह प्रश्न रख दिया कि क्या फ़िल्म के अन्तिम सीन में "मेरा जीवन कोरा कागज़" ही बजेगा या कुछ और सोचा है? अनिल दा हक्के-बक्के होकर कल्याणजी-आनन्दजी के पास गये और पूछा कि क्या करना चाहिये। सुझाव आया कि इंस्ट्रुमेण्टल बजा दिया जाये। उस पर किशोर दा बोले कि इंस्ट्रुमेण्टल भी तो "मेरा जीवन कोरा कागज़" का ही बजेगा न? वहाँ मौजूद गीतकार हशमत साहब ने कहा कि कुछ करते हैं इस पर। तो किशोर दा ने कहा कि बाद में आऊंगा तो फिर पैसे लूंगा अलग से। आनदजी के पास जाकर मज़े लेते हुए किशोर दा बोले कि 'महाराज, देखा फसाया ना! किशोरिया ने कैसे पकड़ा तुम को! बड़े वन-टू वन-टू करते हो न, अब करो वन-टू'। आनन्द जी के शब्दों में - "हम लोग हशमत जी से बात कर रहे थे, तो वो सोच रहे थे कि 'मेरा जीवन...' को चेंज कर पाना मुश्किल है। तो हमने कहा कि आप अन्तरे पे जाओ, कुछ नई बात करते हैं। मैंने कहा कि पहले एक कोटेशन दो, कि ऐसा-ऐसा होता है, उदाहरण दो, फिर उसके फ़ाइनल रेज़ल्ट पे आयेंगे कि इसमें यह होता है। हम ये सब काम कर रहे थे और किशोर दा आ आ कर डिस्टर्ब कर रहे थे कि कुछ लिखा महाराज? फस गये न? मेरा जीवन टुंग्‍ टुंग्‍ टुंग्‍...। मैंने कहा कि दादा प्लीज़। बोले, अभी क्यों प्लीज़? तो मैं उनको (एम. जी. हशमत को) लेके बाहर गया, बोला उदाहरण क्या देंगे कि जब डेलिवरी करती है तो माँ को तकलीफ़ होती है; बोले कि हाँ होती है। तो लिखो 'दुख के अन्दर सुख की ज्योति, और दुख ही सुख का ज्ञान'। ऐसा करते करते बन गया कि 'दर्द सहते जनम लेता हर कोई इंसान'। रेज़ल्ट देना है कि फ़ाइनल क्या है, 'वह सुखी है जो दर्द सह गया'। उसका रेज़ल्ट क्या है, 'सुख का सागर बन के रह गया'। अब ये सब कम्प्लीट हो गया, तब किशोर बोले कि चलो लिखो, हो गया? हाँ हो गया। वज़न में तो है? हाँ, वज़न में भी है, बेवज़न में भी है। उनको हमने कहा कि थैंक-यू दादा, आपकी वजह से यह पूरा हो गया, पूरी बात हो गई। और आज तीस साल हो गये इस गाने को।"



1984: "जाने क्या बात है, नींद नहीं आती" (सनी)

फ़िल्म 'सनी' में इस ख़ूबसूरत ग़ज़लनुमा गीत को लता मंगेशकर ने गाया था। वैसे तो राहुल देव बर्मन की ट्यूनिंग्‍ गुलज़ार के साथ बेहतरीन जमती थी, पर इस गीत में आनन्द बक्शी के साथ भी क्या कमाल किया है उन्होंने! इसी गीत का बांगला संस्करण पंचम ने आशा भोसले से गवाया था जिसके बोल थे "चोखे नामे बृष्टि"। लता जी के साथ साथ आशा जी को भी यह गीत और यह धुन इतनी पसन्द थी कि आशा जी ने अपने 74 वर्ष की आयु में पंचम को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने ऐल्बम 'Asha Reveals Real RD' में गाया था। लता और आशा के चाहनेवाले अक्सर लता और आशा के संस्करणों की तुलना करते हैं। पर दोनो सुनने के बाद यह बताना मुश्किल हो जाता है कि कौन किससे बेहतर है। यही ख़ास बात है लता की आवाज़ की सागदी में और आशा की आवाज़ की शोख़ी में! एक बार पंचम, आशा और गुलज़ार एक कार्यक्रम में एकत्रित हुए थे और उसमें आशा जी ने अपने पति पर यह आरोप लगाया था कि सारी सुन्दर तर्ज़ें वो उनकी बड़ी बहन को दे देते हैं। इस पर पंचम और गुलज़ार आशा को समझाते हुए अपना अपना तर्क देते हैं। पंचम के अनुसार यह आरोप ग़लत है क्योंकि उन्होंने आशा को भी एक से एक बेहतरीन गाने दिये हैं गाने के लिए। गुलज़ार ने भी पंचम का साथ देते हुए कहा कि 'ख़ुशबू' में जब "घर जायेगी तर जायेगी" कम्पोज़ हुआ था तब उन्होंने पंचम से कहा था कि यह गाना  आशा जी गायेंगी। उन्होंने आशा जी को याद भी दिलाया कि जब यह गाना उन्होंने आशा जी से गवाने की बात की तो आशा जी ने ही प्रश्न किया था कि यह तो हीरोइन का गाना है, यह गाना आप मुझे कैसे दे सकते हैं? गुलज़ार ने आगे कहा कि "आपको चुप रहना होगा आशा जी, क्योंकि सिर्फ़ 'ख़ुशबू' के ही नहीं, 'इजाज़त' के तमाम गाने भी आप ने गाये हुए हैं, और 'नमकीन' के भी। इसलिए ऐसा नहीं है कि सारे गाने लता जी को ही देते हैं।" इतने पर आशा जी ने कहा कि मैं तो मज़ाक कर रही थी। पर गुलज़ार साहब रुके नहीं, कहने लगे, "आप दोनो का मैं बताऊँ क्या है, आशा जी, आपको पता है चाँद पर किसने सबसे पहले क़दम रखा है? नील आर्मस्ट्रॉंग्। उनके बाद एडविन ने दूसरा क़दम रखा। बस, एक स्टेप से वो पीछे थे, और देखिये सभी आर्मस्ट्रॉंग् की ही बात करते हैं। एडविन, जो उनके पीछे ही थे, उनको किसी ने याद नहीं रखा। एडविन ने भी वही किया जो आर्मस्ट्रॉंग् ने किया; आपकी अचीवमेण्ट बिल्कुल वैसी ही है, उतनी ही है जितनी दीदी की, पर छोटी हैं तो छोटी हैं, क्या किया जाये! यह तो फ़क़्र की बात है कि वो आपकी बड़ी बहन हैं।" तो चलिए, दोनो सुर-साम्राज्ञियों को सलाम करते हुए फ़िल्म 'सनी' का यह गीत सुनें।



1994: "एक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था" (दिलवाले)

क्या ख़ूब चला था यह गीत उस ज़माने में। हर दूसरे दिन फ़रमाइशी कार्यक्रमों में बज उठता था रेडियो पर। और फ़ौजी जवानों को तो ख़ास पसन्द था यह गीत! तो क्यों न इस गीत को सुनने से पहले इस गीत के संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण के श्रवण राठौड़ का संदेश सुन लेते हैं जो उन्होंने फ़ौजी जवानों को कहे थे अपनी 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में। "जयमाला सुनने वाले सभी फ़ौजी भाइयों को श्रवण का, यानी कि नदीम-श्रवण का नमस्कार! मैं जानता हूँ कि आप बम्बई से कितनी दूर रह कर हमारे देश हिन्दुस्तान की रक्षा कर रहे होंगे, जहाँ पर अगर बर्फ़ है तो बर्फ़ के सिवा कुछ भी नहीं, रेगिस्तान है तो रेत के सिवा कुछ भी नहीं, और पहाड़ है तो पहाड़ों के सिवा कुछ नहीं। आप जिस निष्ठा और संकल्प से अपना काम कर रहे हैं, मेरे पास तो क्या किसी के भी पास कोई शब्द नहीं। हमारी पहली हिट फ़िल्म थी 'आशिक़ी' जिससे नदीम-श्रवण नदीम-श्रवण बने। इससे पहले हमने 17 साल कड़ी संघर्ष की, और 17 साल बाद ईश्वर ने हमें फल दिया। 1980 में जब हम स्ट्रगल कर रहे थे, काफ़ी सारे प्रोड्युसर्स को अपनी धुने सुनाया करते थे। उनमें से एक थे ताहिर हुसैन साहब, जो आमिर ख़ान के पिताजी हैं। हम उनके पास गये और कहा कि 'सर, हमें चांस दे दीजिये'। हमने उनको बहुत सारे गीतों की धुने सुनाई, पहला गीत जो हमने सुनाया वह कौन सा था यह मैं आपको थोड़ी देर बाद बताऊंगा, तो हम लोग दो तीन घंटों तक उनको धुने सुनाते गये। दूसरे दिन जब हम उनके पास गये तो उन्होंने कहा कि म्युज़िक अच्छा है लेकिन मैचुरिटी की कमी है। हम अपसेट हो गये कि ताहिर साहब ने यह क्या कह दिया, हमने इतनी मेहनत की थी इन धुनो पर। ख़ैर, बीस साल बाद जब हमारी 'आशिक़ी', 'दिल है कि मानता नहीं', और 'सड़क' हिट हो गई, तो ताहिर साहब ने हमें बुलाया और कहा कि एक फ़िल्म साथ में करते हैं और कहा कि उन्हें एक हिट गाना चाहिये। तो यह वही गाना है जो हमने बीस साल पहले सबसे पहले उनको सुनाया था। और यह गाना था "घुंघट की आढ़ से दिलबर का"। इस गीत से अलका यागनिक को फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला और ताहिर साहब भी बहुत ख़ुश हुए। इस वाक्या से हमें यह मोरल मिला कि हिम्मत कभी नहीं हारनी चाहिये, एक ना एक दिन कामयाबी ज़रूर मिलेगी।" तो इसी सीख को अपनाते हुए सुनते हैं फ़िल्म 'दिलवाले' का गीत कुमार सानू और अलका यागनिक की आवाज़ों में।



2004: "ये जो देस है तेरा, स्वदेस है तेरा" (स्वदेस)

हिन्दी सिनेमा संगीत के इतिहास में पाँच संगीतकारों को क्रान्तिकारी संगीतकार होने का ख़िताब हासिल है। ये हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, राहुल देव बर्मन और पाँचवा नाम है ए. आर. रहमान का। रहमान की अनोखी प्रतिभा और अनोखा संगीत उन्हें भीड़ से अलग करता है। ए. आर. रहमान बहुत कम बोलते हैं, और साक्षात्कार भी बड़ी मुश्किल से ही देते हैं। और न ही विविध भारती के पास उनका कोई साक्षात्कार या जयमाला मौजूद है। इसलिए रहमान साहब के अपने शब्द तो यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पाये, पर 'स्वदेस' फ़िल्म की एक अन्य गीत के बारे में बता रहे हैं इस फ़िल्म के गीतकार जावेद अख़्तर साहब - "स्वदेस फ़िल्म ने तो मुझे हार्ट-अटैक होने के मोड़ पर ले गया था जब मुझसे यह कहा गया कि मुझे लोकेशन पर ही एक गीत लिखना है और वहीं रेकॉर्ड करना है, और वह भी गीत रामलीला का एक पार्ट है। हम सब उस समय वाई में थे, मेरे पास कोई रेफ़रेन्स नहीं था और वो मुझसे सीता और रावण के बीच अशोकवाटिका का एक सीन लिखवाना चाहते थे। मैंने उनसे कहा कि आप जानते हैं कि आप मुझसे क्या कह रहे हैं? मुझे इसके लिए तुलसीदास का रामचरितमानस पढ़ना पड़ेगा और इसके लिए मुझे कम से कम दस दिन चाहिये। आशुतोष ने कहा कि ए. आर. रहमान अगले दिन ही निकल रहे हैं तीन महीने के लिए और इसलिए गाना कल ही रेकॉर्ड करना पड़ेगा। मैं डर गया, मैं हमेशा इस दिन के आने से डरता था कि मुझे एक सिचुएशन बताया जायेगा और मैं उस पर लिख नहीं पाऊँगा। उस दिन मैं जल्दी सो गया और अगली सुबह 5 बजे उठ गया और लिखने बैठ गया, सोचा कि कोशिश करके देख लिया जाये। और "पल पल है भारी विपदा है आयी" सूरज उगले से पहले तैयार हो गया। मैंने कैसे लिखा आज तक समझ नहीं पाया।" इस गीत को हम फिर कभी सुनेंगे, चलिए आज सुनते हैं फ़िल्म 'स्वदेस' का शीर्षक गीत ए. आर. रहमान के स्वर में।



2014: "मैं तैनु समझावाँ कि, ना तेरे बिना" (हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया)

2010 के इस वर्तमान दशक में फ़िल्मी गीतों पर पंजाबी बोलों और सूफ़ी शैली के संगीत की प्रचूरता पायी जा रही है। हर दौर का अपना एक अलग अंदाज़ होता है, एक चलन होता है, एक ऑडियन्स होता है; इन्हीं के बल पर गीतों की सफलता टिकी होती है। 2014 में रिलीज़ होने वाली फ़िल्मों और उनके गीतों को ग़ौर से सुनने के बाद मुझे जो गीत सबसे ज़्यादा पसन्द आया वह है अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल का गाया फ़िल्म 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' का "मैं तैनु समझावाँ कि, ना तेरे बिना लगदा जी...", जिसे लोगों ने भी ख़ूब सराहा और इस साल का एक चार्टबस्टर गीत सिद्ध हुआ। यह गीत दरसल एक पुनर्निर्मित गीत (recreated song) है जिसका मूल गीत पंजाबी फ़िल्म 'वीरसा' का है राहत फ़तेह अली ख़ान और फ़रहा अनवर की आवाज़ों में, और उस मूल गीत के संगीतकार हैं जावेद अहमद। 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' के लिए इसे रि-क्रीएट किया शरीब-तोशी ने। इसी तरह से मूल गीतकार हैं अहमद अनीस और हिन्दी फ़िल्मी वर्ज़न में गीतकार कुमार ने अपनी तरफ़ से कुछ बोल डाले हैं। कुछ लोगों का कहना था कि अगर राहत साहब की आवाज़ को ही रखी जाती तो बेहतर होता, पर कुछ लोगों को अरिजीत का अंदाज़ भी अच्छा लगा। ख़ैर, हिन्दी फ़िल्म संगीत का नौ-वाँ दशक चल रहा है, संगीत की यह धारा एक बहुत ही लम्बा रास्ता तय करती आई है और आगे भी बहुत दूर तक जाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है। इन नौ गीतों को सुन कर मन में विश्वास पैदा होती है कि अच्छा संगीत अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। अगर सुनने वालों की रुचि अच्छी हो, तो बनाने वाले भी अच्छा ही संगीत रचेंगे, अच्छे और अर्थपूर्ण बोल लिखे जायेंगे। इसी आशा के साथ और आप सभी को नववर्ष 2015 की अग्रिम शुभकामनाएँ देते हुए मैं, सुजॉय चटर्जी, आप से आज विदा लेता हूँ, नमस्कार! आप सुनिए साल 2014 का यह सुन्दर गीत...




कल यानी 1 जनवरी को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की एक और नववर्ष विशेष प्रस्तुति को पढ़ना/सुनना ना भूलिएगा



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ