Showing posts with label ameerbai karnataki. Show all posts
Showing posts with label ameerbai karnataki. Show all posts

Wednesday, June 22, 2011

बिछुडती नायिका की अपने प्रियतम के लिए कामना -"मैं मिट जाऊँ तो मिट जाऊँ, तू शाद रहे आबाद रहे...."

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 684/2011/124

'रस के भरे तोरे नैन' - फिल्मों में ठुमरी विषयक इस श्रृंखला में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार फिर आपका स्वागत करता हूँ| कल की कड़ी में हमने आपसे चर्चा की थी कि नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में 'ठुमरी' एक शैली के रूप में विकसित हुई थी| अपने प्रारम्भिक रूप में यह एक प्रकार से नृत्य-गीत ही रहा है| राधा-कृष्ण की केलि-क्रीड़ा से प्रारम्भ होकर सामान्य नायक-नायिका के रसपूर्ण श्रृंगार तक की अभिव्यक्ति इसमें होती रही है| शब्दों की कोमलता और स्वरों की नजाकत इस शैली की प्रमुख विशेषता तब भी थी और आज भी है| कथक नृत्य के भाव अंग में ठुमरी की उपस्थिति से नर्तक / नृत्यांगना का अभिनय मुखर हो जाता है| ठुमरी का आरम्भ चूँकि कथक नृत्य के साथ हुआ था, अतः ठुमरी के स्वर और शब्द भी भाव प्रधान होते गए|

राज-दरबार के श्रृंगारपूर्ण वातावरण में ठुमरी का पोषण हुआ था| तत्कालीन काव्य-जगत में प्रचलित रीतिकालीन श्रृंगार रस से भी यह शैली पूरी तरह प्रभावित हुई| नवाब वाजिद अली शाह स्वयं उच्चकोटि के रसिक और नर्तक थे| ऊन्होने राधा-कृष्ण के संयोग-वियोग पर कई ठुमरी गीतों की रचना करवाई| ठुमरी और कथक के अन्तर्सम्बन्ध नवाबी काल में ही स्थापित हुए थे| वाजिद अली शाह के दरबार की एक बड़ी रोचक घटना है; जिसने आगे चल कर नृत्य के साथ ठुमरी गायन की धारा को समृद्ध किया| एक बार नवाब के दरबार में अपने समय के श्रेष्ठतम पखावज वादक कुदऊ सिंह आए| दरबार में उनका भव्य सत्कार हुआ और उनसे पखावज वादन का अनुरोध किया गया| कुदऊ सिंह ने वादन शुरू किया| उन्होंने ऐसी-ऐसी क्लिष्ट और दुर्लभ तालों और पर्णों का प्रदर्शन किया कि नवाब सहित सारे दरबारी दंग रह गए| कुदऊ सिंह को पता था कि नवाब के दरबार में कथक नृत्य का बेहतर विकास हो रहा है| उन्होंने ऐसी तालों का वादन शुरू किया जो नृत्य के लिए उपयोगी थे; उनकी यह भी अपेक्षा थी कि कोई नर्तक उनके पखावज वादन में साथ दे| कुदऊ सिंह की विद्वता के सामने किसी का साहस नहीं हुआ| उस समय दरबार में कथक गुरु ठाकुर प्रसाद अपने नौ वर्षीय पुत्र के साथ उपस्थित थे| ठाकुर प्रसाद नवाब वाजिद अली शाह को नृत्य की शिक्षा दिया करते थे| कुदऊ सिंह की चुनौती उनके कानों में बार-बार खटकती रही| अन्ततः उन्होंने अपने नौ वर्षीय पुत्र बिन्दादीन को महफ़िल में खड़े होने का आदेश दिया| फिर शुरू हुई एक ऐसी प्रतियोगिता, जिसमें एक ओर एक नन्हा बालक और दूसरी ओर अपने समय का प्रौढ़ एवं विख्यात पखावज वादक था| कुदऊ सिंह एक से एक क्लिष्ट तालों का वादन करते और वह बालक पूरी सफाई से पदसंचालन कर सबको चकित कर देता था| अन्ततः पखावज के महापण्डित ने उस बालक की प्रतिभा का लोहा माना और उसे अपना आशीर्वाद दिया|

यही बालक आगे चलकर बिन्दादीन महाराज के रूप कथक के लखनऊ घराने का संस्थापक हुआ| बिन्दादीन और उनके भाई कालिका प्रसाद ने कथक नृत्य को नई ऊँचाई पर पहुँचाया| बिन्दादीन महाराज ने कथक नृत्य पर भाव प्रदर्शन के लिए 1500 से अधिक ठुमरियों की रचना की थी, जिनका प्रयोग आज भी कथक नर्तक / नृत्यांगना करते हैं| "रस के भरे तोरे नैन" श्रृंखला के आगामी किसी अंक में हम बिन्दादीन महाराज की ठुमरियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे|

इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आपने अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में 1944 की फिल्म "भर्तृहरि" से राग हेमन्त की ठुमरी सुनी थी| आज हम आपको जो ठुमरी सुनवाने जा रहे हैं, वह भी अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में ही है| 1947 की फिल्म "सिन्दूर" से यह ठुमरी ली गई है| यह वह समय था जब अमीरबाई पार्श्वगायन के क्षेत्र में शीर्ष पर थीं| 'कन्नड़ कोकिला' के नाम से विख्यात अमीरबाई ने 1947 में फिल्मिस्तान द्वारा निर्मित फिल्म "सिन्दूर" में राग "तिलक कामोद" की एक बेहद कर्णप्रिय ठुमरी का गायन किया है| फिल्म के संगीतकार हैं खेमचन्द्र प्रकाश तथा गीतकार हैं कमर जलालाबादी| ठुमरी की नायिका जाते हुए प्रियतम के कुशलता की कामना करती है, जब कि इस बिछोह से उसका ह्रदय दुखी है और आँखें आँसुओं से भीगी हैं| आइए सुनते हैं रस-भाव से भरी यह ठुमरी -



क्या आप जानते हैं...
कि भक्तकवि नरसी भगत का चर्चित भजन -"वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाने रे..." गाने के कारण महात्मा गाँधी अमीरबाई कर्नाटकी के बहुत बड़े प्रशंसक बन गए थे|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - किस राग पर आधारित है ये ठुमरी - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - इस पारंपरिक ठुमरी के संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
हिन्दुस्तानी जी और दीप चंद्रा जी के साथ अमित जी को बधाई. क्षिति जी इस शृंखला में आप सशक्त दावेदार हैं, जमे रहिये

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, October 24, 2010

क्या हमने बिगाड़ा है, क्यों हमको सताते हो....गुजरे दिनों में लौट चलिए सहगल और अमीरबाई के साथ इस नटखट से गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 511/2010/211

इंसान मात्र से ग़लतियाँ होती रहती हैं। चाहे हम लाख कोशिश कर लें, छोटी मोटी ग़लतियाँ फिर भी हर रोज़ हम कर ही बैठते हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस महफ़िल में! आप यह सोच रहे होगे कि यह हम क्या ग़लतियों की बातें लेकर बैठ गये। फिर भी दोस्तों, ज़रा सोचिए, क्या ऐसा भी कोई इंसान है जिसने अपने जीवन में कोई ग़लती ना की हो? बल्कि हम युं भी कह सकते हैं कि ग़लतियों से ही हमें सीखने का मौका मिलता है, अपने आप को सुधारने का मौका मिलता है। जिस दिन हमने कोई ग़लती ना की हो, जिस दिन हमें किसी परेशानी का सामना ना करना पड़ा हो, उस दिन हमें यह यकीन कर लेना चाहिए कि हम ग़लत राह पर चल रहे हैं। ये वाणी मेरी नहीं बल्कि स्वामी विवेकानंद की है। आज हम ग़लतियों की बातें इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आज से हम जो शृंखला शुरु कर रहे हैं, उसका भी विषय यही है। युं तो हमारे फ़िल्मी गीतकार, संगीतकार, गायक, गायिकाएँ और फ़िल्म निर्माता व निर्देशक बड़ी ही सावधानी के साथ गानें बनाते हैं और पूरा पूरा पर्फ़ेक्शन उनमें डालने की कोशिश करते हैं, लेकिन फ़िल्मी इतिहास गवाह है कि कई बार ऐसा हुआ है कि इन अज़ीम फ़नकारों से भी थोड़ी भूल चूक हो गई है जाने अनजाने। तो दोस्तों, ऐसे ही कुछ गड़बड़ी वाले गीतों को हम समेट लाये हैं एक लघु शृंखला की शक्ल में। तो लीजिए आज से अगले १० अंकों में सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'गीत गड़बड़ी वाले'। इससे पहले कि हम इस शृंखला के पहले गीत का ज़िक्र करें, हम यह बताना चाहेंगे कि इस शृंखला का उद्देश्य इन महान कलाकारों की ग़लतियाँ निकालना नहीं है। ऐसी ग़ुस्ताख़ी हम नहीं कर सकते। इन कलाकारों ने जो योगदान दिया है, उनकी तुलना में ये छोटी मोटी ग़लतियाँ नगण्य है। आपको याद होगा फ़िल्म 'ख़ूबसूरत' में रेखा का एक संवाद था "हम ये सब आण्टी जी को चोट पहुँचाने के लिए थोड़े कर रहे हैं, हम तो ये सब कर रहे हैं निर्मल आनंद के लिए"। बस यही बात यहाँ भी लागू होती है। यह शृंखला सिर्फ़ और सिर्फ़ निर्मल आनंद के लिए है। तो आइए हम सब हल्के फुल्के अंदाज़ में इस शृंखला का आनंद उठाते हैं, और पहले उन सभी कलाकारों से क्षमा याचना भी कर लेते हैं जिनकी ग़लतियाँ इस शृंखला में उजागर होंगी।

'गीत गड़बड़ी वाले' शृंखला की पहली कड़ी के लिए हम जिस गीत को चुन लाये हैं, उसमें आवाज़ें हैं फ़िल्म जगत के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल और अमीरबाई कर्नाटकी की। फ़िल्म 'भँवरा' का यह गीत है "क्या हमने बिगाड़ा है, क्यों हमको सताते हो"। पता है इस गीत में गड़बड़ी कैसी हुई? गीत के आख़िर में अमीरबाई कर्नाटकी की लाइन "तुम हमें अपना बनाते हो" दो बार आना था। लेकिन जैसे ही अमीरबाई एक बार इस लाइन को गाती हैं और दूसरी बार गाने के लिए शुरु करती हैं तो सहगल साहब ग़लती से अपनी लाइन "क्या हमने बिगाड़ा है" गाते गाते रुक जाते हैं। और अमीरबाई की लाइन होने के बाद उसे सही जगह पर गाते हैं। इस तरह से गड़बड़ी वाले गीतों में यह गीत शामिल हो गया। दोस्तों, ४० के दशक का यह एक बेहद मक़बूल गाना है। भले ही सहगल साहब ने इस गीत में ग़लती की हों, लेकिन उससे इस गीत की लोकप्रियता में तनिक भी कमी नहीं आयी थी उस ज़माने में। 'भँवरा' रणजीत मोवीटोन की फ़िल्म थी जिसमें सहगल साहब के साथ थे अरुण, कमला चटर्जी, याकूब, मोनिका देसाई, बृजमाला और केसरी। फ़िल्म में संगीत था खेमचंद प्रकाश का। तो आइए किदार शर्मा निर्देशित १९४४ की इस फ़िल्म के इस अनोखे गीत को सुनते हैं। कल एक ऐसा ही गीत लेकर आयेंगे जिसमें बिल्कुल इसी तरह की गड़बड़ी की है एक और गायक ने। तो अनुमान लगाइए कल के गीत की और मुझे इजाज़त दीजिए, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि कुंदन लाल सहगल १९४२ में कलकत्ते के न्यु थिएटर्स में इस्तीफ़ा देकर बम्बई के रणजीत मूवीटोन में चले गये थे। उस समय धीरे धीरे फ़्रीलांसिंग् का दौर भी चलने लगा था। १९४४ में जहाँ एक तरफ़ सहगल साहब ने रणजीत के 'भँवरा' में काम किया, वहीं वापस कलकत्ते जाकर न्यु थिएटर्स के 'माइ सिस्टर' में भी अभिनय किया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०२ /शृंखला ०२
ये पंक्तियाँ सुनिए गीत की -


अतिरिक्त सूत्र - किशोर कुमार का मशहूर अंदाज़ है जो अभी आपने सुना

सवाल १ - सहगायिका बताएं इस युगल गीत की - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम कान्त जी पहली बाज़ी जीतने के बाद दूसरी श्रृखला में भी आपने शानदार शुरूआत की है, २ अंकों की बधाई. अमित जी और बिट्टू जी १ -१ अंक आप दोनों के खाते में भी आये. शंकर लाल जी जैसा कि बटुक नट जी ने कहा कि हम सब आपके साथ हैं...शयर बाज़ार ४ बजे बंद हो जाता है उसके बाद खूब सारा संगीत सुनिए....शाम तक सारी थकान उतर जायेगी....और हाँ एक गुजारिश है आप सब बहुत हद तक नए हैं इस परिवार के अन्य सदस्यों के लिए और हमारे लिए भी....कुछ अपने बारे में विस्तार से हमें लिखें ताकि ये सम्बन्ध और गहरे हो सकें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 17, 2010

मार कटारी मर जाना ये अखियाँ किसी से मिलाना न....अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज़ में एक अनूठा गाना

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 348/2010/48

१९४७ का साल भारत के इतिहास का शायद सब से महत्वपूर्ण साल रहा होगा। इस साल के महत्व से हम सभी वाकिफ हैं। १५ अगस्त १९४७ को इस देश ने पराधीनता की सारी ज़ंजीरों को तोड़ कर एक स्वाधीन वातावरण में सांस लेना शुरु किया था। एक नए भारत की शुरुआत हुई थी इस साल। हालाँकि आज़ादी की ख़ुशी १५ अगस्त के दिन आई थी, लेकिन इस साल की शुरुआत एक बेहद दुखद घटना से हुई थी। और यह दुखद घटना थी हिंदी सिनेमा के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल का निधन। १८ जनवरी १९४७ को वो चल बसे और एक पूरा का पूरा युग उनके साथ समाप्त हो गया। उनके अकाल निधन से फ़िल्म संगीत को जो क्षति पहुँची, उसकी भरपाई हो सकता है कि अगली पीढ़ी ने कर दी हो, लेकिन दूसरा सहगल फिर कभी नहीं जन्मा। एक तरफ़ सहगल का सितारा डूब गया, तो दूसरी तरफ़ से एक ऐसी गायिका का उदय हुआ इस साल जो फ़िल्म संगीत का सब से उज्वल सितारा बनीं और ६ दशकों तक इस इंडस्ट्री पर राज करती रहीं। लता मंगेशकर। जी हाँ, १९४७ में ही लता जी का गाया पहला एकल प्लेबैक्ड सॊंग् "पा लागूँ कर जोरी रे" फ़िल्म 'आप की सेवा में' में सुनाई दी थी। १९४७ में ही देश का बंटवारा हो गया और यह देश हिंदुस्तान और पाक़िस्तान में विभाजित हो गया। लाखों की तादाद में लाशें गिरी, सरहद के दोनों तरफ़ साम्प्रदायिक दंगे, मार काट और लूट मच गई, पाक़िस्तान से हिंदू भाग कर हिंदुस्तान आने लगे, तो यहाँ से मुसलमान अपनी जान बचाकर उधर को दौड़ पड़े। फ़िल्म इंडस्ट्री भी इस अफ़रा-तफ़री से बच नहीं पाई। नतीजा यह हुआ कि यहाँ के कई बड़े बड़े कलाकार हमेशा के लिए पाक़िस्तान चले गए, और लाहौर फ़िल्म उद्योग के कई कलाकार भारत आ गए। जानेवालों में शामिल थे नूरजहाँ, ख़ुरशीद, मास्टर ग़ुलाम हैदर, फ़िरोज़ निज़ामी, उस्ताद अमानत अली ख़ान, रोशनारा बेग़म, जी. ए. चिश्ती, वगेरह। एक तरफ़ इन कलाकारों का इस देश को छोड़ कर जाना, और दूसरी तरफ़ नई पीढ़ी के कलाकारों का आगमन, इन दोनों के एक साथ घटने से फ़िल्म संगीत ने करवट लिया और ४० के दशक के आख़िर से फ़िल्मी गीतों के स्वरूप में, गायकी में, ऒर्केस्ट्रेशन में बहुत से बदलाव आए, और ५० के दशक के आते आते फ़िल्म संगीत पर जैसे उसका यौवन आ गया।

५० के दशक की बातें तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चलती ही रहती है, आज केवल १९४७ की बातें होंगी। दोस्तों, क्यों ना १९४७ के साल को रिप्रेज़ेंट करने के लिए एक ऐसे किसी फ़िल्म के गीत को चुना जाए जो १५ अगस्त के दिन ही रिलीज़ हुई थी! जी हाँ, फ़िल्म 'शहनाई' १५ अगस्त १९४७ को बम्बई के 'नोवेल्टी थिएटर' में रिलीज़ हुई थी जब पूरा देश आज़ादी के जश्न मना रहा था। शहनाई की मंगल ध्वनियाँ इस देश की हवाओं में मिठास घोल रही थी और साथ ही शामिल था इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "हमारे अंगना आज बजे शहनाई"। पी. एल. संतोषी निर्देशित और रेहाना, नज़ीर ख़ान, इंदुमती, मुमताज़ अली, दुलारी अभिनीत यह फ़िल्म असल में एक म्युज़िकल कॊमेडी फ़िल्म थी, जो एक ट्रेरंडसेटर फ़िल्म साबित हुई। निर्देशक-गीतकार पी. एल. संतोषी और संगीतकार सी. रामचन्द्र की जोड़ी ने फ़िल्मी गीतों का एक नया ट्रेंड चालू किया इस फ़िल्म से जो बाद के कई सालों तक चलती रही। "आना मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे" गीत ख़ूब बजा, जिसे हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बहुत पहले ही सुनवा चुके हैं। इसी फ़िल्म में गायिका अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज़ में एक गीत था जिसने भी शोहरत की बुलंदियों को छुआ। आज इसी गीत को हम यहाँ बजा रहे हैं और गीत है "मार कटारी मर जाना, ये अखियाँ किसी से मिलाना ना"। अमीरबाई के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीतों में इस गीत का शुमार होता है। मशहूर अदाकारा गौहर कर्नाटकी की बहन अमीरबाई 'कन्नड़ कोकिला' के नाम से जानी जाती थीं। १९ फ़रवरी १९१९ को कर्नाटक के बीजापुर ज़िले के बिल्गी गाँव में एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मीं अमीरबाई ने माध्यमिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और १५ वर्ष की आयु में ही बम्बई आ गईं। उनकी किसी क़व्वाली से प्रभावित होकर एच. एम. वी ने उस क़व्वाली का ग्रामोफ़ोन रिकार्ड निकाला। गौहर की मदद से उन्हे ओरिएंटल टॊकीज़ की फ़िल्म 'विष्णु भक्ति' में काम करने का मौका मिला सन् १९३४ में। उसके बाद अनिल बिस्वास ने उन्हे नोटिस किया और ईस्टर्ण आर्ट्स व दर्यानी प्रोडक्शन्स की फ़िल्मों में मौके दिलवाए। १९३७ के आते आते अमीरबाई ने कई फ़िल्मों में अभिनय व गायन कर ली, जिनमें शामिल थे 'भारत की बेटी', 'यासमीन', 'फ़िदा-ए-वतन', 'प्रतिमा', 'प्रेम बंधन', 'दुखियारी', 'जेन्टलमैन डाकू', और 'ईंसाफ़'। इन सभी फ़िल्मों में अनिल दा का ही संगीत था। आगे की दास्तान हम फिर किसी दिन बताएँगे, आइए अब आज का गीत सुना जाए जिसमे अखियाँ ना मिलाने की सलाह दे रही हैं अमीरबाई कर्नाटकी।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

बिक गए बिन मोल ही,
चले सब बीते दिन बिसार,
कोई जादू था जीवन,
जिसके सम्मोहन में, बीत गए जन्म हज़ार...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. एक कमचर्चित गायिका ने इस गीत में रफ़ी साहब का साथ दिया था, उनका नाम ?- सही जवाब को मिलेंगें 3 अंक.
3. ये फिल्म का शीर्षक गीत है, फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
4. इस गीत के गीतकार कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
मनु जी, बहुत दिनों बाद आपकी आमद हुई, बेहद अच्छा लगा
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ