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Tuesday, February 8, 2011

पिया न रहे मन-बसिया..रंगरेज से दर्द-ए-दिल बयां कर रहे हैं "तनु वेड्स मनु" के संगीतकार कृष्णा ,गीतकार राजशेखर

Taaza Sur Taal (TST) - 05/2011 - TANU WEDS MANU

"तनु वेड्स मनु".. यह नाम सुनकर आपके मन में कोई भी उत्सुकता उतरती नहीं होगी, इसका मुझे पक्का यकीन है। मेरा भी यही हाल था। एक बेनाम-सी फिल्म, अजीबो-गरीब नाम और अजीबो-गरीब जोड़ी मुख्य-पात्रों की। "माधवन" और "कंगना".. मैं अपने सपने में भी इस जोड़ी की कल्पना नहीं कर सकता था..। लेकिन एक दिन अचानक इस फिल्म की कुछ झलकियाँ यू-ट्युब पर देखने को मिलीं. हल्की-सी उत्सुकता जागी और जैसे-जैसे दृश्य बढते गए, मैं इस "बेढब"-सी अजबनी दुनिया से जुड़ता चला गया। झलकियाँ का ओझल होना था और मैं यह जान चुका था कि यह फिल्म बिन देखे हीं नकार देने लायक नहीं है। कुछ तो अलग है इसमें और इन्हीं दृश्यों के बीच जब "कदी साडी गली पुल (भुल) के भी आया करो" के बीट्स ढोलक पर कूदने लगे तो जैसे मेरे कानों ने पायल बाँध लिये और ये दो नटखट उचकने लगे अपनी-अपनी जगहों पर। फिर तो मुझे समझ आ चुका था कि ऐंड़ी पर खड़े होकर मुझे इस फिल्म के गानों की बाट जोहनी होगी। फिर भी मन में एक संशय तो ज़रूर था कि "कदी साडी गली".. ये गाना तो पुराना है और जब एक पुराने गाने के सहारे फिल्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है तो मुमकिन है कि "ओरिजनल गानों" में कोई दम न हो। लेकिन मैं दुआ कर रहा था कि मेरा शक़ गलत निकले और मेरी दुआ बहुत हद तक कामयाब हुई, इसकी मुझे बेहद खुशी है।

लेम्बर हुसैनपुरी के गाए "कदी साडी गली" में अजब का नशा है। ढोल के बजते हीं पाँव खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। फिल्म में आने से पहले यह गाना जिस मुकाम पर था, आर०डी०बी० ने रीमिक्स करके उस मुकाम को कुछ और ऊपर कर दिया है। पंजाबी भांगड़ों की तो वैसे हीं धूम और धुन गजब की होती है, लेकिन कई मर्तबा एक तरह के हीं बीट्स इस्तेमाल होने के कारण मज़ा जाता रहता है। अच्छी बात यह है कि इस गाने में नयापन है। बस यही उम्मीद करता हूँ कि यह गाना फिल्म के कथानक को आगे बढाने में मदद करेगा और ठूंसा हुआ-सा नहीं दिखेगा।

फिल्म का पहला गाना हीं आर०डी०बी० का? लेकिन आर०डी०बी० तो बस एक हिप-हॉप या डांस-मस्ती गाने के लिए फिल्म में लाए जाते हैं यानि कि हर फिल्म में इनका बस एक हीं गाना होता है। "तब तो कोई न कोई दूसरा संगीतकार हीं इस फिल्म की नैया को अपने गानों के पतवार और चप्पु के सहारे पार लगाएगा और अगर गाने अच्छे करने हैं तो निर्देशक(आनंद एल राय) कोई जाने-माने संगीतकार को हीं यह बागडोर सौपेंगे ताकि बुरे गानों के कारण फिल्म की लुटिया न डूब जाए..." यही सोच रहे हैं ना आप? अमूमन हर किसी की यही सोच होती है। कोई भी नए संगीतकारों पर एकबारगी भरोसा नहीं कर पाता.. और अगर कोई फिल्म किसी निर्देशक की पहली फिल्म हो तब तो हर एक सुलझे इंसान की यही सलाह होती है कि भाई फिल्म में लगा पैसा निकालना हो तो रिस्क मत लो, सेफ़ खेलो और किसी नामी संगीतकार से गाने तैयार करवा लो ताकि फिल्म भले पिट जाए लेकिन गाने हिट हो जाएँ।

यहीं पर आपसे चूक हो गई। हाँ, लेकिन आनंद साहब ने कोई चूक नहीं की। इन्होंने न सिर्फ़ खुद कुछ नया करने का बीड़ा उठाया, बल्कि अपने साथ-साथ गीत और संगीत में भी नए मोहरे सजाकर पूरी की पूरी बाजी हीं रोमांचक कर दी। नया गीतकार, नया संगीतकार.. चलेंगे तो सब साथ, ढलेंगे तो सब साथ, लेकिन इस बात की तो खुशी होगी कि "फिल्म इंडस्ट्री" के दबाव के आगे झुकना नहीं पड़ा, जो दिल में आया वही किया। तो आईये हम सब स्वागत करते हैं संगीतकार "कृष्णा" (Krsna) एवं गीतकार "राजशेखर" का।

ये कृष्णा कौन हैं, ये राजशेखर पहले किधर थे, इन प्रश्नों का जवाब तो हम ढूँढ नहीं पाये, लेकिन इतना यकीन है कि इन दोनों की यह पहली हिन्दी-फिल्म है। और पहली हीं फिल्म में दोनों ने अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश की है।

चलिए तो इस जोड़ी के पहले गीत की बात करते हैं। "ओ रंगरेज मेरे"... इस गीत के बोल बड़े हीं खूबसूरत है। उर्दू और देसी शब्दों के इस्तेमाल से राजशेखर ने एक सूफ़ियाना माहौल तैयार किया है।

रंगरेज तूने अफ़ीम क्या है खा ली,
जो मुझसे तू है पूछे कि कौन-सा रंग?
रंगों का कारोबार है तेरा,
ये तू हीं तो जाने कि कौन-सा रंग?
मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग,
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग,
मेरा फ़ागुन रंग, मेरा सावन रंग..

हद रंग दे, अनहद भी रंग दे,
मंदिर, मस्जिद, मयकद रंग..

आजा हर वसलत रंग दे,
जो आ न सके तो फ़ुरक़त रंग दे..

ऐ रंगरेज मेरे...
ये कौन-से पानी में तूने कौन-सा रंग घोला है?


"मेरे आठों पहर मनभावन रंग दे"- रंगरेज से ब़ड़ी हीं मीठी गुहार लगाई है हमारे आशिक़ ने। अब यहाँ पर रंगरेज खुदा है या फिर इश्क़ के पैरहन रंगने वाली प्रेमिका.. इसका खुलासा तो दिल की दराज़ें खोलकर हीं किया जा सकता है, लेकिन जो भी हो सबसे बड़ा रंगरेज तो खुदा हीं है और खुदा से इस तरह जुड़ने को हीं "निर्गुण" कहते हैं (हिन्दी फिल्मों में निर्गुण का सबसे बड़ा उदाहरण "लागा चुनरी में दाग" है)। जब आशिक़ यह कहता है कि "मेरा क़ातिल तू, मेरा मुंसिफ़ तू" तो चचा ग़ालिब का यह शेर याद आ जाता है:

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क, जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफ़िर पर दम निकले!


इस रंगरेज के पास "कृष्णा" दो बार गए हैं एक बार अपनी हीं आवाज़ के साथ तो दूसरी बार "वडाली बंधुओं" की मंडली के साथ। यूँ तो वडाली बंधुओं (पुरनचंद वडाली एवं प्यारेलाल वडाली) पर खुदा की मेहर है (इसलिए इनकी आवाज़ों से सजी हुई हरेक नज़्म दिल को सुकून पहुँचाती है और यहाँ भी इन दोनों ने वही समां बाँधा है), लेकिन इस बार कृष्णा पर भी उस ऊपर वाले ने अपनी रहमत तारी कर दी है। दोनों हीं गाने अपनी जगह पर कमाल के बने हैं। धुन एक हीं है, इसलिए ज्यादा कुछ फ़र्क की उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन जहाँ पर वडाली बंधु हों, वहाँ नयापन खुद-ब-खुद आ जाता है, इसलिए कृष्णा को यही कोशिश करनी थी कि वे पूरी तरह से कमजोर न पड़ जाएँ... ऐसा नहीं हुआ, यह सबके लिए अच्छी खबर है!

मोहित चौहान! यह नाम लिख देने/सुन लेने के बाद मन में किसी पहाड़ी वादी की परछाईयाँ उभर आती है और दिखने लगता है एक शख्स जो हाथ में गिटार और आँख में प्रेयसी के ख्वाब लिए पत्तों और गुंचों के बीच से चला जा जा रहा है। पहाड़ों का ठेठ अंदाज़ उसकी आवाज़ में खुलकर नज़र आता है और यही कारण है कि हर संगीतकार मोहित चौहान से "प्यार के दो मीठे बोल" गुनगुनाने की दरख्वास्त कर बैठता है। "कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े" (यूँ हीं).. बोल बड़े हीं सीधे और साधारण हैं, लेकिन मोहित की आवाज़ ने इस गाने में जान डाल दी है।

"पिया न रहे मन बसिया" - रूप कुमार राठौड़ साहब को मैने पहले हज़ारों बार सुना है, लेकिन आज तक इनकी आवाज़ इस तरह की पहले कभी नहीं लगी थी, जैसी कि इस गाने में है। इनकी आवाज़ यहाँ पहचान में हीं नहीं आती। मैंने तो कई जगहों पर "शफ़कत अमानत अली" का नाम लिखा पाया था (और मैं मान भी बैठा था) , लेकिन आठ-दस विश्वस्त सूत्रों और ब्लॉगों के चक्कर लगाने के बाद मुझे यकीन करना पड़ा कि ये अपने रूप साहब हीं हैं। अपनी नई आवाज़ में वही पुराना जादू बिखेरने में ये यहाँ भी कामयाब हुए हैं। ज़रा इस गाने के बोलो पर गौर करें:

पल न कटे अब सखी रे पिया बिन,
नीम-सा कड़वा लागे दिन,
हाय! नीम-सा कड़वा लागे अब दिन,
उस पे ये चंदा हाय.. चंदा भी बना सखी सौतन कि
चंदा भी बना हाय.. सखी सौतन कि
कीसो रात मोरी अमावसिया...
मन बसंत को पतझड़ कर वो
ले गयो, ले गयो, ले गयो... रंग-रसिया


पहले फिल्म के लिहाज से राजशेखर ने बेहतरीन पंक्तियाँ गढी हैं। जहाँ इस गाने में "मन-बसिया" और "रंग-रसिया" की बात हो रही है, वहीं अगले गाने "मन्नु भैया" में "करोलबाग की गलियों", "केसर", "यमुना" और "शर्मा जी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके इन्होंने गाने में चार-चाँद लगा दिए हैं। नाम से हीं ज़ाहिर है कि "मन्नु भैया" की टाँग खींची जा रही है और इस खेल में सबसे आगे हैं "सुनिधि चौहान" और उनका तबले और ढोलक (मज़ाक वाले) पर संगत दे रहे हैं नीलाद्री देबनाथ, उज्जैनी मुखर्जी, राखी चाँद और विवेक नायक

अंबिया, इलायची, दालचीनी और केसर,
सुखाएगी तन्नु करोलबाग की छत पर,
तब मन्नु भैया का करिहैं..

जब दिल्ली के मिक्सर में घुट जावे कानपुर की भंग,
जब दिल्ली के ऊपर चढ जावे कानपुर का रंग,
जब क़ुतुब से भी ऊपर जावे, कानपुर की पतंग,
तब मन्नु भैया का करिहैं..


मुझे तो यह गाना बेहद पसंद आया। इस गाने में जहाँ एक तरफ़ मस्ती है, मज़ाक है, वहीं दूसरी तरफ़ शब्दों और ध्वनियों की अच्छी धमाचौकड़ी भी है। ऐसे गाने अमूमन "पुरूष-स्वर" (मेल-व्याएस) में तैयार किए जाते है, लेकिन यहाँ कृष्णा की दाद देनी होगी जो इन्होंने सुनिधि को ये गाना सौंपा और वाह! सुनिधि ने दिल खुश कर दित्ता यार ;)

फिल्म का अंतिम गाना है मिका की आवाज़ में "जुगनी"। यह गाना दूसरे "जुगनी" गानों की तरह हीं है, इसलिए कुछ अलग-सा नहीं लगा मुझे। हाँ, मिका पा जी की मेहनत झलकती है और इसमें दो राय नहीं है कि इस गाने के लिए इनसे अच्छा कोई दूसरा गायक नहीं हो सकता था, लेकिन संगीत (संगीतकार) ने इनका साथ नहीं दिया। "बीट्स" प्रेडिक्टेबल हैं.. इसलिए मज़ा रह-रहकर किरकिरा हो जाता है। मुझे किसी भी दिन (any day) "ओए लकी लकी ओए" का "जुगनी" इस "जुगनी" से ज्यादा पसंद आएगा। क्या करें! स्वाद-स्वाद की बात है :)

तो इस तरह से "तनु वेड्स मनु" के संगीत ने गुमनाम से नामचीन का सफ़र आखिरकार तय कर हीं लिया (है)।

आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7/10

सुनने लायक गीत - रंगरेज, पिया न रहे, मन्नु भैया, साडी गली

एक और बात: इस फिल्म के सारे गाने(प्रिव्यु मात्र) आप कृष्णा के ओफ़िसियल वेबसाईट पर सुन सकते हैं यहाँ:
http://krsnamusic.com/news/tanu-weds-manu-piya-sung-by-roop-kumar-rathod-or-shafqat-amanat-ali/




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, December 14, 2010

मिर्च, ब्रेक के बाद, तेरा क्या होगा जॉनी, नो प्रोब्लम और इसी लाईफ़ में के गानों के साथ हाज़िर है इस साल की आखिरी समीक्षा

हम हरबार किसी एक या किन्ही दो फिल्मों के गानों की समीक्षा करते थे और इस कारण से कई सारी फिल्में हमसे छूटती चली गईं। अब चूँकि अगले मंगलवार से हम दो हफ़्तों के लिए अपने "ताजा सुर ताल" का रंग कुछ अलग-सा रखने वाले हैं, इसलिए आज हीं हमें बची हुई फिल्मों को निपटाना होगा। हमने निर्णय लिया है कि हम चार-फिल्मों के चुनिंदा एक या दो गाने आपको सुनवाएँगे और उस फिल्म के गाने मिला-जुलाकर कैसे बन पड़े हैं (और किन लोगों ने बनाया है), वह आपको बताएँगे। तो चलिए इस बदले हुए हुलिये में आज की समीक्षा की शुरूआत करते हैं।

आज की पहली फिल्म है "ब्रेक के बाद"। इस फिल्म में संगीत दिया है विशाल-शेखर ने और बोल लिखे हैं प्रसून जोशी ने। बहुत दिनों के बाद प्रसून जोशी की वापसी हुई है हिन्दी फिल्मों में... और मैं यही कहूँगा कि अपने बोल से वे इस बार भी निराश नहीं करते। अलग तरह के शब्द लिखने में इनकी महारत है और कुछ गानों में इसकी झलक भी नज़र आती है, हाँ लेकिन वह कमाल जो उन्होंने "लंदन ड्रीम्स" में किया था, उसकी थोड़ी कमी दिखी। बस एक गाना "धूप के मकान-सा" में उनका सिक्का पूरी तरह से जमा है। वैसे गाने में संगीत और गायकी की भी उतनी हीं ज़रूरत होती है और यह तो सभी जानते हैं कि विशाल-शेखर किस तरह का संगीत रचते हैं। यहाँ भी उनकी वही छाप नज़र आती है। जो उनका संगीत पसंद करते हैं (जैसे कि मैं करता हूँ), उन्हें इस फिल्म के गाने भी पसंद आएँगे, ऐसा मेरा यकीन है। चलिए तो आपको इस फिल्म से दो गाने सुनवाते हैं। पहला गाना है एलिस्सा मेन्डोंसा (शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी में से लॉय की सुपुत्री) एवं विशाल दादलानी की आवाज़ों में "अधूरे" , वहीं दूसरा गाना है नीरज श्रीधर, विशाल, शेखर एवं रिस डिसूजा की आवाज़ों में "अजब लहर"।

अधूरे


अजब लहर


"ब्रेक के बाद" के बाद आईये सुनते हैं फिल्म "तेरा क्या होगा जॉनी" के गानों को। यह फिल्म आने के पहले हीं सूर्खियों में आ चुकी है.. क्योंकि यह कई महिने पहले हीं "लीक" हो गई थी.. कईयों ने इसे "पाईरेटेड सीडीज" पर देख भी लिया है (मैंने नहीं :) )। फिल्म के नाम और इसके मुख्य कलाकार (नील नीतिन मुकेश) को देखा जाए तो यह "जॉनी गद्दार" का सिक़्वेल लगती है, लेकिन चूँकि इन दोनों के निर्देशक अलग-अलग हैं (जॊनी गद्दार: श्रीराम राघवन, तेरा क्या होगा जॉनी: सुधीर मिश्रा) तो यह माना जा सकता है कि दोनों की कहानियों में कोई समानता नहीं होगी। इस फिल्म में संगीत है पंकज अवस्थी एवं अली अज़मत का और बोल लिखे हैं नीलेश मिश्रा ,जुनैद वसी, अली अज़मत , सुरेंद्र चतुर्वेदी, सबीर ज़ाफ़र एवं संदीप नाथ ने। अभी हम आपको जो दो गाने सुनाने जा रहे हैं, उनमें पंकज अवस्थी की "लीक से हटकर" आवाज़ है, जो गीतकारों की कविताओं में चार चाँद लगा देती है। पहला गाना है "सुरेंद्र चतुर्वेदी" का लिखा "शब को रोज़" एवं दूसरा है "नीलेश मिश्रा" का लिखा "लहरों ने कहा"। ये रहे वो दो गाने:

शब को रोज़


लहरों ने कहा


अगली फिल्म है "विनय शुक्ला" की "मिर्च"। विनय अपनी फिल्म "गॉडमदर" के कारण प्रख्यात हैं। अपनी इस नई फिल्म में विनय ने "लिंग-समानता" (जेंडर-इक़्विलटी) एवं "वुमन सेक्सुवलिटी" को केंद्र में रखा है। उनका कहना है कि उन्हें यह फिल्म बनाने की प्रेरणा पंचतंत्र की कुछ कहानियों को पढने के बाद मिली। इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं "कोंकणा सेन शर्मा, राईमा सेन, सहाना गोस्वामी, इला अरूण, श्रेयस तालपड़े एवं बोमन ईरानी"। जहाँ तक संगीत की बात है तो कई सालों बाद मोंटी शर्मा बॉलीवुड की मुख्य धारा में लौटे हैं। अपनी वापसी में वे कितने सफ़ल हुए हैं, यह तो आप गाने सुनकर हीं कह सकते हैं। फिल्म में गाने लिखे हैं जावेद अख्तर साहब ने। इस फिल्म का एक गाना तो ट्रेलर आते हीं मक़बूल हो चुका है। चलिए, हम आपको पहले वही गाना सुनाते हैं (कारे कारे बदरा), जिसमें आवाज़ है शंकर महादेवन की। दूसरा गाना जो हम आपको सुनवाने वाले हैं, उसे स्वर दिया है ईला अरूण, पंडित गिरीश चट्टोपाध्याय एवं चारू सेमवाल ने। जिस तरह यह फिल्म बाकी फिल्मों से कुछ हटकर है, वही बात इसके गानों के बारे में भी कही जा सकती है। आप खुद सुने:

कारे कारे बदरा


मोरा सैंयां


आज की अंतिम दो फिल्में हैं राजश्री प्रोडक्शन्स की "इसी लाईफ़ में" एवं "अनिल कपूर प्रोडक्शन्स" कि "नो प्रोब्लम"। पहले का निर्देशन किया है विधि कासलीवाल ने तो दूसरे का अनीस बज़्मी ने। फिल्म कितनी मज़ेदार है या कितनी होगी, यह तो फिल्म देखने पर हीं जाना जा सकता है, लेकिन जहाँ तक गानों की बात है तो मुझे इन दोनों के गानों में कोई खासा दम नहीं दिखा। "मीत ब्रदर्स " एवं "अंजान अंकित" "इसी लाईफ़ के" के कुछ गानों में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए हैं, लेकिन यह बात "नो प्रोब्लम" के "प्रीतम", "साजिद-वाजिद" या "आनंद राज आनंद" के लिए नहीं की जा सकती। चलिए तो हम सुनते हैं "मनोज मुंतसिर" का लिखा मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "इसी उमर में"



और "नो प्रोब्लम" से प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध मास्टर सलीम, कल्पना एवं हार्ड कौर की आवाज़ों में कुमार का लिखा "शकीरा":



आज हमने कुछ अच्छे, कुछ ठीक-ठाक गाने सुने। आपको कौन-कौन-से गाने पसंद आए, ज़रूर लिखकर बताईयेगा। और हाँ, "ताजा सुर ताल" की अगली दो कड़ियों का ज़रूर इंतज़ार करें, आपके लिए कुछ खास हम संजोकर लाने वाले हैं। इसी वायदे के साथ अलविदा कहने का वक़्त आ गया है। धन्यवाद!

Tuesday, October 5, 2010

"क्रूक" में कुमार के साथ तो "आक्रोश" में इरशाद कामिल के साथ मेलोडी किंग प्रीतम की जोड़ी के क्या कहने!!

ताज़ा सुर ताल ३८/२०१०


सुजॊय - दोस्तों, नमस्कार, स्वागत है आप सभी का इस हफ़्ते के 'ताज़ा सुर ताल' में। विश्व दीपक जी, इस बार के लिए मैंने दो फ़िल्में चुनी हैं, और ये फ़िल्में हैं 'क्रूक' और 'आक्रोश'।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्या कोई कारण है इन दोनों को इकट्ठे चुनने के पीछे?

सुजॊय - जी हाँ, मैं बस उसी पे आ रहा था। एक नहीं बल्कि दो दो समानताएँ हैं इन दोनों फ़िल्मों में। एक तो यह कि दोनों के संगीतकार हैं प्रीतम। और उससे भी बड़ी समानता यह है कि इन दोनों की कहानी दो ज्वलंत सामयिक विषयों पर केन्द्रित है। जहाँ एक तरफ़ 'क्रूक' की कहानी आधारित है हाल में ऒस्ट्रेलिया में हुए भारतीयों पर हमले पर, वहीं दूसरी तरफ़ 'आक्रोश' केन्द्रित है हरियाणा में आये दिन हो रहे ऒनर किलिंग्स की घटनाओं पर।

विश्व दीपक - वाक़ई ये दो आज के दौर की दो गम्भीर समस्यायें हैं। तो शुरु किया जाए 'क्रूक' के साथ। मुकेश भट्ट निर्मित और मोहित सूरी निर्देशित 'क्रूक' के मुख्य कलाकार हैं इमरान हाश्मी, अर्जुन बजवा और नेहा शर्मा। प्रीतम का संगीत और कुमार के गीत। पहला गीत सुनते हैं "छल्ला इण्डिया तों आया"। पूरी तरह से पंजाबी फ़्लेवर का गाना है जिसे गाया है बब्बु मान और सुज़ेन डी'मेलो ने। पंजाबी भंगड़ा के साथ वेस्टर्ण फ़्युज़न में प्रीतम को महारथ हासिल है। "मौजा ही मौजा", "नगाड़ा", "दिल बोले हड़िप्पा" के बाद अब "छल्ला"।

सुजॊय - तो आइए इस थिरकन भरे गीत से आज के इस प्रस्तुति की शुरुआत की जाये।

गीत - छल्ला


सुजॊय - 'क्रूक' का दूसरा गीत है "मेरे बिना" जिसे गाया है निखिल डी'सूज़ा ने। अब तक निखिल की आवाज़ कई गायकों वाले गीतों में ही ली गयी थी जिसकी वजह से उनकी आवाज़ को अलग से पहचानने का मौका अब तक हमें नहीं मिल सका था। लेकिन इस गीत में केवल उन्ही की आवाज़ है। जिस तरह से जावेद अली और कार्तिक आजकल कामयाबी के पायदान चढ़ते जा रहे हैं, लगता है निखिल के भी अच्छे दिन उन्हें बाहें पसार कर बुला रहे हैं।

विश्व दीपक - गीत की बात करें तो इस गीत में रॊक इन्फ़्लुएन्स है और एक सॊफ़्ट रोमांटिक नंबर है यह। शुरु शुरु में इस गीत को सुनते हुए कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती, लेकिन गीत के ख़तम होते होते थोड़ी सी हमदर्दी होने लगती है इस गीत के साथ। निखिल ने अच्छा गाया है और क्योंकि उनका यह पहला एकल गाना है, तो उन्हें हमें मुबारक़बाद देनी ही चाहिए। वेल डन निखिल!

सुजॊय - वैसे निखिल ने हाल ही में 'अंजाना अंजानी' का शीर्षक गीत भी गाया है। 'उड़ान' और 'आयेशा' में भी गीत गाये हैं। लेकिन यह उनका पहला सोलो ट्रैक है। आइए अब सुनते हैं इस गीत को।

गीत - मेरे बिना


विश्व दीपक - 'क्रूक' भट्ट कैम्प की फ़िल्म है और नायक हैं इमरान हाश्मी। तो ज़ाहिर है कि इसके गानें उसी स्टाइल के होंगे। वही यूथ अपील वाले इमरान टाइप के गानें। पिछले कुछ फ़िल्मों में इमरान ने ऒनस्क्रीन किस करना बंद कर दिया था और वो फ़िल्में कुछ ख़ास नहीं चली (वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई को छोड़कर) शायद इसलिए वो इस बार 'क्रूक' में अपने उसी सिरियल किसर वाले अवतार में नज़र आयेंगे। ख़ैर, अगले गीत की बात की जाये। इस बार के.के की आवाज़। इमरान हाश्मी के फ़िल्मों में एक गीत के.के की आवाज़ में ज़रूर होता है क्योंकि के.के की आवाज़ में इमरान टाइप के गानें ख़ूब जँचते हैं।

सुजॊय - यह गीत है "तुझी में"। यह भी रॊक शैली में कम्पोज़ किया गाना है, लेकिन निखिल के मुक़ाबले के.के की दमदार आवाज़ को ध्यान में रखते हुए हार्डकोर रॊक का इस्तेमाल किया गया है। ड्रम्स और पियानो का ख़ूबसूरत संगम सुनने को मिलता है इस गीत में। लेकिन जो मुख्य साज़ है वह है १२ स्ट्रिंग वाला गिटार जो पूरे गीत में प्रधानता रखता है।

विश्व दीपक - यह सच है कि इस तरह के गानें प्रीतम पहले भी बना चुके हैं, लेकिन शायद अब तक हम इस अंदाज़ से उबे नहीं हैं, इसलिए अब भी इस तरह के गानें अच्छे लगते हैं। आइए सुनते हैं।

गीत - तुझी में


सुजॊय - और अब एक और गीत 'क्रूक' का हम सुनेंगे, फिर 'आक्रोश' की तरफ़ बढ़ेंगे। यह गीत है मोहित चौहान की आवाज़ में, "तुझको जो पाया"। इस गीत में अकोस्टिक गीटार मुख्य साज़ है, कोई रीदम नहीं है गाने में। मोहित चौहान की दिलकश आवाज़ से गीत में जान आयी है। दरसल यह गीत निखिल के गाये "मेरे बिना" गीत का ही एक दूसरा वर्ज़न है।

विश्व दीपक - इन दोनों की अगर तुलना करें तो मोहित चौहान की आवाज़ में जो गीत है वह ज़्यादा अच्छा सुनाई दे रहा है। मोहित चौहान का ताल्लुख़ हिमाचल की पहाड़ियों से है। और अजीब बात है कि उनकी आवाज़ में भी जैसे पहाड़ों जैसी शांति है, सुकून है। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल वाले गीतों में मोहित की शुद्ध आवाज़ को सुन कर वाक़ई दिल को सुकून मिलता है। इस पीढ़ी के पार्श्व गायकों का प्रतिनिधित्व करने वालों में मोहित चौहान का नाम एक आवश्यक नाम है। लीजिए सुनिए इस गीत को।

गीत - तुझको जो पाया


सुजॊय - आइए अब बढ़ा जाये 'आक्रोश' की ओर। क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी हरियाणा के ऒनर किलिंग्स पर है (लेकिन मेरे हिसाब से फिल्म यूपी, बिहार के किसी गाँव को ध्यान में रखकर फिल्माई गई है), शायद इसलिए इसका संगीत भी उसी अंदाज़ का है। प्रीतम के स्वरबद्ध इन गीतों को लिखा है इरशाद कामिल ने। अजय देवगन, अक्षय खन्ना और बिपाशा बासु अभिनीत इस फ़िल्म का एक आइटम नंबर आजकल टीवी चैनलों में ख़ूब सुनाई व दिखाई दे रहा है - "तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं"।

विश्व दीपक - "मुन्नी बदनाम" के बाद अब "इसक से मीठा"। और इस बार ठुमके लगा रही हैं समीरा रेड्डी। लेकिन हाल के आइटम नंबर की बात करें तो अब भी गुलज़ार साहब के "बीड़ी जल‍इ ले" से मीठा कुछ भी नहीं। ख़ैर, आइए हम ख़ुद ही सुन कर यह निर्णय लें, इस गीत को गाया है कल्पना पटोवारी और अजय झिंग्रन ने। कल्पना यूँ तो असम से संबंध रखती है, लेकिन इन्हें प्रसिद्धि मिली भोजपुरी गानों से। "जा तार परदेश बलमुआ" और "ए गो नेमुआ" जैसे सुपरहिट भोजपुरी गानों को गाने वाली यह गायिका हाल में हीं सिंगिंग के एक रियालटी शो में असम का प्रतिनिधित्व करती नज़र आईं थी। जहाँ तक इस गाने की बात है तो यह पूर्णत: एक कमर्शियल आइटम नंबर है और फ़िल्म की कहानी के लिए इसकी ज़रूरत थी भी। तो आइए इस गीत को सुन ही लिया जाये।

गीत - तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं


सुजॊय - अगला गीत ज़रा हट कर है। प्रीतम ने एक इंटरव्यु में कहा है कि उन्हें वो गानें कम्पोज़ करने में ज़्यादा अच्छे लगते है जिनमें मेलडी होता है। तो साहब इस बार उन्हें मेलडियस कम्पोज़िशन का मौका मिल ही गया। इस गीत में, जिसका शीर्षक है "सौदे बाज़ी", नवोदित गायक अनुपम आमोद ने अपनी आवाज़ दी है। प्रीतम की नये नये गायकों की खोज जारी है और इस बार वे अनुपम को ढूंढ़ लाये हैं। लगता है यह गीत अनुपम को दूर तक लेके जाएगा।

विश्व दीपक - वैसे इसी गीत का एक और वर्ज़न है जिसे जावेद अली से गवाया गया है। लेकिन आज हम अनुपम का स्वागत करते हुए उन्ही का गाया गीत सुनेंगे। पता नहीं इस गीत की धुन को सुनते हुए ऐसा लग रहा है कि जैसे इसी तरह की धुन का कोई और गाना पहले बन चुका है। शायद बाद में याद आ जाए!

सुजॊय - इस गीत की ख़ासियत है इसकी सादगी। भारतीय साज़ों की ध्वनियाँ सुनने को मिलती हैं भले ही सिन्थेसाइज़र पर तय्यार किया गया हो। सुनते हैं अनुपम आमोद की आवाज़।

गीत - सौदे बाज़ी


विश्व दीपक - आज के दौर के एक और गायक जो सूफ़ी गीतों में ख़ूब अपना नाम कमा रहे हैं, वो हैं अपने राहत फ़तेह अली ख़ान साहब। कैलाश खेर ने जो मुक़ाम हासिल किया था, आज वही मुकाम राहत साहब का है। इस फ़िल्म में भी उनका उन्ही के टाइप का एक गाना है "मन की मत पे मत चलियो ये जीते जी मरवा देगा"।

सुजॊय - सचमुच आज हर फ़िल्म में राहत साहब का एक गीत जैसे अनिवार्य हो गया है। क्योंकि आजकल वो 'छोटे उस्ताद' में नज़र आ रहे हैं, मैंने एक बात उनकी नोटिस की है कि वो बहुत ही विनम्र स्वभाव के हैं और बहुत ज़्यादा इमोशनल भी हैं। बात बात पे उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। और बार बार वो लेजेन्डरी गायकों का ज़िक्र करते रहते हैं। इतनी सफलता के बावजूद उनके अंदर जो विनम्रता है, वो साफ़ झलकती है।

विश्व दीपक - "मन की मत पे मत चलियो", इरशाद कामिल ने यमक अलंकार का क्या ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है "मत" शब्द में। दो जगह "मत" आता है लेकिन अलग अलग अर्थ के साथ।

सुजॊय - ठीक वैसे ही जैसे रवीन्द्र जैन ने लिखा था "सजना है मुझे सजना के लिए" और "जल जो ना होता तो जग जाता जल"। तो आइए सुनते हैं राहत साहब की आवाज़ में "मन की मत"।

गीत - मन की मत पे मत


विश्व दीपक - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत एक भक्ति रचना सुखविंदर सिंह की आवाज़ में "राम कथा", जिसमें रामायण के उस अध्याय का ज़िक्र है जिसमें भगवान राम ने रावण का वध कर सीता को मुक्त करवाया था। एक पौराणिक कथा के रूप में ही इस गीत में उसकी व्याख्या की गई है।

सुजॊय - देखना है कि फ़िल्म में इसका फ़िल्मांकन कैसे किया गया है। तब कहेंगे कि क्या "पल पल है भारी विपदा है आयी" के साथ इसका कोई टक्कर है या नहीं! आइए सुन लेते हैं यह गीत।

गीत - राम कथा


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसे लगे इन दोनों फ़िल्मों के गानें? हमने दोनों फ़िल्मों के चार चार गानें आपको सुनवाये और एक एक गानें छोड़ दिये हैं, लेकिन आपको यकीन दि्ला दें कि उससे आप किसी अच्छे गीत से वंचित नहीं हुए हैं। अगर आप मेरी पसंद की बात करें तो 'क्रूक' का "तुझको जो पाया" (मोहित चौहान) और 'आक्रोश' का "मन की मत पे मत जाना" (राहत फ़तेह अली ख़ान) मुझे सब से ज़्यादा पसंद आये। बाक़ी गानें सो-सो लगे। रेटिंग की बात है तो मेरी तरफ़ से दोनों ऐल्बमों को ३ - ३ अंक।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैं आपकी टिप्पणियों को सर-आँखों पर रखते हुए मैं आपके द्वारा दिए गए रेटिग्स को बरकरार रखता हूँ। जहाँ तक प्रीतम के संगीत की बात है तो वो हर बार हर फिल्म में ऐसे कुछ गाने जरूर देते हैं, जिन्हें श्रोताओं
का भरपूर प्यार नसीब होता है। दोनों फिल्मों में ऐसे एक्-दो गाने जरूर हैं। संगीत और इन्स्ट्रुमेन्ट्स के बारे में आपने तो लगभग सब कुछ हीं कह दिया है, इसलिए मैं थोड़ा "बोलों" का जिक्र करूँगा। "कुमार" और "इरशाद कामिल" दोनों हीं अलग तरह के गाने लिखने के लिए जाने जाते हैं। फिर भी अगर मुझसे पूछा जाए कि किसके गाने "अन-कन्वेशनल" होते हैं और दिल को ज्यादा छूते हैं तो मैं इरशाद भाई का नाम लूँगा। इरशाद भाई ने जहाँ एक तरफ "तू जाने ना" लिखकर एकतरफा प्यार करने वालों को एक एंथम दिया है, वहीं "न शहद, न शीरा, न शक्कर" लिखकर "नौटंकी" वाले गानों को कुछ नए शब्द मुहैया कराए हैं। मैं उनके शब्द-सामर्थ्य और शब्द-चयन का कायल हूँ। आने वाली फिल्मों में भी मैं उनसे ऐसे हीं नए शब्दों और बोलों की उम्मीद रखता हूँ। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। उससे पहले सभी श्रोताओं के लिए एक सवाल/एक आग्रह/एक अपील: मैं चाहता हूँ कि हम समीक्षा में रेटिंग न दें, बल्कि बस इतना हीं लिख दिया करें कि कौन-सा गाना बहुत अच्छा है और कौन-सा थोड़ा कम। मैंने यह बात सुजॉय जी से भी कही है और उनके जवाब का इंतज़ार कर रहा हूँ। उनके जवाब के साथ-साथ मैं आप सबों की राय भी जानना चाहूँगा।

आवाज़ रेटिंग्स: क्रूक: ***, आक्रोश: ***

पाठको की रूचि में कमी होती देख आज से सवालों का सिलसिला(ट्रिविया) समाप्त किया जाता है.. सीमा जी, हमें मुआफ़ कीजिएगा, लेकिन आपके अलावा कहीं और से जवाब नहीं आता और आप भी पिछली कुछ कड़ियों में नदारद थीं, इसलिए सीने पर पत्थर रखकर हमें यह निर्णय लेना पड़ा :)

TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'लम्हा'।
२. "जियो, उठो, बढ़ो, जीतो"।
३. 'तलाश'।

Tuesday, September 7, 2010

अंजाना अंजानी की कहानी सुनाकर फिर से हैरत में डाला है विशाल-शेखर ने.. साथ है गीतकारों की लंबी फ़ौज़

ताज़ा सुर ताल ३४/२०१०

विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' में आज उस फ़िल्म की बारी जिसकी इन दिनों लोग, ख़ास कर युवा वर्ग, बड़ी बेसबरी से इंतज़ार कर रहे हैं। रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा अभिनीत फ़िल्म 'अंजाना अंजानी', जिसमें विशाल शेखर के संगीत से लोग बहुत कुछ उम्मीदें रखे हुए हैं।

सुजॊय - और अक्सर ये देखा गया है कि जब इस तरह के यूथ अपील वाले रोमांटिक फ़िल्मों की बारी आती है, तो विशाल शेखर अपना कमाल दिखा ही जाते हैं। और इस फ़िल्म के निर्देशक सिद्धार्थ आनंद हैं जिनकी पिछली तीन फ़िल्मों - सलाम नमस्ते, ता रा रम पम, बचना ऐ हसीनों - में विशाल शेखर का ही संगीत था, और इन तीनों फ़िल्मों के गानें हिट हुए थे।

विश्व दीपक - ये तीनों फ़िल्में, जिनका ज़िक्र आपने किया, ये यश राज बैनर की फ़िल्में थीं, लेकिन 'अंजाना अंजानी' के द्वारा सिद्धार्थ क़दम रख रहे हैं यश राज के बैनर के बाहर। यह नडियाडवाला की फ़िल्म है, और इस बैनर ने भी 'हाउसफ़ुल', 'हे बेबी', 'कमबख़्त इश्क़' और 'मुझसे शादी करोगी' जैसी कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में दी हैं। इसलिए 'अंजाना अंजानी' से लोगों की बहुत उम्मीदें हैं।

सुजॊय - विशाल शेखर की पिछली फ़िल्म थी 'आइ हेट लव स्टोरीज़'। फ़िल्म तो ख़ास नहीं चली, लेकिन फ़िल्म के गानें पसंद किए गए और उन्हें हिट का दर्जा दिया जा चुका है। देखते हैं 'अंजाना अंजानी' उससे भी आगे निकल पाते हैं या नहीं। 'अंजाना अंजानी' की बातें आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत - "अंजाना अंजानी की कहानी"।

गीत - अंजाना अंजानी की कहानी


विश्व दीपक - निखिल डी'सूज़ा और मोनाली ठाकुर की आवाज़ों में यह गाना था। इस गीत के बारे में कम से कम शब्दों में अगर कुछ कहा जाए तो वो है 'पार्टी मटिरीयल'। गीटार, ड्रम्स, ब्रास, रीदम, और गायन शैली, सब कुछ मिलाकर ७० के दशक के "पंचम" क़िस्म का एक डान्स नंबर है यह, जो आपकी क़दमों को थिरकाने वाला है अगले कुछ दिनों तक। हिंग्लिश में लिखा हुआ यह गीत नीलेश मिश्रा के कलम से निकला हुआ है। निखिल और मोनाली, दोनों ही नए दौर के गायक हैं। मोनाली ने इससे पहले फ़िल्म 'रेस' में "ज़रा ज़रा टच मी" और 'बिल्लू' में "ख़ुदाया ख़ैर" जैसे हिट गीत गा चुकी हैं। आज कल वो 'ज़ी बांगला' के 'स रे गा मा पा लिट्ल चैम्प्स' शो की जज हैं।

सुजॊय - और इस गीत में विशाल शेखर की शैली गीत के हर मोड़ पे साफ़ झलकती है। और अब 'अंजाना अंजानी' के टीम मेम्बर्स के नाम। साजिद नडियाडवाला निर्मित और सिद्धार्थ राज आनंद निर्देशित इस फ़िल्म में रणबीर और प्रियंका के अलावा ज़ायेद ख़ान ने भी भूमिका अदा की है। संगीतकार तो बता ही चुके है, गानें लिखे हैं नीलेश मिश्रा, विशाल दादलानी, शेखर, अमिताभ भट्टाचार्य, अन्विता दत्तगुप्तन, कुमार , इरशाद कामिल और कौसर मुनीर। और गीतकारों की तरह गायकों की भी एक पूरी फ़ौज है इस फ़िल्म के साउण्डट्रैक में - निखिल डी'सूज़ा, मोनाली ठाकुर, लकी अली, शेखर, कारालिसा मोण्टेरो, मोहित चौहान, श्रुति पाठक, विशाल दादलानी और शिल्पा राव।

विश्व दीपक - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गीत सुना जाए लकी अली की आवाज़ में।

गीत - हैरत


सुजॊय - पहले गीत ने जिस तरह से हम सब के दिल-ओ-दिमाग़ के तारों को थिरका दिया था, "हैरत" की शुरुआत तो कुछ धीमी लय में होती है, लेकिन एक दम से अचानक इलेक्ट्रॊनिक गीटार की धुनें एक रॊक क़िस्म का आधार बन कर सामने आती है। लकी अली की आवाज़ बहुत दिनों के बाद सुनने को मिली, और कहना पड़ेगा कि ५१ वर्ष की आयु में भी उनकी आवाज़ में उतना ही दम अब भी मौजूद है। 'सुर' और 'कहो ना प्यार है' में उनके गाए गानें सब से ज़्यादा मशहूर हुए थे, हालाँकि उन्होंने कई और फ़िल्मों में भी गानें गाए हैं।

विश्व दीपक - इस गीत को लिखा था ख़ुद विशाल दादलानी ने, और अच्छा लिखा है। इससे पहले भी वे कई गानें लिख चुके हैं। विशाल के बोल और लकी अली की आवाज़ के कॊम्बिनेशन का यह पहला गाना है, शायद इसी वजह से इस गीत में एक ताज़गी है। इस गीत के प्रोमो आजकल टीवी पर चल रहे हैं और इस गीत के फ़िल्मांकन को देख कर ऐसा लग रहा है कि इस गीत की तरह फ़िल्म भी दमदार होगी।

सुजॊय - तो कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि लकी अली और विशाल-शेखर की "हैरत" ने हमें "हैरत" में डाल दिया है। और इस गीत से जो नशा चढ़ा है, उसे बनाए रखते हुए अब सुनते हैं तीसरा गीत राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में। एक और बेहतरीन गायक, एक और बेहतरीन गीत।

गीत - तू ना जाने आस-पास है ख़ुदा


विश्व दीपक - आजकल राहत साहब एक के बाद एक फ़िल्मी गीत गाते चले जा रहे हैं और कामयाबी की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। उनका गाया हर गीत सुनने में अच्छा लगता है। अभी पिछले ही दिनों फ़िल्म 'दबंग' में उनका गाया "तेरे मस्त मस्त दो नैन" आपको सुनवाया था, और आज ये गीत आप सुन रहे हैं। लेकिन एक बात ज़रूर खटकती है कि राहत साहब से हर संगीतकार एक ही तरह के गीत गवा रहे हैं। ऐसे तो भई राहत साहब बहुत जल्दी ही टाइपकास्ट हो जाएँगे!

सुजॊय - हाँ, और हमारे यहाँ लोग आजकल की फ़ास्ट ज़िंदगी में किसी एक चीज़ को बहुत ज़्यादा दिनों तक पसंद नहीं करते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि राहत फ़तेह अली ख़ान अपनी मौलिकता को बनाए रखते हुए अलग अलग तरह के गीत गाएँ, तभी वो एक लम्बी पारी फ़िल्म संगीत में खेल पाएँगे। इस गीत के बारे में यही कहेंगे कि एक टिपिकल "राहत" या "कैलाश खेर" टाइप का गाना है।

विश्व दीपक - सूफ़ी आध्यात्मिकता लिए हुए इस गीत को लिखा है विशाल दादलानी और शेखर रविजानी ने। इसी गाने का एक 'अनप्लग्ड' वर्ज़न भी है जिसमें श्रुति पाठक की आवाज़ भी मौजूद है। बहरहाल आइए सुनते हैं 'अंजाना अंजानी' का अगला गीत शेखर और कारालिसा मोण्टेरो की आवाज़ों में।

गीत - तुमसे ही तुमसे


सुजॊय- विशाल दादलानी और शेखर, दोनों अच्छे गायक भी हैं। जहाँ एक तरफ़ विशाल की आवाज़ में बहुत दम है, रॊक क़िस्म के गानें उनकी आवाज़ में ख़ूब जँचते हैं, उधर दूसरी तरफ़ शेखर की आवाज़ में है नर्मी। बहुत ही प्यारी आवाज़ है शेखर की और ये जो गीत अभी आपने सुना, उसमें भी उनका वही नरम अंदाज़ सुनने को मिलता है। कारालिसा ने अंग्रेज़ी के बोल गाए हैं और गीत की आख़िर में उनकी गायकी गीत में अच्छा इम्पैक्ट लाने में सफल रही है। कुल मिलाकर यह गीत एक कर्णप्रिय गीत है और मुझे तो बहुत अच्छा लगा।

विश्व दीपक - हाँ, और इस गीत में भी एक ताज़गी है और एक अलग ही मूड बना देता है। बस अपनी आँखें मूंद लीजिए और अपने किसी ख़ास दोस्त को याद करते हुए इस गीत का आनंद लीजिए। इस गीत के अंग्रेज़ी के बोल कारालिसा ने ख़ुद ही लिखे है। हिन्दी के बोल अन्विता दत्त गुप्तन और अमिताभ भट्टाचार्य की कलमों से निकले हैं। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं। श्रुति पाठक और मोहित चौहान की आवाज़ों में यह एक और ख़ूबसूरत गीत है इस फ़िल्म का - "तुझे भुला दिया फिर", आइए सुनते हैं।

गीत - तुझे भुला दिया फिर


विश्व दीपक - एक हौंटिंग प्रील्युड के साथ गीत शुरु हुआ और श्रुति के गाए पंजाबी शब्द सुनने वाले के कान खड़े कर देते हैं। और ऐसे में मोहित की अनोखी आवाज़ (कुछ कुछ लकी अली के अंदाज़ की) आकर गीत को हिंदी में आगे बढ़ाती है। बिना रीदम के मुखड़े के तुरंत बाद ही ढोलक के ठोकों का सुंदर रीदम और कोरस के गाए अंतरे "तेरी यादों में लिखे जो...", इस गीत की चंद ख़ासियत हैं। यह तरह का एक्स्पेरीमेण्ट ही कह सकते हैं कि एक ही गीत में इतने सारे अलग अलग प्रयोग। कुल मिलाकर एक सुंदर गीत।

सुजॊय - जी हाँ, ख़ास कर धीमी लय वाले मुखड़े के बाद इंटरल्युड में क़व्वाली शैली के ठेके और कोरस का गायन एक तरह का फ़्युज़न है क़व्वाली और आधुनिक गीत का। आपको बता दें कि इस गीत को विशाल दादलानी ने लिखा है, लेकिन क़व्वाली वाला हिस्सा लिखा है गीतकार कुमार ने। यह गीत सुन कर एक "फ़ील गुड" का भाव मन में जागृत होता है।

विश्व दीपक - "फ़ील गूड" की बात है, तो अब जो अगला गाना है उसके बोल ही हैं "आइ फ़ील गुड"। एक रॊक अंदाज़ का गाना है विशाल दादलानी और शिल्पा राव की आवाज़ों में, आइए इसे सुनते हैं।

गीत - आइ फ़ील गुड


सुजॊय - विशाल और शिल्पा के रॊक अंदाज़ से हम सभी वाकिफ़ हैं। वैसे शिल्पा से अब तक संगीतकार दबे हुए गीत ही गवाते आ रहे हैं, सिर्फ़ "वो अजनबी" ही एक ऐसा गीत था जिसमें उनकी दमदार आवाज़ सामने आई थी। "आइ फ़ील गुड" में भी उनकी आवाज़ खुल के बाहर आई है। और इसके बाद शायद अनुष्का मनचंदा की तरह उन्हें भी इस तरह के और गानें गाने के अवसर मिलेंगे।

विश्व दीपक - इस गीत को भी विशाल ने ही लिखा है, लेकिन अगर फ़ील गुड की बात करें तो पिछला गाना इससे कई गुना ज़्यादा बहतर था। ख़ैर, अब हम आ पहुँचे हैं आज के अंतिम गीत पर। और इसे भी विशाल और शिल्पा ने ही गाया है। "अंजाना अंजानी" फ़िल्म का एक और शीर्षक गीत, इस बार सॊफ़्ट रॊक शैली में, जिसे लिखा है कौसर मुनीर ने। वैसे इस गीत का मुखड़ा इरशाद कामिल ने लिखा है। सिद्धार्थ आनंद की हर फ़िल्म में इस क़िस्म का एक ना एक रोमांटिक युगल गीत ज़रूर होता है, जैसे 'सलाम नमस्ते' का "माइ दिल गोज़ म्म्म्म", 'ता रा रम पम' का "हे शोना", या फिर "ख़ुदा जाने" 'बचना ऐ हसीनों' का।

सुजॊय - भई मुझे तो इस गीत में "सदका किया" की छाप मिलती है। चलिए, जो भी है, गाना अच्छा है, अपने श्रोताओं को भी सुनवा देते हैं।

गीत - अंजाना अंजानी


सुजॊय - इन तमाम गीतों को सुनने के बाद फिर एक बार वही बात दोहराउँगा कि ये गानें कुछ ऐसे बनें हैं कि अगर फ़िल्म चल पड़ी तो ये गानें भी चलेंगे। और फ़िल्म पिट गई तो चंद रोज़ में ही ये भी गुमनामी में खो जाएँगे। 'बचना ऐ हसीनों' फ़िल्म नहीं चली थी, लेकिन "ख़ुदा जाने" गीत बेहद मक़बूल हुआ और आज भी सुना जाता है। लेकिन "ख़ुदा जाने" वाली बात मुझे इस फ़िल्म के किसी भी गाने में नज़र नहीं आई, लेकिन सभी गाने अपनी अपनी जगह पे अच्छे हैं। मुझे जो दो गीत सब से ज़्यादा पसंद आए, वो हैं "तुमसे ही तुमसे" और "तुझे भुला दिया फिर"। मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३ की रेटिंग, और 'अंजाना अंजानी' की पूरी टीम को इस फ़िल्म की कामयाबी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैं आपकी बातों से सहमत भी हूँ और असहमत भी। सहमत इसलिए कि मुझे भी वही दो गाने सबसे ज्यादा पसंद आए जो आपको आए हैं और असहमत इसलिए कि मुझे बाकी गाने भी अच्छे लगे इसलिए मेरे हिसाब से इस फिल्म के गाने इतनी आसानी से गुमनामी के गर्त में धंसेंगे नहीं। इस फिल्म के सभी गानों में विशाल-शेखर की गहरी छाप है, हर गाने में उनकी मेहनत झलकती है। इसलिए मैं अपनी तरफ़ से विशाल-शेखर को "डबल थंब्स अप" देते हुए आपके दिए हुए रेटिंग्स में आधी रेटिंग जोड़कर इसे साढे तीन बनाने की गुस्ताखी करने जा रहा हूँ। संगीतकार के बाद गीतकार की बात करते हैं। सच कहूँ तो मैंने और किसी फिल्म में गीतकारों की इतनी बड़ी फौज़ नहीं देखी थी। ७ गानों के लिए नौ गीतकार.. जबकि विशाल चार गीतों में खुद मौजूद हैं गीतकार की हैसियत से। मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि एक गीत तीन गीतकार मिलकर कैसे लिख सकते हैं। "तुमसे हीं तुमसे" के अंग्रेजी बोलों के लिए कारालिसा की जरूरत पड़ी, यह बात तो पल्ले पड़ती है, लेकिन यह बात मुझे अचंभित कर रही है कि बाकी बचे हिन्दी के कुछ लफ़्ज़ों के लिए अन्विता दत्त गुप्तन और अमिताभ भट्टाचार्य जैसे दिग्गज मैदान में उतर गए। "तुझे भुला दिया फिर" और "अंजाना अंजानी हैं मगर" ये दो ऐसे गीत हैं, जिनका मुखरा एक गीतकार ने लिखा है और अंतरे दूसरे ने.. ये क्या हो रहा है भाई? जहाँ कभी पूरी फिल्म के गाने एक हीं गीतकार लिखा करते थे, वहीं एक गीत में हीं दो-दो, तीन-तीन गीतकार .. तब तो कुछ दिनों में ऐसा भी हो सकता है कि एक-एक पंक्ति एक-एक गीतकार की हो.. एक गीतकार के लिए उससे बुरा क्षण क्या हो सकता है! अगर ऐसा हुआ तो हम जैसे भावी गीतकारों का भविष्य अधर में हीं समझिए :) खैर, कितने गीतकार रखने हैं और कितने संगीतकार- यह निर्णय तो निर्माता-निर्देशक का होता है.. हम कुछ भी नहीं कर सकते.. बस यही कर सकते हैं कि जितना संभव हो सके, अच्छे गाने चुनते और सुनते जाएँ। तो चलिए इन्हीं बातों के साथ हम आज की समीक्षा को विराम देते हैं। अगली बार हम एक लीक से हटकर एलबम के साथ हाज़िर होंगे.. नाम जानने के लिए आप अगली कड़ी का इंतज़ार करें।

आवाज़ रेटिंग्स: अंजाना अंजानी: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १००- कौसर मुनीर का लिखा वह कौन सा युगल गीत है जिस फ़िल्म में सैफ़ अली ख़ान थे और जिस गीत में एक आवाज़ महालक्ष्मी की है?

TST ट्रिविया # १०१- राहत फ़तेह अली ख़ान ने हिंदी फ़िल्म जगत में सन्‍ २००४ में क़दम रखा था और उस साल फ़िल्म 'पाप' में "लागी तुमसे मन की लगन" गीत मक़बूल हुआ था। इसी साल एक और फ़िल्म में भी उन्होंने गीत गाया था, बताइए उस फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # १०२- विशाल-शेखर के शेखर ने इससे पहले भी एक गीत गाया था जो परेश रावल पर फ़िल्माया गया था। क्या आप बता सकते हैं वह गीत कौन सा था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "कुछ मेरे दिल ने कहा" (तेरे मेरे सपने)
२. मधुश्री
३. 'पद्म शेशाद्री हायर सेकण्डरी स्कूल'।

एक बार फिर सीमा जी ने तीनों सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, August 31, 2010

किलिमांजारो में बूम बूम रोबो डा.. रोबोट की हरकतों के साथ हाज़िर है रहमान, शंकर और रजनीकांत की तिकड़ी

ताज़ा सुर ताल ३३/२०१०

सुजॊय - आज है ३१ अगस्त! यानी कि आज 'ताज़ा सुर ताल' इस साल का दो तिहाई सफ़र पूरा कर रहा है। पीछे मुड़ कर देखें तो इस साल बहुत ही कम फ़िल्में ऐसी हैं जिन्होंने बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़े हैं।

विश्व दीपक - हाँ, लेकिन फ़िल्म संगीत की बात करें तो इन फ़िल्मों के अलावा भी कई फ़िल्मों का संगीत सुरीला रहा है। 'वीर', 'इश्क़िया', 'कार्तिक कॊलिंग‍ कार्तिक', 'आइ हेट लव स्टोरीज़', 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता', 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसे फ़िल्मों के गानें काफ़ी अच्छे हैं। अब देखते हैं कि २०१० का बेस्ट क्या अभी आना बाक़ी है!

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप ने कोई ऐसा कम्प्युटर देखा है जिसका स्पीड १ टेरा हर्ट्ज़ हो, और मेमरी १ ज़ीटा बाइट, जिसका प्रोसेसर पेण्टियम अल्ट्रा कोर मिलेनिया वी-२, और एफ़. एच. पी-४५० मोटर हिराटा, जापान का लगा हो?

विश्व दीपक - अरे अरे ये सब क्या पूछे जा रहे हैं आप? यह 'टी. एस. टी' है भई!

सुजॊय - तभी तो! आज हम जिस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं यह उसी से ताल्लुख़ रखता है। ये जो स्पेसिफ़िकेशन्स मैंने अभी बताए, यह दरसल किसी कम्प्युटर का नहीं, बल्कि एक अत्याधुनिक रोबोट का होगा जिसका निर्माण कर रहे हैं फ़िल्म निर्माता कलानिथि मारन निर्देशक शंकर के साथ मिल कर अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'रोबोट' में।

विश्व दीपक - 'रोबोट' इस देश में बनने वाली सब से महँगी फ़िल्म है और इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं साउथ सुपरस्टार रजनीकांत और ऐश्वर्या राय बच्चन। फ़िल्म में संगीत दिया है ए. आर. रहमान ने और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे। दोस्तों, इससे पहले कि हम 'रोबोट' की बातों को आगे बढ़ाएँ, आइए फ़िल्म का पहला गाना सुन लेते हैं जिसे गाया है ए. आर. रहमान, सुज़ेन, काश और क्रिसी ने।

गीत - नैना मिले


सुजॊय - फ़िल्म की कहानी और प्लॊट के हिसाब से ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गानें हाइ टेक्नो बीट्स वाले होंगे और गायन शैली भी उसी तरह का रोबोट वाले अंदाज़ का होगा, और अभी अभी जो हमने गीत सुना उसमें इन सभी बातों का पूरा पूरा ख़याल रखा गया है। "नैना मिले, तुम से नैना मिले", स्वानंद किरकिरे के बोलों को ध्यान से सुना जाए तो उनका ख़ास अंदाज़ महसूस किया जा सकता है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि 'ध्यान से सुना जाए', क्योंकि टेक्नो बीट्स के चलते गीत के बोल पार्श्व में चले गए हैं और संगीत ही सर चढ़ कर बोल रहा है।

विश्व दीपक - वाक़ई एक 'रोबोटिक' गाना है। हाल में एक फ़िल्म आई थी 'लव स्टोरी २०५०' जिसका संगीत भी कुछ इसी तरह का डिमाण्ड करता था। "मिलो ना मिलो" गीत मशहूर हुआ था लेकिन कुल मिलाकर फ़िल्म पिट गई थी। ख़ैर, 'रोबोट' का दूसरा गीत पहले गीत की तुलना में टेक्नो बीट्स के मामले में हल्का है और एक रोमांटिक युगल गीत है मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में। सुनते हैं फिर चर्चा करते हैं।

गीत - पागल अनुकन (प्यारा तेरा गुस्सा भी)


विश्व दीपक - भले ही एक नर्मोनाज़ुक रूमानीयत से भरा गीत है, लेकिन स्वानंद किरकिरे इसमें भी वैज्ञानिक शब्दों को डालना नहीं भूले हैं। हिंदी सिनेमा का यह पहला गीत है जिसमें "न्युट्रॊन" और "ईलेक्ट्रॊन" शब्दों का इस्तमाल हुआ है।

सुजॊय - आइए अब इस फ़िल्म के प्रमुख किरदार रोबोट का परिचय आप से करवाया जाए। इस ऐण्ड्रो-ह्युमानोएड रोबोट का नाम है 'चिट्टी'। यह एक इंसान है जिसने जन्म नहीं लिया, बल्कि जिसका निर्माण हुआ है। चिट्टी गा सकता है, नाच सकता है, लड़ सकता है, पानी और आग का उस पर कोई असर नहीं होता। वो हर वो सब कुछ कर सकता है जो एक इंसान कर सकता है लेकिन शायद उससे भी बहुत कुछ ज़्यादा। वो विद्युत-चालित है और वो झूठ नहीं बोल सकता। चिट्टी की कुछ विशेषताओं के बारे में हमने आपको बताया, आइए अब सुनते हैं 'चिट्टी डान्स शोकेस'।

विश्व दीपक - 'चिट्टी डान्स शोकेस' एक डान्स नंबर है प्रदीप विजय, प्रवीन मणि, रैग्ज़ और योगी बी. का।

गीत - चिट्टी डान्स शोकेस


सुजॊय - वाक़ई ज़बरदस्त इन्स्ट्रुमेन्टल पीस था। हिप-हॊप डान्स के शौकीनों के लिए बहुत अच्छा पीस है। इस फ़्युज़न ट्रैक का इस्तमाल टीवी पर होने वाले डान्स रियल्टी शोज़ में किया जा सकता है।

विश्व दीपक - और अब एक ऐसा गीत जिसे सुनते हुए आप शायद ९० के दशक में पहुँच जाएँगे। और वह इसलिए कि इसमें आवाज़ें हैं हरिहरण और साधना सरगम की। लेकिन गाने के अंदाज़ में ९० के दशक की कोई छाप नहीं है। यह तो इसी दौर का गीत है। यह गीत दर-असल इस रोबोट की गरिमा और महिमा का बखान करता है। रहमान के शुरुआती दिनों में दक्षिण के फ़िल्मों में वो जिस तरह का संगीत दिया करते थे, इस गीत में कुछ कुछ उस शैली की छाया मिलती है। सुनते हैं "अरिमा अरिमा"।

गीत - अरिमा अरिमा


विश्व दीपकव - स्वानंद किरकिरे ने केवल "ईलेक्ट्रॊन" और "न्युट्रॊन" तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा, अब एक ऐसा गीत जिसमें किलिमांजारो और मोहंजोदारो का उल्लेख है, और उल्लेख क्या, गीत के मुखड़े में ही ये दो शब्द हैं जिन पर इस गीत को आधार किया गया है। इस तरह के शब्दों के चुनाव का तो यही उद्येश्य हो सकता है कि धुन पहले बनी होगी और उस धुन पर ये शब्द फ़िट किए गए होंगे।

सुजॊय - जावेद अली और चिनमयी का गाया यह गीत एक मस्ती भरा गीत है जिसमें वह रोबोटिक शैली नहीं है, बल्कि तबले का भी इस्तमाल हुआ है। जावेद अली धीरे धीरे कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। आज के दौर के गायकों में उन्होंने अपनी एक अलग जगह बना ही ली है और फ़िल्म संगीत संसार में उन्होंने अपने क़दम मज़बूती से जमा लिए हैं। आइए सुनते हैं "किलिमांजारो"।

गीत - किलिमांजारो


विश्व दीपक - फ़िल्म के शुरु में चिट्टी कोई भी काम तो कर सकता है, लेकिन वो इंसान के जज़्बातों को समझ नहीं सकता। उसमें कोई ईमोशन नहीं है। और तभी डॊ. वासी चिट्टी के प्रोसेसर को अपग्रेड करते हैं और उसमें ईमोशन्स का सिम्युलेशन करते हैं यह सोचे बिना कि इसके परिणाम क्या क्या हो सकते हैं। अब चिट्टी महसूस कर सकता है और सब से पहले जो वो महसूस करता है, वह है प्यार। क्या यही प्यार डॊ. वासी के रास्ते पे दीवार बन कर खड़ा हो जाएगा? क्या डो. वासी का क्रिएशन ही उनका विनाश कर देगा? यही कहानी है 'रोबोट' की।

सुजॊय - और अब एक और रोबोटिक नंबर, फिर से टेक्नो बीट्स की भरमार लिए यह है "बोम बूम रोबोडा", जिसे गाया है रैग्ज़, योगी बी., मधुश्री, कीर्ति सगठिया और तन्वी शाह ने। मधुश्री को ए. आर. रहमान ने कई ख़ूबसूरत गीतों में गवाया है। बहुत ही मिठास है उनकी आवाज़ में। यह ताज्जुब की ही बात है कि मुंबई के फ़िल्मी संगीतकार क्यों उनसे गानें नहीं गवाते! ख़ैर, सुनते हैं यह गीत।

गीत - बूम बूम रोबोडा


विश्व दीपक - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत "ओ नए इंसान"। श्रीनिवास और खतिजा रहमान का गाया यह गीत है। श्रीनिवास ने बिलकुल रोबोटिक अंदाज़ में यह गाया है। श्रीनिवास ने इस गीत में दो अलग अलग आवाज़ें निकाली हैं, जो एक दूसरे से बिलकुल अलग है। ऒर्केस्ट्रेशन पूरी तरह से ईलेक्ट्रॊनिक है और इस गीत को सुनते हुए एक साइ-फ़ाइ फ़ील आता है।

सुजॊय - और जिन्हें मालूम नहीं है, उन्हें हम यह बताना चाहेंगे कि खतिजा रहमान ए. आर. रहमान की बेटी है जो इस गीत के ज़रिए हिंदी पार्श्व गायन में क़दम रख रही है। चलिए सुनते हैं यह गीत।

गीत - ओ नए इंसान


सुजॊय - हाँ तो विश्व दीपक जी, कैसा रहा इन रोबोटिक गीतों का अनुभव? मुझे तो बुरा नहीं लगा। हाल के कुछ फ़िल्मों में रहमान का जिस तरह का संगीत आ रहा था, ज़्यादातर सूफ़ियाने अंदाज़ का, उससे बिलकुल अलग हट के, बहुत दिनों के बाद इस तरह का संगीत सुनने में आया है। वैसे हाल में 'शिवाजी' में रहमान ने इस तरह का संगीत दिया था, लेकिन हिंदी के श्रोताओं में 'शिवाजी' के गानें कुछ ख़ास असर नहीं कर सके थे। अब देखना है कि 'रोबोट' के गीतों को किस तरह का रेसपॊन्स मिलता है! "पागल अनुकन" और "किलिमांजारो", ये दोनों गीत मुझे सब से ज़्यादा पसंद आए।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, भले हीं गाने सुनने के दौरान मैंने इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, किलिमांजारो और मोहनजोदाड़ो जैसे शब्दों के लिए स्वानंद किरकिरे को क्रेडिट दिया था, लेकिन एक बात मेरे दिल में चुभ-सी रही थी.. शुरू में सोचा कि रहने देता हूँ, हर बात कहनी ज़रूरी नहीं होती, लेकिन जब हम समीक्षा हीं कर रहे हैं तो हमें कुछ भी छुपाने का हक़ नहीं मिलता। शायद आपने रोबोट के तमिल वर्ज़न ऐंदिरन के गाने नहीं सुने। मैंने सुने हैं.. गाने के बोल तो समझ नहीं आए लेकिन ऊपर बताए गए शब्द पकड़ में आ गए थे} और जब मैंने हिन्दी के गाने सुने और हिन्दी में उन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति मिली तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि गीतकार ने गाने का बस अनुवाद हीं किया है और कुछ नहीं। नहीं तो तमिल का "डा" (बूम बूम रोबो डा), जो हिन्दी के "रे" या "अरे" के समतुल्य है, हिन्दी में भी "डा" हीं क्यों होता। और भी ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं.. जिन्हें सुनने पर मुझे लगा था कि किसी साधारण-से गीतकार से गाने लिखवाए (अनुवाद करवाए) गए हैं। लेकिन गीतकार के रूप में "स्वानंद किरकिरे" का नाम देखकर मुझे झटका-सा लगा। अब जैसा कि आपके साथ हुआ और दूसरे हिन्दी-भाषी श्रोताओं के साथ होने वाला है, हम तो बस हिन्दी के गाने हीं सुनते हैं और उसी को "असल" समझ बैठते हैं। अब यहाँ पर दोषी कौन है, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन स्वानंद साहब से मुझे ऐसी उम्मीद न थी। वे "गुलज़ार" और "महबूब" की तरह मिसाल बन सकते थे, जो तमिल के गानों (जिसे वैरामुतु जैसे बड़े कवि/गीतकार लिखा करते हैं) से बोल नहीं उठाते, बल्कि रहमान की धुनों पर अपने नए बोल लिखते हैं। बस इतना है कि स्वानंद साहब से निराश होने के बावजूद रहमान के संगीत के कारण हीं मैं इस एलबम को पसंद कर पा रहा हूँ। सुजॊय जी, आपने इस एलबम के लिए साढे तीन अंक निर्धारित किए थे, लेकिन मैं आधे अंक की कटौती गीतकार के कारण कर रहा हूँ। एक गीतकार/कवि के मन में शब्दों के लिए जो टीस उठती है, वह तो आप समझ हीं सकते हैं.. है ना? खैर.. मैं भी किस भावनात्मक दरिया में बह गया... हाँ तो, आज की समीक्षा को विराम देने का वक्त आ गया है, अगली बार "अनजाना अनजानी" के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए शुभदिन एवं शुभरात्रि!!

आवाज़ रेटिंग्स: रोबोट: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९७- हरिहरण और साधना सरगम की आवाज़ में उस मशहूर गीत का मुखड़ा बताइए जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "ये दिल बेज़ुबाँ था आज इसको ज़ुबाँ मिल गई, मेरी ज़िंदगी को एक हसीं दास्ताँ मिल गई"?

TST ट्रिविया # ९८- फ़िल्म 'रोबोट' के साउण्डट्रैक में आपने जितनी भी आवाज़ें सुनीं, उनमें से एक गायिका हैं जिनका असली नाम है सुजाता भट्टाचार्य। बताइए इस गायिका को अब हम किस नाम से जानते हैं?

TST ट्रिविया # ९९- परिवार की नाज़ुक आर्थिक स्थिति के चलते ए. आर. रहमान को कक्षा-९ में स्कूल छोड़ना पड़ा था। बताइए रहमान उस वक़्त किस स्कूल में पढ़ रहे थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. खुदा जाने (बचना ए हसीनों)
२. ६७
३. इन दोनों फ़िल्मों में विदेशी गीत की धुन का इस्तेमाल किया गया है। 'वी आर फ़मिली' में एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॊक" तथा 'कल हो ना हो' में रॊय ओरबिसन के "प्रेटी वोमेन"।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

Tuesday, August 10, 2010

सलीम-सुलेमान की आशाएँ ढल गई हैं धीमी गति के प्रेरक गीतों में.. साथ हैं प्रीतम और शिराज़ भी

ताज़ा सुर ताल ३०/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को हमारा प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, इसे इत्तेफ़ाक़ ही कहिए या कुछ और, हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में कुछ नायक ऐसे हुए हैं जिनकी फ़िल्मों के गानें हमेशा ही सुपरहिट हुआ करते हैं। जैसे कि राजेश खन्ना की शायद ही कोई फ़िल्म ऐसी होगी जिसके गानें चले ना हों। नए दौर में सलमान ख़ान ऐसे नायक बनें जिनकी फ़िल्मों के गानें बेहद लोकप्रिय होते आए हैं और आज भी होते हैं। ऐसे ही एक और अभिनेता हैं जॊन एब्राहम जिनकी फ़िल्मों का संगीत भी चलता आया है, फिर चाहे फ़िल्म चले या ना चले।

विश्व दीपक - 'जिस्म', 'साया', 'धूम', 'सलाम-ए-इश्क़', 'काल', 'गरम मसाला', 'दोस्ताना', 'गोल', 'न्यू यार्क', 'पाप', 'टैक्सी नंबर ९ २ ११', ये सारी जॉन की फ़िल्में संगीत के लिहाज़ से सफल ही मानी जाएंगी। आज हम जॉन की नई फ़िल्म 'आशाएँ' के गानें लेकर उपस्थित हुए हैं, और इन गीतों को सुनने के बाद हमें और आपको मिलकर यह निर्णय लेना है कि क्या जॉन की पिछली सारी फ़िल्मों के संगीत की तरह इस फ़िल्म के संगीत पर भी 'हिट सुपरहिट' की मोहर लगाई जा सकती है या नहीं।

सुजॊय - सब से पहले तो फ़िल्म के शीर्षक की बात करेंगे। परसेप्ट पिक्चर कंपनी के बैनर तले बनी इस फ़िल्म को लिखा व निर्देशित किया है नागेश कुकुनूर ने। अब आप समझ गए होंगे कि हमने फ़िल्म के शीर्षक का ज़िक्र क्यों किया। जी हाँ, नागेश की मशहूर फ़िल्म 'इक़बाल' के मशहूर गीत "आशाएँ खिले दिल की" से इस फ़िल्म का शीर्षक प्रेरित है।

विश्व दीपक - जॉन एब्राहम के अलावा इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं नवोदित अभिनेत्री सोनल सहगल (जो हिमेश भाई के साथ उनकी फ़िल्म रेडियो में भी दिखी थीं), गिरिश कारनाड, फ़रीदा जलाल, आश्विन चितले, अनिता नायर प्रमुख। श्रेयस तलपडे का भी एक गेस्ट अपीयरेन्स है फ़िल्म में। पॉण्डिचेरी और हैदराबाद के लोकेशन्स पर फ़िल्माये गये इस फ़िल्म के लिए जॉन को १६ किलो का वज़न कम करना पड़ा है ऐसा सुनने में आया है। ये तो थे फ़िल्म से जुड़े कुछ तथ्य, आइए अब गीतों का सिलसिला शुरु किया जाए। फ़िल्म में कुल ८ गीत हैं और ५ रीमिक्स ट्रैक्स।

सुजॊय - 'स्ट्राइकर' और 'राजनीति' की तरह 'आशाएँ' में भी एकाधिक संगीतकार हैं, मुख्य संगीतकार हैं सलीम-सुलेमान, जिन्होंने फ़िल्म का पार्श्व संगीत भी तय्यार किया है। और जो दूसरे संगीतकार हैं, वो हैं प्रीतम (२ गीत) और शिराज़ उप्पल (१ गीत)। गीतकार हैं मीर अली हुसैन, समीर, कुमार और शक़ील सोहैल। तो आइए सुनते हैं पहला गीत नीरज श्रीधर की आवाज़ में। नीरज का नाम देख कर आप समझ ही गए होंगे कि इसके संगीतकार हैं प्रीतम। इस गीत को समीर ने लिखा है।

गीत - मेरा जीना है क्या


विश्व दीपक - नीरज श्रीधर और प्रीतम की जोड़ी जिस तरह के गानें हमें देती आई है आज तक (हरे राम हरे राम, प्रेम की नैय्या, तुम मिले, वगेरह), उससे कुछ अलग हट के है यह गीत। गीत शुरु होता है नर्मोनाज़ुक अंदाज़ में, लेकिन बाद में रॉक शैली आ जाती है। नीरज की आवाज़ अच्छी बैठी है इस गीत में लेकिन यह गीत तो के.के वाला गीत है बिल्कुल। आजकल इस गीत को ख़ूब टीवी पर दिखाया जा रहा है फ़िल्म के प्रोमो में। और नीरज और उस प्रोमो में प्रीतम भी नज़र आ रहे हैं रॉक सिंगर्स की तरह।

सुजॊय - मुझे यह गीत अच्छा ही लगा, लेकिन मेरा भी ख़याल है कि के.के की आवाज़ में गीत और ज़्यादा खुल कर सामने आता। ख़ैर, नीरज ने भी अच्छा निभाया है। आगे बढ़ते हैं दूसरे गीत की तरफ़, और अब की बार गीतकार कुमार के बोल, प्रीतम का ही संगीत, और इसे गाया है शान और तुलसी कुमार ने। एक सुरीले मेलोडियस युगल गीत की उम्मीद हम ज़रूर रख सकते हैं, क्यों? आइए ख़ुद सुनते हैं और फिर निर्णय लेते हैं।

गीत - दिलकश दिलदार दुनिया


सुजॊय - अनुप्रास अलंकार!!! लेकिन जिस तरह के मेलोडियस नर्मोनाज़ुक रोमांटिक युगल गीत की कल्पना मैंने की थी, वैसा नहीं पाया। मैंने तो सोचा था कि "तेरी ओर" और "ख़ुदा जाने" जैसा कुछ सुनने को मिलेगा। लेकिन इस गीत का अंदाज़ कुछ अलग सा है। शान की आवाज़ भी कुछ बदली हुई-सी लगी। तुल्सी कुमार की आवाज़ में तो मुझे कभी कोई ख़ास बात नज़र नहीं आई। ग़लत अर्थ ना निकालें तो मैं यही कहूँगा कि तुलसी कुमार जैसी आवाज़ और गायकी तो हर रियल्टी शो में सुनने को मिल जाती है। इस आवाज़ में ख़ास बात क्या है कोई मुझे समझाए ज़रा!

विश्व दीपक - इस गीत के बारे में इतना ही कहूँगा कि कम्पोजिशन अच्छा है, बीट बेस्ड सॉंग है, ठीक ठाक गीत है। लेकिन प्रीतम से हम कुछ और बेहतर उम्मीद रखते हैं, ख़ास कर रोमांटिक नर्मोनाज़ुक गीतों में। चलिए अब बढ़ते हैं तीसरे गीत की ओर। प्रीतम के बाद अब है शिराज़ उप्पल की बारी। उन्होंने ना केवल इस गीत को स्वरबद्ध किया है, बल्कि शक़ील सोहैल के लिखे इस गीत को ख़ुद गाया भी है। सुनते हैं "रब्बा"।

गीत - रब्बा


विश्व दीपक - गायक-संगीतकार शिराज़ उप्पल पाक़िस्तान से ताल्लुक़ रखते हैं। गाना तो अच्छा ही बना है, धुन भी अच्छी है, गाया भी ठीक-ठाक है, लेकिन पता नहीं क्यों इस गीत ने कोई आस असर नहीं छोड़ा। बस यही कह सकता हूँ कि "रब्बा ये क्या हुआ"।

सुजॊय - यह शायद इसलिए भी हो सकता है कि शिराज़ की आवाज़ में ऊँचे नोट्स वाले गीत ज़्यादा अच्छे लगते हैं। नीचे सुर के गीतों में उनकी आवाज़ खुल के बाहर नहीं आती। इस गीत के बारे में यही कहूँगा कि शक़ील सोहैल ने अच्छा कलम चलाया है।

विश्व दीपक - अच्छा, हमने तीन गीत सुनें, अब से अगले पाँच गीतों में संगीत सलीम सुलेमान का है और गीतकार हैं मीर अली हुसैन। सुनते हैं इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी की पहली रचना ज़ुबीन की आवाज़ में।

गीत - अब मुझको जीना


सुजॊय - यह आशावादी और प्रेरणादायक गीत था। ज़ुबीन आसाम से ताल्लुक़ रखते हैं और वहाँ पर ख़ूब लोकप्रिय हैं। हिंदी में प्रीतम ने उनसे फ़िल्म 'गैंगस्टर' में "या अली रहम अली" गवाया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस गीत को भी उन्होंने पूरे जोश के साथ गाया है। ज़ोरदार ऑरकेस्ट्रेशन और क़दमों को थिरकाने वाला गीत है। पिछले तीन गीत भी अच्छे थे लेकिन कुछ ना कुछ कमी लग रही थी उनमें। इस गीत को सुन कर एक ताज़गी जैसी आ गई, बहुत ही खुल कर यह गीत आया है और सही में गीत अच्छा है।

विश्व दीपक - इस गीत की शुरुआत में कुछ कुछ 'Summer of 69' जैसा लगा, फिर गीत ने तेज़ गति पकड़ ली और अपनी अलग राह पकड़ कर अपने मुक़ाम तक पहुँच गई। ज़ुबीन गर्ग की आवाज़ में एक अलग कशिश है और भीड़ से अलग सुनाई देती है। उनसे और भी ज़्यादा गानें संगीतकार गवा सकते हैं। 'आशाएँ' फ़िल्म का पाँचवा गीत है शफ़ाक़त अमानत अली की आवाज़ में, "शुक्रिया ज़िंदगी"। आइए गीत सुनते हैं, फिर बात करते हैं।

गीत - शुक्रिया ज़िंदगी


सुजॊय - ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करता हुआ यह गीत सुन कर हम सलीम सुलेमान, मीर अली हुसैन और शफ़ाक़त अमानत अली का शुक्रिया अदा ही कर सकते हैं। "छन के आई तो क्या चांदनी तो मिली" जैसे अन्योक्ति अलंकार में सजकर यह गीत ज़िंदगी के प्रति आशावादी होने की प्रेरणा देती है। मुझे तो यह गीत सुनते हुए फ़िल्म 'सदमा' का वो मशहूर याद गया कि "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले, हमने भी तेरे हर एक ग़म को गले से लगाया है, है न"।

विश्व दीपक - बेहद ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं मीर अली हुसैन ने। मुझे तो लग रहा है कि अच्छे गीतकारों और अच्छे बोल वाले गीतों का ज़माना वापस आ गया है। पिछले कुछ समय से निम्न स्तर के बोल वाले गानें बहुत ही कम हो गए हैं। क्या फ़िल्म संगीत एक बार फिर से करवट ले रहा है?

सुजॊय - काश ऐसा हो जाए, और फ़िल्म संगीत का एक और सुनहरा दौर आ जाए तो मज़ा आ जाए! शफ़ाक़त अमानत अली के बाद अब बारी है श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज़ की। "पल में मिला जहाँ" श्रेया की मधुर आवाज़ में ढलकर बेहद सुरीला सुनाई देता है, आइए सुनते हैं।

गीत - पल में मिला जहां (श्रेया)


विश्व दीपक - श्रेया की नर्म आवाज़ में बिना किसी साज़ के जैसे ही "पल में मिला जहां" शुरु होता है, गीतकार किस ख़ूबसूरती से हर पंक्ति की शुरुआत "पल में" से करके "पल में" पर ही ख़त्म करते हैं, गीत को सुन कर महसूस किया जा सकता है।

पल में मिला जहां, है धुआँ पल में,
पल में यक़ीन था, अब गुमां पल में,
पल में उम्मीद थी, अरमां पल में,
पल में बहार थी, अब ख़िज़ाँ पल में।

सुजॊय - गीत में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, जिस वजह से श्रेया को काफ़ी मेहनत करनी पड़ी होगी क्योंकि पूरा दायित्व उनकी गायकी पर आ गया है। गीत तो निस्संदेह उत्कृष्ठ है, लेकिन देखना यह है कि आज के जेनरेशन के कितने लोगों को इस गीत को पूरा सुनने का धैर्य रहेगा। इसी गीत का एक पुरुष संस्करण भी है शंकर महादेवन की आवाज़ में, आइए लगे हाथ इसे भी सुन लिया जाए।

गीत - पल में मिला जहां (शंकर)


विश्व दीपक - इन दोनों संस्करणों को सुन कर कह पाना मुश्किल है कि कौन सा बेहतर है। शंकर ने ज़्यादा ज़ोर डाल कर गाया है। शंकर एक ऐसे गायक और संगीतकार हैं जिन्हे हर संगीतकार पसंद करते हैं, उनकी गायकी के साथ साथ उनके मीठे स्वभाव के कारण भी। तभी तो दूसरे संगीतकार उनसे समय समय पर गवाते रहते हैं। हाल ही में फ़िल्म 'राजनीति' में "धन धन धरती रे" उन्होंने गाया था।

सुजॊय - और आठवें और अंतिम गीत की बारी जिसे गाया है मोहित चौहान ने। एक और धीमी गति वाला गीत जिसमें है रोमांस, लेकिन गभीरता के साथ। "चला आया प्यार" में परक्युशन का सुंदर इस्तेमाल हुआ है।

विश्व दीपक - तबले का भी सुंदर इस्तेमाल सुनाई देता है। आम तौर पर फ़्युज़न गीतों में गीत देसी होता है, सुर देसी होते हैं और बीट्स विदेशी होते हैं; लेकिन इस गीत में गायकी और गीत की धुन आधुनिक है, लेकिन जो रीदम है उसे तबले की थापों पर शास्त्रीय अंदाज़ में तय्यार किया गया है जिससे एक नवीनता आई है गाने में। सुना जाए...

गीत - चला आया प्यार


इन आठ गीतों को सुन कर हमारी तरफ़ से तो थम्प्स अप है। हाँ, गानें ज़रा धीमी लय के और गहरे शब्दों वाले हैं। आख़िर नागेश कुकुनूर की फ़िल्म है, उसमें कुछ गहरी बातें तो होंगी। अभी हाल ही में इस फ़िल्म की टीम (जॉन, सोनल सहगल और नागेश कुकुनूर) इण्डियन आइडल में गेस्ट बन कर आए थे अपनी इस फ़िल्म को प्रोमोट करने के लिए। उसमें इन लोगों ने कहा कि यह फ़िल्म लीक से हट कर है और कम बजट की फ़िल्म है। लेकिन यह लोगों के दिलों को ज़रूर छूएगी। फ़िल्म के गीतों ने तो हमारे दिल को छुआ है, देखना है कि फ़िल्म किस तरह का कमाल दिखाती है। हमारी तरफ़ से इस फिल्म को लाखों दुआएँ!

ढर्रे के अनुसार हमें यह भी तो बताना होगा कि अगली बार हम किस फिल्म की समीक्षा लेकर हाज़िर होने वाले हैं। तो दोस्तों, अभी हमारे सामने दो फिल्में हैं - "वी और फ़ैमिली" और "दबंग"। अब कौन सी फिल्म किस्मत वाली साबित होगी, यह तो वक़्त हीं बताएगा। हाँ, अगर आप इन दोनों में से किसी एक को खासा-पसंद करते हैं तो टिप्पणी में इसका ज़िक्र जरूर कर दें। हम आपकी राय का पूरा ख्याल रखेंगे। वैसे अंतिम निर्णय तो हमारा है काहे कि हम तो ठहरे दबंग :)

आवाज़ रेटिंग्स: आशाएँ: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८८- ये गुलशन कुमार की सुपुत्री हैं और इस कारण भी संगीत की दुनिया में इनका नाम है। पिछले दिनों आई फिल्म "वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई" में भी इन्होंने एक गाना गाया था। २००९ में रीलिज हुई इनके डेब्यु एलबम का नाम बताईये।

TST ट्रिविया # ८९- नागेश कुकुनूर की उस फ़िल्म का नाम बताएँ जिसमें दोस्ती को समर्पित एक गाना था। वह गाना किसने गाया था?

TST ट्रिविया # ९०- "फ़ना" के गीत "चाँद सिफ़ारिश" की प्रोग्रामिंग किस संगीतकार (संगीतकार बंधुओं) ने की थी? इसी (इन्हीं) की सलाह पर इस गाने में "शुभान-अल्लाह" डाला गया था।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "चरके बोदन चिरबी चकर" का इस्तेमाल हुआ है जो किशोर कुमार ने फ़िल्म 'पड़ोसन' के मशहूर गीत "एक चतुर नार" में किया था।
२. शैल हाडा।
३. "एक तीखी तीखी सी उफ़ करारी से लड़की" (लागा चुनरी में दाग)।

Tuesday, August 3, 2010

"इश्क़ महंगा पड़े फिर भी सौदा करे".. ऐसा हीं एक सौदा करने आ पहुँचें हैं कभी साफ़, कभी गंदे, "लफ़ंगे परिंदे"

ताज़ा सुर ताल २९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! जैसा कि हाल के सालों में हम देखते आ रहे हैं.. आज के फ़िल्मकार नई नई कहानियाँ हिंदी फ़िल्मों में ला रहे हैं। वैसे तो ज़्यादातर फ़िल्मों की कहानियों का आधार नायक-नायिका-खलनायक ही होते रहे हैं और आज भी है, लेकिन बदलते समाज और दौर के साथ साथ फ़िल्म के पार्श्व में काफ़ी परिवर्तन आ गए हैं। अब आप ही बताइए मुंबई के 'बाइक गैंग्स' पर किसी फ़िल्म की कल्पना क्या ७० के दशक में की जा सकती थी?

सुजॊय - क्योंकि फ़िल्म समाज का आईना कहलाता है, तो बदलते दौर के साथ साथ, बदलते समाज के साथ साथ फ़िल्में भी बदल रही है। और यही बात लागू होती है फ़िल्म संगीत पर भी। जब जब फ़िल्मी गीतों के गिरते हुए स्तर पर लोग चर्चा शुरु कर देते हैं, तब भी उन्हें इसी बात को ध्यान में रखना होगा कि अब वक़्त बदल गया है। आज की नायिका अगर "चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है" जैसे गीत गाये, तो वह बहुत ज़्यादा नाटकीय और बेमानी लगेगी। इसलिए बदलते दौर के साथ साथ बदलते संगीत को भी खुले दिल से स्वीकारें, इसी में शायद सब की भलाई है। हाँ, यह ज़रूर है कि गीतों का स्तर नहीं गिरना चाहिए। अच्छा फ़नकार वही है जो लाख पाबंदियों के बावजूद भी अच्छा काम कर निकल जाए। और पिछले कुछ दिनों से हम देख भी रहे हैं कि कुछ कलाकार इस ओर ध्यान दे भी रहे हैं।

विश्व दीपक - तो अब आज की फ़िल्म की चर्चा शुरु की जाए! जैसा कि हमने पिछले हफ़्ते हीं इशारा कर दिया था, आज हम लेकर आए हैं फ़िल्म 'लफ़ंगे परिंदे' के गीतों को। यह फ़िल्म मुंबई के बाइक गैंग्स की कहानी है जिसका निर्माण किया है आदित्य चोपड़ा ने और निर्देशन है प्रदीप सरकार का। नील नितिन मुकेश फ़िल्म के नायक हैं जो नंदु की भूमिका में नज़र आएँगे, जो एक फ़ाइटर है और जो आँखों में पट्टी लगाकर रिंग में लड़ेंगे। उधर फ़िल्म की नायिका बनीं हैं दीपिका पडुकोण जो निभा रही है पिंकी का किरदार, जो एक नृत्यांगना है और जो नेत्रहीन है। नंदु पिंकी को अपनी आँखों से दुनिया दिखाता है तो पिंकी उसे प्यार करना सिखाती है। लेकिन इन दोनों को अपने प्यार के लिए किस तरह की कीमत चुकानी होगी, यह आप ख़ुद देख लीजिएगा २० अगस्त के बाद, यानी जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हो जाएगी।

सुजॊय - तो दोस्तों, यश राज के बैनर तले बनने वाली इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं नवोदित गायक रोनित सरकार की आवाज़ में। फ़िल्म के गीतकार हैं प्रदीप सरकार के चहेते गीतकार स्वानंद किरकिरे, और संगीत के लिए चुना गया है आर. आनंद को।

गीत - लफ़ंगे परिंदे


विश्व दीपक - आजकल रॊक शैली का लगभग सभी फ़िल्मों में इस्तेमाल हो रहा है। पिछले कुछ हफ़्तों में हमने जिन जिन फ़िल्मों के गानें इस स्तंभ में सुने हैं, उन सब में एक ना एक रॊक अंदाज़ का गीत ज़रूर रहा है। "लफ़ंगे परिंदे" गीत भी उसी रॊक स्टाइल का है। हेवी मेटल, गीटार की भरमार और उस पर रोनित सरकार की वज़नदार आवाज़ धुन और इन हेवी मेटल्स के साथ पूरा पूरा न्याय करती है। यह गीत किसी रॊक ऐल्बम में होती तो इसे ज़्यादा कामयाबी मिलती, फ़िल्मी गीत के रूप में इस तरह के गीत का लोगों की ज़ुबान पर चढ़ना ज़रा मुश्किल सा हो जाता है। गीत अच्छा है इसमें कोई शक़ नहीं है, और इस गीत से इस ऐल्बम की धमाकेदार शुरुआत हुई है।

सुजॊय - इस बात पर अगर हम ग़ौर करें कि यह एक यशराज फ़िल्म है, तो हमेशा से यशराज के फ़िल्म का शीर्षक गीत बड़ा ही रोमांटिक और नर्मोनाज़ुक हुआ करता है। उस दृष्टि से यह एक उल्लंघन है उनके हीं नियमों का है और ऐसा यशराज की फ़िल्म से उम्मीद नहीं किया करते हैं लोग। तो सब को चौंका कर ही कह सकते हैं कि यशराज बैनर अब अपना इमेज बदल रहा है। अच्छा, अगले गीत की तरफ़ बढ़ने से पहले आप को यह बता दें कि इस फ़िल्म के संगीतकार आर. आनंद का दुबारा पदार्पण हुआ है फ़िल्म जगत में। इससे पहले आर. आनंद ने आग़ोश बैण्ड के ज़रिए 'पैसा' नामक ऐल्बम का निर्माण किया था। फिर उसके बाद इन्होंने दक्षिण के कुछ फ़िल्मों में संगीत दिया और आनंद की आख़िरी फ़िल्म थी 'ज़ोर'। अब देखते हैं हिंदी फ़िल्मों में वो क्या कुछ कर दिखाते हैं।

विश्व दीपक - और अब "लफ़ंगे परिंदे" के बाद "मन लफ़ंगा"।

गीत - मन लफ़ंगा


सुजॊय - पिछले गीत से जो एक ख़ास मूड बन गया था, उसी मूड को आगे बढ़ाता हुआ यह गीत हमने सुना मोहित चौहान की आवाज़ में। गोवानीज़ कोरल गायन का इस्तेमाल सुना जा सकता है इस गीत में। ऒरकेस्ट्रेशन भी गोवा के संगीत जैसा लगता है। मोहित की आवाज़ ने एक बार फिर गीत के साथ पूरा पूरा न्याय किया और कहने की ज़रूरत नहीं कि मोहित चौहान एक के बाद एक सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। उनके गाये ज़्यादातर गानें ही हिट हो रहे हैं। इन दिनों 'वन्स अपन ए टाइम' का "पी लूँ" गीत हर चैनल पर सुनने को मिल रहा है जो चार्टबस्टर भी बन चुका है। "मन लफ़ंगा" गीत का एक रीमिक्स भी है फ़िल्म के ऐल्बम में लेकिन ऒरिजिनल के साथ इसकी तुलना अर्थहीन है।

विश्व दीपक - अकोस्टिक गीटार का जो इस्तेमाल हुआ है, वह कई दृष्टि से नवीन लगता है। एक सादा सरल बीट और रीदम गीत के प्रवाह को कर्णप्रिय बनाता है और लगता है कि यह गीत भी एक मक़बूल रोमांटिक गीत के रूप में उभर कर आएगा। स्वानंद के बोल भी कमाल के हैं कि नायक कह रहा है कि उसे अपने मन पर कोई बस नहीं है, मन तो लफ़ंगा है, जब प्यार की बात आती है तो वो किसी की नहीं सुनता, वह मनमानी करता है। "इश्क़ महंगा लगे.. फिर भी सौदा करे".. यह पंक्ति अपने आप में हीं सारी बात कह देती है। इस गीत को पहली बार सुनने के बाद एक बार और सुनने को दिल करता है। दोस्तों, आप लोग अगला गीत सुनिए, मैं ज़रा इस गीत को दोबारा सुन कर फिर अगला गीत सुनता हूँ।

सुजॊय - अगला गीत है शैल हाडा और अनुष्का मनचंदा की अवाज़ों में, आइए सुनते हैं।

गीत - धतड़ ततड़


विश्व दीपक - इस ऐल्बम का रॊक फ़ील बरकरार रखा है इस "धतड़ ततड़" ने। शैल हाडा सांवरिया का शीर्षक गीत गाने के बाद जैसे ग़ायब हो गए थे, उन्हे वापस लौटा देख कर ख़ुशी हो रही है, क्योंकि वो बेहद गुणी कलाकार हैं। उनके इंटरव्यु से पता चलता है कि शास्त्रीय संगीत सीखे हुए कलाकार है, जिन्होंने कई सालों तक मुंबई के किसी स्कूल में बच्चों को संगीत सिखाया भी है। और इस गीत में उनके साथ अनुष्का मनचंदा की आवाज़ ने अच्छा साथ दिया है। रॊक और लोक संगीत का फ़्युज़न है इस गीत में, स्ट्रिंग्स के साथ साथ ढोल का इस्तेमाल हुआ है जो क़दमों को थिरकाने लगते हैं।

सुजॊय - सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल के बाद अब ऐसा लगने लगा है कि जो दो गायिका दूसरों के मुक़ाबले कुछ आगे निकल रही हैं वो हैं अनुष्का मनचंदा और शिल्पा राव। धीरे धीरे संगीतकारों की निगाहें इन्ही दो गायिकाओं पर टिक-सी रही है ऐसा प्रतीत होता है। पूरी तरह से मुंब‍इया डान्स नंबर है और लगता है और इस बार गणपति में तो शायद इसी गीत की धूम रहेगी। लोग ख़ूब झूमने वाले हैं इस गीत के साथ जैसे पिचले साल सलमान ख़ान की फ़िल्म 'वाण्टेड' का गीत "तेरा ही जल्वा" छाया हुआ था। ख़ैर, इस धतड़ ततड़ के बाद अब एक सुकूनदायक गीत की बारी शिल्पा राव की आवाज़ में हो जाए!

गीत - नैन परिंदे


विश्व दीपक - एक ख़ूबसूरत पियानो पीस के साथ शुरु होकर यह गीत बेहद सुरीला आकार ले लेता है। शिल्पा राव इस तरह के गानें एक के बाद एक गा रही हैं और उनकी आवाज़ में इस तरह के गानें ख़ूब जँचते भी हैं। "सजदे में युंही" (बचना ऐ हसीनों), "उड़ी उड़ी मुड़ी मुड़ी" (पा), "रंग दे" (लाहौर), जैसे गीत शिल्पा राव के हाल के सफल गीतों में शुमार होते हैं। इस गीत की बात करें तो स्वानंद किरकिरे के शब्द बड़े ही काव्यात्मक और अर्थपूर्ण लगते हैं।

सुजॊय - शिल्पा राव की आवाज़ दीपिका के उपर अच्छी बैठी है, जिनके लिए "सजदे में युंही" भी शिल्पा ने गाया था। देखते हैं कि क्या शिल्पा भविष्य में दीपिका का स्क्रीन वॉयस बन पाती हैं या नहीं। और अब एक और रॉक सॉंग आज के समय के सब से कामयाब रॉकस्टार सूरज जगन की आवाज़ में। सूरज जगन एक रॉक सिंगर हैं जो फ़िल्म 'रॉक ऒन' में परदे पर नज़र भी आए थे। उन्होंने उस फ़िल्म में दूसरे बैंड के लीड सिंगर का किरदार निभाया था। उनकी आवाज़ में वह जोश है, वह वज़न है, जो इन हार्ड मेटल संगीत में साफ़ साफ़ सुनाई भी दे और अपना असर भी करे।

विश्व दीपक - बेस गीटार और ईलेक्ट्रिक गीटार का ख़ूब इस्तेमाल हुआ है इस गीत में, और सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरस में ढोलकी और स्कॉटिश पाइप का भी इस्तेमाल हुआ है। तो चलिए इस थिरकन भरे गीत को सुन लिया जाये। वैसे भी यह फ़िल्म का एक और शीर्षक गीत है जिसके बोल हैं "रंग डालें लफ़गे परिंदे"।

गीत - रंग डालें लफ़ंगे परिंदे


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसा लगा 'लफ़ंगे परिंदे'? मुझे तो एक और 'रॉक ऒन' लगा। फ़िल्म की कहानी के अनुसार ये गीत बने हैं जो सिचुएशनल हैं। मोहित चौहान और शिल्पा राव वाले दो गीत एक श्रेणी में रख सकते हैं और बाक़ी के तीन गीत रॉक श्रेणी में। यकीनन हीं यह ऐल्बम ऐवरेज से ऊपर है... बल्कि मैं तो कहता हूँ कि यह ऐल्बम भी इन्हीं दिनों आए बाकी ऐल्बमों-सा मक़बूल होने का माद्दा रखता है। वैसे भी यहाँ उन परिंदों की बात हो रही है जो कभी साफ तो कभी गंदे हैं लेकिन खुलेआम उड़ते हैं.. संगीत की दुनिया में भी इन्होंने लम्बी उड़ान भरी है... है ना? "ये कभी साफ़, ये कभी गंदे, लफ़ंगे परिंदे" :-)

विश्व दीपक - सुजॉय जी, सही कहा आपने। यहाँ पर मैं संगीतकार और गीतकार दोनों की तारीफ़ करना चाहूँगा। गीतकार के बारे में क्या कुछ नया कहूँ। स्वानंद साहब हर तरह के गीत लिखने में उस्ताद हो चुके हैं। भला कोई यकीन कर सकता हूँ कि इन्होंने हीं "आल इज़ वेल" लिखा था। और यहाँ पर वही "लफ़ंगे परिंदे" लिख रहे हैं.. पिछली फिल्म "राजनीति" में इन्होंने हीं कहा था "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन" तो वेलडन अब्बा में इन्हीं की कलम से ये बोल निकले थे "साबुन लेकर हाथ में निकले, सिस्टम को है धोना रे"। "खोया खोया चाँद" के शीर्षक गीत को भला कोई भूल सकता है... और कितने गाने गिनवाऊँ! मैं तो भाई इनका कायल हो गया हूँ। "देसी शब्दों" की बौछार इनसे अच्छा कोई और नहीं कर सकता.. यह तो मानना हीं पड़ेगा। गीतकार के बाद संगीतकार की भी बात कर लें। तो यहाँ पर प्रदीप सरकार की समझ-बूझ और विश्वास की दाद देनी होगी जो उन्होंने अपने नियमित संगीतकार "शांतनु मोइत्रा" की बजाय एक गुमनाम संगीतकार (आर आनंद) को चुना.. मैं सच कहता हूँ, मैंने इस फिल्म से पहले इनका नाम नहीं सुना था, लेकिन इस फिल्म के गानों को सुनने के बाद अब सोच रहा हूँ कि ढूँढ-ढूँढकर इनके गाने सुनूँ। इन्होंने इस फिल्म के नब्ज़ को जैसे पकड़-सा लिया है.. गानों को सुनते हीं दृश्य सामने आने लगते हैं। निस्संदेह संगीतकार की जीत हुई है। मेरी उम्मीदें इनसे अब बढ गई हैं.. देखते हैं आगे क्या होता है। चलिए तो इस सुखद बातचीत के बाद आज की समीक्षा को विराम देते हैं। अगली बार एक नई फिल्म (शायद आशाएँ या वी आर फैमिली या फिर कोई और) के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

आवाज़ रेटिंग्स: लफ़ंगे परिंदे: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८५- 'लफ़ंगे परिंदे' फ़िल्म के गीत "धतड़ ततड़" को आप किशोर कुमार से कैसे जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # ८६- "मेरे उपर भी आइ.आइ.टी या पी.एम.टी की परीक्षा देने का प्रेशर था घर से। लेकिन एक बार युवा वाणी कार्यक्रम के लिए आकाशवाणी केन्द्र जाते वक़्त मेरा ऐक्सिडेन्ट हो गया। तब मम्मी ने कहा कि अब ज़िंदगी में जो करना है करो। क्योंकि उस ऐक्सिडेन्ट से बच कर निकलना मेरे लिए दूसरा जन्म था। मैं कैसे बचा मुझी कुछ नहीं पता। तो मम्मी ने कहा कि जो अब ज़िंदगी में बनना है बनो"। बताइए हम किस फ़नकार की बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८७- प्रदीप सरकार और स्वानंद किरकिरे का साथ कई फ़िल्मों में हुआ है। बताइए इन दोनों के उस फ़िल्म के उस गीत का मुखड़ा जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "होश लेके उड़ गया उसकी कैसी है जादूगरी"।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रियदर्शन, प्रीतम, अक्षय कुमार।
२. नगीन तनवीर।
३. फ़िल्म - बिल्लू, गीत - बिल्लू भयंकर, सहगायक - अजय झिंग्रन और कल्पना.

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। अवध जी, ताजा सुर ताल पर आपको देखकर बेहद खुशी हुई। आगे भी इसी तरह अपनी उपस्थिति से हमें कृतार्थ करते रहिएगा। यही आग्रह है आपसे। आपने एक सवाल का सही जवाब दिया। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, May 18, 2010

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं.. लोक, शास्त्रीय और पाश्चात्य-संगीत की मोहक जुगलबंदी का नाम है "राजनीति"

ताज़ा सुर ताल १९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों, 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़ी कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। आज जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा हम करने जा रहे हैं वह है प्रकाश झा की अपकमिंग् फ़िल्म 'राजनीति'। १० बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित प्रकाश झा ने हमेशा ही अपने फ़िल्मों में समाज और राजनीति के असली चेहरों से हमारा बावस्ता करवाया है। और 'राजनीति' भी शायद उसी जौनर की फ़िल्म है।

सुजॊय - हाँ, और सुनने में आया है कि 'राजनीति' की कहानी जो है वह सीधे 'महाभारत' से प्रेरित है। दर-असल यह एक ऐसी औरत के सफर की कहानी है जो भ्रष्टाचार से लड़ती हुईं देश की प्रधान मंत्री बन जाती हैं। कैटरीना कैफ़ ने ही यह किरदार निभाया है और ऐसा कहा जा रहा है कि यह चरित्र सोनिया गांधी से काफ़ी मिलता-जुलता है, वैसे कैटरीना का यह कहना है कि उन्होंने प्रियंका गाँधी के हावभाव को अपनाया है। ख़ैर, फ़िल्म की कहानी पर न जाते हुए आइए अब सीधे फ़िल्म के संगीत पक्ष पर आ जाते हैं।

विश्व दीपक - लेकिन उससे पहले कम से कम हम इतना ज़रूर बता दें कि 'राजनीति' में कैटरीना कैफ़ के अलावा जिन मुख्य कलाकारों ने काम किए हैं वो हैं अजय देवगन, नाना पाटेकर, रणबीर कपूर, नसीरुद्दिन शाह, अर्जुन रामपाल, मनोज बाजपयी, सारा थॊम्पसन, दर्शन जरीवाला, श्रुति सेठ. निखिला तिरखा, चेतन पण्डित, विनय आप्टे, किरण कर्मकार, दया शंकर पाण्डेय, जहांगीर ख़ान, और रवि खेमू।

सुजॊय - वाक़ई बहुत बड़ी स्टार कास्ट है। विश्व दीपक जी, अभी हाल ही में एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी 'स्ट्राइकर', आपको याद होगा। फ़िल्म कब आयी कब गयी पता ही नहीं चला, लेकिन उस फ़िल्म के संगीत में कुछ बात थी। और सब से बड़ी बात यह थी कि उसमें ६ अलग अलग संगीतकार थे और ६ अलग अलग गीतकार। 'स्ट्राइकर' फ़िल्म की हमने जिस अंक में चर्चा की थी, हमने कहा था शायद यह पहली फ़िल्म है इतने सारे संगीतकार गीतकार वाले। अब देखिए, 'राजनीति' में भी वही बात है।

विश्व दीपक - हाँ, लगता है कुछ फ़िल्मकार अब इस राह पर भी चलने वाले हैं। अच्छी बात है कि एक ही एल्बम के अंदर लोगों को और ज़्यादा विविधता मिलेगी। अगर एक ही फ़िल्म में प्रीतम, शान्तनु मोइत्रा, आदेश श्रीवास्तव, और वेन शार्प जैसे बिल्कुल अलग अलग शैली के संगीतकार हों, तो लोगों को उसमें दिलचस्पी तो होगी ही।

सुजॊय - तो चलिए, 'राजनीति' का पहला गाना सुनते हैं मोहित चौहान और अंतरा मित्रा की आवाज़ों में। गीत इरशाद कामिल का है और धुन प्रीतम की।

गीत: भीगी सी भागी सी


सुजॊय - प्रीतम और इरशाद कामिल की जोड़ी ने हमेशा हिट गीत हमें दिए हैं। इस गीत को सुन कर भी लगता है कि यह लम्बी रेस का घोड़ा बनेगा। एक बार सुन कर शायद उतना असर ना कर पाए, लेकिन दो तीन बार सुनने के बाद गीत दिल में उतरने लगती है। मेलडी के साथ साथ एक यूथ अपील है इस गीत में।

विश्व दीपक - जी हाँ, आप सही कह रहे हैं और जिस तरह से गीत को रचा गया है, वह भी काफ़ी अलग तरीके का है। अमूमन मोहित चौहान हीं अपने आलाप के साथ गीत की शुरूआत करते हैं, लेकिन इस गाने में पहली दो पंक्तियाँ अंतरा मित्रा की हैं, जो अपनी मीठी-सी आवाज़ के जरिये मोहित की पहाड़ी आवाज़ के लिए रास्ता तैयार करती हैं। और जहाँ तक मोहित की बात है तो ये किसी से छुपा नहीं है कि मोहित इरशाद-प्रीतम के पसंदीदा गायक हैं और वे कभी निराश भी नहीं करते। इस गाने में इरशाद का भी कमाल दिख पड़ता है। "संदेशा", "अंदेशा", "गुलाबी", "शराबी" जैसे एक-दूसरे से मिलते शब्द कानों को बड़े हीं प्यारे लगते हैं।

सुजॊय - चलिए इस गीत के बाद अब जो गीत हम सुनेंगे वह शायद फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है। तभी तो फ़िल्म के प्रोमोज़ में इसी गीत का सहारा लिया जा रहा है। "मोरा पिया मोसे बोलत नाही, द्वार जिया के खोलत नाही"। शास्त्रीय और पाश्चात्य संगीत का सुंदर फ़्युज़न सुनने को मिलता है इस गीत में, जिसे आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया है और गाया भी ख़ुद ही है। पार्श्व में उनका साथ दिया है शशि ने तो अंग्रेज़ी के शब्दों को अपनी मोहक आवाज़ से सजाया है रोज़ाली निकॊलसन ने। इस गीत को लिखा है समीर ने। बहुत दिनों के बाद समीर और आदेश श्रीवस्तव का बनाया गीत सुनने को मिल रहा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इन्होने ९० के दशक के अंदाज़ में नहीं, बल्कि समय के साथ चलते हुए इसी दौर के टेस्ट के मुताबिक़ इस गीत को ढाला है।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, वैसे शायद आपको यह याद हो कि कुछ सालों पहले पाकिस्तानी ग्रुप फ़्युज़न का एक गीत आया था "मोरा सैंया मोसे बोले ना"। यह गीत बाद में "नागेश कुकुनूर" की फिल्म "हैदराबाद ब्लूज़-२" में भी सुनने को मिला था और हाल-फिलहाल में इसे "अमन की आशा" में शामिल किया गया है। मेरे हिसाब से "समीर"/"आदेश श्रीवास्तव" इस गाने की पहली पंक्ति से प्रेरित हुए हैं और उन्होंने उस पंक्ति में आवश्यक परिवर्त्तन करके इस गाने को एक अलग हीं रूप दे दिया है। या ये भी हो सकता है कि यह पंक्ति किसी पुराने सूफ़ी कवि की हो, जहाँ से दोनों गानों के गीतकार प्रभावित हुए हों। मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं,इसलिए कुछ कह नहीं सकता। वैसे जो भी हो, समीर ने इस गाने को बहुत हीं खूबसूरत लिखा है और उसी खूबसूरती से आदेश ने धुन भी तैयार की है। आदेश श्रीवास्तव हर बार हीं अपने संगीत से हम सबको चौंकाते रहे हैं, लेकिन इस बार तो अपनी आवाज़ के बदौलत इन्होंने हम सबको स्तब्ध हीं कर दिया है। इनकी आवाज़ में घुले जादू को जानने के लिए पेश-ए-खिदमत है आप सबके सामने यह गीत:

गीत: मोरा पिया


सुजॊय - इसी गीत का एक रीमिक्स वर्ज़न भी है, लेकिन ख़ास बात यह कि सीधे सीधे ऒरिजिनल गीत का ही रीमिक्स नहीं कर दिया गया है, बल्कि कविता सेठ की आवाज़ में इस गीत को गवाकर दीप और डी.जे. चैण्ट्स के द्वारा रीमिक्स करवाया गया है। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि आदेश श्रीवास्तव वाला वर्जन बेहतर है। आइए सुनते हैं कविता सेठ की आवाज़ में यह गीत:

गीत: मोरा पिया मोसे बोलत नाही (ट्रान्स मिक्स)


विश्व दीपक - प्रीतम-इरशाद कामिल और आदेश-समीर के बाद अब बारी है शांतनु-स्वानंद की। शांतनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की जोड़ी भी एक कमाल की जोड़ी है, जिनका स्कोर १००% रहा है। भले इनकी फ़िल्में बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाब रही हो या असफल, इनके गीत-संगीत के साथ हमेशा ही 'ऒल इज़ वेल' रहा है। '३ इडियट्स' की अपार लोकप्रियता के बाद अब 'राजनीति' में ये दोनों वापस आए हैं और केवल एक गीत इन्होने इस फ़िल्म को दिया है। यह एक डांस नंबर है "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन"।

सुजॊय - प्रणब बिस्वास, हंसिका अय्यर और स्वानंद किरकिरे की आवाज़ों में यह गीत एक मस्ती भरा गीत है। 'लागा चुनरी में दाग' फ़िल्म के "हम तो ऐसे हैं भ‍इया" की थोड़ी बहुत याद आ ही जाती है इस गीत को सुनते हुए। स्वानंद किरकिरे क्रमश: एक ऐसे गीतकार की हैसियत रखने लगे हैं जिनकी लेखन शैली में एक मौलिकता नज़र आती है। भीड़ से अलग सुनाई देते हैं उनके लिखे हुए गीत। और भीड़ से अलग है शांतनु का संगीत भी। "मोरा पिया" में अगर शास्त्रीय संगीत के साथ पाश्चात्य का फ़्युज़न हुआ है, तो इस गीत में हमारे लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत का संगम है। कुल मिलाकर एक कर्णप्रिय गीत है पिछले गीत की तरह ही। सुनते हैं बारिश को समर्पित यह गीत और इस चिलचिलाती गर्मी में थोड़ी सी राहत की सांस लेते हैं इस गीत को सुनते हुए।

गीत: इश्क़ बरसे


सुजॊय - और अब गुलज़ार के कलम की जादूगरी। "धन धन धरती रे" गीत समर्पित है इस धरती को। वेन शार्प के संगीत से सजे इस गीत के दो रूप हैं। पहले वर्ज़न में आवाज़ है शंकर महादेवन की और दूसरी में सोनू निगम की। सोनू वाले वर्ज़न का शीर्षक रखा गया है "कॊल ऒफ़ दि सॊयल"। एक देश भक्ति की भावना जागृत होती है इस गीत को सुनते हुए। पार्श्व में बज रहे सैन्य रीदम के इस्तेमाल से यह भावना और भी ज़्यादा बढ़ जाती है। मुखड़े से पहले जो शुरुआती बोल हैं "बूढ़ा आसमाँ, धरती देखे रे, धन है धरती रे, धन धन धरती रे", इसकी धुन "वंदे मातरम" की धुन पर आधारित है। और इसे सुनते हुए आपको दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले "बजे सरगम हर तरफ़ से गूंजे बन कर देश राग" गीत की याद आ ही जाएगी।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही पकड़ा है आपने। वैसे इस गीत के बारे में कुछ कहने से पहले मैं वेन शार्प से सबको परिचित करवाना चाहूँगा। वेन शार्प एक अमेरिकन संगीतकार हैं, जिन्होंने इससे पहले प्रकाश झा के हीं "गंगाजल" और "अपहरण" में संगीत दिया है। साथ हीं साथ पिछले दिनों आई फिल्म "लाहौर" में भी इन्हीं का संगीत था। ये एकलौते अमेरिकन संगीतकार हैं जिन्हें फिल्मफ़ेयर से नवाजा गया है। अब तो ये प्रकाश झा के फेवरेट बन चुके हैं। चूँकि ये हिन्दी नहीं समझते, इसलिए इनका संगीत पूरी तरह से निर्देशक की सोच और गीतकार के शब्दों में छुपी भावना पर निर्भर करता है। इनका मानना है कि हिन्दी फिल्म-संगीत की तरफ़ इनका रूझान "ए आर रहमान" की "ताल" को सुनने के बाद हुआ। चलिए अब इस गाने की भी बात कर लेते हैं। तो इस गाने में "वंदे मातरम" को एक नया रूप देने की कोशिश की गई है। धरती को पूजने की बजाय गुलज़ार साहब ने धरती की कठिनाईयों की तरफ़ हम सबका ध्यान आकर्षित किया है और इसके लिए उन्होंने बड़े हीं सीधे और सुलझे हुए शब्द इस्तेमाल किए हैं, जैसे कि "सूखा पड़ता है तो ये धरती फटती है।" अंतिम पंक्तियों में आप "सुजलां सुफलां मलयज शीतलां, शस्य श्यामलां मातरम" को महसूस कर सकते हैं। अब ज्यादा देर न करते हुए हम आपको दोनों हीं वर्जन्स सुनवाते हैं। आप खुद हीं निर्णय लें कि आपको किसकी गायकी ने ज्यादा प्रभावित किया:

गीत: धन धन धरती (शंकर महादेवन)


गीत: धन धन धरती रिप्राईज (सोनू निगम)


"राजनीति" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
तो दोस्तों, अब आपकी बारी है, कहिए 'राजनीति' के गानें कैसे लगे आपको? क्या कुछ ख़ास बात लगी इन गीतों में? क्या आपको लगता है कि चार अलग अलग तरह के गीतकार-संगीतकार जोड़ियों से फ़िल्म के गीत संगीत पक्ष को फ़ायदा पहुँचा है? प्रकाश झा के दूसरे फ़िल्मों के गीत संगीत की तुलना में इस फ़िल्म को आप क्या मुक़ाम देंगे? ज़रूर लिख कर बताइएगा टिप्पणी में।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५५- हाल ही में ख़बर छपी थी कि रणबीर कपूर लता जी से मिलने वाले हैं किसी ख़ास मक़सद के लिए। बता सकते हैं क्या है वह ख़ास मक़सद?

TST ट्रिविया # ५६- गीतकार समीर एक इंटरविउ में बता रहे हैं - "मैने अपना गीत जब अमित जी (अमिताभ बच्चन) को सुनाया, तो वो टेबल पर खाना खा रहे थे। वो गाने लगे और रोने भी लगे, उनको अपनी बेटी श्वेता याद आ गईं।" दोस्तों, जिस गीत के संदर्भ में समीर ने ये शब्द कहे, उस गीत को आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया था। अंदाज़ा लगा सकते हैं कौन सा गीत है यह?

TST ट्रिविया # ५७- प्रकाश झा ने 'राजनीति' में गुलज़ार साहब से एक गीत लिखवाया है। क्या आप १९८४ की वह मशहूर फ़िल्म याद कर सकते हैं जिसमें गुलज़ार साहब ने प्रकाश झा के साथ पहली बार काम किया था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रशान्त तामांग।
२. प्रकाश मेहरा, जिन्होने लिखा था "जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों"।
३. फ़िल्म 'अपना सपना मनी मनी' में "देखा जो तुझे यार, दिल में बजी गिटार"।

सीमा जी, आपके दोनों जवाब सही हैं। तीसरे सवाल का जवाब तो आपने जान हीं लिया। दिमाग पर थोड़ा और जोड़ देतीं तो इस सवाल का जवाब भी आपके पास होता। खैर कोई नहीं.. इस बार की प्रतियोगिता में हिस्सा लीजिए।

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