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Friday, June 4, 2010

महान फनकारों के सुरों से सुर मिलते आज हम आ पहुंचे हैं रिवाईवल की अंतिम कड़ी में ये कहते हुए - तू भी मेरे सुर में सुर मिला दे...

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ४५

पिछले ४५ दिनों से, यानी डेढ़ महीनों से आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं रिवाइवल सुनहरे दौर के सदाबहार नग़मों का, जिन्हे हमारे कुछ जाने पहचाने साथियों की आवाजों में। आज हम आ पहुँचे हैं इस विशेष शृंखला की अंतिम कड़ी पर। इस शृंखला में जिन जिन गायक गायिकाओं ने हमारे सुर में सुर मिला कर इस शृंखला को इस सुरीले अंजाम तक पहुँचाया है, हम उन सभी कलाकारों का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं, और साथ ही साथ हम आप सभी सुधी श्रोताओं का भी आभार व्यक्त करते हैं जिन्होने इन गीतों को सुन कर अपनी राय और तारीफ़ें लिख भेजी। तो आइए आज इस सुरीली शृंखला को एक सुरीला अंजाम प्रदान करते हैं और सुनते हैं फ़िल्म 'चितचोर' से "तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, संग गा ले, तो ज़िंदगी हो जाए सफल"। आपको बता दें कि इस गीत के लिए हेमलता को उस साल का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला था। इससे पहले कि आप यह गीत सुनें, इस गीत की रिकार्डिंग् की कहानी सुनिए ख़ुद हेमलता से जो उन्होने विविध भारती के एक इंटरव्यू में कहे थे। "इस गीत की रिकार्डिंग् के दिन मैं स्टुडियो लेट पहुँची। किस कारण से लेट हुई थी यह अब तो याद नहीं, बस लेट हो गई थी। वहाँ येसुदास जी आ चुके थे। गाने की रिकार्डिंग् के बाद दादा ने मुझसे कहा कि अगर तुम मेरे गुरु की बेटी नहीं होती तो वापस कर देता। यह सुन कर मैं इतना रोयी उस दिन। मुझे उन पर बहुत अभिमान हो गया, कि वो मुझे सिर्फ़ इसलिए गवाते हैं क्योंकि मैं उनके गुरु की बेटी हूँ? बरमन दादा, कल्याणजी भाई, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, ये सब भी तो मुझसे गवाते हैं, तो फिर उन्होने ऐसा क्यों कह दिया! मुझे बहुत बुरा लगा और मैं दिन भर बैठके रोयी। मैं दादा से जाकर यह कहा कि देर से आने के लिए अगर आप मुझे बाहर निकाल देते तो मुझे एक सबक मिलता, बुरा नहीं लगता, पर आप ने ऐसा क्यों कहा कि अगर गुरु की बेटी ना होती तो बाहर कर देता। तो उन्होने मुझसे बड़े प्यार से कहा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जब तुम्हारे लिए सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स वेट करेंगे, तुम नहीं आओगी तो रिकार्डिंग् ही नहीं होगी'।" तो दोस्तों, आइए अब 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की अंतिम कड़ी के इस गीत को सुना जाए और आपको यह बताते चलें कि सोमवार से हम वापस लौटेंगे अपनी उसी पुराने स्वरूप में और दोबारा शुरु होगा गोल्डन दौर के गोल्डन गीतों का कारवाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी नंबर ४११ के साथ। साथ ही पहेली प्रतियोगिता और 'क्या आप जानते हैं' स्तंभ भी हम वापस ले आएँगे। तो ज़रूर पधारिएगा 'आवाज़' के मंच पर सोमवार यानी ७ जून को। एक बार फिर से उन सभी गायक गायिकाओं का शुक्रिया अदा करते हुए जिन्होने 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की इस शृंखला को मुकम्मल बनाया, हम ले रहे हैं इजाज़त, नमस्कार!

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -तू जो मेरे सुर में...
कवर गायन -रश्मि नायर और एन वी कृष्णन




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रश्मि नायर
इन्टरनेट पर बेहद सक्रिय और चर्चित रश्मि मूलत केरल से ताल्लुक रखती हैं पर मुंबई में जन्मी, चेन्नई में पढ़ी, पुणे से कॉलेज करने वाली रश्मि इन दिनों अमेरिका में निवास कर रही हैं और हर तरह के संगीत में रूचि रखती हैं, पर पुराने फ़िल्मी गीतों से विशेष लगाव है. संगीत के अलावा इन्हें छायाकारी, घूमने फिरने और फिल्मों का भी शौक है
एन वी कृष्णन
मधुर आवाज़ के धनी एन वी कृष्णन साहब मूल रूप से कालीकट केरल के हैं और मुंबई में रहते हैं, जीवन यापन की दौड धूप में उन्हें अपने जूनून संगीत को समय देने के मौका नहीं मिला, पर इन्टरनेट क्रांति ने उनके गायन को आज एक नया आकाश दे दिया है, कृष्णन साहब अपनी इस दूसरी पारी को खूब एन्जॉय कर रहे हैं इन दिनों


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Tuesday, May 4, 2010

मल्टी स्टारर फिल्मों में सुनाई दिए कुछ अनूठे यादगार मल्टी सिंगर गीत भी

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १४

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' पर हम एक ऐसा गीत लेकर आए हैं जिसे ऒरिजिनली चार महान गायकों ने गाया था। इतना ही नहीं, इन चारों गायकों का एक साथ में गाया हुआ यह एकमात्र गीत भी है। इसीलिए यह गीत फ़िल्म संगीत के इतिहास का एक बेहद महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय गीत बन जाता है। जी हाँ, फ़िल्म 'अमर अकबर ऐंथनी' का वही मशहूर गीत "हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें", जिसे आवाज़ दी थी लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी और मुकेश ने। फ़िल्म के परदे पर लता जी ने तीनों नायिकाओं का पार्श्वगायन किया था - परवीन बाबी, नीतू सिंह और शबाना आज़मी; किशोर दा बनें अमिताभ बच्चन की आवाज़; रफ़ी साहब ने प्लेबैक दिया ऋषी कपूर को तथा विनोद खन्ना के लिए गाया मुकेश ने। आज इस गीत का जो रिवाइव्ड वर्ज़न हम सुनेंगे उसे भी चार आवाज़ों ने गाए हैं, जिनके बारे में आपको अभी थोड़ी देर में पता चल जाएगा। इस गीत को लिखा है आनंद बक्शी और संगीत दिया लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। इसी फ़िल्म में एक अन्य गीत है किशोर दा और अमिताभ साहब का गाया हुआ "माइ नेम इज़ ऐंथनी गोनज़ल्वेस"। तो आज प्यारेलाल जी से जान लेते हैं कि आख़िर ये कौन शख़्स हैं ऐंथनी गोनज़ल्वेस! पेश है 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम से एक अंश। प्यारेलाल जी से बात कर रहे हैं विविध भारती के कमल शर्मा:

हम लोग १९५७ में जा रहे थे विएना। सब कुछ फ़िक्स हो गया था। मतलब हम लोग यहाँ से शिफ़्ट करेंगे वहाँ, मतलब अपना ग्रीन कार्ड ले लेंगे, वहाँ जाएँगे। मैंने पिताजी से कहा कि मैं वहाँ जाऊँगा, क्योंकि मुझे बनना था यहूदी मेनन। तो मैंने बहुत प्रैक्टिस की वायलिन की। अभी अभी जब मैं गया था तो बहुत मज़ा आया, सब ने कहा 'इतना प्ररफ़ेक्ट पोज़िशन', इसका श्रेय जाता है मिस्टर ऐंथनी गोनज़ल्वेस को। उन्होने सीखाया मुझको कि कैसे होल्ड करना है वायलिन।

प्र: तो आपने जो एक गाना है 'अमर अकबर ऐंथनी' में, क्या आप ने उनको डेडिकेट किया?

इसका आप सुनिए, जब यह पिक्चर साइन हो गई, तो पिक्चर का नाम था 'अमर अकबर ऐंथनी, तो लक्ष्मी बोले कि 'प्यारे, इसमें गुरु का नाम आ गया है'। तो उनका नाम था पहले, 'पिक्चर' में, ऐंथनी फ़रनंडेज़। तो वो चेंज करके ऐंथनी गोनज़ल्वेस हमने करवाया और वह गाना भी बनाया, और हमने ख़ास कहा बच्चन साहब को कि भई मेरे गुरु का है, ऐक्टिंग् ठीक से करना, ऐसे ही मज़ाक में कहा। 'he was very happy' और कभी मैं बच्चन साहब से मिलवाऊँगा भी उनको। अभी वो हैं, गोवा में रहते हैं, 'now he is, I think, 81'.

प्र: अभी भी मुलाक़ात होती है बीच में?

हमेशा। मैं कोई भी काम करता हूँ तो हमेशा उनसे पूछता हूँ, 'and he is very soft-spoken', बहुत अच्छे, और अभी वो ८१ वर्ष के हैं, लेकिन एक बाल भी सफ़ेद नहीं है।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - हमको तुमसे हो गया है प्यार...
कवर गायन - पारसमणी आचार्य/प्रदीप सोमसुन्दरन/आज़म खान/एन वी कृष्णन




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डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं

प्रदीप सोमसुन्दरन
जो लोग टीवी पर म्यूजिकल शो देखने के शौक़ीन हैं, उन्होंने भारतीय टेलीविजन पर पहले सांगैतिक आयोजन 'मेरी आवाज़ सुनो' को ज़रूर देखा होगा। प्रदीप सोमसुंदरन को इसी कार्यक्रम में सन 1996 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक चुना गया था और लता मंगेशकर सम्मान से सम्मानित किया गया था। 26 जनवरी 1967 को नेल्लूवया, नेल्लूर, केरल में जन्मे प्रदीप पेशे से इलेक्ट्रानिक के प्राध्यापक हैं। त्रिचुर की श्रीमती गीता रानी से 12 वर्ष की अवस्था में ही प्रदीप ने कर्नाटक-संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दी थी और 16 वर्ष की अवस्था में स्टेज-परफॉर्मेन्स देने लेगे थे। प्रदीप कनार्टक शास्त्रीय गायन के अतिरिक्त हिन्दी, मलयालम, तमिल, तेलगू, अंग्रेज़ी और जापानी आदि भाषाओं में ग़ज़लें और भजन गाते हैं। इन्होंने कई मलयालम फिल्मी गीतों में अपनी आवाज़ दी है। और गैर मलयालम फिल्मी तथा गैर हिन्दी फिल्मी गीतों में ये काफी चर्चित रहे हैं।

आज़म खान
रफ़ी साहब, किशोर कुमार, येसुदास, हरिहरन, सुरेश वाडेकर, सोनू निगम और उदित नारायण इनके पसंदीदा गायक हैं. आज़म फर्मवेयर इंजिनियर है अमेरिका में और गायन का विशेष शौक रखते हैं. इन्टरनेट पर बहुत से संगीत मंचों पर इनकी महफिलें सजती रहती हैं


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खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

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