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Friday, August 20, 2010

जब हुस्न-ए-इलाही बेपर्दा हुआ वी डी, ऋषि और नए गायक श्रीराम के रूबरू

Season 3 of new Music, Song # 17

सूफी गीतों का चलन इन दिनों इंडस्ट्री में काफी बढ़ गया है. लगभग हर फिल्म में एक सूफियाना गीत अवश्य होता है. ऐसे में हमारे संगीतकर्मी भी भला कैसे पीछे रह सकते हैं. सूफी संगीत की रूहानियत एक अलग ही किस्म का आनंद लेकर आती है श्रोताओं के लिए, खास तौर पे जब बात हुस्न-ए-इलाही की तो कहने ही क्या. जिगर मुरादाबादी के कलाम को विस्तार दिया है विश्व दीपक तन्हा ने. दोस्तों गुलज़ार साहब इंडस्ट्री में इस फन के माहिर समझे जाते हैं. ग़ालिब, मीर आदि उस्ताद शायरों के शेरों को मुखड़े की तरह इस्तेमाल कर आगे एक मुक्कमल गीत में ढाल देने का काम बेहद खूबसूरती से अंजाम देते रहे हैं वो. हम ये दावे के साथ कह सकते हैं इस बार हमारे गीतकार उनसे इक्कीस नहीं तो उन्नीस भी नहीं हैं यहाँ. ऋषि ने पारंपरिक वाद्यों का इस्तेमाल कर सुर रचे हैं तो गर्व के साथ हम लाये हैं एक नए गायक श्रीराम को आपके सामने जो दक्षिण भारतीय होते हुए भी उर्दू के शब्दों को बेहद उ्म्दा अंदाज़ में निभाने का मुश्किल काम कर गए हैं इस गीत में. साथ में हैं श्रीविद्या, जो इससे पहले "आवारगी का रक्स" गा चुकी हैं हमारे लिए. तो एक बार सूफियाना रंग में रंग जाईये, और डूब जाईये इस ताज़ा गीत के नशे में.

गीत के बोल -


इश्क़.. इश्क़
मौला का करम
इश्क़... इश्क़
आशिक का धरम

हम कहीं जाने वाले हैं दामन-ए-इश्क़ छोड़कर,
ज़ीस्त तेरे हुज़ूर में, मौत तेरे दयार में.....

हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही
हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही

हम ने जिगर की
बातें सुनी हैं
मीलों आँखें रखके
रातें सुनी हैं
एक हीं जिकर है
सब की जुबां पे
साँसें सारी जड़ दे
शाहे-खुबां पे

सालों ढूँढा खुद में जो रेहां
हमने पाया तुझमें वो निहां..

खुल्द पूरा हीं वार दें, हम तो तेरे क़रार पे....

हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही...
हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही...

मोहब्बत काबा-काशी
मोहब्बत कासा-कलगी
मोहब्बत सूफ़ी- साकी,
मोहब्बत हर्फ़े-हस्ती..

एक तेरे इश्क़ में डूबकर हमें मौत की कमी न थी,
पर जी गए तुझे देखकर, हमें ज़िंदगी अच्छी लगी।



मेकिंग ऑफ़ "हुस्न-ए-इलाही" - गीत की टीम द्वारा

श्रीराम: मैं सूफ़ी गानों का हमेशा से हीं प्रशंसक रहा हूँ, इसलिए जब ऋषि ने मुझसे यह पूछा कि क्या मैं "हुस्न-ए-इलाही" गाना चाहूँगा, तो मैंने बिना कुछ सोचे फटाफट हाँ कह दिया। इस गाने की धुन और बोल इतने खूबसूरत हैं कि पहली मर्तबा सुनने पर हीं मैं इसका आदी हो चुका था। गाने की धुन साधारण लग सकती है, लेकिन गायक के लिए इसमें भी कई सारे रोचक चैलेंजेज थे/हैं। ऋषि चाहते थे कि कि "सालों ढूँढा खुद में जो रेहां" पंक्ति को एक हीं साँस में गाया जाए। अब चूँकि यह पंक्ति बड़ी हीं खूबसूरत है तो मुझे हर लफ़्ज़ में जरूरी इमोशन्स और एक्सप्रेसन्स भी डालने थे और बिना साँस तोड़े हुए (जो कि असल में टूटी भी) यह करना लगभग नामुमकिन था। मैं उम्मीद करता हूँ कि मैंने इस पंक्ति के साथ पूरा न्याय किया होगा। इस गाने में कुछ शब्द ऐसे भी हैं, जिन्हें पूरे जोश में गाया जाना था और साथ हीं साथ गाने की स्मूथनेस भी बरकरार रखनी थी, इसलिए आवाज़ के ऊपर पूरा नियंत्रण रखना जरूरी हो गया था। विशेषकर गाने की पहली पंक्ति, जो हाई-पिच पर है.. इसे ऋषि ने गाने में तब जोड़ा जब पूरे गाने की रिकार्डिंग हो चुकी थी। चूँकि यह मेरा पहला ओरिजिनल है, इसलिए मेरी पूरी कोशिश थी कि यह गाना वैसा हीं बनकर निकले, जैसा ऋषि चाहते थे। मैं यह कहना चाहूँगा कि इसे गाने का मेरा अनुभव शानदार रहा। साथ हीं मैं श्रीविद्या की तारीफ़ करना चाहूँगा। उनकी मधुर मेलोडियस आवाज़ ने इस गाने में चार चाँद लगा दिए हैं। और अंत में मैं ऋषि और विश्व दीपक को इस खूबसूरत गाने के लिए बधाई देना चाहूँगा।

श्रीविद्या:मेर हिसाब से हर गीत कुछ न कुछ आपको सिखा जाता है. इस गीत में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया इसकी धुन ने जो सूफी अंदाज़ की गायिकी मांगती है. हालाँकि मेरा रोल गीत में बेहद कम है पर फिर भी मैं खुश हूँ कि मैं इस गीत का हिस्सा हूँ. ये ऋषि के साथ मेरा दूसरा प्रोजेक्ट है और मुझे ख़ुशी है विश्व दीपक और श्रीराम जैसे पतिभाशाली कलाकारों के साथ ऋषि ने मुझे इस गीत के माध्यम से काम करने का मौका दिया

ऋषि एस: "हुस्न-ए-इलाही" गाने का मुखड़ा "जिगर मुरादाबादी" का है.. मेरे हिसाब से मुखड़ा जितना खूबसूरत है, उतनी हीं खूबसूरती से वी डी जी ने इसके आस-पास शब्द डाले हैं और अंतरा लिखा है। आजकल की तकनीकी ध्वनियों (टेक्नो साउंड्स) के बीच मुझे लगा कि एक पारंपरिक तबला, ढोलक , डफ़्फ़ वाला गाना होना चाहिए, और यही ख्याल में रखकर मैंने इस गाने को संगीतबद्ध किया है। मुंबई के श्रीराम का यह पहला ओरिज़िनल गाना है। उन्होंने इस गाने के लिए काफ़ी मेहनत की है और अपने धैर्य का भी परिचय दिया है। मैंने उनसे इस गाने के कई सारे ड्राफ़्ट्स करवाए, लेकिन वे कभी भी मजबूरी बताकर पीछे नहीं हटे। उनकी यह मेहनत इस गाने में खुलकर झलकती है। आउटपुट कैसा रहा, यह तो आप गाना सुनकर हीं जान पाएँगें। इस गाने में फीमेल लाइन्स बहुत हीं कम हैं, फिर भी श्रीविद्या जी ने अपनी आवाज़ देकर गाने की खूबसूरती बढा दी है। इस गाने को साकार करने के लिए मैं पूरी टीम का तह-ए-दिल से आभारी हूँ।

विश्व दीपक: आवाज़ पर महफ़िल-ए-ग़ज़ल लिखते-लिखते न जाने मैंने कितना कुछ जाना, कितना कुछ सीखा और कितना कुछ पाया.. यह गाना भी उसी महफ़िल-ए-ग़ज़ल की देन है। जिगर मुरादाबादी पर महफ़िल सजाने के लिए मैंने उनकी कितनी ग़ज़लें खंगाल डाली थी, उसी दौरान एक शेर पर मेरी नज़र गई। शेर अच्छा लगा तो मैंने उसे अपना स्टेटस मैसेज बना लिया। अब इत्तेफ़ाक देखिए कि उस शेर पर ऋषि जी की नज़र गई और उन्होंने उस शेर को मेरा शेर समझकर एक गाने का मुखरा गढ डाला। आगे की कहानी यह सूफ़ियाना नज़्म है| जहाँ तक इस नज़्म में गायिकी की बात है, तो पहले हम इसे पुरूष एकल (मेल सिंगल) हीं बनाना चाहते थे, लेकिन हमें सही मेल सिंगर मिल नहीं रहा था। हमने यह गाना श्रीराम से पहले और दो लोगों को दिया था। एक ने पूरा रिकार्ड कर भेज भी दिया, लेकिन हमें उसकी गायिकी में कुछ कमी-सी लगी। तब तक हमारा काफ़ी समय जा चुका था। ऋषि इस गाने को जल्द हीं रिकार्ड करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मुझसे पूछा कि हमारे पास फीमेल सिंगर्स हैं, क्या हम इसे फीमेल सॉंग बना सकते हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन ऋषि को हीं लगा कि गाने का मूड और गाने का थीम मेल सिंगर को ज्यादा सूट करता है। इस मुद्दे पर सोच-विचार करने के बाद आखिरकार हमने इसे दो-गाना (डुएट) बनाने का निर्णय लिया। श्रीविद्या ने अपनी रिकार्डिंग हमें लगभग एक महीने पहले हीं भेज दी थी। उनकी मीठी आवाज़ में आलाप और "इश्क़ इश्क़" सुनकर हमें अपना गाना सफल होता दिखने लगा। लेकिन गाना तभी पूरा हो सकता था, जब हमें एक सही मेल सिंगर मिल जाता। इस मामले में मैं कुहू जी का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, जिन्होंने ऋषि को श्रीराम का नाम सुझाया। श्रीराम की आवाज़ में यह गाना सुन लेने के बाद हमें यह पक्का यकीन हो चला था कि गाना लोगों को पसंद आएगा। मुज़िबु पर इस गाने को लोगों ने हाथों-हाथ लिया है, आशा करता हूँ कि हमारे आवाज़ के श्रोता भी इसे उतना हीं प्यार देंगे।

श्रीराम ऐमनी
मुम्बई में जन्मे और पले-बढे श्रीराम गायन के क्षेत्र में महज़ ७ साल की उम्र से सक्रिय हैं। ये लगभग एक दशक से कर्नाटक संगीत की शिक्षा ले रहे हैं। आई०आई०टी० बम्बे से स्नातक करने के बाद इन्होंने कुछ दिनों तक एक मैनेजमेंट कंसल्टिंग कंपनी में काम किया और आज-कल नेशनल सेंटर फॉर द परफ़ोर्मिंग आर्ट्स (एन०सी०पी०ए०) में बिज़नेस डेवलपेंट मैनेज़र के तौर पर कार्यरत हैं। श्रीराम ने अपने स्कूल और आई०आई०टी० बम्बे के दिनों में कई सारे स्टेज़ परफोरमेंश दिए थे और कई सारे पुरस्कार भी जीते थे। ये आई०आई०टी० के दो सबसे बड़े म्युज़िकल नाईट्स "सुरबहार" और "स्वर संध्या" के लीड सिंगर रह चुके हैं। श्रीराम हर ज़ौनर का गाना गाना पसंद करते हैं, फिर चाहे वो शास्त्रीय रागों पर आधारित गाना हो या फिर कोई तड़कता-फड़कता बालीवुड नंबर। इनका मानना है कि कर्नाटक संगीत में ली जा रही शिक्षा के कारण हीं इनकी गायकी को आधार प्राप्त हुआ है। ये हर गायक के लिए शास्त्रीय शिक्षा जरूरी मानते हैं। हिन्द-युग्म (आवाज़) पर यह इनका पहला गाना है।

श्रीविद्या कस्तूरी
कर्णाटक संगीत की शिक्षा बचपन में ले चुकी विद्या को पुराने हिंदी फ़िल्मी गीतों का खास शौक है, ये भी मुजीबु पे सक्रिय सदस्या हैं. ये इनका दूसरा मूल हिंदी गीत है। हिन्द-युग्म पर इनकी दस्तक सजीव सारथी के लिखे और ऋषि द्वारा संगीतबद्ध गीत "आवारगी का रक्स" के साथ हुई थी।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।

Song - Husn-E-Ilaahi
Voice - Sriraam and Srividya
Music - Rishi S
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Prashen's media


Song # 16, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, June 18, 2010

खुदा के अक्स और आवारगी के रक्स के बीच कुछ दर्द भी हैं मैले मैले से

Season 3 of new Music, Song # 10

12 जून को बाल श्रम निषेध दिवस मनाया गया, पर क्या इतने भर से हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है ? श्रम करते, सड़कों पे पलते, अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित बच्चे रोज हमारी आँखों के आगे से गुजरते हैं, और हम चुपचाप किनारा कर आगे बढ़ जाते हैं. हिंद युग्म आज एक कोशिश कर रहा है, इन उपेक्षित बच्चों के दर्द को कहीं न कहीं अपने श्रोताओं के ह्रदय में उतारने की, आवाज़ संगीत महोत्सव के तीसरे सत्र के दसवें गीत के माध्यम से. इस आयोजन में हमारे साथी बने हैं संगीतकार ऋषि एस, और गीतकार सजीव सारथी. साथ ही इस गीत के माध्यम से दो गायिकाओं की भी आमद हो रही है युग्म के मंच पर. ये गायिकाएं है श्रीविध्या कस्तूरी और तारा बालाकृष्णन. हम आपको याद दिला दें कि आवाज़ के इतिहास में ये पहला महिला युगल गीत है.

गीत के बोल -



उन नन्हीं आँखों में,
देखो तो देखो न,
उन हंसीं चेहरों को,
देखो तो देखो न,
शायद खुदा का अक्स है,
आवारगी का रक्स है,
सारे जहाँ का हुस्न है,
या जिंदगी का जश्न है...
उन नन्हीं....

बेपरवाह, बेगरज,
उडती तितलियों जैसी,
हर परवाज़ आसमां को,
छूती सी उनकी,

पथरीले रास्तों पे,
लेकर कांच के सपने,
आँधियों से, पल पल,
लड़ती लौ, जिंदगी उनकी,

हँसी ठहाकों में, छुपी गीतों में,
दबी आहें भी है, कौन देखे उन्हें,
जगी रातों में, घुटी बातों में,
रुंधी सांसें भी है, कौन समझे उन्हें...

उन सूनी आँखों में,
झांको तो, झांको न,
उन नंगे पैरों तले,
देखो तो देखो न,
कुछ अनकही सी बातें हैं,
सहमी सहमी सी रातें हैं,
सारे शहर का गर्द है,
मैले मैले से दर्द हैं....
.



"आवारगी का रक्स" है मुजिबू पर भी, जहाँ श्रोताओं ने इसे खूब पसंद किया है

मेकिंग ऑफ़ "आवारगी का रक्स" - गीत की टीम द्वारा

श्रीविध्या कस्तूरी: मुझे इस गीत के बोल सबसे अधिक पसदं आये. ऐसे में इस शब्दों को गायन में व्यक्त करना मेरे हिसाब से इस प्रोजेक्ट का सबसे मुश्किल हिस्सा था मेरे लिए. पर ऋषि ने मुझे पूरे गीत का अर्थ, महत्त्व, और कहाँ मुझे कैसे गाना है आदि बहुत विस्तार से बताया, मैं उनकी शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे इस गीत का हिस्सा बनाया, मुझे आगे भी इस टीम के साथ काम करने में खुशी होगी.

तारा बालाकृष्णन: ऋषि, विध्या और सजीव के साथ इस प्रोजेक्ट में काम करना एक बेहद सुखद अनुभव रहा. ये एक बेहद खूबसूरत धुन है और उसी अनुरूप सटीक शब्द भी दिए है सजीव ने. मुझे भी सबसे अधिक इस गीत के थीम ने ही प्रभावित किया. ये अनाथ बच्चों के जीवन पर है और गीत में बहुत सी मिली जुली भावनाओं का समावेश है, मेरे लिए ये एक सीखने लायक अनुभव था, शुक्रिया ऋषि, आपने इस गीत के लिए मुझे चुना.

ऋषि एस: ये गीत लिखा गया था २००८ में, और ठीक १ साल बाद यानी २००९ में उसकी धुन बनी, और आज उसके १ साल बाद युग्म में शामिल हो रहा है ये गीत. रोमांटिक गीतों की भीड़ में कुछ अलग थीम पर काम करना बेहद उत्साहवर्धक होता है. शुक्रिया विध्या और तारा का जिन्होंने इस गीत में जान फूंकी, और शुक्रिया सजीव का जो हमेशा ही नए थीमों पर काम करने के लिए तत्पर रहते हैं.

सजीव सारथी:अपने खुद के लिखे गीतों में मेरे लिए ये गीत बेहद खास है. ये मूल रूप से एक कविता है, जिसे अपने मूल स्वरुप में स्वरबद्ध करने की कोशिश की पहले ऋषि ने, मगर नतीजा संतोषजनक न मिलने के करण हम सब दूसरे कामों में लग गए, मैं लगभग इसके बारे में भूल ही चुका था कि ऋषि ने एक दिन कविता में पंक्तियों के क्रमों में हल्की फेर बदल के साथ ये धुन पेश की, बस फिर तो ये नगमा हम सब की पहली पसंद बन गया. इसे एक महिला युगल रखने का विचार भी ऋषि का था और तारा -विध्या भी उन्हीं की खोज है, ये गीत मेरे दिल के बहुत करीब है और यदि संभव हुआ तो किसी दिन इसका एक विडियो संस्करण भी बनाऊंगा


तारा बालाकृष्णन
शास्त्रीय गायन में निपुण तारा के लिए गायन जूनून है. पिछले दस सालों से की बोर्ड भी सीख और बजा रही हैं. इन्टरनेट पर ख़ासा सक्रिय है विशेषकर मुजीबु पर, हिंद युग्म पर ये इनका पहला गीत है.

विध्या
कर्णाटक संगीत की शिक्षा बचपन में ले चुकी विध्या को पुराने हिंदी फ़िल्मी गीतों का खास शौक है, ये भी मुजीबु पे सक्रिय सदस्या हैं. ये इनका पहला मूल हिंदी गीत है, और युग्म पर भी आज इसी गीत के माध्यम से इनकी ये पहली दस्तक है

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

Song - Awargi ka raks
Voice - Tara Balakrishnan, Srividya Kasturi and Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Sajeev Sarathie
Photograph - Manuj Mehta


Song # 10, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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