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Sunday, October 14, 2018

राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 389 : RAG MEGH MALHAR




स्वरगोष्ठी – 389 में आज


पूर्वांग और उत्तरांग राग – 4 : राग मेघ मल्हार


नायिका और गायिका खुर्शीद बानो से फिल्म का एक गीत और पण्डित अजय चक्रवर्ती से राग मेघ मल्हार सुनिए




पण्डित अजय  चक्रवर्ती
खुर्शीद बानो
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हमने राग मेघ मल्हार चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम नायिका और गायिका खुर्शीद बानो के स्वर में 1942 में प्रदर्शित फिल्म “तानसेन” से राग मेघ मल्हार पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में राग मेघ मल्हार में निबद्ध एक खयाल रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपको राग मेघ मल्हार का रसास्वादन करा रहे हैं। भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बानो ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से ऋतु के विपरीत पावस का आनन्द लीजिए।

राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ : स्वर – खुर्शीद बानो : फिल्म – तानसेन


काफी थाट का राग मेघ मल्हार औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’। आप यह खयाल सुनिए और हमें  आज की इस कड़ी  को यहीं विराम  देने की अनुमति दीजिए।

राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 389वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1974 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 20 अक्तूबर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 391वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 387वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म “आँखें” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मीना कपूर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौथी कड़ी में आपने राग मेघ मल्हार का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में राग का यथार्थ स्वरूप का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग में पिरोया संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश द्वारा स्वरबद्ध फिल्म “तानसेन” का गीत खुर्शीद बानो से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 389 : RAG MEGH MALHAR : 14 अक्तूबर, 2018

Sunday, November 19, 2017

ठुमरी हेमन्त : SWARGOSHTHI – 344 : THUMARI HEMANT




स्वरगोष्ठी – 344 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 1 : ठुमरी हेमन्त

विरह व्यथा की अभिव्यक्ति के लिए चाँद-दूत की परिकल्पना – “चन्दा देश पिया के जा...”




अमीरबाई कर्नाटकी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की फिल्मों में शामिल ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हमने आपके लिए 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” से एक फिल्मी ठुमरी का चयन किया है। इस ठुमरीनुमा गीत को पण्डित इन्द्र ने लिखा है, संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश ने इसे राग हेमन्त के स्वर में बाँधा है और इसे गायिका-अभिनेत्री अमीरबाई कर्नाटकी ने गाया है।


ठुमरी गीतों में “रस निष्पत्ति” एक प्रमुख तत्व होता है। नौ रसों में “श्रृंगार रस” ठुमरी गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। श्रृंगार रस के दो पक्ष; संयोग और वियोग होते हैं। आज के ठुमरी गीत में श्रृंगार रस के वियोग पक्ष को रेखांकित किया गया है। नायिका अपनी विरह-व्यथा को नायक तक पहुँचाने के लिए वही मार्ग अपनाती है, जैसा कालिदास के "मेघदूत" में अपनाया गया है। "मेघदूत" का यक्ष जहाँ अपनी विरह वेदना की अभिव्यक्ति के लिए मेघ को सन्देश-वाहक बनाता है, वहीं आज के ठुमरी गीत की नायिका अपनी विरह व्यथा की अभिव्यक्ति के लिए चाँद को दूत बनने का अनुरोध कर रही है।

ठुमरी एक भाव-प्रधान, चपल-चाल वाला गीत है। मुख्यतः यह श्रृंगार प्रधान गीत है; जिसमें लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का श्रृंगार मौजूद होता है। इसीलिए ठुमरी में लोकगीत जैसी कोमल शब्दावली और अपेक्षाकृत हलके रागों का ही प्रयोग होता है। अधिकतर ठुमरियों के बोल अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रज भाषा में होते हैं। नृत्य में प्रयोग की जाने वाली अधिकतर ठुमरी कृष्णलीला प्रधान होती हैं। शान्त, गम्भीर अथवा वैराग्य भावों की सृष्टि करने वाले रागों के बजाय चंचल रागों; जैसे पीलू, काफी, जोगिया, खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, गारा, पहाड़ी, तिलंग आदि में ठुमरी गीतों को निबद्ध किया जाता है। सम्भवतः हलके या कोमल रागों में निबद्ध होने के कारण ही पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपनी पुस्तक "क्रमिक पुस्तक मालिका" में ठुमरी को "क्षुद्र गायन शैली" कहा है। आज की ठुमरी में राग हेमन्त की झलक है। ठुमरी गायन में त्रिताल, चाँचर, दीपचन्दी, जत, दादरा, कहरवा आदि तालों का प्रयोग होता है।

आपके लिए आज हमने जो ठुमरी गीत चुना है; वह 1944 की फिल्म "भर्तृहरि" से है। यह फिल्म उत्तर भारत में बहुप्रचलित 'लोकगाथा' पर आधारित है। इस लोकगाथा के नायक ईसापूर्व पहली शताब्दी में उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के राजा भर्तृहरि हैं। यह लोकगाथा भी फिल्म निर्माताओं का प्रिय विषय रहा है। इस लोकगाथा पर पहली बार 1922 में मूक फिल्म बनी थी। इसके बाद 1932, 1944 और 1954 में हिन्दी में तथा 1973 में गुजराती में भी इस लोकगाथा पर फ़िल्में बन चुकी हैं। 1944 में बनी फिल्म "भर्तृहरि" की नायिका सुप्रसिद्ध अभिनेत्री मुमताज शान्ति थीं और इस फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे; जिन्होंने उस समय तेजी से उभर रहीं पार्श्वगायिका अमीरबाई कर्नाटकी को इस ठुमरी गीत को गाने के लिए चुना। 1906 में बीजापुर, कर्नाटक में जन्मीं अमीरबाई कर्नाटकी ने 1934 में अपनी बड़ी बहन और प्रसिद्ध अभिनेत्री गौहरबाई के सहयोग से फिल्मों में प्रवेश किया था। इसी वर्ष उन्हें पहली बार फिल्म "विष्णुभक्ति" में अभिनय करने का अवसर मिला। 1934 से 1943 के बीच अमीरबाई ने अभिनय और गायन के क्षेत्र में कड़ा संघर्ष किया। अन्ततः 1943 में उनकी किस्मत तब खुली जब उन्हें 'बोम्बे टाकीज' की फिल्म "किस्मत" में गाने का अवसर मिला। इस फिल्म के गीतों से अमीरबाई को खूब प्रसिद्धि मिली। उन्हें प्रसिद्ध करने में फिल्म के संगीतकार अनिल विश्वास का बहुत बड़ा योगदान था। अमीरबाई कर्नाटकी ने फिल्मों में अभिनय और पार्श्वगायन के अलावा संगीत निर्देशन भी किया था। 1948 में बहाव पिक्चर्स की सफल फिल्म "शाहनाज़" में अमीरबाई ने संगीत निर्देशन किया था। अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में जो ठुमरी गीत हम आपके लिए प्रस्तुत करने जा रहे हैं; वह ऋतु प्रधान राग "हेमन्त" और कहरवा ताल में निबद्ध है। राग हेमन्त पूर्वी थाट का राग है। इस राग के आरोह में पाँच और अवरोह में सात प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग होता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम है। यह ऋतु प्रधान राग होता है, अतः हेमन्त ऋतु में किसी भी समय और अन्य समय में सूर्यास्त के समय (सन्धिप्रकाश के समय) गाया-बजाया जा सकता है। इस राग में श्रृंगार का विरह पक्ष और तड़प का भाव खूब उभरता है। गायिका अमीरबाई कर्नाटकी ने नायिका की विरह-व्यथा को अपने स्वरों के माध्यम से किस खूबी से अभिव्यक्त किया है; यह आप यह ठुमरी गीत सुन कर सहज ही अनुभव कर सकते हैं। यह परम्परागत ठुमरी नहीं है; इसके गीतकार हैं पं. इन्द्र; जिनकी 'चाँद-दूत' परिकल्पना को अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों ने सार्थक किया है।


राग हेमन्त : “चन्दा देश पिया के जा...” : अमीरबाई कर्नाटकी : फिल्म – भर्तृहरि





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 344वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1947 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म से एक ठुमरीनुमा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 25 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 346वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 342वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – विदुषी गिरिजा देवी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की पहली कड़ी में आपने 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” के ठुमरीनुमा गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे जिसमें ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग हेमन्त की छाया है। इस नई श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर भी चर्चा करेंगे तथा सम्बन्धित रागों तथा इस संगीत शैली पर आधारित रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, July 16, 2017

राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 326 : RAG MEGH MALHAR




स्वरगोष्ठी – 326 में आज

पावस ऋतु के राग – 1 : आषाढ़ के पहले मेघ का स्वागत

“गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...”





पं. अजय चक्रवर्ती
खुर्शीद बानो
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” आरम्भ हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम राग मेघ मल्हार की चर्चा कर रहे हैं। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। इस राग में आज हम आपको सबसे पहले राग मेघ मल्हार के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से खुर्शीद बानो का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं। इसके साथ ही राग का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ : स्वर – खुर्शीद बानो : फिल्म – तानसेन
राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 326वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग सात दशक पूर्व प्रदर्शित पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह गीत किस पार्श्वगायक की आवाज़ में है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 22 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 328वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 324 वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दादी माँ’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – मन्ना डे और महेन्द्र कपूर।

इस अंक की पहेली में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी तथा तीन में से एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है - छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश से नन्दलाल सिंह रघुवंशी ने। आशा है कि अन्य पाठक भी नियमित रूप से ‘स्वरगोष्ठी’ देखते रहेंगे और पहेली में भाग लेते रहेंगे। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से नई श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” का शुभारम्भ हो रहा है। इस श्रृंखला ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जाएगा। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग मेघ मल्हार पर चर्चा की। हमारी पिछली श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ पर हमारे कुछ पाठकों ने टिप्पणी की है। यहाँ मैं इन टिप्पणियों का उल्लेख कर रहा हूँ।

दूरदर्शन की सुपरिचित समाचार वाचिका निर्मला कुमारी लिखती हैं – “कृष्णमोहनजी नमस्कार। संगीतकार रोशन के बारे में रोचक जानकारियों से परिपूर्ण आपके इस सुन्दर आलेख के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई। आज के युग में संगीत की जानकारी रखने वाले सच्चे समीक्षक शायद उँगलियों पर गिनाये जा सकते हैं। भविष्य में भी आपके आलेखों की प्रतीक्षा रहेगी।" 

इसी प्रकार अनुभवी नाटककार और रंगकर्मी सुल्तान अहमद रिजवी ने लिखा है – “मिश्र जी बहुत ज़िम्मेदारी से आप यह पुनीत कार्य कर रहे हैं। मैने अपनॆ परिवार में यह पाया कि आप की पोस्ट पढ़ कर बच्चे आलोच्य गानो को सुन रहे है। यह उपकार है नयी पीढी पर आपका। आपको साधुवाद।“

आगामी अंक में हम मल्हार अंग के प्रमुख राग ‘मियाँ मल्हार’ पर चर्चा करेंगे और इस राग में निबद्ध कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन  
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Saturday, October 22, 2016

"पिया मिलन को जाना...", जानिये कि कैसे नृत्य के बोल रूपान्तरित हो गए एक गीत में


एक गीत सौ कहानियाँ - 96
 

'पिया मिलन को जाना...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 96-वीं कड़ी में आज जानिए 1939 की फ़िल्म ’कपालकुंडला’ के प्रसिद्ध गीत "पिया मिलन को जाना..." के बारे में जिसे पंकज मल्लिक ने गाया था। गीत लिखा है आरज़ू लखनवी ने और संगीत दिया है पंकज मल्लिक ने। 

बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित एक प्रसिद्ध उपन्यास है ’कपालकुंडला’
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय
जो 1866 में प्रकाशित हुई थी। यह जंगलों, तान्त्रिकों और ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी लड़की कपालकुंडला की कहानी है जिसे एक शहरी लड़के नबकुमार से प्रेम हो जाता है। परन्तु नबकुमार से विवाह के पश्चात कपालकुंडला शहरी जीवन को अपना नहीं पाती। ’कपालकुंडला’ बंकिम चन्द्र के श्रेष्ठ कृतियों में से एक है जिसका अंग्रेज़ी, हिन्दी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, संस्कृत और जर्मन भाषाओं में अनुवाद हुआ है। बांगला थिएटर के अग्रदूतों में से एक गिरिश चन्द्र घोष, तथा अतुल कृष्ण मित्र ने इस उपन्यास का नाटक-रूपान्तर किया। 1874 में बंकिम चन्द्र के एक आत्मीय दामोदर मुखोपाध्याय ने ’कपालकुंडला’ उत्तर-कृति (sequel) लिखा ’मृनमयी’ के शीर्षक से। ’कपालकुंडला’ का फ़िल्म रूपान्तर एकाधिक बार हुआ है। सबसे पहली बार प्रियनाथ गांगुली के निर्देशन में 1929 में मूक फ़िल्म बनी थी ’कपालकुंडला’; इसके बाद 1933 में प्रेमांकुर अतुर्थी ने इस उपन्यास पर बांगला सवाक फ़िल्म बनाई। इसके बाद आई 1939 की हिन्दी फ़िल्म ’कपालकुंडला’ जिसे नितिन बोस और फणी मजुमदार ने निर्देशित किया। बांगला में यह फ़िल्म दो बार और बनी - 1952 में अर्धेन्दु बनर्जी के निर्देशन में और 1981 में पिनाकी भूषण मुखर्जी के निर्देशन में। 1939 की हिन्दी फ़िल्म में पंकज मल्लिक का गाया "पिया मिलन को जाना" गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। इसे फ़िल्म-संगीत इतिहास का एक ट्रेण्डसेटर गीत भी माना जाता रहा है। शास्त्रीय संगीत और पाश्चात्य ऑरकेस्ट्रेशन के संगम से उत्पन्न एक हल्का-फुल्का गीत, जिसकी विशेषताएँ आगे चल कर फ़िल्म-संगीत की धारा बन गई।



दूरदर्शन के बांगला चैनल DD-7 पर बरसों पुराना रेकॉर्ड किया हुआ पंकज मल्लिक का एक बांगला में श्याम-
"पिया मिलन को जाना" गीत के दृश्य; बायीं ओर पंकज मल्लिक
श्वेत साक्षात्कार प्रसारित हुआ था जिसमें उन्होंने इस गीत के बनने की कहानी बताई थी। उसी बांगला में बताये कहानी का हिन्दी अनुवाद ये रहा - "पिया मिलन को जाना, इसके बनने की कहानी आपको शायद मालूम न हो, यह एक आश्चर्यजनक घटना थी। खेमचन्द प्रकाश जी, जिन्होंने बम्बई में ’तानसेन’ फ़िल्म की थी, खेमचन्द प्रकाश का असली परिचय था एक कोरियोग्राफ़र का। बहुत ही बेहतरीन नृत्य शिक्षक। बहुत ही बेहतरीन! और ख़ास तौर से कथक नृत्य में तो उनके जैसा कोई नहीं। ’कपालकुंडला’ में वो कोरिओग्राफ़र थे। उन्होंने कथक नृत्य का एक बोल अभिनेत्री कमलेश कुमारी को सिखाया था एक सीन के लिए। और ख़ुद तबला बजाना जानते थे, तो उन कथक के बोलों पर तबला बजा कर, कि नृत्य के बोल भी गा रहे हैं, तबले पर ताल भी पड़ रहे हैं, और कमलेश कुमारी नाच रही हैं, कुछ इस तरह का सीन था। तब मैंने खेमचन्द जी को कहा, खेमचन्द जी ’कपालकुंडला’ में मेरे सहयोगी थे, नहीं सहयोगी नहीं, सहकारी थे। ख़ैर, मैंने उनसे कहा कि अगर इस नृत्य के बोल के उपर एक गीत तैयार हो जाए तो कैसा हो? तब निर्देशक नितिन बोस जी बोले कि फिर तो बहुत ही अच्छी बात होगी! गाना तैयार हो सकता है क्या? मैंने कहा कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है, कोशिश करके देखते हैं। तब आरज़ू साहब लखनवी, जो कवि थे, उनसे पूछा गया कि क्या नृत्य के इन बोलों और तबले के इन तालों पर किसी गीत की रचना हो सकती है भला? मुझे वो ताल याद नहीं है, हाँ, फ़लाना फ़लाना राधा, पिया मिलन को जाना। तो "राधा" बन गया "जाना"। इस तरह से कथक नृत्य के बोलों को एक फ़िल्मी गीत के रूप में रूपान्तरित कर दिया गया था।" 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, July 31, 2016

राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 280 : RAG MEGH MALHAR




स्वरगोष्ठी – 280 में आज

पावस ऋतु के राग – 1 : आषाढ़ के पहले मेघ का स्वागत

“बरसो रे काले बादरवा हिया में बरसो...”



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” आरम्भ हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम राग मेघ मल्हार की चर्चा करेंगे। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। इस राग में आज हम आपको सबसे पहले राग मेघ मल्हार के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से खुर्शीद बेगम का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं। इसके साथ ही राग का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।


जकल हम सब प्रकृति के अनूठे वरदान पावस ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। हमारे चारो ओर के परिवेश ने हरियाली की चादर ओढ़ने की पूरी तैयारी कर ली है। तप्त-शुष्क भूमि पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर चारो ओर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है। ऐसे ही मनभावन परिवेश का सृजन करने के लिए और हमारे उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए आकाश में कारे-कजरारे मेघ उमड़-घुमड़ रहे हैं। भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ, बसन्त और पावस हैं। पावस ऋतु में मल्हार अंग के रागों का गायन-वादन अत्यन्त सुखदायी होता है। वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपको राग मेघ मल्हार का रसास्वादन करा रहे हैं। भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बेगम ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से पावस का आनन्द लीजिए।


राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ फिल्म – तानसेन : स्वर – खुर्शीद बेगम


काफी थाट का राग मेघ मल्हार औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’


राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में कण्ठ-स्वर को पहचानिए और हमे इस गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 6 अगस्त, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 282वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 278 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – अल्हैया बिलावल, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – तीनताल, सितारखानी और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- स्वर – मन्ना डे

इस बार की पहेली में छः प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। इस अंक से हमारे एक नये साथी भूपेन्द्र भी जुड़े हैं। हम उनका स्वागत करते हैं। पहेली का सही उत्तर देने वाले अन्य प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ आरम्भ हो रही है। आज के अंक में आपने राग मेघ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के अगले अंक में हम पावस ऋतु के एक अन्य राग का परिचय प्राप्त करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव हमे भेज सकते हैं। श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 


Sunday, June 21, 2015

मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 224 : MEGH MALHAR



स्वरगोष्ठी – 224 में आज

रंग मल्हार के – 1 : राग मेघ मल्हार

आषाढ़ के प्रथम मेघ का प्रतिनिधि - राग मेघ मल्हार

‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’, आरम्भ हो रही है। श्रृंखला के पहले अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम राग मेघ मल्हार की चर्चा करेंगे। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। इस राग में आज हम आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना और इसी राग के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से खुर्शीद बेगम का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं।

स वर्ष कुछ विलम्ब से ही सही आजकल हम सब प्रकृति के अद्भुत वरदान पावस ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। हमारे चारो ओर के परिवेश ने हरियाली की चादर ओढ़ने की पूरी तैयारी कर ली है। तप्त-शुष्क भूमि पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर चारो ओर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है। ऐसे ही मनभावन परिवेश का सृजन करने के लिए और हमारे उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए आकाश में कारे-कजरारे मेघ उमड़-घुमड़ रहे हैं। भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ, बसन्त और पावस हैं। पावस ऋतु में मल्हार अंग के रागों का गायन-वादन अत्यन्त सुखदायी होता है। वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। काफी थाट का यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’।


राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती




भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में चित्रित किया है। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बेगम ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से पावस का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ फिल्म – तानसेन : स्वर – खुर्शीद बेगम





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 224वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सुप्रसिद्ध उस्ताद गायक की आवाज़ में प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 27 जून, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 226वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 222 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित राजन मिश्र। इस बार पहेली में हमारी एक नई श्रोता-पाठक, गोरखपुर से पूजा पाण्डेय ने पहली बार प्रतियोगिता में भाग लिया और एक प्रश्न का सही उत्तर दिया। पूजा जी का स्वागत करते हुए उन्हें एक अंक दिया जाता है। अन्य नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, रायपुर, छत्तीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने दिया है।सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ का आज से शुभारम्भ हुआ है। आज के अंक में आपने राग मेघ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के आगामी अंकों में हम आपको मल्हार अंग के अन्य रागों को सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी पिछली श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, January 25, 2015

राग भूपाली और कल्याण में ध्रुपद गीत : SWARGOSHTHI – 204 : DHRUPAD BANDISH



स्वरगोष्ठी – 204 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 2

गुण्डेचा बन्धुओं और सहगल से सुनिए ध्रुपद के निबद्ध गीत



 


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र नई लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैली परिचय’ की दूसरी कड़ी मे हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की मौजूदा शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद शैली के परिचय से श्रृंखला की शुरुआत की थी और इस कड़ी में आपको ध्रुपद आलाप से परिचित कराया था। आज के अंक में हम आपके लिए ध्रुपद शैली में निबद्ध गीत अर्थात ध्रुपद बन्दिश का रसास्वादन कराएंगे। सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धु राग भूपाली में निबद्ध बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा विख्यात गायक कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद के आलाप में राग के स्वरों का बिना लय के क्रमशः विस्तार किया जाता है। विलम्बित से आरम्भ करते हुए क्रमशः द्रुत गति की ओर बढ़ते जाते हैं। आलाप का यह भाग वीणा के आलाप, जोड़ और अन्त में झाला की भाँति की जाती है। कुशल गायक इसी भाग में रागानुकूल भाव और रस की सृष्टि करने में समर्थ होते हैं। द्रुत लय में आलाप के सम्पन्न होने के बाद बारी आती है, बन्दिश की। इस भाग में एक पद रचना को राग के स्वरों में ढाल कर विलम्बित मध्य लय में प्रस्तुत किया जाता है। स्वरों से उपजने वाले रस और भाव को जब साहित्य का आश्रय मिल जाता है तब प्रस्तुति का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है। बन्दिश का स्थायी स्थापित करने के बाद कलासाधक अपनी लयकारी का पक्ष प्रदर्शित करते हैं। यह लयकारी दुगुन, तिगुन। चौगुन, से लेकर अठगुन और आड़, कुवाड़ सहित अनेक क्लिष्ट लय में की जाती है। इस क्रिया में विभिन्न मात्राओं से आरम्भ करके सीधी या तिहाई के साथ लयकारी की जाती है। यह प्रदर्शन कलाकार अपनी क्षमता, प्रतिभा और रियाज़ के बल पर करते हैं। बन्दिश के अगले भाग में उपज का काम किया जाता है। इस भाग में रचना के शब्दों को विभिन्न प्रकार के बोलबाँट से सुसज्जित करते हुए प्रदर्शित किया जाता है। उपज बोलबाँट का कलात्मक कार्य श्रोताओं के लिए आनन्ददायक होता है। इस प्रकार स्वर, लय, ताल और पद के साहित्य के समन्वय से ध्रुपद बन्दिश की संरचना की जाती है। गायन के दौरान ताल देने के लिए पखावज की संगति की जाती है। आम तौर पर ध्रुपद रचनाएँ चौताल, तीव्रा, सूल, धमार आदि तालों में गायी जाती है। समर्थ कलासाधक लम्बी मात्राओं के क्लिष्ट ताल, जैसे- ब्रह्म, रुद्र, लक्ष्मी, मत्त, शेष आदि तालों में भी गायन प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान ध्रुपद गायकी के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं युगल गायक गुण्डेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा), जिन्हें संगीत की शिक्षा विख्यात साधक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर और रुद्रवीणा के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर से प्राप्त हुई। ध्रुपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से आज सुनिए, राग भूपाली, सूल ताल में निबद्ध एक ध्रुपद रचना।


राग भूपाली ध्रुपद : ‘शंकरसुत गणेश विघ्नविनाशन गौरीनन्दन...’ : गुण्डेचा बन्धु : सूल ताल




फिल्मों में ध्रुपद संगीत का उपयोग लगभग नहीं के बराबर मिलता है। काफी छानबीन के बाद 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ का एक गीत उपलब्ध हुआ है, जो ध्रुपद शैली के अनुकूल है। यह फिल्म बादशाह अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन के जीवन पर आधारित थी। तानसेन के जीवन के बारे में उपलब्ध कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ किंवदन्तियों के आधार पर रचे गए फिल्म के कथानक पर फिल्म का निर्माण किया गया था। प्रमुख भूमिकाओं में कुन्दनलाल सहगल और खुर्शीद प्रस्तुत किये गए थे। नायक और नायिका दोनों ही अभिनय के साथ-साथ गायन में भी कुशल थे। चूँकि यह फिल्म एक महान संगीतज्ञ के जीवन पर केन्द्रित थी, अतः फिल्म के सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश ने इन्हीं गीतों में एक गीत ध्रुपद शैली के अनुकूल रखा था। ऐसी मान्यता है कि तानसेन अपने समय की ध्रुपद गायकी में सर्वश्रेष्ठ थे। कुन्दनलाल सहगल के गाये इस गीत में परम्परागत भारतीय संगीत की कुछ विशेषताओ को इंगित किया गया है। ऐसी मान्यता है कि ध्रुपद अंग का यह गीत तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास की रचना है। यह अनूठा गीत राग कल्याण और ताल चौताल में निबद्ध किया गया है। आप फिल्म ‘तानसेन’ का यह ध्रुपद गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग कल्याण ध्रुपद : ‘सप्तसुरन तीन ग्राम गाओ सब गुणीजन...’ : कुन्दनलाल सहगल : चौताल





संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 204वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ध्रुपद अंग के ही एक गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।
 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 31 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 202वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको ध्रुपद अंग में पण्डित उदय भवालकर द्वारा प्रस्तुत आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ध्रुपद शैली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पखावज अथवा मृदंग। वाद्य शहनाई और सितार। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी नई लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


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