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गुरुवार, 1 मार्च 2018

होली विशेष:: श्रीदेवी पर फ़िल्माया संभवत: एकमात्र होली गीत


होली विशेष: श्रीदेवी पर फ़िल्माया एकमात्र होली गीत


"होली आयी रे, आयी रे, रंग बरसे.."





’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! आप सभी को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

इस अवसर पर अभिनेत्री श्रीदेवी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आइए सुनें उन पर फ़िल्माया हुआ सम्भवत: एकमात्र होली गीत। यह गीत है 1979 की फ़िल्म ’सोलवाँ सावन’ का, जो श्रीदेवी की बतौर नायिका पहली हिन्दी फ़िल्म रही। इस गीत को गाया है वाणी जयराम और साथियों ने, गीत लिखा है नक्श ल्यालपुरी ने, और संगीतबद्ध किया है जयदेव ने।




प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 28 जनवरी 2017

चित्रकथा - 4: आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


अंक - 4

आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा..



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीतकार थे जो शुरु से लेकर अन्त तक अपने उसूलों पर चले, और किसी के भी लिए उन्होंने अपना सर नीचे नहीं झुकाया, फिर चाहे उनकी हाथ से फ़िल्म चली जाए या गायक-गायिकाएँ मुंह मोड़ ले। करीयर के शुरुआती दिनों में ही एक ग़लतफ़हमी की वजह से लता मंगेशकर के साथ जो अन-बन हुई थी, उसके चलते नय्यर साहब ने कभी लता जी के साथ सुलह नहीं किया। और अपने करीयर के अन्तिम चरण में अपनी चहेती गायिका आशा भोसले से भी उन्होंने सारे संबंध तोड़ दिए। आइए आज हम नज़र डाले उन पार्श्वगायिकाओं पर जिनकी आवाज़ का ओ. पी. नय्यर ने अपने गीतों में इस्तमाल किया आशा भोसले से संबंध समाप्त होने के बाद।



संगीतकार ओ. पी. नय्यर की शख़्सियत के बारे में हम सभी जानते हैं। जब दूसरे सभी संगीतकार लता
मंगेशकर से अपने गीत गवाने के लिए व्याकुल थे, तब उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वो लता से कभी नहीं गवाएँगे। राजकुमारी, शम्शाद बेगम और गीता दत्त से अपनी शुरुआती फ़िल्मों के गीत गवाने के बाद नय्यर साहब को मिली आशा भोसले। आशा जी और नय्यर साहब की जोड़ी कमाल की जोड़ी बनी। एक से एक सुपर-डुपर हिट गीत बनते चले गए। लेकिन यह जोड़ी भी टिक नहीं सकी। 70 के दशक के आते आते संगीतकारों की नई पीढ़ी ने फ़िल्म-संगीत जगत में तहल्का मचाना शुरु कर दिया था। कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और राहुल देव बर्मन सर्वोच्च शिखर पर पहुँच चुके थे। ऐसे में शंकर जयकिशन, ओ. पी. नय्यर, रवि, चित्रगुप्त आदि संगीतकारों का करीअर ढलान पर आ गया। उधर ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले के बीच भी अन-बन शुरु हुई। और कहा जाता है कि जब एक दिन नय्यर साहब ने आशा जी की बेटी वर्षा पर हाथ उठाने की हिमाकत की, उस दिन आशा ने ओ. पी. नय्यर के साथ किसी भी तरह के संबंध में पूर्ण-विराम लगा दिया। उन दिनों ’प्राण जाए पर वचन ना जाए’ फ़िल्म रिलीज़ होने ही वाली थी और इसका "चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया" गीत बेहद लोकप्रिय होने लगा था। ऐसे में आशा जी ने निर्माता-निर्देशक से कह कर इस गीत को फ़िल्म से हटवा दिया। और जब इसी फ़िल्म के लिए नय्यर साहब को इस वर्ष का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिला, तब घर लौटते वक़्त गाड़ी का शीशा उतार कर यह पुरस्कार उन्होंने बाहर फेंक दिया। नय्यर और आशा का रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो गया।

इस घटना के समय नय्यर और आशा एक और फ़िल्म में साथ में काम कर रहे थे। फ़िल्म थी ’टैक्सी
Krishna Kalle
ड्राइवर’। 1973 में प्रदर्शित इस फ़िल्म में तब तक आशा भोसले की आवाज़ में कई गीत रेकॉर्ड हो चुके थे, बस एक गीत रेकॉर्ड होना बाक़ी था। आशा जी से संबंध समाप्त होने के बाद यह आख़िरी गीत नय्यर साहब ने कृष्णा कल्ले से गवाने का निर्णय लिया। गीत के बोल थे "प्यार करते हो यार, करके डरते हो यार"। गीत क्लब-कैबरे जौनर का गीत है। यूं तो कृष्णा कल्ले ने इस गीत को बहुत अच्छा गाया है, पर आशा-नय्यर का वह जादू नहीं चल पाया। कुछ-कुछ इसी तरह के भाव पर आधारित आशा-नय्यर का एक मास्टरपीस गीत रहा है फ़िल्म ’मेरे सनम’ का "ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अन्धेरा ना घबराइए"। वह असर नय्यर साहब ’टैक्सी ड्राइवर’ के इस गीत में पैदा नहीं कर सके। गायिका कृष्णा कल्ले ने 60 और 70 के दशकों में बहुत से फ़िल्मी गीत गाए, पर उनमें से अधिकतर कम बजट की फ़िल्मों के गीत होने की वजह से ज़्यादा चल नहीं पाए। रफ़ी साहब के साथ उनका गाया 1967 की फ़िल्म ’राज़’ का गीत "सोचता हूँ के तुम्हें मैंने कहीं देखा है" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। मराठी और कन्नड़ फ़िल्मों में भी उन्होंने कई गीत गाए हैं।


’टैक्सी ड्राइवर’ के बाद ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी अगली फ़िल्म आई ’ख़ून का बदला ख़ून’। 1978
Vani Jayram
की इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने एक नहीं बल्कि तीन-तीन गायिकाओं को मौक़ा दिया अपने गीतों को गाने का। ये थीं वाणी जयराम, उत्तरा केलकर और पुष्पा पगधरे। वाणी जयराम का करीअर हिन्दी फ़िल्मों में 1971 में शुरु हुआ जब वसन्त देसाई के संगीत में फ़िल्म ’गुड्डी’ में दो गीत गा कर वो रातों रात मशहूर हो गईं। फिर नौशाद साहब ने उन्हें अपनी 1972 की फ़िल्म ’पाक़ीज़ा’ में "मोरा साजन" और 1977 की फ़िल्म ’आइना’ में आशा भोसले के साथ एक युगल गीत में गवाया। और 1978 में ओ. पी. नय्यर ने उन्हें ’ख़ून का बदला ख़ून’ की मुख्य गायिका के रूप में प्रस्तुत किया और उनसे एक या दो नहीं बल्कि फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाए। रफ़ी साहब के साथ गाया "एजी होगा क्या आगे जनाब देखना, अभी तो सवाल है जवाब देखना" क़व्वाली शैली का गीत है जिसमें नय्यर साहब का हस्ताक्षर ऑरकेस्ट्रेशन इन्टरल्युड में साफ़ सुनाई देता है, पर गीत को 70 के दशक के स्टाइल में ढालने की कोशिश की गई है। वाणी जयराम के गाए चार और गीत हैं इस फ़िल्म में; "बड़ा दुख द‍इबे पवन पुरवैया" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डालके" मुजरा शैली के गीत हैं। "तुमको दीवाना मेरी जान बनाने के लिए, एक बस एक मोहब्बत की नज़र काफ़ी है" एक क्लब नंबर है। "ज़ुल्फ़ लहराई तो सावन का महीना आ गया" में नय्यर साहब की वही 60 के दशक के गीतों की छाया नज़र आई, पर कुल मिला कर इस फ़िल्म में वाणी जयराम की आवाज़ वह कमाल नहीं दिखा सकी जो ’गुड्डी’ में दिखाई थी। गीतों में वह दम नहीं था कि उस दौर के सुपरहिट फ़िल्मों के सुपरहिट गीतों से टक्कर ले पाते।


’ख़ून का बदला ख़ून’ में वाणी जयराम के साथ दो और गायिकाओं की आवाज़ें भी गूंजी। इनमें से एक थीं
Uttara Kelkar
उत्तरा केलकर। इन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा तो नहीं गाईं, पर मराठी संगीत जगत में इनका नाम हुआ। कहना आवश्यक है कि हिन्दी फ़िल्म जगत में उत्तरा केलकर को पहला अवसर ओ. पी. नय्यर ने ही दिया था ’ख़ून का बदला ख़ून’ में। इस फ़िल्म के तीन गीतों में इनकी आवाज़ सुनाई दी - "घर अपना बंगाल और बम्बई...", "हम यतीमों के जैसा भी संसार..." और "प्यार भरा कजरा अखियों में..."। लेकिन ये तीनों गीत उनकी एकल आवाज़ में नहीं थे, बल्कि वाणी जयराम इनमें मुख्य गायिका थीं, और साथ में थीं पुष्पा पगधरे। इन गीतों ने उत्तरा केलकर को कोई प्रसिद्धी तो नहीं दिलाई, पर हिन्दी फ़िल्म जगत में उनका खाता खुल गया। उन्हें हिन्दी में दूसरा मौका मिला सात साल बाद, 1985 की फ़िल्म ’टारज़न’ में जिसमें बप्पी लाहिड़ी ने उनसे गवाए "मेरे पास आओगे" और "तमाशा बनके आए हैं" जैसे हिट गीत। 1987 में ’डान्स डान्स’ का "आ गया आ गया हलवा आ गया" गीत भी सुपरहिट रहा। ’माँ कसम’, ’अधिकार’, ’सूर्या’, ’पुलिस और मुजरिम’, और ’इनसानियत के देवता’ जैसी फ़िल्मों में उनके गाए गीत नाकामयाब रहे। ओ. पी. नय्यर ने भी फिर कभी उत्तरा केलकर से अपने गीत नहीं गवाए।


वाणी जयराम और उत्तरा केलकर के अलावा ’ख़ून का बदला ख़ून’ में नय्यर साहब ने पुष्पा पगधरे को
Pushpa Pagdhare
भी गाने का मौक़ा दिया था। "घर अपना बंगाल और बम्बई" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डाल के" में इन्होंने अपनी आवाज़ मिलाई थी। वैसे यह पुष्पा पगधरे की पहली फ़िल्म नहीं थी। इससे एक साल पहले 1977 में संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी ने धार्मिक फ़िल्म ’जय गणेश’ में इन्हें गाने का अवसर दिया था। आशा भोसले, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर जैसे सीनियर गायकों के साथ इनकी भी आवाज़ इस ऐल्बम में सुनाई दी थी। 1978 में ही एक और फ़िल्म में पुष्पा की आवाज़ सुनाई दी, यह फ़िल्म थी ’चोर का भाई चोर’। डी. एस. रेउबेन के संगीत में इस फ़िल्म के गाने नहीं चले। इस तीनों फ़िल्मों के पिट जाने की वजह से पुष्पा पगधरे की आवाज़ लोगों तक नहीं पहुँच सकी और पुष्पा गुमनामी में ही रह गईं। ओ. पी. नय्यर ने एक बार फिर उन्हें मौका दिया अपनी अगली ही फ़िल्म ’बिन माँ के बच्चे’ में जो प्रदर्शित हुई थी 1979 में। इस फ़िल्म के कुल छह गीतों में तीन रफ़ी साहब के एकल, दो पुष्पा पगधरे के एकल और एक रफ़ी-पुष्पा डुएट थे। रफ़ी साहब के साथ गाया गीत एक होली गीत था जिसके बोल थे "होली आई रे आई रे होली आई रे, दिल झूम रहे मस्ती में लिए लाखों रंग बहार के"। बदलते दौर में भी अपनी शैली को बरकरार रखने की कोशिश में नाकाम रहे नय्यर साहब और यह होली गीत कोई कमाल नहीं दिखा सकी। पुष्पा पगधरे की एकल गीतों में पहला गीत था "अपनी भी एक दिन ऐसी मोटर कार होगी" और दूसरा गीत था "जो रात को जल्दी सोये और सुबह को जल्दी जागे"। इन गीतों में नय्यर साहब का स्टाइल बरकरार था और एस. एच. बिहारी के लिखे सुन्दर बोलों के होने के बावजूद ये गाने नहीं चले। एक तो दौर बदल चुका था, 80 के दशक में 60 के दशक का स्टाइल भला कैसे हिट होता! और शायद आशा भोसले की आवाज़ होती तो बात कुछ और होती, क्या पता! 1986 की फ़िल्म ’अंकुष’ में "इतनी शक्ति हमें देना दाता" गा कर पुष्पा पगधरे को पहली बार हिन्दी फ़िल्म जगत में ख्याति हासिल हुई। इस फ़िल्म के संगीतकार थे कुलदीप सिंह। ओ. पी. नय्यर ने अपने जीवन की अन्तिम फ़िल्म, 1995 की ’मुक़द्दर की बात’ में एक बार फिर से पुष्पा पगधरे को गवाया था।


1979 में ओ. पी. नय्यर के संगीत निर्देशन में एक और फ़िल्म आई ’हीरा मोती’। इस फ़िल्म में भी रफ़ी
Dilraj Kaur
साहब पुरुष गायक थे, साथ में मन्ना डे भी। पर गायिका के रूप में इस बार उन्होंने चुना दिलराज कौर की आवाज़। शत्रुघन सिन्हा और रीना रॉय पर फ़िल्माया रफ़ी-दिलराज डुएट "होंठ हैं तेरे दो लाल हीरे" पंजाबी शैली का नृत्य गीत है जिसमें दिलराज कौर आशा भोसले के अंदाज़ में गाने की कोशिश करती हैं और कुछ हद तक सफल भी हुई हैं। फ़िल्म अगर चलती तो शायद यह गीत भी चल पड़ता, पर अफ़सोस की बात कि फ़िल्म के ना चलने से इस गीत पर किसी का ध्यान नहीं गया। इस फ़िल्म में एक ख़ूबसूरत क़व्वाली भी थी रफ़ी साहब, मन्ना दा और दिलराज कौर की आवाज़ों में - "ज़िन्दगी लेकर हथेली पर दीवाने आ गए, तीर खाने के लिए बन कर निशाने आ गए"। इस गीत में भी दिलराज कौर का वही आशा वाली अंदाज़ साफ़ महसूस की जा सकती है। शत्रुघन सिन्हा, डैनी और बिन्दू पर फ़िल्माई हुई यह क़व्वाली उस ज़माने में काफ़ी हिट हुई थी। इस फ़िल्म में दिलराज कौर की आवाज़ में तीन एकल गीत भी थे। "तुम ख़ुद को देखते हो सदा अपनी नज़र से" सुन कर नय्यर साहब के कितने ही पुराने गीत याद आ जाते हैं। इस गीत की धुन से मिलती जुलती धुनों का उन्होंने कई बार अपने गीतों में प्रयोग किया है। "यही वह जगह है" गीत से भी इस गीत की ख़ास समानता है। "सौ साल जियो तुम जान मेरी तुम्हें मेरी उमरिया लग जाए" एक हल्का फुल्का जनमदिन गीत है जिसमें हिट होने के सभी गुण थे, बस बदक़िस्मती यही थी कि फ़िल्म पिट गई। अन्तिम गीत "मैं तुझको मौत दे दूँ या आज़ाद कर दूँ, तुझे नई ज़िन्दगी दे दूँ या बरबाद कर दूँ" भी एक सुन्दर रचना है जिसमें मध्य एशियाई संगीत की छाया मिलती है, और गीत के बोलों में ’मेरा गाँव मेरा देश’ के प्रसिद्ध गीत "मार दिया जाए के छोड़ दिया जाए" से समानता मिलती है।


इन चन्द फ़िल्मों में संगीत देने के बाद ओ. पी. नय्यर को यह बात समझ आ गई कि लता मंगेशकर या
S Janaki
आशा भोसले को लिए बग़ैर उन्हें किसी बड़ी फ़िल्म में संगीत देने का अवसर मिलना असंभव है। लता के साथ काम करने का सवाल ही नहीं था और आशा से वो किनारा कर चुके थे, अत: इस इंडस्ट्री से संयास लेना ही उन्होंने उचित समझा। नय्यर साहब अपने मर्ज़ी के मालिक थे, वो किसी के शर्तों पर काम नहीं करते थे, अपने उसूलों के लिए वो अपने परिवार से भी अलग हो गए। 80 के दशक के अन्त तक उन्हें आर्थिक परेशानियों ने भी घेर लिया और ना चाहते हुए भी उन्हें एक बार फिर से इस फ़िल्म जगत में क़दम रखना पड़ा। साल था 1992 और फ़िल्म थी ’मंगनी’। बी. आर. इशारा निर्देशित यह फ़िल्म एक कम बजट की फ़िल्म थी। पार्श्वगायिका के रूप में लिया गया दक्षिण की मशहूर गायिका एस. जानकी को, गायक बने एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम। और गीतकार थे क़मर जलालाबादी जिनके साथ नय्यर साहब ने पुराने ज़माने में बहुत काम किया है। लेकिन बात बन नहीं पायी। एस. जानकी की गाई "मैं तो मर के भी तेरी रहूंगी" एक बेहद कर्णप्रिय रचना है जिसे नय्यर साहब ने शास्त्रीय संगीत पर आधारित किया है। एस. जानकी की आवाज़ और अन्दाज़ में आशा जी की झलक मिलती है। इस गीत के इन्टरल्युड में भी उन्होंने कुछ ऐसी आलाप ली हैं जो बिल्कुल आशा-नय्यर के गीतों की याद दिला जाती हैं। नय्यर साहब ने एक साक्षात्कार में यह कहा है कि अगर एस. जानकी विदेश में जाकर नहीं बस जातीं तो उनसे बेहतर गाने वाली पूरे हिन्दुस्तान में नहीं थीं। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर वो मुंबई में गातीं तो वो शीर्ष की गायिका होतीं। इस फ़िल्म का एक अन्य गीत है "हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा" जो नय्यर साहब के जाने-पहचाने तालों पर आधारित है। नय्यर साहब के गीतों की ख़ासियत यह है कि हर गीत में वो अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते थे और यह गीत भी एक ऐसा ही गीत है जिसे सुन कर कोई भी बता सकता है कि यह नय्यर साहब का कम्पोज़िशन है।


1992 में ही ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई जिसके गीतों ने ख़ूब लोकप्रियता
Kavita
हासिल की। यह फ़िल्म थी ’निश्चय’। भप्पी सोनी निर्मित इस फ़िल्म में सलमान ख़ान और करिश्मा कपूर के होने की वजह से फ़िल्म लोगों तक पहुँची, और ओ. पी. नय्यर ने भी यह सिद्ध किया कि 90 के दशक में भी उनके संगीत का जादू बरक़रार है। इस फ़िल्म में सलमान की आवाज़ बने अमित कुमार और करिश्मा की आवाज़ बनी कविता कृष्णमूर्ती। इस फ़िल्म में कविता की एकल आवाज़ में "छुट्टी कर दी मेरी" के अलावा अमित-कविता के चार युगल गीत थे - "किसी हसीन यार की तलाश है", "सुन मेरे सजना सुन रे", "नई सुराही ताज़ा पानी पी ले तू जानी" और "देखो देखो तुम हो गया मैं गुम"। ये सभी के सभी गीत बेहद कामयाब रहे और ऐसा लगा जैसे फ़िल्म-संगीत का सुनहरा दौर वापस आ गया है। जब यही बात किसी ने एक साक्षात्कार में नय्यर से कही तो ’निश्चय’ के गीतों की लोकप्रियता से साफ़ इनकार करते हुए नय्यर साहब ने कहा,
"देखिए, इन दो पिक्चरों ने यह बता दिया कि नय्यर साहब, आप जो बनाते हो वो आज चलेगा नहीं, और जो आज बन रहा है वो मैं बना नहीं सकता। तो ग्रेस किस चीज़ में है? विस्डम ऐण्ड ग्रेस? कि आप विथड्रॉ कर लीजिए! बहुत कैसेट बिका था, बहुत बहुत बिका म्युज़िक, पिक्चर रिलीज़ होते ही दोनों ठप्प। तो म्युज़िक भी गया साथ में, पिक्चरों का जनाज़ा निकला और म्युज़िक का भी। उस वक़्त मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत थी, तो मुझे वो तस्वीरें लेनी पड़ी। बेगर्स कान्ट बी चूज़र्स; ज़रूरतमन्द आदमी तो यह नहीं देखेगा कि सब्जेक्ट क्या क्या है, जब ज़रूरतमन्द नहीं था, तब भी नहीं पूछता था मैं कि सबजेक्ट क्या है, कहानी क्या है, कुछ नहीं। मेरा एक ही सब्जेक्ट और एक ही कहानी थी कि रुपया कितना है!"



Ranjana Joglekar
’निश्चय’ के बाद 1994 में एक और फ़िल्म आई ’ज़िद’ जिसमें नय्यर साहब का संगीत एक बार फिर हिट हुआ, पर फ़िल्म के बुरी तरह पिट जाने से फ़िल्म के साथ-साथ फ़िल्म के गीतों का भी जनाज़ा निकल गया। इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने कविता कृष्णमूर्ति के अलावा दो और गायिकायों से गीत गवाए। ये गायिकाएँ थीं रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर। मोहम्मद अज़ीज़ और रंजना जोगलेकर की युगल आवाज़ों में "तुझे प्यार कर लूँ यह जी चाहता है" को बेहद सुन्दर तरीके से स्वरबद्ध किया है जिसमें तबले का आकर्षक प्रयोग किया गया है। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में "कोरी गगरिया मीठा पानी" में कोई नई या ख़ास बात नहीं लगी। उपर से हाल ही में फ़िल्म ’निश्चय’ में "नई सुराही ताज़ा पानी" लोग सुन चुके थे। कविता, रंजना और माधुरी जोगलेकर, इन तीनों ने एक साथ आवाज़ें मिलाई "ख़ून-ए-जिगर से हो लिख देंगे हम तो पहला पहला
Madhuri Joglekar
सलाम सँवरिया के नाम"। इस गीत में तीनों गायिकाएँ पूरा गीत साथ में गाती हैं, इसलिए तीनों आवाज़ों का कॉनट्रस्ट बाहर नहीं आया। अगर तीनों गायिकाएँ बारी-बारी गातीं तो शायद कुछ और बात बनती। कुल मिला कर ’ज़िद’ के गाने सुन्दर और कर्णप्रिय होने के बावजूद फ़िल्म के ना चलने से इनकी तरफ़ लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। 
और 1995 में ओ. पी. नय्यर के संगीत में ढल कर अन्तिम फ़िल्म लौन्च हुई ’मुक़द्दर की बात’ पर यह फ़िल्म प्रदर्शित नहीं हो सकी। इस फ़िल्म के गाने महेन्द्र कपूर और पुष्पा पगधरे ने गाए। "सोने में सुगन्ध मिलाई गई, तब तेरी काया बनाई गई" एक बेहद सुन्दर युगल गीत है, जो बोल, संगीत और गायन की दृष्टि से उत्तर रचना है। एक और युगल गीत है "क्या यह मुमकिन है हम दोनों मिला करें हर बार, बार बार दुनिया में किसी को कब मिलता है प्यार"। इन गीतों को सुन कर यह बात मन में उठती है कि क्या नय्यर साहब ने ही महेन्द्र कपूर को सबसे ज़्यादा अच्छे गाने दिए हैं! इसी फ़िल्म की एक अन्य सुन्दर रचना है "कैसे ये तारों भरी रात खिली सजना" जो पुष्पा पगधरे की एकल आवाज़ में शास्त्रीय राग में ढल कर बेहद सुन्दर बन पड़ी है। पुष्पा जी की आवाज़ में एक और एकल गीत है "पिया तेरा प्यार मैं तो माँग में सजाऊंगी, जग सारा देखेगा मैं तेरी बन जाऊँगी" जिसमें पंजाबी रंग है और साथ ही इन्टरल्युड में सितार पर शास्त्रीय रंग भी है।

ओ. पी. नय्यर 81 वर्ष की आयु में 28 जनवरी 2007 को इस फ़ानी दुनिया से चले गए। अपने उसूलों के पक्के नय्यर साहब ने कभी अपना सर नहीं झुकाया, फिर चाहे उनके गीत लता और आशा न गाए, उन्होंने कभी किसी के साथ कोई समझौता नहीं किया या किसी के दबाव में नहीं आए। आशा भोसले से अलग होने के बाद उनके गाने कृष्णा कल्ले, वाणी जयराम, पुष्पा पगधरे, उत्तरा केलकर, दिलराज कौर, एस. जानकी, कविता कृष्णामूर्ति, रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर जैसी गायिकाओं ने गाए। गाने सभी उत्कृष्ट बने लेकिन फ़िल्मों के ना चलने से ये गाने भी ठंडे बस्ते में चले गए। 

आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में गणतन्त्र दिवस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए देशभक्ति फ़िल्मी गीतों पर लेख आप सब ने पसन्द किया, हमें बहुत प्रसन्नता हुई। आँकड़ों के अनुसार इस लेख को करीब 162 पाठकों ने पढ़ा है। ’चित्रकथा’ के पिछले तीन अंकों का अब तक का मिला-जुला रीडरशिप है 580, आप सभी के इस स्नेह और सहयोगिता के लिए हम आपके अत्यन्त आभारी हैं और आशा करते हैं कि भविष्य में यूं ही आप अपना साथ बनाए रखेंगे।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 16 अगस्त 2014

"मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोय", जनमाष्टमी पर फ़िल्म 'मीरा' के संगीत से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 38
 

‘मेरे तो गिरिधर गोपाल...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 38वीं कड़ी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पवित्र अवसर पर आज जानिये फ़िल्म 'मीरा' में वाणी जयराम का गाया भजन "मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोय..."।




क्तिरस की फ़िल्मों के इतिहास में 1979 में बनी गुलज़ार की फ़िल्म 'मीरा' का महत्वपूर्ण स्थान है। भले इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झण्डे नहीं गाड़े, पर उत्कृष्ट भक्ति फ़िल्मों की जब जब बात चलेगी, इस फ़िल्म का उल्लेख ज़रूर होगा। इस फ़िल्म के गीतों की गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में कुल 12 मीरा भजन हैं -

वाणी जयराम
1. एरी मैं तो प्रेम दीवानी...
2. बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी...
3. बादल देख डरी...
4. जागो बंसीवाले...
5. जो तुम तोड़ो पिया मैं नाही तोड़ूँ रे...
6. करना फ़कीरी फिर क्या दिलगिरी...
7. करुणा सुनो श्याम मेरे...
8. मैं सांवरे के रंग रची...
9. मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोय...
10. प्यारे दर्शन दीजो आज...
11. राणाजी मैं तो गोविन्द के गुन गाऊँ...
12. श्याम माने चाकर राखो जी...


इन सभी भजनों को इस फ़िल्म के लिए स्वरबद्ध किया था सुप्रसिद्ध सितार वादक पण्डित रविशंकर ने। "मेरे तो गिरिधर गोपाल..." के लिए गायिका वाणी जयराम को उस वर्ष फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार मिला था। वाणी जयराम का गाया एक और भजन "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." भी इस पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थी। उस वर्ष अन्य नामांकित गायिकायें थीं, छाया गांगुली (आपकी याद आती रही रात भर - गमन), उषा मंगेशकर (हमसे नज़र तो मिलाओ - इकरार), और हेमलता (मेघा ओ मेघा - सुनैना)।

जिस प्रकार मीराबाई का जीवन मुश्किलों से घिरा रहा, उसी प्रकार फ़िल्म 'मीरा' के निर्माण में भी तरह-तरह की कठिनाइयाँ आती रहीं। पर हर कठिनाई का सामना किया गुलज़ार की पूरी टीम ने और आख़िर में बन कर तैयार हुई 'मीरा'। जब फ़िल्म के निर्माता प्रेमजी और जे. एन. मनचन्दा ने गुलज़ार को इस फ़िल्म को लिखने व निर्देशित करने का निमंत्रण दिया, तब दो कलाकार जो गुलज़ार को पूर्व-निर्धारित मिले वो थे हेमामालिनी और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। बाकी कलाकारों का चयन होना बाक़ी था, जो काम गुलज़ार को करना था। गुलज़ार को पता था कि उनकी जो ट्युनिंग पंचम के साथ जमती है, वह एल.पी के साथ नहीं हो सकती, फिर भी प्रेमजी का यह 'मीरा' का प्रस्ताव इतना आकर्षक था कि वो ना नहीं कह सके। वैसे एल.पी के साथ गुलज़ार इससे पहले 'पलकों की छाँव में' फ़िल्म में काम कर चुके थे। गुलज़ार के अनुसार यह फ़िल्म स्वीकार करने का सबसे मुख्य कारण यह था कि 1981 के वर्ष को 'महिला मुक्ति वर्ष' (Women's Liberation Year) के रूप में मनाया जाना था और वो मीराबाई को इस देश की प्रथम मुक्त महिला मानते हैं क्योंकि मीराबाई के अपने उसूल थे, वो अच्छी जानकार थीं, वो बुद्धिमती थीं, वो एक कवयित्री थी, और उन्होंने अपने पति के धर्म को स्वीकार नहीं किया। गुलज़ार मीराबाई के जीवन के आध्यात्मिक अंग को फ़िल्म में रखना तो चाहते थे पर यह भी नहीं चाहते थे कि फ़िल्म केवल उनकी पौराणिक (mythological) छवि को ही दर्शाये। वो तो फ़िल्म को एक ऐतिहासिक फ़िल्म बनाना चाहते थे।

फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो जाने के बाद गुलज़ार ने सिटिंग रखी फ़िल्म के संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे के साथ। मीराबाई द्वारा लिखी बेशुमार भजनों की चर्चा करते हुए अन्त में कुल 12 भजन छाँट लिए गये जो फ़िल्म में रखे जाने थे। फ़िल्म के निर्माता ने व्यावसायिक पत्रिकाओं में विज्ञापन प्रकाशित कर दिया - 'आज की मीरा' (लता मंगेशकर) 'मीरा' की मुहूर्त शॉट में क्लैप करेंगी। गुलज़ार ने पहला भजन "मेरे तो गिरिधर गोपाल..." को सबसे पहले फ़िल्माने की तैयारी भी कर ली। एल.पी ने भजन कम्पोज़ किया और लता जी से सम्पर्क किया रेकॉर्डिंग के लिए। लक्ष्मी-प्यारे जानते थे कि लता जी ना नहीं करेंगी। पर उनके सर पे बिजली आ गिरी जब लता जी ने इसे गाने से इनकार कर दिया। लता जी के अनुसार अभी हाल ही में उन्होंने अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर के लिए मीरा भजनों का एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम रेकॉर्ड किया है, इसलिए दोबारा किसी कमर्शियल फ़िल्म के लिए वही भजन नहीं गा सकती। लता जी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थीं। मसला इतना नाज़ुक था कि ना तो गुलज़ार लता जी से इस पर बहस कर सकते थे और एल.पी. का तो सवाल ही नहीं था। हुआ यूँ कि लता जी के ना कहने पर एल. पी ने भी फ़िल्म में संगीत देने से मना कर दिया। उन्हे लगा कि कहीं लता जी उनसे नाराज़ हो गईं और भविष्य में उनके गीत गाने से मना कर देंगी तो वो बरबाद हो जायेंगे। ख़ैर, लता जी के पीछे हट जाने के बाद गुलज़ार ने आशा भोसले से अनुरोध किया। पर आशा जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया कि जहाँ देवता ने पाँव रखे हों, वहाँ फिर मनुष्य पाँव नहीं रखते। अब 'मीरा' की टीम डर गई। न लता है, न आशा, न एल. पी। गुलज़ार अगर चाहते तो पंचम को संगीतकार बनने के लिए अनुरोध कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। लता और आशा के गुलज़ार को मना करने पर पंचम वैसे ही शर्मिन्दा थे, गुलज़ार उन्हें और ज़्यादा शर्मिन्दा नहीं करना चाहते थे। और इस तरह से लता, आशा, एल.पी, पंचम - ये दिग्गज इस फ़िल्म से बहुत दूर हो गये।

गुलज़ार हार नहीं माने, और सोचने लगे कि ऐसा कौन संगीतकार है जो अपने संगीत के दम पर लता और आशा के बिना भी फ़िल्म के गीतों को सही न्याय और स्तर दिला सकता है! और तभी उन्हें पण्डित रविशंकर का नाम याद आया। पंडित जी उस समय न्यूयॉर्क में थे; उनसे फोन पर सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि वो सितम्बर-अक्तूबर में भारत वापस आने के बाद स्क्रिप्ट पढ़ेंगे और उसके बाद ही अपना फ़ैसला सुनायेंगे। वह जून का महीना था और गुलज़ार इतने दिनों तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अमरीका का टिकट कटवाया और पहुँच गये पण्डित जी के पास। यह गुलज़ार साहब की पहली अमरीका यात्रा थी। पण्डित जी को स्क्रिप्ट पसन्द आई, पर उस पर काम वो सितम्बर से ही शुरू कर पायेंगे, ऐसा उन्होंने कहा। लेकिन गुलज़ार साहब के फिर से अनुरोध करने पर वो अमरीका में रहते हुए ही धुनों पर काम करने को तैयार हो गये। अभी भी पण्डित जी को थोड़ी सी हिचकिचाहट थी क्योंकि उन्होंने भी लता मंगेशकर वाले विवाद की चर्चा सुनी थी। संयोग से जब गुलज़ार पण्डित जी से मिलने अमरीका गये, उन दिनों लता जी भी वहीं थीं। गुलज़ार साहब और पण्डित जी ने लता जी को फ़ोन किया और उन्हें सब कुछ बताया तो लता जी ने उनसे कहा कि उन्हें फ़िल्म 'मीरा' के बनने से कोई परेशानी नहीं है, बस वो ख़ुद इसमें शामिल नहीं होना चाहती। अब इसके बाद पण्डित जी का अगला सवाल था कि कौन सी गायिका इन भजनों को गाने वाली हैं? गुलज़ार के मन में वाणी जयराम का नाम था, पर वो पण्डित जी से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे, यह सोच कर कि वो कैसे रिऐक्ट करेंगे वाणी जयराम का नाम सुन कर। इसलिए गुलज़ार साहब ने ही पण्डित जी से गायिका चुनने को कहा। और पण्डित जी का जवाब था, "वाणी जयराम कैसी रहेगी?"


पण्डित रविशंकर ने "बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी..." को सबसे पहले कम्पोज़ किया। गुलज़ार साहब के अनुसार यह इस ऐल्बम का सबसे बेहतरीन भजन है। कहते हैं कि "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." कम्पोज़ करते समय पण्डित जी ने कहा था - "जो ट्यून रोशन साहब ने बनायी है 'नौबहार' में, वह दिमाग़ से नहीं जाती। लेकिन मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूँगा कि कुछ अलग हट कर बनाऊँ"। पर जिस भजन के लिए वाणी जयराम को पुरस्कार मिला, वह था "मेरे तो गिरिधर गोपाल..."। सितम्बर में भारत वापस आने के बाद 'मीरा' के सभी 12 भजन एक के बाद एक 9 दिनों के अन्दर रेकॉर्ड किये गये वाणी जयराम की आवाज़ में। पण्डित जी सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम करते हुए पूरे अनुशासन के साथ कार्य को समय पर सम्पन्न किया। एक दिन ऐसा हुआ कि पण्डित जी बहुत ही थके हुए से दिख रहे थे। गुलज़ार साहब के पूछने पर उन्होंने बताया कि अगले दिन वो दोपहर 2 बजे से काम शुरू करेंगे। यह कह कर वो निकल गये। अगले दिन पंडित जी 2 बजे आये, बिल्कुल तरो-ताज़ा दिख रहे थे। जब गुलज़ार साहब ने उनसे इसका ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि अब वो बहुत ज़्यादा बेहतर महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने लगातार 8 घंटे अपना सितार बजाया है सुबह 4 बजे से बैठ कर; वो इसलिये थके हुए से लग रहे थे क्योंकि कई दिनों से उन्हे अपने सितार को छूने का मौका नहीं मिल पाया था। इस तरह से 'मीरा' के गानें बने। यह सच है कि फ़िल्म के ना चलने पर इन भजनों के तरफ़ ज़्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया और ना ही रेडियो पर ये भजन लोकप्रिय कार्यक्रमों में सुनाई पड़े। पर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और लता मंगेशकर अगर इस फ़िल्म से जुड़ते तो क्या इस फ़िल्म का व्यावसायिक अंजाम कुछ और होता, यह अब कह पाना बहुत मुश्किल है।

आइए, अब हम मीरा का यही पद सुनते हैं। फिल्म में यह भक्तिगीत दो बार प्रस्तुत हुआ है। पहली बार महल में यह गीत रचते हुए दिखाया गया है और दूसरी बार मन्दिर में भक्तों के बीच मीरा इसे गातीं हैं। किंवदन्तियों के अनुसार बादशाह अकबर, तानसेन के साथ वेश बदल कर इस मन्दिर में मीरा का भजन सुनने आते हैं। तानसेन खुद को रोक नहीं पाते और गीत की अंतिम पंक्ति पहले एकल और फिर मीरा के साथ युगल रूप में गाने लगते हैं। तानसेन के लिए यह पुरुष कण्ठ-स्वर सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित दिनकर कैंकणी ने दिया है। पण्डित रविशंकर ने मीरा का यह पद राग खमाज के स्वरों में बाँधा है।

फिल्म - मीरा : 'मेरे तो गिरिधर गोपाल...' : वाणी जयराम और पण्डित दिनकर कैंकणी : संगीत - पण्डित रविशंकर 

  

अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रविवार, 15 दिसंबर 2013

विविध रागों में निबद्ध मीरा का एक भक्तिपद


स्वरगोष्ठी – 146 में आज

रागों में भक्तिरस – 14

‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम कुछ बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। आज हम आपको भक्त कवयित्री मीराबाई का एक भजन प्रस्तुत करेंगे जिसे अलग-अलग गायिकाओं के स्वरों में और विभिन्न रागों में पिरोया गया है। हम आपको मीरा का यह कृष्णभक्ति से परिपूर्ण पद क्रमशः गायिका वाणी जयराम, लता मंगेशकर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ों में सुनवाएँगे। एक ही भजन को चार अलग-अलग आवाज़ों और धुनों में सुन कर आपको भजन की भावभिव्यक्ति और रस की ग्राह्यता में अन्तर करने का अवसर भी मिलेगा।   



भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा रही है। इस संगीत परम्परा में जड़ता नहीं है। यह तो गोमुख से निरन्तर निकलने वाली वह पवित्र धारा है जिसके मार्ग में अनेक धाराएँ मिलती है और इस मुख्य धारा में विलीन हो जाती हैं। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। परन्तु भक्तिरस की धारा जो वैदिक युग में समाहित हुई, वह अविच्छिन्न रूप से आज भी जारी है। आज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। 15वीं और 16वीं शताब्दी में संगीत के विकास में भक्त कवियों का भरपूर योगदान था। इस काल में सूरदास, मीराबाई, गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, पुण्डरीक विट्ठल आदि ऐसे भक्तकवि हुए जिन्होने भक्तिकाल में साहित्य के साथ-साथ संगीत को भी प्रतिष्ठित किया। इनका प्रभाव आज भी साहित्य और संगीत के क्षेत्र में कायम है। इनमें से आज हम भक्त कवयित्री मीराबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। मीरा का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्ति धारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमे आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’। इस पद के चार संस्करण हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले प्रस्तुत है, गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग तोड़ी के स्वरों का चयन किया था। राग तोड़ी की चर्चा से पहले आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना रूपक ताल में निबद्ध है।


राग तोड़ी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : वाणी जयराम ; फिल्म मीरा 



अभी आपने मीरा के इस पद की रसानुभूति राग तोड़ी के स्वरों में किया। अब थोड़ी चर्चा राग तोड़ी के विषय में कर ली जाए। राग तोड़ी इसी नाम के थाट तोड़ी से सम्बन्धित माना जाता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके साथ मध्यम स्वर तीव्र और निषाद स्वर शुद्ध प्रयोग होता है। इसके आरोह और अवरोह, दोनों में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार है। राग तोड़ी के गायन-वादन का सबसे उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। करुण और भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए यह उपयुक्त राग है।
आइए, मीरा का यही पद अब एक भिन्न रूप में सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इसी भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया था। राग भीमपलासी काफी थाट से सम्बन्धित है। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण भी सुनिए।


राग भीमपलासी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म नौबहार



मीरा के इसी पद का तीसरा संस्करण 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘जोगन’ में प्रयोग किया गया था। फिल्म में इस भक्तिपद का उपयोग काफी द्रुत लय में कीर्तन शैली में किया गया है। फिल्म के मुख्य कलाकार दिलीप कुमार, नरगिस, प्रतिमा देवी, पूर्णिमा, तबस्सुम आदि थे। अभिनेता राजेन्द्र कुमार की यह पहली फिल्म थी। भजन के इस संस्करण को सुनते समय कई रागों की झलक मिलती है। स्थायी में राग सिन्दूरा तो अन्तरे में राग झिंझोटी के दर्शन भी होते हैं। सामान्य रूप से इस गीत को राग मिश्र झिंझोटी पर आधारित कहा जा सकता है। फिल्म ‘जोगन’ में शामिल मीरा के इस पद को बुलो सी. रानी ने संगीतबद्ध किया था और गायिका गीता दत्त ने स्वर दिया था। इस प्रस्तुति के बाद इसी पद का चौथा स्वरूप भी आप सुनेगे। यह एक गैर फिल्मी संस्करण है, जिसे गायिका सुमन कल्याणपुर ने स्वर दिया है। मीरा के पारम्परिक अन्तरों के साथ इसे कृपशंकर तिवारी ने स्वरबद्ध किया है। इस प्रस्तुति में राग जोग की स्पष्ट झलक मिलती है। भारतीय संगीत का राग जोग भक्तिरस के साथ वैराग्य भाव का सृजन भी करता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग नट इसके समतुल्य राग होता है। सम्पूर्ण जाति का यह राग पूर्वांग प्रधान होता है। आरोह में केवल शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध और कोमल, दोनों गान्धार का प्रयोग किया जाता है। राग जोग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय माना जाता है। सुमन कल्याणपुर की इस प्रस्तुति में आपको मीरा के इसी पद में एक अन्य भाव का सृजन भी परिलक्षित होगा। आप मीरा के एक ही पद के इन संस्करणों की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र झिंझोटी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : गीता दत्त : फिल्म जोगन




राग जोग : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : सुमन कल्याणपुर : गैर फिल्मी भजन





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना के स्वरों को ध्यान से सुनिए और हमे गायिका का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 144वीं कड़ी में हमने आपको विदुषी कला रामनाथ के वायलिन वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वायलिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी के साथ-साथ हमारे एक नए पाठक/श्रोता चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको राग तोड़ी, भीमपलासी, मिश्र झिंझोटी और जोग पर आधारित मीराबाई के एक पद का रसास्वादन कराया। आगामी अंक में आप मीरा के ही एक अन्य पद की अलग-अलग स्वरों में की गई प्रस्तुति का रसास्वादन कर सकेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की पन्द्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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