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Saturday, May 26, 2018

चित्रकथा - 70: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 1)

अंक - 70

हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 1)

"मन डोले मेरा तन डोले..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें उन हिन्दी फ़िल्मों पर जिनमें है नाग-नागिन के चरित्र, उनकी प्रेमकथाएँ, जिनमें है शैतान सपेरों द्वारा सांपों पर अत्याचार, और जिनमें है नागिन का इन्तक़ाम।




1931 में ’आलम आरा’ से बोलती फ़िल्मों की शुरुआत के दो साल के अन्दर 1933 में जहाँ आरा कज्जन और पेशेन्स कूपर अभिनीत फ़िल्म आई थी ’ज़हरी सांप’। फ़िल्म की कहानी उपलब्ध ना होने की वजह से ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है कि क्या वाक़ई इस फ़िल्म में सांप दिखाए गए थे या फिर यह बस सांकेतिक शीर्षक है फ़िल्म के किसी चरित्र के लिए! अगर यह मान लें कि यह सांप की कहानी है, तो यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की पहली फ़िल्म होगी इस शैली की। फ़िल्म के संगीतकार बृजलाल वर्मा और गीतकार पंडित नारायण प्रसाद ’बेताब’ ने गीत रचे और जहाँ आरा कज्जन की आवाज़ में ये तमाम गीत फ़िल्म में सुनाई दिए। हालांकि इस फ़िल्म में दस से भी अधिक गीत थे, लेकिन किसी भी गीत में सांप या उससे मिलता-जुलता कोई संदर्भ नहीं मिला। फ़िल्म इतिहास के उस पहले दौर में स्पेशल इफ़ेक्ट्स के तकनीक विकसीत नहीं हुए थे कि सांपों के दृश्य नाटकीयता के साथ दिखाए जा सके। शायद इसी वजह से किसी भी फ़िल्मकार ने इस शैली पर फ़िल्म बनाने का प्रयास नहीं किया। ’ज़हरी सांप’ बनने के दस साल बाद, 1943 में ’विष कन्या’ नामक फ़िल्म आई। फ़िल्म की शीर्षक भूमिका में थीं साधना बोस, साथ में थे पृथ्वीराज कपूर और लीला मिश्र मुख्य भूमिकाओं में। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार विष कन्या उस लड़की को कहा जाता है जिसके ख़ून में ज़हर हो, जिस वजह से उस देश का राजा उसका इस्तमाल दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए करते थे। विष कन्याओं का उल्लेख चाणक्य के ’अर्थशास्त्र’ में मिलता है। यह चन्द्रगुप्त मौर्य के समय काल की बात है (ईसा पूर्व 340-293)। ख़ैर, ’विष कन्या’ फ़िल्म के संगीतकार थे खेमचन्द प्रकाश और गीत लिखे किदार शर्मा ने। इस फ़िल्म में भी दस से अधिक गीत थे, बस एक गीत में "नाग" का उल्लेख मिला - "मतवाले नैना नाग रे..."। 40 के ही दशक में फ़िल्म ’नागन’ का निर्माण शुरू तो हुआ था, लेकिन फ़िल्म अन्त तक बन कर प्रदर्शित नहीं हो सकी। कुछ सूत्रों में इस फ़िल्म को 1950 की फ़िल्म मानी जाती है, लेकिन हक़ीक़त यही है कि यह एक अप्रदर्शित फ़िल्म है। इस फ़िल्म के लिए सुरेन्द्रनाथ और गीता रॉय के गाए कुछ गीत रिकॉर्ड भी हुए थे। फ़िल्म के संगीतकार के रूप में कहीं हुस्नलाल-भगतराम का नाम दिया हुआ है तो कहीं पर पंडित अमरनाथ (हुस्नलाल-भगतराम के बड़े भाई) और हरबंसलाल का। पचास के दशक में 1951 में दलसुख पंचोली ने बनाई फ़िल्म ’नगीना’। मुक्ता के चरित्र में फ़िल्म की नायिका थीं नूतन। फ़िल्म की कथानक कुछ इस तरह की है कि फ़िल्म का नायक नासिर ख़ान अपने पिता के सर से झूठा इलज़ाम हटाने के लिए सबूत इकट्ठा करने के एक पुरानी हवेली/ खंडहर में जाते हैं जहाँ उनकी मुलाक़ात एक रहस्यमयी लड़की (नूतन) से होती है। इस बात पर ध्यान दें कि इस फ़िल्म में नूतन कोई इच्छाधारी नागिन के चरित्र में नहीं है, और ना ही इसमें किसी सपेरा द्वारा किसी नागिन से नगीना या नागमणि छीनने का कोई दृश्य है। बल्कि कहानी के रहस्य को और भी अधिक घनीभूत करने के लिए नागमणि अंगूठी का एक पक्ष रखा गया है। शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र और हसरत के रचे गीत लता, सी. एच. आत्मा, रफ़ी और शमशाद बेगम ने गाए। सी. एच. आत्मा का गाया "रो‍ऊँ मैं सागर किनारे, सागर हंसी उड़ाए" अपने ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। इस तरह से इन सभी शुरुआती फ़िल्मों की कहानियों में अप्रत्यक्ष रूप से सांप या सांप संबंधित पक्ष होते हुए भी ये दरसल नाग-नागिन शैली की फ़िल्में नहीं हैं।

जिस फ़िल्म से नाग-नागिन की परम्परा हिन्दी फ़िल्मों में शुरू हुई, वह थी 1953 की फ़िल्म ’नाग पंचमी’। उन दिनों अभिनेत्री निरुपा रॉय पौराणिक फ़िल्मों में अग्रणी नायिकाओं में थीं। विनोद देसाई निर्मित व रमण देसाई निर्देशित इस फ़िल्म में नायक थे मन्हर देसाई। अपनी तरह की पहली फ़िल्म होने की वजह से यह फ़िल्म ख़ूब चली और एक सफल फ़िल्म रही उस वर्ष की। पौराणिक फ़िल्मों में काम करने वाले कलाकार टाइपकास्ट कर दिए जाते थे, जिन्हें सामाजिक फ़िल्मों में मौके नहीं मिल पाते थे आसानी से। इस फ़िल्म के संगीतकार चित्रगुप्त और गीतकार गोपला सिंह नेपाली के साथ भी यही हुआ। फ़िल्म के अधिकांश गीत आशा भोसले ने गाए जिनमें एक गीत था "ओ नाग कहीं जा बसियो रे, मेरे पिया को ना डसियो रे..."। निरुपा रॉय पर फ़िल्माया यह गीत फ़िल्म का लोकप्रिय गीत रहा। और फिर 1954 में एक ऐसी फ़िल्म आई जिसने चारों तरफ़ धूम मचा दी। यह थी ’फ़िल्मिस्तान’ की धमाकेदार फ़िल्म ’नागिन’। नन्दलाल जसवन्तलाल के निर्देशन में वैजयन्तीमाला - प्रदीप कुमार अभिनीत यह आंशिक रूप से रंगीन फ़िल्म एक ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाई। हेमन्त कुमार के संगीत में, राजेन्द्र कृष्ण का लिखा और लता का गाया "मन डोले मेरा तन डोले" गीत उस वर्ष ’गीत माला’ का वार्षिक गीत बना। इस फ़िल्म के लिए बीन की धुन कल्याणजी वीरजी शाह और रवि ने तैयार की - कल्याणजी अपने ही बनाए साज़ केवियोलिन पर और रवि हारमोनियम पर। बिना असली बीन का इस्तमाल किए इतनी अच्छी बीन की धुन इससे पहले फ़िल्म संगीत में सुनाई नहीं दी थी। ’नागिन’ फ़िल्म की यह बीन-संगीत इतना मशहूर रहा है कि समय समय पर इसका प्रयोग होता चला आया है। ’नागिन’ की कहानी दो आदिवासी जनजातियों की आपस में तकरार की कहानी है। नागी जनजाति के सरदार की बेटी है माला (वैजयन्तीमाला) और रागी जनजाति के सरदार का बेटा है सनातन (प्रदीप कुमार)। नागी सरदार सनातन को मार डालना चाहता है अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए। उधर माला ग़लती से नागा इलाके में घुस आती है बीन की धुन से आकृष्ट होकर। बीन वादक सनातन से उसकी मुलाक़ात होती है और प्रेमपुष्प खिलते हैं। उस वर्ष की सफलतम फ़िल्मों में से एक ’नागिन’ एक ट्रेन्डसेतर फ़िल्म सिद्ध हुई जिसने फ़िल्मी कहानी की इस नई शैली का द्वार खोल दिया। आगे चल कर इस तरह के कबीलों की आपस की लड़ाई के बीच नायक-नायिका के प्रेम कहानियों पर बहुत सी फ़िल्में बनीं। नागिन का फ़ॉरमुला इतना पसन्द किया गया कि 1956 से 1958 के तीन सालों में कम से कम 6 फ़िल्में और बनीं। ’नाग पंचमी’ फ़िल्म की सफलता को देखते हुए बाबूभाई मिस्त्री ने फिर एक बार निरुपा रॉय और मन्हर देसाई (और साथ में महिपाल) को लेकर 1956 में पौराणिक कथा आधारित ’सती नागकन्या’ फ़िल्म का निर्माण किया। चित्रगुप्त की जगह इस बार संगीतकार बने एक और पौराणिके-ऐतिहासिक फ़िल्म संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी। गोपाल सिंह नेपाली के साथ साथ बी. डी. मिश्र और सरस्वती कुमार दीपक ने भी कुछ गीत लिखे। ’नाग पंचमी’ की ही तरह इस फ़िल्म के अधिकांश गीत आशा भोसले ने गाए और कुछ गीतों में रफ़ी और गीता दत्त की आवाज़ें थीं। सती नागकन्या की कहानी रामायण से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार एक सर्प-राजकुमारी लंकाधिपति रावण के पुत्र इन्द्रजीत मेघनाद से विवाह करती है, जो मेघनाद से अपने नाग पति की हत्या का बदला लेने आई है। मेघनाद के रथ के पहिये के नीचे कूचल कर उसके पति की मृत्यु हुई थी। इसी शीर्षक से 1983 में भी एक फ़िल्म बनी थी जिसकी भी यही कहानी है। साथ ही इस फ़िल्म में भगवान विष्णु, लक्ष्मी और शेष नाग का क्रम से राम, सीता और लक्ष्मण के रूप में पुनर्जनम की कथा भी शामिल है। फ़िल्म में जयश्री गडकर, अनीता गुहा, सुलोचना, मन्हर देसाई, अंजना मुमताज़ आदि ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। 1956 और 1983 की ’सती नागकन्या’ फ़िल्मों में एक समानता यह है कि दोनों फ़िल्मों में मन्हर देसाई नज़र आए, 1983 वाले में रावण की भूमिका में।

1957 में नाग-नागिन की फ़िल्मों ने रफ़्तार पकड़ ली और कुल चार फ़िल्में इस वर्ष बनीं - ’नाग लोक’, ’नाग मणि’, ’नाग पद्मिनी’ और ’शेष नाग’। ’नाग मणि’ और ’शेष नाग’ शीर्षक से 90 के दशक में भी फ़िल्में बनी हैं। ’सती नाग कन्या’ की सफलता के बाद बाबूभाई मिस्त्री फिर एक बार निरुपा रॉय को लेकर बनाई ’नाग लोक’। साथ में थे शाहु मोडक, अजीत और कृषन कुमारी। फ़िल्म के संगीतकार थे रामलाल हीरापन्ना तथा गीत लिखे भरत व्यास, गोपाल सिंह नेपाली, सरस्वती कुमार दीपक, पी. एल. संतोषी और इंदीवर ने। यह फ़िल्म भगवान शिव की पौराणिक कथाओं की फ़िल्म है, इसलिए कुछ गीत शिव भजन भी हैं जैसे कि "हे शिवशंकर हे प्रलयंकर..." (लता), "शंकर भोले भाले..." (आशा-रफ़ी), "सोलह सोमवार जिस घर में जलते सोलह दीप..." और "सोमवार के व्रत का..."। ’नाग मणि’ रमण बी. देसाई की फ़िल्म थी जिसमें निरुपा रॉय त्रिलोक कपूर, मन्हर देसाई, हेलेन मुख्य कलाकारों में थे। निरुपा रॉय और त्रिलोक कपूर की जोड़ी पौराणिक फ़िल्मों की हिट जोड़ी मानी जाती है और दोनों ने शिव-पार्वती की जोड़ी को परदे पर कई फ़िल्मों में साकार किया है। ’नाग मणि’ के संगीतकार थे अविनाश व्यास और गीतकार थे कवि प्रदीप। आशा भोसले और मन्ना डे की आवाज़ों में "ये है पाताल की दुनिया नागों..." फ़िल्म का एकमात्र गीत है नागों को समर्पित। शकीला - महिपाल के अभिनय से सजी लेखराज भाकरी निर्देशित फ़िल्म ’नाग पद्मिनी’ मुल्क राज भाकरी निर्मित फ़िल्म थी। पौराणिक फ़िल्मों में उन दिनों बड़े संगीतकार संगीत देने से कतराते थे टाइपकास्ट हो जाने के डर से। इस वजह से पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में संगीत देने वाले संगीतकारों की एक अलग श्रेणी ही बन गई थी। इस फ़िल्म में संगीत था सनमुख बाबू का और गाने लिखे प्रेम धवन ने। गीता दत्त और कृष्णा गोयल की आवाज़ों में "सपेरा बीन बजाये गयो, नागन को मस्त बनाये गयो, मैं तो बैठी हूँ दिल को हार, तीर तोरे नयनन का लागा जिगरवा के पार..." एक सुन्दर रचना है जिसमें बीन संगीत के सुन्दर टुकड़े रखे गए हैं। चतुर्भुज दोशी निर्देशित ’शेष नाग’ में शाहु मोडक और सुलोचना मुख्य कलाकारों में थे और त्रिलोक कपूर - निरुपा रॉय की जोड़ी फिर एक बार शंकर-पार्वती के रूप में प्रकट हुए। भरत व्यास के लिखे गीतों को अविनाश व्यास ने स्वरबद्ध किया, तथा सुधा मल्होत्रा और सुलोचना ने गीतों में आवाज़ें दीं। 1958 में विनोद देसाई निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग चम्पा’ जिसमें मन्हर देसाई, ललिता पवार और निरुपा रॉय मुख्य कलाकारों में थे। फ़िल्म के गीत-संगीत की ख़ास बात यह थी कि इसके संगीतकार थे मन्ना डे। लेकिन ताज्जुब की बात यह थी कि मन्ना डे ने अपनी आवाज़ में कोई भी गीत नहीं गाया और सभी गीत लता या आशा की आवाज़ में थे। लता की आवाज़ में "नागन बिछड़े नाग से..." फ़िल्म की एक सुन्दर रचना है। 1976 में ’नाग चम्पा’ शीर्षक से दोबारा एक फ़िल्म बनी, निर्माता थे महेन्द्र पटेल ने। एस. एन. त्रिपाठी ना केवल इस फ़िल्म के संगीतकार थे, बल्कि फ़िल्म का निर्देशन भी उन्होंने ही किया और एक चरित्र का अभिनय भी किया। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे कानन कौशल और शाहि कपूर। भरत व्यास के लिखे "नाग चम्पा हे नटराज बिनती सुनो..." (सुमन कल्याणपुर), "बीन बजा मेरे मस्त सपेरे..." (आशा) और "नाग पंचमी का आया है यह मंगल त्योहार..." (आशा) गीतों में नाग का उल्लेख और वर्णन मिलता है। 50 के दशक में बनने वाली नाग-नागिन के फ़िल्मों की बातें समाप्त करने से पहले 1959 में बनने वाली एक पाकिस्तानी फ़िल्म ’नागिन’ का ज़िक्र ज़रूरी है। ख़लील क़ैसर निर्देशित इस फ़िल्म में नीलो, रतन कुमार, हुस्ना, यूसुफ़ ख़ान आदि नज़र आए। क़तील शिफ़ई के लिखे नग़मों को सफ़दार हुसैन की मौसिक़ी में इक़बाल बानो, ज़ुबेदा ख़ानुम, नहीद नियाज़ी और सलीम रज़ा जैसे गायकों ने आवाज़ दी।

60 के दशक के शुरू में ही आई ’नाचे नागिन बाजे बीन’। कुमकुम, चन्द्रशेखर, हेलेन आदि के अभिनय से सजी इस फ़िल्म में मजरूह सुल्तानपुरी के गीत और चित्रगुप्त का संगीत था। लता, रफ़ी और साथियों की आवाज़ों में फ़िल्म का शीर्षक गीत है, जिसमें लता गाती हैं - "मैं हूँ गोरी नागन देखूंगी रसिया, कैसे आज नहीं बाजे तेरी बीन रे", जिस पर रफ़ी का जवाब है - "किसी परदेसी का छोटा सा जिया, ऐसे नाच के ना हौले हौले छीन रे"। फिर साथियों की आवाज़ में "नाचे रे नागिन बाजे रे बीन" पंक्ति गीत को फ़िल्म का शीर्षक गीत बनाती है। बीन की धुन और नृत्य प्रधान यह सुमधुर गीत लता-रफ़ी के गाए कमचर्चित युगल गीतों में से एक है। फ़िल्म का एक अन्य गीत है सुमन कल्याणपुर और मोहम्मद रफ़ी का गाया हुआ - "गोरी नागन बन के ना चला करो, जादू मारेगा सपेरा कोई आइके, दिल हाथ में लेके चला करो, मैं तो चलूंगी हज़ारों बलखाइके"। लोक धुन आधारित बीन संगीत प्रधान यह नृत्य रचना भी फ़िल्म की एक कर्णप्रिय रचना है। 1962 में शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म ’नाग देवता’ में अंजलि देवी, महिपाल, शशिकला मुख्य कलाकार थे। एस. एन. त्रिपाठी के संगीत में इस पौराणिक शैली की फ़िल्म में क़मर जलालाबादी ने गीत लिखे (एक गीत प्रकाश मेहरा का लिखा हुआ था)। यह फ़िल्म असफल रही और फ़िल्म के गीत भी नहीं चले। इसी तरह से 1963 की ’नाग मोहिनी’ भी फ़्लॉप रही। इस फ़िल्म में इन्दिरा बंसल, ख़ुर्शीद बावा, विजया चौधरी आदि कलाकार थे। भरत व्यास के गीत और सरदार मलिक का संगीत भी फ़िल्म को बचा नहीं सके। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में "फनवाले महाराज मेरी रखना तू लाज, गुण गाऊँ मैं आजा आजा तुझे कब से बुलाऊँ मैं" में "फनवाले महाराज" का उल्लेख ही नहीं बल्कि उनका गुणगान भी है कि किस तरह से उनके फन पर पूरी दुनिया टिकी हुई है। भरत व्यास ने बड़ी ख़ूबसूरती से इस गीत में नाग देवता पर लिखा है - "नाग देवता तेरा रूप है जैसे धूप और छाया, किसी ने जोखम पार सहे तो प्यार किसी ने पाया, मैं अनाथ सा फिरूँ भटकता किसी ने ना अपनाया, आज प्राण की भीख माँगने द्वार पे तेरे आया"। 1963 में नाग-नागिन फ़िल्मों की फिर एक बार होड़ सी लग गई थी। इसी साल आई ’सुनहरी नागिन’। बाबूभाई मिस्त्री ने अपने 50 के दशक के फ़ॉरमुले को लगा कर महिपाल और केलेन को मुख्य किरदारों में लेकर यह फ़िल्म बनाई। ख़ास बात यह कि इस बार उन्होंने संगीत का भार सौंपा कल्याणजी-आनन्दजी को। इस वजह से अब तक की फ़िल्मों के गीतों में जो एकरसता आई थी, वो थोड़ी दूर हुई। फ़ारूक़ क़ैसर, इंदीवर, गुल्शन बावरा, वेद पाल और आनन्द बक्शी ने फ़िल्म के गीत लिखे। लता मंगेशकर की आवाज़ में "बीन ना बजाना, ये जादू ना जगाना, के देगा ज़माना" एक सुन्दर रचना है। इस गीत में भी बीन की धुन है; इस बात की याद दिला दूँ कि 1954 की ’नागिन’ की वह प्रसिद्ध बीन संगीत कल्याणजी भाई ने अपने क्लेविओलिन पर बजाया था। हो सकता है कि इस फ़िल्म के तमाम बीन संगीत भी उसी साज़ पर तैयार किए गए हों। 1963 की अगली फ़िल्म ’नाग ज्योति’ के मुख्य कलकारों में फिर एक बार पौराणिक फ़िल्मों के कलाकार शामिल थे, जैसे कि महिपाल, अनीता गुहा, उमा दत्त और इंदिरा। फिर एक बार भरत व्यास और सरदार मलिक की जोड़ी ने गीत-संगीत का पक्ष संभाला। फ़िल्म का एक उल्लेखनीय गीत था आशा भोसले का गाया शिव तांडव स्तोत्र - "जटाटवी–गलज्जल–प्रवाह–पावित–स्थले..."। नाग-नागिन पार्श्व के पौराणिक फ़िल्मों में भगवान शिव का उल्लेख ज़रूर मिलता है और यह फ़िल्म कोई व्यतिक्रम नहीं। इसी साल ’बीन का जादू’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई थी जिसमें महिपाल, कुमुद त्रिपाठी, हेलेन आदि कलाकार थे और संगीत के लिए फिर एक बार एस. एन. त्रिपाठी को लिया गया था। बी. डी. मिश्र के लिखे गीतों को आवाज़ दी सुमन कल्याणपुर और महेन्द्र कपूर ने। इस फ़िल्म में भी एक शिव भजन था - "शंभु शंबु शंभु शंभु, हर हर महादेव त्रिपुरारी, जटाजुट धारी..."। इसे सुमन कल्याणपुर ने गाया था। 

1964 में ’पहाड़ी नागिन’ फ़िल्म बनी थी जिसमें इंदिरा, साधना खोटे, आज़ाद आदि कलाकार थे। इक़बाल का संगीत और फ़ारूक़ क़ैसर के गीत। फ़िल्म की कहानी के बारे में जानकारी उपलब्ध ना होने की वजह से यह कह पाना मुश्किल है कि "पहाड़ी नागिन" से वाक़ई किसी नागिन का कोई सम्पर्क है या फ़िल्म की नायिका के लिए ही ऐसे ही यह शीर्षक दिया गया है। 1966 में बलवन्त भट्ट निर्देशित फ़िल्म ’नागिन और सपेरा’ में मास्टर भगवान, शकीला, बेला बोस, मन्हर देसाई जैसे कलाकार थे और संगीत था कमचर्चित संगीतकार हरबंसलाल का। गीत लिखे सत्य पाल वर्मा ने। आशा भोसले की आवाज़ में "तेरी बीन है जादू मेरा..." गीत नागिन और सपेरे के रिश्ते को दर्शाता है। इसी साल शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग मन्दिर’। शान्तिलाल सोनी 1962 में ’नाग देवता’ निर्देशित कर चुके थे। जिस तरह से कल्याणजी-आनन्दजी ने 1963 में ’सुनहरी नागिन’ में संगीत दिया था, उसी तरह से ’नाग मन्दिर’ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीत दिया। असद भोपाली, भरत व्यास और शिव कुमार सरोज ने फ़िल्म के गीत लिखे। उन दिनों लता और रफ़ी के बीच बातचीत बन्द होने की वजह से फ़िल्म का एकमात्र युगल गीत लता ने महेन्द्र कपूर के साथ गाया। यह एक बेहद कर्णप्रिय रचना है "एक मंज़िल एक सफ़र है अब हमारा आपका"। लेकिन फ़िल्म के बॉक्स ऑफ़िस पर असफल रहने की वजह से ये गाने चर्चा में नहीं रहे। इस तरह से साल-दर-साल नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों में नज़र दौड़ाते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि जहाँ 50 के दशक में इस शैली की पौराणिक या स्टण्ट फ़िल्में हिट हो जाया करती थीं, वहाँ 60 के दशक में ये फ़िल्में फ़्लॉप होने लगी। दर्शकों की रुचि में बदलाव, बदलता दौर और बदलती पीढ़ी का असर नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली पौराणिक और फ़ैन्टसी फ़िल्मों में पड़ने लगी। 

अगले अंक में इस शोधालेख का दूसरा व अंतिम भाग पोस्ट किया जाएगा।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, May 18, 2014

एक सुषिर लोकवाद्य बीन, महुवर अथवा पुंगी

स्वरगोष्ठी – 168 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 6

'मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार...'  नागों को भी झूमने पर विवश कर देने वाला वाद्य


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की छठीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे जो सुषिर वर्ग का वाद्य है, अर्थात बाँसुरी या शहनाई की तरह इस वाद्य को भी हवा से फूँक कर बजाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि बीन के स्वर से नाग मुग्ध होकर झूमने लगते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के हमारे साथी सुजॉय चटर्जी इस सुषिर वाद्य पर चर्चा कर रहे हैं। 


दोस्तों, आपने शास्त्रीय मंचों पर कई ऐसे वाद्य देखे-सुने होंगे जो मूलतः लोकवाद्य श्रेणी में आते हैं, किन्तु गुणी संगीतज्ञों ने उनमें आवश्यक परिमार्जन कर शास्त्रीय संगीत के उपयुक्त बनाया। आज हमारी चर्चा में एक ऐसा लोकवाद्य है जो आज भी अपने मौलिक रूप में लोकमंचों पर ही सुशोभित है। वह वाद्य बीन है, जो कोई शास्त्रीय साज़ नहीं है, बल्कि इसे हम लोक-साज़ ही कहेंगे, क्योंकि इसका प्रयोग लोक संगीत मे स्वरवाद्य के रूप में ही होता है। इस साज का सर्वाधिक प्रयोग एक समुदाय विशेष के लोग अपने जीविकोपार्जन के लिए करते हैं। यह सपेरों का समुदाय है। बीन को आज हम सपेरों और साँपों से जोड़ते हैं। बीन वाद्य को पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। उत्तर और पूर्व भारत में इसे पुंगी, तुम्बी, महुवर, नागासर और सपेरा बाँसुरी के नामों से पुकारा जाता है, तो दक्षिण में नागस्वरम, महुदी, पुंगी और पमबत्ती कुज़ल नाम से प्रचलित है। पुंगी या बीन को सपेरे की पत्नी का दर्जा दिया जाता है और इस साज़ का विकास शुरु में लोक संगीत के लिए किया गया था।

पुंगी या बीन के चाहे कितने भी अलग-अलग नाम क्यों न हो, इस साज़ की जो संरचना है, वह हर स्थान पर लगभग एक जैसा ही है। इसकी लम्बाई करीब एक से दो फुट होती है। पारम्परिक तौर पर बीन या पुंगी एक सूखी लौकी से बनाया जाता है, जिसका इस्तेमाल एयर रिज़र्वर के लिए किया जाता है। इसके साथ बाँस के दो पाइप लगाये जाते हैं जिन्हें जिवाला कहा जाता है। इनमें से एक पाइप मेलोडी के लिए और दूसरा ड्रोन इफ़ेक्ट के लिए होती है। सबसे उपर लौकी के सूखे खोल के अन्दर एक ट्यूब डाला जाता है। वादक बाँसुरी की तरह है इसके सिरे पर फूँक मारता है। लौकी के खोल के अंदर फूँकने पर इसमें हवा भरती है और नीचे के हिस्से में लगे जिवाला से बाहर निकलती है। इन दोनों पाइपों में एक 'बीटिंग रीड' होती है जो ध्वनि उत्पन्न करती है। हम पहले ही यह चर्चा कर चुके हैं कि एक पाइप से मेलोडी बजती है और दूसरे से ड्रोन इफ़ेक्ट आता है। आधुनिक संस्करण में बाँस की दो पाइप के अलावा एक लम्बे मेटलिक ट्यूब का इस्तेमाल होता है। यह भी ड्रोन का काम करता है। पुंगी या बीन बजाते वक़्त हवा की निरन्तरता जरूरी है। फूँक में कोई ठहराव मुमकिन नहीं है। इसलिए इसे बजाने का जो सबसे प्रचलित तरीका है, वह है गोलाकार तरीके से साँस लेने का, जिसे हम अंग्रेज़ी में 'सर्कुलर ब्रीदिंग' कहते हैं। आइए, अब हम आपको समूह में बीन वादन सुनवाते हैं। इसे राजस्थान के लोक कलाकारों ने प्रस्तुत किया है।


समूह बीन वादन : राजस्थानी लोक धुन




पुंगी या बीन साज़ का इस्तेमाल राजस्थान के विख्यात लोकनृत्य, कालबेलिया में अनिवार्य रूप से होता है। इस नृत्य का कालबेलिया नामकरण इसी नाम से पहचाने जाने वाली एक बंजारा जाति के नाम पर पर हुआ है। यह जाति प्राचीन काल से ही एक जगह से दूसरे जगह पर निरन्तर घूमती रहती है। जीविकोपार्जन के लिए ये लोग साँपों को पकड़ते हैं और उनके ज़हर का व्यापार करते हैं। शायद इसी वजह से कालबेलिया लोकनृत्य के पोशाक में और नृत्य की मुद्राओं में भी सर्पों की विशेषताएँ देखी जा सकती हैं। कालबेलिया जाति को सपेरा, जोगिरा, और जोगी भी कहते हैं और ये स्वयं को हिन्दू मानते है। इनके पूर्वज कांलिपार हैं, जो गुरु गोरखनाथ के बारहवें उत्तराधिकारी थे। कालबेलिया सबसे ज़्यादा राजस्थान के पाली, अजमेर, चित्तौड़गढ़ और उदयपुर ज़िलों में पाये जाते हैं। कालबेलिया नृत्य इनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसमें पुरुष संगीत का पक्ष संभालते हैं। और इस पक्ष को संभालने के लिए जिन साज़ों का वे सहारा लेते हैं, उनमें शामिल हैं बीन या पुंगी, डफ़ली, खंजरी, मोरचंग, खुरालिओ और ढोलक, जिनसे नर्तकियों के लिए रिदम उत्पन्न की जाती है। जैसे जैसे नृत्य आगे बढ़ता है, रिदम और तेज़ होती जाती है। इन नर्तकियों का शरीर इतना लचीला होता है कि देख कर ऐसा लगता है जैसे रबर के बनें हैं। जिस तरह से बीन बजाकर साँपों को आकर्षित और वश में किया जाता है, कालबेलिया की नर्तकियाँ भी उसी अंदाज़ में बीन और ढोलक के इर्द-गिर्द लहरा कर नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

बीन का इस्तेमाल कई हिन्दी फ़िल्मी गीतों में भी हुआ है। और जब भी कभी साँपों के विषय पर फ़िल्म बनी तो बीन के पीसेस बहुतायत में शामिल हुए। कभी हारमोनियम और क्लेवायलिन से बीन की ध्वनि उत्पन्न की गई तो कभी कोई और सीन्थेसाइज़र से। क्योंकि मूल बीन बजाने में कठिन अभ्यास की जरूरत होती है, इसलिए ज़्यादातर गीतों में अन्य साज़ों पर मिलते-जुलते आवाज़ को उत्पन्न कर इस्तेमाल किया गया। किसी और साज़ के इस्तेमाल से बीन का ईफ़ेक्ट लाया गया है ज़्यादातर गीतों में। आइए, 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नागिन' का बेहद लोकप्रिय गीत सुनते हैं, लता मंगेशकर की आवाज़ में। इसके संगीतकार हेमन्त कुमार थे और गीत में बीन की आकर्षक धुन के वादक कल्याण जी थे। संगीतकार कल्याण जी-आनन्द जी जोड़ी के कल्याण जी उन दिनों हेमन्त कुमार के सहायक थे। गीत के शुरुआत में बीन की धुन का एक लम्बा टुकड़ा इस्तेमाल हुआ है। यह हिस्सा इतना अधिक लोकप्रिय हुआ था कि आज छः दशक बाद भी अगर किसी सन्दर्भ में बीन के धुन की ज़रूरत पड़ती है, तो इसी पीस का सहारा लिया जाता है। आप बीन की मोहक धुन से युक्त इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म - नागिन : ‘मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार...’ : लता मंगेशकर : संगीत – हेमन्त कुमार





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 168वें अंक की पहेली में आज हम आपको लगभग छः दशक पुराने एक लोकप्रिय फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत के इस अंश में किस ताल वाद्य का प्रयोग किया गया है? ताल वाद्य का नाम बताइए।

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 166वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको प्राचीन सुरबहार वाद्य पर प्रस्तुत तालबद्ध रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न के रूप में हमने प्रस्तुत रचना का राग पूछा था, जिसका सही उत्तर है- राग जैजैवन्ती। पहेली के दूसरे दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- धमार ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के अन्तर्गत लोकवाद्य बीन के बारे में चर्चा की। अगले अंक में हम एक ऐसे लोक तालवाद्य की चर्चा करेंगे, जो आज शास्त्रीय मंचों पर भी शोभायमान हो चुका है। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 


शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Wednesday, November 28, 2012

राग जौनपुरी और बातें बीन की - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 21 

नमस्कार दोस्तों, आज के इस साप्ताहिक ब्रोडकास्ट में हम आपके लिए लाये हैं राग जौनपुरी की चर्चा और बातें बीन की. प्रस्तुति है आपकी प्रिय होस्ट संज्ञा टंडन की, स्क्रिप्ट है कृष्णमोहन मिश्र की.



Sunday, February 20, 2011

सुर संगम में आज - बीन का लहरा और इस वाध्य से जुडी कुछ बातें

सुर संगम - 08

पुंगी या बीन के चाहे कितने भी अलग अलग नाम क्यों न हो, इस साज़ का जो गठन है, वह लगभग एक जैसा ही है। इसकी लम्बाई करीब एक से दो फ़ूट की होती है। पारम्परिक तौर पर पुंगी एक सूखी लौकी से बनाया जाता है, जिसका इस्तमाल एयर रिज़र्वर के लिए किया जाता है। इसके साथ बांस के पाइप्स लगाये जाते हैं जिन्हें जिवाला कहा जाता है।


सुप्रभात! 'सुर संगम' की आठवीं कड़ी में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। दोस्तों, पिछले सात अंकों में आप ने इस स्तंभ में या तो शास्त्रीय गायकों के गायन सुनें या फिर भारतीय शास्त्रीय यंत्रों का वादन, जैसे कि सितार, शहनाई, सरोद, और विचित्र वीणा। आज भी हम एक वादन ही सुनने जा रहे हैं, लेकिन यह कोई शास्त्रीय साज़ नहीं है, बल्कि इसे हम लोक साज़ कह सकते हैं, क्योंकि इसका प्रयोग लोक संगीत मे होता है, या कोई समुदाय विशेष इसका प्रयोग अपनी जीविका उपार्जन के लिए करता है। आज हम बात कर रहे हैं बीन की। जी हाँ, वही बीन, जिसे हम अक्सर सपेरों और सांपों से जोड़ते हैं। बीन पूरे भारतवर्ष में अलग अलग इलाकों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। उत्तर और पूर्व भारत में इसे पुंगी, तुम्बी, नागासर, और सपेरा बांसुरी के नामों से पुकारा जाता है, तो दक्षिण में नागस्वरम, महुदी, पुंगी और पमबत्ती कुज़ल नाम प्रचलित है। पुंगी या बीन को सपेरे की पत्नी का दर्जा दिया जाता है और इस साज़ का विकास शुरु शुरु में लोक संगीत के लिए किया गया था।

पुंगी या बीन के चाहे कितने भी अलग अलग नाम क्यों न हो, इस साज़ का जो गठन है, वह लगभग एक जैसा ही है। इसकी लम्बाई करीब एक से दो फ़ूट की होती है। पारम्परिक तौर पर पुंगी एक सूखी लौकी से बनाया जाता है, जिसका इस्तेमाल एयर रिज़र्वर के लिए किया जाता है। इसके साथ बांस के पाइप्स लगाये जाते हैं जिन्हें जिवाला कहा जाता है। इनमें से एक पाइप मेलडी के लिए और दूसरा ड्रोन ईफ़ेक्ट के लिए है। सब से उपर एक ट्युब डाला जाता है लौकी के अंदर, जो एक बांसुरी की तरह है जिसमें सपेरा फूंक मारता है बजाने के लिए। लौकी के अंदर हवा भरता है और नीचे के हिस्से में लगे दो पाइपों से बाहर निकल जाता है। इन दोनों पाइपों में एक 'बीटिंग रीड' होता है जो ध्वनि उत्पन्न करता है। और जैसा कि बताया, एक पर मेलडी बजती है और दूसरे से ड्रोन ईफ़ेक्ट आता है। आधुनिक संस्करण में बांस के दो पाइपों के अलावा एक लम्बे मेटलिक ट्युब का इस्तमाल होता है। यह ड्रोन का भी काम करता है। पुंगी या बीन बजते वक़्त कोई पौज़ मुमकिन नहीं है। इसलिए इसे बजाने का जो सब से प्रचलित तरीका है, वह है गोलाकार तरीके से सांस लेने का, जिसे हम अंग्रेज़ी में 'सर्कुलर ब्रीदिंग' कहते हैं।

पुंगी या बीन साज़ का इस्तेमाल करने वालों में कालबेलिया सम्प्रदाय एक मुख्य नाम है। कालबेलिया जाति एक बंजारा जाति है जो प्राचीन काल से ही एक जगह से दूसरे जगह पर निरंतर घूमती रहती है। जीविका उपार्जन के लिए ये लोग सांपों को पकड़ते हैं और उनके ज़हर का व्यापार करते हैं। और शायद इसी वजह से इनका जो लोक नृत्य है और जो पोशाक है, उनमें भी सर्पों की विशेषताएँ देखी जा सकती हैं। कालबेलिया जाति को सपेरा, जोगिरा, और जोगी भी कहते हैं और इनका धर्म हिंदु है। इनके पूर्वज कांलिपार हैं, जो गुरु गोरखनाथ के १२-वें उत्तराधिकारी थे। कालबेलिया सब से ज़्यादा राजस्थान के पाली, अजमेर, चित्तौड़गढ़ और उदयपुर ज़िलों में पाये जाते हैं। कालबेलिया नृत्य इनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसमें पुरुष संगीत का पक्ष संभालते हैं। और इस पक्ष को संभालने के लिए जिन साज़ों का वे सहारा लेते हैं, उनमें शामिल हैं पुंगी, डफ़ली, बीन, खंजरी, मोरचंग, खुरालिओ और ढोलक, जिनसे नर्तकियों के लिए रीदम उत्पन्न की जाती है। जैसे जैसे नृत्य आगे बढ़ता है, रिदम और तेज़ होती जाती है। इन नर्तकियों का शरीर इतना लचीला होता है कि देख कर ऐसा लगता है जैसे रबर के बनें हैं। जिस तरह से बीन बजाकर सांपों को आकर्षित और वश में किया जाता है, कालबेलिया की नर्तकियाँ भी उसी अंदाज़ में बीन और ढोलक के इर्द गिर्द लहरा कर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। तो आइए किसी संगीत समारोह से प्राप्त एक विडिओ देखें और सुनें जिसमें वादक बीन बजा रहे हैं और साथ में ढोलक है संगत के रूप में।

बीन की धुन


बीन का इस्तमाल बहुत से हिंदी फ़िल्मी गीतों में होता आया है। और जब भी कभी सांप के विषय पर फ़िल्म बनी तो बीन के पीसेस बहुतायत में शामिल हुए। कभी हारमोनियम और क्लेविओलिन से बीन की ध्वनि उत्पन्न की गई, कभी कोई और सीन्थेसाइज़र से। क्योंकि मूल बीन बहुत ज़्यादा सुरीला या कर्णप्रिय नहीं होता है, इसलिए किसी और साज़ के इस्तमाल से बीन का ईफ़ेक्ट लाया गया है ज़्यादातर गीतों में। आइए फ़िल्म 'नगीना' का शीर्षक गीत सुनते हैं लता मंगेशकर की आवाज़ में; आनंद बक्शी के बोल और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत। गीत की शुरुआत में एक लम्बा पीस है बीन का, और यह पीस बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुई थी और आज भी अगर किसी संदर्भ में बीन के धुन की ज़रूरत पड़ती है, तो इसी पीस का सहारा लिया जाता है।

मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा (नगीना)


सुर-संगम में आज बस इतना ही, अगले हफ़्ते फिर कुछ और लेकर हम हाज़िर होंगे, अनुमति दीजिये, नमस्कार!

प्रस्तुति-सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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