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Saturday, July 5, 2014

"मोरा गोरा अंग ल‍इ ले..." - जानिये किन मुश्किलों से गुज़रते हुए बना था यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 35
 

मोरा गोरा अंग ल‍इ ले...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्युटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 35-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'बन्दिनी' के गीत "मोरा गोरा अंग ल‍इ ले..." के बारे में। 




गुलज़ार
फ़िल्म 'बन्दिनी' का निर्माण चल रहा था, जिसके निर्देशक थे बिमल राय, संगीतकार थे सचिनदेव बर्मन और बतौर गीतकार शैलेन्द्र फ़िल्म के गाने लिखने वाले थे। अब हुआ यूँ कि दादा बर्मन और शैलेन्द्र के बीच किसी वजह से मनमुटाव हो गया और ग़ुस्से में आकर सचिन दा ने कह दिया कि वो शैलेन्द्र के साथ काम नहीं करेंगे। इसी समय बिमल दा के लिए इस फ़िल्म का पहला गीत शूट करना बेहद ज़रूरी हो गया था। वो मुश्किल में पड़ गये; लाख समझाने पर भी सचिन दा शैलेन्द्र जी के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं हुए। जब बिमल दा ने यह बात शैलेन्द्र को बताई तो शैलेन्द्र जी सोच में पड़ गये कि बिमल दा को इस मुश्किल से कैसे निकाला जाये। उन्हीं दिनों शैलेन्द्र Bombay Youth Choir के सदस्य हुआ करते थे जिसके गुलज़ार भी सदस्य थे। यह कॉयर किशोर कुमार की पत्नी रूमा देवी चलाती थीं। गुलज़ार उन दिनों एक गराज में गाड़ियों को रंगने का काम किया करते थे और एक लेखक बनने का ख़्वाब देखा करते। क्योंकि शैलेन्द्र को गुलज़ार के इस लेखन-रुचि का पता था, उन्होंने गुलज़ार से कहा कि जाकर बिमल दा से मिले और बताया कि बिमल दा के लिए एक गीत लिखना है। क्योंकि गुलज़ार को गीत लेखन में कोई रुचि नहीं थी और न ही वो फ़िल्मों के लिए कुछ लिखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शैलेन्द्र जी को मना कर दिया। पर शैलेन्द्र जी कहाँ मानने वाले थे। आख़िरकार शैलेन्द्र की ज़िद के आगे गुलज़ार को झुकना पड़ा। गुलज़ार अपने एक दोस्त देबू के साथ, जो उन दिनों बिमल दा के सहायक थे, पहुँच गये बिमल राय के डेरे पर। बिमल दा ने गुलज़ार को उपर से नीचे तक देखा और देबू की तरफ़ मुड़ कर बांगला में बोले, "भद्रलोक कि बैष्णब कोबिता जाने?" (क्या इस महाशय को वैष्णव कविता पता है?) जब देबू ने बिमल दा को बताया कि गुलज़ार को बांगला समझ आती है, तो बिमल दा को शर्म आ गई। ख़ैर, बिमल दा ने गुलज़ार को सिचुएशन समझाया और सचिन दा के पास भेज दिया धुन सुनने के लिए। दादा बर्मन से धुन लेकर गुलज़ार चले गये घर और एक सप्ताह बाद गीत लेकर वापस पहुँच गये सचिन दा के पास। सचिन को जब गीत सुनाया तो उन्हें पसन्द आया। गुलज़ार ने पूछा कि क्या मैं बिमल दा को जा कर गीत सुना दूँ? सचिन ने पूछा कि क्या तुम्हे गाना आता है? गुलज़ार के ना कहने पर सचिन ने उन्हें बिमल दा को गीत सुनाने से मना करते हुए कहा, "अरे तुम कैसा भी सुनायेगा और हमारा ट्युन रीजेक्ट हो जायेगा"। ख़ैर, बिमल राय को गीत और धुन, दोनों बहुत पसन्द आया और गायिका के रूप में लता मंगेशकर का नाम चुन लिया गया। गुलज़ार को ये सब कुछ सपना जैसा लग रहा था। एक सप्ताह पहले वो एक गराज में मकेनिक थे और एक सप्ताह बाद उनके लिखे पहले फ़िल्मी गीत के साथ सचिनदेव बर्मन और लता मंगेशकर का नाम जुड़ रहा था। वाकई यह किसी सपने से कम नहीं था।

बिमल राय
"मोरा गोरा अंग लै ले" की सिचुएशन कुछ ऐसी थी कि नूतन, यानी कल्याणी, मन ही मन बिकाश, यानी अशोक कुमार को चाहने लगी है। एक रात चुल्हा-चौका समेट कर गुनगुनाती हुई बाहर निकल रही है। इस सिचुएशन पर यह गीत आता है। गीत बनने के बाद बिमल राय और सचिन देव बर्मन के बीच एक और विवाद खड़ा हो गया। बिमल दा चाहते थे कि गीत घर के अन्दर फ़िल्माया जाये, जबकि सचिन देव बर्मन आउटडोर के लिए इन्टरल्युड बना चुके थे। बिमल राय ने तर्क दिया, यह कहते हुए कि ऐसा करेक्टर घर से बाहर जाकर नहीं गा सकती। सचिन दा ने कहा कि बाहर नहीं जायेगी तो बाप के सामने गायेगी कैसे? दादा बर्मन के सवाल पर बिमल राय ने दलील दी कि बाप से हमेशा वैष्णव कवितायें सुना करती हैं तो गा क्यों नहीं सकती? सचिन दा बोले, "यह कविता पाठ नहीं है दादा, यह गाना है"। इस बात पर बिमल दा बोले कि तो फिर कविता लिखो, वो कविता गायेगी। अब सचिन देव बर्मन को झल्लाहट होने लगी। फिर भी उन्होंने अपनी दलील दी कि गाना घर में घुट जायेगा। उनके इस बात पर बिमल दा ने कहा कि तो फिर आंगन में ले जाओ, लेकिन बाहर नहीं जायेगी। सचिन देव अब इस बात पर अड़ गये कि अगर वो बाहर नहीं जायेगी तो हम भी गाना नहीं बनायेगा। इस तरह थोड़ी देर बहस चलती रही। और बाद में दोनों ने डिसाइड किया कि चलो कल्याणी यानी नूतन को घर के आंगन में ले जाते हैं और तय हो गया कि यह गाना कल्याणी आंगन में ही गायेगी। बिमल राय और दादा बर्मन ने अब गुलज़ार से बोला कि अब तुम इस गाने को आंगन का गाना बनाओ। गुलज़ार फिर देबू के पास गये। उससे वैष्णव कवितायें ली, जो कल्याणी अपने पिता से सुना करती थी। बिमल दा ने गुलज़ार से कहा कि सिचुएशन कुछ ऐसी होगी कि रात का वक़्त है, कल्याणी को यह डर है कि चाँदनी रात में उसे कोई देख न ले। इसलिए वो घर से बाहर नहीं जा रही है। वो आंगन से आगे नहीं जा पाती। इस पर सचिन देव बर्मन ने भी अपनी बात ऐड कर दी, चांदनी रात में भी वो डरती तो है, मगर बाहर चली आयी है। अब मुड़-मुड़ कर आंगन की तरफ़ देखती है, ऐसा कुछ भी होगा, इस पर भी कुछ लिखो। तो गुलज़ार साहब ने बिमल राय और सचिन देव बर्मन, दोनों की बातों को मिला कर, कल्याणी की हालत समझ कर जो गीत लिखा, वह गीत था "मोरा गोरा अंग लै ले, मोहे श्याम रंग दै दे"। क्या मास्टरपीस गीत लिखा गुलज़ार ने। इस गीत को सुनने के बाद शैलेन्द्र ने भी स्वीकार किया कि इतना अच्छा शायद वो भी नहीं लिख पाते इस सिचुएशन पर। बिमल दा और शैलेन्द्र, दोनो यह चाहते थे कि 'बन्दिनी' के बाकी के गीत भी गुलज़ार ही लिखे। पर सचिन देव बर्मन ने गुलज़ार जैसे नये गीतकार के साथ काम करने से मना कर दिया। जल्द ही उनकी शैलेन्द्र से दोस्ती हो गई और उन्होंने ऐलान किया कि इस फ़िल्म के बाकी गीत शैलेन्द्र ही लिखेंगे। सचिन दा का मिज़ाज कुछ ऐसा हुआ करता था कि उनकी बात को टालना किसी के बस की बात नहीं होती। इस बात पर बिमल दा और शैलेन्द्र, दोनों को गुलज़ार के लिए बुरा लगा, पर गुलज़ार ने कुछ भी नहीं कहा और शैलेन्द्र जी को उनकी कुर्सी वापस देते हुए कहा कि यह आप ही की कुर्सी है, आप ही सम्भालिये। बस, इतनी सी है इस गीत के पीछे की कहानी। लीजिए, अब आप भी उस गीत को सुनिए।

फिल्म - बंदिनी : 'मोरा गोरा अंग लइले मोहे श्याम रंग दइदे...' : लता मंगेशकर : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - गुलजार 




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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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