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Saturday, December 27, 2008

रफ़िक़ शेख की ग़ज़ल ने ली जबरदस्त बढ़त, छोडा खुशमिजाज़ मिटटी को पीछे

अक्तूबर के अजय वीर गीत हैं फ़िर एक बार आमने सामने, और पहले चरण के तीसरे और अन्तिम समीक्षक की पैनी नज़र है उन पर. देखते हैं कि क्या फैसला उनका-

डरना झुकना छोड़ दे

गीत बेहद प्रभावी है । बोल बढिया हैं । अच्‍छी बात ये है कि ये गीत एक संदेश देता है । संयोजन और गायकी में भी ये गीत एकदम युवा है । क्‍लब मिक्‍स में जो टेक्‍नो इफेक्‍ट्स हैं वो अच्‍छे लगते हैं । लेकिन मुझे लगता है कि पंजाबी तड़का मिक्‍स ज्‍यादा अच्‍छा बन पड़ा है । इसे हम सूफी मिक्‍स कहते तो ज्‍यादा अच्‍छा लगता । अब तक का सर्वश्रेष्‍ठ गीत ।
गीत—पूरे पांच. धुन और संगीत संयोजन-पूरे पॉँच, गायकी और आवाज़-पूरे पांच, ओवारोल प्रस्तुति-पूरे पांच
कुल- २०/२०: १०/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 20.5 / 30

ऐसा नहीं कि आज मुझे चांद चाहिए---

इस ग़ज़ल की शायरी ज़रा कमज़ोर लगी । गायकी और संगीत संयोजन उत्‍तम ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १८/२०: ९/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30


सूरज चांद और सितारे

ये ठीक है कि ये हिंद युग्‍म पर अब तक का सबसे बड़ा ग्रुप है । लेकिन दिक्‍कत ये है कि जिस गीत को चुना गया है वो काफी कमज़ोर है । बोलों और भावों में गहराई नहीं है । गायकी और संगीत-संयोजन अच्‍छा है । मुझे लगता है कि अगर ये बैंड उत्‍कृष्‍ट बोलों वाले गीतों को लेकर प्रस्‍तुत हो तो बहुत संभावनाएं खुल सकती हैं ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १५/२०: ७.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 22.5 / 30


तेरा दीवाना हूं
आवाज़ अच्‍छी है । पर नज़्म कमज़ोर है । नज़्म के कुछ हिस्‍से अच्‍छे बन पड़े हैं । संगीत संयोजन उम्‍दा ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-५
कुल- १९ /२०: ९.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 27 / 30


ओ साहिबां

गीत को सुनते ही पहली पंक्ति में ही एक बात खटकती है । गायक को नुक्‍तों का अंदाज़ा नहीं है । ख़ामख़ां को ‘खामखां’ और ‘ख़ुमारी’ को ‘खुमारी’ गाने से गीत का मज़ा बिगड़ गया है । संगीत औसत है ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, गायकी और आवाज़-३
कुल- १३ /२०: ६.५ /१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30

अक्तूबर के गीतों का पहले चरण की परीक्षा को पार करने का बाद अब तक का समीकरण इस प्रकार है -

तेरा दीवाना हूँ - २७ / ३०.
खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
ओ साहिबा - २४ / ३०
ऐसा नही - २४ / ३०.
सूरज चाँद और सितारे - २२.५ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
डरना झुकना - २०.५ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.



Tuesday, December 23, 2008

जब अक्टूबर के अजय वीर गीत दूसरी बार भिडे...

किन्हीं कारणों वश हम अपनी समीक्षाओं की प्रस्तुति में कुछ पीछे छूट गए थे. पर कोशिश हमारी रहेगी कि जनवरी के पहले सप्ताह के अंत तक हम इस सत्र के सभी गीतों की पहले चरण की समीक्षा और अंक तालिका आपके समुख रख सकें. तो सबसे पहले नज़र करें कि क्या कहते हैं हमारे दूसरे समीक्षक अक्टूबर के अजय वीर गीतों के बारे में -

डरना झुकना छोड दे, सारे बंधन तोड दे..

इस अच्छे गीत की शुरुआत में ही गायकों से हारमोनी के सुरों में गडबड हो गयी है.सुरों की पकड किसी भी सूरत में स्थिर हो नही पाती, जिसकी वजह से आगे चल कर भी गीत प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है. जोगी सुरिंदर और अमनदीप का गला तरल ज़रूर है, मगर इस गफ़लत की वजह से पेरुब द्वारा रचे गये सुरों के इस अज़ीम शाहकार में बॆलेंस नहीं रह पाता.

इसी वजह से पंजाबी तडके में भी स्वाद में उतना जायका नही ले पाता सुनने वाला श्रोता, जो आगे चलकर थोडा सुरीला ज़रूर हो जाता है.मगर कर्णप्रिय या लोकप्रिय होना याने गुणवता में उच्च कोटी का होना यह समीकरण नहीं है, कम से कम मेरे विचार से.सुर और ताल किसी भी गाने के मूल तत्व हैं, और इसमें कमी-बेशी पूरे गीत के स्ट्रक्चर को विकलांग बनाता है.

यूं नहीं की इसमें कोई अच्छाई नहीं है. शुरुआत की संयोजन में हुई कमी के बावजूद गायको के वोईस थ्रो और उर्जा का भंडार असीमित लगता है.गायकों में उम्मीद की किरण नज़र आती है.

मगर एक बात की तारीफ़ किये बगैर समीक्षा पूर्ण नही होगी. सजीव सारथी द्वारा लिखे इस गीत के बोलों में जो आग का, चेतना का प्रस्फ़ुटन हुआ है, उसकी वजह से युवा मन के विद्रोह के स्वर और जोश के तूफ़ान की अभिव्यक्ति अचूक हो पाई है.इस तरह के गीतों से रसोत्पत्ति के माध्यम -संगीत और स्वर का शुद्ध समन्वय हमें सुनने को मिलता है.

इसीलिये,यह गीत खत्म होने के बाद भी मन के पीछे याद के किसी कोने में सहज कर रखा गया और बाद में भी किसी दूसरे कार्य के बीच जुगाली की तरह हमारे कानों के इंद्रियों के समक्ष रिकॊल हो जाता है. चलो ये भी क्या कम है.

गीत - 3.5, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 14.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 10.5/20

ऐसा नही के आज मुझे चांद चाहिये..

शिवानी द्वारा लिखा गया यह गीत बेहद श्रवणीय बन पडा है, इसका पूरा श्रेय संगीतकार ऋषि को जाता है. इस गीत के हर शब्द में छिपी हुई वेदना को प्रतिष्ठा की मासूमियत भरी आवाज़ नें अच्छी तरह से उभारा है.

मगर उनकी आवाज़ के लोच और माधुर्य के साथ साथ स्वर नियंत्रण और सुरों पर ठहरने चलने की सरगम यात्रा का एक सुर से दूसरे पर जाने का सफ़र थोडा़ और सुरीला होता तो इस प्रस्तुति को अधिक अंक मिल सकते थे.गीत को कालजयी बनने में इन सभी का योगदान होता है, तब कहीं जाकर गीत आपके जेहन में हमेशा के लिये कैद हो जाता है.

फ़िर भी ऋषि के स्वरों के और वाद्यों के चयन, इंटरल्युड में हारमोनी के पुट की वजह से मैं तो इसे बार बार सुन रहा हूं, और नारी हृदय के भावों में मन की निश्छलता प्रतिष्ठा जी की आवाज़ से निकल कर सीधे आपके मन की गहराई में जाती है, और आप उसके सुख दुख में एकाकार हो जाते है. चांद की ख्वाहिश ना रख कर विश्वास को प्राधान्यता देना अपने आप में एक बडी बात कह जाती है इस गीत का भावार्थ, जिसके लिये गीतकार को साधुवाद.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 15.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/२०

सूरज चांद और सितारे

कृष्णा पंडित और साथियों द्वारा यह गीत बडे ही जोश और जुनून से गाया है. इस रॊक गीत की शुरुआत से ही जो रिदम की उर्जा का स्रोत फूट पडा है, वह गीत के बोलों को समर्थन करते हुए युवा स्पंदन का प्रतिनिधित्व करता है.

गीत के बोल जिस तरह इस धुन में संजय द्विवेदी नें पिरोये है,या जिस तरह से संगीतकार चैतन्य भट्ट नें इन नई पीढी की भावनाओं के प्रतिबिंब गीतों के बोलों को अपनी गतिवान धुन से चैतन्य बनाया है, दोनो ही बधाई के पात्र है.

मगर गायक समूह इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी इस द्रुत लय के गीत में टेम्पो पकडने में कहीं कहीं पिछड़ जाते है,या फ़िर कहीं कहीं समय पर सम पर पहुंचने के लिये शब्दों को अस्पष्ट या जल्द डिलेवर कर जाते है.

फिर भी धुन की आकर्षकता और ऑवरोल प्रस्तुती इसे पार पहूंचा देती है,और यादगार भी बना देती है.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 4, प्रस्तुति - 3.5, कुल - 15; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/20.

आखरी बार बस.

प्रस्तुत गीत के हर पहलू में एक उत्तमता , उत्तुंगता और गहराई के दीदार होते है, इसमें कोई शक नहीं. मोईन नज़र नें लिखे इस प्रसिद्ध गज़ल के हर शब्द का अपना खुद का वज़्न और सौंदर्य है, जो विरह की इन्तेहां का खूब बयां करता है, साथ ही एक उम्मीद का शेड़ दिखा जाता है. ऐसी गज़ल कृति को स्वर बद्ध कर पाना और निभा जाना कठिन है, जो संगीतकार रफ़ीक शेख़ नें सहजता से और बखूबी निभाया है.

साथ ही उनका गायन गीत को और मेलोडियस,श्रव्य एवं सुकून भरा बना जाता है. उनकी जादुई आवाज़ सधी, नियंत्रित , गज़ल गाने को पूरी तरह मुआफ़िक और मॊड्युलेशन के कणों से भरपूर है. फ़िल्मी संगीत या रेकोर्डेड नॊन फ़िल्मी गीत या गज़ल की सारी खूबियां अपनें में समाये हुए इस गीत की रिपीट वॆल्यु भी साबित होती है जब मन इस गज़ल को सुनने को फिर मांग उठता है.

वैसे इस तरह की तर्ज़ काफ़ी परिभाषित लगती है, और किसी आश्चर्य या अनूठेपन से मरहूम होने से युवाओं के आज की पीढी की मान्यताओं और मांगों को शायद ही पूर्ण कर पायेगी. मगर फ़िर वही बात- कर्णप्रियता या मधुरता में कोई ट्विस्ट की दरकार नही हो सकती. शायद इसीलिये, ऐसी धुनें काल के थपेडों को भी झेल जाती है, और लंबी दूरी का घोडा़ साबित होती है.यकीन ना हो तो फ़िल्मी गीतों का इतिहास पलट कर चेक कर लिजिये.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4.5, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 17; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/20

ओ साहिबा

विश्वजीत एक अच्छे गायक है, और इस गीत में अलग अंदाज़ में अलग जॊनर का गीत बखूबी गाया है. इस गीत का यु एस पी भी यही मुख्त़लिफ़ अंदाज़े बयां है. थोडा और परिश्रम कर स्वरों के ठहराव पर ज़्यादा ध्यान देते तो और चार चांद लग जाते.

सजीव सारथी हमेशा की तरह यहां एक मुख्त़लिफ़ सा विचार लेकर निराला माहौल रचते है. उनके तरकश में शब्दों के तीर भरे हुए है,और सही जगह सही और उचित शब्दों को रखनें में महारत हासिल कर चुके है. उनके बोलों में क्लिष्टता के अभाव की वजह से,और मीटर में घड़न होने की वजह से गेत के गेय बनने के कारण, इस फ़्रंट पर गीत के गायक और संगीतकार को बंदिश में सरलता और तरलता दोनो का लाभ दे जाती है. दिन के जलने का और रात के बुझने का मौलिक खयाल मन मोह लेता है .(कब जले दिन यहां और कब बुझे रातें...) बहूत खूब.

यही बात सुभोजित के बारे में भी कही जा सकती है.गाने के संगीत का एक अपना रिदम है,चैतन्य है.उन्होनें अपनी तरफ़ से से कहीं भी गाने को सुरों द्वारा या वाद्यों द्वारा लाऊड़ नहीं होने दिया है. बेकरारी और खुमारी का चित्रण सुरों के ब्रश से स्ट्रोक देकर रंगा गया है. मन की उहापोह की स्थिति ज़रूर ग्रुप वायोलीन (सिन्थेसाईज़र) के घुमावदार सरगम की मदत से दिखाया है, मगर वह भी नियंत्रित.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 16.5 ; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/२०

Monday, November 17, 2008

अक्तूबर के अजय वीर पहली बार आमने सामने

अक्तूबर के अजय वीर गीतों के पहले चरण की पहली समीक्षा में समीक्षक ने मेलोडी को तरजीह दी है...

गीत # १४ - डरना झुकना छोड़ दे

एकदम सामान्य गीत, पूरा सुन पाना भी मुश्किल... गीत के ३ और गायकी के ३ अंक के अलावा बाकी सारे पक्षों में एक भी नंबर दे पाना मुश्किल।
गीत ३, संगीत ० , गायकी ३, प्रस्तुति ०, कुल ६ / २०.

3/10.

गीत # 15 -ऐसा नही कि आज मुझे चाँद चाहिए

एक और कर्णप्रिय रचना.. गीत बढ़िया संगीत उम्दा , प्रस्तुति भी बढ़िया बस गायकी में (नीचे सुरों में )थोड़ी सी गुंजाईश और हो सकती थी। फिर भी आलओवर बहुत बढ़िया रचना।
गीत ४, संगीत ४, गायकी ३.५, प्रस्तुति ३.५, कुल १५ /२०

7.5/10

गीत # 16 -सूरज चाँद सितारे..

कर्णप्रिय गीत, एक बार सुनने लायक।
गीत ४,संगीत ३.५,गायकी ३.५, प्रस्तुति ४ कुल १५/२०.

7.5/10.


गीत # 17 -आखिरी बार तेरा दीदार ...

बहुत ही सुन्दर गज़ल,सभी पहलूओं पर कलाकारों ने अपना पूरा योगदान दिया। संगीत,गायकी,गीत सब कुछ शानदार। बेहद कर्णप्रिय।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४.५ प्रस्तुति ४.५ कुल १८/२०.

9/10.

गीत # 18 -ओ साहिबा

एक बार फिर सजीव सारथी के मधुर गीत को शुभोजीत ने सुन्दर संगीत में ढ़ाला और उतनी ही सुन्दरता से बिस्वजीत ने इसे गाया। कहीं कहीं साँस लेने की आवाज को बिस्वजीत छुपा नहीं पाये, थोड़ा सा ध्यान देना होगा उन्हें।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४ प्रस्तुति ५ कुल १८ / २०.

9/10.

चलते चलते -

लगता है अब तक समीक्षा के पहले चरण को पार चुके आधे सत्र के गीतों को इन नए गीतों से जबरदस्त टक्कर मिलने वाली है. कुल मिला कर यह सत्र एक उत्तेजना से भरे पड़ाव की तरफ़ बढ रहा है, जहाँ एक से बढ़कर एक गीत एक दुसरे से भिड रहे हैं सरताज गीत की दावेदारी लेकर. संगीत और संगीत प्रेमियों के लिए तो ये सब सुखद ही है

Tuesday, October 7, 2008

जानिए ज़ोरबा के माने पेरुब से

सूफी रॉक संगीत के नए पहरुए हैं लुधिआना के पेरुब और उनके जोडीदार जोगी सुरेंदर और अमन दीप कौशल. "ज़ोरबा" ग्रुप के इन पंजाबी मुंडों का नया गीत "डरना झुकना" इन दिनों आवाज़ पर धूम मचा रहा है. आवाज़ के लिए अर्चना शर्मा ने की उनसे एक ख़ास मुलकात. पेश है उसी संवाद के ये अंश -



पेरुब, संगीत को जीवन मार्ग बनाने की प्रेरणा किससे मिली आपको ?

संगीत की प्रेरणा मुझे मेरी माता जी ने और मेरे बड़े भाइयों ने दी ......

कितना समय हो गया आपको संगीत को अपना कैरियर बनाये हुए ?

इस क्षेत्र मैं मुझे तकरीबन आठ साल से जयादा हो गए हैं ...........

आपके गुरु कौन रहे ? मतलब संगीत की तालीम आपने किससे ली ?

गुरु तो बहुत हैं संगीत के .... मगर संगीत की सही शिक्षा मैंने प्रोफ. मनमोहन सिंह जी से ...प्रोफ. श्री. शान्ति लाल जी से और संत मोहन सिंह, सुखदेव सिंह नामधारी जी से प्राप्त की .....

ज़ोरबा का क्या अर्थ है पेरुब ?

ज़ोरबा का अर्थ है जो नाच सके बिना ताल के, जो गा सके बिना साज़ के, जो संसार के हर रंग में रहते हुए, संसार से, जिसको अलग हो जाना है बिना कुछ किए....हर आदमी ज़ोरबा ही है " who is going to be buddha, is zorba " इस से जयादा कहना मुश्किल होगा .....वैसे ज़ोरबा हम ने आपने बैंड ग्रुप का नाम रखा है ...जोगी और मैं दोनों एक साथ स्कूल मैं ही पड़ते थे .जोगी पहले से ही गाता था. जोगी अमन और मैं एक ही गुरुजनों से सीखे हुए हैं . यूँ कहें की हम गुरुभाई है . जोगी अमन और मैं बचपन के ही दोस्त हैं और हम तीनो को बचपन से ही संगीत मैं रुची थी और अब यही profession बन गया है हम सबका.

आपने अब तक के सफर के बारे में एक संक्षित सा ब्यौरा दीजिये पेरुब ?

मेरा जन्म १९८१ मैं लुधिअना हुआ और बचपन की शिक्षा आपने माता पिता से दादी से और शहर के स्कूल से ही प्राप्त की, बाद मैं प्राइवेट कॉलेज मैं बी.बी.ए. से ड्राप आउट हूँ :-).........स्कूल मैं रहते ही संगीत से बहुत लगाव था...संगीत का सफर भी स्कूल से शुरू हो गया था .......पिता जी के देहान्त के बाद काफी कुछ बदल गया और फिर मुझे आपने पैरों पर जल्दी ही खड़ा होना था..........सो तब से लेकर आज तक struggle चल रही है.......

आपका झुकाव सूफियाना संगीत की तरफ ज्यादा है, कोई ख़ास वजह ?

वैसे तो हर किस्म का संगीत सुनना पसंद करता हूँ : जहाँ तक सूफी म्यूजिक का सवाल है, इस का कारण बताना मुश्किल है : बस यही कहूँगा की मेरे दिल को जल्दी छू लेता है...............

पहला सुर से पहले क्या आपकी कोई और भी एल्बम आयी है ?

पहला सुर एल्बम से पहले मैंने ९ धार्मिक एल्बमस (हिन्दी,पंजाबी दोनों) और २ documentries फिल्मों (जैन धरम पर आधारित) और ११ पंजाबी गानों में संगीत दिया ..........

कैसा रहा हिंद युग्म के साथ काम करने का अनुभव ?

हिन्दयुग्म के साथ काम करके मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं चाहता हूँ की जो भी वह सब प्रयास कर रहे है, उसमे वह सफल हों

भविष्य की योजनायें क्या है ?

आने वाले सालों मैं मेरी यही कोशिश है की अच्छा संगीत लोगो तक पंहुचा सकूँ जो दिल को सुकून दे सके .............


संगीत के अलाव और क्या क्या करना पसंद है ?

संगीत के अलावा मुझे घूमने और नई जगहों पर जाना पसंद है , हाँ कुछ पुस्तकें पढने का भी शौंक है..........

अपने श्रोताओं और चाहने वालों के नाम कोई संदेश ?

बस यही कहूँगा की अच्छा सुने अच्छा गायें और अच्छा सुनायें ..

पेरुब और उनकी टीम को हिंद युग्म की तरफ़ से भी बहुत सी शुभकामनायें. आईये एक बार फ़िर से आनंद लें उनके इस नये गीत "डरना झुकना छोड़ दे" का (गीत को सुनने के लिए नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें)
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Friday, October 3, 2008

है मुमकिन वो करना तुझे, जो नामुमकिन दुनिया कहे...

दूसरे सत्र के चौदहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज.

"पहला सुर" एल्बम में अपने सूफी गीत "मुझे दर्द दे" से धूम मचाने वाले पंजाबी मुंडे एक बार फ़िर लौटे हैं नए सत्र में, एक नए गीत "डरना झुकना छोड़ दे" लेकर. पेरुब के नेतृत्व में जोगी सुरेंदर और अमनदीप कौशल ने गाया है इसे और सजीव सारथी ने लिखे हैं बोल इस नए गीत के. इस गीत के मध्यम से पेरुब एक संदेश देना चाहते हैं आज के युवा वर्ग को उन्हें उम्मीद है कि उनका यह प्रयास हमारे श्रोताओं को पसंद आएगा.

The team of sufiyaana singers from ludhiana is back with a bang, Perub composed this new song "darna jhukna" penned by Sajeev Sarathie and sung by Jogi Surender and Aman Deep Kaushal along with Perub.This song has a strong massage for new generation of India, that is way Perub wants this song to be opened a day after Gandhi jayanti. So here we present the song for all our audience. please spare a few moment to give your valuable comment/suggestion about this brand new song

तो लीजिये प्रस्तुत है ये नया गीत, जो दो संस्करण में है. पहला है क्लब मिक्स और दूसरा है पंजाबी तड़का (जिसमें ढोलक और तबला का अतिरिक्त प्रभाव दिया गया है). पेरुब और उनकी टीम को आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा.

डरना झुकना ....( क्लब मिक्स )



डरना झुकना... ( पंजाबी तड़का )





गीत के बोल - lyrics

डरना झुकना छोड़ दे,
सब जंजीरें तोड़ दे,
आ चल अपने इस जोश में,
अब तूफानों को मोड़ दें...
यारा वे.....

जुल्म भला अब क्यों सहें,
चुप बे - वजहा क्यों रहें,
आवाज़ उठा अब बात कर,
आँखों में ऑंखें डाल कर

यारा वे...

खोल दरीचे सोच के,
राहें नई चुन खोज के,
सब झूठे आडम्बर हटा,
तू भेद भाव सारे मिटा,

यारा वे...

ताक़त अपनी जान ले,
ख़ुद को तू पहचान ले,
है मुमकिन वो करना तुझे,
जो नामुमकिन दुनिया कहे,

यारा वे...

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)

डरना झुकना ....( क्लब मिक्स )




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


डरना झुकना... ( पंजाबी तड़का )




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


SONG # 14, SEASON # 02, "DARNA JHUKNA CHOD DE" OPENED ON AWAAZ HIND YUGM ON 03/10/2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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