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Saturday, November 26, 2016

"प्यार किया तो डरना क्या...”, ’एक गीत सौ कहानियाँ’ की 100-वीं कड़ी में इस कालजयी रचना की बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 100 (अंतिम कड़ी)
 

'जब प्यार किया तो डरना क्या...' 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 100-वीं कड़ी में आज जानिए 1960 की कालजयी फ़िल्म ’मुग़ल-ए-आज़म’ के मशहूर गीत "प्यार किया तो डरना क्या...” के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शिव शक़ील बदायूंनी के और संगीत नौशाद का।

फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी किस्से-कहानियाँ सुनाते हुए आज हम आ पहुँचे हैं ’एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तंभ के 100-वें पड़ाव पर। और यहाँ पहुँच कर रुकती है यह कारवाँ। ’एक गीत सौ कहानियाँ’ के इस सीज़न का यही है समापन अंक। आप सभी ने इस सफ़र में हमारा पूरा-पूरा साथ दिया, इस मंज़िल तक हमने साथ-साथ सफ़र तय किया, इसके लिए हम आप सभी पाठकों के आभारी हैं। इस सीज़न के इस अन्तिम अंक को ख़ास बनाने के लिए हम लेकर आए हैं एक बहुत ही ख़ास गीत। यह उस फ़िल्म का गीत है जो हिन्दी फ़िल्म इतिहास के 10 सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। और यह वह गीत है जो फ़िल्म-संगीत इतिहास के 10 सर्वश्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में गिना जाता है। यह फ़िल्म है ’मुग़ल-ए-आज़म’ और यह गीत है “प्यार किया तो डरना क्या...”। 

‘मुग़ल-ए-आज़म' 1960 की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म। के. आसिफ़ निर्देशित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म की नीव सन् 1944 में रखी गयी थी। दरसल बात ऐसी थी कि आसिफ़ साहब ने एक नाटक पढ़ा। उस नाटक की कहानी शहंशाह अकबर के राजकाल के पार्श्व में लिखी गयी थी। कहानी उन्हें अच्छी लगी और उन्होंने इस पर एक बड़ी फ़िल्म बनाने की सोची। लेकिन उन्हें उस वक़्त यह अन्दाज़ा भी नहीं हुआ होगा कि उनके इस सपने को साकार होते 16 साल लग जायेंगे। 'मुग़ल-ए-आज़म' अपने ज़माने की बेहद महंगी फ़िल्म थी। एक एक गीत के सीक्वेन्स में इतना खर्चा हुआ कि जो उस दौर के किसी पूरी फ़िल्म का खर्च होता था। नौशाद के संगीत निर्देशन में भारतीय शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत की छटा लिए इस फ़िल्म में कुल 12 गीत थे जिनमें आवाज़ें दी उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, लता मंगेशकर, शम्शाद बेग़म और मोहम्मद रफ़ी। हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास का यह एक स्वर्णिम अध्याय रहा। यहाँ तक कि इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "प्यार किया तो डरना क्या" को शताब्दी का सबसे रोमांटिक गीत का ख़िताब भी दिया गया था। 

नौशाद साहब के ज़बान से 'मुग़ल-ए-आज़म' के साथ जुड़ी उनकी यादों के उजाले पेश हैं, नौशाद साहब की ये
शकील, लता और नौशाद
बातें हमें प्राप्त हुईं हैं विविध भारती के 'नौशाद-नामा' कार्यक्रम के ज़रिए - "मुझे एक क़िस्सा याद है, इसी घर में (जहाँ उनका यह 'इंटरव्यू' रिकार्ड हुआ था) छत पर एक कमरा है। एक दिन मैं वहाँ बैठकर अपनी आँखें बंद करके फ़िल्म 'अमर' का एक गाना बना रहा था। ऐसे में के. आसिफ़ वहाँ आये और नोटों की एक गड्डी, जिसमें कुछ 50,000 रुपय थे, उन्होंने मेरी तरफ़ फेंका। यह अगली फ़िल्म के लिए 'अडवांस' था। मेरा सर फिर गया और उन पर चिल्लाया, "यह आपने क्या किया, आपने मेरा सारा काम ख़राब कर दिया, आप अभी ये पैसे उठाकर ले जायो और ऐसे किसी आदमी को दे दो जो पैसों के बग़ैर काम नहीं करता हो।" थोड़ी देर के बाद आसिफ़ साहब कहने लगे कि मैं 'मुग़ल-ए-आज़म'  बनाने जा रहा हूँ। मैंने कहा, "कोई भी आज़म बनाइए, मैं आपके साथ हूँ क्युंकि आपका और हमारा उस वक़्त का साथ है जब दादर पर हम इरानी होटल में एक कप चाय आधी आधी पीते थे"। हमने कहा कि "हमारा आपका साथ उस वक़्त का है, क्या आप ये पैसे नहीं देंगे तो मैं काम नहीं करूँगा?" वो नीचे गये और मेरी पत्नी से कहा कि "अरे, वो उपर छत पर नोट फेंक रहे हैं।" वो मेरी पतनी को उपर ले आये और ज़मीन पर फैले नोटों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, "मैनें दिया था उनको 'अडवांस', वो रखे नहीं"। तब मैने कहा, "देखिए, यह आप रखिए पैसे अपने, आप बनाइए, मैं आपके साथ हूँ, ख़ुदा आपको कामयाबी दे"। फिर वह फ़िल्म बनी, और बहुत सारे साल गुज़र गये इस फ़िल्म के बनते बनते। यह वही घर है जहाँ उस फ़िल्म की मीटिंग वगेरह हुआ करती थी। आख़िर में 'मुग़ल-ए-आज़म' बनकर तय्यार हो गयी।" 

अब ज़रा इस गीत को गानेवालीं सुरकोकिला लता मंगेशकर की भी राय जान लें इस गीत के बनने की कहानी के बारे में। अभी हाल में जब IBN7 TV Channel वालों ने एक मुलाक़ात में लताजी से पूछा:

"60 के दशक की बात करें तो एक फ़िल्म जिसे हम नज़रंदाज़ नहीं कर सकते, 'मुग़ल-ए-आज़म'। वह एक गाना, जो आज भी लोगों को उतना ही 'हौंटिंग फ़ीलिंग' देता है, लोग कहते हैं कि 'रोंगटे खड़े हो जाते हैं उस गाने को सुनकर', 'प्यार किया तो डरना क्या'। गाना बहुत ही 'लीजेन्डरी' है, कहते हैं कि नौशाद साहब ने आपको बाथरूम मे वह गाना गवाया था, बताइए क्या यह सच है?" 


सवाल सुनते ही लताजी के साथ साथ सभी दर्शक ज़ोर से हँस पड़े, और फिर लताजी ने जवाब दिया - "नहीं, बाथरूम मे नहीं गवाया था, वह गाना जब हमने रिकार्ड किया, तो 'लास्ट लाइन' उनको 'रिपीट' करनी थी 'इको इफ़ेक्ट' के लिए। पर 'इको इफ़ेक्ट' तब ऐसे नहीं आता था, किसी मशीन से नहीं आता था। तो मुझे उन्होने दूसरे कमरे में खड़ा किया था, और वहाँ से मैने गाया, थोड़ा नज़दीक जाके गाया, मतलब, वही सर्कस ही चलता रहा, यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ, इस तरह से उन्होंने रिकार्ड किया था।" 


बाथरूम में नहीं गवाया था?

(हँसते हुए), जी नहीं, बाथरूम में नहीं गवाया था।

“जब प्यार किया तो डरना क्या...” गीत के दो पैरोडी संस्करण भी बने हैं, ऐसा शायद ही किसी और गीत के साथ हुआ हो। पहला गीत है मन्ना डे का गाया हुआ 1967 की फ़िल्म ’राज़’ का गीत “जब प्यार किया तो मरना क्यों, अरे प्यार किया कोई जंग नहीं की, छुरियों से फिर लड़ना क्यों”। यह गीत आइ.एस. जोहर पर फ़िल्माया गया था और हास्य रस में डुबो कर इसे पेश किया गया। गीत के बोलों के लिए कमर जलालाबादी और संगीत के लिए कल्याणजी-आनन्दजी को भले ही क्रेडिट दिया गया है, पर बोल और संगीत, दोनों के लिहाज़ से यह गीत मूल गीत से 90% मिलता-जुलता है। दूसरा पैरोडी बना 1970 में, फ़िल्म थी ’रातों का राजा’। इस फ़िल्म में गीतकार राजेश नाहटा और संगीतकार राहुल देव बर्मन ने शम्शाद बेगम और महेन्द्र कपूर से गवाया था “जब प्यार किया तो डरना क्या, प्यार किया कोई दारु नहीं पी, छुप-छुप प्याले भरना क्या”। यह भी हास्य रस आधारित गीत है जो वैशाली और राजेन्द्र नाथ पर फ़िल्माया गया। इस गीत का संगीत पूर्णत: मूल गीत की धुन पर ही है, पर बोल नए हैं, जिसे सही मायने में पैरोडी कहते हैं।

ख़ैर यह तो रही पैरोडी की बातें, लेकिन आज हम सुनेंगे मूल गीत। आइए सुनते हैं यह कालजयी रचना और ’एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तंभ को फ़िलहाल यहीं समाप्त करने की दीजिए मुझे इजाज़त, नमस्कार! 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, November 13, 2016

राग देसी : SWARGOSHTHI – 292 : RAG DESI




स्वरगोष्ठी - 292 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 5 : रागदारी संगीत की सुगन्ध बिखेरता दौर

“आज गावत मन मेरो झूम के, तेरी तान भगवान...”



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।


खनऊ से बम्बई (अब मुम्बई) आकर कुछ समय तक नौशाद अपने एक मित्र के परिचित डॉ. अब्दुल अलीम नामी के यहाँ रहे। परन्तु जब उन्हें ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ में पियानो वादक की नौकरी मिल गई तब वह लखनऊ के एक अखतर साहब के साथ दादर में रहने लगे। अख्तर साहब एक दूकान में सेल्समैन थे और उसी दूकान में रहा करते थे। रात को दूकान में जब गर्मी लगती तब दोनों मित्र बाहर फुटपाथ पर अपना बिस्तर लगा लेते। सड़क के दूसरी ओर ‘ब्राडवे सिनेमाघर’ था। जब बरसात होती तो उन्हे शिवाजी भवन की सीढ़ियों के नीचे शरण लेनी पड़ती। उसी सीढ़ियों पर खट-खट करती उस जमाने की मशहूर हीरोइन लीला चिटनिस अपने निवास में जाया करती थी। ‘ब्राडवे सिनेमाघर’ में ही वर्षों बाद नौशाद की फिल्म ‘बैजू बावरा’ ने गोल्डन जुबली मनाई थी। इस अवसर पर सामने के फुटपाथ को देख कर नौशाद ने अपने कड़की के दिनों के फुटपाथ के दिनों को याद कर नम आँखों से फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट से कहा था –“इस सड़क को पार करने में मुझे पन्द्रह वर्ष लग गए”।

उस्ताद अमीर खाँ 
अपने संगीत निर्देशन के आरम्भिक दशक में नौशाद के गीतों की विशेषता थी कि इनमें अवधी लोक संगीत का मनोहारी मिश्रण मिलता है। इस पहले दशक के गीतों में जहाँ भी रागों का स्पर्श उन्होने किया, उनकी धुनें सुगम और गुनगुनाने लायक थीं। नौशाद की छठें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत का प्रभुत्व बढ़ता गया। अब हम वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ और उसके गीतों की चर्चा करते हैं, जिसमें नौशाद ने रागों के प्रति अपने अगाध श्रद्धा को सिद्ध किया और राग आधारित गीतों को संगीतबद्ध करने की अपनी क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना की थी। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास कई लोकप्रिय पार्श्वगायक और गायिकाओं की आवाज़ का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था।

पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर
अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1953 में एक फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग देसी के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन बादशाह अकबर के दरबार में किया गया था। तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक सांगीतिक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। अकबर बादशाह ने श्रेष्ठता के निर्णय के लिए यह शर्त रखी कि जिसके संगीत के असर से पत्थर पिघल जाएगा वही गायक सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतियोगिता में तानसेन की तुलना में बैजू बावरा की श्रेष्ठता सिद्ध हुई थी। आज का गीत फिल्म के इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया था। इस गीत में अपने समय के दो दिग्गज गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर ने अपना स्वर दिया था।

राग देसी : ‘आज गावत मन मेरो झूम के...’: पण्डित डी.वी. पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ



संगीतकार नौशाद को भारतीय संगीत के रागों के प्रति कितनी श्रद्धा थी, इस गीत को सुन कर स्पष्ट हो जाता है। अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञों को फिल्म संगीत के मंच पर लाने में नौशाद अग्रणी रहे हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत के माध्यम से प्रकृति के रंगों को बिखेरने में सक्षम राग ‘देसी’ अथवा ‘देसी तोड़ी’ पर चर्चा करेंगे। अभी आपने जो युगल गीत सुना, वह तीनताल में निबद्ध है। परदे पर तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने और बैजू बावरा के लिए पण्डित पलुस्कर जी ने स्वर दिया था। मित्रों, इन दोनों कलासाधकों का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विशाल है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में मात्र कुछ पंक्तियों में समेटा नहीं जा सकता। इस गीत के गीतकार, शकील बदायूनी और संगीतकार, नौशाद हैं। अपने समय के इन दो दिग्गज संगीतज्ञों की उपस्थिति में नौशाद साहब किस प्रकार उन्हें निर्देशित कर पाए होंगे यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। वर्षों पहले एक साक्षात्कार में नौशाद जी ने स्वयं इस गीत की चर्चा करते हुए बताया था कि उन्होने दोनों दिग्गज संगीतज्ञों को फिल्म के प्रसंग की जानकारी दी, राग पर चर्चा हुई और गाने के बोल दिये गए। उन्होने आपस में सलाह-मशविरा किया और फिर रिकार्डिंग शुरू हो गई। इस गीत के आरम्भिक लगभग 1 मिनट 45 सेकेण्ड की अवधि में दोनों गायकों ने ‘तुम्हरे गुण गाउँ...’ पंक्तियों के माध्यम से विलम्बित खयाल की झलक और शेष भाग में द्रुत खयाल का रूप प्रदर्शित किया है। गीत के अन्तिम भाग में तानसेन के तानपूरा का तार टूट जाता है, जबकि बैजू द्रुत लय की तानें लगाते रहते हैं। फिल्म में उनकी तानों के असर से काँच के पात्र में रखा पत्थर पिघलने लगता है।

उस्ताद  फ़ैयाज़  खाँ
आइए, अब कुछ चर्चा राग देसी के बारे में करते है। दिन के दूसरे प्राहर में गाये-बजाये जाने वाले इस राग को देसी के अलावा देसी तोड़ी अथवा देस तोड़ी भी कहते हैं। यह आसावरी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते है, जबकि धैवत और निषाद स्वर शुद्ध रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमे शुद्ध धैवत के स्थान पर कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी स्वर राग देस के समान ही प्रयोग किया जाता है। फिल्म ‘बैजू बावरा’ में इस राग का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मुखर प्रयोग किया गया था। आइए, अब हम आपको इस राग का एक समृद्ध आलाप उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में सुनवा रहे हैं। भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो हमारे सामने आता है, वह है, आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस की वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना गुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बना लिया और पालन-पोषण के साथ ही संगीत के शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। अब हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग देसी का आलाप प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग देसी : ध्रुपद अंग में आलाप : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 292वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित एक हिन्दी भाषा की फिल्म के एक गीत का अंश सुनवाते हैं। इस गीत को एक उस्ताद गायक ने स्वर दिया है। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की पहेली का उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। 



  

1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप इस महान गायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 19 नवम्बर 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 294वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 290 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1944 में प्रदर्शित फिल्म ‘रतन’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – ज़ोहराबाई अम्बालेवाली

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के आज के अंक में राग देसी या देसी तोड़ी के स्वरों में पिरोये गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, March 26, 2016

BAATON BAATON MEIN - 17: INTERVIEW OF LYRICIST SHAKEEL BADAYUNI'S SON JAVED BADAYUNI

बातों बातों में - 17

गीतकार शकील बदायूनी के पुत्र जावेद बदायूनी से बातचीत 


"मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज मार्च 2016 का चौथा शनिवार है। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत के मशहूर गीतकार और अदबी शायर शकील बदायूनी के पुत्र जावेद बदायूनी से की गई बातचीत के सम्पादित अंश। जावेद साहब से यह बातचीत वर्ष 2011 में की गई थी। संयोग से उस दिन होली था। क्योंकि इस सप्ताह हम होली का त्योहार मना रहे हैं, इसलिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के ख़ज़ाने से हम इसे आपके लिए दुबारा चुन लाए हैं।

    


जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके पूरे परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!


शुक्रिया बहुत बहुत, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ! मुझे याद करने के लिए आपका शुक्रिया!

आज का दिन बड़ा ही रंगीन है, और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रु-ब-रु हो रहे हैं। 

मुझे भी बेहद ख़ुशी है अपने वालिद के बारे में बताने का मौका पाकर।

जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शकील साहब के बारे में सवालात का सिलसिला शुरु करूँ,  मैं यह कहना चाहूँगा कि यह बड़ा ही संयोग की बात है कि हमारी और आपकी बातचीत होली के मौक़े पर हो रही है और शकील साहब ने होली पर एक नहीं दो नहीं बल्कि बहुत सारे गीत लिखे हैं।

जी हाँ,, आपने ठीक कहा, उन्होंने कई होली गीत फ़िल्मों के लिए लिखे हैं। ’मदर इण्डिया’ में शमशाद बेगम का गाया "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे ज़रा बांसुरी", शायद यही उनका पहला मशहूर होली गीत था।

जी। और इसके बाद भी उन्होंने कई और गीत लिखे जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। फ़िल्हाल यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शकील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर परिवार का माहौल कैसा था?


जावेद बदायूनी
एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था, और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सब से हँस खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था। कई परिवारों में ऐसा देखा गया है कि पिता बहुत सख़्त होते हैं जिस वजह से बच्चे उनके साथ घुलमिल नहीं सकते, एक दूरी बनी रहती है हमेशा। पर हमारे साथ ऐसा बिलकुल नहीं हुआ। बहुत ही शानदार यादें हैं मेरे मन में अपने वालिद के।

क्या उस समय घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता था?

जी हाँ जी हाँ, शकील साहब के दोस्त लोगों का आना जाना लगा ही रहता था जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं। एक अदबी माहौल होता था घर पर। 

शकील साहब ने अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में 1916 से 1936 का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर 1936 से 1942 का समय अलीगढ़ का; 1942 से 1946 का दिल्ली का उनका समय, और 1946 के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

शकील साहब का जन्म बदायूँ में हुआ, उनके वालिद का नाम था मोहम्मद जमाल अहमद सोख़ता क़ादरी। वो चाहते थे कि उनके बेटे का करीअर बहुत अच्छा हो। इसलिए उन्होंने घर पर ही अरबी, उर्दू, फ़ारसी और हिन्दी के ट्युशन का इन्तज़ाम कर दिया।

इसका मतलब कि जैसे ज़्यादातर शायरों को यह परम्परा विरासत में मिली होती है, शकील साहब के साथ ऐसा नहीं हुआ?

बिलकुल नहीं हुआ!

फिर शेर-ओ-शायरी क चसका उन्हें कैसे लगा?


उनके एक दूर के रिश्तेदार हुआ करते थे जिनका नाम था ज़िया-उल-क़ादरी बदायूनी। वो एक मज़हबी शायर थे। तो उनकी शायरी से शकील साहब काफ़ी प्रभावित हुए। और साथ ही बदायूँ का समकालीन माहौल कुछ ऐसा था कि इस तरफ़ उनका रुझान हुआ। और वो शेर-ओ-शायरी की तरफ़ मुड़ गए।

सार्वजनिक रूप से शकील साहब ने शेर-ओ-शायरी और मुशायरों में हिस्सा लेना कब से शुरु किया?

1936 में जब उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया, तब से वो इन्टर-कॉलेज, इन्टर-यूनिवर्सिटी मुशायरों में हिस्सा लेते थे और अक्सर जीत भी जाते। यह सिलसिला उस ज़माने से शुरु हुआ। तब उनकी उम्र कोई 20 साल की होगी। उनका काफ़ी नाम हो गया था उस समय से ही। 

आपने बताया कि बदायूं में उनके दूर के रिश्तेदार से प्रभावित होकर उनके अन्दर शायरी के अन्कुर फूटे। क्या किसी और से भी उन्होंने कोई तालीम ली?

अलीगढ़ के दिनों में उन्होंने उर्दू में पारदर्शी बनने के लिए हकीम अब्दुल वहीद ’अश्क़’ बिजनोरी से ट्युशन लेने लगे। बस यहीं तक, बाक़ी सब उनके अन्दर ही था।

पढ़ाई पूरी होने के बाद क्या वो दिल्ली आ गए थे?

1940 में उनका निकाह मेरी वालिदा से हुआ, मेरी वालिदा का नाम है सलमा। मेरी वालिदा उनके दूर के रिश्तेदारों में थीं और बचपन से वो मेरे वालिद साहब को जानती भी थीं। लेकिन उनके परिवार में परदा का रिवाज़ था जिस वजह से दोनों कभी पास नहीं आ सके थे उन दिनों। और ना ही कभी मेरे वालिद ने उसे देखा था। तो निकाह हो गया, और बी.ए. की डिग्री लेकर वो दिल्ली चले गए बतौर सपलाई अफ़सर। साथ ही ख़ाली समय में शौक़िया तौर पर मुशायरों में भाग लेना नहीं भूलते। उनका नाम चारों तरफ़ फ़ैलने लगा था। अलीगढ़, बदायूँ से निकल कर दिल्ली में भी उनका नाम हो गया और धीरे-धीरे पूरे हिन्दुस्तान में उनकी चर्चा होने लगी।

वाह! बहुत ख़ूब!

ये वो दिन थे जब शायर अक्सर समाज के दलित और शोषित वर्गों के लिए लिखा करते थे, उनके उत्थान के लिए, समाज की भलाई के लिए। पर शकील साहब की शायरी का रंग बिलकुल अलग था। उनकी शायरी में रोमान्स था जो दिल के बहुत क़रीब था। उनकी शायरी में नयापन था जो लोगों को पसन्द आया। वो अक्सर कहते थे मैंने सुना है "मैं शकील दिल का हूँ तरजुमाँ, कह मोहब्बतों का हूँ राज़दाँ, मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं"।

वाह! क्या बात है! अच्छा ये सब बातें दिल्ली की हैं। दिल्ली से बम्बई तक का फ़सला कैसे और कब मिटा?


शकील साहब लता जी से क्या कह रहे हैं भला?
शकील साहब 1944 में बम्बई शिफ़्ट हो गए थे। वो फ़िल्मों में गाने लिखना चाहते थे। शुरुआत मुशायरों से ही की। वहाँ भी वो मुशायरों की जान बन बैठे बहुत जल्दी ही। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए. आर. कारदार साहब भी गये हुए थे और इन्होंने शकील साहब को नज़्म पढ़ते हुए वहाँ सुना। उन पर शकील साहब की शायरी का बहुत असर हुआ। उन्हें लगा कि शकील साहब एक सफल फ़िल्मी गीतकार बन सकते हैं। तो कारदार साहब और नौशाद साहब उनसे मिले और नौशाद साहब ने उनसे पूछा कि क्या आप अपने शायराना अंदाज़ का बयाँ एक लाइन में कर सकते हैं? इस सवाल पर शकील साहब का जवाब था "हम दर्द का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की एक आग लगा देंगे"।

वाह!

बस फिर क्या था, नौशाद साहब ने फ़ौरन कारदार साहब से कह कर उन्हें 1947 की फ़िल्म ’दर्द’ में गाने लिखने के लिए साइन करवा लिया। और इसी शेर को इस फ़िल्म का टाइटल सॉंग् भी बनाया गया, "हम दर्द का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे"। इस फ़िल्म के गाने मशहूर हो गए, ख़ास कर उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का"। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी गीतकार को अपनी पहली ही फ़िल्म में इतनी बड़ी कामयाबी मिले। पर शकील साहब ने ’दर्द’ से ही कामयाबी का जो झंडा लहराना शुरु किया, वो आख़िर तक कायम रहा।

इसमें कोई शक़ नहीं! जावेद साहब, क्या शकील साहब कभी आप भाई बहनों को भी प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिए?

जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे। 

शकील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शकील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाक्या?


शकील साहब और नौशाद साहब वीयर ग्रेटेस्ट फ़्रेण्ड्स! यह हक़ीक़त है कि शकील साहब नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों की आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग् इनके गीतों से साफ़ छलकती है। शकील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार भी दिया करते थे। नौशाद साहब जितने बड़े संगीतकार थे, उतनी ही अच्छी शेर-ओ-शायरी भी किया करते थे। अगर वो गीतकार भी होते तो भी उतने ही मशहूर होते इसमें कोई शक़ नहीं।

सही है! यानी कि शकील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता समान स्नेह दिया।

बिलकुल ठीक, इसमें कोई शक़ नहीं!

शकील-नौशाद जोड़ी का कौन सा गीत आपको सबसे ज़्यादा पसन्द है?

इस जोड़ी का हर गीत अपने आप में एक मील का पत्थर है। किस किस गीत की बात करूँ? 'दुलारी’ (1949), ’दीदार’ (1951), 'बैजु बावरा’ (1952), 'शबाब’ (1954), 'मदर इण्डिया’ (1957), ’मुग़ल-ए-आज़म’ (1960), ’शबाब’ (1954), ’गंगा जमुना’ (1961), ’मेरे महबूब’ (1963), ये सारी फ़िल्मों के गानें बहुत हिट हुए थे, मुझे भी पसन्द है।

जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शकील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

शकील साहब के साथ हम सब रेकॊर्डिंग् पर जाया करते थे और कभी कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते थे। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़े हैं जो बहुत याद आते हैं। 

आपने शकील-नौशाद की जोड़ी के कुछ फ़िल्मों के नाम गिनाये जिनके गीत आपको पसन्द है। शकील साहब ने अन्य संगीतकारों के लिए भी गीत लिखे हैं जैसे कि रवि, हेमन्त कुमार प्रमुख। इन संगीतकारों के लिए शकील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मास्टरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिये लिखे गये हों। यह बताना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि ’दो बदन’ और 'चौधवीं का चांद' रवि साहब के साथ, 'साहब बीवी और ग़ुलाम' हेमन्त कुमार साहब के साथ।

जावेद साहब, आज होली है और जैसा कि मैंने शुरु में ही कहा था कि शकील साहब ने बहुत सारे फ़िल्मी होली गीत लिखे हैं, एक गीत का उल्लेख हमने किया, बाक़ी गीतों के बारे में बताइए?

’मुग़ल-ए-आज़म’ में एक गीत था, हालाँकि यह होली गीत तो नहीं, बल्कि जन्माष्टमी के सिचुएशन का गीत था फ़िल्म में, "मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे"। फ़िल्म ’कोहिनूर’ में "तन रंग लो जी आज मन रंग लो"। यह नौशाद सहब के साथ था। फिर रवि साहब के साथ फ़िल्म ’फूल और पत्थर’ में "लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिये"।

जी हाँ, ’कोहिनूर’ और ’फूल और पत्थर’ के इन दोनो गीतों में ही "तन" और "मन" शब्दों का शकील साहब ने इस्तमाल किया अलग अलग तरीक़ों से, बहुत ही सुन्दर और रंगीन। जावेद साहब, अब हम बात करना चाहेंगे शकील साहब को मिले हुए पुरस्कारों के बारे में?


पुरस्कारों की क्या बात करूँ, उन्हें लगातार तीन साल तक फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला था।

क्या बात है! इनके बारे में बताएँगे विस्तार से?

1961 में ’चौधवीं का चाँद’ फ़िल्म के टाइटल गीत के लिए, 1962 में फ़िल्म ’घराना’ के "हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं" के लिए, और 1963 में ’बीस साल बाद’ के "कहीं दीप जले कहीं दिल" गीत के लिए।

मतलब दो बार रवि साहब और एक बार हेमन्त दा के गीत के लिए। नौशाद साहब के किसी गीत में उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिला, यह आश्चर्य की बात है।

भारत सरकार ने उन्हें ’गीतकार-ए-आज़म’ की उपाधि से सम्मानित किया था। 3 मई 2013 को उनकी तस्वीर के साथ एक डाक टिकट India Post ने जारी किया है।

वाह! बहुत ख़ूब! जावेद साहब, नौशाद साहब के साथ शकील साहब के दोस्ती की बात हमने की, और कौन कौन से उनके दोस्त थे फ़िल्म इन्डस्ट्री से?

शकील साहब को बैडमिन्टन खेलने का बहुत शौक़ था। पिक्निक और शिकार करना, पतंग उड़ाना उन्हें बहुत भाता था। और इन सब कामों में उनके साथी हुआ करते थे मोहम्मद रफ़ी साहब, जॉनी वाकर साहब और नौशाद साहब तो थे ही। इनके अलावा दिलीप कुमार साहब, वजाहत मिर्ज़ा साहब, ख़ुमार बाराबंकवी साहब और आज़म बजतपुरी साहब उनके करीबी लोग हुआ करते थे फ़िल्म इन्डस्ट्री से।

हम शकील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही सुनते हैं रेडियो पर, लेकिन उनके लिखे ग़ैर-फ़िल्मी नज़्मों और ग़ज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।


मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब 'कुल्यात-ए-शकील' के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में 500 से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

आपने आंकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमने आप से शकील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा आपको कि शकील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

उन्होंने 108 फ़िल्मों में लगभग 800 गीत लिखे हैं, और इनमें 5 फ़िल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

बहुत ही कम उम्र में शकील साहब चले गए। क्या कारण था उनकी इस असामयिक मृत्यु का?

उन्हें डाइबेटिस तो थी ही, उन्हें टी.बी भी हो गया। पंचगनी के एक सैनिटोरियम में उनका इलाज चल रहा था। 1968-69 में वो बम्बई से पंचगनी के चक्कर लगाया करते थे। नौशाद साहब आते थे मिलने। केवल 53 साल की उम्र में उनका इन्तकाल हो गया। दिन था 20 अप्रैल 1970।

हमने सुना है कि आर्थिक स्थिति परिवार की उस समय ठीक नहीं थी। और नौशाद साहब ने निर्माताओं से कह कर शकील साहब को तीन फ़िल्मों के लिए साइन करवाया था। इस घटना के बारे में बतायेंगे?


जावेद बदायूनी
नौशाद साहब को जैसे ही इस बात का पता चला कि शकील साहब बीमार हैं और उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं है, उन्हें बहुत ज़्यादा तकलीफ़ हुई, दुख हुआ। नौशाद साहब को पता था कि शकील साहब इतने ख़ुद्दार इंसान हैं कि किसी से पैसे वो नहीं लेंगे, यहाँ तक कि नौशाद से भी नहीं। इसलिए नौशाद साहब ने एक दूसरा रास्ता इख़्तियार किया। वो पहुँच गये कुछ फ़िल्म निर्माताओं के पास और शकील साहब की हालत का ब्योरा देते हुए उनके लिए हासिल कर लाए तीन फ़िल्मों में गीत लिखने का कॉनट्रैक्ट। यही नहीं, उस समय शकील किसी फ़िल्म के लिए जितने रकम लिया करते थे, उससे दस गुणा ज़्यादे रकम पर नौशाद ने उन फ़िल्म निर्माताओं को राज़ी करवाया। उसके बाद नौशाद ख़ुद जा पहुँचे पंचगनी जहाँ इनका इलाज चल रहा था। जैसे ही उन्होंने उन तीन फ़िल्मों में गाने लिखने और पेमेण्ट की रकम के बारे में बताया तो शकील सहब समझ गये कि उन पर अहसान किया जा रहा है। और उन्होंने नौशाद साहब से वो फ़िल्में वापस कर आने को कहा। पर नौशाद साहब ने भी अब ज़िद पकड़ ली और शकील साहब को गाने लिखने पर मजबूर किया। ये तीन फ़िल्में थीं 'राम और श्याम', 'आदमी', और 'संघर्ष'। फ़िल्म 'राम और श्याम' का गीत "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" उन्होंने पंचगनी के अस्पताल के बेड पर बैठे-बैठे लिखा था। अपनी दिन-ब-दिन ढलती जा रही ज़िन्दगी को देख कर उन्हें शायद यह अहसास हो चला था कि अब वो ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेंगे, कि उनका अन्तिम समय अब आ चला है, शायद इसीलिए उन्होंने इस गीत में लिखा कि "कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा, शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा, आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले"। नौशाद साहब अपने जीवन के अन्त तक जब भी इस गीत को सुनते थे, उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे शकील साहब को याद करके।

बहुत ही मार्मिक! क्या ये तीन फ़िल्में शकील साहब की अन्तिम तीन फ़िल्में थीं?

आख़िरी फ़िल्म शायद ’प्यार का रिश्ता’ थी जिसे वो शंकर-जयकिशन के लिए लिख रहे थे। इस फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में से तीन गीत इन्होंने लिखे, फिर इनका इन्तकाल हो गया और बाक़ी के बचे दो गीत इन्दीवर साहब से लिखवाये गए। यह फ़िल्म 1973 में रिलीज़ हुई थी।

शकील साहब के जाने के बाद आपके परिवार की आर्थिक स्तिथि बिगड़ गई होगी। कैसे सम्भला फिर सब?

उनके दोस्त अहमद ज़कारिया और रंगूनवाला जी, इन्होंने मिल कर एक ट्रस्ट बनाई ’याद-ए-शकील’ के नाम से। और इस ट्रस्ट ने हमें उस बुरे वक़्त में सहारा दिया।

जावेद साहब, आप भी अपने पैरों पर खड़े हुए, यह बताइए कि आप किस क्षेत्र में कार्यरत है?

मैं पिछले 32 सालों से SOTC Tour Operators के साथ था, और अब HDFC Standard Life में हूँ, मुंबई में स्थित हूँ। 

और अब एक आख़िरी सवाल आपसे, शकील साहब ने जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या आपके परिवार का कोई और सदस्य, रिश्तेदार उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ शकील को शकील साहब के गुण मिले हैं और वो बहुत ख़ूबसूरत शायरी लिखती हैं।

बहुत बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शकील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, भविष्य में हम आप से शकील साहब की शख़्सियत के कुछ और अनछुये पहलुयों पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर से होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार!

बहुत बहुत शुक्रिया आपका!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Sunday, February 14, 2016

राग हमीर : SWARGOSHTHI – 257 : RAG HAMIR




स्वरगोष्ठी – 257 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 5 : राग हमीर

मालिनी राजुरकर और मोहम्मद रफी से सुनिए राग हमीर की प्रस्तुतियाँ



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हम राग हमीर के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही इस राग में पहले सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में राग हमीर की एक बन्दिश प्रस्तुत की जाएगी और फिर इसी राग पर आधारित 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ का एक गीत मुहम्मद रफी और उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।


कल्याणहिं के थाट में, दोनों मध्यम जान,
ध-ग वादी-संवादि सों, राग हमीर बखान।

दिन के पाँचवें प्रहर या रात्रि के पहले प्रहर में गाने-बजाने वाला, दोनों मध्यम स्वर से युक्त एक और राग है, हमीर। मूलतः राग हमीर दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति से इसी नाम से उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित राग के समतुल्य है। राग हमीर को कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होने और तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग होने के कारण कुछ प्राचीन ग्रन्थकार और कुछ आधुनिक संगीतज्ञ इसे बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। ऐसा मानना तर्कसंगत भी है, क्योंकि इस राग का स्वरूप राग बिलावल से मिलता-जुलता है। किन्तु अधिकांश विद्वान राग हमीर को कल्याण थाट-जन्य ही मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम स्वर के साथ शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यहाँ भी रागों के गायन-वादन के समय सिद्धान्त और व्यवहार में विरोधाभाष है। समय सिद्धान्त के अनुसार जिन रागों का वादी स्वर पूर्व अंग का होता है उस राग को दिन के पूर्वांग अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। इसी प्रकार जिन रागों का वादी स्वर उत्तर अंग का हो उसे दिन के उत्तरांग में अर्थात मध्यरात्रि 12 से मध्याह्न 12 बजे के बीच प्रस्तुत किया जाना चाहिए। परन्तु राग हमीर का वादी स्वर धैवत है, अर्थात उत्तर अंग का स्वर है। स्वर सिद्धान्त के अनुसार इस राग को दिन के उत्तरांग में गाया-बजाना जाना चाहिए। परन्तु राग हमीर रात्रि के पहले प्रहर में अर्थात दिन के पूर्वांग में गाया-बजाया जाता है। सिद्धान्त और व्यवहार में परस्पर विरोधी होते हुए राग हमीर को समय सिद्धान्त का अपवाद मान लिया गया है।

अब हम आपको राग हमीर की एक लुभावनी बन्दिश का गायन सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, मालिनी जी के स्वरों में सुनिए राग हमीर की यह मोहक बन्दिश। रचना तीनताल में निबद्ध है और इसके बोल हैं –‘घर जाऊँ लंगरवा कैसे...’


राग हमीर : ‘घर जाऊँ लंगरवा कैसे...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर 



राग हमीर को सर्वसम्मति से सम्पूर्ण जाति का राग माना जाता है, किन्तु भातखण्डे जी ने इस राग के आरोह में पंचम स्वर को वर्जित कहा है। परन्तु व्यवहार में आरोह में पंचम स्वर का प्रयोग किया जाता है। तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम स्वर के साथ तथा शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। राग केदार, कामोद और हमीर में तीव्र मध्यम का प्रयोग एक ही ढंग से किया जाता है। राग हमीर के आरोह में निषाद स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग होता है। किन्तु कभी-कभी सपाट भी प्रयोग होता है। इसके अवरोह में गान्धार स्वर वक्र होता है। राग की रंजकता बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोह में धैवत स्वर के साथ कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग कामोद और केदार इस राग के समप्रकृति राग होते हैं। 

अब हम आपको राग हमीर के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते है। यह गीत 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से लिया गया है। इसका संगीत नौशाद ने तैयार किया किया है और इसे उनके सर्वप्रिय गायक मोहम्मद रफी ने स्वर दिया है। नौशाद का संगीतकार जीवन 1939-40 से शुरू हुआ था। 1944 में एक फिल्म ‘पहले आप’ बनी थी। इस फिल्म में मोहम्मद रफी को पहली बार गाने का अवसर मिला था। यह गीत था –‘हिंदुस्तान के हम हैं हिंदुस्तान हमारा...’। इस गीत में श्याम, दुर्रानी और रफी के साथ अन्य आवाज़ें भी थी। इस गीत के बाद से लेकर मोहम्मद रफी के अन्तिम समय तक नौशाद के सर्वप्रिय गायक बने रहे। नौशाद के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी अनेक राग आधारित गीत गाये हैं। इन्हीं में से फिल्म कोहिनूर का यह गीत भी है। गीत में राग हमीर के स्वरों का असरदार ढंग से पालन किया गया है। परदे पर यह गीत दिलीप कुमार पर फिल्माया गया है। गीत में एक स्थान पर द्रुत लय में मोहम्मद रफी को आकार में तानें लेनी थी, परन्तु यह मुश्किल काम वे कर नहीं पा रहे थे। नौशाद ने तानों का यह काम सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ से सम्पन्न कराया। गीत में सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र खाँ का योगदान भी रहा। लीजिए, अब आप शकील बदायूनी का लिखा, तीनताल में निबद्ध यही गीत सुनिए, जिसके बोल हैं –‘मधुबन में राधिका नाचे रे...’। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग हमीर : ‘मधुबन में राधिका नाचे रे...’ : मोहम्मद रफी और उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म कोहिनूर 





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 257वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर अनुमान लगाइए कि यह किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 20 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 259वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 255 की संगीत पहेली में हमने आपको 1983 में प्रदर्शित फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – श्यामकल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – किशोर कुमार

इस बार की पहेली हमारे प्रतिभागियों को राग का अनुमान लगाने कठिनाई हुई। गीतांश में कई रागों की छाया थी। एकमात्र प्रतिभागी डॉ. किरीट छाया ने ही राग की सही पहचान की है। कुल छः प्रतिभागी तीन में से दो प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी छः विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के पाँचवें अंक में आपने राग हमीर पर चर्चा के सहभागी बने। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पास हर सप्ताह आपकी फरमाइशे आती हैं। हमारे कई पाठकों ने ‘स्वरगोष्ठी’ में दी जाने वाली रागों के विवरण के प्रामाणिकता की जानकारी माँगी है। उन सभी पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि रागों का जो परिचय इस स्तम्भ में दिया जाता है, वह प्रामाणिक पुस्तकों से पुष्टि करने का बाद ही लिखा जाता है। यह पुस्तकें है; संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और श्री वसन्त द्वारा संकलित और श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा सम्पादित ‘राग-कोष’, संगीत सदन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित और श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’ तथा आवश्यकता पड़ने पर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’। हम इन ग्रन्थों से साभार पुष्टि करके ही आप तक रागों का परिचय पहुँचाते हैं। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति :कृष्णमोहन मिश्र 





Saturday, September 5, 2015

"बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ..." - शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर बैजु बावरा और उनके गुरु स्वामी हरिदास का स्मरण


एक गीत सौ कहानियाँ - 65

 
शिक्षक दिवस पर गुरु का स्मरण

'मन तड़पत हरि दर्शन को आज...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 65-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’बैजु बावरा’ के सदाबहार भक्ति रचना "मन तड़पत हरि दर्शन को आज..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था।

Rai Mohan as Swami Haridas
गुरु शिष्य की परम्परा सदियों से हमारे देश में चली आ रही है। गुरु द्रोण से लेकर आज के दौर में भी गुरु और शिष्य का रिश्ता बरकरार है। आज शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में ’एक गीत सौ कहानियाँ’ के माध्यम से याद करते हैं बैजु बावरा और उनके गुरु स्वामी हरिदास जी को। 1952 की फ़िल्म ’बैजु बावरा’ में एक दृश्य है जिसमें बैजु के गुरु हरिदास जी बीमार हैं और बिस्तर से उठ नहीं पा रहे। पर बैजु की आवाज़ में "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" सुन कर वो इतने प्रभावित हो जाते हैं, उन पर इस भजन का ऐसा असर होता है कि वो अपने पाँव पर खड़े हो जाते हैं और चल कर अपने शिष्य को गले लगा लेते हैं। "बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ, दीजो दान हरि गुण गाऊँ, सब गुणी जन पे तुम्हरा राज, तड़पत हरि दर्शन को आज"। बैजु बावरा का जन्म गुजरात सलतनत के चम्पानेर में एक ग़रीब ब्राह्मण के घर हुआ था। उनका नाम बैजनाथ मिश्र था। पिता की मृत्यु के बाद उनकी माँ, जो एक कृष्ण भक्त थीं, बैजनाथ को साथ लेकर वृन्दावन चली गईं। वहीं पर बैजु की मुलाक़ात स्वामी हरिदास से हुई जिनके गुरुकुल में बैजु की शिक्षा-दीक्षा हुई। बैजु ने एक अनाथ बालक गोपाल को गोद लिया और उसे संगीत में पारंगत बनाया। समय के साथ-साथ बैजु और गोपाल की प्रसिद्धि बढ़ी और चन्देरी के राज दरबार में दोनों को गाने का अवसर मिला। गोपाल ने अपनी शिष्या प्रभा से विवाह कर एक पुत्री मीरा को जन्म दिया। एक दिन जब बैजु कहीं गए हुए थे, गोपाल अपनी पत्नी और पुत्री के साथ चन्देरी को हमेशा के लिए छोड़ कर कुछ कश्मीरी व्यवसायी लोगों के दिए लालच में पड़ कर कश्मीर चले गए। जब बैजु ने वापस आकर देखा कि उसका परिवार बिखर गया है, वह एक भिखारी बन गया और पागलों की तरह यहाँ-वहाँ भटकने लगा। और तभी उनके नाम के आगे "बावरा" लग गया। तानसेन, जो स्वामी हरिदास के ही शिष्य थे, उन्होंने अपने गुरु से बैजु के बारे में सुन रखा था। उनसे मिलने की चाह तानसेन के मन में जागी और उन्होंने अपने रीवा के संरक्षक राजा रामचन्द्र बघेला से एक संगीत प्रतियोगिता आयोजित करने का अनुरोध किया क्योंकि उन्हें यकीन था कि बैजु ज़रूर इसमें भाग लेने आएगा। बैजु आया और ऐसा राग मृगरंजिनि गाया कि हिरण सम्मोहित हो गए। राग मालकौंस गाकर बैजु बावरा ने एक पत्थर को भी पिघला दिया था। और फ़िल्म ’बैजु बावरा’ का प्रस्तुत भजन भी राग मालकौंस पर ही आधारित है। यह भजन फ़िल्मी भजनों में एक बहुत ऊँचा स्थान रखता है। फ़िल्म-संगीत में इतना दिव्य और अलौकिक काम बहुत कम देखने को मिलता है। और सबसे महत्वपूर्ण जो बात है इस भजन में वह यह कि इस शुद्ध हिन्दी/संस्कृत आधारित भजन के रचयिता तीन मुसलमान कलाकार हैं - शक़ील बदायूंनी, नौशाद अली और मोहम्मद रफ़ी। साम्प्रदायिक सदभाव का इससे बेहतर उदाहरण और कोई नहीं हो सकता! ’बैजु बावरा’ फ़िल्म में बैजु, तानसेन और स्वामी हरिदास की भूमिकाओं में थे क्रम से भारत भूषण, सुरेन्द्रनाथ और राय मोहन।

Vijay Bhatt
’बैजु बावरा’ विजय भट्ट और शंकर भट्ट के ’प्रकाश पिक्चर्स’ की फ़िल्म थी। नौशाद को उनका पहला बड़ा ब्रेक इसी बैनर ने दिया था साल 1940 में। उन दिनों डी. एन. मधोक फ़िल्म ’माला’ की कहानी और संवाद लिख रहे थे, और उन्होंने ही यह सुझाव दिया कि इस फ़िल्म के संगीत के लिए एक युवा संगीतकार की आवश्यक्ता है। भट्ट भाइयों ने नौशाद की पहली फ़िल्म ’प्रेम नगर’ की कुछ धुनों को सुन रखा था। मधोक के कहने पर नौशाद को 250 रुपये महीने पर रख लिया गया। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ शृंखला में ’नौशाद-नामा’ शीर्षक से प्रस्तुत कार्यक्रम में नौशाद साहब ने ’बैजु बावरा’ के निर्माण से जुड़ी बहुत सी बातें बताई थी, उसी बातचीत से सम्पादित अंश प्रस्तुत है। "विजय भट्ट और शंकर भट्ट भाई थे, बहुत पढ़े-लिखे थे। ’स्टेशन मास्टर’ के बाद मैं ’कारदार प्रोडक्श्न्स’ में आ गया। एक दिन दोनो भाई मेरे पास आकर कहने लगे कि ’प्रकाश पिक्चर्स’ कंपनी को बन्द करने की नौबत आ गई है। मैंने पूछा कि क्या मैं कोई मदद कर सकता हूँ? वो बोले कि आप आइए, दिलीप कुमार और नरगिस को ले आइए, ताकि ’प्रकाश पिक्चर्स’ का कर्ज़ अदा हो जाए। मैंने उनसे हर सम्भव मदद करने का वादा किया और पूछा कि क्या उनके पास कोई कहानी है? फिर अगले छह महीने तक हमने ’बैजु बावरा’ की कहानी पर काम किया। पैसे और पेमेण्ट की कोई बात नहीं हुई, हम बस कहानी को डेवेलप करते चले गए। फिर मैंने एक सुझाव दिया विजु भाई को कि चैरेक्टर चलता है ऐक्टर नहीं चलता। विजु भाई ने पूछा कि क्या मतलब है इसका? मैंने समझाया कि अगर आप दिलीप कुमार या राज कपूर को बैजु बावरा के रोल के लिए लेंगे तो दर्शक उसे दिलीप कुमार या राज कपूर के रूप में ही पहचानेगी, कोई नहीं कहेगा कि बैजु आया है। ऐसे लड़के को लीजिए जो बैजु लगे और ऐसी किसी लड़की को लीजिए जो गौरी लगे।"

Naushad, Rafi & Shaqeel
नौशाद साहब ने आगे बताया कि मीना कुमारी के वालिद अली बक्श अपनी बेटियों के साथ दादर में रहते थे नौशाद के घर के आसपास ही। उन दिनों मीना वाडिया की एक जादू-टोने की पिक्चर में काम कर रही थी। मैंने अली बक्श से कहा कि मीना को मेरे साथ प्रकाश पिक्चर्स भेज दे ताकि उसे अच्छी फ़िल्म में काम करने का मौका मिल सके। और आख़िरकार भारत भूषण और मीना कुमारी बैजु और गौरी के रोल के लिए सीलेक्ट किए गए। वो अपना काम करते थे और मैं अपना। गाना रेकॉर्ड करके साउन्डट्रैक भेज देते थे पिक्चराइज़ करने के लिए। इस तरह से ’बैजु बावरा’ बनी। जब शंकर भाई ने यह सुना कि फ़िल्म के गीतों में शास्त्रीय संगीत और रागों का भरमार है तो उन्हें इस बात से थोड़ा ऐतराज़ हुआ। उन्होंने कहा कि लोगों के सर में दर्द हो जाएगा और वो भाग जाएँगे थिएटरों से। पर मैं अपने बात पे कायम था। मुझे पब्लिक का टेस्ट बदलना था। पब्लिक को क्यों हमेशा वही चीज़ें दी जाए जो उन्हें हर वक़्त पसन्द आते हैं? हमने पब्लिक को उन्हीं की संस्कृति के संगीत से रु-ब-रु करवाया, और हम कामयाब भी हुए। विजय भट्ट को इस फ़िल्म के लिए काफ़ी तारीफ़ें मिली और मुझे भी अपने हिस्से का इनाम मिला। फ़िल्म की सिल्वर जुबिली हुई, पर आज तक मेरा इस फ़िल्म के लिए कोई ऐग्रीमेण्ट नहीं बना। मुझे अब तक याद है वह जुमला जो विजय भट्ट ने मुझसे कहा था कि प्रकाश में ताला लगाना है। मैंने उनसे कहा था कि अगर वो मुझे इस फ़िल्म के लिए पैसे नहीं भी देगा तो भी मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है।" और अब आप यही गीत सुनिए - 

'मन तड़पत हरिदर्शन को आज...' : फिल्म - बैजू बावरा : मुहम्मद रफी : नौशाद : शकील बदायूनी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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