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रविवार, 23 जुलाई 2017

राग मियाँ मल्हार : SWARGOSHTHI – 327 : RAG MIYAN MALHAR




स्वरगोष्ठी – 327 में आज

पावस ऋतु के राग – 2 : तानसेन की अमर कृति – मियाँ मल्हार

“बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...”






उस्ताद राशिद  खाँ
सुरेश वाडकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हम राग मियाँ की मल्हार पर चर्चा करेंगे। राग मियाँ मल्हार मल्हार अंग का सबसे लोकप्रिय राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु का यथार्थ परिवेश का सृजन किया जा सकता है। इस राग में आज हम आपको सबसे पहले राग मियाँ की मल्हार के स्वरों पर आधारित 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ से गायक सुरेश वाडकर की आवाज़ में गाया गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग मियाँ की मल्हार में प्रस्तुत एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं।

राग मियाँ की मल्हार : “बादल घुमड़ बढ़ आए...” : सुरेश वाडकर : फिल्म – साज

राग मियाँ की मल्हार : ‘बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...’ : उस्ताद राशिद खाँ



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 327वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग साढ़े छः दशक पूर्व प्रदर्शित प्राचीन फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 29 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 329वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 325वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – मेघ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल / तिलवाड़ा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, तालवाद्य – पखावज

इस अंक की पहेली में सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि अन्य पाठक भी नियमित रूप से ‘स्वरगोष्ठी’ देखते रहेंगे और पहेली में भाग लेते रहेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग मियाँ मल्हार पर चर्चा की। हमारे पिछले अंक पर Anuya Ahire ने टिप्पणी की है –“सादर प्रणाम। नई श्रृंखला का और साथ ही नये प्रयोग का हार्दिक स्वागत है। श्रृंखला की लोकप्रियता बढती जाये, ये शुभकामना है। इस प्रयास से परिपूर्ण जानकारी मिलती है”।

आगामी अंक में हम मल्हार अंग के एक और राग पर चर्चा करेंगे और इस राग में निबद्ध कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 16 जुलाई 2017

राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 326 : RAG MEGH MALHAR




स्वरगोष्ठी – 326 में आज

पावस ऋतु के राग – 1 : आषाढ़ के पहले मेघ का स्वागत

“गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...”





पं. अजय चक्रवर्ती
खुर्शीद बानो
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” आरम्भ हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम राग मेघ मल्हार की चर्चा कर रहे हैं। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। इस राग में आज हम आपको सबसे पहले राग मेघ मल्हार के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से खुर्शीद बानो का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं। इसके साथ ही राग का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ : स्वर – खुर्शीद बानो : फिल्म – तानसेन
राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 326वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग सात दशक पूर्व प्रदर्शित पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह गीत किस पार्श्वगायक की आवाज़ में है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 22 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 328वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 324 वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दादी माँ’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – मन्ना डे और महेन्द्र कपूर।

इस अंक की पहेली में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी तथा तीन में से एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है - छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश से नन्दलाल सिंह रघुवंशी ने। आशा है कि अन्य पाठक भी नियमित रूप से ‘स्वरगोष्ठी’ देखते रहेंगे और पहेली में भाग लेते रहेंगे। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से नई श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” का शुभारम्भ हो रहा है। इस श्रृंखला ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जाएगा। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग मेघ मल्हार पर चर्चा की। हमारी पिछली श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ पर हमारे कुछ पाठकों ने टिप्पणी की है। यहाँ मैं इन टिप्पणियों का उल्लेख कर रहा हूँ।

दूरदर्शन की सुपरिचित समाचार वाचिका निर्मला कुमारी लिखती हैं – “कृष्णमोहनजी नमस्कार। संगीतकार रोशन के बारे में रोचक जानकारियों से परिपूर्ण आपके इस सुन्दर आलेख के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई। आज के युग में संगीत की जानकारी रखने वाले सच्चे समीक्षक शायद उँगलियों पर गिनाये जा सकते हैं। भविष्य में भी आपके आलेखों की प्रतीक्षा रहेगी।" 

इसी प्रकार अनुभवी नाटककार और रंगकर्मी सुल्तान अहमद रिजवी ने लिखा है – “मिश्र जी बहुत ज़िम्मेदारी से आप यह पुनीत कार्य कर रहे हैं। मैने अपनॆ परिवार में यह पाया कि आप की पोस्ट पढ़ कर बच्चे आलोच्य गानो को सुन रहे है। यह उपकार है नयी पीढी पर आपका। आपको साधुवाद।“

आगामी अंक में हम मल्हार अंग के प्रमुख राग ‘मियाँ मल्हार’ पर चर्चा करेंगे और इस राग में निबद्ध कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन  
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


शुक्रवार, 25 मार्च 2016

लव जिहाद उर्फ़ उदास आँखों वाला लड़का


बोलती कहानियां : एक नया अनुभव - 01 

बोलती कहानियां के नए संस्करण में आज प्रस्तुत है पंकज सुबीर की कालजयी रचना "लव जिहाद उर्फ़ उदास आँखों वाला लड़का". प्रमुख स्वर है अनुज श्रीवास्तव का, और संयोजन है संज्ञा टंडन का. सुनिए और महसूस कीजिये इस कहानी के मर्म को, जो बहुत हद तक आज के राजनितिक माहौल की सच्चाई को दर्शाता है.

"लड़का बहुत कुछ भूल चुका है। बहुत कुछ। उसके मोबाइल में अब कोई गाने नहीं हैं। न सज्जाद अली, न रामलीला, न आशिक़ी 2। जाने क्या क्या सुनता रहता है अब वो। दिन भर दुकान पर बैठा रहता है। मोटर साइकिल अक्सर दिन दिन भर धूल खाती है। कहीं नहीं जाता। आप जब भी उधर से निकलोगे तो उसे दुकान पर ही बैठा देखोगे। अब उसके गले में काले सफेद चौखाने का गमछा परमानेंट डला रहता है और सिर पर गोल जालीदार टोपी भी। दाढ़ी बढ़ गई है। बढ़ी ही रहती है।" - इसी कहानी से

लेखक का परिचय
पंकज सुबीर उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार । उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को इंडिपेंडेंट मीडिया सोसायटी (पाखी पत्रिका) द्वारा वर्ष 2011 का स्व. जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान । उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार। कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी वर्ष 2008 में भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार हेतु अनुशंसित। कहानी संग्रह महुआ घटवारिन को कथा यूके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान। समग्र लेखन हेतु वर्ष 2014 में वनमाली कथा सम्मान। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तीन कहानी संकलनों लोकरंगी प्रेम कथाएँ, नौ लम्बी कहानियाँ तथा युवा पीढ़ी की प्रेम कथाएँ में प्रतिनिधि कहानियाँ सम्मिलित। कहानी शायद जोशी कथादेश अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत । पाकिस्तान की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका आज ने भारत की कहानी पर केन्द्रित विशेषांक में चार कहानियों का उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया। कहानियाँ, व्यंग्य लेख एवं कविताएँ नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, हँस, लमही, प्रगतिशील वसुधा, हिंदी चेतना, परिकथा, सुख़नवर, सेतु, वागर्थ, कथाक्रम, कथादेश, समर लोक, संवेद वराणसी, जज्बात, आधारशिला, समर शेष है, लफ्ज़, अभिनव मीमांसा, अन्यथा जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित। इसके अलावा समाचार पत्रों के सहित्यिक पृष्ठों पर भी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दैनिक भास्कर, नव भारत, नई दुनिया, लोकमत आदि हिंदी के प्रमुख समाचार पत्र शामिल हैं। कई कहानियों का तेलगू , पंजाबी, उर्दू में अनुवाद। कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध कार्य । सह संपादक : हिंदी चेतना, वेब संपादक : परिकथा, वेब संपादक : लमही, वेब संपादक : दूसरी परंपरा समन्वयक (भारत) : हिन्दी प्रचारिणी सभा (हिन्दी चेतना), कैनेडा प्रकाशित पुस्तकेंः ईस्ट इंडिया कम्पनी (कहानी संग्रह), महुआ घटवारिन (कहानी संग्रह ), ये वो सहर तो नहीं (उपन्यास), युवा पीढ़ी की प्रेम कथाएँ (कहानी संकलन), नौ लम्बी कहानियाँ (कहानी संकलन), लोकरंगी प्रेमकथाएँ (कहानी संकलन), एक सच यह भी (कहानी संकलन), हिन्दी कहानी का युवा परिदृश्य (संपादन श्री सुशील सिद्धार्थ)

बुधवार, 23 मार्च 2016

होली के रंग रंगा राग काफी


रेडियो प्लेबैक की पूरी टीम अपने पाठकों और श्रोताओं को संप्रेषित कर रही है होली की ढेर सारी मंगल कामनाएँ...रंगों भरे इस त्यौहार में आपके जीवन में भी खुशियों के नए रंग आये यही हमारी प्रार्थना है. हिंदी फिल्मों में राग काफी पर आधारित बहुत से होली गीत बने हैं, आईये आज सुनें हमारे स्तंभकार कृष्णमोहन मिश्रा और आवाज़ की धनी संज्ञा टंडन के साथ इसी राग पर एक चर्चा, जिसमें जाहिर है शामिल है एक गीत होली का भी
 

रविवार, 21 सितंबर 2014

‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : SWARGOSHTHI – 186 : THUMARI BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 186 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 5 : ठुमरी भैरवी


लता जी को जन्मदिन के उपलक्ष्य में समर्पित है उन्हीं की गायी श्रृंगार रस से अभिसिंचित ठुमरी- ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ 





जन्मदिन पर शताधिक शुभकामना 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के पाँचवें अंक में आज हम फिर एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी संस्करण के साथ उपस्थित हैं। इस श्रृंखला में आप सुन रहे हैं, कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियाँ, जिन्हें फिल्मों में पूरे आन, बान और शान के साथ शामिल किया गया। इस स्तम्भ के वाहक कृष्णमोहन मिश्र और संज्ञा टण्डन की ओर से आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख और चित्र, दृश्य माध्यम के साथ और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत होते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज का यह अंक हम विश्वविख्यात गायिका लता मंगेशकर को उनके जन्मदिन (28 सितम्बर) से ठीक एक सप्ताह पूर्व उन्हें शुभकामनाएँ देते हुए प्रस्तुत कर रहे हैं। 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाजूबन्द’ में उन्होने एक पारम्परिक ठुमरी ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ का थोड़े परिवर्तन के साथ मोहक गायन प्रस्तुत किया था। इस ठुमरी के माध्यम से हम उन्हें जन्मदिन की अग्रिम बधाई देते हैं। इसके साथ ही इस ठुमरी का पारम्परिक गायन हम उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ और पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


ठुमरी भारतीय संगीत की वह रसपूर्ण शैली है, जिसमें स्वर और साहित्य का समान महत्त्व होता है। यह भावप्रधान और चपल चाल वाला गीत है। मुख्यतः यह श्रृंगार प्रधान गीत होता है; जिसमें लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का श्रृंगार उपस्थित होता है। इसीलिए ठुमरी में लोकगीत जैसी कोमल शब्दावली और अपेक्षाकृत हलके रागों का ही प्रयोग होता है। अधिकतर ठुमरियों के बोल अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रजभाषा में होते हैं। कथक नृत्य में प्रयोग की जाने वाली अधिकतर ठुमरियाँ कृष्णलीला प्रधान होती हैं। शान्त, गम्भीर अथवा वैराग्य भावों की सृष्टि करने वाले रागों के बजाय चंचल रागों; जैसे पीलू, काफी, जोगिया, खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, गारा, पहाड़ी, तिलंग आदि में ठुमरी गीतों को निबद्ध किया जाता है। ठुमरी गायन में त्रिताल, चाँचर, दीपचन्दी, जत, दादरा, कहरवा आदि तालों का प्रयोग होता है। आज के अंक में प्रस्तुत की जाने वाली भैरवी की श्रृंगार रस प्रधान ठुमरी है, जिसके बोल हैं- ‘साँवरिया ने जादू डारा, बाजूबन्द खुल खुल जाय...’। इस ठुमरी के बोल लोक साहित्य से प्रेरित है। अन्तरे की पंक्तियाँ हैं- ‘जादू की पुड़िया भर भर मारे, का करेगा वैद्य बेचारा...’। इस ठुमरी को अनेक गायक-गायिकाओं ने अपने स्वरों से सँवारा है। आज के अंक में हम आपको सबसे पहले यह ठुमरी उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में सुनवाएँगे। पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत के मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक और सर्जक थे। लीजिए सुनिए, उनके स्वरों में प्रस्तुत श्रृंगार रस में डूबी यह ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ 




इस श्रृंगार रस प्रधान ठुमरी में लोकतत्व प्रमुख रूप से उभरता है। नायिका पर साँवरिया का ऐसा जादू सवार है कि वह अपना सुध-बुध खो बैठी है। हर समय नायक की चिन्ता में डूबी रहने वाली नायिका का शरीर इतना दुबला हो गया है कि उसके तमाम आभूषणों में से एक बाजूबन्द बार-बार स्वतः खुल कर गिर पड़ता है। साँवरिया के इस जादुई प्रभाव से नायिका को मुक्त कराने में वैद्य अर्थात चिकित्सक भी समर्थ नही है। ठुमरी के इस अनूठे भाव को एकदम अनूठे ढंग की गायकी से परिभाषित किया है, पण्डित भीमसेन जोशी ने। भारतीय संगीत की विविध विधाओं ध्रुवपद, खयाल, ख़याल, तराना, भजन, अभंग आदि शैलियों के माध्यम से सात दशकों तक पण्डित भीमसेन जोशी ने संगीत प्रेमियों को अपने स्वर के सम्मोहन में बाँधे रखा था। पण्डित जी की खरज भरी आवाज का वैशिष्ट्य जादुई रहा है। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ रूपान्तरित कर देते थे, वह अनुभव करने की चीज है। 'तान' को वे अपनी चेरी बनाकर अपने कण्ठ में नचाते रहे। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी, भजन और अभंग गायन में भी महारथ हासिल थी। आइए उनके कण्ठ-स्वर में सुनते हैं यही ठुमरी-  ‘साँवरिया ने जादू डारा, बाजूबन्द खुल खुल जाय...’


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : पण्डित भीमसेन जोशी




आज हम जिस गायन शैली को ठुमरी गीत के रूप में जानते हैं, उसे एक शैली के रूप में पहचान मिली, अवध के नवाबी दरबार में। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में ठुमरी को नई पहचान तो मिली किन्तु इसका विकास बनारस के समृद्ध सांगीतिक परिवेश में हुआ। आज की ठुमरी ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ का उपयोग 1954 में ‘बाजूबन्द’ नाम से ही प्रदर्शित फिल्म में किया गया था। इस फिल्म के संगीतकार मोहम्मद शफ़ी थे। फिल्म के एक नृत्य प्रसंग में इस ठुमरी का प्रयोग किया गया था। रामानन्द सागर निर्देशित फिल्म ‘बाजूबन्द’ में एक कम चर्चित संगीतकार मोहम्मद शफ़ी ने भैरवी की इस ठुमरी को लता मंगेशकर से गवाया था। आप लता मंगेशकर जी को उनके जन्मदिन की बधाई देते हुए उन्हीं के मधुर स्वरों में यह ठुमरी सुनिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : फिल्म बाजूबन्द : लता मंगेशकर : संगीत - मोहम्मद शफ़ी  




अब हम आज के इस आलेख और गीतों के समन्वित रूप को श्रव्य माध्यम में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी असरदार आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 5 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 186वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक बेहद मशहूर ठुमरी के अन्तरा का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 190वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

2 – ठुमरी के अन्तरा का यह अंश सुन कर इस प्रसिद्ध ठुमरी के स्थायी की पंक्ति बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 188वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 184वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको विदुषी परवीन सुलताना की आवाज़ में राग पहाड़ी की ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पहाड़ी तथा पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका परवीन सुलताना। परवीन जी ने फिल्म ‘पाकीजा’ के लिए यह ठुमरी राग पहाड़ी के स्वरों में गाया है, जबकि विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे सहित अन्य कलाकारों ने इसे पारम्परिक रूप से खमाज या मिश्र खमाज में गाया है। पहेली की हमारी नियमित प्रतिभागी हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने इसी भ्रम के कारण इस बार केवल दूसरे प्रश्न का उत्तर ही सही दिया है। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


कुछ अपनी कुछ आपकी


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। इस श्रृंखला में हमने एक नया प्रयोग किया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत आलेख, चित्र और गीत-संगीत के आडियो रूप के साथ-साथ सम्पूर्ण आलेख, गीतों के साथ श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा? हमें अपनी प्रतिक्रिया अवश्य लिखिएगा। 7 सितम्बर को प्रकाशित / प्रसारित ‘स्वरगोष्ठी’ के 183वें अंक के बारे में हमारे कई पाठकों / श्रोताओं ने कुछ सार्थक टिप्पणियाँ की है-

Sunil Bajpai – मोरे राजा ~ फुलवन गेंद से ~ ना मारो ~ लगत करेजवा में चोट ~ ~ फुल गेंदवा ना मारो ~ लगत करेजवा में चोट ~

Vijaya Rajkotia - Rasoolan bai is well known for Thumri singing. Thanks for posting.

Abhijeet Kondekar - Sheer delight to listen to this version, thanks for the post!

Ananth Rao - Phul gendavan na maro.....a lovely tumri. Thanks for sharing.

आप भी इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

रविवार, 31 अगस्त 2014

‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : SWARGOSHTHI – 183 : DADARA BHAIRAVI


स्वरगोष्ठी – 183 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 2 : भैरवी दादरा


उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का गाया दादरा जब मन्ना डे ने दुहराया- ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख, चित्र दृश्य माध्यम और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम के मिले-जुले रूप में प्रस्तुत होते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंक हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। 

‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला में हम कुछ ऐसी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके पारम्परिक रूप को बरकरार रखते हुए अथवा आंशिक परिवर्तन के साथ फिल्म में भी इस्तेमाल किया गया है। पिछले अंक में हमने आपको राग झिंझोटी में निबद्ध एक परम्परागत ठुमरी उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में सुनवाया था। आज के अंक में हम ‘आफ़ताब-ए-मौसिकी’ के खिताब से नवाज़े गए उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। साथ ही उनका गाया भैरवी का एक दादरा- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” और इसी ठुमरी का फिल्म ‘दूज का चाँद’ में किये गए रोचक उपयोग की चर्चा करेंगे।




न्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक से लेकर पिछली शताब्दी के मध्यकाल तक के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें सिद्धि प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा घराना’ के ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई।

आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। 1938 में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर गीत में चार-चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। आज हम आपको उनका गाया भैरवी का बेहद लोकप्रिय दादरा- ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ सुनवाते हैं।


भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ






 
उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में प्रस्तुत भैरवी का यह दादरा श्रृंगार-रस प्रधान है। नायिका, नायक से सौतन के घर न जाने की मान-मनुहार करती है, और यही इस दादरा का प्रमुख भाव है। यह दादरा 1960 में प्रदर्शित, देव आनन्द, नूतन और महमूद अभिनीत फिल्म ‘मंज़िल’ में संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने प्रयोग किया था। यद्यपि इस फिल्म के प्रायः सभी गीत लोकप्रिय हुए थे, किन्तु पार्श्वगायक मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत यह दादरा सदाबहार गीतों की श्रेणी में शामिल हो गया था। फिल्म में यह दादरा हास्य अभिनेता महमूद के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। गीत चूँकि महमूद पर फिल्माना था इसलिए बर्मन दादा और मन्ना डे ने इस श्रृंगार प्रधान गीत को अपने कौशल से हास्य गीत के रूप में ढाल दिया। मूल दादरा की पहचान को बनाए रखते हुए गीत को फिल्म में शामिल किया गया था। हाँ, स्थायी के शब्दों में ‘चलो’ के स्थान पर ‘हटो’ अवश्य जोड़ा गया और गीत के अन्तिम भाग में तीनताल जोड़ा गया। लीजिए अब आप इस दादरा का फिल्मी संस्करण सुनिए-


भैरवी दादरा : फिल्म – मंज़िल : ‘बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...’ : मन्ना डे : संगीत – सचिनदेव बर्मन







'स्वरगोष्ठी' की इस श्रृंखला में अब हम आपको आज के इस आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य रूप प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आप इस प्रस्तुति का आनन्द लीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन 






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 183वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। 
 



1 – कण्ठ संगीत की इस रचना के अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो हमें गायक का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 185वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 181वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी झिंझोटी की ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग झिंझोटी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस के साथ ही हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस बार हमारे एक नए प्रतिभागी गोविन्द मकवाना ने भी पहेली में हिस्सा लिया है। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आपको ‘स्वरगोष्ठी’ का यह स्वरूप कैसा लगा? हमें अवश्य बताइएगा। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन  
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

गुरुवार, 22 मई 2014

क्या लगाई तुमने ये कसम कसम से...

खरा सोना गीत - देखो कसम से 

छेड़ छाड़ और मस्ती से भरे इस युगल गीत को फिर से याद करें हमारे प्रस्तोता अनुज श्रीवास्तव के साथ, स्क्रिप्ट है सुजोय की और प्रस्तुति सहयोग है संज्ञा टंडन का. 

सोमवार, 19 मई 2014

तुझे ओर की तम्मंना मुझे तेरी आरज़ू है....

खरा सोना गीत - जिसे तू कबूल कर ले 

चंद्रमुखी के समर्पण को उभरता ये गीत है जिसमें लोक संगीत की भी महक है, जानिये इस गीत से जुडी कुछ और बातें हमारी प्रस्तोता श्वेता पाण्डेय के साथ, स्क्रिप्ट है सुजोय की और प्रस्तुति है संज्ञा टंडन की.  

गुरुवार, 15 मई 2014

दुनिया के सवालों में उलझी एक मार्मिक रचना

खरा सोना गीत - दुनिया करे सवाल तो 

हमारे प्रस्तोता अनुज श्रीवास्तव के साथ आईये ताज़ा करें मीना कुमारी और लता की जुगलबंदी का ये गीत जिसे साहिर-रोशन के रचे बहतरीन गीतों में गिना जाता रहा है. स्क्रिप्ट है सुजोय की और प्रस्तुति है संज्ञा टंडन की  


सोमवार, 21 अप्रैल 2014

ठंडी हवा हो काली घटा हो तो मन क्यों न झूमें

खरा सोना गीत - ठंडी हवा काली घटा 
प्रस्तोता - संज्ञा टंडन 
स्क्रिप्ट सुजोय चट्टरज़ी
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन  

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

मुखड़े पे बिखरे गेसुओं की दास्ताँ

खरा सोना गीत - मुखड़े पे गेसू आ गए 

प्रस्तोता - रचिता टंडन 
स्क्रिप्ट - सुजोय 
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 


                 

या फिर यहाँ से डाऊनलोड कर सुने  

गुरुवार, 27 मार्च 2014

साहिर और रोशन की अनूठी जुगलबंदी से बनी ये नायाब कव्वाली





खरा सोना गीत - निगाहें मिलाने को जी चाहता है 
प्रस्तोता - रचिता टंडन 
स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी 
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

तलत में आवाज़ में महसूस हुई एक हारे हुए प्रेमी की तड़प

खरा सोना गीत # आँसू समझ के 
प्रस्तोता : लिंटा मनोज 
स्क्रिप्ट : सुजॉय चट्टर्जी
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

भीगी भीगी फ़ज़ाओं में लहराएँ आशा ताई के संग

खरा सोना गीत # भीगी भीगी फिज़ा 
प्रस्तोता : अंतरा चक्रवर्ती
स्क्रिप्ट : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन 


गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

याद करें मन्ना दा को इस शानदार गीत के साथ

खरा सोना गीत : आयो कहाँ से घनश्याम
प्रस्तोता : अर्शना सिंह
स्क्रिप्ट : संज्ञा टंडन
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

मादक आदयें आवाज़ की, गीता दत्त का नशीला जादू

खरा सोना गीत : अरे तौबा
प्रस्तोता : रचिता टंडन
स्क्रिप्ट : सुजॉय चट्टर्जी
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

सुर, स्वर ओर शब्दों का अनूठा मेल है ये युगल गीत

खरा सोना गीत # तेरे सुर ओर मेरे गीत 
प्रस्तोता - रचेता टंडन
स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

भटियाली संगीत की मिठास बर्मन दा के साथ

खरा सोना गीत # सुन मेरे बंधू रे 
प्रस्तोता - दीप्ती सक्सेना
स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 


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