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Wednesday, January 22, 2014

रागमाला गीत -2 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट





प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट


रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 2



राग भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुलतानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस की छटा बिखेरता रागमाला गीत


दो उस्तादों के गायन और वादन की अनूठी जुगलबन्दी

फिल्म : गूँज उठी शहनाई

संगीतकार : बसन्त देसाई

गायक : उस्ताद अमीर खाँ

शहनाई वादक : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन 






Sunday, March 17, 2013

Raagmaala 2 उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के जन्मदिवस पर विशेष



स्वरगोष्ठी – 112 में आज


रागों के रंग रागमाला गीत के संग - 2

फिल्म 'गूँज उठी शहनाई 'के रागमाला गीत में दो उस्तादों की अनूठी जुगलबन्दी


आज ‘स्वरगोष्ठी’ के एक ताज़ा अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में एक और रागमाला गीत लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आज का यह रागमाला गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। यह गीत दो कारणों से आज के अंक को विशेष बनाता है। पहली विशेषता यह है कि इसे भारतीय संगीत-जगत के दो दिग्गज उस्तादों- उस्ताद अमीर खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने जुगलबन्दी के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरी विशेषता यह है कि आगामी गुरुवार, 21 मार्च को शहनाई-वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की 98वीं जयन्ती है। रागमाला का यह गीत आज हम उन्हीं उस्ताद शहनाईनवाज़ को स्वरांजलि-स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं।


बसन्त देसाई
र्ष 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ का कथानक एक प्रेम त्रिकोण पर आधारित है, परन्तु फिल्म का नायक किशन (राजेन्द्र कुमार) सांगीतिक प्रतिभा से सम्पन्न कुशल शहनाईवादक भी है। फिल्म में किशन की बाल्यावस्था में संगीत के प्रति ललक और संगीत-गुरु रघुनाथ महाराज (अभिनेता उल्हास) के मार्गदर्शन से एक कुशल शहनाईवादक बनने की दास्तान है। फिल्म के संगीतकार बसन्त देसाई ने इस फिल्म में एक से बढ़ कर एक राग आधारित गीतों का संयोजन किया था। चूँकि फिल्म का कथानक एक शहनाईवादक के चरित्र पर केन्द्रित है इसलिए बसन्त देसाई ने अपने समय के दिग्गज शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और वाराणसी के ही युवा शहनाईवादक रामलाल को भी फिल्म से सम्बद्ध किया गया था। यही नहीं, संगीत के इन्दौर घराने के संस्थापक और वाहक उस्ताद अमीर खाँ को फिल्म में गायन के लिए राजी कर लिया गया। संगीतकार बसन्त देसाई स्वयं भी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अत्यन्त कुशल थे और जब उनके साथ जब इन दिग्गज कलाकारों का साथ मिला तब फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ के लिए कई अविस्मरणीय और कालजयी गीतों की रचना हुई। इन्हीं गीतों में से एक रागमाला गीत भी है, जिसकी चर्चा आज हम आपसे कर रहे हैं।

फिल्म में इस रागमाला गीत का उपयोग उस प्रसंग में किया गया है, जब एक अनाथ बालक किशन, मन्दिर के एक कोने में छिप कर, देव-प्रतिमा के सम्मुख साधनारत संगीत के प्रकाण्ड पण्डित रघुनाथ महाराज के स्वरों का अपनी शहनाई पर अनुकरण करने का प्रयत्न करता है। किशन की शहनाई के स्वर कानों में पड़ते ही पण्डित रघुनाथ महाराज अपने उस एकलव्य जैसे शिष्य की प्रतिभा को पहचान लेते हैं और उसे अपना शिष्य बना कर विधिवत संगीत की शिक्षा देने लगते हैं। आज का रागमाला गीत इसी प्रसंग से जुड़ा है। यह गीत, गायन और शहनाईवादन की जुगलबन्दी के रूप में है। गुरु रघुनाथ महाराज गायन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने कण्ठस्वर दिया है, जब कि शिष्य किशन के लिए उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई बजाई है। गीत में क्रमशः भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुल्तानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस रागों का प्रयोग किया गया है। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार ही यह क्रम रखा गया है। पहला राग भटियार सूर्योदय का राग है। समय के अनुसार ही क्रमशः आगे बढ़ते हुए मध्यरात्रि के राग चन्द्रकौंस से गीत को विराम दिया गया है।

उस्ताद अमीर खाँ
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
इस रागमाला गीत का आरम्भ मन्दिर के दृश्य से होता है, जहाँ देव-प्रतिमा के सम्मुख गुरु रघुनाथ महाराज संगीत-साधना के अन्तर्गत प्रातःकाल के राग भटियार की एक रचना- ‘निसदिन न बिसरत मूरत तिहारी...’ का गायन कर रहे हैं। वहीं मन्दिर के दूसरे कोने में बालक किशन शहनाई पर रघुनाथ महाराज के स्वरों की अनुकृति करने का प्रयास करता है। महाराज के कानों में अचानक शहनाई का मधुर स्वर पड़ता है और वे किशन के पास जाकर उसकी प्रतिभा की सराहना करते हैं और उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार कर लेते हैं। अगला राग रामकली है, जिसे महाराज के घर के अभ्यास कक्ष में फिल्माया गया है। इस प्रसंग में महाराज पहले राग रामकली में एक पंक्ति गाते हैं और फिर किशन उन्हीं स्वरों को शहनाई पर बजाता है। अचानक गुरु महाराज राग देशी की सरगम गुनगुनाते है। देशी के बाद राग शुद्ध सारंग के स्वरों में आलाप और शहनाईवादन साथ-साथ होता है। इसके बाद महाराज राग मुल्तानी की एक बन्दिश- ‘बलमा तुम संग लागली प्रीत...’ गाते हैं। मुल्तानी के बाद राग यमन की बारी आती है। इस राग की एक प्रचलित बन्दिश ‘अवगुण न कीजिए गुणी संग...’ के साथ महाराज किशन से कुछ सरल तानों का अभ्यास कराते हैं। अचानक गुरु महाराज राग बागेश्री का सरगम आरम्भ कर देते हैं। रागमाला गीत के इस भाग में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने कुछ जटिल ताने बजाई हैं। अन्त में राग चन्द्रकौंस का तराना प्रस्तुत किया जाता है और गीत के इसी भाग में किशन एक परिपक्व युवक (अभिनेता राजेन्द्र कुमार) और शहनाईवादक के रूप में परिलक्षित होता है। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ का आठ रागों में गुथा हुआ यह रागमाला गीत सुनवाते हैं। इस गीत में उस्ताद अमीर खाँ के कण्ठस्वर और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई की जुगलबन्दी की गई है।


रागमाला गीत : भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुल्तानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस : उस्ताद अमीर खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के रागमाला में पिरोए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बहार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म संगीत सम्राट तानसेन। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने केवल दूसरे प्रश्न का ही सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें एक अंक ही मिलते हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

इसी अंक की पहेली के साथ वर्ष 2013 की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) भी पूर्ण हुई है। इस श्रृंखला में सर्वाधिक 16.5 अंक प्राप्त कर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने प्रथम स्थान, 16 अंक पाकर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने द्वितीय स्थान और 15.5 अंक पाकर बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने तृतीय स्थान प्राप्त किया है। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले अंक से हमने आपके अनुरोध पर ‘रागमाला’ शीर्षक से लघु श्रृंखला आरम्भ की है। परन्तु अगला अंक रंग और उल्लास के पर्व, होली से ठीक पहले पड़ने वाले रविवार को प्रकाशित होगा, इसलिए ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक रस-रंग से भरपूर होली पर केन्द्रित होगा। भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों में होली का चित्रण जिस प्रकार हुआ है, अगले अंक में हम ऐसे ही कुछ उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। रविवार, 24 मार्च को हम इस विशेष अंक के साथ उपस्थित होंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


Sunday, January 20, 2013

दिन के तीसरे प्रहर के कुछ मोहक राग



 

स्वरगोष्ठी-105 में आज
राग और प्रहर – 3

कृष्ण की बाँसुरी और राग वृन्दावनी सारंग 



‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों आपके इस प्रिय स्तम्भ में लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। गत सप्ताह हमने आपसे दिन के दूसरे प्रहर के कुछ रागों के बारे में चर्चा की थी। आज दिन के तीसरे प्रहर गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की बारी है। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न लगभग तीन बजे तक की अवधि के बीच का माना जाता है। इस अवधि में सूर्य की सर्वाधिक ऊर्जा हमे मिलती है और इसी अवधि में मानव का तन-मन अतिरिक्त ऊर्जा संचय भी करता है। आज के अंक में हम आपके लिए तीसरे प्रहर के रागों में से वृन्दावनी सारंग, शुद्ध सारंग, मधुवन्ती और भीमपलासी रागों की कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे।


सारंग अंग के रागों में वृन्दावनी सारंग और शुद्ध सारंग राग तीसरे प्रहर के प्रमुख राग माने जाते हैं। यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपनी प्रिय बाँसुरी पर वृन्दावनी सारंग और मेघ राग की अवतारणा किया करते थे। सारंग का अर्थ होता है मयूर और कृष्ण द्वारा दिन के तीसरे प्रहर वृन्दावन के कुंजों में अपने सखाओं के संग इस राग की अवतारणा की परिकल्पना के कारण ही वृन्दावनी सारंग नाम प्रचलन में आया होगा। वर्तमान में राग वृन्दावनी सारंग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-औड़व जाति के इस राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद, अर्थात दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। सामान्य परिवेश में इस राग का गायन-वादन दिन के तीसरे प्रहर में ही किया जाता है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु की चरम अवस्था और वर्षा ऋतु का आहट देने वाले कजरारे मेघों के एकत्रीकरण के परिवेश का सार्थक चित्रण करने में भी राग वृन्दावनी सारंग पूर्ण समर्थ होता है। अब हम आपको राग वृन्दावनी सारंग में निबद्ध एक मध्य-द्रुत तीनताल की रचना बाँसुरी पर सुनवाते हैं। वादक हैं आश्विन श्रीनिवासन्।

राग वृन्दावनी सारंग : बाँसुरी - मध्य-द्रुत तीनताल की रचना : आश्विन श्रीनिवासन् 


दिन के तीसरे प्रहर अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न तक की अवधि का एक और राग है, शुद्ध सारंग। आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों, अर्थात औड़व-षाडव जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और धैवत स्वर तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित है। साथ ही आरोह में तीव्र मध्यम स्वर तथा अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। इस राग को कुछ संगीतकार कल्याण थाट से तो कुछ बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। आपको राग शुद्ध सारंग का एक मनमोहक उदाहरण सुनवाने के लिए एक बार फिर हमने बाँसुरी वाद्य का ही चयन किया है। विश्वविख्यात बाँसुरी-वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के प्रिय रागों में राग शुद्ध सारंग भी एक राग है। उन्हीं का बजाया राग शुद्ध सारंग का आकर्षक आलाप अब हम आपको सुनवाते हैं।

राग शुद्ध सारंग : बाँसुरी – आलाप : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


दिन के तीसरे प्रहर में ही गाया-बजाया जाने वाला एक और मधुर राग है, मधुवन्ती। इस राग के बारे में यह तथ्य प्रचलित है कि मैहर घराने के सुप्रसिद्ध सरोद-वादक उस्ताद अली अकबर खाँ ने कर्नाटक पद्यति के 29वें मेलकर्ता राग धर्मावती के आरोह से ऋषभ और धैवत को हटा कर इस राग को स्वरूप दिया। स्वयं उस्ताद अली अकबर खाँ, पण्डित रविशंकर और इनके शिष्यों ने इस राग को प्रचारित-प्रसारित किया। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। आरोह में कोमल गान्धार और तीव्र मध्यम तथा अवरोह में इन स्वरों के साथ शुद्ध धैवत और ऋषभ स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। अब हम आपको राग मधुवन्ती की एक मध्य लय की रचना सरोद पर ही सुनवाते है। वादक हैं, उस्ताद अली अकबर खाँ।

राग मधुवन्ती : सरोद – मध्यलय की गत : उस्ताद अली अकबर खाँ


तीसरे प्रहर में अधिकाधिक प्रयोग किया जाने वाला एक राग भीमपलासी है। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला भीमपलासी, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है। इसमें गान्धार व निषाद कोमल तथा अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है, किन्तु अवरोह में सभी सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर तार सप्तक का षडज होता है। कुछ विद्वान वादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी करते हैं। आज के इस अंक में अब हम आपको राग भीमपलासी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। 1966 में सुनील दत्त और साधना अभिनीत एक फिल्म ‘मेरा साया’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीत निर्देशक मदनमोहन ने राग भीमपलासी के सुरों में गीत- ‘नैनों में बदरा छाए...’ संगीतबद्ध किया था। गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ के शब्दों को लता मंगेशकर के स्वरों का साथ मिला था। राग भीमपलासी पर आधारित इस फिल्मी गीत का आप रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : फिल्म – मेरा साया : ‘नैनों में बदरा छाए...’ : लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 105वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 103वें अंक में हमने आपको 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ से राग गूजरी अथवा गूर्जरी तोड़ी पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गूजरी या गूर्जरी तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हृदयनाथ और गायिका लता मंगेशकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। इन्हें पूरे दो अंक मिलते हैं। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दूसरे प्रश्न के आधे भाग का सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं .5 अंक। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने पहले प्रश्न का अधूरा उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं 1.5 अंक। जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग को तो सही पहचाना किन्तु गायक-गायिका को नहीं पहचान सके, अतः इन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का 

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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