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Monday, March 29, 2010

विंटेज रहमान, ठन्डे शंकर, और सक्रिय शांतनु हैं आज के टी एस टी मेनू में

ताज़ा सुर ताल १३/२०१०

सजीव- 'ताज़ा सुर ताल' में आज एक नहीं बल्कि तीन तीन फ़िल्मो के गीत गूंजेंगे जो हाल ही में प्रदर्शित हुईं हैं। ये तीनों फ़िल्में एक दूसरे से बिल्कुल अलग है, एक दूजे से बिल्कुल जुदा है। सुजॊय, तुम्हे याद है एक दौर ऐसा था जब ए. आर. रहमान नए नए हिंदी फ़िल्मी दुनिया में आए थे और उस दौर में दक्षिण के कई फ़िल्मों को हिंदी में डब किया जा रहा था जिनमें रहमान का संगीत था।

सुजॊय - हाँ, जैसे कि 'हम से है मुक़ाबला', 'दुनिया दिलवालों की', 'रोजा' और बहुत सी ऐसी फ़िल्में जिन्हे हिंदी में डब किया गया था। इन फ़िल्मों के गानें ऒर्जिनली तमिल होने की वजह से इन्ही धुनों पर हिंदी के बोल लिखना भी एक चैलेंज हुआ करता था।

सजीव - हाँ, और यह काम उन दिनों भली भाँती कर लिया करते थे गीतकार पी.के. मिश्रा। ख़ैर, वह दौर तो गुज़र चुका है, लेकिन हाल में रहमान की धुनों वाली एक और मशहूर तमिल फ़िल्म को हिंदी में डब किया गया है। यह फ़िल्म है 'शिवाजी दि बॊस'।

सुजॊय - सजीव, मुझे याद है २००७ के जून महीने में मैं अपने काम के सिलसिले में चेन्नई गया हुआ था, उन दिनों यह तमिल फ़िल्म वहाँ रिलीज़ हुई थी। मुझे अब भी याद है रजनीकांत के बड़े बड़े पोस्टर्स पूरे शहर भर में छाए हुए थे।

सजीव - बिल्कुल ठीक, १५ जून २००७ को यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, और इसका हिंदी वर्ज़न रिलीज़ हुआ है ८ जनवरी २०१० को। वी.एम प्रोडक्शन्स निर्मित व एस. शंकर निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे रजनीकांत, श्रिया सरन, सुमन, विवेक, रघुवरण प्रमुख। ए. आर. रहमान ने न केवल फ़िल्म के गाने स्वरबद्ध किए बल्कि पार्श्व संगीत भी तैयार किया।

सुजॊय - तो सजीव, बात संगीत के चल पड़ी है तो आगे बढ़ने से पहले अपने श्रोताओं को सुनवा देते हैं इस फ़िल्म से एक गीत। इस गीत को सुनते हुए हिंदी प्रांत के श्रोताओं को एक अंदाज़ा हो जाएगा दक्षिण में चल रहे संगीत के बारे में। इसे गाया है ब्लाज़, रैग्ज़, तन्वी, सुरेश पीटर ने। इस गीत के तमिल वर्ज़न को विजय ने लिखा था।

गीत - स्टाइल


सुजॊय - 'शिवाजी दि बॊस' फ़िल्म एक सुप्रतिष्ठित सॊफ़्टवेयर सिस्टेम आर्किटेक्ट शिवाजी के इर्द गिर्द घूमती है, जो हाल ही में भारत लौटा है अमेरीका में अपना कार्य समाप्त कर। उसका सपना है कि भारत आकर वो इस समाज को मुफ़्त चिकित्सा व शिक्षा दिलवाए। लेकिन उसे यहाँ पर कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अब उसके पास अपने तरीके से इस करप्ट सिस्टेम का मुकाबला करना है। यही है इस फ़िल्म की मूल कहानी। इस फ़िल्म को उस समय तक का सब से महँगी फ़िल्म मानी गई जो ६० करोड़ की राशी में बनी थी, और इस फ़िल्म ने १०० करोड़ के उपर का व्यापार किया, यानी कि ४० करोड़ का मुनाफ़ा।

सजीव - अब इसी फ़िल्म का एक और गीत सुन लेते हैं जिसे हरिहरण और मधुश्री ने गाया है। मधुश्री ने युं तो बहुत कम फ़िल्मों में गाया हैं, लेकिन जितने भी गीत गाये हैं उनमें से ज़्यादातर ए. आर. रहमान के गानें हैं। यह गीत है "वाह जी वाह जी वाह जी, मेरा जीवन है शिवाजी"। इसका तमिल संस्करण भी इन्ही गायकों की आवाज़ों में है और उसे लिखा था वैरामुथु ने।

सुजॊय - गीत सुनने से पहले आपको बता दें कि २००८ में इस फ़िल्म को फ़िल्मफ़ेयर-दक्षिण अवार्ड्स में बहुत सारे पुरस्कार मिले। तमाम और पुरस्कारों के अलावा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और ए. आर. रहमान को सर्वश्रेष्ठ संगीतकर का पुरस्कार मिला था।

गीत - वाह जी वाह जी



सजीव - अब हम आते हैं आज की दूसरी फ़िल्म पर। 'कार्तिक कॊलिंग् कार्तिक'। इस फ़िल्म के रिलीज़ से पहले जिस तरह की उम्मीदें इससे की जा रहीं थीं, शायद उतनी यह फ़िल्म खरी नहीं उतरी और सिनेमाघरों से जल्दी ही यह फ़िल्म उतर गई। जहाँ तक संगीत का सवाल है, इस फ़िल्म के कम से कम दो गीतों ने लोगों के दिलों को ज़रूर छुआ।

सुजॊय - और इनमें से एक गीत ने लोगों के दिलों को ही नहीं, बल्कि कदमों को ज़रूर छुआ। जब शंकर अहसान लॊय का संगीत हो और जावेद अख़्तर के गीत हों, तो गानें अच्छे बनेंगे ही। तो सजीव, क्योंकि आज हम इस फ़िल्म का एक ही गीत सुनेंगे, इसलिए क्यों ना हम उसी गीत को यहाँ बजाएँ जो सब से ज़्यादा हिट रहा.

सजीव - बिल्कुल, "उफ़ तेरी अदा", यह गीत इन दिनों काफ़ी बज रहा है। शंकर महादेवन, अलिज़ा मेन्डोन्सा और साथियों की आवाज़ें हैं इस गाने में। मेरा ख़याल है कि गीत के बोलों पर ज़्यादा ध्यान ना देकर इसकी रिदम के साथ झूमना चाहिए, तभी इसे ज़्यादा एंजॊय किया जा सकेगा।

गीत - उफ़ तेरी अदा


सुजॊय - और अब आज की तीसरी व अंतिम फ़िल्म की बारी। यह फ़िल्म भी प्रदर्शित हो चुकी है, 'वेल डन अब्बा'। श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक के फ़िल्म की और उनके फ़िल्मों के संगीत की भूमिका देने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। उनकी शुरुआती फ़िल्मों का संगीत देखिए और आज के दौर में बनी उनकी फ़िल्मों का संगीत, कितना फ़र्क आ गया है, लेकिन समानांतर सिनेमा का जो उनका स्टाइल है, वह उन्होने बरकरार रखा है।'ज़ुबेदा' और 'बोस दि फ़ॊरगोटेन हीरो' में उन्होने रहमान का संगीत लिया था, फिर उसके बाद वो मुड़ गए शान्तनु मोइत्र की तरफ़ जिनके साथ उन्होने इससे पहले 'वेलकम टू सज्जनपुर' में काम किया था। और अब ये दोनों साथ में फिर एक बार आए हैं 'वेल डन अब्बा' में।

सजीव - शान्तनु मोइत्र और उनके गीतकार जोड़ीदार स्वानंद किरकिरे का काम हमेशा ही उत्कृष्ट होता है। बहुत कम फ़िल्में करते हैं ये दोनों लेकिन हर एक फ़िल्म के गानें बहुत ख़ास हुआ करते हैं चाहे फ़िल्म चले या ना चले। '३ इडियट्स' की अपार सफलता के बाद अब ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गीतों से भी लोग उमीदें ज़रूर लगाएँगे, लेकिन लोगों को यह भी याद रखना होगा कि '३ इडियट्स' एक व्यावसायिक फ़िल्म थी और 'वेल डन अब्बा' एक पैरलेल फ़िल्म है। इनका आपस में तुलना करना निरर्थक है।

सुजॊय - 'वेल डन अब्बा' के मुख्य कलाकार हैं बोमन इरानी, मिनिशा लाम्बा, रवि किशन और सोनाली। स्वानंद किरकिरे के अलावा अशोक मिश्र और इला अरुण ने भी इसमें गीत लिखे हैं। तो चलिए पहला गीत सुनते हैं इला अरुण और डैनियल जॊर्ज की आवाज़ों में "मेरी बन्नो होशियार"। यह एक शादी वाला गाना है और इसमें बोल भी गुदगुदाने वाले हैं।

सजीव - और पार्श्व में जो तेलुगू के शब्द आते है, उनसे भी गीत में एक ख़ास बात आ गई है। अच्छा सुजॊय इस गीत को सुनो और सुनने के बाद बताओ कि तुम्हे इस गीत से कौन सी पुरानी फ़िल्मी गीत की याद आई।

गीत - मेरी बन्नो होशियार


सुजॊय - सजीव, मुझे लगता है कि इस गीत की धुन मिलती जुलती है 'दो आँखें बारह हाथ' फ़िल्म में लता जी के गाए गीत "स‍इयां झूठों का बड़ा सरताज निकला" से। दरअसल क्या है कि इस तरह के उत्तर भारत के शादी वाले गीतों की धुन लगभग एक जैसी ही होती है जो लम्बे समय से चली आ रही है। धुन वही है लेकिन बोल बदलते जाते हैं। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि किसी तरह की 'ट्युन लिफ़्टिंग्' हुई है, बस यही कह सकते हैं कि इसे एक पारम्परिक धुन मान लें।

सजीव - ठीक कहा। और अब एक सुफ़ी शैली में बना गीत राघव और राजा हसन की आवाज़ में। रियल्टी शो से उभरे राजा हसन को आजकल मौके मिलने लगे हैं, हो सकता है कि धीरे धीरे वो सीढियाँ चढ़ते जाएँगे। यह गीत है "रहीमन इश्क का धागा रे, कबहूँ ना चटकाना रे"। रहीम के दोहों पर आधारित यह गीत सुनते हुए आपको अपने बचपन की याद ज़रूर आ जाएगी जब हिंदी के पाठ्यक्रम में रहीम और कबीर जैसे संतों के दोहों के पाठ हुआ करते थे।

सुजॊय - और इन दोहों में जीवन दर्शन के उपदेशों को कितनी ख़ूबसूरती के साथ प्रकृति से उदाहरण लेकर समझाया गया है। याद है फ़िल्म 'अखियों के झरोखों से' फ़िल्म में भी इसी तरह का एक दोहावलि गीत था जिसमें एक प्रतियोगिता में नायक और नायिका दोहों से एक दूसरे का मुकाबला करते हैं। उस गीत में पहला दोहा था "बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले बोल, रहीमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल"।

सजीव - और पता है 'अखियों के झरोखों से' के उस दोहावलि में भी इस दोहे का शुमार किया गया था, यानी कि "रहीमन इश्क का धागा रे..."। सचमुच, ये दोहे सुनकर बहुत सुकून मिलता है, और 'वेल डन अब्बा' के इस गीत में भी वही बात है। सुनते हैं।

गीत - रहीमन इश्क का धागा


"शिवाजी दा बॉस" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बोलों पर बिना ध्यान दिए यदि विंटेज रहमान को एक बार फिर सुनना चाहते हैं तो अल्बम खरीद लाईये. ये रहमान का वो अंदाज़ है जहाँ संगीत धुनों पर खुल कर बरसता है, हिंदी फिल्मों में रहमान बेहद संयम बरतते हैं साजों के चुनाव आदि के मामले में, यहाँ मेचुरिटी नज़र आती है, पर इस तरह की तमिल फिल्मों में जहाँ उन्हें बस "धाकड" संगीत देना होता है, वो लौट आते हैं अपने पुराने अंदाज़ में, ये वही अंदाज़ है.

"कार्तिक कौल्लिंग कार्तिक" के संगीत को आवाज़ रेटिंग **१/२
गीतकार संगीतकार की ये वो टीम है जिसने संगीत की दुनिया को एक से एक गीत दिए हैं, पर विडम्बना देखिये ये जोड़ी अब अपना चार्म खोती सी दिखाई दे रही है. नएपन् का सतत अभाव.

"वेल डन अब्बा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
अल्बम के लिहाज से न सही पर फिल्म की पठकथा के अनुरूप नज़र पड़ता है ये संगीत. यहाँ भी कोई नयापन नहीं है, पर गीत मधुर जरूर लगते हैं

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ३७- शिवाजी दि बॊस' ए.वी.एम की फ़िल्म थी। बताइए ए.वी.एम की पहली हिंदी फ़िल्म कौन सी थी और किस साल प्रदर्शित हुई थी?

TST ट्रिविया # ३८- एक ऐसा साल था जिस साल फ़िल्मफ़ेयर के अन्तर्गत जतिन ललित को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला था, और उसी साल ए. आर. रहमान को फ़िल्मफ़ेयर का आर. डी. बर्मन अवार्ड मिला था। बताइए वह कौन साल था और जतिन ललित और रहमान को किन किन फ़िल्मों के लिए ये पुरस्कार मिले थे?

TST ट्रिविया # ३९- रहीम का वह कौन सा दोहा है जिसमें बिगड़ी बात फिर ना बन पाने की बात कही गई है?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछली बार अल्बम के चयन को लेकर कुछ बात छिड़ी, देखिये हमारा काम नयी अल्बोम के संगीत के बारे में जानकारी देना है ये तो श्रोता ही बतायेंगें कि वो कितने सार्थक हैं. मुनीश जी और तन्हा जी आप दोनों के विचारों का हम स्वागत करते हैं. सीमा जी केवल एक ही जवाब. चलिए अन्य दो जवाब हम दिए देते हैं.
जिन ३ गीतों में हमने समानता पूछी थी उन तीनों गीतों के संगीतकार महिला हैं और उनकी आवाज़ भी इन गीतों में शामिल है। पहला गीत सरस्वती देवी का है (फ़िल्म" अछूत कन्या), दूसरा गीत उषा खन्ना (फ़िल्म: बिन फेरे हम तेरे)।
दिबाकर बनर्जी का टीवी सीरियल था 'नॊट ए नाइस मैन टू नो'.

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