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Saturday, August 8, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 05 - कानन देवी


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 05

 
कानन देवी


’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है फ़िल्म जगत के प्रथम दौर की मशहूर गायिका-अभिनेत्री कानन देवी को।  
 
22 अप्रैल 1916 को कोलकाता के पास हावड़ा में एक छोटी बच्ची का जन्म हुआ। माँ ने नाम रखा कानन। पूरा नाम कानन बाला। बेहद ख़ूबसूरत दिखने वाली इस प्यारी बच्ची को क्या पता था कि इस दुनिया में उसका आना समाज के बनाए हुए कानूनों के ख़िलाफ़ था। बिन ब्याही लड़की की बेटी बन कर जन्म लेना ही उस बच्ची का अपराध था।  कानन की माँ राजोबाला का जिस लड़के के साथ प्रेम था, वह राजोबाला के गर्भवती होते ही रिश्ता ख़त्म कर भाग खड़ा हुआ। साहसी राजोबाला ने कोख में पल रहे संतान को जन्म देने का कठिन निर्णय तो लिया पर समाज का मुंह बन्द कर पाना उनके बस में नहीं था। इसलिए "अवैध" शब्द कानन के साथ जुड़ गया। माँ और बेटी की सामाजिक ज़िन्दगी आसान नहीं थी। फिर भी राजोबाला ने हिम्मत नहीं हारी और कानन को पालने लगी। कुछ समय बाद एक बार फिर राजोबाला की ज़िन्दगी में प्रेम का संचार हुआ और रतन चन्द्र दास नामक एक युवक से उनकी आत्मीयता बढ़ी। राजोबाला और रतन ने विवाह कर ली। रतन अच्छा लड़का था और कानन को पिता का प्यार देने लगा। राजोबाला और कानन की ज़िन्दगी संभली ही थी कि एक दिन अचानक जैसे फिर एक बार बिजली गिर पड़ी। रतन का अकस्मात निधन हो गया। माँ-बेटी फिर से असहाय हो गई। पिता के घर से राजोबाला को कोई मदद नहीं मिली, हर तरफ़ से दरवाज़े बन्द हो गए। अपना और बेटी का पेट पालने के लिए राजोबाला को लोगों के घरों में बरतन माँजने और पोछा लगाने का काम करना पड़ा। पर बेटी को इस राह पर चलने नहीं दिया। कुछ लोग कहते हैं कि कानन की शिक्षा हावड़ा के St. Agnes' Convent School से हुई थी, पर इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है। रतन की मृत्यु के बाद बहुत ज़्यादा दिनों तक कानन की पढ़ाई नहीं चल सकी और वो स्कूल से बाहर निकल गई।  

क़िस्मत हर किसी को कम से कम एक बार मौक़ा ज़रूर देती है। कानन को भी यह मौका मिला जब तुलसी बनर्जी नामक एक सज्जन, जिन्हें कानन काका बाबू (चाचा जी) कह कर बुलाती थी, ने उन्हें ’मादन थिएटर्स’ और ’ज्योति स्टुडियोज़’ में ले गए। कानन उस समय मात्र 10 वर्ष की थीं पर बहुत ही सुन्दर युवती के रूप में परिणित हो रही थीं। यह 1926 की बात थी। उस ज़माने में अच्छे घर की लड़कियों का फ़िल्मों में अभिनय करना ख़राब माना जाता था। पर जिस लड़की को जन्म से लेकर कभी समाज ने उचित सम्मान ही नहीं दिया, उस समाज के इस एक और पाबन्दी से कैसा डर? कानन के सौन्दर्य को देख उन्हें 1926 की मूक फ़िल्म ’जयदेव’ में एक छोटे रोल के लिए चुन लिया गया। इसके अगले ही साल ’शंकराचार्य’ फ़िल्म में भी उन्होंने अभिनय किया। 1932 की फ़िल्म ’विष्णु माया’ और ’प्रह्लाद’ में तो उन्होंने नायक की भूमिका निभाई। 1933 से 1936 तक ’राधा फ़िल्म्स’ में काम करने के बाद 1937 में वो जुड़ीं ’न्यु थिएटर्स’ से और वहीं पर उन्हें सबसे अधिक प्रसिद्धि मिली। गायक-अभिनेताओं में अगर कुन्दलाल सहगल शीर्ष पर थे तो गायिका-अभिनेत्रियों में कानन देवी चोटी पर थीं। राय चन्द बोराल ने उनकी गायकी को सँवारा, निखारा और उन्हें एक बेहतरीन गायिका बनने की तमाम बारिकियाँ सिखाई। बचपन से समाज की अशोभनीय टिप्पणियों को झेलने वाली कानन अब फ़िल्म जगत की नामचीन स्टार बन चुकी थीं। जैसे जैसे समय बीतता गया, अच्छे घरों की लड़कियों का आगमन फ़िल्मों में होने लगा, और कानन देवी को भी उसके समाज ने स्वीकार कर लिया। कानन देवी की कहानी से हमें यह सीख ज़रूर लेनी चाहिए कि अगर मन में विश्वास है, मेहनत करने की नियत है, तो कोई उसे रोक नहीं सकता। उपलब्धियाँ समाज को झुकने पर मजबूर कर ही देती हैं। अवैध संतान के रूप में जन्म लेने वाली, और बचपन में समाज के कटाक्ष झेलने वाली कानन की अपार सफलता को देख कर हम यही कह सकते हैं कि कानन, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Thursday, April 11, 2013

कृष्णचन्द्र डे और कुन्दनलाल सहगल की गायकी


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 41

कारवाँ सिने-संगीत का 

न्यू थिएटर्स की पूरन भगत और यहूदी की लड़की


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी न्यू थिएटर्स द्वारा १९३३ में निर्मित दो फिल्मों- पूरन भगत और यहूदी की लड़की के गीतों की चर्चा कर रहे हैं। 

लकत्ते की न्यू थिएटर्स ने १९३३ में तीन महत्वपूर्ण फ़िल्में बनाई – ‘पूरन भगत’, ‘राजरानी मीरा’, और ‘यहूदी की लड़की’। बोराल और सहगल की जोड़ी ने पुन: अपना जादू जगाया ‘पूरन भगत’ में। राग बिहाग और यमन-कल्याण पर आधारित “राधे रानी दे डारो ना” हो या “दिन नीके बीते जाते हैं सुमिरन कर पिया राम नाम”, फ़िल्म के सभी गीत, जो मूलत: भक्ति रस पर आधारित थे, लोकप्रिय हुए। वैसे सहगल इस फ़िल्म में नायक नहीं थे, सिर्फ़ उनके गाये गीत रखने के लिये उन्हें पर्दे पर उतारा गया था। “राधा रानी…” भजन संगीतकार रोशन के मनपसंद भजनों में से एक है, ऐसा उन्होंने एक रेडिओ कार्यक्रम में कहा था। कृष्ण चन्द्र डे, जो के. सी. डे के नाम से भी जाने गए, इस फ़िल्म में अभिनय और गायन प्रस्तुत किया। “जाओ जाओ हे मेरे साधु रहो गुरु के संग” और “क्या कारण है अब रोने का, जाये रात हुई उजियारा” जैसे गीत उन्हीं के गाये हुए थे। सहगल और के. सी डे की दो आवाज़ें एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग थीं। एक तरफ़ सहगल की कोमल मखमली आवाज़, तो दूसरी तरफ़ के. सी. डे की आवाज़ थी बुलंद। के. सी. डे के बारे में यह बताना ज़रूरी है कि वो आँखों से अंधे थे। कुछ लोग कहते हैं कि वो जनम से ही अंधे थे, जबकि कई लोगों का कहना है कि कड़ी धूप में पतंगबाज़ी करने से उनके आँखों की रोशनी जाती रही। उन्हें फिर ‘अंध-कवि’ की उपाधि दी गई। पार्श्वगायक मन्ना डे इन्हीं के भतीजे हैं। मन्ना डे ने सहगल और अपने चाचाजी का ज़िक्र एक रेडिओ कार्यक्रम में कुछ इस तरह से किया था - "सहगल साहब बहुत लोकप्रिय थे। मेरे सारे दोस्त जानते थे कि मेरे चाचा जी, के.सी. डे साहब के साथ उनका रोज़ उठना बैठना है। इसलिए उनकी फ़रमाइश पे मैंने सहगल साहब के कई गाने एक दफ़ा नहीं, बल्कि कई बार गाये होंगे। 'कॉलेज-फ़ंक्शन्स' में उनके गाये गाने गा कर मैंने कई बार इनाम भी जीते।" उधर ‘राजरानी मीरा’ बांगला फ़िल्म ‘मीरा’ का हिंदी रीमेक था, जिसमें पृथ्वीराज कपूर और पहाड़ी सान्याल सान्याल तो थे ही, साथ में दुर्गा खोटे को विशेष रूप से ‘प्रभात’ से कलकत्ता लाया गया था इस फ़िल्म के शीर्षक किरदार को निभाने के लिए। दुर्गा खोटे के गाये मीरा भजन तो थे ही, साथ में शास्त्रीय गायिका और पेशे से तवायफ़, इंदुबाला से भी कुछ गीत बोराल ने गवाये। लीजिए, के.सी. डे की आवाज़ में फिल्म ‘पूरन भगत का यह लोकप्रिय गीत सुनिए-

फिल्म पूरन भगत : “जाओ जाओ हे मेरे साधु रहो गुरु के संग” : कृष्ण चन्द्र डे


‘यहूदी की लड़की’ के माध्यम से एक ऐसे संगीतकार ने फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में क़दम रखा जिनके सुझाये फ़ॉरमेट पर हिंदी फ़िल्मी गीत आज तक बनती चली आई है। ये थे पंकज मल्लिक जिनकी संगीत-प्रतिभा का लोहा आज तक कलाकार मानते हैं, और फ़िल्म-संगीत के अगले दौर के संगीतकारों (उदाहरण: ओ. पी. नय्यर) के लिए भी वो प्रेरणास्रोत बने हैं। संगीतकार तुषार भाटिया ने एक बार मुझे बताया था कि भले ही आर. सी. बोराल न्यू थिएटर्स के प्रथम संगीतकार हुए, लेकिन उनकी रचनाओं में शुद्ध शास्त्रीय संगीत ही झलकती। फ़िल्म-संगीत को अपना स्वरूप प्रदान किया था पंकज मल्लिक ने, और यही स्वरूप आज तक चली आ रही है। रबीन्द्र-संगीत को पहली बार स्वरबद्ध करने और फ़िल्म-संगीत में उन्हें शामिल करने का श्रेय भी पंकज मल्लिक को ही जाता है। पंकज बाबू का पहला ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड १९२६ में विडिओफ़ोन कंपनी ने निकाला था। सवाक फ़िल्मों में संगीतकार बनने से पहले वो ‘इंटरनैशनल फ़िल्मक्राफ़्ट’ की मूक फ़िल्मों के प्रदर्शन के दौरान ‘लाइव ऑरकेस्ट्रा’ का संचालन करते थे। रेडिओ से भी ४०-४५ वर्ष का उनका गहरा नाता रहा। ‘यहूदी की लड़की’ में सहगल के गाए ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने” को पंकज मल्लिक ने राग भीमपलासी में स्वरबद्ध कर सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। रतनबाई का गाया “अपने मौला की जोगन बनूंगी” भी इस फ़िल्म का एक लोकप्रिय गीत था। अब हम आपको सहगल की आवाज़ में मिर्ज़ा गालिब की यही मशहूर गजल सुनवाते हैं।

फिल्म यहूदी की लड़की : “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने” : कुंदनलाल सहगल 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे आपको । सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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