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रविवार, 15 नवंबर 2020

राग काफी : SWARGOSHTHI – 488 : RAG KAFI

 


आपको दीपोत्सव पर हार्दिक मंगलकामना 

संगीतकार रोशन की पुण्यतिथि (16 नवम्बर) पर विशेष  
   




स्वरगोष्ठी – 488 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 4 : संगीतकार रोशन 

राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "बावरे नैन" के गीतों को रोशन ने संगीतबद्ध किया था। 





विदुषी मालिनी राजुरकर 

संगीतकार रोशन 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की चौथी कड़ी में हम 1950 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "बावरे नैन” से राग काफी पर आधारित एक गीत; "ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” यह एक युगल गीत है, जिसका संगीत रोशन ने और मुकेश व गीता दत्त ने स्वर दिया है। कल 16 नवम्बर को संगीतकार रोशन की पुण्यतिथि है। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उन्हीं का गीत समर्पित कर रहे हैं। राग काफी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग काफी में निबद्ध एक तराना रचना को सुविख्यात संगीत विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 




"बावरे नैन" में राज कपूर 

राज कपूर की प्रारम्भिक दौर की फिल्मों के संगीतकारों पर केन्द्रित हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” श्रृंखला में हम राज कपूर की फिल्म यात्रा के आरम्भिक एक दशक के उन संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके संगीत ने फिल्म इतिहास के कई पृष्ठों को रेखांकित किया है। राज कपूर के अभिनय में सहज रूप से हँसने और उतने ही सहज रूप में रोने की अद्भुत क्षमता थी। सम्भवतः इसी गुण के कारण उन्हें “भारत का चार्ली चैपलिन” कहा गया था। राज कपूर को प्रेम ने हँसने और रोने की क्षमता दी, तो स्वतन्त्रता के बाद तेजी से बदलते भारतीय मूल्यों ने हँसते हुए रोना और रोते हुए हँसना सिखा दिया। “आग” से लेकर “जिस देश में गंगा बहती है” तक राज कपूर की फिल्मों में प्रेम के स्थायी भाव के साथ देश की विसंगतियों पर दर्शकों ने आँसू के भाव को स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। परदे पर राज कपूर द्वारा गाये अधिकतर दर्द भरे गीतों में स्वर मुकेश के हैं। आज हम आपसे राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म ‘बावरे नैन’ के गीतों पर चर्चा करेंगे, जिसे रोशन ने संगीतबद्ध किया था। 

पाँचवें दशक के अन्त अर्थात 1949 में भारतीय फिल्म जगत में एक ऐसे संगीतकार का उदय हुआ, जो लखनऊ के मैरिस कालेज (वर्तमान में; भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से शास्त्रीय संगीत विधिवत प्रशिक्षित, मैहर के उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से गुरु शिष्य परम्परा में सारंगी वादन की शिक्षा प्राप्त और बारह वर्षों तक आकाशवाणी में संगीतकार के रूप में कार्य करने का अनुभव लेकर आए थे। फिल्म संगीत में नया रंग भरने वाले उस संगीतकार को हम रोशन के नाम से जानते हैं। मुम्बई में रोशन को पहला अवसर देने वाले फिल्मकार थे केदार शर्मा, जिन्होंने अपनी फिल्म “नेकी और बदी” में उन्हें संगीत निर्देशन के लिए अनुबन्धित किया। दुर्भाग्य से यह फिल्म चली नहीं और रोशन का बेहतर संगीत भी अनसुना रह गया। रोशन स्वभाव से अन्तर्मुखी थे। पहली फिल्म “नेकी और बदी” की असफलता से रोशन चिन्तित रहा करते थे, तभी केदार शर्मा ने अपनी अगली फिल्म “बावरे नैन” के संगीत का दायित्व उन्हें सौंपा। इस फिल्म के नायक राज कपूर थे। रोशन ने राज कपूर की अभिनय शैली और फिल्म में उनके चरित्र का सूक्ष्म अध्ययन किया और उसी के अनुकूल गीतों की धुनें बनाई। इस बार फिल्म भी हिट हुई और रोशन का संगीत भी। आज भी “बावरे नैन” एक बड़ी संगीतमय फिल्म के रूप में याद की जाती है। कल रोशन की पुण्यतिथि है। हम उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए उनका ही एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 

फिल्म “बावरे नैन” के नायक राज कपूर के लिए रोशन ने मुकेश की आवाज़ को प्राथमिकता दी। राजकपूर और मुकेश एक ही गुरु से संगीत सीखा करते थे, जबकि मुकेश और रोशन स्कूल के सहपाठी थे। फिल्म “बावरे नैन” में ये तीनों मित्र एकत्र हुए थे। परिणामस्वरूप फिल्म का गीत, संगीत उत्कृष्ट स्तर का बन गया। इस फिल्म में मुकेश और गीता दत्त का गाया युगल गीत; “ख़यालों में किसी के इस तरह...”, मुकेश और राजकुमारी का गाया; “मुझे सच सच बता दो...”, राजकुमारी के स्वरों में गाये गए अन्य एकल गीत अपने समय के लोकप्रिय गीतों में थे। परन्तु जो लोकप्रियता राज कपूर पर फिल्माए गए गीत; “तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं वापस बुला ले...” को मिली वह ऐतिहासिक थी। मुकेश के गाये इस गीत ने तहलका मचा दिया। इस गीत की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि लगभग तीन दशक बाद एच.एम.वी. ने अपने “बेस्ट ऑफ मुकेश” संग्रह में इस गीत को स्थान दिया। इसी प्रकार फिल्म के एक अन्य युगल गीत; “ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” ने भी लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया। आइए, यही गीत अब हम सब सुनते हैं, जिसे मुकेश और गीता दत्त ने गाया है। गीतकार हैं, केदार शर्मा और संगीतकार हैं रोशन। फिल्म “बावरे नैन” के इस गीत को सुनवाने का अनुरोध हमें “स्वरगोष्ठी” के अनेक पाठकों ने किया है। आइए सुनते हैं, राज कपूर के फिल्मी सफर का एक उल्लेखनीय गीत। 

राग काफी : “ख़यालों में किसी के इस तरह...” : मुकेश और गीता दत्त : संगीत – रोशन 


हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है; काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। पहले हम राग काफी के स्वरों की संरचना पर विचार करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा, रे, ग(कोमल), म, प, ध, नि(कोमल), सां, तथा अवरोह में सां नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर दीपोत्सव के अवसर पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए। आप यह तराना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग काफी : द्रुत तीनताल में निबद्ध तराना : स्वर – विदुषी मालिनी राजुरकर 





संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 488वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ठीक सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल गायक और गायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 21 नवम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 490 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 486वें अंक में हमने आपको 1949 में प्रदर्शित फिल्म "सुनहरे दिन” से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की चौथी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "बावरे नैन” के एक गीत का रसास्वादन और गीत और संगीतकार का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग काफी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय तराना का गायन प्रस्तुत किया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग काफी : SWARGOSHTHI – 488 : RAG KAFI : 15 नवम्बर, 2020 



रविवार, 8 नवंबर 2020

राग काफी : SWARGOSHTHI – 487 : RAG KAFI

 






स्वरगोष्ठी – 487 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार - 3 : संगीतकार ज्ञानदत्त 

"सुनहरे दिन" में राज कपूर के लिए कर्णप्रिय राग काफी पर आधारित गीत ज्ञानदत्त ने सँजोया 





पण्डित भीमसेन जोशी 

फिल्म 'सुनहरे दिन' में राज कपूर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की तीसरी कड़ी में हम 1949 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" से राग काफी पर आधारित एक गीत; "बहारों ने जिसे छेड़ा..." प्रस्तुत कर रहे हैं। राग काफी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग काफी में निबद्ध एक रागदारी रचना "बावरे गम दे गयो..." को सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



इस श्रृंखला के अन्तर्गत इन दिनों हम सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार राज कपूर की फिल्म यात्रा के कुछ ऐसे पड़ावों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें संगीत के प्रति उनके अनुराग और चिन्तन का रेखांकन हुआ है। पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि राज कपूर को संगीत संस्कारगत प्राप्त हुआ था। बचपन में अपनी माँ से, किशोरावस्था में न्यू थिएटर्स के संगीत कक्ष से और युवावस्था में अपने पिता के पृथ्वी थिएटर के नाटकों से प्राप्त संगीत राज कपूर के रग-रग में बसा हुआ था। अपनी पहली फिल्म "आग" के लिए उन्होने पृथ्वी थियेटर के संगीतकार राम गांगुली को चुना था। इस फिल्म में शंकर और जयकिशन, संगीत दल के मात्र एक वादक थे। अपनी अगली फिल्म "बरसात" के लिए राज कपूर ने शंकर जयकिशन को ही संगीतकार के रूप में चुना था। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस फिल्म का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। "बरसात" (1949) से लेकर "मेरा नाम जोकर" (1070) तक पूरे 21 वर्षों के दौरान शंकर जयकिशन, राज कपूर की 20 फिल्मों के सफल संगीतकार रहे। इसके बाद आर.के. की फिल्मों; "बॉबी", "सत्यं शिवं सुन्दरम्", "प्रेम रोग" और "प्रेम ग्रन्थ" के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल तथा "राम तेरी गंगा मैली" और "हिना’ के संगीतकार रवीन्द्र जैन थे। इस श्रृंखला में हम राज कपूर के सर्वाधिक लोकप्रिय संगीतकारों के स्थान पर उनके फिल्मी सफर के प्रारम्भिक एक दशक के उन संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं, जिनका गहरा प्रभाव राज कपूर पर पड़ा। 1949 में जब राज कपूर फिल्म "बरसात" के निर्माण में व्यस्त थे उसी समय वे तीन अन्य निर्माताओं की फिल्मों; "सुनहरे दिन", "परिवर्तन" और "अन्दाज़" में अभिनेता के रूप में भी कार्य कर रहे थे। इतनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने किसी भी फिल्म में अपने अभिनय का स्तर गिरने नहीं दिया। इस वर्ष की फिल्मों में से आज हम फिल्म "सुनहरे दिन" में राज कपूर की भूमिका की और फिल्म के एक गीत के माध्यम से इस फिल्म के विस्मृत संगीतकार ज्ञानदत्त की चर्चा करेंगे। 1949 में प्रदर्शित फिल्म "सुनहरे दिन" का निर्माण जगत पिक्चर्स ने किया था, जिसके निर्देशक सतीश निगम थे। फिल्म में राज कपूर की भूमिका एक रेडियो गायक की थी। अपने श्रोताओं के बीच यह गायक चरित्र बेहद लोकप्रिय है। इस फिल्म का यह गीत वर्तमान में लगभग विस्मृत संगीतकार ज्ञानदत्त ने राग काफी पर आधारित किया है। इसके साथ ही राग काफी की एक शास्त्रीय रचना विख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में भी प्रस्तुत करेंगे। 


संगीतकार ज्ञानदत्त 
चौथे और पाँचवे दशक के चर्चित संगीतकार ज्ञानदत्त का फिल्मी सफर रणजीत मूवीटोन से आरम्भ हुआ था। 1937 में प्रदर्शित "तूफानी टोली" उनकी पहली फिल्म थी। श्रृंगार रस से परिपूर्ण संगीत रचने में उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं था। उनकी चौथे दशक की फिल्मों की प्रमुख गायिका वहीदन बाई (अपने समय की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री निम्मी की माँ) थीं। संगीत की दृष्टि से अनेक सफल फिल्मों की संगीत रचना करने के बाद पाँचवें दशक के अन्त में ज्ञानदत्त ने राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" की संगीत रचना की थी। इस फिल्म का संगीत ज्ञानदत्त के लिए विशेष उल्लेखनीय रहा। लोकप्रियता की दृष्टि से उस वर्ष की फिल्मों में राजकपूर द्वारा निर्मित, निर्देशित और अभिनीत "बरसात" तथा केवल अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" के गीत शीर्ष पर थे। "सुनहरे दिन" का नायक चूँकि रेडियो गायक है, अतः ज्ञानदत्त ने इन गीतों में वाद्यवृन्द (आर्केस्ट्रा) का अत्यन्त आकर्षक प्रयोग किया था। फिल्म में ज्ञानदत्त ने राज कपूर के लिए मुकेश को पार्श्वगायक के रूप में अवसर दिया था। मुकेश और राज कपूर एक ही गुरु से संगीत सीखने जाया करते थे। फिल्म "आग" में मुकेश और राज कपूर की जोड़ी साथ थी, किन्तु इन दोनों के आवाज़ की स्वाभाविकता का अनुभव फिल्म "सुनहरे दिन" के गीतों से हुआ। फिल्म में मुकेश के साथ सुरिन्दर कौर और शमशाद बेग़म की आवाज़ें हैं। फिल्म "सुनहरे दिन" के गीतों में मुकेश और सुरिन्दर कौर की आवाज़ों में; "दिल दो नैनों में खो गया...", "लो जी सुन लो...", मुकेश और शमशाद बेग़म के स्वरों में; "मैंने देखी जग की रीत..." अत्यन्त लोकप्रिय गीत सिद्ध हुए, परन्तु जो लोकप्रियता मुकेश के एकल स्वर में प्रस्तुत गीत; "बहारों ने जिसे छेड़ा है वो साजे जवानी है..." को मिली, उससे अपने समय का यह एक उल्लेखनीय गीत बन गया था। आज हम आपको उल्लास और उमंग से परिपूर्ण यही गीत सुनवाएँगे। "सुनहरे दिन" संगीतकार ज्ञानदत्त के फिल्मी सफर की सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म के बाद ज्ञानदत्त की संगीतबद्ध फिल्में व्यावसायिक रूप से असफल होती गई। अन्ततः 1965 में फिल्म "जनम जनम के साथी" के साथ ही उन्होने अपने संगीतकार जीवन से विराम ले लिया। 3 दिसम्बर 1974 को संगीतकार ज्ञानदत्त का निधन हुआ था। आइए आज हम आपको सुनवाते हैं, ज्ञानदत्त द्वारा संगीतबद्ध वह ऐतिहासिक गीत, जिसने गायक मुकेश और अभिनेता राज कपूर की जोड़ी को स्थायित्व दिया। गीतकार हैं, शेवन रिजवी। 

राग काफी : "बहारों ने जिसे छेड़ा..." : मुकेश : फिल्म - सुनहरे दिन : संगीत - ज्ञानदत्त 


काफी थाट के स्वर हैं; सा, रे, कोमल ग॒, म, प, ध, कोमल नि॒। इस थाट में गान्धार और निषाद कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। राग "काफी" में गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं; सा, रे, ग(कोमल), म, प, ध, नि(कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा। राग काफी की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है और इसका गायन अथवा वादन समय मध्यरात्रि होता है। परन्तु फाल्गुन मास में हर समय गाया जा सकता है। राग काफी में ठुमरी, होली और रंगोत्सव से सम्बन्धित रचनाएँ खूब निखरती हैं। अधिकांश ठुमरियों में ब्रज की होली का वर्णन मिलता है। इससे मिलता जुलता राग "सिन्दूरा" होता है। आइए, सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग काफी की एक बन्दिश सुनते हैं। आप राग "काफी" की यह रचना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग काफी : "बावरे गम दे गयो री..." : पण्डित भीमसेन जोशी 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 487वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ठीक सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल पार्श्वगायिका और गायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 14 नवम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 489 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 485वें अंक में हमने आपको 1948 में प्रदर्शित फिल्म "गोपीनाथ" से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - सिन्धु भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – नीनू मजूमदार और मीना कपूर। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की तीसरी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" के एक गीत का रसास्वादन और गीत का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग काफी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय रचना "बावरे गम दे गयो री..." का गायन प्रस्तुत किया। 

लखनऊ, दूरदर्शन की समाचार वाचक, उद्घोषक और सुप्रसिद्ध गायिका निर्मला कुमारी ने "स्वरगोष्ठी" के पिछले अंक के बारे में प्रशंसात्मक टिप्पणी की है। लिखतीं है; वाह वाह । संगीत की इस सुन्दर श्रृंखला की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं । आपको बहुत बहुत बधाई । 

फेसबुक पर हमारी एक श्रोता और पाठक राजश्री श्रीवास्तव ने लिखा; Krishn mohan ji aap bahut hi sarahniy kaarya kar rahe hain sageet me ruchi rakhne walon ke apki sajha ki gai jankariyan prashasaniya hai. Bahut babut dhanywad. 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया राग काफी : SWARGOSHTHI – 487 : RAG KAFI : 8 नवम्बर, 2020
 


रविवार, 23 फ़रवरी 2020

राग काफी : SWARGOSHTHI – 457 : RAG KAFI






स्वरगोष्ठी – 457 में आज

काफी थाट के राग – 1 : राग और थाट काफी

विदुषी गिरिजा देवी से राग काफी में होरी और मुहम्मद रफी व साथियों से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी गिरिजा देवी
मुहम्मद रफी
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जनक अथवा आश्रय जन्य राग काफी पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की पहली कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में राग काफी में निबद्ध एक होरी ठुमरी रचना का रसास्वादन कराएंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक पुरानी हिन्दी फिल्म का गीत मुहम्मद रफी और साथियों के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। 1963 में प्रदर्शित सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास “गोदान” पर आधारित फिल्म के गीतकार अनजान और संगीतकार पण्डित रविशंकर हैं।


काफी थाट में गान्धार और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग काफी, काफी थाट का जनक अथवा आश्रय राग माना जाता है। राग काफी में उसके थाट के अनुकूल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इसकी जाति सम्पूर्ण होती है। इस राग के गायन अथवा वादन का अनुकूल समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु फाल्गुन मास में किसी भी समय गायन या वादन किया जा सकता है। राग काफी और काफी थाट के अन्य जन्य रागों में भारतीय पर्व होली की रचनाएँ भरपूर मिलती हैं। होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक पर्व होता है। यह ऋतु परिवर्तन और नई फसल के तैयार होने का प्रतीक पर्व भी माना जाता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में पाया जाता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी, दादरा विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी रंग से रँगी होली में परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधाकृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, राग काफी में निबद्ध यह मनमोहक होरी।

काफी होरी : “तुम तो करत बरजोरी...” : विदुषी गिरिजा देवी



राग काफी चंचल प्रकृति का राग है। अतः इस राग में अधिकतर छोटा खयाल और ठुमरी गायी जाती है। अधिकांश ठुमरियों में ब्रज की होली का चित्रण मिलता है। ऐसी ठुमरियों को होली के आसपास फाल्गुन मास में हर समय गाया जा सकता है। दरअसल राग काफी ऋतु प्रधान राग है। अब हम आपको सुनवाते है, राग काफी पर आधारित एक फिल्मी गीत। 1963 में मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास पर आधारित फिल्म “गोदान” प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित इस फिल्म के संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल की विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। यह गीत कहरवा ताल में है, जिसमें ब्रज की होली का चित्रण है। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म “गोदान” के इस होली गीत का। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग काफी : “होली खेलत नन्दलाल बिरज में...” मुहम्मद रफी और साथी : फिल्म – गोदान



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 457वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1997 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 29 फरवरी, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 459 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 455वें अंक में हमने आपको 2015 में प्रदर्शित मराठी फिल्म “कटयार कालजात घुसली” से एक राग आधारित नाट्य गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूरिया कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – शंकर महादेवन और महेश काले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने काफी थाट और उसके आश्रय अथवा जनक राग काफी राग का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में इस राग की एक होरी ठुमरी का रसास्वादन किया। राग काफी के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए 1963 में प्रदर्शित फिल्म “गोदान” का एक गीत मुहम्मद रफी और साथियों के स्वर में प्रस्तुत किया। फिल्म के संगीतकार पण्डित रविशंकर हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
 राग काफी : SWARGOSHTHI – 457 : RAG KAFI : 23 फरवरी, 2020 


रविवार, 24 दिसंबर 2017

ठुमरी काफी : SWARGOSHTHI – 349 : THUMARI KAFI




स्वरगोष्ठी – 349 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 6 : श्रृंगार का वियोग पक्ष रेखांकित

रंगमंच पर नृत्य के साथ प्रस्तुत की गई ठुमरी - "कासे कहूँ मन की बात..."




सुधा मल्होत्रा
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम केवल फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक हों, यह आवश्यक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात कर रहे हैं। आज हम आपके लिए जो ठुमरी गीत प्रस्तुत करने जा रहें हैं, फिल्म में उसे ब्रिटिश शैली के रंगमंच पर, कुछ ख़ास दर्शकों के बीच फिल्माया गया है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म "धूल का फूल" में शामिल इस ठुमरी के बोल हैं "कासे कहूँ मन की बात..."। गीत में श्रृंगार का वियोग पक्ष ही रेखांकित हुआ है, परन्तु एक अलग अन्दाज़ में। नायिका अपने प्रेमी के प्रति शिकवे-शिकायत व्यक्त करती है। गीत का मुखड़ा एक परम्परागत ठुमरी पर आधारित है। राग "काफी", तीन ताल और कहरवा में निबद्ध इस ठुमरी का गायन सुधा मल्होत्रा ने किया है। परदे पर इसे नृत्य की संगति में गाया गया है।


“फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” विषयक श्रृंखला में इन दिनों हम ठुमरी शैली के विकास- क्रम पर चर्चा कर रहे हैं। बनारस में ठुमरी पर चटक लोक-रंग चढ़ा। यह वह समय था जब अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विफल हो गया था और एक-एक कर देशी रियासतें ब्रिटिश शासन के कब्जे में आते जा रहे थे। कलाकारों से राजाश्रय छिनता जा रहा था। भारतीय कलाविधाओं को अंग्रेजों ने हमेशा उपेक्षित किया। ऐसे कठिन समय में तवायफों ने, भारतीय संगीत; विशेष रूप से ठुमरी शैली को जीवित रखने में अमूल्य योगदान किया। भारतीय फिल्मों के प्रारम्भिक तीन-चार दशकों में अधिकतर ठुमरियाँ तवायफों के कोठे पर ही प्रस्तुत की गई। पिछले अंक में अवध के जाने-माने संगीतज्ञ उस्ताद सादिक अली खाँ का जिक्र हुआ था। अवध की सत्ता नवाब वाजिद अली शाह के हाथ से निकल जाने के बाद सादिक अली ने ही ठुमरी का प्रचार देश के अनेक भागों में किया था। सादिक अली खाँ के एक परम शिष्य थे भैयासाहब गणपत राव; जो ठुमरी गायन के साथ-साथ हारमोनियम वादन में दक्ष थे। सादिक अली से प्रेरित होकर गणपत राव हारमोनियम जैसे विदेशी वाद्य पर ठुमरी और दादरा के बोल इतनी सफाई से बजाते थे कि श्रोता चकित रह जाते थे। भैयासाहब ने भी बनारस, गया, कलकत्ता आदि केन्द्रों में ठुमरी का प्रचार-प्रसार किया था। भैया गणपत राव ग्वालियर के थे और इनकी माँ का नाम चन्द्रभागा बाई था। महाराजा ग्वालियर की वह प्रेयसी थीं और एक कुशल गायिका भी थीं। भैया जी अपने समय के संगीतज्ञों में अद्वितीय थे। उनका पालन-पोषण संगीत के प्रमुख केन्द्र ग्वालियर में हुआ था, परन्तु उनकी स्वाभाविक अभिरुचि लोकप्रिय संगीत की ओर थी। सादिक अली की ठुमरियों पर दीवाने होकर उन्होंने लखनऊ की ठुमरी को अपनाया।

उन दिनों हारमोनियम भारतीय शास्त्रीय संगीत में उपेक्षित था। गायन संगति के लिए सारंगी का ही प्रयोग मान्य था। यह उचित भी था; क्योंकि सारंगी ही एक ऐसा वाद्य है जो मानव-कण्ठ के सर्वाधिक निकट है। ऐसे माहौल में गणपत राव ने हारमोनियम जैसे विदेशी वाद्य को अपनाया और उस साज़ पर वह ठुमरी के बोलों को इतनी कुशलता से बजाते थे कि बड़े-बड़े सारंगी वादक भी यह कार्य नहीं कर पाते थे। यह भैया गणपत राव के साहसिक कदम का ही प्रतिफल है कि आज हारमोनियम केवल ठुमरी में ही नहीं बल्कि हर प्रकार के संगीत में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। यहाँ तक कि आजादी के बाद तक "आकाशवाणी" में प्रतिबन्धित हारमोनियम आज स्टूडियो की शोभा बढ़ा रहा है। ठुमरी की विकास-यात्रा में नये-नये प्रयोग हुए तो कुछ भ्रान्तियाँ और रूढ़ियाँ भी टूटीं। ठीक इसी प्रकार फिल्मों में भी ठुमरी के कई नए प्रयोग किये गए। राज-दरबारों से लेकर तवायफ के कोठे तक ठुमरियों का फिल्मांकन हुआ। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटिश रंगमंच की देखा-देखी शेक्सपीयर के नाटकों के मंचन और ओपेरा आदि के लिए बने रंगमंच पर ठुमरियों और कथक नृत्य की प्रस्तुतियाँ होने लगी थीं| ठुमरी दरबार की ऊँची दीवार से बाहर तो निकल आई, लेकिन जनसामान्य से उसकी दूरी अभी भी बनी हुई थी। ऐसे आयोजन विशिष्ट लोगों के लिए ही होते थे।

आज जो ठुमरी गीत आपके लिए हम प्रस्तुत करने जा रहें हैं, फिल्म में यह ब्रिटिश शैली के रंगमंच पर, कुछ ख़ास दर्शकों के बीच प्रस्तुत की गई है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म "धूल का फूल" में शामिल इस ठुमरी के बोल हैं "कासे कहूँ मन की बात..."। गीत में श्रृंगार का वियोग पक्ष ही रेखांकित हुआ है, परन्तु एक अलग अन्दाज़ में। नायिका अपने प्रेमी के प्रति शिकवे-शिकायत व्यक्त करती है। गीत का मुखड़ा एक परम्परागत ठुमरी पर आधारित है। थोड़े फेर-बदल के साथ ठुमरी "कासे कहूँ मन की बात..." के स्थायी की यही पंक्तियाँ कुछ अन्य फ़िल्मों में भी प्रयोग हुए हैं। 1954 की फिल्म "सुबह का तारा" और 1979 में बनी फिल्म "भलामानुष" में इस ठुमरी की स्थायी पंक्तियाँ प्रयोग की गई हैं। राग "काफी", तीन ताल और कहरवा में निबद्ध फिल्म “धूल का फूल” की इस ठुमरी का गायन सुधा मल्होत्रा ने किया है। फिल्मी परदे पर इसे नृत्य की संगति में गाया गया है। गायिका गायन के साथ-साथ सितार वादन भी करती है। गीत के प्रारम्भ में सितार पर बेहद आकर्षक आलाप और उसके बाद सरगम प्रस्तुत किया गया है। फिल्म "धूल का फूल" की इस ठुमरी गीत के प्रसंग में अभिनेता अशोक कुमार, नन्दा, राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा दर्शक के रूप मौजूद हैं। फिल्म में गीत साहिर लुधियानवी का और संगीत एन. दत्ता का है। आइए राग "काफी" में निबद्ध फिल्म "धूल का फूल" की यह ठुमरी सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में सुनते हैं।

ठुमरी काफी : “कासे कहूँ मन की बात...” : सुधा मल्होत्रा : फिल्म – धूल का फूल



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 349वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 30 दिसम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 351वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 347वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1958 में प्रदर्शित फिल्म “कालापानी” से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – आशा भोसले

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं – एक अन्तराल के बाद चित्तौड़गढ़, राजस्थान से हमारी नियमित पाठक / श्रोता इन्दु पुरी गोस्वामी ने पहेली प्रतियोगिता में भाग लिया और तीनों प्रश्नो का सही उत्तर दिया है। अन्य सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की आज की कड़ी में आपने 1959 में प्रदर्शित फिल्म “धूल का फूल” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा कर रहे हैं, जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो ठुमरी गीत सुना, वह राग काफी पर आधारित है। इस श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा भी जारी है। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 26 मार्च 2017

फाल्गुनी गीत : SWARGOSHTHI – 310 : SONGS OF FAGUN




स्वरगोष्ठी – 310 में आज


फागुन के रंग – 2 : राग काफी में कुछ और गीत


पण्डित जसराज से सुनिए -“परमानन्द प्रभु चतुर ग्वालिनी तज रज तक मोरी जाए बलाए...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखला “फागुन के रंग” की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। दो सप्ताह पूर्व ही हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया था। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंक में हमने इस राग में ठुमरी और टप्पा प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम राग काफी में खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत करेंगे। पहले विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के मनमोहक स्वर में एक द्रुत खयाल, उसके बाद राग काफी का एक तराना पण्डित कुमार गन्धर्व के दिव्य स्वरों में और अन्त में पण्डित जसराज की आवाज़ में राग काफी में पिरोया एक भक्तिगीत भी प्रस्तुत करेंगे। 



अश्विनी भिड़े  देशपाण्डे
पिछले अंक में हमने राग काफी के स्वरूप पर चर्चा करते हुए निवेदन किया था कि राग काफी, इसी नाम से पहचाने जाने वाले काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी में धमार गायकी से लेकर खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, टप्पा और भजन आदि रचनाएँ आकर्षक लगती हैं। चंचल प्रकृति के इस राग में निबद्ध रचनाओं के माध्यम से उल्लास और उमंग का भाव सहज ही सृजित किया जा सकता है। ठुमरियों में प्रायः मिश्र काफी का रूप मिलता है। रस और भाव में विविधता के लिए राग काफी के स्वर-संगतियों में प्रयोग की अपार सम्भावनाएँ हैं। राग का ऐसा ही एक रूप आज के इस अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। राग के इस रूप को काफी कान्हड़ा के नाम से पहचाना जाता है। राग काफी कान्हड़ा में आरोह के स्वर काफी के अनुसार प्रयोग होते है, जबकि अवरोह के स्वर कान्हड़ा अंग में प्रयोग किए जाते हैं। राग काफी की प्रवृत्ति चंचल होती है और कान्हड़ा की प्रवृत्ति गम्भीर होती है। राग काफी कान्हड़ा में परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न करने का प्रयास होता है। अब हम आपको राग काफी कान्हड़ा में आपको द्रुत खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

 डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग काफी कान्हड़ा का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग काफी कान्हड़ा : ‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’ : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



पण्डित कुमार गन्धर्व 
 लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब हम आपको राग काफी का एक तराना सुनवा रहे है, जिसे भारतीय संगीत जगत के शीर्षस्थ साधक पण्डित कुमार गन्धर्व ने स्वर दिया है। कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ था, जिसका माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। कुमार गन्धर्व ने जब संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 तक वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। आज के अंक में हम आपको इस महान संगीतज्ञ के स्वरों में राग काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह तराना सुनिए और राग काफी की प्रत्यक्ष रसानुभूति कीजिए।
राग काफी : तीनताल में निबद्ध तराना : पण्डित कुमार गन्धर्व



पण्डित जसराज
 खयाल और तराना के बाद अब हम आपको राग काफी में एक भजन सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज। जसराज जी का जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पण्डित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पण्डित जसराज को संगीत के संस्कार अपने परिवार से मिले। जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। उनके बाद परिवार के भरण-पोषण का दायित्व जसराज जी के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पण्डित मणिराम जी पर आ गया। इन्हीं की छत्र-छाया में जसराज जी की संगीत शिक्षा आगे बढ़ी। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परन्तु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था। संगति कलाकारों के साथ इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में दक्ष नहीं हो जाते, वे अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवन्त सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत को आत्मसात किया। पण्डित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की खयाल शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के मार्गदर्शन में हवेली संगीत विधा पर व्यापक अनुसन्धान कर अनेक नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन पद्यति पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में दो भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पण्डित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। आज के अंक में हम पण्डित जसराज के द्वारा राग काफी के स्वरों में पिरोया एक भक्तिगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने उनके अल्बम ‘बिहरत रंग लाल गिरधारी’ से लिया है। आप भक्तिरस से अभिसिंचित इस गीत का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग काफी : भजन : ‘कहा करूँ वैकुण्ठ ही जाए...’ : पण्डित जसराज




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिख भेजिए।

3 – यह किस महान गायक की आवाज़ है? 
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 1 अप्रैल, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 312वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 308वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वाद्य संगीत की राग आधारित रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, वाद्य – गिटार

इस अंक के तीनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीन में से दो प्रश्न का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी है; हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। इन सभी चार प्रतिभागियों को 2-2 अंक मिलते हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने एक प्रश्न का ही सही उत्तर दिया है; अतः इन्हें एक अंक ही मिलेगा। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ का यह दूसरा अंक था। इस अंक में भी हमने राग काफी में प्रयोग खयाल, तराना और भजन की रचनाओं की चर्चा की है। इस श्रृंखला में हम बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जो अगले अंक में भी जारी रहेगा। आगामी अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। आगामे श्रृंखला के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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