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Sunday, December 27, 2009

मिर्ज़ा ग़ालिब की 212वीं जयंती पर ख़ास

आज से 212 वर्ष पहले एक महाकवि का जन्म हुआ जिसकी शायरी को समझने में लोग कई दशक गुजार देते हैं, लेकिन मर्म समझ नहीं पाते। आज रश्मि प्रभा उर्दू कविता के उसी महाउस्ताद को याद कर रही हैं अपने खूबसूरत अंदाज़ में। आवाज़ ने मिर्ज़ा ग़ालिब के ऊपर कई प्रस्तुतियाँ देकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किया है। शिशिर पारखी जो खुद पुणे से हैं, ने उर्दू कविता के 7 उस्ताद शायरों के क़लामों का एक एल्बम एहतराम निकाला था,जिसे आवाज़ ने रीलिज किया था। इसकी छठवीं कड़ी मिर्ज़ा ग़ालिब के ग़ज़ल 'तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले' को समर्पित थी। आवाज़ के स्थई स्तम्भकार संजय पटेल ने लता मंगेशकर की आवाज़ में ग़ालिब की ग़ज़लों की चर्चा दो खण्डों (पहला और दूसरा) में की थी। संगीत की दुनिया पर अपना कलम चलाने वाली अनिता कुमार ने भी बेग़म अख़्तर की आवाज़ में मिर्जा ग़ालिब की एक रचना 'जिक्र उस परीवश का और फ़िर बयां अपना...' हमें सुनवाया था।

लेकिन आज रश्मि प्रभा बिलकुल नये अंदाज़ में अपना श्रद्धासुमन अर्पित कर रही हैं। सुनिए और बताइए-

Saturday, June 27, 2009

घर आजा घिर आयी बदरा सांवरिया...पंचम दा की ७० वीं जयंती पर ओल्ड इस गोल्ड का विशेष अंक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 124

"१९५७की बात मैं कर रहा हूँ, जब मैं पहली बार इस फ़िल्मी दुनिया में बतौर संगीतकार क़दम रखा। महमूद साहब थे मेरे जिगरी दोस्त, उन्होने मुझे एक पिक्चर दिया जिसका नाम था 'छोटे नवाब'। वह मेरी पहली पिक्चर थी। तो हम लोग जिस तरीके से सिचुयशन डिसकस करते हैं, वो हम लोगों ने किया, फिर एक गाना बनाया, दूसरा गाना बनाया, फिर तीसरा गाना बनाया, लेकिन मुझे बहुत एक तर्ज़ पसंद आ रही थी, जो उन्होने भी पसंद किया था, महमूद साहब ने, उस गाने की रिकॉर्डिंग के लिए हम तैयार हो गये, और उसकी रिकॉर्डिंग की डेट भी नज़दीक आ गयी। तो उन्होने (महमूद) कहा कि 'तीन चार दिन के अंदर गाना कर के दीजिये।' मैं उनको डरते डरते कहा कि 'देखिये, आप तो इस वक़्त बहुत बड़े नामी प्रोड्युसर नहीं हैं, लेकिन फिर भी मैं चाहूँगा कि यह गाना बहुत बढ़िया एक सिंगर गाये तो अच्छा है।' उन्होने पूछा, 'कौन?' तो मेरे मन में ज़ाहिर है यही आया कि 'लता दीदी अगर गायें तो अच्छा रहेगा।' लेकिन लता दी एक महीने तक तो बुकिंग में रहती थीं, हर रोज़ दो या तीन गाना गाती थीं। तो मैं डरते डरते एक दिन महबूब स्टुडियो में गया, उनसे मिला और कहा कि 'नमस्कार'। उन्होने कहा कि 'हाँ, कोई काम के लिये ज़रूर आये होगे!' मैने कहा 'आप के लिये बहुत छोटा सा काम है, लेकिन मेरे लिये बहुत बड़ा काम हो जायेगा अगर आप यह गाना कर दें तो!' उन्होने कहा कि 'हाँ, मुझे पता चला है कि तुम्हे एक पिक्चर मिली है, नाम क्या रखा है?' मैने कहा कि 'छोटे नवाब'। 'नाम तो बहुत अच्छा है, मुझे क्या करना है, गाना गाना है?' मैनें कहा 'जी, एक गाना तो आप को गाना पड़ेगा, मैं चाहता हूँ कि मेरी ज़िंदगी का पहला गाना जो है वह आप ही गायें।' तो उन्होने कहा 'कब करना है?' मैने कहा कि 'तीन चार दिन के अंदर अगर आप कर दें तो बहुत अच्छी बात है।' तो उन्होने कहा कि 'तीन चार दिन में थोड़े डेट है मेरे पास! कम से कम डेढ़ महीने तक बुकिंग है मेरी।' मैने कहा डरते डरते कि 'हाँ, मुझे मालूम है, फिर भी आप कुछ कोशिश करें तो हो जायेगा।' तो उन्होने कुछ दो तीन जगहों पर फ़ोन किये, करने के बाद उन्होने कहा कि 'चलो, तुम्हारे पहले गाने के लिये मैं तीन दिन के अंदर डेट देती हूँ, और वह गाना मुझे बता दो।' मैने उनको सुनाया, गाना सुनते ही मुझे बहुत आशिर्वाद किया।"

तो दोस्तों, इतना पढ़ने के बाद तो आप समझ ही गये होंगे कि ये बातें कौन कह रहे थे और किस गीत के बारे में कह रहे थे! जी हाँ, बिल्कुल ठीक समझे, विविध भारती के विशेष जयमाला कार्यक्रम में करीब करीब तीन दशक पहले ये बातें कही थी राहुल देव बर्मन साहब ने, अपने पहले गीत "घर आजा घिर आये बदरा साँवरिया" के बारे में। और यही गीत आज सुनिये 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में छोटे बर्मन साहब की ७० वीं जयंती पर. 'छोटे नवाब' फ़िल्म आयी थी सन् १९६३में जिसका निर्माण उस्मान अली ने किया था, निर्देशन किया एस. ए. अकबर ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे महमूद, अमीता, मीनू मुमताज़, और अल्ताफ़। फ़िल्म तो बहुत ज़्यादा नहीं चली, लेकिन फ़िल्म अमर हो गयी केवल इस बात के लिये कि यह पंचम की पहली फ़िल्म थी। शैलेन्द्र के लिखे प्रस्तुत गीत को सुनवाने से पहले एक और रेडियो कार्यक्रम का एक अंश आप के साथ बाँटना चाहूँगा। एक बार विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में आशा भोंसले, राहुल देव बर्मन और गुलज़ार साहब ने शिरकत की थी और बातों बातों में बात छिड़ी थी लताजी और सचिन देव बर्मन के बीच चली ग़लतफ़हमी की। किस तरह से राहुल देव बर्मन के इसी गाने के ज़रिये उस बरसों पुरानी ग़लतफ़हमी का अंत हुआ था, पढ़िये निम्नलिखित अंश में -

पंचम: फ़िल्म 'छोटे नवाब' में मेरा पहला गाना रिकार्ड हुआ लताजी की आवाज़ में। इससे जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है। एक कहावत है न कि पुराने चावल घमंडी होते हैं, तो मेरे पिताजी भी घमंडी थे, उनका दीदी के साथ कुछ अन-बन हो गयी थी। उन्होने कह दिया था कि 'मैं किसी और से गानें गवाउँगा।' तो वह क्या हुआ कि वह मेरा पहला पिक्चर था, मैं दीदी के पास गया और कहा कि 'आप को मेरे लिये गाना पड़ेगा।' उन्होने कहा कि 'क्यों नहीं गाऊँगी, ज़रूर गाऊँगी।' उन दिनों रिहर्सल हुआ करते थे। तो वो आयीं हमारे घर में रिहर्सल करने के लिये और रिहर्सल में गाना सुनके बहुत आशिर्वाद दिया, और उन्होने कहा कि 'पिताजी से नहीं मिलाओंगे?' मैने कहा कि 'वो दरवाज़े पे ख़ड़े हैं, दूसरे कमरे में, वो आने की सोच ही रहे हैं। उन्होने (लता) आवाज़ दी कि 'दादा, अंदर आइये।'

गुलज़ार: अच्छा, रूठे हुए थे!

पंचम: अंदर आ के बोले, 'लता, कितने डेट्स दे सकती हो मुझे?' वो ऐसे ही बात करते थे। बोलीं, 'आप को जितने चाहिये, एक महीने का चाहिये?' फिर उसके बाद पिताजी के साथ लताजी का अच्छा हो गया एक बार फिर।

आशा: एक बात पूछूँ? सच बतायेंगे? उस दिन आप अंदर से काँप रहे थे न?

पंचम: बिल्कुल! मैने पहली बार उन्हे १९५१ में "ठंडी हवायें लहराके आये" गाते हुए देखा था, 'she is so simple', लगता ही नहीं था कि इतनी बड़ी गायिका हैं।


तो दोस्तों, देखा आप ने कि किस तरह से पंचम के इस पहले पहले गीत ने बर्मन दादा और लता जी के बीच करीब ६ साल की अन-बन (१९५७ से १९६३ तक) को ख़त्म कर दिया, जिस वजह से फ़िल्म सगीत को एक बार फिर से लता और दादा के संगम से बनने वाले एक से एक नायाब गाने मिल सके। लेकिन आज ज़िक्र दादा बर्मन का नहीं बल्कि छोटे नवाब की चल रही है, तो आइये सुनते हैं राग मालगुंजी पर आधारित यह यादगार गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. बिमल रॉय की फिल्म में तलत साहब का गाया गीत.
२. हालाँकि बर्मन दा संगीतकार थे पर तलत को गायक लेने का सुझाव उनके सहायक जयदेव ने दिया था.
३. एक अंतरे की दूसरी पंक्ति इस शब्द से शुरू होती है -"गीत".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
कल की पहेली में तो हमारे दिग्गज भी परेशान दिखे. पर स्वप्न मंजूषा जी आखिरकार बाज़ी मार ही गयी. आप शरद जी के स्कोर के करीब पहुँचने की सबसे सशक्त दावेदार हैं २० अंकों के लिए बधाई. दिशा जी ने हाथ आया मौका गँवा दिया. पराग जी सही जवाब पर आप फिर लेट हो गए. विनोद जी लक्ष्मी प्यारे की पहली फिल्म "पारसमणी" थी, न कि "धरती कहे पुकार के" जिसके गीत का आपने जिक्र किया, सुमित जी खुलासे के लिए धन्यवाद.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, April 8, 2009

अनमोल बना रहने को कब टूटा कंचन...महादेवी वर्मा को आवाज़ का नमन

छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में महादेवी वर्मा एक हैं !इनका जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में एक संपन्न कला -प्रेमी परिवार में सन् १९०७ में होली के दिन हुआ !महादेवी जी अपने परिवार में लगभग २०० वर्ष बाद पैदा होने वाली लड़की थी! इसलिए उनके जन्म पर सबको बहुत प्रसन्नता हुई !अपने संस्मरण `मेरे बचपन के दिन' में उन्होंने लिखा है कि,"मैं उत्पन्न हुई तो मेरी बड़ी खातिर हुई और मुझे वह सब नहीं सहन करना पड़ा जो अन्य लड़कियों को सहना पड़ता है !"इनके बाबा (पिता)दुर्गा के भक्त थे तथा फ़ारसी और उर्दू जानते थे !इनकी माता जी जबलपुर कि थीं तथा हिंदी पढ़ी लिखी थीं !वे पूजा पाठ बहुत करती थी !माताजी ने इन्हें पंचतंत्र पढना सिखाया था तथा बाबा इन्हें विदुषी बनाना चाहते थे !इनका मानना है कि बाबा की पढ़ाने की इच्छा और विरासत में मिले सांस्कृतिक आचरण ने ही इन्हें लेखन की प्रवर्ति की ओर अग्रसर किया !इनकी आरंभिक शिक्षा इंदौर में हुई !माता के प्रभाव ने इनके ह्रदय में भक्ति -भावना के अंकुर को जन्म दिया !मात्र ९ वर्ष की उम्र में ये विवाह -बंधन में बांध गयीं थीं !विवाह के उपरांत भी इनका अध्ययन चलता रहा !

आस्थामय जीवन की साधिका होने के कारण ये शीघ्र ही विवाह बंधन से मुक्त हो गयीं !सन् १९३३ में इन्होने प्रयाग में संस्कृत विषय में ऍम.ए.की परीक्षा उत्तीर्ण की !नारी समाज में शिक्षा प्रसार के उद्देश्य से प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की !कुछ समय तक मासिक पत्रिका `चाँद 'का उन्होने निशुल्क सम्पादन किया !

महादेवी जी का कार्य क्षेत्र बहुमुखी रहा है !उन्हें सन् १९५२ में उत्तर प्रदेश की विधान परिषद् का सदस्य मनोनीत किया गया !सन् १९५४ में वे साहित्य अकादमी दिल्ली की संस्थापक सदस्य बनीं !सन् १९६० में प्रयाग महिला विद्यापीठ की कुलपति नियुक्त हुई !सन् १९६६ में साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों के लिए भारत सरकार ने पदमभूषण अलंकरण से विभूषित किया !विक्रम कुमांयुं तथा दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया !१९८३ में चम ओर दीपशिखा पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरूस्कार दिया गया !उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने भी `भारती'नाम से स्थापित हिंदी के सर्वोत्तम पुरूस्कार से महादेवी जी को सम्मानित किया !सन् १९८७ में इनका स्वर्गवास हो गया !

महादेवी जी ने गद्य ओर पद्य दोनों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है !कविता में अनुभूति तत्व की प्रधानता है तो गद्य में चिंतन की !महादेवी उच्च कोटि की रहस्यवादी छायावादी कवियित्री हैं !वे मूलतः अपनी छायावादी रचनाओं के लिए प्रसिद्द हैं !गीत लिखने में महादेवी जी को आशातीत सफलता मिली है !उनकी रचनाओं में माधुर्य प्रांजलता ,करुणा,रोमांस ओर प्रेम की गहन पीडा ओर अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति की अभिव्यक्ति मिली है !इनके गीतों को पढ़ते समय पाठक का हृदय

भीग उठता है !विरह-वेदना को अपनी कला के रंग में रंग देने के कारण ही उन्हें आधुनिक युग की मीरा भी कहा जाता है !उन्हें अपने जीवन `दीपक'का प्रतीक अत्यंत प्रिय रहा है,जो उनकी कविताओं में जीवन का पर्याय बनकर प्रयुक्त हुआ है!`नीहार',`रश्मि',`नीरजा',`सांध्यगीत',`दीपशिखा'और `चामा 'उनकी प्रसिद्द काव्य -रचनाएँ हैं !गद्य के अंतर्गत `श्रंखला की कड़ियाँ ',`अतीत के चलचित्र ',`स्मृति की रेखाएं ',`पथ के साथी ' इत्यादि ऐसे संग्रह हैं ,जिनको पढ़ते समय आँखें भीगे बिना नहीं रहतीं और दिल सोचता ही रह जाता है ,कई प्रश्न और कई समस्याएं हमारे सामने चुनौतियों के रूप में कड़ी हो जाती हैं ,जिनका उत्तर हम स्वयं ही दे सकते हैं ,कोई और नहीं !

इन सबके अतिरिक्त देश-प्रेम भी इनके हृदय में कूट कूट कर भरा है !इनका मानना था कि यदि मनुष्य अपनी मन को जीत लेगा तो कोई दुनियाकी ताकत उसको पराजित नहीं कर सकती !इसका परिचय उनके द्वारा रचित कविता `जाग तुझको दूर जान' से मिलता है !जिसके अंतर्गत उन्होंने लिखा है कि -

"नभ तारक सा खंडित पुलकित
यह क्षुर-धारा को चूम रहा
वह अंगारों का मधु-रस पी
केशर-किरणों सा झूम रहा
अनमोल बना रहने को कब
टूटा कंचन हीरक ,पिघला ?"


इसमें महादेवी जी का कहना है कि आकर्षक रूप प्राप्त कर अमूल्य बने रहने के लिए सोना भला कब टूटा है और हीरा कब पिघला है ?भाव यह है कि दोनों अपनी अपनी प्रकृति के अनुरूप साधन अपनाकर ही अनुपम सौन्दर्य को प्राप्त करते हैं !सोने को तपना ही पड़ता है तथा हीरे को खंडित ही होना पड़ता है !वेदना कि अनुभूति कर ही दोनों अमूल्य बन जाते हैं !महादेवी जी ने अपने गीतों में आलस ,प्राक्रतिक आपदा ,सांसारिक मोह माया ,विभिन्न प्रकार के आकर्षण व् व्यक्तिगत कमजोरियों आदि पर विजय प्राप्त कर निरंतर साध्य पथ पर अग्रसर होते रहने कि बात कही है !यानिकी प्रत्येक परिस्थिति में स्वतंत्रता प्राप्त करना समस्त देशवासियों का फ़र्ज़ है !

दोस्तों, युग्म परिवार के आचार्य संजीव सलिल जी, आदरणीय महादेवी जी के भतीजे हैं. चूँकि मार्च २४ को उनकी जयंती थी, हमने मृदुल जी के संचालन में इस माह का पॉडकास्ट कवि सम्मलेन भी उन्ही को समर्पित किया था. आईये सुनें आचार्य संजीव सलिल जी से उनके अपने संस्मरण.





आलेख - शिवानी सिंह




Tuesday, February 24, 2009

तलत महमुद का था अंदाजें बयां कुछ और...

गायक तलत महमूद की ८५ वीं जयंती पर विशेष

गीत संगीत के बिना जरा जीवन की कल्पना करिये और लगे हाथ यह कल्पना भी कर डालिये कि तलत महमुद जैसे गायक की खूबसूरत मखमली आवाज यदि हमारे कानों तक पहुँचनें से महरुम रहती तो। तब ज्यादा कुछ न होता, धरती अपनी जगह ही बनी रहती, आसमान भी वहीं स्थिर रहता, बस हम इन बेहद खूबसूरत गीतों को सुननें से महरूम रह जाते। "वो दिन याद करो","आहा रिमझिम के वो प्यारे प्यारे गीत लिये","प्यार पर बस तो नहीं फिर भी", जैसे गीत हमारे नीरस जीवन, में मधुर रस घोलते हैं।

सुनिए १९६८ में आई फ़िल्म "आदमी" से रफी और तलत का गाया गीत, गीतकार हैं शकील बदायूँनी और संगीत है नौशाद का -


तहजीब के शहर लखनऊ में २४ फरवरी १९२४ में जन्में तलत महमुद को बचपन से ही संगीत का बेहद शौक था। वे संगीत के इतने दीवाने थे कि पूरी पूरी रात वे संगीत सुनते सुनते ही बिता देते थे। उन्होनें संगीत की विधिवत शिक्षा प.भट्ट से ली। अपने संगीत कैरियर की शुरूआत मीर, जिगर, दाग गजलों से की। उस समय संगीत की सबसे बडी कंपनी एच एम वी के लिये उन्होनें १९४१ "सब दिन एक समान नहीं था"; गीत गवाया जो बेहद प्रसिद हुआ। १९४४ में उनका गाया गैर फिल्मी गीत "तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला ना सकेगी" बेहद मशहुर हुआ और आज तक वह सबसे ज्यादा बिकने वाली गैर फिल्मी अलबम बनी हुई है।

सुनिए गीत "बेरहम आसमां", तलत, राजेंदर कृष्ण और मदन मोहन.-


तलत ने फिल्मों में आने से पहले आकाशवाणी लखनऊ और फिर बाद में कलकता आकाशवाणी में तपन कुमार के नाम से कई गैर फिल्मी गीत गाये। लखनऊ और कलकता में अपने गायन का लोहा मनवाने के बाद उनकी किस्मत उन्हें १९४९ में बम्बई ले आई जहाँ उनके हुनर को पहले ही पहचाना जा चुका था। बम्बई में उन्के गायन का चर्चा आम हो चुका था। महान संगीतकार अनिल विश्वास ने जब तलत को सुना तो वे उनकी कँपकपाहट में सिमटी हुई आवाज से बेहद प्रभावित हुये। पर जब अनिल विश्वास जी की जब दुबारा तलत महमुद जी से मुलाकात हुई तो उन्होनें तलत की आवाज में मौजूद कंपकपाहट गायब देखी, इसका कारण पुछनें पर तलत ने जवाब दिया की सभी कहते हैं की मैं जब गाता हुँ तो मेरी आवाज काँपती हैं, तो मैं उसे अपनी आवाज में तबदील कर के गा रहा हुँ। तब अनिल विश्वास ने कहाँ अपनी प्राकर्तिक आवाज को बदलने की गलती मत करना, मुझे तुम्हारी वो ही काँपती हुई आवाज चाहियें। आगे चलकर वह कंपकंपाहट ही तलत महमुद के गायन की विशेषता बनी।

उसी कंपकंपाती आवाज़ का जादू है इस गीत में भी- "तस्वीर बनता हूँ..."-


तलत महमुद फिल्मों में अभिनय करना चाहते थे, अपने शानदार व्यक्तित्व के कारण उन्हें फिल्में भी मिली पर अभिनय के बजाये उनका गायन ही ज्यादा उभर कर सामने आया। उन्कें द्वारा अभिनीत पहली फिल्म १९४५ में बनी 'राजलक्ष्मी' थी और आखिरी नूतन के साथ "सोनें की चिडियाँ"। फिल्म सिटी बम्बई आने पर उनको जो पहला गीत गाने को मिला वह था, संगीतकार अनिल विश्वास के निर्देशन में दिलीप कुमार पर फिल्माया गया गीत "ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो"। दिलीप कुमार के सीधे सरल प्रेमी की छवि पर तलत महमुद की कोमल आवाज बेहद मेल खाती थी।

लता के साथ गाया ये दोगाना भला कौन भूल सकता है..."इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा..." -


तलत महमूद की आवाज में एक खूबसूरत मिठास, सादगी, सुरूचि थी जो उनके समकालीनों में नदारद थी। उर्दू का उनका उच्चारण बेहद साफ सुथरा और सधा हुआ था, जो गजलों के लिये उपयुक्त होता है सो उनके हिस्से में ज्यादा गजल आई। फिल्मों में गजलों को नया आयाम देते हुये तलत महमुद ने बेहतरीन गजलें संगीत जगत को दी। कालंतर में उनको गजलों का शहनशाह कहा गया। उनकी मिश्री सी मिट्ठी आवाज में नफासत के साथ जो कंपकपाहट सुनाई देती है जो दुर्लभ है। जैसे समुंदर की लहरें किनारों से टकराती है या फिर दीये की काँपती लौ, ठीक उसी तरह का आभास देती है तलत महमुद की आवाज।

सुनिए एक बार फ़िर तलत और मदन मोहन की टीम..."दो दिन की मोहब्बत में..."-


मखमली आवाज के धनी तलत महमुद ने १२ भारतीय भाषाओं में गाया और फिल्म अभिनेता के रूप में उन्होनें १३ फिल्मों में काम किया। तलत ने अपने ४० साल के कैरियर में लगभग ८०० गीत गाये जिनमें से कई तो अदभुत गीत है "ए गमें दिल क्या करूँ","रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिये", "हमसे आया न गया", "तेरी आँख के आँसू पी जाऊँ","शामें गम की कसम", "इतना ना मुझसे तु प्यार बढा","फिर वही शाम वो ही तनहाई","मेरी याद में न तुम आँसु बहाना", "ऐ मेरे दिल","तस्वीर बनाता हूँ","जाये तो जाये क्हाँ"," मिलते ही आँखे दिल हुआ दिवाना किसीका","दिले नादान तुझे हुआ क्या है","मैं दिल हुँ एक अरमान भरा","है सबसे मधुर", "प्यार पर बस तो नहीं","ये नई नई प्रीत है", "रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाये","अँधें जहान के अँधें रास्ते", "जब छाये सावन की घटा","कोई नहीं मेरा इस दुनिया में'"," '' आँसू समझ कर","बेरहम आसमान","बुझ गयी गम की हवा","जिन्दगी देने वाले सुन","ये हवा ये रात सुहानी", "जो खुशी से चोट खाये वो नजर क्हाँ से लाऊँ", "आंसू तो नहीं मेरी आँखों में'',"सितारों तुम गवाह रहना मेरा","मोहब्बत तुर्क की मानें","वो जालिम प्यार क्या जानें","रो रो बीता जीवन सारा", "जिऊँगा जब तलक तेरे अफसाने याद आयेगें","आँसु तो नहीं हैं आँखों में","दो दिन की मोहब्बत में तुमनें" तुम्हें नींद आयेगी, तुम तो सो भी जाओगें, किसका ले लिया है दिल, ये भी भुल जाओगें, जैसे अनगिन्त गीत तलत महमुद जी आवाज में दर्ज हैं।

"सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या हुआ..."- एक और बेशकीमती गीत -


तलत ने बेहतरीन शायरों के साथ काम किया। वे अच्छी शायरी पर हमेशा जोर देते थे। शकील बदायुँनी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुलतानपुरी के अनमोल शब्दों पर तलत महमुद ने अपनी मखमली आवाज का जामा पहनाया। शकील बदायुँनी से उनकी दोस्ती आखिर तक बनी रही। ५०-६० वह दौर संगीत के लिहाज से स्वर्णिम था। बेहतरीन संगीतकार, लाजवाब शायर, प्रतिभा सम्पंन गायकों का दौर था वह।

फिल्मों के अलावा तलत महमुद अपने गैर फिल्मी गीतों के लिये भी याद किये जायेगें। उनकें कुछ गैर फिल्मी गीतों के बोल इस प्रकार से हैं,"दिल की गहराई नाप कर","जिसने दिल को आँसु बसाके", "कहीं इश्क का तकाजा", "जिंदगी की रात में","जिंदगी की उदास राहों में", "गजल का साज उढाओं बढी उदास", '"उसकी हसरत है जिसे दिल से","असर उसको जरा नहीं होता","सभी अंदाजें हुसन प्यारे हैं", "कोई आरजु नहीं है"। तलत महमुद ने उस समय के सभी बडे अभिनेताओं के लिये अपनी आवाज दी। देव आनन्द के लिये गाये उनके गीत हैं "जाये तो जाये कहाँ","ये नई नई प्रीत है",सुनील दत के लिये गाया उनका प्रसिद्ध गीत है "जलते हैं जिसके लिये" और "इतना ना मुझ से तु प्यार बढा, कि मैं इक बादल आवारा,भारत भूषण के लिये, "इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही","तेरी आँख के आँसू पी जाऊँ",लेकिन सबसे ज्यादा दिलीप कुमार पर तलत महमुद की आवाज का इस्तेमाल किया गया।

सुनिए फ़िल्म किनारे किनारे से "देखी तेरी खुदाई..." संगीत है जयदेव का -


देश में ही नहीं उनके लाखों प्रशंसक विदेशों में भी थे इसीलिये उन्कें गीतों का आयोजन विदेशों में भी होने लगे। १९५६ में तलत महमुद पहले फिल्म गायक बने जिन्होनें विदेशों में व्यवसायिक शो दिये। इस तरह के शो की शुरूआत सबसे पहले तलत महमुद से ही हुई थी। ६० के उतरार्थ में तेज संगीत का दौर शुरू हो चुका था, तलत महमूद अपने आप को उस माहौल में ढाल पाने में असमर्थ थे सो वक्त रहते उन्होनें फिल्म गायन से अपने को अलग कर लिया। पर गैर फिल्मी गीत वे लम्बें अरसे तक गाते रहे। बाद में पार्किन्सन की बीमारी ने उनकी आवाज पर असर डालाना शुरू कर दिया। लम्बे अरसे तक वे बीमार रहे, १९९६ में अपनी आवाज रूपी धरोहर हम संगीत प्रेमियों को सौंप कर चले गये।

आज भी मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश के आवाज की तरह गाने वाले मिल जायेगे पर तलत महमुद की मखमली आवाज की नकल करने वाला गायक नहीं मिल सका है। आज २४ फरवरी को उनकी जयंती पर हम तलत महमुद के दीवाने बस इतना ही कह सकते हैं,तलत महमुद का था अँदाजें बया कुछ और...-



प्रस्तुति - विपिन चौधरी

Tuesday, September 23, 2008

सुनिए 'हाहाकार' और 'बालिका से वधू'

सूखी रोटी खायेगा जब कृषक खेत में धरकर हल,
तब दूँगी मैं तृप्ति उसे बनकर लोटे का गंगाजल।
उसके तन का दिव्य स्वेदकण बनकर गिरती जाऊँगी,
और खेत में उन्हीं कणों से मैं मोती उपजाऊँगी।
फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदी से जग की अमा मिटा जाऊँ।-विश्चछवि ('रेणुका' काव्य-संग्रह से)


उपर्युक्त पंक्तियाँ पढ़कर किस कवि का नाम आपके दिमाग में आता है? जी हाँ, जिसने खुद जैसे जीव की कल्पना की जीभ में भी धार होना स्वीकारा था। माना था कि कवि के केवल विचार ही बाण नहीं होते वरन जिसके स्वप्न के हाथ भी तलवार से लैश होते हैं। आज यानी २३ सितम्बर २००८ को पूरा राष्ट्र या यूँ कह लें दुनिया के हर कोने में हिन्दी प्रेमी उसी राष्ट्रकवि रामधारी दिनकर की १००वीं जयंती मना रहे हैं। आधुनिक हिन्दी काव्य राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का शंखनाद करने वाले युग-चारण नाम से विख्यात, "दिनकर" का जन्म २३ सितम्बर १९०८ ई. को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया घाट नामक गाँव में हुआ था. इन की शिक्षा मोकामा घाट के स्कूल तथा फिर पटना कॉलेज से हुई जहाँ से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बी. ए. (ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की. एक विद्यालय के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जन-संपर्क विभाग के उप निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया. साहित्य-सेवाओं के लिए उन्हें डी. लिट. की मानक उपाधि, विभिन्न संस्थाओं ने उनकी पुस्तकों पर पुरस्कार ( साहित्य अकादमी तथा ज्ञानपीठ ) और भारत सरकार ने पद्मभूषण के उपाधि प्रदान कर उन्हें समानित किया.

कभी इसी कवि ने कहा था-

प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों के शृंगार माँगता हूँ। -- 'आग की भीख' ('सामधेनी' से)


इसी सप्ताह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अग्रयुवक शहीद भगत सिंह की भी जयंती है। क्या संयोग है कि एक ही सप्ताह में राष्ट्रकवि और राष्ट्रपुत्र का जन्मदिवस है! शायद राष्ट्रकवि ने भगत सिंह के सम्मान में और उनके जैसे वीरों में देशप्रेम की आग भरने के लिए ही कहा होगा-

यह झंडा, जिसको मुर्दे की मुट्ठी जकड़ रही है,
छिन न जाय, इस भय से अब भी कसकर पकड़ रही है,
थामो इसे, शपथ लो, बलि का कोई क्रम न रुकेगा,
चाहे जो हो जाय, मगर यह झण्डा नहीं झुकेगा।
इस झण्डे में शान चमकती है मरनेवालों की,
भीमकाय पर्वत से मुट्ठी भर लड़नेवालों की। --- 'सरहद के पार' से ('सामधेनी' से)


इस राष्ट्रकवि ने कविता को परिभाषित करते हुए कहा था-

बड़ी कविता कि जो इस भूमि को सुंदर बनाती है,
बड़ा वह ज्ञान जिससे व्यर्थ की चिन्ता नहीं होती।
बड़ा वह आदमी जो जिन्दगी भर काम करता है,
बड़ी वह रूह जो रोये बिना तन से निकलती है।---- 'स्वप्न और सत्य' ('नील कुसुम' से)



"दिनकर" के कुछ काव्य संकलन :

१ रश्मिरथी
२ कुरुक्षेत्र
३ चक्रवाल
४ रसवंती
५ नीम के पत्ते
६ संचयिता
७ आत्मा की आँखें
८ उर्वशी
९ दिनकर की सूक्तियां
१० मुक्ति - तिलक
११ सीपी और शंख
१२ दिनकर के गीत
१३ हारे को हरिनाम
१४ राष्मिलोक
१५ धुप और धुंआ
१६ कोयला और कवित्व ..... इत्यादि ..

हम रामधारी जी के साहित्य की मीमांसा करें तो छोटी मुँह बड़ी बात होगी। हमने सोचा कि आवाज़ के माध्यम से इस महाकवि को कैसे श्रद्धासुमन अर्पित करें। जिन खोजा, तिन पाइयाँ, अमिताभ मीत मिले, जो साहित्यकारों में सबसे अधिक दिनकर से प्रभावित हैं। मीत का परिवार भी साहित्य का रसज्ञ था। मीत को बचपन में इस राष्ट्रकवि का सानिध्य भी मिला। मीत का सपना ही है कि दिनकर की 'रश्मिरथी' को इस मंच से दुनिया के समक्ष 'आवाज़' के रूप में लाया जाय।

मीत ने दिनकर की दो प्रसिद्ध कविताओं 'हाहाकार' ('हुंकार' कविता-संग्रह से) और 'बालिका से वधू' ('रसवन्ती' कविता-संग्रह से) अपनी आवाज़ दी है। सुनें और राष्ट्रकवि को अपनी श्रद्धाँजलि दें।

हाहाकार


बालिका से वधू




प्रस्तुति- अमिताभ 'मीत'


कविता पृष्ठ पर पढ़ें वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश रावतानी की कलम से 'दिनकर-चंद स्मृतियाँ'


कलम आज उनकी जय बोल- शोभा महेन्द्रू की प्रस्तुति

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