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Sunday, May 5, 2019

राग हंसध्वनि : SWARGOSHTHI – 418 : RAG HANSADHWANI






स्वरगोष्ठी – 418 में आज

बिलावल थाट के राग – 6 : राग हंसध्वनि

पण्डित रविशंकर से सितार पर राग हंसध्वनि की रचना और लता मंगेशकर और मन्ना डे से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित रविशंकर
लता मंगेशकर और मन्ना डे
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से दूसरा थाट बिलावल है। इस श्रृंखला में हम बिलावल थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में बिलावल थाट के जन्य राग “हंसध्वनि” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर का बजाया राग हंसध्वनि में एक आकर्षक रचना सुनवाएँगे। साथ ही 1956 की फिल्म “परिवार” से राग हंसध्वनि में पिरोया एक सदाबहार गीत सुनवाएँगे और इसके संगीतकार सलिल चौधरी के बारे में आपको कुछ जानकारी देंगे।



राग हंसध्वनि का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना जाता है। इसमें सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। मध्यम और धैवत स्वर वर्जित होने के कारण इस राग की जाति औड़व-औड़व होती है। वादी स्वर तार षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का प्रथम प्रहर माना जाता है। यह कर्नाटक पद्धति का राग है, जिसका प्रचार अब उत्तर भारत में हो गया है। यह चंचल प्रकृति का उत्तरांग प्रधान राग है। इस राग के वादी-संवादी स्वरों और गायन समय में मतभेद है। राग हंसध्वनि में ऋषभ स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण होता है। गान्धार स्वर का कण लेते हुए ऋषभ स्वर पर रुकते हैं। आरोह में ऋषभ स्वर अल्प होता है। यह राग शंकरा के बहुत समीप है। मुख्य अन्तर यह है कि राग शंकरा मींड़ प्रधान गम्भीर प्रकृति का राग है, जबकि राग हंसध्वनि चंचल प्रकृति का राग है। दूसरा अन्तर यह है कि राग शंकरा में धैवत स्वर प्रयोग किया जाता है, जबकि राग हंसध्वनि में धैवत स्वर वर्जित होता है। राग हंसध्वनि के स्वर-संयोजन को समझने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर का बजाया सितार पर इस राग में निबद्ध एक रचना का रसास्वादन कराते हैं।

राग हंसध्वनि : सितार पर एक रचना : पण्डित रविशंकर



अब हम आपको राग हंसध्वनि में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1956 में प्रदर्शित फिल्म “परिवार” से लिया है। इस गीत को लता मंगेशकर और मन्ना डे ने स्वर दिया है। इसके गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार सलिल चौधरी हैं। सलिल चौधरी मूलतः साम्यवादी विचारधारा के थे। उन्होने अपने संगीत को साम्यवाद का सन्देश प्रसारित करने का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनाया। वह विलक्षण संगीतकार होने के साथ ही बाँग्ला के अच्छे कवि, गीतकार और संगीत समीक्षक भी थे। इस गीत के बारे में टिप्पणी करते हुए लेखक पंकज राग अपनी पुस्तक “धुनों की यात्रा” में लिखते हैं; अपनी रचनाओं में भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रयोग सलिल चौधरी ने कई बार सूक्ष्म बारीकियों के साथ किया। कर्नाटक शैली के राग हंसध्वनि को लेकर फिल्म “परिवार” के लिए कम्पोज़ किया हुआ उनका अद्भुत गीत “जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया...” तो अमर हो चुका है। लीजिए अब आप यही गीत लता मंगेशकर और मन्ना डे के युगल स्वर में सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग हंसध्वनि : “जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया...” : लता मंगेशकर और मन्ना डे : फिल्म – परिवार



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 418वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1972 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 420वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि गीत के इस अंश में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किन पार्श्वगायकों के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 11 मई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 420 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 416वें अंक की पहेली में हमने आपको वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म “सुशीला” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – शंकरा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुबारक बेगम

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

हिन्दी सिने राग इन्साइ क्लोपीडिया, भाग - 1 का मुखपृष्ठ
मित्रों, आज हम आपका परिचय भारतीय संगीत के एक ऐसे अध्येता से कराने जा रहे हैं, जिन्होने अथक परिश्रम कर अब तक लगभग 17000 फिल्मी गीतों में प्रयुक्त विविध रागों का अध्ययन और विश्लेषण किया है। भारतीय संगीत के इस पारखी का नाम कन्हैया लाल पाण्डेय (के.एल. पाण्डेय) है। 4 नवम्बर, 1954 को उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद में इनका जन्म हुआ था। हरदोई के ही तत्कालीन संगीत-गुरु पण्डित सुखदेव बहादुर सिंह और पण्डित विद्यासागर सिंह से संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1974 में लखनऊ विश्वविद्यालय से जीव रसायन विषय से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। 1978 में उन्होने रेल यातायात सेवा में पदभार ग्रहण किया। सिविल सेवा की तैयारियों और रेल सेवा में अधिकारी पद पर रहते हुए संगीत से नाता जुड़ा रहा। सेवाकाल के दौरान देश के विभिन्न स्थानों पर अनेक गुणी संगीतज्ञों से सम्पर्क हुआ और फिल्मी गीतों का संकलन और विश्लेषण का कार्य जारी रहा। वर्तमान में श्री पाण्डेय के पास लगभग 2000 फिल्मों और 2 लाख रिकार्डिंग का संकलन है। 1931 में बनी फिल्म “आलम आरा” से फिल्मों ने बोलना सीख लिया था। तब से लेकर 2017 तक की फिल्मों के लगभग 17000 गीतों में रागों का विश्लेषण पाण्डेय जी कर चुके हैं। विश्लेषित गीतों का वर्णक्रमानुसार तीन खण्डों में प्रकाशन भी हो चुका है। हिन्दी और अँग्रेजी, दोनो भाषाओं के इस विशाल संकलन का शीर्षक “हिन्दी सिने राग इन्साइक्लोपीडिया” रखा गया है। प्रथम खण्ड में ए से जी वर्ण से शुरू होने वाले गीतों को 560 पृष्ठों में शामिल किया गया है। इस खण्ड के मुखपृष्ठ का चित्र यहाँ दिया जा रहा है। अन्य खण्डों की जानकारी आगामी अंकों में दी जाएगी। विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए आप kanhayaabha@gmail.com अथवा  swargoshthi@gmail.com पर सन्देश भेज सकते हैं।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने बिलावल थाट के राग “हंसध्वनि” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर द्वारा प्रस्तु एक रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “परिवार” से लता मंगेशकर और मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत किया गया। संगीतकार सलिल चौधरी ने इस गीत को राग हंसध्वनि के स्वरों पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग हंसध्वनि : SWARGOSHTHI – 418 : RAG HANSADHWANI : 5 मई, 2019

Saturday, November 21, 2015

"दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा..." - जानिए पोलैण्ड के उस गीत के बारे में भी जिससे इस गीत की धुन प्रेरित है


एक गीत सौ कहानियाँ - 70
 

'दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 70-वीं कड़ी में आज जानिए 1958 की फ़िल्म ’मधुमति’ के गीत "दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सलिल चौधरी का।

मैं आजकल पोलैण्ड में हूँ। कार्यालय के काम से मुझे एक महीने के लिए यहाँ रहना पड़ेगा। नवंबर का मध्य होते ही यूरोप में जाड़ा ज़ोर पकड़ चुका है। 3 डिग्री तापमान, बादलों भरा आकाश, धूप का कहीं नामोनिशान नहीं, सूर्योदय सुबह 7:30 और सूर्यास्त शाम 4 बजे, चारों तरफ़ ठण्ड और धुंधलाहट के मद्देनज़र रविवार होने के बावजूद बाहर घूमने-फिरने का ख़ास मौका नहीं मिल रहा। ऐसे में होटल के कमरे में फ़्री वाई-फ़ाई के सहारे लैपटॉप पर दफ़्तर के काम के साथ-साथ यू-ट्यूब पर गाने सुनने या फ़िल्म देखने के अलावा और कोई काम नहीं। यकायक ख़याल आया कि पोलैण्ड आने की तैयारी की भागा-दौड़ी में अगले सप्ताह का ’एक गीत सौ कहानियाँ’ लिखना तो रह ही गया था। दिल मचल उठा यह सोच कर कि अगले एक घंटे का समय इसे लिखते हुए गुज़ार दूँगा। किस गीत के बारे में लिखूँ आज? कुछ सूझ नहीं रहा। बगल के कमरे से पोलैण्ड के किसी गीत के बोल और ताल कानों पर पड़ रही है। अचानक जैसे कोई बिजली सी कौंध गई। याद आया कि फ़िल्म ’मधुमति’ में एक गीत है जो एक पोलिश (पोलैण्ड की भाषा) गीत की धुन पर आधारित है। मन रोमांच से भर उठा। कभी सोचा न था कि पोलैण्ड जैसे देश में भी मेरे क़दम पड़ेंगे। यहँ रहते हुए यहाँ की लोक-धुन से प्रेरित हिन्दी फ़िल्मी गीत का शोध निस्संदेह एक आनन्ददायक अनुभूति होगी।


"दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा, तू हमसे आँख ना चुरा, तुझे क़सम है आ भी जा..." गीत के कम्पोज़िशन के लिए सलिल चौधरी ने पोलैण्ड के एक लोक धुन का सहारा लिया था। इस गीत के अलावा सलिल दा ने कई बार विदेशी लोक धुनों या विदेशी आधुनिक धुनों का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है। उदाहरण स्वरूप ’दो बिघा ज़मीन’ का "धरती कहे पुकार के..." गीत आधारित था लेव निपर द्वारा स्वरबद्ध 'Meadowlands' पर। ’तांगेवाली’ फ़िल्म का "हल्के हल्के चलो साँवरे..." गीत प्रेरित था ’The Wedding Samb” से। फ़िल्म ’छाया’ के "इतना ना मुझसे..." तो सर्वविदित है कि यह मोज़ार्ट के एक सिम्फ़नी से प्रेरित है। फ़िल्म ’माया’ का "ज़िन्दगी क्या है सुन मेरे यार..." चार्ली चैपलिन के 1951 की फ़िल्म ’Limelight' के थीम से प्रेरित था। ’मेमदीदी’ फ़िल्म का "बचपन बचपन..." आधारित था नर्सरी राइम 'A-Tisket, A-Tasket' से जबकि ’हाफ़ टिकट’ का "आँखों में तुम..." 1948 के चार्टबस्टर 'Buttons and Bows' से प्रेरित था। "दिल तड़प-तड़प के..." जिस मूल गीत के धुन पर आधारित है वह गीत है "Szla dzieweczka do gajeczka" जिसका उच्चारण है "shwah jeh-vehtch-ka duh lah-sech-kah"। मूल लोक गीत का रिदम धीमा है ("दिल तड़प-तड़प..." का रिदम इससे थोड़ा तेज़ है), जबकि इस पोलिश लोक गीत के आधुनिक संस्करण भी बने हैं जिनकी रिदम काफ़ी तेज़ है। "Szla dzieweczka do gajeczka" दरसल एक कहानी है जो गीत के माध्यम से कही गई है। यह कहानी है एक युवती की जो जंगल में जाती है फल तोड़ने के लिए। वहाँ उसकी मुलाक़ात एक नौजवान शिकारी से होती है जो जंगल में अपना रास्ता भटक गया है। नौजवान युवती से दो चीज़ें माँगता है - खाना और प्यार। युवती का जवाब है कि वह सारा खाना ख़ुद खा चुकी है और जहाँ तक प्यार का सवाल है तो हालाँकि नौजवान शिकारी बहुत ही ख़ूबसूरत है पर उसके मन में अभी तक उसका पहला प्यार हावी है जिसे वो भुला नहीं पा रही है। बस इतनी सी है इस गीत की कहानी। और हाँ "Szla dzieweczka" का शाब्दिक अर्थ है "चलती हुई लड़की"। 


"Szla dzieweczka" गीत पोलैण्ड के दक्षिण-पश्चिम प्रान्त सिलेसिआ (Silesia) में उत्पन्न हुआ था; यह प्रान्त शताब्दियों से जर्मनी के अधीन हुआ करता था जहाँ पोलिश लोग अल्पसंख्यक हुआ करते थे। यहाँ के लोकगीत और लोकनृत्य साधारण और सरल हुआ करते थे। इस गीत पर शोध करते हुए कार्तिक एस. का लिखा एक ब्लॉग मिला जहाँ इसके बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई गई है। कार्तिक लिखते हैं कि उनके पिता ने उन्हें यह जानकारी दी थी कि "दिल तड़प-तड़प के..." गीत की धुन से मिलती जुलती धुन उन्होंने एक वृत्तचित्र 'Music and dances of Silesia' में सुना है जो Polish World War II के पार्श्व पर बनी Andrez Wajda की क्लासिक फ़िल्म 'Kanal' के साथ जोड़ी गई है। कार्तिक को सुन्दर श्रीनिवासन के ब्लॉग से भी यह पता चला कि ’मधुमति’ का यह गीत किसी विदेशी गीत से प्रेरित है। फिर सुन्दर की सहायता से कार्तिक ने बैंगलोर में ’रेडियो सिटी’ की RJ शीतल अय्यर से सम्पर्क किया जिनके भाई का पोलिश मूल की लड़की से विवाह हुआ है। इस तरह से शीतल अय्यर के भाभी को जब ’मधुमति’ का गीत सुनवाया गया तो उन्होंने तुरन्त "Szla dzieweczka" की धुन को पहचान लिया।

कार्तिक ने इस गीत के बारे में अधिक जानकारी के लिए कई पोलिश म्युज़िक फ़ोरम्स में लिखा था, और कार्तिक को आश्चर्य-चकित करते हुए University of Southern California के Polish Music Center के निर्देशन मिस वान्डा विल्क (Wanda Wilk) ने जवाब देते हुए कई महत्वपूर्ण तथ्य इस गीत के दिए। मिस विल्क के ही शब्दों में - 


Ms. Wanda Wilk
"The song is a very popular folk-song that originated in the Silesian (South-Western) part of Poland i.e., from the regions of Slask Gorny (High Silesia), Cieszyn and Opole regions. The ethnographer Juliusz Roger identifies it as coming from Rybnik, which is near the Czech border. That is where the famous Polish jazz pianist, Adam Makowicz, and the famous Polish composer, Henryk Gorecki, come from. It has been very popular throughout Poland for many years, for various celebratory occasions like namesday, youth gatherings etc. It has been recorded by the professional Folk Song & Dance Ensemble, 'Slask' produced by Polskie Nagrania, by the Lira Ensemble of Chicago and by popular singers like Maryla Rodowicz and popular Polish dance bands.

As far as the pronunciation, it goes something like this...

Szla dzieweczka: shwah jeh-vehtch-ka
do laseczka: duh lah-sech-kah
do zielonego: duh zhyeh-loh-neh-go
nadeszla tam mysliweczka: nah-desh-wah tahm mih-shlee-vetch-kah
bardzo szwarnego: bahr-dzoh schwahr-neh-goh
O moj mily mysliweczku: Oh mooy mee-lyh mih-shlee-vetch-koo
dalabym ci chleba z maslem: dah-wah-bim chee hleh-bah z mahs-wem
alem juz zjadla: a-lehm yoosh zyad-wah" 

लीजिए, अब आप फिल्म 'मधुमती' का यही गीत मुकेश और लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनिए। इसके बाद आप मूल पोलिश लोकगीत भी सुन सकते हैं। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, August 16, 2015

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 232 : MORNING RAGA




स्वरगोष्ठी – 232 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती और उनकी सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।



भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- ‘रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’। यह बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं, पटियाला (कसूर) घराने की गायकी में सिद्ध पण्डित अजय चक्रवर्ती। इस प्रस्तुति में उनका साथ दे रही हैं, अजय जी की ही सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती।


राग बिलावल : रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’ : अजय चक्रवर्ती और कौशिकी चक्रवर्ती





आज का दूसारा प्रातःकालीन भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन-वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बांग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - जागते रहो : संगीत - सलिल चौधरी





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 232वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गायिका के स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 22 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर प्रस्तुत कजरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। तीसरी श्रृंखला के विजेताओं के प्राप्तांक हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Sunday, September 15, 2013

स्वरगोष्ठी – 137 में आज : ‘मन रे हरि के गुण गा...’


 
स्वरगोष्ठी – 137 में आज

रागों में भक्तिरस – 5

ध्रुवपद अंग में राग भैरव का रंग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे राग भैरव पर चर्चा करेंगे जो भक्तिरस की सृष्टि करने में सबसे उपयुक्त राग है। भारतीय संगीत के इस प्राचीनतम राग में आज हम आपको एक ध्रुवपद रचना सुनवाएँगे। साथ ही इस राग पर आधारित, 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से एक मधुर भक्तिगीत प्रस्तुत करेंगे। 


स श्रृंखला के पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान भारतीय संगीत की परम्परा वैदिक काल से जुड़ी है। उस काल के उपलब्ध प्रमाणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन संगीत का स्वरूप धर्म और आध्यात्म से प्रभावित था। वैदिक युग के बाद भारतीय संगीत का अगला पड़ाव पौराणिक युग में होता है। इस युग में जनसामान्य का झुकाव शास्त्रगत संगीत की अपेक्षा लोक-गीत और नृत्य की ओर अधिक हुआ। इस प्रवृत्ति को और अधिक स्पष्ट करते हुए हैलीन कॉफमैन ने ‘दी म्यूजिक ऑफ आर्य’ नामक पुस्तक में लिखा है कि पौराणिक युग में लोक-गीत और लोक-नृत्यों का सर्वाधिक विकास हुआ था। इन विधाओं में स्थानीय रुचियों का पूरा ध्यान रखा जाता था। इस युग में लिखे ‘हरिवंश पुराण’ में नृत्य और मार्कण्डेय पुराण, वायु पुराण तथा वृहद्धर्म पुराण में वाद्य संगीत का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य में उल्लेख है कि इस युग में वीणा का सर्वाधिक प्रचार हुआ। वीणा के विविध प्रकार- परिवादिनी, विपंची, बल्लकी, महती, नकुली, कच्छपी आदि लोकप्रिय थे।

आज हम आपसे राग भैरव की चर्चा करेंगे। प्राचीन ग्रन्थों में भैरव को प्रथम राग माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस राग का सृजन स्वयं भगवान शिव ने किया था। यह प्रातःकालीन राग है, अर्थात सूर्योदय के पश्चात इस के गायन-वादन की परम्परा है। आजकल अधिकतर संगीत सभाओं और गोष्ठियों का आयोजन आम तौर पर सायंकाल या रात्रि में किया जाता है। इस कारण राग भैरव सुनने का अवसर कम मिलता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के राग भैरव में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। कुछ विद्वानो के अनुसार प्राचीन काल में भैरव में शुद्ध निषाद (वर्तमान स्वरूप) के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता था। राग के अवरोह में वक्रगति का प्रयोग किया जाता है। राग भैरव में जोगिया की तरह शुद्ध मध्यम पर ठहराव नहीं दिया जाता। राग कलिंगड़ा इससे मिलता-जुलता राग है। आइए, अब हम आपको राग भैरव के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते है।

आज हम आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से राग भैरव पर आधारित एक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह कीर्तन शैली का भक्ति गीत है, जिसके संगीतकार सलिल चौधरी थे। राग भैरव को आधार बना कर सलिल चौधरी ने फिल्म ‘जागते रहो’ में भी एक आकर्षक गीत- ‘जागो मोहन प्यारे...’ तैयार किया था, जो आज भी लोकप्रिय है। यह गीत हम कई अवसरों पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ से प्रस्तुत कर चुके है। आज उन्हीं सुरीले संगीतकार का राग भैरव पर आधारित यह दूसरा गीत सुनिए। इस गीत में बंगाल के लोकप्रिय ताल वाद्य ‘खोल’ का प्रयोग कहरवा ताल में किया गया है। गीत में आपको एकाध स्थान पर राग जोगिया का स्पर्श भी परलक्षित होगा, किन्तु गीत का ढाँचा राग भैरव के स्वरों में है। इस गीत से जुड़े दो तथ्य भी उल्लेखनीय हैं। आगामी 28 सितम्बर को कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर का जन्मदिन है। भक्तिरस से पगे उनके इस गीत के माध्यम से हम उन्हें शुभकामनाएँ अर्पित करते हैं। इसके साथ ही फिल्म ‘मुसाफिर’ सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की प्रथम निर्देशित फिल्म थी। आगामी 30 सितम्बर को उनकी 91वीं जयन्ती है। इस गीत के माध्यम से हम उस महान फ़िल्मकार की स्मृतियों को नमन करते हैं। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।



राग भैरव : ‘मन रे हरि के गुण गा...’ : लता मंगेशकर : फिल्म मुसाफिर




वर्तमान में भारतीय संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, उनमें ध्रुपद अथवा ध्रुवपद शैली सबसे प्राचीन है। प्राचीन ग्रन्थों में प्रबन्ध गीत शैली का उल्लेख मिलता है। ध्रुवपद या ध्रुपद का जनक इसी प्रबन्ध गीत को माना जाता है। ध्रुवपद शैली की विशिष्ट पद रचना और गायन पद्यति का विकास ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के काल (1468-1516 ई.) में उन्हीं के प्रयासों से हुआ था। वे मध्ययुगीन पद शैली के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। राजा मानसिंह स्वयं एक संगीतज्ञ थे, इसलिए उनके द्वारा प्रवर्तित शैली में परम्परा की उपेक्षा नहीं की गई थी। उन्होने प्राचीन शास्त्र को ही आधार मान कर ध्रुवपद शैली का विकास किया था। आगे चल कर ध्रुवपद शैली चार भिन्न बानी (वाणी), गौरहार, डागर, खण्डहार और नौहार बानी के नाम से विकसित हुई। आज के अंक में हम आपके लिए डागरबानी के अन्तर्गत राग भैरव का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। डागर परिवार के सुविख्यात साधक उस्ताद सईदुद्दीन डागर के स्वरों में सुनिए, राग भैरव में निबद्ध ध्रुवपद। सूल ताल में पखावज संगति उद्धवराव आपेगाँवकर ने किया है। आप राग भैरव में यह ध्रुवपद सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग भैरव : ‘मध आली मध अन्त शिव आली...’ : उस्ताद सईदुद्दीन डागर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 137वीं संगीत पहेली में हम आपको एक भक्तिरस प्रधान खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – यह खयाल रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 139वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 135वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के स्वरों में प्रस्तुत एक स्तुतिगीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी कान्हड़ा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित जसराज। इस अंक के दोनों प्रश्नो के उत्तर एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, U.S.A से दिनेश कृष्णजोइस, हमारे नियमित प्रतिभागी जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपको राग भैरव की चर्चा करते हुए इस राग की दो रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक कम प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र
 

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