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Thursday, September 8, 2011

करलो जितना सितम कर सको तुम...शमशाद जी का गाया अंतिम फ़िल्मी गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 740/2011/180

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की अंतिम कड़ी लेकर हम हाज़िर हैं। आज शमशाद बेगम मुंबई के पवई में हीरानंदानी कॉम्प्लेक्स में अपनी बेटी उषा रात्रा और उषा की पति के साथ रहती हैं, मीडिया से दूर, अपने चाहने वालों से दूर। शमशाद जी अपने पति गणपत लाल बट्टो के १९५५ में मृत्यु के बाद से ही अपनी बेटी के साथ रहती हैं। अपने रूढ़ीवादी पिता को दिये वादे के मुताबिक उन्होंने पहले के तीन दशकों में किसी को अपनी तसवीर खींचने नहीं दी। रेकॉर्डिंग् स्टुडिओ भी वो बुर्खे में जाया करती थीं। भले ही उनके लाखों फ़ैन थे, लेकिन इंडस्ट्री के चंद लोगों को ही मालूम था कि वो दिखती कैसी हैं। कभी उन्होंने प्रेस या मीडिआ को इंटरव्यू नहीं दिया। बस उनकी आवाज़ और उनके गाये हुए गीत ही उनकी पहचान बनी रही। और हम भी यही समझते हैं कि यही सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। शमशाद जी नें अपना पहला स्टेज शो पचास साल की उम्र में पेश किया। अपना पहला फ़ोटो भी 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' को इसी दौरान खींचने दिया। अभी कुछ समय पहले मीडिआ में एक विवाद खड़ा हो गया था जब कई पत्र-पत्रिकाओं ने उनकी मृत्यु का ग़लत समाचार छाप दिया था। बाद में पता लगा कि वो शमशाद बेगम दरअसल अभिनेत्री सायरा बानू की माँ थीं। शमशाद जी को २००९ में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। आज शमशाद जी ९२ वर्ष की हो चुकी हैं। उनके स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करते हुए इस शृंखला का अंतिम गीत अब सुनने जा रहे हैं।

१९४१ में शमशाद जी का जो फ़िल्मी करीयर शुरु हुआ था (फ़िल्म 'ख़ज़ान्ची' से), वह आकर रुका था १९८१ में। ६० के दशक से ही उनके गाये गानें कम होने लगे थे, और ७० के दशक में तो ना के बराबर उन्हें सुनने को मिला। १९७० की फ़िल्म 'हीर रांझा' में शमशाद बेगम, नूरजहाँ और जगजीत कौर की आवाज़ों में "नाचे अंग वे" गीत सुनने को मिला था। उसके बाद शमशाद जी जैसे ख़ामोश हो गईं। लेकिन १९८१ की फ़िल्म 'गंगा मांग रही बलिदान' में गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन नें उन्हें गवाया। और यही अंतिम फ़िल्म थी जिसमें शमशाद जी नें अपनी आवाज़ दी थीं। आइए आज इस शृंखला का समापन इसी फ़िल्म के एक गीत से किया जाये, जिसे शमशाद जी नें मुबारक़ बेगम और चेतन के साथ मिलकर गाया है। बहुत ही अफ़सोस की बात है कि शमशाद बेगम नें उस वक़्त फ़िल्म-संगीत जगत से सन्यास लेने की सोची जब उनके मनपसंद संगीतकार नें उन्हें कोरस में गाने का निमंत्रण दिया। एक सुप्रतिष्ठित गायिका के लिए इससे बड़ा असम्मान दूसरा हो नहीं सकता था। इसलिए शमशाद जी फ़िल्मों से चली गईं। 'हिंद-युग्म - आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम शमशाद बेगम जी को स्वस्थ जीवन और दीर्घायु होने की शुभकामनाएँ देते हुए उन पर केन्द्रित यह शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' यहीं सम्पन्न करते हैं। इस शृंखला के बारे में आप अपनी राय टिप्पणी के अलावा oig@hindyugm.com पर भी भेज सकते हैं, नमस्कार!



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत पहचानिये इन सूत्रों के माध्यम से
१. आवाज़ है रफ़ी साहब की.
२. "ड्रीम गर्ल" पर फिल्मांकित है गीत.
३. कविता रुपी इस गीत में शुरू होने से पहले एक अन्य गायक के स्वर में दो पंक्तियाँ है जिसका आरंभ - "अंग-प्रत्यंग"

गीतकार बताएं - ३ अंक
संगीतकार कौन हैं - २ अंक
फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, September 7, 2011

भीगा भीगा प्यार का समां....भीगे भीगे मौसम में सुनिए ये युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 740/2011/180

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों जारी है सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे'। आज इस शृंखला की नवी कड़ी में प्रस्तुत है शमशाद जी का गाया एक युगल गीत। अब तक आपनें उनके गाये हुए एकल गीत सुनें, पर आज वो आवाज़ मिला रही हैं रफ़ी साहब के साथ। यूं तो तलत महमूद और मुकेश के साथ भी शमशाद जी गा चुकी हैं, पर किशोर कुमार के साथ उन्होंने बहुत से मज़ाइया गीत गाये हैं, और उनके सब से ज़्यादा युगल गीत रफ़ी साहब के साथ हैं। आज की कड़ी के लिए हमने जिस रफ़ी-शमशाद डुएट को चुना है, वह है साल १९६० की फ़िल्म 'सावन' का रिमझिम सावन बरसाता हुआ "भीगा भीगा प्यार का समा, बता दे तुझे जाना है कहाँ"। संगीतकार हैं हंसराज बहल। नय्यर साहब के संगीत की थोड़ी बहुत झलक मिलती है इस गीत में, शायद घोड़ा-गाड़ी रीदम की वजह से। और यह भी सच है कि नय्यर साहब से पहले पंकज मल्लिक और नौशाद साहब इस तरह के रीदम का प्रयोग अपने गीतों में कर चुके थे। क्योंकि नय्यर साहब नें इस रीदम पर सब से ज़्यादा गानें कम्पोज़ किये, इसलिये यह रीदम उनका ट्रेडमार्क बन गया था। बहरहाल फ़िल्म 'सावन' के इस सदाबहार युगल गीत को लिखा है गीतकार प्रेम धवन नें। गीत फ़िल्माया गया है भारत भूषण और अमीता पर।

और आइए अब एक बार फिर से मुड़ा जाये कमल शर्मा के लिए हुए उसी इंटरव्यू की तरफ़ जिसमें शमशाद जी बता रही हैं सहगल साहब, किशोर दा और रफ़ी साहब के बारे में।

कमल जी - सहगल साहब के साथ हुई मुलाक़ात के बारे में हमें कुछ बताइए।

शमशाद जी - उन्हें मैंने बम्बई में देखा था। एक दिन मैं 'रणजीत' में रिहर्सल कर रही थी। ख़बर आई कि सहगल साहब आ रहे हैं। मैंने उन लोगों से कह रखा था कि सहगल साहब की गाड़ी आये तो मुझे बताना। इतने में उनकी गाड़ी आ गई, उनकी उंगली में हीरे की अंगूठी थी। मैंने कहा, "सलाम"। किसी ने उन्हें मेरे बारे में बताया हुआ था, वो मेरे पास आये और पंजाबी में कहा कि ओए तूने अपने बारे में कुछ नहीं बताया, सिर्फ़ सलाम कह कर चली जा रही थी!

कमल जी - सहगल साहब के बाद, अब मैं किशोर दा के बारे में पूछना चाहता हूँ, ये बहुत बाद की बात होगी, उनके साथ भी आपने गाया है।

शमशाद जी - वो बहुत ही शरीफ़ आदमी थे (हँसते हुए)। वो अपनी स्टाइल का बड़ा अच्छा गायक थे, हमारे साथ उनका बहुत अच्छा रिलेशन था, उनके साथ कुछ डुएट्स मैंने गाये हैं। एक गाना बड़ा चला था 'नया अंदाज़' पिक्चर का, उन्होंने भी इतना अच्छा गाया था इसे, "मेरी नींदों में तुम"।

कमल जी - और किन किन गायकों के साथ आपकी जोड़ी बनी?

शमशाद जी - कोई जोड़ी-वोड़ी नहीं जी, उस ज़माने में म्युज़िक डिरेक्टर्स किसी की बात नहीं सुनते थे, वो जिस गायक को चुनेंगे, हमें उसी के साथ गाना पड़ेगा, किसी की मजाल है जो कोई ज़बरदस्ती करे!

कमल जी - अच्छा तो किस गायक के साथ आपको गाते हुए सबसे अच्छा लगा?

शमशाद जी - किसी के भी साथ बुरा नहीं लगा। मैंने हमेशा चाहा कि मैं जिसके साथ गा रही हूँ, वो भी अच्छा गाये। उसका अच्छा होगा तो मेरा भी अच्छा होगा।

कमल जी - शमशाद जी, एक आर्टिस्ट, रफ़ी साहब, उनके बारे में लोग ज़रूर आप के मुंह से जानना चाहेंगे, आपको कैसा लगा उनके साथ काम करके?

शमशाद जी - बहुत शरीफ़ आदमी, नेक आदमी थे. उनका वैसा मिज़ाज नहीं था कि मेरा नाम है इतना, गाने-बजाने वाले लोग ज़्यादा बद-मिज़ाज होते ही नहीं हैं।

तो आइए दोस्तों, इस भीगे भीगे गीत का मज़ा लेते हुए अनुभव करें कि बारिश में भीगते हुए किसी तांगे पे बैठ कर हम सफ़र कर रहे हैं अपने प्रिय साथी के साथ।



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



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Tuesday, September 6, 2011

कहाँ चले हो जी प्यार में दीवाना करके...अपनी आवाज़ से दीवाना करती शमशाद बेगम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 739/2011/179

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! शमशाद बेगम के गाये गीतों पर केन्द्रित इस लघु शृंखला में आइए आज एक बार फिर से रुख़ करते हैं कमल शर्मा द्वारा ली गई साक्षात्कार की तरफ़ और पढ़ा जाये उसी साक्षात्कार से कुछ और अंश।

कमल जी - मुंबई में आने के बाद यहाँ आपकी पहली फ़िल्म कौन सी थी?

शमशाद जी - पहली फ़िल्म महबूब साहब का किया, 'तक़दीर', वो लाहौर गये थे। 'तक़दीर' पिक्चर के लिए मुझे बूक किया था। वहाँ उनकी हीरोइन थी, उनका ससुराल भी वहीं था। वो तो नहीं आईं, महबूब साहब मेरे घर आए और कहा कि तुम मेरे साथ चलो। मेरे बाबा आने नहीं देते थे। वो कहते थे इधर ही ठीक है, तुम क्या इतनी दूर बम्बई जाओगी? दो दो साल शक्ल देखने को नहीं मिलेंगे। महबूब साहब नें कहा कि अरे समुंदर में जाने दो उसको। उन्होंने बाबा से कहा कि मिया, आप ग़लत समझ रहे हैं, इसको जाने दीजिए। अब इसका नाम इतना है कि जाने दो इसे, आप नें सोचा भी नहीं होगा कितनी बड़ी इंडस्ट्री है। उनके कहने पर बाबा नें कहा कि अच्छा जाने देते हैं। फिर 'तक़दीर' पिक्चर बनाकर हम वापस (लाहौर) चले गये। 'तक़दीर' में संगीत था रफ़ीक़ ग़ज़नवी का। रफ़ीक़ बहुत अच्छा गाते थे।

कमल जी - लेकिन 'तक़दीर' नें तय कर दिया कि आपकी तक़दीर मुंबई में ही लिखी है।

शमशाद जी - बम्बई में, यहाँ से चली गई थी मैं, फिर मुझे पूना से बुलाया। एक पिक्चर थी 'नवयुग चित्रपट' की - 'पन्ना'। इसके सारे गानें सुपरहिट हुए। और फ़िल्म सिल्वर जुबिली से भी ज़्यादा टाइम चली थी। फिर वहाँ से बम्बई आ गए। बम्बई आने के बाद, यहाँ सब लोग कहने लगे यह करो वह करो। सब करते करते दो महीने लग गए। फिर आहिस्ता आहिस्ता मैं इधर ही रहने लगी। अभी मकान लिया नहीं था, होटल में रहते थे कई कई। जब हम इधर आकर सेटल हो गए, तब मकान लिया। माहिम में रहते थे।

कमल जी - और पहली गाड़ी आपनें कब ख़रीदी?

शमशाद जी - पहली गाड़ी तो आते ही साल ख़रीदी थी, नहीं तो कैसे आते जाते? नई गाड़ी तो मिलती नहीं थी, तो हमने सेकण्ड हैण्ड ली। नई गाड़ी तो आती नहीं थी। बुकिंग करवानी पड़ती थी या फिर बाहर से आती थी। और कितने कितने साल लग जाते थे, बुकिंग में। फिर '४७ में नई गाड़ी ली, शेवरोले।

कमल जी - मुंबई में सब से ज़्यादा रेकॉर्डिंग् आपकी कहाँ होती थी? यूं तो आज बहुत सारे रेकॉर्डिंग् स्टुडिओज़ हैं, पर उस समय तो गिने-चुने स्टुडिओज़ ही थे। तो सबसे ज़्यादा रेकॉर्डिंग् आपकी कहाँ हुई?

शमशाद जी - आपनें देखा होगा जहाँ पे रणजीत स्टुडिओ हैं न, वहाँ पे गली में जाकर एक बहुत बड़ा स्टुडिओ था - 'सिने साउण्ड'। वहाँ पर बहुत सारे गानें रेकॉर्ड होते थे, क्योंकि वहाँ पे शर्मा का बहुत नाम था ऐज़ रेकॉर्डिस्ट।

कमल जी - अच्छा सब से ज़्यादा रिहर्सल आपने किस गाने के लिये किया था?

शमशाद जी - यह तो भ‍इया मुझे कुछ नहीं याद! मैंने कितने ही गाने गाये हैं।

कमल जी - ऐसा गाना कि एक दिन हो गया, दो दिन भी हो गए?

शमशाद जी - यह तो रोज़ की बात थी। वो एक एक गाने को चार चार छह छह दिन गवाते थे; नौशाद साहब मानेंगे नहीं, आँखें बंद करके बैठ जाते थे। उनकी कितनी ही पिक्चरें हैं जो सिल्वर जुबिली, गोल्डन जुबिली मनायी।

दोस्तों, आज हम शमशाद जी के गाये जिस गीत को लेकर आये हैं, वह है १९५७ की ही फ़िल्म 'मोहिनी' का "कहाँ चले हो जी प्यार में दीवाना करके, मैं तो नीम तले आ गई बहाना करके"। फ़िल्म के संगीतकार थे नारायण दत्ता, जिन्हें हम एन. दत्ता के नाम से ज़्यादा जानते हैं। १९५७ में दत्ता जी नें 'हम पंछी एक डाल के', 'हमारा राज', 'मिस्टर एक्स' और 'मोहिनी' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। 'मोहिनी' में आज के प्रस्तुत गीत के अलावा शमशाद बेगम नें एक और एकल गीत गाया था जिसके बोल हैं "मेरे दिल का सजनवा इलाज"। इस साल शमशाद नें जिन फ़िल्मों में गीत गाये, उसकी फ़ेहरिस्त इस प्रकार है - मदर इण्डिया, मोहिनी, अमर सिंह राठोड़, भक्त ध्रुव, चंडी पूजा, चंगेज़ ख़ान, छोटी बहू, गरमा-गरम, हम पंछी एक डाल के, जहाज़ी लुटेरा, जय अम्बे, कितना बदल गया इंसान, लाल बत्ती, लक्ष्मी पूजा, मायानगरी, मेरा सलाम, मिर्ज़ा साहिबा, मिस बॉम्बे, मिस इण्डिया, मुसाफ़िर, नाग लोक, नया दौर, पाक दमन, पैसा, परिस्तान, पवन पुत्र हनुमान, क़ैदी, राम-लक्ष्मण, सती परीक्षा, शाही बज़ार, शारदा, शेर-ए-बग़दाद, श्याम की जोगन, ताजपोशी, यहूदी की लड़की। इस फ़ेहरिस्त को देख कर आप समझ चुके होंगे कि उस साल शमशाद जी कितनी व्यस्त गायिका रही होंगी। तो आइए आज का गीत सुना जाये, फ़िल्म 'मोहिनी' के इस गीत को लिखा है गीतकार राजा मेहंदी अली ख़ान नें।



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

अमित जी, कुछ दिन यूहीं चलने दीजिए, फिर पहेली में कोई नयेपन लेकर हाज़िर होंगें हम

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



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Monday, September 5, 2011

पी के घर आज प्यारी दुल्हन....एक विदाई गीत शमशाद के स्वरों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 738/2011/178



पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की सातवीं कड़ी में आप सब का स्वागत है। नय्यर साहब के दो गीत सुनने के बाद आज एक बार फिर बारी नौशाद साहब की। १९५७ में नौशाद साहब की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म रही 'मदर इण्डिया'। इस फ़िल्म में शमशाद बेगम के गाये दो एकल गीतों नें फ़िल्म के अन्य गीतों के साथ साथ ख़ूब धूम मचाई। इनमें से एक तो है मशहूर होली गीत "होली आयी रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी", जिसे हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पिछले साल सुनवाया था, और इस साल भी होली के अवसर पर शकील बदायूनी के बेटे जावेद बदायूनी से की गई बातचीत पर केन्द्रित 'शनिवार विशेष' में सुनवाया था। शमशाद जी का गाया 'मदर इण्डिया' का दूसरा गीत था विदाई गीत "पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली, रोये माता पिता उनकी दुनिया चली"। बड़ा ही दिल को छू लेने वाला विदाई गीत है यह। शमशाद बेगम के गाये मस्ती भरे गीतों को हमने ज़्यादा सुना है। लेकिन कुछ गीत उनके ऐसे भी हैं जो सीरियस क़िस्म के हैं। १९४८ में नौशाद साहब नें शमशाद बेगम से गवाया था "धरती को आकाश पुकारे"। और इसके १० साल बाद नौशाद साहब नें ही उनसे 'मदर इण्डिया' में "पी के घर" गवाया। दृश्य में राज कुमार और नरगिस का विवाह होता है, और उसके बाद विदाई होती है और पाश्व में शमशाद बेगम और सखियों की आवाज़ें गूंज उठती है। दीपचंदी ताल पर आधारित यह गीत शमशाद बेगम के करीयर का एक उल्लेखनीय गीत है। दीपचंदी ताल पर बहुत से गीत बने हैं, जिनमें राग पहाड़ी का मुख्य रूप से प्रयोग किया जाता है।



आज जब नरगिस और शमशाद बेगम का एक साथ ज़िक्र चल पड़ा है, तो क्यों न आज इस अभिनेत्री-गायिका जोड़ी के बारे में थोड़ी चर्चा की जाये! महबूब ख़ान नें जब अपनी फ़िल्म 'तक़दीर' प्लैन की तो वो एक नए चेहरे की तलाश कर रहे थे। और १४ साल की नरगिस को मोतीलाल के ऑपोज़िट चुन लिया। और उनकी पार्श्वगायन के लिए चुना गया शमशाद बेगम को। फ़िल्म के सभी गीत कामयाब रहे और शमशाद जी बन गईं नरगिस जी की आवाज़। 'तक़दीर' की सफलता के बाद शमशाद-नरगिस जोड़ी वापस आईं दो साल बाद, यानी १९४५ में महबूब साहब की ही फ़िल्म 'हुमायूं' में। इस फ़िल्म में शमशाद जी से गीत गवाये गये लेकिन ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर राजकुमारी की आवाज़ थी। इस फ़िल्म का "नैना भर आये नीर" गीत को बहुत सफलता मिली थी। १९४७ में नरगिस अभिनीत फ़िल्म 'मेहंदी' में शमशाद जी नें गाया "ओ दूर जाने वाले आती है याद आजा"। १९४८ में नरगिस-शमशाद की जोड़ी नें दो सुपरहिट फ़िल्मों में काम किया - 'आग' और 'मेला'। 'आग' फ़िल्म का "काहे कोयल शोर मचाये" आप इसी शृंखला में सुन चुके हैं। 'नरगिस आर्ट कन्सर्ण' की फ़िल्म 'अंजुमन' में भी शमशाद जी से गीत गवाये गये। इस फ़िल्म के सात शमशाद नंबर्स में पाँच एकल थे और दो युगल। १९४९ की फ़िल्म 'अंदाज़' में लता जी नें नरगिस का प्लेबैक किया, जब कि शमशाद जी की आवाज़ ली गई कुक्कू के लिए। यह वह समय था जब लता मंगेशकर पहली पहली बार के लिए उस समय की प्रचलित गायिकाओं के सामने कड़ी चुनौती रख दी। १९५० में 'बाबुल' फ़िल्म में एक बार फिर शमशाद जी की आवाज़ सजी नरहिस के होठों पर, हालांकि फ़िल्म के सभी शमशाद नंबर्स गीत नरगिस पर नहीं फ़िल्माये गये थे। इस फ़िल्म में शमशाद जी मुख्य गायिका थीं और लता जी दूसरी गायिका। लेकिन बहुत जल्द ही लता जी मुख्य गायिका के रूप में स्थापित हो गईं। फ़ीमेल डुएट्स में पहले पहले शमशाद बेगम नायिका की आवाज़ बनतीं और लता जी नायिका की सहेली या बहन की; पर ५० के दशक में लता जी बन गईं नायिका की आवाज़ और शमशाद जी की आवाज़ पर "दूसरी लड़की" नें होंठ हिलाये। आइए अब सुना जाये आज का गीत फ़िल्म 'मदर इण्डिया' से। शक़ील साहब के बोल और नौशाद साहब का संगीत।







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पहेली में अमित जी के आलावा कोई उत्साह के साथ रूचि नहीं ले रहा. हमें लगता है कि आने वाले गीत का अंदाजा लगाने के बजाय अब से हम प्रस्तुत गीत पर चर्चा करें...आपका क्या विचार है



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






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Sunday, September 4, 2011

रात रंगीली गाये रे....एक अलग भाव का गीत शमशाद का गाया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 736/2011/176



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक और नई सप्ताह में आप सभी का मैं, सुजॉय चटर्जी, स्वागत करता हूँ। इन दिनों इस स्तंभ में जारी है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम के गाये गीतों से सुसज्जित लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे'। पाँच गीत आपनें सुनें, पाँच गीत अभी और सुनने वाले हैं। पिछले हफ़्ते यह शृंखला आकर रुकी थी नय्यर साहब की धुन पर फ़िल्म 'सी.आइ.डी' के गीत पर। नय्यर साहब के साथ शमशाद जी की पारी इतनी सफल रही है कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए आज के अंक में भी है धूम नय्यर-शमशाद के जोड़ी की। 'दास्तान-ए-नय्यर' सीरीज़ में जब नय्यर सहाब से शमशाद बेगम के बारे में ये पूछा गया था -



कमल शर्मा: शमशाद जी से आप किस तरह से मिले?



ओ.पी. नय्यर: शमशाद जी को क्योंकि मैं लाहौर से ही जानता हूँ, रेडियो से। वो मेरे से ४-५ साल बड़ी हैं, तो बच्चा था मैं उनके आगे, और मैं उनको बहुत पहले से, पेशावर में, पश्तो गाने गाया करती थीं। फिर रेडियो लाहौर में आ गईं। बड़ी ख़ुलूस, बहुत प्यार करने वाली ईमोशनल औरत है।



कमल शर्मा: क्या खनकती आवाज़ है!



ओ.पी. नय्यर: टेम्पल वॉयस साहब, उनका नाम ही टेम्पल वॉयस है।



यूनुस ख़ान: नय्यर साहब, आपके कई गानें शमशाद बेगम नें गाये हैं, और आपने कहा है कि शमशाद बेगम आपको ख़ास हिंदुस्तानी धरती से जुड़ा स्वर लगता है।



ओ.पी. नय्यर: टेम्पल वॉयस, उसकी आवाज़ का नाम है टेम्पल बेल; जब मंदिर में घंटियाँ बजती हैं, गिर्जा में घंटे बजते हैं, इस तरह की खनक है उनकी आवाज़ में, जो किसी फ़ीमेल आर्टिस्ट में नहीं है और न कभी होगी।



यूनुस ख़ान: और वो आपके कम्पोज़ किए हुए और शमशाद बेगम के गाये हुए जो जो आपके गीत हैं, उनके बारे में हमको बताइए कि शमशाद बेगम की क्या रेंज थी और...



ओ.पी. नय्यर: ख़ूब रेंज थी उनकी, कोई रेंज कम नहीं थी। ऑरिजिनल वॉयसेस जो हैं, वो शमशाद और गीता ही हैं। आशा की कई क़िस्म की आवाज़ें आपको आज भी मिलेंगी, लता जी की आवाज़ें आपको आज भी मिलेंगी, लेकिन गीता और शमशाद की आवाज़ कहीं नहीं मिलेगी। यह हक़ीक़त है। देखिये पहले तो मैं गीता जी, शमशाद जी, इनसे काफ़ी मैं गानें लेता रहा, और बाद में आशाबाई आ गईं हमारी ज़िंदगी में, तो वो हमसे भी मोहब्बत करने लगीं और हमारे संगीत से भी।



और इस तरह से दोस्तों, आशा भोसले के आ जाने के बाद गीता दत्त और शमशाद बेगम, दोनों के लिये नय्यर साहब नें अपने दरवाज़े बंद कर दिए। लेकिन तब तक ये दोनों गायिकायें उनके लिए इतने गानें गा चुकी थी कि जिनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है। उसी लम्बी फ़ेहरिस्त से आज प्रस्तुत है १९५६ की फ़िल्म 'नया अंदाज़' से "रात रंगीली गाये रे, मोसे रहा न जाये रे, मैं क्या करूँ"। मीना कुमारी पर फ़िल्माया हुआ गीत है। इस फ़िल्म का शमशाद जी और किशोर दा के युगल स्वरों में "मेरी नींदों में तुम" गीत आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पहले सुन चुके हैं। जाँनिसार अख़्तर साहब का लिखा हुआ गीत है, और खनकती आवाज़ शमशाद बेगम की। मीना कुमारी, जो बाद में ट्रैजेडी क्वीन के रूप में जानी गईं, इस फ़िल्म में उनका किरदार एक सामान्य लड़की की थी। इस गीत के फ़िल्मांकन में मीना कुमारी अपने कमरे में, आंगन में गाती हुई दिखाई देती हैं। रात में नायिका अपने दिल का हाल बयाँ करती शीर्षक पर बहुत सारे गीत बने हैं समय समय पर, यह गीत भी उन्हीं में से एक है। यह बताते हुए कि किशोर कुमार और मीना कुमारे के अलावा 'नया अंदाज़' में जॉनी वाकर, प्राण, कुमकुम, जयंत और टुनटुन नें भी मुख्य भूमिकाएँ निभाई थी, आइए आपको सुनवाते हैं "रात रंगीली गाये रे"।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. ये एक विदाई गीत है.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. मुखड़े में शब्द है - प्यारी"



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक

फिल्म की नायिका कौन है - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, September 1, 2011

कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...शोखियों में डूबा एक नशीला गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 735/2011/175



'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ इन दिनों गूंज रही है उन्हीं को समर्पित लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' में। आज हम जिस संगीतकार की रचना सुनवाने जा रहे हैं, उन्होंने भी शमशाद बेगम को एक से एक लाजवाब गीत दिए, और उनकी आवाज़ को 'टेम्पल बेल वॉयस' की उपाधि देने वाले ये संगीतकार थे ओ. पी. नय्यर। नय्यर साहब के अनुसार दो गायिकाएँ जिनकी आवाज़ ऑरिजिनल आवाज़ें हैं, वे हैं गीता दत्त और शमशाद बेगम। दोस्तों, विविध भारती पर नय्यर साहब की एक लम्बी साक्षात्कार प्रसारित हुआ था 'दास्तान-ए-नय्यर' शीर्षक से। उस साक्षात्कार में कई कई बार शमशाद जी का ज़िक्र छिड़ा था। आज और अगली कड़ी में हम उसी साक्षात्कार के चुने हुए अंशों को पेश करेंगे जिनमें नय्यर साहब शमशाद जी के बारे में बताते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वो अपना पहला पॉपुलर गीत "प्रीतम आन मिलो" को मानते हैं, तो नय्यर साहब का जवाब था, ""कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र", 'आर-पार' का पहला सुपरहिट गाना शमशाद जी का"। शमशाद बेगम के गाये गीतों में नय्यर साहब डबल बेस का ख़ूब इस्तमाल किया करते थे, इस बारे में भी जानिये उन्हीं से - "मैं जब जैसे चाहता था, एक दिन मुझे एक रेकॉर्डिस्ट नें कम्प्लिमेण्ट दिया कि नय्यर साहब, आप रेकॉर्डिंग् करवाना जानते हो, बाकी किसी को पता नहीं! ये आपने सुना "ज़रा हट के ज़रा बच के, ये है बॉम्बे मेरी जान", और उसमें, शमशाद जी के गानों में "लेके पहला पहला प्यार", "कभी आर कभी पार", "बूझ मेरा क्या नाव रे", ये डबल बेस का खेल है सब!"



नय्यर साहब के इंटरव्यूज़ में एक कॉमन सवाल जो होता था, वह था लता से न गवाने का कारण। 'दास्तान-ए-नय्यर' में जब यह बात चली कि मदन मोहन के कम्पोज़िशन्स को कामयाब बनाने के लिये लता जी का बहुत बड़ा हाथ है, उस पर नय्यर साहब नें कहा, "लता मंगेशकर का बहुत बड़ा हाथ था, और हम हैं वो कम्पोज़र जिन्होंने लता मंगेशकर की आवाज़ पसंद ही नहीं की। वो गायिका नंबर एक हैं, पसंद क्यों नहीं की, क्योंकि हमारे संगीत को सूट नहीं करती। 'थिन थ्रेड लाइक वॉयस' हैं वो। मुझे चाहिये थी सेन्सुअस, फ़ुल ऑफ़ ब्रेथ, जैसे गीता दत्त, जैसे शमशाद बेगम। टेम्पल बेल्स की तरह वॉयस है उसकी। शमशाद जी की आवाज़ इतनी ऑरिजिनल है कि बस कमाल है।" तो आइए दोस्तों, नय्यर साहब और शमशाद जी के सुरीले संगम से उत्पन्न तमाम गीतों में से आज हम एक सुनते हैं। फ़िल्म 'सी.आइ.डी' का यह गीत है "कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना"। मजरूह सुल्तानपुरी के बोल हैं, और आपको बता दें कि इस गीत की धुन पर अनु मलिक नें 'मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी' फ़िल्म का अल्का याज्ञ्निक का गाया "दिल का दरवाज़ा खुल्ला है राजा, आठ रोज़ की तू छुट्टी लेके आजा" गीत तैयार किया था। "कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना", इस जुमले का इस्तमाल आज भी लोग करते हैं अपने दोस्तों यारों को चिढ़ाने के लिए, किसी की खिंचाई करने के लिए, हास्य-व्यंग के लिए। आइए सुना जाये वहीदा रहमान पर फ़िल्माया १९५६ की 'सी.आइ.डी' फ़िल्म का यह सदाबहार नग़मा।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. मीना कुमारी पर है ये गीत.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. मुखड़े में "रात" का जिक्र है



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

सही कहा आपने इंदु जी लगता है सबने अमित के आगे हाथ खड़े कर दिए हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, August 31, 2011

शरमाये काहे, घबराये काहे, सुन मेरे राजा...नशीली अंदाज़ और चुलबुलापन शमशाद की आवाज़ का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 734/2011/174



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! आज 'ईद-उल-फितर' का पाक़ मौका है। इस मौक़े पर मैं, अपनी तरफ़ से, और पूरे 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से आप सभी को दिली मुबारक़बाद देता हूँ। यह त्योहार आप सब के जीवन में ढेरों ख़ुशियाँ लेकर आएँ, यही परवर दिगारे आलम से दरख्वास्त है। एक तरफ़ ईद की ख़ुशियाँ हों, और दूसरी तरफ़ हो शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ का जादू, तो फिर जैसे सोने पे सुहागा वाली बात है, क्यों है न? तो चलिए 'बूझ मेरा क्या नाव रे' शृंखला की चौथी कड़ी शुरु की जाए। दोस्तों, आजकल फ़िल्मों में आइटम नंबर का बड़ा चलन हो गया है। शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म बनती है जिसमें इस तरह का गीत न हो। लेकिन यह परम्परा आज की नहीं है, बल्कि पचास के दशक से ही चली आ रही है। आज जिस तरह से कुछ निर्दिष्ट गायिकाओं से आइटम सॉंग गवाये जाते हैं, उस ज़माने में भी वही हाल था। और उन दिनों इस जौनर में शीर्ष स्थान शमशाद बेग़म का था। बहुत सी फ़िल्में ऐसी बनीं, जिनमें मुख्य नायिका का पार्श्वगायन किसी और गायिका नें किया, जबकि शमशाद बेगम से कोई ख़ास आइटम गीत गवाया गया। आज की कड़ी में आप सुनेंगे दादा सचिन देव बर्मन की धुन पर शमशाद जी की मज़ाहिया आवाज़-ओ-अंदाज़। मुझे तो ऐसा अनुभव होता है कि उस ज़माने में किशोर कुमार जिस तरह की कॉमेडी अपने गीतों में करते थे, गायिकाओं में, और इस शैली में उन्हें टक्कर देने के लिए केवल एक ही नाम था, और वह था शमशाद बेगम का। १९५१ में 'नवकेतन' की फ़िल्म आई थी 'बाज़ी', जिसमें मुख्य गायिका के रूप में गीता रॉय नें अपनी आवाज़ दीं और एक से एक लाजवाब गीत फ़िल्म को मिले, जिनमें शामिल हैं "सुनो गजर क्या गाये", "तदबीर से निगड़ी हुई तक़दीर बना ले", "देख के अकेली मोहे बरखा सताये", "ये कौन आया", "आज की रात पिया दिल ना तोड़ो"। इन कामयाब और चर्चित गीतों के साथ साथ इस फ़िल्म में एक गीत शमशाद बेगम का भी था, जिसनें भी ख़ूब मकबूलीयत हासिल की उस ज़माने में। "शरमाये काहे, घबराये काहे, सुन मेरे राजा, ओ राजा, आजा आजा आजा", इस गीत में उन्होंने न केवल अपनी गायकी का लोहा मनवाया, बल्कि अजीब-ओ-ग़रीब हरकतों से, तरह तरह की आवाज़ें निकालकर कॉमेडी का वह नमूना पेश किया जो उससे पहले किसी गायिका नें शायद ही की होगी। और इसी वजह से आज की कड़ी के लिए हमने इस गीत को चुना है। साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ यह गीत है।



दोस्तों, आज के प्रस्तुत गीत में शमशाद जी भले ही हमसे ना घबराने और ना शरमाने की सीख दे रही हैं, लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि वो ख़ुद मीडिया से दूर भागती रहीं, पब्लिक फ़ंक्शन्स में वो नहीं जातीं, और यहाँ तक कि अपना पहला स्टेज शो भी पचास वर्ष की आयु होने के बाद ही उन्होंने दिया था। शमशाद जी तो सामने नहीं आतीं, लेकिन उनके गाये गीतों के रीमिक्स आज भी बाज़ार में छाये हैं। कैसा लगता है उनको? "मुझे रीमिक्स से कोई शिकायत नहीं है। आज शोर शराबे का ज़माना है, रीदम का ज़माना है, बच्चे लोग ऐसे गाने सुन कर ख़ुश होते हैं, झूमते हैं। मुझे भी अच्छा लगता है, पर कोई इन गीतों में हमारा नाम भी तो लें! लोग जब तक मुझे याद करते हैं, जब तक मेरे गाने बजाये जाते हैं, मैं ज़िंदा हूँ।" शमशाद जी के गाये गीत हमेशा ज़िंदा रहेंगे इसमें कोई शक़ नहीं है। तीन दशकों तक उन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में राज किया है और उनकी आवाज़ की खासियत ही यह है कि उनकी आवाज़ की ख़ुद की अलग पहचान है, खनक है, जो किसी अन्य गायिका से नहीं मिलती, और इसलिए उनकी प्रतियोगिता भी अपने आप से ही रही है। शमशाद जी के गाये ज़्यदातर गानें चर्चित हुए। मास्टर ग़ुलाम हैदर, नौशाद, ओ.पी. नैयर, सी. रामचन्द्र जैसे संगीतकारों नें उनकी आवाज़ को नई दिशा दी, और साज़ और आवाज़ के इस सुरीले संगम से उत्पन्न हुआ एक से एक कामयाब, सदाबहार गीत। आइए आज का सदाबहार गीत सुना जाये, लेकिन संगीतकार हैं दादा बर्मन।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. इस गीत के संगीतकार वो हैं जिन्होंने शमशाद की आवाज़ को "टेम्पल बेल" का नाम दिया था.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है - "इरादे"



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

गीत किस अभिनेत्री पर है फिल्माया गया - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

क्षिति जी बहुत दिनों में दिखी कल, सही जवाब के साथ, अमित जी और इंदु जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, August 30, 2011

ना बोल पी पी मोरे अंगना, ओ पंछी जा रे जा...एक अंदाज़ ये भी शमशाद का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 733/2011/173



मशाद बेगम के गाये गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की आज है तीसरी कड़ी। कुछ वर्ष पहले वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के नेतृत्व में विविध भारती की टीम पहुँची थी शमशाद जी के पवई के घर में, और उनसे लम्बी बातचीत की थी। उसी बातचीत का पहला अंश कल हमनें पेश किया था, आइए आज उसी जगह से बातचीत के कुछ और अंश पढ़ें।



शमशाद जी: मैंने मास्टरजी (ग़ुलाम हैदर) से फिर कहा कि दूसरा गाना गाऊँ? उन्होंने कहा कि नहीं, इतना ठीक है। फिर १२ गानों का ऐग्रीमेण्ट हो गया, हर गाने के लिए १२ रुपये। मास्टरजी नें उन लोगों से कहा कि इस लड़की को वो सब फ़ैसिलिटीज़ दो जो सब बड़े आर्टिस्टों को देते हो। उस ज़माने में ६ महीनों का कॉनट्रैक्ट हुआ करता था, ६ महीने बाद फिर रेकॉर्डिंग् वाले आ जाते थे। सुबह १० से शाम ५ बजे तक हम रिहर्सल किया करते म्युज़िशियन्स के साथ, मास्टरजी भी रहते थे। आप हैरान होंगे कि उन्हीं के गाने गा गा कर मैं आर्टिस्ट बनी हूँ।



कमल जी: आप में भी लगन रही होगी?



शमशाद जी - मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब कहा करते थे कि इस लड़की में गट्स है, आवाज़ भी प्यारी है। शुरु में हर गीत के लिए १२ रूपए देते थे। पूरा सेशन ख़त्म होने पर मुझे ५००० रूपए मिले। जब रब मेहरबान तो सब मेहरबान! (यहाँ शमशाद जी भावुक हो जाती हैं और रो पड़ती हैं) जब रेज़ल्ट निकलता है तो फिर क्या कहने!



कमल जी: आप फिर रेडियो से भी जुड़ गईं, इस बारे में कुछ बतायें।



शमशाद जी: जब मैंने गाना शुरु किया था तब रेडियो नहीं था, सिर्फ़ ग्रामोफ़ोन कंपनीज़ थीं, और बहुत महंगा भी था, १०० रूपए कीमत थी ग्रामोफ़ोन की और हर रेकॉर्ड की कीमत होती थी २.५० रुपये। दो साल बाद जब हम तैयार हो गए, तब रब ने रेडियो खोल दिया और मैं पेशावर रेडियो में शामिल हो गई।



कमल जी: रेडियो में किसी प्रोड्युसर को आप जानती थीं, आपको मौका कैसे मिला?



शमशाद जी: उस वक़्त प्रोड्युसर नहीं, स्टेशन डिरेक्टर होते थे, उनके लिए गाने वाले कहाँ से आयेंगे? वो ग्रामोफ़ोन कंपनी वालों से पूछते थे गायकों के बारे में। जिएनोफ़ोन कंपनी से भी उन्होंने पूछा और इस तरह से मेरा नाम उन्हें मिल गया। मैंने पेशावर रेडियो से शुरुआत की, पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी प्रोग्राम करने लगी। फिर लाहौर और दिल्ली रेडियो से भी जुड़ी।



और दोस्तों, जुड़े हुए तो हम हैं पिछले ६ दशकों से शमशाद बेगम के गाये हुए गीतों के साथ। उनकी आवाज़ में जो आकर्षण है, रौनक है, जो चंचलता है, जो शोख़ी है, उसके जादू से कोई भी नहीं बच सकता। तीन दशकों में उनकी खनकती आवाज़ नें सुनने वालों पर जो असर किया था, वह असर आज भी बरकरार है। आइए आज की कड़ी में भी एक और असरदार गीत सुनते हैं १९४९ की फ़िल्म 'दुलारी' से। ग़ुलाम हैदर और राम गांगुली के बाद, आज बारी संगीतकार नौशाद साहब की। जैसा कि पहली कड़ी में हमनें ज़िक्र किया था कि नौशाद साहब के मुताबिक़ शमशाद जी की आवाज़ में पंजाब के पाँच दरियाओं की रवानी है। आइए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को सुनते हुए नौशाद साहब के इसी बात को महसूस करने की कोशिश करते हैं। नौशाद साहब को याद करते हुए शमशाद जी नें अपनी 'जयमाला' में कहा था, "संगीतकार नौशाद साहब के साथ मैंने कुछ १६-१७ फ़िल्मों में गाये हैं जैसे 'शाहजहाँ', 'दर्द', 'दुलारी', 'मदर इण्डिया', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'दीदार', 'अनमोल घड़ी', 'आन', 'बैजु बावरा', वगेरह। मेरे पास उनके ख़ूबसूरत गीतों का ख़ज़ाना है। लोग आज भी उनके संगीत के शैदाई हैं। मेरे स्टेज शोज़ में भी लोग ज़्यादातर उनके गीतों की ही फ़रमाइश करते हैं।" लीजिए, नौशाद साहब और शमशाद जी, इन दोनों को समर्पित आज का यह गीत सुनते हैं।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. मुख्या रूप से इस फिल्म में गीता रॉय के गाये गीत थे.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. एक अंतरे में "दिलवाले"- "मतवाले" का काफिया है



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

इस गीत के संगीतकार - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

एक बार फिर अमित जी को टक्कर मिल मात्र इंदु जी से, अरे भाई बाकी धुरंधर कहाँ है ? या सवाल ज्यादा मुश्किल लग रहे हैं ? खैर इंदु जी आपके जवाब गलत हों संभावना कम ही होती है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, August 29, 2011

काहे कोयल शोर मचाये रे....एक और खनकता गीत शमशाद की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 732/2011/172



'बूझ मेरा क्या नाव रे' - पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। जैसा कि कल हमने वादा किया था कि शमशाद जी के बचपन और शुरुआती दौर के बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे, तो आइए आज प्रस्तुत है विविध भारती द्वारा ली गई एक साक्षात्कार के अंश। शमशाद जी से बातचीत कर रहे हैं वरिष्ठ उद्‍घोषक श्री कमल शर्मा:



शमशाद जी: मेरे को गाना नहीं सिखाया किसी ने, ग्रामोफ़ोन पर सुन सुन कर मैंने सीखा। मेरे घरवाले ने एक पैसा नहीं खर्च किया। लड़कों का ही फ़िल्मों में गाना बजाना अच्छा नहीं माना जाता था, लड़कियों की क्या बात थी! मैं गाने लगती घर में तो सब चुप करा देते थे कि क्या हर वक़्त चैं चैं करती रहती है!



कमल जी: शमशाद जी, आपनें किस उम्र से गाना शुरु किया था?



शमशाद जी - आठ साल से गाना शुरु किया, जब से होश आया तभी से गाती थी।



कमल जी - आप जिस स्कूल में पढ़ती थीं, वहाँ आपके म्युज़िक टीचर ने आपका हौसला बढ़ाया होगा?



शमशाद जी - उन्होंने कहा कि आवाज़ अच्छी है, पर घरवालों ने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, वह ब्रिटिश ने बनाया था, उर्दू ज़बान में, मैंने पाँचवी स्टैण्डर्ड तक पढ़ाई की। हम चार बहनें और तीन भाई थे। एक मेरा चाचा था, एक उनको गाने का शौक था। वो कहते थे कि हमारे घर में यह लड़की आगे चलकर अच्छा गायेगी। वो मेरे बाबा के सगे भाई थे। वो उर्दू इतना अच्छा बोलते थे कि तबीयत ख़ुश हो जाती, लगता ही नहीं कि वो पंजाब के रहनेवाले थे। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौकीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। लेकिन वो मेरे गाने से डरते थे। वो कहते कि चार चार लड़कियाँ हैं घर में, तू गायेगी तो इन सबकी शादी करवानी मुश्किल हो जायेगी।



कमल जी: शमशाद जी, आपकी गायकी की फिर शुरुआत कैसे और कब हुई?



शमशाद जी: मेरे उस चाचा ने मुझे जिएनोफ़ोन (Jien-o-Phone) कंपनी में ले गए, वो एक नई ग्रामोफ़ोन कंपनी आयी हुई थी। उस समय मैं बारह साल की थी। वहाँ पहुँचकर पता चला कि ऑडिशन होगा, उन लोगों ने तख़्तपोश बिछाया, हम चढ़ गए, उस पर बैठ गए (हँसते हुए)। वहीं पर मौजूद थे संगीतकार मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब। इतने कमाल के आदमी मैंने देखा ही नहीं था। वो मेरे वालिद साहब को पहचानते थे। वो कमाल के पखावज बजाते थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि आपके साथ कौन बजायेगा? मैंने कहा मैं ख़ुद ही गाती हूँ, मेरे साथ कोई बजानेवाला नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि थोड़ा गा के सुनाओ। मैंने ज़फ़र की ग़ज़ल शुरु की, "मेरे यार मुझसे मिले तो...", एक अस्थाई, एक अंतरा, बस! उन्होंने मुझे रोक दिया, मैंने सोचा कि गये काम से, ये तो गाने ही नहीं देते! ये मैंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि मैं प्लेबैक आर्टिस्ट बन जाऊँगी, मेरा इतना नाम होगा। मैं सिर्फ़ चाहती थी कि मैं खुलकर गाऊँ।



दोस्तों, शमशाद जी का कितना नाम हुआ, और कितना खुल कर वो गाईं, ये सब तो अब इतिहास बन चुका है, आइए अब बात करते हैं आज के गाने की। शृंखला की शुरुआत हमने कल की थी मास्टर ग़ुलाम हैदर के कम्पोज़िशन से। आज आइए सुनें संगीतकार राम गांगुली के संगीत निर्देशन में १९४८ की राज कपूर की पहली निर्मित फ़िल्म 'आग' से शमशाद जी का गाया फ़िल्म का एक बेहद लोकप्रिय गीत "काहे कोयल शोर मचाये रे, मोहे अपना कोई याद आये रे..."। गीतकार हैं बहज़ाद लखनवी और गीत फ़िल्माया गया है नरगिस पर। इस गीत में कुछ ऐसा जादू है कि गीत को सुनने वाला हर कोई अपनी यादों में खो जाता है, उसे भी कोई अपना सा याद आने लगता है। इस गीत के बारे में शमशाद जी नें कहा था, "राज कपूर अपनी पहली फ़िल्म 'आग' बना रहे थे। वे मेरे पास आये और कहा कि मैं पृथ्वीराज कपूर का बेटा हूँ। मैं कहा बहुत ख़ुशी की बात है। फिर उन्होंने कहा कि आपको मेरी फ़िल्म में गाना पड़ेगा। मैंने कहा गा दूँगी। इस फ़िल्म के सारे गानें बहुत ही मक़बूल हुए, संगीतकार थे राम गांगुली। इस फ़िल्म का एक गीत सुनिये।"







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. १९४९ की फिल्म है ये.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द युग्म से - "रुत अलबेली"



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

इस गीत के संगीतकार - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

वाह इंदु जी आपके क्या कहने, दादी आपकी उपस्तिथि लगनी चाहिए इस शृंखला की हर कड़ी में, और अमित जी को बधाई है :)



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, August 28, 2011

सावन के नज़ारे हैं....शमशाद बेगम की पहली फिल्म के एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 731/2011/171



मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, स्वागत है आप सभी का इस सुरीले सफ़र में। कृष्णमोहन मिश्र जी द्वारा प्रस्तुत 'वतन के तराने' लघु शृंखला के बाद आज से एक नई शृंखला के साथ, मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हो गया हूँ। आज से शुरु होने वाली लघु शृंखला समर्पित है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक लाजवाब पार्श्वगायिका को। ये वो गायिका हैं दोस्तों जिनकी आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पाँचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओ. पी. नय्यर साहब नें इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मंदिर में घंटियाँ बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है। प्रस्तुत है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे'। शमशाद बेगम के गाये गीतों की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज ६ दशक बाद भी उनके गाये हुए गीतों के रीमिक्स जारी हो रहे हैं। आइए इस शृंखला में उनके गाये गीतों को सुनने के साथ साथ उनके जीवन और करीयर से जुड़ी कुछ बातें भी जानें, और शमशाद जी के व्यक्तित्व को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें।



विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करते हुए शमशाद बेगम नें बरसों बरस पहले अपनी दास्तान कुछ यूं शुरु की थीं - "देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएँ! मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरु करूँ! आप मेरे गानें अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूँ। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूं है कि मेरा जन्म लाहौर में १९१९ में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी का भी नहीं था मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसंद आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग् कंपनी (jien-o-phone) के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। १४ साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ जो था "हाथ जोड़ा लई पखियंदा ओये क़सम ख़ुदा दी चंदा"। उस रेकॉर्ड कंपनी नें फिर मेरे १०० रेकॉर्ड्स निकाले। १९३७ में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहाँ मैंने पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। १९३९ में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया १९४० की पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' में, जिसमें मेरा गीत "आ सजना" काफ़ी हिट हुआ था। मेरी पहली हिंदी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म ५२ हफ़्तों से ज़्यादा चली।" दोस्तों, शमशाद जी नें बहुत ही कम शब्दों में अपने शुरुआती दिनों का हाल बयान कर दिया। लेकिन इतनी आसानी से हम भला संतुष्ट क्यों हों? इसलिये कल हम उनसे इन्ही दिनों के बारे में विस्तार से जानेंगे। लेकिन फ़िल्हाल सुना जाये शमशाद जी की पहली हिंदी फ़िल्म 'ख़ज़ांची' से उनका गाया यह गीत "सावन के नज़ारे हैं"। मास्टर ग़ुलाम हैदर का संगीत है, और गीत लिखा है वली साहब नें। १९४१ में बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था मोती गिदवानी नें और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे एम. इस्माइल, रमोला और नारंग।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. एक बड़े निर्माता निर्देशक की पहली निर्मित फिल्म थी ये.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. मुखड़े में शब्द है - "याद"



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

इस गीत के संगीतकार - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

जी इंदु जी अमित जी अब १० से भी अधिक श्रृंखलाएं जीत चुके हैं. बधाई के हकदार तो हैं ही



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, December 12, 2010

कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र.....आज भी इस गीत की रिदम को सुनकर मन थिरकने नहीं लगता क्या आपका ?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 546/2010/246

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और नए सप्ताह में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। दोस्तों, पिछले तीन हफ़्तों से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सज रही है एक ऐसी महफ़िल जिसे रोशन कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ समान फ़िल्मकार। 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' लघु शृंखला के पहले तीन खण्डों में वी. शांताराम, महबूब ख़ान और बिमल रॊय के फ़िल्मी सफ़र पर नज़र डालने के बाद आज से हम इस शृंखला का चौथा और अंतिम खण्ड शुरु कर रहे हैं। और इस खण्ड के लिए हमने जिस फ़िल्मकार को चुना है, वो एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार हैं। फ़िल्म निर्माण और निर्देशन के लिए तो वो मशहूर हैं ही, अभिनय के क्षेत्र में भी उन्होंने लोहा मनवाया है और साथ ही एक अच्छे नृत्य निर्देशक भी रहे हैं। इस बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न फ़िल्मकार को दुनिया जानती है गुरु दत्त के नाम से। आज से अगले चार अंकों में हम गुरु दत्त को और उनके फ़िल्मी सफ़र को थोड़ा नज़दीक से जानने और समझने की कोशिश करेंगे और साथ ही उनके द्वारा निर्मित और/या निर्देशित फ़िल्मों के कुछ बेहद लोकप्रिय व सदाबहार गानें भी सुनेंगे। गुरु दत्त पडुकोण का जन्म ९ जुलाई १९२५ को बैंगलोर (मैसूर प्रोविंस) में हुआ था। उनके पिता शिवशंकरराव पडुकोण और माँ वसंती पडुकोण चित्रपुर के सारस्वत थे। पिता पहले पहले स्कूल के हेडमास्टर थे और बाद में बैंक की नौकरी कर ली, जब कि उनकी माँ एक स्कूल में पढ़ाती थीं और लघु कहानियाँ लिखती थीं, तथा बांगला के उपन्यासों को कन्नड़ में अनुवाद भी करती थीं। जब गुरु दत्त का जन्म हुआ, उस वक़्त वसंती पडुकोण की उम्र केवल १६ वर्ष थी। परिवार की आर्थिक अवस्था ठीक ना होने और माता-पिता में संबंध अच्छे ना होने की वजह से गुरु दत्त का बचपन कठिन ही रहा। गुरु दत्त का नाम शुरु में वसंत कुमार रखा गया था, लेकिन बालावस्था में एक हादसे का शिकार होने के बाद उनका बदलकर गुरु दत्त कर दिया गया, क्योंकि परिवार के हिसाब से यह नाम ज़्यादा शुभ था। गुरु दत्त के तीन छोटे भाई थे आत्माराम, देवीदास और विजय, और उनकी एकमात्र बहन थी ललिता। निर्देशिका कल्पना लाजमी ललिता की ही बेटी हैं। गुरु दत्त बचपन में अपना बहुत सारा समय अपने मामा बालाकृष्णा बी. बेनेगल के साथ बिताया करते थे, जिन्हें वो बकुटमामा कहकर बुलाते थे। बकुटमामा उन दिनों फ़िल्मों के पोस्टर्स पेण्ट किया करते थे। इसी बकौटमामा के भतीजे हैं महान फ़िल्मकार श्याम बेनेगल। तो दोस्तों, यह था गुरु दत्त साहब के परिवार का पार्श्व।

दोस्तों, गुरु दत्त के नाम से बहुत से लोगों को आज भी यह लगता है कि बंगाली थे, जब कि ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन उनका बंगाल से नाता तो ज़रूर है। जैसा कि हमने बताया कि गुरु दत्त के पिता हेडमास्टर थे और उसके बाद बैंक की नौकरी की। फिर उसके बाद वो एक क्लर्क की हैसियत से बर्मा शेल कंपनी में कार्यरत हो गये और इस तरह से कलकत्ते के भवानीपुर में रहने लगे। यहीं पर गुरु दत्त की स्कूली शिक्षा सम्पन्न हुई। और इसी वजह से गुरु दत्त बंगला भी बहुत फ़ुर्ती से बोल लेते थे। बंगाल की संस्कृति को उन्होंने इतने अच्छे से अपने में समाहित किया कि बाद में जब बंगाल के पार्श्व पर बनी फ़िल्मों का निर्माण किया तो उनमें जान डाल दी। दोस्तों, गुरु दत्त के फ़िल्मी सफ़र की कहानी हम कल के अंक से शुरु करेंगे, आइए अब सीधे आ जाते हम आज बजने वाले गीत पर। इस पहले अंक के लिए हमने उस फ़िल्म का शीर्षक गीत चुना है जो गुरु दत्त निर्मित, निर्देशित व अभिनीत पहली ब्लॊकबस्टर फ़िल्म थी। जी हाँ, 'आर-पार'। ऐसी बात नहीं कि इससे पहले उन्होंने फ़िल्में निर्देशित नहीं की, लेकिन 'आर पार' को जो शोहरत और बुलंदी हासिल हुई थी, वह बुलंदी पहले की फ़िल्मों को नसीब नहीं हुई थी। शम्शाद बेगम की आवाज़ में मजरूह सुल्तनपुरी की रचना और संगीतकार, जी हाँ, हमारे ओ.पी. नय्यर साहब, जिनके साथ गुरु दत्त की बहुत अच्छी ट्युनिंग् जमी थी। नय्यर साहब भी इसी गीत को अपना पहला कामयाब गीत बताते रहे हैं। विविध भारती के 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में जब कमल शर्मा ने उनसे पूछा कि क्या वो अपना पहला गीत "प्रीतम आन मिलो" को मानते हैं, तो नय्यर साहब ने खारिज करते हुए "कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र" का ही ज़िक्र किया। तो आइए शम्शाद बेगम की खनकती आवाज़ में इस गीत को सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि इसी वर्ष २०१० में गुरु दत्त को सी.एन.एन ने अपने "Top 25 Asian actors of all time" की सूची में शामिल किया है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०७ /शृंखला ०५
गीत का इंटरल्यूड सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - इससे आसान कुछ हो ही नहीं सकता :).

सवाल १ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गायिका का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी ने दो अंकों की छलांग लगायी, मगर श्याम जी अभी भी आगे हैं, भाई श्याम का कोई तोड़ फिलहाल नज़र नहीं आ रहा.....बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, December 1, 2010

दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे.....एक क्लास्सिक फिल्म का गीत जिसके निर्देशक थे महबूब खान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 539/2010/239

हबूब ख़ान की फ़िल्मी यात्रा पर केन्द्रित इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' का दूसरा खण्ड आप पढ़ और सुन रहे हैं। इस खण्ड की आज चौथी कड़ी में हम रुख़ कर रहे हैं महबूब साहब के ५० के दशक में बनीं फ़िल्मों की तरफ़। वैसे पिछले तीन कड़ियों में हमने गानें ५० के दशक के ही सुनवाए हैं, जानकारी भी दी है, लेकिन महबूब साहब के फ़िल्मी सफ़र के ३० और ४० के दशक के महत्वपूर्ण फ़िल्मों का ज़िक्र किया है। आइए आज की कड़ी में उनकी बनाई ५० के दशक की फ़िल्मों को और थोड़े करीब से देखा जाए। इस दशक में उनकी बनाई तीन मीलस्तंभ फ़िल्में हैं - 'आन', 'अमर' और 'मदर इण्डिया'। 'आन' १९५२ की सफलतम फ़िल्मों में से थी, जिसे भारत के पहले टेक्नो-कलर फ़िल्म होने का गौरव प्राप्त है। दिलीप कुमार, निम्मी और नादिर अभिनीत इस ग्लैमरस कॊस्ट्युम ड्रामा में दिखाये गये आलिशान राज-पाठ और युद्ध के दृष्य लोगों के दिलों को जीत लिया। 'आन' बम्बई के रॊयल सिनेमा में रिलीस की गयी थी । इस फ़िल्म के सुपरहिट संगीत के लिए नौशाद ने कड़ी मेहनत की थी। उन्होंने १०० पीस ऒरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया पार्श्वसंगीत तैयार करने के लिए। उस ज़माने में ऐसा बहुत कम ही देखा जाता था। केवल शंकर जयकिशन ने १०० पीस ऒरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया था 'आवरा' में। नौशाद साहब की आदत थी कि वो अपने नोटबुक में गानों के नोटेशन्स लिख लिया करते थे। और इसी का नतीजा था कि 'आन' का पार्श्वसंगीत लंदन में री-रेकॊर्ड किया जा सका। अमेरिका में एक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है 'आन' के नोटेशन्स की, और जिसे नौशाद साहब के हाथों ही जारी किया गय था। इस तरह का सम्मान पाने वाले नौशाद पहले भारतीय संगीतकार थे। 'आन' के बाद १९५४ में महबूब ख़ान ने बनाई 'अमर' जिसमें दिलीप कुमार और निम्मी के साथ मधुबाला को लिया गया। शक़ील - नौशाद ने एक बार फिर अपना कमाल दिखाया। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गानें शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। लेकिन ५० के दशक में महबूब ख़ान की सब से महर्वपूर्ण आई १९५७ में - 'मदर इण्डिया', जो हिंदी सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय बन चुका है। अपनी १९४० की फ़िल्म 'औरत' का रीमेक था यह फ़िल्म। नरगिस, सुनिल दत्त, राज कुमार और राजेन्द्र कुमार अभिनीत यह फ़िल्म १४ फ़रवरी के दिन प्रदर्शित किया गया था। 'मदर इण्डिया' की कहानी राधा (नरगिस) की कहानी थी, जिसका पति (राज कुमार) एक दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गँवाने के बाद उससे अलग हो जाता है। राधा अपने बच्चों को बड़ा करती है हर तरह की सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करते हुए। उसका एक बेटा बिरजु (सुनिल दत्त) बाग़ी बन जाता है जबकि दूसरा बेटा रामू (राजेन्द्र कुमार) एक आदर्श पुत्र है। अंत में राधा बिरजु की हत्या कर देती है और उसका ख़ून उनकी ज़मीन को उर्वर करता है। 'मदर इण्डिया' के लिए महबूब ख़ान को फ़िल्मफ़ेयर के 'सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म' और 'सर्वश्रेष्ठ निर्देशक' के पुरस्कर मिले थे। नरगिस को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था। इसके अलावा फ़रदून ए. ईरानी को सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र और कौशिक को सर्वश्रेष्ठ ध्वनिमुद्रण का पुरस्कार मिला था।

आज की कड़ी में हम आपको सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का गीत "दुख भरे दिन बीते रे भइया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे"। मोहम्मद रफ़ी, शम्शाद बेग़म, आशा भोसले और मन्ना डे की आवाज़ें, और शक़ील-नौशाद की जोड़ी। इस गीत के बनने की कहानी ये रही मन्ना दा के शब्दों में (सौजन्य: 'हमारे महमान', विविध भारती) - "जब हम 'मदर इण्डिया' के गा रहे थे वह "दुख भरे दिन बीते रे भइया...", अभी मैं, रफ़ी साब, आशा, गा रहे थे सब लोग, और शम्शाद बाई थीं, और कोरस। रिहर्सल करने के बाद, नौशाद साहब के घर में हो रहा था रिहर्सल, तो बोले कि 'अच्छा मन्ना साहब, कल फिर कितने बजे?' तो मैंने बोला कि 'ठीक है नौशाद साहब, मैं आ जाऊँगा १० बजे'। तो रफ़ी साहब, बहुत धीरे बोलते थे, कहने लगे, 'दादा, कल सवेरे रेकॊर्डिंग् है'। बोला कि 'नौशाद साहब, रफ़ी साहब की कल रेकॊर्डिंग् है'। नौशाद साहब बोले कि 'ठीक है शाम को बैठते हैं'। तो आशा ने कहा, 'शाम को तो मैं नहीं आ सकती, शाम को रेकोर्डिंग् है मेरी'। 'अच्छा फिर परसों बैठते हैं'। तो परसों का तय हो गया। तो परसों सब फिर मिले और फिर से "दुख भरे दिन...", फिर से सब किया। कुछ तीन तीन घंटे रिहर्सल। अब फिर कब करना है? तो किसी ने पूछा कि 'और भी रिहर्सल करना है?' 'क्या बात कर रहे हैं?', नौशाद साहब। 'नहीं साहब, दो एक रिहर्सल चाहिए'। 'तो फ़लाना दिन बैठते हैं, ठीक है न रफ़ी मियाँ?' 'हाँ'। 'क्यों शम्शाद बाई?' 'आशा बाई, ठीक है ना?' 'मन्ना जी तो आएँगे'। ऐसे हम फिर मिले। इस तरह से रेकोडिंग् करते थे। पूरी तरह से तैयार करने के बाद जम के रेकोडिंग् 'स्टार्ट' हुई। नौशाद साहब पहुँच गए रेकॊर्डिंग् बूथ में। रेकोडिस्ट के पास जाकर बैठ गए। नौशाद साहब के रिहर्सल्स इतने पर्फ़ेक्ट हुआ करते थे कि रेकॊर्डिंग् के बीच में कभी कट नहीं होते थे। लेकिन इस गाने में 'रेडी वन टू थ्री फ़ोर स्टार्ट', "दुख भरे दिन बीते रे भइया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे", "कट", सब चुप। नौशाद साहब बाहर आये, 'वाह वाह वाह वाह, बेहतरीन, नंदु, तुमने वह क्या बजाया उधर?' वो कहता है, 'नौशाद साहब, मैंने यह बजाया'। 'वह कोमल निखार, वह ज़रा सम्भाल ना, वह ज़रा ठीक नहीं है, एक मर्तबा और'। 'अरे रफ़ी साहब, वह कौन सा नोट लिया उपर? "देख रे घटा घिर के आई, रस भर भर लाई, हो ओ ओ ओ ओ...", इसको ज़रा सम्भालिए, यह फिसलता है उधर'। 'एक मर्तबा और'। और फिर अंदर चले गए।" तो देखा दोस्तों, कि किस तरह से इस गीत की रेकॊर्डिंग् हुई थी। तो लीजिए इस अविस्मरणीय फ़िल्म का यह अविस्मरणीय गीत सुनते हैं महबूब ख़ान को सलाम करते हुए।



क्या आप जानते हैं...
कि 'मदर इण्डिया' को ऒस्कर पुरस्कारों के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म की श्रेणी में नामांकन मिला था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली १० /शृंखला ०४
गीत का प्रील्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान है इसलिए कोई अन्य सूत्र नहीं.

सवाल १ - किन किन पुरुष गायकों की आवाज़ है इस समूह गीत में - २ अंक
सवाल २ - महिला गायिकाओं के नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी २ अंक अभी भी पीछे हैं यानी आज अगर श्याम जी एक अंक वाले सवाल का भी जवाब दे देते हैं तो बाज़ी उन्हीं के हाथ रहेगी...देखते हैं क्या होता है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, January 12, 2010

मेरे पिया गए रंगून, किया है वहां से टेलीफून...मोबाइल क्रांति के इस युग से काफी पीछे चलते हैं इस गीत के जरिये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 312/2010/12

'स्वरांजली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला में इन दिनों हम याद कर रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के उन कलाकारों को जिनका इस जनवरी के महीने में जन्मदिन या स्मृति दिवस होता है। गत ५ जनवरी को संगीतकार सी. रामचन्द्र जी की पुण्यतिथि थी। आज हमारी 'स्वरांजली' उन्ही के नाम! जैसा कि हमने पहली भी कई बार उल्लेख किया है कि सी. रामचन्द्र उन पाँच संगीतकारों में शुमार पाते हैं जिन्हे फ़िल्म संगीत के क्रांतिकारी संगीतकार होने का दर्जा दिया गया है। ४० के दशक में जब फ़िल्म संगीत मुख्यता शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और सुगम संगीत पर ही आधारित हुआ करती थी, ऐसे में सी. रामचन्द्र जी ने पाश्चात्य संगीत को कुछ इस क़दर हिंदी फ़िल्मी गीतों में इस्तेमाल किया कि वह एक ट्रेंडसेटर बन कर रह गया। यह ज़रूर है कि इससे पहले भी पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल होता आया है, लेकिन गीतों को पूरा का पूरा एक वेस्टर्ण लुक सी. रामचन्द्र जी ने ही पहली बार दिया था। और देखिए, जहाँ एक तरफ़ उनके "शोला जो भड़के", "संडे के संडे", "ईना मीना डीका", "मिस्टर जॊन बाबा ख़ान" जैसे गीत हैं, वहीं दूसरी तरफ़ कोमल से कोमल शास्त्रीय अंदाज़ वाले गानें भी बेशुमार हैं जैसे कि "धीरे से आजा री अखियन में", "जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग", "जा री जा री ओ कारी बदरिया", "तू छूपी है कहाँ मैं तरसता यहाँ" वगेरह। कहने का अर्थ यह कि उन्होने अपने आप को वर्सेटाइल बनाए रखा और किसी एक स्टाइल के साथ ही चिपके नहीं रहे। आज उन्हे श्रद्धांजली स्वरूप हमने जिस गीत को चुना है उसे सुनते ही आपके चेहरे पर मुस्कुराहट खिल जाएगी। यह है सन् १९४९ की फ़िल्म 'पतंगा' का 'ऒल टाइम फ़ेवरिट' "मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफ़ून"।

१९४९ में एच. एस. रवैल पहली बार फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे 'वर्मा फ़िल्म्स' के बैनर तले बनी इसी फ़िल्म, यानी कि 'पतंगा' के साथ। फ़िल्म 'शहनाई' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र और गीतकार राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी जम चुकी थी। इस फ़िल्म में भी इसी जोड़ी ने गीत-संगीत का पक्ष संभाला। 'पतंगा' के मुख्य कलाकार थे श्याम और निगार सुल्ताना। याकूब और गोप, जिन्हे भारत का लौरल और हार्डी कहा जाता था, इस फ़िल्म में शानदार कॊमेडी की। 'शहनाई' की तरह इस 'रोमांटिक कॊमेडी' फ़िल्म को भी सी. रामचन्द्र ने ख़ूब अंजाम दिया। ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत तो जैसे एक कल्ट सॊंग् बन कर रह गया। टेलीफ़ोन पर बने गीतों का ज़िक्र इस गीत के बिना अधुरी समझी जाएगी। बल्कि युं कहें कि टेलीफ़ोन पर बनने वाला यह सब से लोकप्रिय गीत रहा है आज तक। शम्शाद बेग़म और स्वयं चितलकर का गाया हुआ यह गीत एक नया कॊन्सेप्ट था फ़िल्म संगीत के लिए (सी.रामचन्द्र को हम पहले ही क्रांतिकारी करार दे चुके हैं)। भले इस गीत को सुन कर ऐसा लगता है कि नायक और नायिका एक दूसरे से टेलीफ़ोन पर बात करे हैं, लेकिन असल में यह गीत एक स्टेज शो का हिस्सा है। उन दिनों बर्मा में काफ़ी भारतीय जाया करते थे, शायद इसीलिए रंगून शहर का इस्तेमाल हुआ है। (द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का रंगून से गहरा नाता था)। आज के दौर में शायद ही रंगून का ज़िक्र किसी फ़िल्म में आता होगा। फ़िल्म 'पतंगा' के दूसरे हल्के फुल्के हास्यप्रद गीतों में शामिल है शमशाद बेग़म का गाया "गोरे गोरे मुखड़े पे गेसू जो छा गए", "दुनिया को प्यारे फूल और सितारे, मुझको बलम का नाम", शमशाद और रफ़ी का गाया डुएट "बोलो जी दिल लोगे तो क्या क्या दोगे" और "पहले तो हो गई नमस्ते नमस्ते", शमशाद और चितलकर का गाया एक और गीत "ओ दिलवालों दिल का लगाना अच्छा है पर कभी कभी"। दोस्तों, यह वह साल था जिस साल लता मंगेशकर 'महल' और 'बरसात' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर चारों तरफ़ हलचल मचा दी थी। इस फ़िल्म में उन्होने भी कुछ गीत गाए। एक गाना था शमशाद बेग़म के साथ "प्यार के जहान की निराली सरकार है", और तीन दर्द भरे एकल गीत भी गाए, जिनमें जो सब से ज़्यादा हिट हुआ था वह था "दिल से भुला दो तुम हमें, हम ना तुम्हे भुलाएँगे"। दोस्तों, आज सी. रामचन्द्र जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए हम भी यही कहते हैं कि आप ने जो संगीत हमारे लिए रख छोड़ा है, उसे हमने अभी तक कलेजे से लगाए रखा है, और आनेवाली तमाम पीढ़ियाँ भी इन्हे सहज कर रखेंगी ज़रूर! चलिए माहौल को अब थोड़ा सा हल्का करते हैं, और देहरादून से रंगून के बीच की इस बातचीत का मज़ा लेते हैं।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

अंगडाई लेकर जागी सुबह,
फिर किलकारियां गूंजी आँगन में,
उसकी पायल की झंकार सुन,
नींद से जागा है मेरा संसार....

अतिरिक्त सूत्र - इस संगीतकार की पुण्यतिथि ६ जनवरी है

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी लौटे हैं २ अंकों के लिए बधाई, अनुराग जी बिलकुल सही कहा आपने...इंदु जी आशा है अब तबियत बेहतर होगी आपकी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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