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Monday, October 23, 2017

फ़िल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 11 || राजेंद्र कुमार

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 11
Rajendra Kumar

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के ग्यारहवें एपिसोड में सुनिए कहानी राजेंद्र कुमार की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 
नूतन 
हृषिकेश मुखर्जी 
मजरूह सुल्तानपुरी
साधना 
एस डी बर्मन

Saturday, June 4, 2016

"हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...", क्यों राज कपूर ने किया था महेन्द्र कपूर से गीत गवाने का वादा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 83
 

'हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 83-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की मशहूर फ़िल्म ’संगम’ के गीत "हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर, मुकेश और महेन्द्र कपूर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत शंकर जयकिशन का। 


बात 60 के दशक के शुरुआत की होगी, एक स्टेज शो के लिए राज कपूर ताशकन्द गए और अपने साथ महेन्द्र कपूर जी को भी ले गए। ताशकन्द उस समय USSR का हिस्सा हुआ करता था। और रूस में राज कपूर बहुत लोकप्रिय थे। राज कपूर का शो ज़बरदस्त हिट शो, इस शो में राज कपूर ने भी कुछ गाने गाए, उन गानों पर महेन्द्र कपूर ने हारमोनियम बजा कर राज कपूर का साथ दिया। इस शो के लिए महेन्द्र कपूर ने ख़ास तौर से हिन्दी गानों का रूसी भाषा में अनुवाद करके तैयार कर रखा था। जब उनके गाने की बारी आई तब उन्होंने फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले..." को रूसी भाषा में जो गाया तो लोग झूम उठे। और महेन्द्र कपूर का नाम लेकर "once more, once more" का शोर मचाने लगे। जनता का यह रेस्पॉन्स देख कर राज कपूर ने महेन्द्र कपूर से कहा कि "देखा, एक कपूर ही दूसरे कपूर को मात दे सकता है!" शायद इसलिए कहा होगा कि राज कपूर की परफ़ॉरमैन्स के बाद महेन्द्र कपूर को रूसी जनता से उनके गीत का जो रेसपॉन्स मिला वो राज कपूर उम्मीद नहीं कर रहे थे। ज़ाहिर है कि राज कपूर के रेसपॉन्स से महेन्द्र कपूर को रेसपॉन्स ज़्यादा मिला। राज कपूर महेन्द्र कपूर से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महेन्द्र से कहा कि मैं चाह कर भी मेरे गाने तुमसे नहीं गवा सकता क्योंकि तुम तो जानते ही हो कि मेरी आवाज़ मुकेश है, मेरे सारे गाने मुकेश ही गाते हैं। महेन्द्र जी बोले, "मुकेश जी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं, इसलिए मैं चाहता भी नहीं कि उनके गाने मैं गाऊँ"। इस पर राज साहब बोले कि लेकिन मैं एक वादा करता हूँ कि मेरी अगली फ़िल्म में जो दूसरा हीरो होगा, उसके लिए तुम ही गाना गाओगे। महेन्द्र कपूर ने मज़ाक में राज कपूर से कहा कि "राज जी, आप बहुत बड़े आदमी हैं, भारत लौट कर आपको यह वादा कहाँ याद रहेगा?" उस वक़्त राज कपूर सिगरेट पी रहे थे, सिगरेट की एक कश लेकर मुंह से निकाली सिगरेट और जलती हुई सिगरेट से अपने हाथ पे एक निशान दाग़ दिया और बोले, "तुम फ़िकर मत करो, यह जला निशान मुझे अपना वादा भूलने नहीं देगा।"

इस घटना के बाद जब राज कपूर और महेन्द्र कपूर हिन्दुस्तान लौट कर आए तो राज कपूर ने अपने वादे के अनुसार अगली ही फ़िल्म ’संगम’ में दूसरे नायक राजेन्द्र कुमार के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ में गाना रेकॉर्ड किया और ताशकन्द में किए अपने वादे को निभाया। गाना था "हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा, दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जाएगा..."। इस गीत के साथ महेन्द्र कपूर की कुछ यादें मुकेश की भी जुड़ी हुई हैं। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों में’ कार्यक्रम में इस बारे में महेन्द्र जी ने कहा था, "मुझे जब "नीले गगन के तले..." के लिए फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला, तो किसी भी दूसरे सिंगर ने मुझे फ़ोन करके बधाई नहीं दी। एक रात मेरा नौकर आकर मुझसे कहा कि बाहर मुकेश जी आए हैं, आप से मिलना चाहते हैं। मैं तो हैरान रह गया कि मुकेश जी आए हैं मेरे घर। मैं भागता हुआ बाहर गया तो बोले, आओ यार, मेरी पत्नी से कहा कि भौजी, लड्डू शड्डू बाँटों। फिर मुझसे कहा कि ऐसे ही काम करते रहो, बहुत अच्छा होगा तुम्हारा। उन्हें कोई कॉम्प्लेक्स नहीं था कि कौन छोटा है कौन बड़ा है। एक बार मेरे बेटे के स्कूल के प्रिन्सिपल ने मुझसे अनुरोध किया कि आप मुकेश जी से अनुरोध करें कि हमारे स्कूल के फ़ंक्शन में आएँ। मैंने कहा कि ठीक है मैं उनसे कहूँगा। उस समय हम ’संगम’ के गीत की रेकॉर्डिंग् पर मिल रहे थे। मैंने उनसे कहा कि ऐसा है, मेरे बेटे के स्कूल फ़ंक्शन में आप गाएँगे? उन्होंने कहा कि हाँ, गा दूँगा। तो मैंने उनसे पूछा कि आप पैसे कितने लेंगे? उन्होंने कहा कि वो 3000 लेते हैं। मुकेश जी ने यह भी कहा कि वो वहाँ पर ज़्यादा देर नहीं ठहरेंगे, गाना गा कर आ जाएँगे। तो मैंने स्कूल के प्रिन्सिपल से कह दिया कि मुकेश जी गाएँगे और गाना हो जाने के बाद उन्हें 3000 रुपये उसी वक़्त दे दिया जाए। तो मुकेश जी वहाँ गए, सात-आठ गाने गाए, लेकिन पैसे लिए बिना ही वापस चले गए। अगले दिन जब वो मुझसे मिले तो कहा कि कल बड़ा मज़ा आया स्कूल में बच्चों के साथ। मैंने पूछा कि मुकेश जी, आपने पैसे तो ले लिए थे ना? वो बोले, कैसे पैसे? मैंने कहा कि आप ने जो कहा था कि 3000 रुपये? बोले, मैंने कहा था कि मैं 3000 लेता हूँ, पर यह नहीं कहा था कि मैं 3000 लूँगा। महेन्द्र, एक बात बताओ, अगर कल नितिन उसके महेन्द्र अंकल से कहेगा कि चाचाजी, आप मेरे स्कूल में गाना गाओ तो क्या आप उसके लिए पैसे लोगे?" लीजिए अब अप फिल्म 'संगम' का वही गीत सुनिए। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Tuesday, July 28, 2009

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना....राजेंद्र कुमार की दरख्वास्त रफी साहब की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 154

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के तहत इन दिनों आप सुन रहें हैं लघु शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी'। अब तक जिन चेहरों से आपका परिचय हुआ है, वो हैं शम्मी कपूर, दिलीप कुमार और सुनिल दत्त। आज का चेहरा भी बहुत ख़ास है क्योंकि इनके भी ज़्यादातर गानें रफ़ी साहब ने ही गाये हैं। इस चेहरे को हम सब जुबिली कुमार, यानी कि राजेन्द्र कुमार के नाम से जानते हैं। रफ़ी साहब और राजेन्द्र कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो जो जो प्रमुख फ़िल्में ज़हन में आती हैं, उनके नाम हैं धूल का फूल, मेरे महबूब, आरज़ू, सूरज, गंवार, दिल एक मंदिर, और आयी मिलन की बेला। लेकिन एक और फ़िल्म ऐसी है जिसमें मुख्य नायक राज कपूर थे, और सह नायक रहे राजेन्द्र कुमार। ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म के ज़्यादातर गानें मुकेश ने ही गाये होंगे, लेकिन उस फ़िल्म में दो गानें ऐसे थे जो राजेन्द्र कुमार पर फ़िल्माये जाने थे। उनमें से एक गीत तो लता-मुकेश-महेन्द्र कपूर का गाया हुआ था जिसमें राजेन्द्र साहब का प्लेबैक किया महेन्द्र कपूर ने, और दूसरा जो गीत था वह रफ़ी साहब की एकल आवाज़ में था। जी हाँ, यहाँ फ़िल्म 'संगम' की ही बात चल रही है। रफ़ी साहब के गाये इस अकेले गीत ने वो शोहरत हासिल की कि जो शायद फ़िल्म के दूसरे सभी गीतों को बराबर का टक्कर दे दे। इसमें कोई शक़ नहीं कि रफ़ी साहब के गाये इस गीत ने फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार के किरदार को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बनाया और किरदार को और ज़्यादा सशक्त किया। "ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना, कि तुम मेरी ज़िंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो"। राजेन्द्र कुमार और रफ़ी साहब की जोड़ी के तमाम हिट गीतों में से यही गीत हम आज लेकर आये हैं ख़ास आप के लिए। अगर बहुत दिनों से आप ने यह गीत नहीं सुन रखा था, तो आज इस गीत को सुनकर तमाम पुरानी यादें आपकी ताज़ा हो गयी होंगी, ऐसा हमारा ख़याल है।

'संगम' फ़िल्म इतनी चर्चित रही है कि इस फ़िल्म के बारे में नया कुछ बताने को हमारे पास नहीं है। बस प्रस्तुत गीत के बारे में यह ज़रूर कहूँगा कि प्रेम पत्र लिखने पर जितने भी गानें बने हैं, उनमें यह गीत एक अहम स्थान रखता है। रोमांटिक गानें लिखने में हसरत जयपुरी साहब का कोई सानी नहीं था, इस गीत के ज़रिये उन्होने इस बात को फिर एक बार प्रमाणित किया है। गीत का मुखड़ा और अंतरे जितने ख़ूबसूरत हैं, उतना ही ख़ूबसूरत है गीत के शुरुवाती बोल - "मेहरबाँ लिखूँ, हसीना लिखूँ, या दिलरुबा लिखूँ, हैरान हूँ कि आप को इस ख़त में क्या लिखूँ"! हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा! और रफ़ी साहब तो रफ़ी साहब, क्या समर्पण और अदायगी इस गीत में उन्होने दिखाई है, के सुन कर प्रेम-पत्र लिखने वाले के लिए दिल में हमदर्दी पैदा हो जाये! शंकर जयकिशन का संगीत भी उतना ही असरदार था इस गीत में। कुल मिलाकर यह गीत इन सभी कलाकारों के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन कर रह गया। और आज हम उसी पड़ाव से गुज़र रहे हैं, तो सुनिये फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर का यह सुनहरा नग़मा। और हाँ, आप को यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के लिये राजेन्द्र कुमार को उस साल के फ़िल्म-फ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार मिला था।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक सदाबहार ग़ज़ल रफी साहब की आवाज़ में.
2. कलाकार हैं -"राज कुमार".
3. मुखड़े में शब्द है -"कुदरत".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न जी आप बस दो जवाब दूर हैं हमारी दूसरी विजेता बनने से. एक बार स्वप्न जी विजेता बन जाए उसके बाद हमें लगता है कि पराग जी और दिशा जी में जम कर टक्कर होने वाली है. रोहित जी हौंसला अफजाई के लिए धन्येवाद. शरद जी आपकी पैरोडी पढ़कर तो मज़ा आ गया. दरअसल जैसा कि उपर सुजॉय ने लिखा भी है, प्रेम पत्र हम सभी ने लिखा होगा कभी न कभी. लिखने के बाद जो सोच सबसे पहले जेहन में आती है उसे ये गीत बहुत सुंदर अभिव्यक्ति देता है. शायद ही कोई होगा जिसे ये गीत पसंद न हो.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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