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शनिवार, 10 सितंबर 2016

"आज भी जब वहाँ से गुज़रता हूँ तो फ़ूटपाथ को चूम लेता हूँ, कभी मैं वहाँ सोता था साहब!"


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 16
 
नौशाद-2



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध संगीतकार नौशाद पर। आज प्रस्तुत है नौशाद के संघर्ष की कहानी का दूसरा और अन्तिम भाग।
  

मैंने माजिद साहब को लिखा था कि मेरा ऐसा ऐसा हाल हो गया है, क्या करूँ? तो माजिद साहब ने एक मनी ऑर्डर भेजा, नामी साहब के मार्फ़त। रेस्तोराँ में मेरे साथ, रात को बैठे मेरे साथ खाना खाने नामी साहब, बोले, अरे भाई, तुम्हारा एक मनी ऑर्डर आया है। भाई तुम्हें ज़रूरत पड़ गई थी तो मुझसे क्यों नहीं कहा? आदिल साहब क्या सोचेंगे कि मैं इस क़ाबिल भी नहीं था कि मैं तुम्हारी कोई मदद करता। मैंने कहा कि मैंने यह सोचा कि जो सर छुपाने की जगह भी मिली है शायद यह भी खो दूँ। अगर आपसे यह मैं दर्ख़्वास्त करूँगा तो आपके नज़रों से गिर जाऊँगा! बोले, तुम्हारे पास डायरी रहती थी, जेब में रखते हो? अभी है? मैंने कहा, जी हाँ। कहने लगे, लिखो जो मैं लिखाता हूँ। मैंने कहा, फ़रमाइए। उन्होंने कहा, लिखो, तुम जिस मक़सद के लिए आए हो, एक दिन इसमें कामयाबी हासिल करोगे, मैं अगर ज़िन्दा रहा तो तुमको सलाम करने आऊँगा। मैंने कहा, नामी साहब, किस उम्मीद पर आपने यह जुमला लिखवाया मुझसे? मुझमें कोई ख़ूबी नहीं है, आपने क्या देखा? कुछ तो मैं जानता भी नहीं हूँ मौसीक़ी के बारे में भी। कह रहे, देखो, तुम दो महीने से पैदल आते-जाते हो, यह मई-जून का महीना है, गरमियों में, और तुमने उफ़ तक नहीं की। मुझसे कभी सवाल नहीं किया। तो जो तुम्हारी लगन है, वो तुम्हें ले कर जाएगी मंज़िल तक!

एक दिन गफ़ूर साहब से फिर मुलाक़ात हुई फ़िल्म सिटी के गेट पर और वो मुझे ले गए, मुश्ताक़ हुसैन साहब से मिलवाया। और मुश्ताक़ साहब ने मुझसे कुछ सुना। उसके बाद उन्होंने कहा कि अच्छा, तुम कल से आओ, मेरे साथ काम करो। तो मैं कभी पेटी बजाऊँ, कभी पियानो बजाऊँ, जो साज़ वो दे दें, तीस रुपये महीने पर वहाँ नौकरी मिली। यह पहला इत्तेफ़ाक़ था। फिर उसके बाद एक इश्तिहार मैंने पढ़ा कि खेतवाड़े में एक ऑफ़िस है, यह पता है, यह टेलीफ़ोन नंबर है, और उसमें म्युज़िशियनों की ज़रूरत है। एक फ़िल्म कंपनी बन रही है ’न्यु पिक्चर्स’ के नाम से। सलमान साहब एक थे बनारस के, वो उसके मैनेजर थे। तो उनको सब ऐप्लिकेशन देते थे। मैंने भी अर्ज़ी डाल दी। गया वहाँ। म्युज़िक जो दे रहे थे उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब। तो उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब का थिएटर की दुनिया से मैं नाम सुनता आ रहा था। कि थिएटर में उस ज़माने में जो स्टेज प्ले होते थे उसमें सब क्लासिकल म्युज़िक का इस्तमाल होता था। बंदिशें सब ख़याल की, और स्थायी, अन्तरे और ठुमरी। तो साहब वहाँ अन्दर ट्रायल हो रहा था। सब लोग जो ट्रायल देने आए म्युज़िशियन बहुत अच्छा अच्छा वो सुना रहे थे। तो मैंने कहा कि मेरी तो  इसमें कोई जगह ही नहीं हो सकती, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, इतना अच्छा लोग सुना रहे हैं उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब को, मैं क्या सुनाऊँ! फिर जब मेरा नंबर आने लगा तो मैं वहाँ से भाग खड़ा हुआ। उपर से सलमान साहब ने आवाज़ दी, अरे अरे इधर आइए, वो ज़बरदस्ती ले गए उपर और मुझे वो रूम में धकेल दिया उन्होंने। उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब बैठे हुए थे। कहा कि कुछ सुनाओ। मैंने कहा, उस्ताद मुझे कुछ नहीं मालूम, इतना अच्छा-अच्छा लोगों ने सुनाया। उनके आगे मेरी कोई झैसियत ही नहीं। मैं आपको क्या सुनाऊँ हुज़ूर, बस आपके दीदार हो गए, यही मेरे लिए बहुत है!

कुछ दिनों बाद मुझे ऑफ़र लेटर मिला कि मुझे 40 रुपये महीने की तनख्वाह पर रख लिया गया है। उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब के साथ काम करना गर्व की बात थी। वो जिस फ़िल्म में काम कर रहे थे, वो एक रशियन हेनरी साहब की फ़िल्म थी। स्टुडियो चेम्बुर में था, उस वक़्त चेम्बुर जंगलों से घिरा होता था। हम लोग दादर से कुरला और फिर कुरला से मानखुर्द जाते। हमने अपनी रेल्वे पास बना ली। ग़ुलाम मोहम्मद तबला बजा रहे थे उस फ़िल्म में, वो भी हमारे साथ जाते थे। जहाँ मैं काम करने जाता था उसके पास ही में एक ’ब्रॉडवे सिनेमा’ हुआ करती थी। एक दिन वहाँ मुझे लखनऊ का रहने वाला एक आदमी मिला। जब उन्होंने सुना कि मैं रोज़ कोलाबा से इतनी दूर आता हूँ, तो उन्होंने मुझे उनके साथ उनकी दुकान के पीछे खोली में रहने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि गरमियों में वो लोग फ़ूटपाथ पर सोते हैं, ब्रॉडवे सिनेमा के ठीक ऑपोज़िट में। फ़ूटपाथ के उस साइड ब्रॉडवे थिएटर थी जिसकी रोशनी फ़ूटपाथ पर पड़ती थी। मैंने नामी साहब से इजाज़त ली और वहाँ आ गया रहने। आज भी जब वहाँ से गुज़रता हूँ तो फ़ूटपाथ को चूम लेता हूँ, कभी मैं वहाँ सोता था साहब! और एक बार उसी थिएटर में मेरी फ़िल्म की जुबिली हुई। मैं उस थिएटर की बैल्कनी से उस फ़ूटपाथ को देख रहा था कि मेरी आँखों में पानी  आ गए। विजय भट्ट ने पूछा कि क्या हुआ, आप रो क्यों रहे हैं? मैंने कहा कि उस फ़ूटपाथ को देख कर आँखें भर आईं, आख़िर 16 साल लगे इस फ़ूटपाथ को पार करने में!

सूत्र: नौशादनामा, विविध भारती




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



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