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Monday, March 1, 2010

"अमन की आशा" है संगीत का माधुर्य, होली पर झूमिए इन सूफी धुनों पर

ताज़ा सुर ताल ०९/२०१०

सुजॊय - सभी पाठकों को होली पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ और सजीव, आप को भी!
सजीव - मेरी तरफ़ से भी 'आवाज़' के सभी रसिकों को होली की शुभकामनाएँ और सुजॊय, तुम्हे भी।
सुजॊय - होली का त्योहार रंगों का त्योहार है, ख़ुशियों का त्योहार है, भाइचारे का त्योहार है। गिले शिकवे भूलकर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं, चारों तरफ़ ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है।
सजीव - सुजॊय, तुमने भाइचारे की बात की, तो मैं समझता हूँ कि यह भाइचारा केवल अपने सगे संबंधियों और आस-पड़ोस तक ही सीमित ना रख कर, अगर हम इसे एक अंतर्राष्ट्रीय रूप दें, तो यह पूरी की पूरी पृथ्वी ही स्वर्ग का रूप ले सकती है।
सुजॊय - जी बिल्कुल! आज कल जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय उग्रवाद बढ़ता जा रहा है, विनाश और दहशत के बादल इस पूरी धरा पर मंदला रहे हैं। ऐसे में अगर कोई संस्था अगर अमन और शांति का दूत बन कर, और सीमाओं को लांघ कर दो देशों को और ज़्यादा क़रीब लाने का प्रयास करें, तो हमें खुले दिल से उसकी स्वागत करनी चाहिए।
सजीव - हाँ, और ऐसी ही दो संस्थाओं ने मिल कर अभी हाल में एक परियोजना बनाई है भारत और पाक़िस्तान के रिश्तों को मज़बूत करने की। ये संस्थाएँ हैं भारत का सब से बड़ा मीडिया ग्रूप 'टाइम्स ग्रूप', पाक़िस्तान का मीडिया जायण्ट 'जंग ग्रूप', तथा 'जीओ टीवी ग्रूप', और इस परियोजना का शीर्षक है 'अमन की आशा'। ये मीडिया जायण्ट्स मिल कर दोनों देशों के बीच राजनैतिक और सांस्कृतिक संबंधों में सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ तक सांस्कृतिक पक्ष का सवाल है, तो इन दोनों देशों के जानेमाने कलाकारों के गीतों का एक संकलन हाल ही में जारी किया गया है।
सुजॊय - डबल सी डी पैक वाले 'अमन की आशा' ऐल्बम में ऐसे ऐसे कालजयी कलाकारों की रचनाएँ शामिल किए गए हैं कि कौन सा गीत किससे बेहतर है बताना मुश्किल है। इनमें से कुछ फ़िल्मी रचनाएँ हैं तो कुछ ग़ैर-फ़िल्मी, लेकिन हर एक गीत एक अनमोल नगीने की तरह है जो इस ऐल्बम में जड़े हैं। और क्यों ना हो जब लता मंगेशकर, गुलज़ार, भुपेन्द्र सिंह, शंकर महादेवन, हरीहरण, रूप कुमार राठोड़, नूरजहाँ, गु़लाम अली, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, अबीदा परवीन, मेहदी हसन, राहत फ़तेह अली ख़ान, वडाली ब्रदर्स जैसे अज़ीम फ़नकारों के गाए गानें इसमें शामिल हों। इनमें से कुछ गानें नए हैं तो कुछ कालजयी रचनाएँ हैं। और कुछ पारम्परिक गानें तो आप ने हर दौर में अलग अलग गायकों की आवाज़ों में सुनते आए हैं।
सजीव - इस ऐल्बम में कुल २० गानें हैं, जिनमें से हम ५ ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं को आज के इस 'ताज़ा सुर ताल' की कड़ी में शामिल कर रहे हैं। बाक़ी गीत आप समय समय पर 'आवाज़' के अन्य स्तंभों में सुन पाएँगे। तो सुजॊय, चलो बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाने से पहले एक गीत हो जाए अबीदा परवीन का गाया हुआ!

गीत - मैं नारा-ए-मस्ताना


सजीव- वाह ये तो कोई जादू था सुजॉय, मैं तो अभी तक झूम रहा हूँ...
सुजॊय -बिलकुल ठीक, अबीदा परवीन का जन्म १९५४ में हुआ था पाकिस्तान के सिंध के लरकाना के अली गोहराबाद मोहल्ले में। संगीत की तालीम उन्होने शुरुआती समय में अपने पिता उस्ताद ग़ुलाम हैदर से ही प्राप्त किया। बाद में शाम चौरसिया घराने के उस्ताद सलामत अली ख़ान से उन्हे संगीत की शिक्षा मिली। अपने पिता के संगीत विद्यालय में जाते हुए अबीदा परवीन में संगीत के जड़ मज़बूत होते चले गए। उनका प्रोफ़ेशनल करीयर रेडियो पाक़िस्तान के हैदराबाद केन्द्र से शुरु हुआ था सन् १९७३ में। उनका पहला हिट गीत एक सिंधी गीत था "तूहींजे ज़ुल्फ़न जय बंद कमंद विधा"। सूफ़ियाना संगीत में अबीदा जी का एक अलग ही मुक़ाम है। मूलत: वो ग़ज़लें गाती हैं, लेकिन उर्दू प्रेम गीत और ख़ास तौर पर काफ़ी पर उनका जैसे अधिकार सा बना हुआ है। वो उर्दू, सिंधी, सेरैकी, पंजाबी और पारसी में गाती हैं।
सजीव - व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो अबीदा परवीन ने रेडियो पाक़िस्तान के सीनियर प्रोड्युसर ग़ुलाम हुसैन शेख़ से शादी की, जिनका अबीदा जी के शुरुआती करीयर में एक गायिका के रूप में उभरने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। पुरस्कारों की बात करें तो अबीदा परवीन को १९८२ में 'प्राइड ऒफ़ परफ़ॊर्मैंस' का 'प्रेसिडेण्ट ऒफ़ पाक़िस्तान अवार्ड' मिला था। अभी कुछ वर्ष पहले २००५ में उन्हे 'सितारा-ए-इमतियाज़' के सम्मान से नवाज़ा गया था।
सुजॊय - वैसे तो अबीदा जी के असंख्य ऐल्बम बनें हैं, उनमें से कुछ के नाम हैं आपकी अबीदा, अरे लोगों तुम्हारा क्या, बेस्ट ऒफ़ अबीदा परवीन (१९९७), बाबा बुल्ले शाह, अबीदा परवीन सिंग्स् सॊंग्स् ऒफ़ दि मिस्टिक्स, अरीफ़ाना क़लाम, फ़ैज़ बाइ अबीदा, ग़ालिब बाइ अबीदा परवीन, ग़ज़ल का सफ़र, हर तरन्नुम, हीर बाइ अबीदा, हो जमालो, इश्क़ मस्ताना, जहान-ए-ख़ुसरो, कबीर बाइ अबीदा, काफ़ियाँ बुल्ले शाह, काफ़ियाँ ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद ख़ज़ाना, कुछ इस अदा से आज, लट्ठे दी चादर, मेरे दिल से, मेरी पसंद, रक़्स-ए-बिस्मिल, सरहदें, तेरा इश्क़ नचया, दि वेरी बेस्ट ऒफ़ अबीदा, यादगार ग़ज़लें, आदि। इन नामों से ही आप अंदाज़ा ल्गा सकते हैं कि अबीदा परवीन किन शैलियों में महारथ रखती हैं।
सजीव - अबीदा परवीन के बारे में अच्छी बातें हमने जान ली, और अब 'अमन की आशा' में आगे बढ़ते हुए दूसरा गीत रूप कुमार राठोड़ और देवकी पंडित की आवाज़ों में, यह एक आध्यात्मिक गीत है, दैवीय सुर गूंजते हैं इस भक्ति रचना में जिसके बोल हैं "अल्लाहू"। 'अमन की आशा' सूफ़ी संगीत को एक और ही मुक़ाम तक ले जाती है।

गीत - अल्लाहू


सजीव - अगला गीत है वडाली ब्रदर्स का गाया "याद पिया की आए"। ये दोनों भाई जब किसी महफ़िल में गाते हैं तो एक ऐसा समा बंध जाता है कि महफ़िल के ख़त्म होने तक श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हे सुनते हैं, और महफ़िल के समापन के बाद भी जिसका असर लम्बे समय तक बरक़रार रहता है। सुजॊय, इन दो भाइयों के बारे में कुछ बताना चाहोगे?
सुजॊय - ज़रूर! पूरनचंद वडाली और प्यारेलाल वडाली भी सूफ़ी गायक व संगीतज्ञ हैं जिनका ताल्लुख़ पंजाब के अमृतसर के गुरु की वडाली से है। वडाली ब्रदर्स सूफ़ी संतों के उपदेशों व विचारों को गीत-संगीत के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने वाले कलाकारो की पाँचवी पीढ़ी के सदस्य हैं। ये दो भाई एक ग़रीब परिवार से ताल्लुख़ रखते थे। बड़े भाई पूरनचंद २५ वर्ष के लम्बे समय तक कुश्ती के अखाड़े से जुड़े हुए थे। छोटा भाई प्यारेलाल अपने घर की अर्थिक स्थिति को थोड़ा बेहतर बनाने के लिए गाँव के रासलीला में श्री कृष्ण की भूमिक निभाया करते थे। भगवान के आशीर्वाद से दोनों भाइयों ने मिलकर आज जो मुक़ाम हासिल किया है, वह उल्लेखनीय है।
सजीव - जहाँ तक मैम्ने सुना है इनके पिता ठाकुर दास ने पूरनचंद को ज़बरदस्ती संगीत में धकेला जब कि उनकी दिलचस्पी अखाड़े में थी। ख़ैर, पूरनचंद ने पंडित दुर्गादास और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान से तालीम ली, जब कि प्यारेलाल को पूरनचंद ने ही संगीत सीखाया। आज भी प्यारेलाल अपने बड़े भाई को ही अपना गुरु और्व सर्वस्व मानते हैं। अपने गाँव के बाहर इन दो भाइयों ने अपना पहला पब्लिक परफ़ॊर्मैंस जलंधर के हरबल्लभ मंदिर में दिया था।
सुजॊय - पता है वडाली ब्रदर्स दरसल जलंधर में आयोजित हरबल्लभ संगीत सम्मेलन में भाग लेने के लिए ही गए थे, लेकिन उनके वेश-भूषा को देख कर उन्हे वहाँ गाने का मौका नहीं दिया गया। निराश होकर इन्होने तय किया कि वो हरबल्लभ मंदिर के बाहर ही अपना संगीत प्रस्तुत करेंगे। और इन्होने ऐसा ही किया। संयोगवश उस वक़्त वहाँ आकाशवाणी जलंधर के संगीत विभाग के एक सदस्य मौजूद थे जिनको उनकी गायकी अच्छी लगी और आकाशवाणी जलंधर में उनकी पहली रिकार्डिंग् हुई।
सजीव - वडाली ब्रदर्स के बारे में अभी और भी बहुत सी बातें हैं बताने को, लेकिन वो हम फिर किसी दिन बताएँगे। यहाँ पर बस यह बताते हुए कि वडाली ब्रदर्स काफ़ी, गुरबाणी, ग़ज़ल और भजन शैलियों में महारथ रखते है, आपको सुनवा रहे है 'अमन की आशा' ऐल्बम में उनका गाया "याद पिया की आए"।
सुजॊय - सजीव, "याद पिया की आए" उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब ने ठुमरी के अंदाज़ में गाया था। लेकिन वडाली ब्रदर्स के गाए इस वर्ज़न में तो उन्होने इसका नज़रिया ही बिल्कुल बदल के रख दिया है। चलिए सुनते हैं इस रूहानी रचना को।

गीत - याद पिया की आए


सजीव - "याद पिया की आए" की तरह एक और पारम्परिक रचना है "दमादम मस्त कलंदर, अली दम दम दे अंदर", जिसे हर दौर में अलग अलग फ़नकारों ने गाए हैं, जैसे कि नूरजहाँ, अबीदा परवीन, रूना लैला, नुसरत फ़तेह अली ख़ान और भी बहुत सारे। 'अमन की आशा' में इस क़व्वाली का जो संस्करण शामिल किया गया है उसे गाया है रफ़ाक़त अली ख़ान ने।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान पाक़िस्तान के अग्रणी गायक हैं जिनका ताल्लुख़ शाम चौरसी घराने से है। गायन के साथ साथ कई साज़ बजाने में वो माहिर हैं और अपने गीतों में पाश्चात्य साज़ों का भी वो ख़ूब इस्तेमाल करते हैं। तबला, ढोलक, हारमोनियम, इलेक्ट्रिक ड्रम और सीन्थेसाइज़र वो ख़ूब बजा लेते हैं। रफ़ाक़त साहब का जन्म लाहौर में हुअ था। संगीत उन्हे विरासत में ही मिली, पिता उस्ताद नज़ाक़त अली ख़ान, चाचा उस्ताद सलामत अली ख़ान, स्व: उस्ताद नौरत फ़तेह अली ख़ान और जवाहर वत्तल जानेमाने गायक हुए हैं।
सजीव - हाल की उनके दो ऐल्बम 'अल्लाह तेरा शुक्रिया' और 'मान' काफ़ी चर्चित रहे। रफ़ाक़त साहब के पसंदीदा फ़नकारों में लता मंगेशकर, किशोर कुमार, हरीहरन और शंकर महादेवन शामिल हैं।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान के बारे में एक और दिलचस्प बात यह कि वो जिम्नास्टिक्स में यूनिवर्सिटी व नैशनल चैम्पियन रह चुके हैं। तो आइए सुनते हैं यह मशहूर पारम्परिक उर्दू सूफ़ी क़लाम।

गीत - दमादम मस्त कलंदर


सजीव - और अब इस ऐल्बम का शीर्षक गीत पेश है शंकर महादेवन और राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ों में। गुलज़ार साहब के लिखे इस गीत को 'अमन की आशा' मिशन का ऐंथेम माना जा रहा है।
सुजॊय - "नज़र में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते, ये सुर बुलाते हैं जब तुम इधर नहीं आते"। २ मिनट का यह गीत दरअसल एक ऐंथेम की तरह ही है, सीधे सादे बोल लेकिन गहरा भाव छुपा हुआ है, शांति का प्रस्ताव भी है, अमन की आशा भी है। शंकर और राहत साहब के अपने अपने अनोखे अंदाज़ से इसमें एक जो कॊण्ट्रस्ट पैदा हुआ है, वही इसकी खासियत है।
सजीव - इस गीत को सुनने से पहले हम बस यही कहेंगे अपने पाठकों व श्रोताओं को कि यह ऐल्बम एक मास्टर पीस ऐल्बम है और अच्छे संगीत के क़द्रदान इसे ज़रूर ख़रीदें। यह उपलब्ध है टाइम्स म्युज़िक पर।
सुजॊय - सभी को एक बार फिर से होली की ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए हम अमन और शांति की आशा करते हैं।

नज़र में रहते हो (अमन की आशा)


"अमन की आशा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग *****
भाई अब जहाँ ऐसे ऐसे फनकार होंगें उस अल्बम की समीक्षा कोई क्या करे, अल्बम का हर गीत अपने आप में बेमिसाल है, खासकर आबिदा के कुछ जबरदस्त सूफी गीतों को इसमें स्थान दिया गया है. संगीत प्रेमियों के लिए अति आवश्यक है ये अल्बम, हर हाल में खरीदें सुनें.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २६- अभी हाल में वडाली ब्रदर्स ज़ी टीवी के किस कार्यक्रम में अतिथि बन कर पधारे थे?
TST ट्रिविया # २७ आबिदा की किस अल्बम पर पीटर मार्श ने टिपण्णी की थी कि वो शौपिंग लिस्ट भी गाकर श्रोताओं को रुलाने की कुव्वत रखती है ?
TST ट्रिविया # २८ अभी हाल ही में देविका पंडित की कौन सी अलबम बाजार में आई है


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी ने जबरदस्त वापसी की है सभी सवालों का सही जवाब देकर, बधाई

Sunday, February 1, 2009

फरहान और कोंकणा के सपनों से भरे नैना

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (10)
"सांवरिया" मोंटी से है उम्मीदें संगीत जगत को
१६ साल की उम्र में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के की -बोर्ड वादक के रूप में फ़िल्म "मिस्टर इंडिया" से अपने संगीत कैरियर की शुरुआत करने वाले मोंटी शर्मा आजकल एक टी वी चैनल पर नए गायक/गायिकाओं के हुनर की समीक्षा करते हुए दिखाई देते हैं. फ़िल्म "देवदास" में उन्होंने इस्माईल दरबार को सहयोग दिया था. इसी फ़िल्म के दौरान दरबार और निर्देशक संजय लीला बंसाली के रिश्ते बिगड़ गए, तो संजय ने मोंटी से फ़िल्म का थीम म्यूजिक बनवाया और बकायादा क्रडिट भी दिया. संजय की फ़िल्म "ब्लैक" के बाद मोंटी को अपना जलवा दिखने का भरपूर मौका मिला फ़िल्म "सांवरिया" से. इस फ़िल्म के बाद मोंटी ने इंडस्ट्री में अपने कदम जोरदार तरीके से जमा लिए. पिछले साल उनकी फ़िल्म "हीरो" का गीत हमारे टॉप ५० में स्थान बनने में सफल हुआ था. अभी हाल ही में फ़िल्म "चमकू" में अपने काम के लिए उन्हें कलाकार सम्मान के लिए नामांकन मिला है. मोंटी की आने वाली फिल्में हैं दीपक तिजोरी निर्देशित "फॉक्स", सुभाष घई की "राइट और रोंग", अनुज शर्मा की "नौटी अट फोर्टी", और इसके आलावा "आज फ़िर जीने की तम्मना है" और "खुदा हाफिज़" (जिसमें उनका संगीत सूफियाना होगा) जैसी कुछ लीक से हटकर फिल्में भी हैं. जावेद अख्तर के साथ उनका गठबंधन होगा फ़िल्म "मिर्च" में. तो कहने का तात्पर्य है कि मोंटी अब इंडस्ट्री के व्यस्तम संगीतकारों में से एक हैं, और संगीत प्रेमी उनसे कुछ अलग, कुछ ख़ास किस्म के संगीत की, यकीनन उम्मीद कर सकते हैं. उनके संगीत में शास्त्रीय वाध्यों और आधुनिक संगीत का सुंदर मिश्रण सुनने को मिलता है, रियलिटी शोस में आए प्रतिभागियों से भी वे बेहद संतुष्ट नज़र आए. उनका वादा है कि वो जल्दी ही इन नए गायकों को अपनी फिल्मों में मौका देंगें. हम तो यही उम्मीद करेंगें कि उनके संगीत के माध्यम से हमें कुछ और नए और युवा कलाकारों की आवाजें भी सुनने को मिले. शुभकामनायें मोंटी को.



अनु मालिक बिंदास हैं - कैलाश खेर

"अल्लाह के बन्दे" ये गीत आज भी सुनने में उतना ही तारो ताज़ा, उतना ही जादू भरा लगता है, जितना तब था जब कैलाश खेर नाम के इस युवा गायक ने इसे गाकर सुनने वालों के दिलों में अपनी स्थायी जगह बना ली थी. बहुत थोड़े समय में ही कैलाश ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया है. हाल ही में आई "दसविदानिया" से उनके दो गीत हमारे सालाना काउंट डाउन का हिस्सा बने थे, उनकी एल्बम "कैलाशा" भी खासी मशहूर हुई थी. अपने सूफियाना अंदाज़ से मंत्रमुग्ध करने वाले कैलाश सूफीवाद को एक रहस्य से भरा प्रेम मानते हैं जो आत्मा और परमात्मा का मिलन करवाता है. और अपनी आने वाली सूफी एल्बम को लेकर बहुत उत्साहित भी हैं, जिसके लिए हर बार की तरफ़ उन्होंने ख़ुद गीत रचे और संगीतबद्ध किए हैं. मोंटी की ही तरह वो भी एक अन्य चैनल में रियलिटी शो में समीक्षक हैं जहाँ उनके साथ हैं संगीतकार अनु मालिक, जिनके साथ अक्सर उनका वैचारिक मतभेद होते दर्शक देखते ही रहते हैं. अनु मालिक के बारे में पूछने पर कैलाश कहते हैं -"शुरू में मैं अनु मालिक को पसंद नही करता था यह सोचकर कि ये आदमी बहुत ज्यादा बोलता है. पर अब मुझे महसूस होता है कि वो एक बेहद गुणी संगीतकार हैं जो बहुत कम समय में धुन बनने में माहिर हैं, और इंसान भी दिलचस्प और बिंदास हैं.", अब हम क्या कहें कैलाश...आप ख़ुद समझदार हैं...


माइकल जैक्सन अब अधिक नही जी पायेंगें

पश्चिमी संगीत के महारथी कहे जाने वाले माइकल जेक्सन इन दिनों बुरी तरह बीमार हैं और यदि एक वेबसाइट की बात पर यकीन करें तो वो ५ या ६ महीनों से अधिक जीवित नही रह पायेंगें. अश्वेत समुदाय से आकर भी रंग भेदी अमेरिका वासियों के दिलो पर बरसों बरस राज करने वाले माइकल का जीवन विवादों से भरपूर रहा. पर उनका संगीत आज भी पाश्चात्य संगीत की रीड है. इस बेहद अमीर संगीतकार की इस बिगड़ती हालत से दुनिया भर में फैले उनके चाहने वाले उदास और दुखी हैं. उनके प्रशंसक भारत में भी कम नही. मुंबई में हुआ उनका मशहूर शो आज तक याद किया जाता है. आवाज़ उम्मीद करता है कि वो जल्दी ही स्वास्थलाभ करें और फ़िर से संगीत के क्षेत्र में सक्रिय काम करें.


सपनों से भरे नैना

पिछले सप्ताह से हम इस कड़ी में आपको सुनवा रहे हैं एक गीत जिसे "सप्ताह का गीत" चुना जाता है. आज सुनिए जावेद अख्तर साहब का लिखा एक बहुत ही खूबसूरत गीत. इस गीत के लाजवाब बोल ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है. फरहान अख्तर और कोंकणा सेन शर्मा की प्रमुख भूमिका वाली इस नई फ़िल्म का नाम है "लक बाई चांस". पर इस फ़िल्म में सबसे अधिक पसंद किया जा रहा है पुरानी जोड़ी ऋषि कपूर और डिम्पल कपाडिया का काम. जावेद अख्तर की बेटी जोया अख्तर ने इस फ़िल्म से निर्देशन की दुनिया में अपना सशक्त कदम रखा है. यूँ तो फ़िल्म में जावेद साहब के लिखे सभी गीत बहुत सुंदर हैं और शंकर एहसान लोय की तिकडी ने पिछली फ़िल्म "रॉक ऑन" से एकदम अलग किस्म का संगीत रचा है इस फ़िल्म के लिए. सुनिए "सपनों से भरे नैना...", और जावेद साहब के शब्दों में छुपे रहस्यों को महसूस कीजिये शंकर महादेवन की गहरी आवाज़ में.




Thursday, July 10, 2008

यादों के बदल छाए, उमड़ घुमड़ घिर आए....

दोस्तो,
हमें यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है, की हिंद युग्म के संगीत-सफर के सबसे पहले गायक सुबोध साठे (नागपुर) ने अपनी वेब साईट http://www.subodhsathe.com/ पर अपनी पहली मराठी एल्बम " मेघा दातले " का भव्य विमोचन किया है, जहाँ से आप इनके गीतों को डाउनलोड कर सकते हैं, साथ ही उन्होंने इसी एल्बम के एक गीत "ती जताना" का एक विडियो भी बनाया है जिसे आप यहाँ भी देख सकते हैं -



हमने की इसी बाबत सुबोध से बातचीत की, पेश है कुछ अंश -



Hind Yugm - Hi Subodh, finally a full marathi album, tell us what this "megha datle" is all about, the theme behind the album ?

'पहला सुर' में सुबोध के गीत
सुबह की ताज़गी
वो नर्म सी
झलक
Subodh - Yeah, finally! After starting all my compositions in Hindi, I thought I should do something in Marathi as well and started searching for meaningful poems. I found very tallented people through orkut who penned these songs for me (some of them on demand and some were already written) Lyricists are..Tushar Joshi, Renuka Khatavkar, Arun Nandan, Prasanna Shembekar, Kshipra and Shilpa Deshpande.

"Megh Datle, Aathvaninche..." in hindi, it means "Ghir aaye Badra....yadon ke"............ i think :)


All songs are composed and sung by me and music is arranged by my friend from Pune, Chaitanya Aadkar (who plays Keyboard with Sunidhi Chavan's group)

Hind Yugm - You made a video also, why you choose this perticular song for the video ?

Subodh - I think, this song relates to anyone or atleast it relates to me unknowingly, + lyrics and composition both are very close to my heart. This song is special!

Hind Yugm - How was the response ? What can we expect next, an Hindi album ?

Subodh - Response has been very very good, Thanks to all!! Haven't think about Hindi album (my 1st 3 albums are in Hindi only). But if I find meaningful lyrics will definitely do one Hindi album as well. I am going to launch my 2nd Marathi album in 2009.

Thank you Subodh, all the very best....Hind Yugm is eagly waiting to hear your first self composed song for Awaaz ( for the new season ) " khushmizaaz mitti ".

सुबोध को तलाश है अर्थपूर्ण गीतों की, जो भी गीतकार सुबोध के साथ जुड़ कर अपने गीत रचना चाहें संपर्क करें "subodh sathe" , पर.

हमने इस गीत ( ती जताना ), के गीतकार तुषार जोशी जी, जो कि हिंद युग्म के वरिष्ट कवियों में से एक हैं, उनसे भी पूछे कुछ सवाल, पेश है कुछ अंश -

हिंद युग्म - तुषार जी, सुबोध के साथ आपकी पहली मराठी एल्बम " मेघा दाटले " आ चुकी है, कैसा रहा ये अनुभव आपके लिए ?

तुषार जोशी - बड़ा ही सुखद अनुभव रहा। सुबोध ने गीत बडा़ ही दिल लगाकर गाया है। यूँ गीत में जान आ गई है। इसके पहले भी सुबोध ने मेरे कई हिन्दी और मराठी कविताओं को धुन देकर गाया है मगर इस गीत की बात ही कुछ और है क्योंकि ये गीत और गीतों के साथ अल्बम के रूप में प्रकाशित किया गया है।

हिद युग्म - आपका पहला हिन्दी गीत " भूल गए हो " हिंद युग्म पर आया था सुबोध का बनाया और गाया हुआ, जिसे बहुत अधिक सराहा गया था, आज की इस सफलता पर आप क्या श्रेय देना चाहेंगे हिंद युग्म को ?

तुषार जोशी - हिंद युग्म हमेशा से लोगों को जोडने का माध्यम रहा है। मुझे खुशी है कि हिन्दयुग्म के माध्यम से मेरी कविता और सुबोध ने गाया हुआ गीत लाखों लोगों तक पहुँचा। यूँ हिन्दयुग्म हमारे लिये सारी दुनिया के साथ जोडने वाला दरवाज़ा बन गया है।

हिंद युग्म - तुषार जी, अगला कदम क्या होगा, क्या हम उम्मीद करें की जल्द ही आपकी और सुबोध की जोड़ी एक हिन्दी एल्बम देगी, हिंद युग्म , आवाज़ के श्रोताओं के लिए ?

तुषार जोशी - ये खयाल मुझे पसंद आया। मै कहूँगा जरूर, क्यों नहीं?

हिंद युग्म आवाज़ की पूरी टीम की तरफ़ से सुबोध और तुषार जी को बधाइयाँ और शुभकामनाएं आने वाली समस्त योजनाओं के लिए.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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