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रविवार, 15 नवंबर 2020

राग काफी : SWARGOSHTHI – 488 : RAG KAFI

 


आपको दीपोत्सव पर हार्दिक मंगलकामना 

संगीतकार रोशन की पुण्यतिथि (16 नवम्बर) पर विशेष  
   




स्वरगोष्ठी – 488 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 4 : संगीतकार रोशन 

राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "बावरे नैन" के गीतों को रोशन ने संगीतबद्ध किया था। 





विदुषी मालिनी राजुरकर 

संगीतकार रोशन 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की चौथी कड़ी में हम 1950 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "बावरे नैन” से राग काफी पर आधारित एक गीत; "ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” यह एक युगल गीत है, जिसका संगीत रोशन ने और मुकेश व गीता दत्त ने स्वर दिया है। कल 16 नवम्बर को संगीतकार रोशन की पुण्यतिथि है। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उन्हीं का गीत समर्पित कर रहे हैं। राग काफी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग काफी में निबद्ध एक तराना रचना को सुविख्यात संगीत विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 




"बावरे नैन" में राज कपूर 

राज कपूर की प्रारम्भिक दौर की फिल्मों के संगीतकारों पर केन्द्रित हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” श्रृंखला में हम राज कपूर की फिल्म यात्रा के आरम्भिक एक दशक के उन संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके संगीत ने फिल्म इतिहास के कई पृष्ठों को रेखांकित किया है। राज कपूर के अभिनय में सहज रूप से हँसने और उतने ही सहज रूप में रोने की अद्भुत क्षमता थी। सम्भवतः इसी गुण के कारण उन्हें “भारत का चार्ली चैपलिन” कहा गया था। राज कपूर को प्रेम ने हँसने और रोने की क्षमता दी, तो स्वतन्त्रता के बाद तेजी से बदलते भारतीय मूल्यों ने हँसते हुए रोना और रोते हुए हँसना सिखा दिया। “आग” से लेकर “जिस देश में गंगा बहती है” तक राज कपूर की फिल्मों में प्रेम के स्थायी भाव के साथ देश की विसंगतियों पर दर्शकों ने आँसू के भाव को स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। परदे पर राज कपूर द्वारा गाये अधिकतर दर्द भरे गीतों में स्वर मुकेश के हैं। आज हम आपसे राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म ‘बावरे नैन’ के गीतों पर चर्चा करेंगे, जिसे रोशन ने संगीतबद्ध किया था। 

पाँचवें दशक के अन्त अर्थात 1949 में भारतीय फिल्म जगत में एक ऐसे संगीतकार का उदय हुआ, जो लखनऊ के मैरिस कालेज (वर्तमान में; भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से शास्त्रीय संगीत विधिवत प्रशिक्षित, मैहर के उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से गुरु शिष्य परम्परा में सारंगी वादन की शिक्षा प्राप्त और बारह वर्षों तक आकाशवाणी में संगीतकार के रूप में कार्य करने का अनुभव लेकर आए थे। फिल्म संगीत में नया रंग भरने वाले उस संगीतकार को हम रोशन के नाम से जानते हैं। मुम्बई में रोशन को पहला अवसर देने वाले फिल्मकार थे केदार शर्मा, जिन्होंने अपनी फिल्म “नेकी और बदी” में उन्हें संगीत निर्देशन के लिए अनुबन्धित किया। दुर्भाग्य से यह फिल्म चली नहीं और रोशन का बेहतर संगीत भी अनसुना रह गया। रोशन स्वभाव से अन्तर्मुखी थे। पहली फिल्म “नेकी और बदी” की असफलता से रोशन चिन्तित रहा करते थे, तभी केदार शर्मा ने अपनी अगली फिल्म “बावरे नैन” के संगीत का दायित्व उन्हें सौंपा। इस फिल्म के नायक राज कपूर थे। रोशन ने राज कपूर की अभिनय शैली और फिल्म में उनके चरित्र का सूक्ष्म अध्ययन किया और उसी के अनुकूल गीतों की धुनें बनाई। इस बार फिल्म भी हिट हुई और रोशन का संगीत भी। आज भी “बावरे नैन” एक बड़ी संगीतमय फिल्म के रूप में याद की जाती है। कल रोशन की पुण्यतिथि है। हम उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए उनका ही एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 

फिल्म “बावरे नैन” के नायक राज कपूर के लिए रोशन ने मुकेश की आवाज़ को प्राथमिकता दी। राजकपूर और मुकेश एक ही गुरु से संगीत सीखा करते थे, जबकि मुकेश और रोशन स्कूल के सहपाठी थे। फिल्म “बावरे नैन” में ये तीनों मित्र एकत्र हुए थे। परिणामस्वरूप फिल्म का गीत, संगीत उत्कृष्ट स्तर का बन गया। इस फिल्म में मुकेश और गीता दत्त का गाया युगल गीत; “ख़यालों में किसी के इस तरह...”, मुकेश और राजकुमारी का गाया; “मुझे सच सच बता दो...”, राजकुमारी के स्वरों में गाये गए अन्य एकल गीत अपने समय के लोकप्रिय गीतों में थे। परन्तु जो लोकप्रियता राज कपूर पर फिल्माए गए गीत; “तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं वापस बुला ले...” को मिली वह ऐतिहासिक थी। मुकेश के गाये इस गीत ने तहलका मचा दिया। इस गीत की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि लगभग तीन दशक बाद एच.एम.वी. ने अपने “बेस्ट ऑफ मुकेश” संग्रह में इस गीत को स्थान दिया। इसी प्रकार फिल्म के एक अन्य युगल गीत; “ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” ने भी लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया। आइए, यही गीत अब हम सब सुनते हैं, जिसे मुकेश और गीता दत्त ने गाया है। गीतकार हैं, केदार शर्मा और संगीतकार हैं रोशन। फिल्म “बावरे नैन” के इस गीत को सुनवाने का अनुरोध हमें “स्वरगोष्ठी” के अनेक पाठकों ने किया है। आइए सुनते हैं, राज कपूर के फिल्मी सफर का एक उल्लेखनीय गीत। 

राग काफी : “ख़यालों में किसी के इस तरह...” : मुकेश और गीता दत्त : संगीत – रोशन 


हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है; काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। पहले हम राग काफी के स्वरों की संरचना पर विचार करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा, रे, ग(कोमल), म, प, ध, नि(कोमल), सां, तथा अवरोह में सां नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर दीपोत्सव के अवसर पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए। आप यह तराना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग काफी : द्रुत तीनताल में निबद्ध तराना : स्वर – विदुषी मालिनी राजुरकर 





संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 488वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ठीक सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल गायक और गायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 21 नवम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 490 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 486वें अंक में हमने आपको 1949 में प्रदर्शित फिल्म "सुनहरे दिन” से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की चौथी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "बावरे नैन” के एक गीत का रसास्वादन और गीत और संगीतकार का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग काफी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय तराना का गायन प्रस्तुत किया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग काफी : SWARGOSHTHI – 488 : RAG KAFI : 15 नवम्बर, 2020 



रविवार, 4 सितंबर 2016

गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 282 : GAUD MALHAR




स्वरगोष्ठी – 282 में आज

पावस ऋतु के राग – 3 : मिलन की आतुरता और गौड़ मल्हार

“गरजत बरसत भीजत आई लो...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। इस राग के गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु में उपजने वाले भावों का सृजन करते हैं। आज की कड़ी में हम आपको पहले 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ का एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है और इसे संगीतकार रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोया है। इसके साथ ही राग का वास्तविक स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में राग गौड़ मल्हार में प्रस्तुत एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं।


लता मंगेशकर
ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की एक परम्परागत बन्दिश का चुनाव किया। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। आइए अब हम आपको हम फिल्म ‘मल्हार का गीत सुनवाते है। लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का गीत सुनिए, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को मूल बन्दिश के निकट ला दिया।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार



मालिनी राजुरकर
राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो अधिकतर इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे। राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक पण्डित मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 282वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में कण्ठ-स्वर को पहचानिए और हमे इस गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 10 सितम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 284वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 280 की संगीत पहेली में हमने आपको 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मियाँ की मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- स्वर – सुरेश वाडकर

इस बार की पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। पहेली का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया और अमेरिका से विजया राजकोटिया। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ जारी है। आज के अंक में आपने राग गौड़ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के अगले अंक में हम पावस ऋतु के एक अन्य राग का परिचय प्राप्त करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव हमे भेज सकते हैं। श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रविवार, 17 जनवरी 2016

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 253 : RAG KAMOD





स्वरगोष्ठी – 253 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 1 : राग कामोद

‘ए री जाने न दूँगी...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर नये वर्ष की पहली श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की आज से शुरुआत हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा करेंगे, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम राग कामोद के स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं। राग कामोद में पहले हम पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल स्वरों में एक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद इसी बन्दिश के फिल्मी प्रयोग का एक उदाहरण लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवाएँगे।


कल्याणहिं के थाट में दोनों मध्यम लाय,
प-रि वादी-संवादि कर, तब कामोद सुहाय।

राजन और साजन मिश्र
संगीत के विद्यार्थियों को राग के ढाँचे का परिचय देने के उद्देश्य से उपरोक्त दोहे का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही राग के स्वरों की जानकारी ‘लक्षण गीत’ के माध्यम से भी दी जाती है। इस श्रृंखला और आज के अंक में हम आपसे दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक प्राचीन ग्रन्थकारों के आधार पर बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘एरी जाने न दूँगी...’। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है।


राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 



सी. रामचन्द्र के साथ रोशन और लता
श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। इन रागो की चर्चा हम इसी श्रृंखला के आगामी अंकों में करेंगे। ऊपर आपने राग कामोद की जो बन्दिश सुनी है, उस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने भी साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 253वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्म संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 255वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 251वें अंक में हमने संगीत पहेली को विराम दिया था, अतः इस अंक का कोई भी परिणाम और विजेता नहीं है। 252वें अंक की पहेली का परिणाम और विजेताओं की सूची हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से आरम्भ श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का यह पहला अंक था, जिसमें आप राग कामोद की चर्चा के सहभागी थे। इससे पहले 251 और 252वें अंकों में आप बीते वर्ष के सिंहावलोकन अंकों के साक्षी बने। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारी एक नियमित पाठक और श्रोता तथा वर्ष 2015 की पहेली की एक महाविजेता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया ने निम्नलिखित विचार व्यक्त किया है – 
‘I want to take this opportunity to express my gratitude to you and all those who worked with you for making "Swargoshthi" a wonderful base for all music lovers, classical, light or film music where they can listen to music, read about the life-sketch of different artists, expand their awareness of music to be able to appreciate and enjoy the divinity felt as a result. I am also very impressed by the Shrunkhala and Paheli which I look forward to every week and try and participate as much as possible.Today, it gives me such joy to win the music quiz and I am speechless to describe how it touches my heart. I think this is very important to make our thinking and feelings so engrossed in music which will enable us to increase our knowledge. With regards, Vijaya Rajkotia.
आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




रविवार, 6 सितंबर 2015

राग भीमपलासी और पीलू : SWARGOSHTHI – 234 : RAG BHIMPALASI & PILU



स्वरगोष्ठी – 234 में आज 

रागों का समय प्रबन्धन – 3 : दिन के तीसरे प्रहर के राग 

राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।  उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के तृतीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के राग पीलू की एक ठुमरी सुविख्यात गायिका गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया राग भीमपलासी पर आधारित, फिल्म ‘बावरे नैन’ का एक गीत गायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। 


भारतीय संगीत के प्राचीन विद्वानों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले रस व भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। उन्होने राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। पिछले अंक में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वरसिद्धान्त’ पर चर्चा की थी, जिसके अन्तर्गत राग के मध्यम स्वर से रागों के पूर्वार्द्ध या उत्तरार्द्ध समय का निर्धारण किया गया है। आज के अंक में हम वादी और संवादी स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण के सिद्धान्त पर चर्चा कर रहे हैं। जिस प्रकार चौबीस घण्टे की अवधि को दो भागों, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, में बाँट कर रागों के समय निर्धारण कर सकते हैं, उसी प्रकार सप्तक के भी दो भाग, उत्तरांग और पूर्वांग, में विभाजित कर रागों का समय निर्धारित किया जाता है। संख्या की दृष्टि से सप्तक के प्रथम चार स्वर, अर्थात षडज, ऋषभ, गान्धार और मध्यम पूर्वांग तथा पंचम, धैवत, निषाद और अगले सप्तक का षडज मिल कर उत्तरांग कहलाते हैं। शास्त्रकारों ने यह नियम बनाया कि जिन रागों का वादी स्वर पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर है उस राग को दिन के पूर्वार्द्ध में अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच तथा जिन रागों का वादी स्वर उत्तरांग के स्वरों में से कोई एक स्वर हो तो उसे दिन के उत्तरार्द्ध में अर्थात मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जा सकता है। इस नियम की रचना से कुछ राग अपवाद रह गए। उदाहरण के रूप में राग भीमपलासी का उल्लेख किया जा सकता है। इस राग में वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। उपरोक्त नियम से राग का वादी और संवादी सप्तक के पूर्वांग में आ जाता है। राग का एक प्रमुख नियम है कि अगर वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में होगा तो संवादी स्वर उत्तरांग में और यदि वादी स्वर उत्तरांग में होगा तो संवादी स्वर पूर्वांग में होना चाहिए। इस दृष्टि से राग भीमपलासी और भैरव उपरोक्त नियम के प्रतिकूल हैं। इस नियम के अनुसार भीमपलासी के समान भैरवी भी पूर्वांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु भैरवी प्रातःकालीन राग है। इन अपवादों के चलते उपरोक्त नियम में संशोधन किया गया। संशोधन के अनुसार सप्तक के दोनों अंगों का दायरा बढ़ा दिया गया, अर्थात सप्तक के पूर्वांग में षडज से पंचम तक के स्वर और उत्तरांग में मध्यम से तार सप्तक के षडज तक के स्वर हो सकते हैं। इस नियम के अनुसार राग का वादी स्वर यदि सप्तक के पूर्वांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के पूर्व अंग में होगा और यदि वादी स्वर उत्तरांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के ऊतर अंग में किया जाएगा।

आज हम आपसे दिन के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न 12 से अपराह्न 3 बजे के बीच का समय। इस प्रहर के रागों का का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग के स्वर, अर्थात षडज से पंचम स्वर में से कोई एक स्वर होता है। इस प्रहर का एक बेहद लोकप्रिय राग पीलू है। राग पीलू में उपशास्त्रीय रचनाएँ खूब निखरती हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक ठुमरी विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में सुनवाते हैं। पीलू काफी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप, शुद्ध और कोमल प्रयोग किये जाते हैं। अब आप राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’ सुनिए, जिसे विदुषी गिरिजा देवी ने गाया है।


राग पीलू ठुमरी : “पपीहरा पी की बोल न बोल...” : विदुषी गिरिजा देवी




राग पीलू के अलावा दिन के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- धनाश्री, पटमंजरी, प्रदीपकी या पटदीपकी, भीमपलासी, मधुवन्ती, हंसकंकणी, हंसमंजरी आदि। अब हम आपको दिन के तीसरे प्रहर के एक और राग, भीमपलासी का रसास्वादन कराते हैं। राग भीमपलासी भी काफी थाट का राग है। इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। राग में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग होता है, शेष सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आइए, भक्त कवयित्री मीरा का एक पद अब राग भीमपलासी पर आधारित सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इस भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। श्रृंखला के पिछले अंक में आपने यही पद राग तोड़ी में सुना था। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण राग भीमपलासी के स्वरों में सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म – नौबहार





संगीत पहेली - 234


‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 60 के दशक की फिल्म का राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।

1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश मे गायक और गायिका के युगल स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 12 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 236वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपसे फिल्म ‘मीरा’ से मीराबाई के एक पद का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका वाणी जयराम। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

‘स्वरगोष्ठी’ की इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (पहेली क्रमांक 221 से 230 तक) के विजेताओं के प्राप्तांकों की गणना के जा चुकी है। प्राप्तांक के अनुसार प्रथम और द्वितीय स्थान पर दो-दो प्रतिभागी हैं। 20-20 अंक के साथ पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। दूसरे स्थान पर वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी हैं। इन दोनों प्रतिभागियों को 18-18 अंक प्राप्त हुए हैं। तीसरे स्थान पर 4 अंक के साथ रायपुर, छत्तीसगढ़ की राजश्री श्रीवास्तव रहीं। इन सभी पाँच प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह तीसरा अंक था। अगले अंक में हम दिन के चौथे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



शनिवार, 31 जनवरी 2015

"महलों का राजा मिला..." - इस गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि दी रोशन साहब की पत्नी ने उन्हें



एक गीत सौ कहानियाँ - 51
 

महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 51वीं कड़ी में आज जानिए फ़िल्म 'अनोखी रात' के मशहूर गीत "महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। 



हिन्दी फ़िल्म संगीत जगत में कई संगीतकार ऐसे हुए हैं जो अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बावजूद बहुत ज़्यादा अन्डर-रेटेड रहे। एक से एक बेहतरीन रचना देने के बावजूद इंडस्ट्री और पब्लिक ने उनकी तरफ़ उतना ध्यान नहीं दिया जितना कुछ गिने-चुने और "सफल" संगीतकारों की तरफ़ दिया करते थे। ऐसे एक अन्डर-रेटेड संगीतकार थे रोशन। 40 के दशक में रोशन साहब की प्रतिभा और कला से प्रभावित होकर निर्माता-निर्देशक और संगीतकार ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर, जो बाद में देश-विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये थे, उन्होंने रोशन को All India Radio Delhi में नौकरी दिलवा दी बतौर इन्स्ट्रूमेण्टलिस्ट। और वहीं रोशन साहब की मुलाक़ात हुई कलकत्ता की इरा मोइत्रा से। इरा जी उनके साथ ही काम करने लगीं। दोनों ही कला और संगीत के प्रेमी थे। ऐसे में दोनो का एक दूसरे के निकट आना, प्रेम का पुष्प खिलना बहुत ही प्राकृतिक और सामान्य बात थी। रोशन और इरा के बीच प्यार हो गया और दोनो ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद रोशन साहब मुम्बई (तब बम्बई) आ गये और ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के साथ म्युज़िक ऐसिस्टैन्ट के रूप में काम करने लगे। एक लम्बे संघर्ष और कई चुनौतियों को पार करने के बाद उन्हें स्वतंत्र फ़िल्में मिलने लगी। जिन फ़िल्मों में संगीत देकर उन्होंने हिन्दी फ़िल्म संगीत संसार में अपने नाम की छाप छोड़ दी, वो फ़िल्में थीं 'बावरे नैन', 'बरसात की रात', 'आरती', 'ताज महल', 'ममता', 'बहू बेग़म', 'दिल ही तो है', 'दूज का चाँद', 'चित्रलेखा', 'भीगी रात', 'देवर' और 'अनोखी रात'। रोशन ने लगभग 94 फ़िल्मों में स्वतंत्र रूप से संगीत दिया और उसके अलावा भी कई ऐसी फ़िल्में की जिनमें उन्होंने दो या तीन गीतों का संगीत तैयार किया जब कि उन फ़िल्मों में कोई और मुख्य संगीतकार थे।


रोशन दम्पति
1968 में रोशन साहब जब 'अनोखी रात' फ़िल्म का संगीत बना रहे थे, उसी दौरान उनकी तबीयत नासाज़ हो गई। हार्ट की प्रॉबलेम हो गई थी। फिर भी उन्होंने ऐसी हालत में भी 'अनोखी रात के लगभग सभी गीत रेकॉर्ड कर लिये, पर एक गाना रेकॉर्ड होना अभी बाक़ी था। और दुर्भाग्यवश दिल का दौरा पड़ने से रोशन साहब चले गये 16 नवम्बर के दिन। उनके इस आकस्मिक निधन से इस फ़िल्म का संगीत अधूरा ही रह गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कुछ समय बाद 'अनोखी रात' फ़िल्म के निर्देशक असित सेन ने यह फ़ैसला किया वो बचा हुआ जो एक गीत है इस फ़िल्म का, उसे सलिल चौधरी से कम्पोज़ और रेकॉर्ड करवायेंगे। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि किसी किसी जगह इस बात का उल्लेख है कि 'अनोखी रात' फ़िल्म के इस अन्तिम गीत को रोशन साहब के गुज़र जाने के बाद उनके मुख्य सहायक श्याम राज और सोनिक (संगीतकार जोड़ी सोनिक-ओमी के) ने रेकॉर्ड करवाया था। पर शायद यह सच्चाई नहीं है। तो साहब, जब रोशन साहब की पत्नी इरा जी को इस बात का पता चला कि असित दा सलिल दा से वह आख़िरी गाना बनवाना चाह रहे हैं, तो उनके मन में कुछ और ही बात चल रही थी।   वो उस मातम के दौर में भी असित सेन के पास गईं और उनसे कहा कि फ़िल्म का यह जो एक बचा हुआ गाना है, उसे वो अपनी देख रेख में रेकॉर्ड करवाना चाहती हैं। यह गीत एक श्रद्धांजलि होगी एक वियोगी पत्नी की अपने स्वर्गीय पति के लिए। यह सुन कर असित सेन चौंक उठे। उन्हें यह तो मालूम था कि इरा जी एक गायिका हैं, पर इसका ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो इस तरह का संगीत संयोजन और पूरे रेकॉर्डिंग का संचालन कर कर पायेंगी। उन्होंने इरा जी से पूछा कि आप ये सब कुछ कर पायेंगी? जवाब था "हाँ"। और तब दादा असित सेन ने इरा जी की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस बचे हुए गीत की रेकॉर्डिंग की ज़िम्मेदारी उनको दे दी।


राजेश रोशन
"महलों का राजा मिला, हमारी बेटी राज करेगी, ख़ुशी ख़ुशी कर दो विदा, हमारी बेटी राज करेगी...", यह था वह गीत। गीत की धुन रोशन साहब ने पहले से ही तैयार की हुई थी। इरा जी ने पूरे गाने को अरेंज करके, इस धुन को फ़ाइन ट्यून करके, रेकॉर्ड करवाया, और इस तरह से यह मास्टरपीस कम्पोज़िशन बनी एक श्रद्धांजलि, एक वियोगी पत्नी की तरफ़ से अपने स्वर्गवासी पति के लिए। और क्या लिखा है कैफ़ी साहब ने कि गीत सुनते ही आँखें भर आती हैं! और सिचुएशन भी क्या थी, मुसाफ़िरों का एक दल एक रात के लिए एक रेस्ट-हाउस में आसरा लेता है। एक व्यापारी पिता (तरुन बोस) और उनकी पुत्री (ज़हिदा) उस दल का हिस्सा हैं। यह सामने आता है कि पिता अपनी पुत्री का किसी से विवाह करवाना चाहते हैं पर पुत्री इस रिश्ते से ख़ुश नहीं हैं। तभी बारिश शुरू होती है और एक डाकू (संजीव कुमार) भी उसी बिल्डिंग में शरण लेने घुस आते हैं। वो उस लड़की की तरफ़ जब एक दृष्टि से देखने लगता है तो लड़की इसका कारण पूछती है। और वो कहता है कि उनकी शक्ल बिल्कुल उसके स्वर्गवासी पत्नी से मिलती है, और इस तरह से अपनी पूरी कहानी बताता है। इस गीत में दर्द है एक बेटी का। पर आश्चर्य की बात है कि इसी धुन का इस्तेमाल रोशन साहब के बेटे और अगले दौर के संगीतकार राजेश रोशन ने फ़िल्म 'ख़ुदगर्ज़' में किया और बना डाला एक ख़ुशी का गीत। शत्रुघ्न सिन्हा और अमिता सिंह पर फ़िल्माया हुआ तथा नितिन मुकेश व साधना सरगम का गाया वह गीत था "यहीं कहीं जियरा हमार, ए गोरिया गुम होई गवा रे..."। यह गीत भी अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। राजेश रोशन ने कई बार दूसरों की धुनों से प्रेरित होकर अपने गीत बनाये हैं और उन पर धुन चुराने के आरोप भी जनता ने लगाये हैं, पर इस गीत के लिए यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने पिता की धुन का सहारा लिया है। क्या पिता की सम्पत्ति पुत्र की सम्पत्ति नहीं है? क्या इसे भी चोरी ही कहेंगे आप?

फिल्म - अनोखी रात : 'महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...' : लता मंगेशकर : संगीत - रोशन : गीत - कैफी आज़मी



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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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