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Saturday, March 10, 2018

चित्रकथा - 59: शम्मी आंटी को श्रद्धांजलि उनके संघर्ष की कहानी के साथ

अंक - 59

शम्मी आंटी को श्रद्धांजलि


"प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम..."




24 April 1929 – 6 March 2018


6 मार्च 2018 को जानीमानी अभिनेत्री शम्मी (शम्मी आंटी) का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एक सशक्त अभिनेत्री, एक मिलनसार इंसान, और एक ख़ूबसूरत सितारा, यानी कि शम्मी आंटी। जी हाँ, प्यार से लोग उनके नाम के साथ "आंटी" लगाते हैं। शम्मी आंटी ने शुरुआत बतौर फ़िल्म नायिका की थीं, फिर आगे चल कर चरित्र अभिनेत्री और फिर टेलीविज़न के परदे पर भी ख़ूब लोकप्रियता हासिल की। अधिकतर कलाकारों का संघर्ष जहाँ उनके अरिअर के शुरुआती समय में होता है, वहाँ शम्मी जी का संघर्ष उस समय शुरु हुआ जब वो अपने करिअर के शीर्ष पर थीं। ऐसा क्यों? यही हम जानने की कोशिश करेंगे आज के ’चित्रकथा’ के इस अंक में। तो आइए पढ़ें शम्मी आंटी के संघर्ष की कहानी। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है अभिनेत्री शम्मी (आंटी) की पुण्य स्मृति को!






म्मी आंटी का असली नाम था नरगिस रबाड़ी। मात्र तीन वर्ष की आयु में पिता को खोने के बाद, उनकी माँ ने धार्मिक कार्यक्रमों में खाना बनाने का काम कर के नरगिस और उनकी बहन मणि की परवरिश की। 13 वर्ष की आयु में अपनी माँ का हाथ बंटाने के लिए नरगिस ने दवाई के कारखाने में दवाई पैकिंग् करने की नौकरी कर ली जिसके लिए उन्हें 100 रुपये मासिक वेतन मिलते थे। फ़िल्मों में उनका आना अचानक ही हुआ। उनके पारिवारिक मित्र चिनू मामा फ़िल्मकार महबूब ख़ान के साथ काम कर रहे थे और अभिनेता-निर्माता शेख मु्ख्तार से भी उनकी अच्छी जान पहचान थी। उन्हीं दिनों शेख़ मुख्तार अपनी अगली फ़िल्म के लिए दूसरी नायिका की तलाश कर रहे थे जिसमें पहली नायिका के रूप में बेगम पारा का चयन हो चुका था। जब चिनू मामा ने नरगिस रबाड़ी को यह बात बताई तो वो अपनी क़िस्म्त आज़माने के लिए तैयार हो गईं। स्क्रीन टेस्ट में पास भी हो गईं लेकिन एक शर्त पर कि वो अपना नाम बदल लेंगी क्योंकि नरगिस के नाम से एक सफल अभिनेत्री इंडस्ट्री में मौजूद हैं। इस तरह से फ़िल्म के निर्देशक तारा हरिश ने उनका नाम रख दिया "शम्मी" और यह फ़िल्म थी ’उस्ताद पेड्रो’ जो 1949 में बन कर प्रद्रशित हुई। 18 वर्ष की आयु में फ़िल्म साइन कर यह फ़िल्म उनके 20 वर्ष की आयु में प्रदर्शित हुई। बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म कामयाब सिद्ध हुई। तारा हरिश गायक मुकेश द्वारा निर्मित फ़िल्म ’मल्हार’ भी निर्देशित कर रहे थे। इस फ़िल्म में उन्होंने शम्मी को बतौर मुख्य नायिका चुना। ’मल्हार’ के सुमधुर हिट गीतों ने शम्मी को स्टार का दर्जा दिलवा दिया। शम्मी की तीसरी फ़िल्म आई 1952 में - ’संगदिल’। दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ किया हुआ यह फ़िल्म ख़ास नहीं चली। लेकिन के. आसिफ़ की हिट फ़िल्म ’मुसाफ़िरख़ाना’ की सफलता के बाद शम्मी को एक के बाद एक फ़िल्मों के ऑफ़र आते चले गए। शम्मी की ख़ास बात यह थी कि उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उन्हें नायिका के ही रोल चाहिए। नायिका, दूसरी नायिका, खलनायिका, हास्य और अन्य चरित्र भूमिकाओं में लगातार फ़िल्में करती चली गईं। 1970 तक उनके अभिनय से सजी महत्वपूर्ण फ़िल्में रहीं ’इलज़ाम’, ’पहली झलक’, ’बंदिश’, ’आज़ाद’, ’हलाकू’, ’सन ऑफ़ सिन्दबाद’, ’राज तुलक’, ’ख़ज़ांची’, ’घर संसार’, ’आख़िरी दाव’, ’कंगन’, ’भाई-बहन’, ’दिल अपना और प्रीत पराई’, ’हाफ़ टिकट’, ’इशारा’, ’जब जब फूल खिले’, ’प्रीत न जाने रीत’, ’आमने सामने’, ’उपकार’, ’इत्तेफ़ाक़’, ’साजन’, ’डोली’, ’राजा साब’ और ’दि ट्रेन’ प्रमुख।

70 के दशक के आते आते अब वो 40 वर्ष की आयु की हो चुकी थीं। लगातार काम करते हुए उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति काफ़ी मज़बूत बना ली थी और उन्होंने अब शादी करके घर-परिवार बसाने का निर्णय लिया। इसी दौरान उनकी मित्रता एक आकांक्षी निर्देशक सुल्तान अहमद से हुई, जो फ़िल्म जगत में स्थापित होने के लिए उन दिनों संघर्षरत थे। शम्मी की फ़िल्म जगत में उस समय काफ़ी जान-पहचान थी, उन्हें लोग इज़्ज़त करते थे। इस वजह से सुल्तान अहमद को इंडस्ट्री में काम दिलाने में शम्मी जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ’प्यार का रिश्ता’ (’73), 'हीरा’ (’73), ’गंगा की सौगंध’ ('78) जैसी फ़िल्मों में सुल्तान अहमद को दाख़िला शम्मी जी की वजह से ही मिली थी। शम्मी जी के ज़रिए राजेश खन्ना, सुनिल दत्त और आशा पारेख जैसे नामी अभिनेता सुल्तान अहमद की फ़िल्मों में काम करने के लिए राज़ी हो गए क्योंकि ये सभी शम्मी जी को पहचानते थे और उनकी इज़्ज़त करते थे। शम्मी और सुल्तान अहमद भी एक दूसरे के क़रीब आने लगे और दोनों ने शादी कर ली। शम्मी ने फिर सुल्तान अहमद की फ़िल्मों के बाहर अभिनय करना भी बन्द कर दिया और परिवार की तरफ़ ध्यान देने लगीं। शादी के सात साल बाद भी शम्मी माँ नहीं बन सकीं। दो बार उनका गर्भपात हो गया। इसी दौरान शम्मी और सुल्तान अहमद ने एक घर ख़रीदने का निर्णय लिया। हालाँकि सुल्तान अहमद ने यह मकान शम्मी जी के नाम से ही ख़रीदना चाहा, पर शम्मी जी ने यह कहा कि इसे उनकी ननंद के नाम ख़रीदना चाहिए क्योंकि उनकी ननंद के पास न कोई नौकरी थी और न कोई सहारा। कोई औरत अपने पैसों से ख़रीदा हुआ घर अपनी ननंद के नाम कर दे, ऐसा आज तक किसे ने सुना है कहीं!! ऐसी थीं शम्मी जी। उधर सुल्तान अहमद के भाई का परिवार भी उनके साथ ही रहता था। क्योंकि भाई की पत्नी अशिक्षित थीं, इसलिए शम्मी जी उनके बच्चे का ख़याल रखती थीं और उन्होंने उस बच्चे का दाख़िला शिमला के एक अच्छे स्कूल में करवाया। इस तरह से शम्मी जी ने उस परिवार की निस्वार्थ सेवा की और अपना पूरा अर्थ परिवार के लिए लगा दिया।

शम्मी जी की सुल्तान अहमद को फ़िल्म जगत में स्थापित करने की मदद तथा उनके परिवार के लिए किया गया निस्वार्थ त्याग और सेवा का मूल्य सुल्तान अहमद ने चुकाया उन्हें तलाक़ देकर। सुल्तान अहमद का एक दूसरी औरत से संबंध स्थापित हुआ जिस वजह से शम्मी जी के साथ उनके रिश्ते में दरार पड़ गई। अपने आत्मसम्मान को बरक़रार रखते हुए शम्मी जी 1980 में एक दिन अपना घर, अपना पैसा, अपनी गाड़ी, अपना परिवार, सब कुछ छोड़ कर अपनी माँ के पास अपने पुराने घर में चली गईं। इस घटना की वजह से सुल्तान अहमद पर फ़िल्म जगत की कई बड़ी हस्तियाँ नाराज़ हुईं जिनमें नरगिस और सुनिल दत्त शामिल थे। अब शम्मी जी के लिए फ़िल्म जगत में दूसरी पारी शुरु करने की बारी थी अपने आप को दुबारा अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए। फ़िल्म जगत में लोग उनकी इज़्ज़त करते थे, सुनिल दत्त के सहयोग से आठ दिनों के अन्दर उन्हें 'The Burning Train' में एक रोल दिलवाया। राजेश खन्ना ने भी ’रेड रोज़’, ’आँचल’, ’कुदरत’, ’आवारा बाप’ और ’स्वर्ग’ जैसी फ़िल्मों में उन्हें रोल दिलवाये जिस वजह से वो एक बार फिर से सबकी नज़र में आ गईं और फिर एक बार उनकी गाड़ी चल पड़ी। इस सफलता को देखते हुए शम्मी जी ने ’पिघलता आसमान’ नामक एक फ़िल्म बनाने की सोची। राजेश खन्ना नायक थे और उन्हीं के ज़रिए इसमाइल श्रॉफ़ निर्देशक चुने गए। पर खन्ना और श्रॉफ़ के बीच किसी मतभेद की वजह से खन्ना इस फ़िल्म से निकल गए। शशि कपूर ने शम्मी जी की ख़ातिर फ़िल्म को स्वीकार कर लिया पर इसमाइल श्रॉफ़ अपनी आदतों से बाज़ नहीं आए। अन्त में निर्देशन का कोई तजुर्बा न होते हुए भी शम्मी जी को ख़ुद इस फ़िल्म को निर्देशित करना पड़ा, और फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई, और शम्मी जी का सारा पैसा डूब गया। वो फिर एक बार ज़ीरो पर पहुँच गईं।


अब उनकी तीसरी पारी के शुरु होने की बारी थी। उनके करिअर को फिर एक बार पुनर्जीवित करने के लिए राजेश खन्ना ने दूरदर्शन के कुछ कार्यक्रमों को प्रोड्युस करने के लिए शम्मी जी का नाम रेकमेण्ड कर दिया। टेलीविज़न जगत में वो बेहद लोकप्रिय हो उठीं। ’देख भाई देख’, ’ज़बान सम्भाल के’, ’श्रीमान श्रीमती’, ’कभी ये कभी वो’ और ’फ़िल्मी चक्कर’ जैसे धारावाहिकों ने कामयाबी के झंडे गाढ़ दिए। और इस कामयाबी से वो फिर एक बार फ़िल्मों में भी नज़र आने लगीं। ’कूली नंबर वन’, ’हम’, ’मर्दों वाली बात’, ’गुरुदेव’, ’गोपी किशन’, ’हम साथ-साथ हैं’ और ’इम्तिहान’ जैसी फ़िल्में उनकी इस दौर की फ़िल्में रहीं। टीवी और इन फ़िल्मों में अभिनय की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति सुधर गई और अपने अन्तिम समय तक वो शारीरिक रूप से सक्रीय थीं और अन्त तक अभिनय करने की लालसा उनके मन में थी। अभी पाँच साल पहले 83 वर्ष की आयु में वो ’शिरीं फ़रहाद की निकल पड़ी’ फ़िल्म में नज़र आई थीं। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह है कि इसमें डेज़ी इरानी ने भी अभिनय किया है। डेज़ी इरानी इसमें शम्मी आंटी की पुत्रवधु का चरित्र निभाया, और मज़ेदार बात यह कि डेज़ी इरानी की पहली फ़िल्म ’बंदिश’ (1955) में भी शम्मी जी ने अभिनय किया था। शम्मी आंटी एक ऐसी शख़्सियत हैं जिन्होंने अपनी सहनशीलता, संघर्ष करने के जसबे और हर बार अपने आप को मुसीबतों से बाहर निकालने के दृढ़ संकल्प का परिचय एक बार नहीं बल्कि बार बार दिया। अभी 6 मार्च को शम्मी आंटी हम सबको छोड कर चली गईं और इसके ठीक दो दिन बाद 8 मार्च को हमने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया। इस विशेष दिन पर शम्मी जी बार बार याद आती रहीं। आख़िर शम्मी आंटी जैसी महिला बहुत कम पैदा होती हैं, है ना? ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से हम शम्मी आंटी को देते हैं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि। उनके अभिनय से सजी फ़िल्में और धारावाहिक आने वाली पीढ़ियों को लम्बे समय तक प्रेरित करते रहेंगे अच्छा और सहज अभिनय करने के लिए, और यह भी सिखाते रहेंगे कि किसी भी अभिनेत्री को टाइप-कास्ट ना होकर हर तरह के किरदार निभाने रहने चाहिए। यही एक सच्चे कलाकार की पहचान है!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, October 8, 2016

शम्मी जी की सुल्तान अहमद को स्थापित करने की मदद और निस्वार्थ त्याग का मूल्य सुल्तान अहमद ने चुकाया उन्हें तलाक़ देकर!


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 17
 
शम्मी



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध अभिनेत्री शम्मी पर। 
  

धिकतर कलाकारों का संघर्ष उनके करीअर के शुरुआती समय में होता है, पर आज हम जिन कलाकार की कहानी प्रस्तुत करने जा रहे हैं, उनका संघर्ष फ़िल्म जगत में स्थापित होने के बाद शुरु होता है। आप हैं अभिनेत्री शम्मी, जिन्हें हम बहुत से फ़िल्मों व टीवी धारावाहिकों में देख चुके हैं। शम्मी को फ़िल्म जगत में प्रवेश के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा। अपने एक पारिवारिक सूत्र के ज़रिए वो फ़िल्मों में आ गईं और एक के बाद एक फ़िल्म में काम करते हुए इंडस्ट्री में स्थापित हो गईं। 1949 में यह सफ़र शुरु करते हुए वो 70 के दशक में पहुँच गईं। अब वो 40 वर्ष की आयु पर आ चुकी थीं और उन्होंने शादी करके घर-परिवार संभालने का निर्णय लिया। इसी दौरान उनकी मित्रता एक आकांक्षी निर्देशक सुल्तान अहमद से हुई, जो फ़िल्म जगत में स्थापित होने के लिए संघर्षरत थे। शम्मी की फ़िल्म जगत में उस समय काफ़ी जान-पहचान थी, उन्हें लोग इज़्ज़त करते थे। इस वजह से सुल्तान अहमद को इंडस्ट्री में काम दिलाने में शम्मी जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ’प्यार का रिश्ता’ (’73), 'हीरा’ (’73), ’गंगा की सौगंध’ ('78) जैसी फ़िल्मों में सुल्तान अहमद को दाख़िला शम्मी जी की वजह से ही मिली। शम्मी जी के दोस्त राजेश खन्ना, सुनिल दत्त और आशा पारेख जैसे नामी अभिनेता सुल्तान अहमद की फ़िल्मों में काम करने के लिए राज़ी हो गए। शम्मी और सुल्तान अहमद भी एक दूसरे के क़रीब आने लगे और दोनों ने शादी कर ली। शम्मी ने फिर सुल्तान अहमद की फ़िल्मों के बाहर अभिनय करना भी बन्द कर दिया और परिवार की तरफ़ ध्यान देने लगीं। शादी के सात साल बाद भी शम्मी माँ नहीं बन सकीं। इसी दौरान शम्मी और सुल्तान अहमद ने एक घर ख़रीदने का निर्णय लिया। हालाँकि सुल्तान अहमद ने यह मकान शम्मी जी के नाम से ही ख़रीदना चाहा, पर शम्मी जी ने यह कहा कि इसे उनकी ननद के नाम ख़रीदना चाहिए क्योंकि उनकी ननद के पास न कोई नौकरी थी और न कोई सहारा। कोई औरत अपने पैसों से ख़रीदा हुआ घर अपनी ननद के नाम कर दे, ऐसा आज तक किसने सुना है कहीं!! ऐसी थीं शम्मी जी। उधर सुल्तान अहमद के भाई का परिवार भी उनके साथ ही रहता था। क्योंकि भाई की पत्नी अशिक्षित थीं, इसलिए शम्मी जी उनके बच्चे का ख़याल रखती थीं और उन्होंने उस बच्चे का दाख़िला शिमला के एक अच्छे स्कूल में करवाया। इस तरह से शम्मी जी ने उस परिवार की निस्वार्थ सेवा की।

शम्मी जी की सुल्तान अहमद को फ़िल्म जगत में स्थापित करने की मदद तथा उनके परिवार के लिए किया गया निस्वार्थ त्याग और सेवा का मूल्य सुल्तान अहमद ने चुकाया उन्हें तलाक़ देकर। सुल्तान अहमद का एक दूसरी औरत से संबंध स्थापित हुआ जिस वजह से शम्मी जी के साथ रिश्ते में दरार पड़ गई। अपने आत्मसम्मान को बरक़रार रखते हुए शम्मी जी एक दिन साल 1980 में अपना घर, अपना पैसा, अपनी गाड़ी, अपना परिवार, सब कुछ छोड़ कर अपनी माँ के पास अपने पुराने घर में चली आईं। इस घटना की वजह से सुल्तान अहमद पर फ़िल्म जगत की कई बड़ी हस्तियाँ नाराज़ हुईं जिनमें नरगिस और सुनिल दत्त शामिल थे। अब शम्मी जी के लिए फ़िल्म जगत में दूसरी पारी शुरु करने की बारी थी अपने आप को दुबारा अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए। फ़िल्म जगत में लोग उनकी इज़्ज़त करते थे, सुनिल दत्त के सहयोग से आठ दिनों के अन्दर उन्हें 'The Burning Train' में एक रोल दिलवाया। राजेश खन्ना ने भी ’रेड रोज़’, ’आँचल’, ’कुदरत’, ’आवारा बाप’ और ’स्वर्ग’ जैसी फ़िल्मों में उन्हें रोल दिलवाये जिस वजह से वो एक बार फिर से सबकी नज़र में आ गईं और फिर एक बार उनकी गाड़ी चल पड़ी। इस सफलता को देखते हुए शम्मी जी ने ’पिघलता आसमान’ नामक एक फ़िल्म बनाने की सोची। राजेश खन्ना नायक थे और उन्हीं के ज़रिए इसमाइल श्रॉफ़ निर्देशक चुने गए। पर खन्ना और श्रॉफ़ के बीच किसी मतभेद की वजह से खन्ना इस फ़िल्म से निकल गए। शशि कपूर ने शम्मी जी की ख़ातिर फ़िल्म को स्वीकार कर लिया पर इसमाइल श्रॉफ़ अपनी आदतों से बाज़ नहीं आए। अन्त में निर्देशन का कोई तजुर्बा न होते हुए भी शम्मी जी को ख़ुद इस फ़िल्म को निर्देशित करना पड़ा, और फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई, और शम्मी जी का सारा पैसा डूब गया। वो फिर एक बार ज़ीरो पर पहुँच गईं।

अब उनकी तीसरी पारी के शुरु होने की बारी थी। उनके करीअर को फिर एक बार पुनर्जीवित करने के लिए राजेश खन्ना ने दूरदर्शन के कुछ कार्यक्रमों को प्रोड्युस करने के लिए शम्मी जी का नाम रेकमेण्ड कर दिया। टेलीविज़न जगत में वो बेहद लोकप्रिय हो उठीं। ’देख भाई देख’, ’ज़बान सम्भाल के’, ’श्रीमान श्रीमती’, ’कभी ये कभी वो’ और ’फ़िल्मी चक्कर’ जैसे धारावाहिकों ने कामयाबी के झंडे गाढ़ दिए। और इस कामयाबी से वो फिर एक बार फ़िल्मों में भी नज़र आने लगीं। ’कूली नंबर वन’, ’हम’, ’मर्दों वाली बात’, ’गुरुदेव’, ’गोपी किशन’, ’हम साथ-साथ हैं’ और ’इम्तिहान’ जैसी फ़िल्में इस दौर की रहीं। टीवी और इन फ़िल्मों में अभिनय की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति सुधर गई और आजकल 86 वर्ष की आयु में भी वो सक्रीय हैं और फ़िल्मों में अभिनय करना चाहती हैं। 83 वर्ष की आयु में वो ’शिरीं फ़रहाद की निकल पड़ी’ फ़िल्म में नज़र आई थीं। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से हम शम्मी जी की सहनशीलता, संघर्ष करने के जसबे और हर बार अपने आप को मुसीबतों से बाहर निकालने के दृढ़ संकल्प के लिए सलाम करते हैं और उनकी दीर्घ आयु की कामना करते हैं। शम्मी जी, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!!




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



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