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Saturday, September 26, 2015

BAATON BAATON MEIN-12: INTERVIEW OF LATA MANGESHKAR

बातों बातों में - 12

स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से सुजॉय चटर्जी की बातचीत


"क्वीन एलिज़ाबेथ ने मुझे चाय पर बुलाया था ..."  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। दोस्तों, आगामी 28 तारीख़ को जन्मदिन है स्वरसाम्राज्ञी, भारतरत्न लता मंगेशकर का। लता जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए आज ’बातों बातों में’ में हम प्रस्तुत कर रहे हैं ट्विटर के माध्यम से उनसे पूछे गए कुछ सवालों पर आधारित एक छोटा सा साक्षात्कार, और साथ ही उनके गीतों से सजी एक विशेष प्रस्तुति ’आठ दशक आठ गीत’।
    


वो एक आवाज़ जो पिछले आठ दशकों से दुनिया की फ़िज़ाओं में अमृत घोल रही है, जिसे इस सदी की आवाज़ होने का गौरव प्राप्त है, जिस आवाज़ में स्वयं माँ सरस्वती निवास करती है, जो आवाज़ इस देश की सुरीली धड़कन है, उस कोकिल-कंठी, स्वर-साम्राज्ञी, भारत-रत्न, लता मंगेशकर से बातचीत करना किस स्तर के सौभाग्य की बात है, उसका अंदाज़ा आप भली भाँति लगा सकते हैं। जी हाँ, मेरा यह परम सौभाग्य है कि ट्विटर के माध्यम से मुझे भी लता जी से कुछ प्रश्न पूछने का मौका नसीब हुआ, और उससे भी बड़ी बात यह कि लता जी ने किस सरलता से मेरे उन चंद सवालों के जवाब भी दिए। जितनी मेरी ख़ुशकिस्मती है उससे कई गुना ज़्यादा बड़प्पन है लता जी का कि वो अपने चाहनेवालों के सवालों के जवाब इस सादगी, सरलता और विनम्रता से देती हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि फलदार पेड़ हमेशा झुके हुए होते हैं। तो आइए, प्रस्तुत है आपके इस दोस्त सुजॉय चटर्जी के सवाल और लता जी के जवाब ।

लता जी, बहुत बहुत नमस्कार, ट्विटर पर आपको देख कर हमें कितनी ख़ुशी हो रही है कि क्या बताऊँ! लता जी, आप ने शांता आप्टे के साथ मिलकर सन 1946 की फ़िल्म 'सुभद्रा'  में एक गीत गाया था, "मैं खिली खिली फुलवारी"। तो फिर आपका पहला गीत 1947 की फ़िल्म 'आपकी सेवा में' का "पा लागूँ कर जोरी रे" को क्यों कहा जाता है?

नमस्कार! मैंने 1942 से लेकर 1946 तक कुछ फ़िल्मों में अभिनय किया था जिनमें मैंने गानें भी गाये थे, जो मेरे उपर ही पिक्चराइज़ हुए थे। 1947 में 'आपकी सेवा में' में मैंने पहली बार प्लेबैक किया था।

लता जी, पहले के ज़माने में लाइव रेकॊर्डिंग हुआ करती थी और आज ज़माना है ट्रैक रेकॊर्डिंग का। क्या आपको याद कि वह कौन सा आपका पहला गाना था जिसकी लाइव नहीं बल्कि ट्रैक रेकॊर्डिंग हुई थी?

वह गाना था फ़िल्म 'दुर्गेशनंदिनी' का, "कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफ़िर, सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है", जिसे मैंने हेमन्त कुमार के लिए गाया था।

लता जी, "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत से पंडित नेहरु की यादें जुड़ी हुई हैं। क्या आपको कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी से भी मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है?

आदरणीय बापू को मैं मिल ना सकी, लेकिन उनके दूर से दर्शन दो बार हुए। आदरणीय पंडित जी और आदरणीया इंदिरा जी को प्रत्यक्ष मिलने का सौभाग्य मुझे कई बार प्राप्त हुआ है।

लता जी, क्या इनके अलावा किसी विदेशी नेता से भी आप मिली हैं कभी?

कई विदेशी लीडर्स से भी मिलना हुआ है जैसे कि प्रेसिडेण्ट क्लिण्टन और क्वीन एलिज़ाबेथ। क्वीन एलिज़ाबेथ ने मुझे चाय पर बुलाया था और मैं बकिंघम पैलेस गई थी उनसे मिलने, श्री गोरे जी के साथ मे, जो उस समय भारत के राजदूत थे।

लता जी, विदेशी लीडर्स से याद आया कि अगर विदेशी भाषाओं की बात करें तो श्रीलंका के सिंहली भाषा में आपने कम से कम एक गीत गाया है, फ़िल्म 'सदा सुलग' में। कौन सा गाना था वह और क्या आप श्रीलंका गईं थीं इस गीत को रेकॊर्ड करने के लिए?

मैंने वह गीत मद्रास (चेन्नई) में रेकॊर्ड किया था और इसके संगीतकार थे श्री दक्षिणामूर्ती। गीत के बोल थे "श्रीलंका त्यागमयी"।

लता जी, आपने अपनी बहन आशा भोसले और उषा मंगेशकर के साथ तो बहुत सारे युगल गीत गाए हैं। लेकिन मीना जी के साथ बहुत कम गीत हैं। मीना मंगेशकर जी के साथ फ़िल्म 'मदर इण्डिया' फ़िल्म में एक गीत गाया था "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा"। क्या किसी और हिंदी फ़िल्म में आपने मीना जी के साथ कोई गीत गाया है?

मैं और मीना ने 'चांदनी चौक' फ़िल्म में एक गीत गाया था, रोशन साहब का संगीत था, और उषा भी साथ थी।

तो दोस्तों, ये थे चंद सवाल जो मैंने पूछे थे लता जी से, और जिनका लता जी ने बड़े ही प्यार से जवाब दिया था। आगे भी मैं कोशिश करूँगा कि लता जी से कुछ और भी ऐसे सवाल पूछूँ जो आज तक किसी इंटरव्यु में सुनने को नहीं मिला।

और अब लता जी को उनके जनमदिन की अग्रिम शुभकामनाएँ देते हुए प्रस्तुत करते हैं उनके गाए गीतों से सजी एक विशेष प्रस्तुति ’आठ दशक आठ गीत’।

1945: माता तेरी चरणों में (बड़ी माँ)

जैसा कि लता जी ने उपर कहा है कि भले ही उनका गाया पहला प्लेबैक गीत 1947 में फ़िल्म ’आपकी सेवा में’ में आया, पर 1942 से ही वो फ़िल्मों में अभिनय का काम करना शुरू कर दिया था और कुछ फ़िल्मों में गाने भी गाईं जो उन्हीं पर फ़िल्माये भी गए। पिता की असामयिक मृत्यु की वजह से 13 वर्ष की अल्पायु में लता को मेक-अप लगा कर कैमरे के सामने जाना पड़ा जो उन्हें पसन्द नहीं था। 1942 से 1947 के दौरान उन्होंने जिन फ़िल्मों में अभिनय किया, उनमें एक महत्वपूर्ण फ़िल्म थी ’बड़ी माँ’ जिसमें नूरजहाँ नायिका थीं। तो लीजिए 1945 की इसी फ़िल्म का एक गीत प्रस्तुत है लता मंगेशकर, ईश्वरलाल और साथियों की आवाज़ों में जो लता जी पर ही फ़िल्माया गया था।


https://www.youtube.com/watch?v=Y07vWXV73qI


1955: मनमोहना बड़े झूठे (सीमा)

1949 में ’महल’, ’बरसात’ और ’लाहौर’ जैसी फ़िल्मों में सुपरहिट गीत गाने के बाद लता मंगेशकर पहली पंक्ति की गायिकाओं में शामिल हो गईं। स्वाधीनता के बाद बम्बई में बनने वाली फ़िल्मों का चलन भी बदलने लगा था। भारी भरकम आवाज़ों (जैसे कि शमशाद बेगम, अमीरबाई कर्नाटकी, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली आदि) के मुक़ाबले पतली आवाज़ का चलन बढ़ने लगा। ऐसे में लता, आशा और कुछ वर्ष बाद सुमन कल्याणपुर (गरीबों की लता) की लोकप्रियता बढ़ने लगी। 50 के दशक में लता जी को एक से एक बेहतरीन गीत गाने का मौका मिला जिनमें एक है फ़िल्म ’सीमा’ का "मनमोहना बड़े झूठे"। सुनिए यह गीत और ख़ुद ही विचार कीजिए कि क्या लता जी में वो सब गुण नहीं थे जो एक शुद्ध शास्त्रीय गायिका में होती हैं! शंकर जयकिशन ने भी क्या निखारा है इस गीत के कम्पोज़िशन को! वाह!

https://www.youtube.com/watch?v=ewi3GN7RKNc


1965: आज फिर जीने की तमन्ना है (गाइड)

60 के दशक के आते-आते अन्य सब आवाज़ों को पीछे पटकते हुए सिर्फ़ दो ही आवाज़ें सर चढ कर बोल रही थीं - लता और आशा। इन दो आवाज़ों की चमक ही इतनी ज़्यादा थी कि अत्यन्त प्रतिभाशाली होते हुए भी अन्य गायिकाओं को बड़े बैनर की फ़िल्मों में गाने के मौके नहीं मिल पाते थे। 1965 की फ़िल्मों में से हमने जिस फ़िल्म का गीत चुना है वह है ’गाइड’। यह इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि करीब छह सालों तक अनबन रहने के बाद लता मंगेशकर और सचिन देव बर्मन में सुलह हो जाती है और तब उत्पन्न होते हैं फ़िल्म ’गाइड’ के गीतों जैसी अनमोल रचनाएँ। इस गीत को सुनते हुए क्या यह महसूस नहीं होता कि लता और दादा बर्मन के संगम को पा कर जैसे गीत ख़ुद झूम रहा हो?

https://www.youtube.com/watch?v=1odcNKyfZJU


1975: न जाने क्यों होता है यह ज़िन्दगी के साथ (छोटी से बात)

दादा बर्मन ही की तरह एक और संगीतकार जिनके गीतों को लता जी के स्वर ने अमर बना दिया, वो हैं सलिल चौधरी। 70 के दशक में जहाँ एक तरफ़ ’शोले’, ’दीवार’, ’धर्मात्मा’ जैसी फ़िल्मों की कहानियों ने फ़िल्मी गीतों का स्वरूप ही बदल कर रख दिया, वहीं दूसरी तरफ़ ’छोटी सी बात’, ’गीत गाता चल’ जैसी मध्य-वर्गीय घरेलु फ़िल्मों ने जी-तोड़ मेहनत की फ़िल्म संगीत की धारा में सुमधुर सुरों को कायम रखने की। सलिल चौधरी की यह ख़ासियत रही है भारतीय धुनों के साथ पाश्चात्य ऑरकेस्ट्रेशन को मिलाने की, और फ़िल्म ’छोटी सी बात’ के इस शीर्षक गीत में भी उनका वही रंग दिखाई देता है। आइए सुनते हैं यह गीत...

https://www.youtube.com/watch?v=NC1yM-9Jwrk


1985: सुन साहिबा सुन प्यार की धुन (राम तेरी गंगा मैली)

जिन फ़िल्मकारों के साथ लता जी ने महत्वपूर्ण काम किया है, उनमें एक नाम है राज कपूर। संगीत की अच्छी समझ रखने वाले राज कपूर ने शुरू से अन्त तक लता जी की आवाज़ का सराहा लिया अपनी फ़िल्मों में (’मेरा नाम जोकर’, ’धरम करम’ अपवाद ज़रूर हैं)। 80 के दशक में जब फ़िल्म संगीत का स्तर बहुत ज़्यादा नीचे उतर गया, तब कुछ फ़िल्मकारों और कुछ संगीतकारों ने फ़िल्मी गीतों में मधुरता को कायम रखने की जी-तोड़ कोशिशें की। इनमें शामिल थे राज कपूर और रवीन्द्र जैन। 1985 में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों में लता मंगेशकर के गाये हुए गीतों में ’राम तेरी गंगा मैली’ फ़िल्म के गीतों के अलावा किसी अन्य फ़िल्म का विचार आ नहीं पाया। तो चलिए हसरत जयपुरी की यह रचना सुनते हैं जिसे लिखने में मदद की थी उनकी बेटी किश्वरी जयपुरी।

https://www.youtube.com/watch?v=f5JR_0u5zg4


1995: मेरे ख़्वाबों में जो आये (दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे)

राज कपूर की तरह एक और दो और फ़िल्मकार जिनके साथ लता जी ने एक लम्बी पारी खेली, वो थे यश चोपड़ा और सूरज बरजात्या। चोपड़ा और बरजात्या कैम्प की तमाम फ़िल्मों में लता जी के गाये गीतों की लोकप्रियता सर चढ़ कर बोली। 70 और 80 के दशकों में तो क्या 90 के दशक में भी वही लोकप्रियता बरक़रार रही। अगर बरजात्या के वहाँ ’मैंने प्यार किया’ और ’हम आपके हैं कौन’ जैसी फ़िल्मों के गीतों ने लोकप्रियता की हदें पार की, वहीं दूसरी ओर चोपड़ा कैम्प में ’चाँदनी’, ’लम्हे’, ’डर’, ’दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ और ’दिल तो पागल है’ के गीतों ने भी बहुत धूम मचाई। 1995 में लता जी के गाये गीत केवल तीन फ़िल्मों में सुनाई दिये - ’करण-अर्जुन’, ’सनम हरजाई’ और ’दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’। 65 वर्ष की आयु में 17 वर्ष के किरदार सिमरन के लिए DDLJ में गाने गा कर लता जी ने जितना मंत्रमुग्ध श्रोताओं को किया, उससे ज़्यादा किया उन्हें आश्चर्यचकित। 

https://www.youtube.com/watch?v=wmTWjT3wG8M


2005: कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे (Page 3)

2000 के दशक के आते-आते फ़िल्मों की नायिकाओं के चरित्र में इतने बदलाव आ गए कि सुन्दर-सुशील आदर्श भारतीय नारी के चरित्रों को मिलने वाली लता जी की आवाज़ इन नई नायिकाओं पर फ़िट नहीं हो पायी। भले ही करीना कपूर, रानी मुखर्जी, प्रीति ज़िन्टा जैसी अभिनेत्रियों की आवाज़ लता जी बनी, पर स्क्रीन पर जच नहीं पायी। दूसरी तरफ़ फ़िल्म-संगीत की धारा भी कुछ इस क़दर बदल चुकी थी कि वो लता जी के स्टाइल के अनुरूप नहीं रही। ए. आर. रहमान और एक-दो संगीतकारों को छोड़ कर लता जी ने फ़िल्मों में गाना बिल्कुल ना के बराबर कर दिया। 2005 में लता जी के गाये दो गीत आये, एक था फ़िल्म ’बेवफ़ा’ में "कैसे पिया से मैं कहूँ मुझे कितना प्यार है" और दूसरा फ़िल्म ’Page 3' का "कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे"। 'Page 3' फ़िल्म को बहुत से पुरस्कारों से नवाज़ा गया था, इसलिए आइए इस फ़िल्म के गीत को ही शामिल करते हैं, संगीतकार हैं समीर टंडन।

https://www.youtube.com/watch?v=rydPYHqsNBQ

2015: जीना क्या है जाना मैंने (Dunno Y2 - Life is a Moment)

यह बस आश्चर्य ही है कि साल 2015 में भी लता मंगेशकर के गाये हुए गीत फ़िल्म में रिलीज़ हो रहे हैं। 86 वर्ष की आयु में रेकॉर्ड किया हुआ उनका गीत हाल ही में प्रदर्शित फ़िल्म ’Dunno Y2 - Life is a Moment’ के थीम सॉंग् के रूप में जारी हुआ है, और सच पूछिये तो इस गीत को सुनते हुए यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि इसे लता जी ने 2015 में गाया है। कुदरत का करिश्मा और उपरवाले का एक अजूबा ही कहा जा सकता है इसे। लता जी की स्वरगंगा में जिसने भी डुबकी लगाई, उसने ही तृप्ति पायी। नाद की इस अधिष्ठात्री ने पिछले आठ दशकों से इस जगत को गुंजित किया है। उनकी आवाज़ में संगम की पवित्रता है जो हर मन को पवित्र कर देती है। हम कितने भाग्यशाली हैं जो लता जी की आवाज़ को सुन सकते हैं; अफ़सोस तो उन लोगों के लिए होता है जो लता जी के गीत सुने बग़ैर ही इस दुनिया से चले गए थे।

https://www.youtube.com/watch?v=VAN4dnZVhx4


लता जी को उनके जनमदिवस पर एक बार फिर से हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं, ईश्वर उन्हें दीर्घायु करें, उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें, यही कामना है। अब आज की इस प्रस्तुति को समाप्त करने की दीजिये हमें अनुमति, नमस्कार!

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Monday, October 27, 2008

हम होंगे कामियाब

कभी कभी छोटी छोटी कोशिशें एक बड़ी सोच का रूप धारण कर लेती है. और फ़िर उस सोच का अंकुर पल्लवित होकर एक बड़ा वृक्ष बनने की दिशा में बढ़ने लगता है और उसकी शाखायें आसमान को छूने निकल पड़ती है. आज से ठीक एक साल पहले २७ अक्टूबर २००७ की शाम को हिंद युग्म ने अपना पहला संगीतबद्ध गीत जारी किया था. दिल्ली, हैदराबाद और नागपुर में बैठे एक गीतकार, एक संगीतकार और एक गायक ने ऑनलाइन बैठकों के माध्यम से तैयार किया था एक अनूठा गीत "सुबह की ताजगी". और इसी के साथ नींव पड़ी एक विचार की जो आज आपके सामने "आवाज़" के रूप में फल फूल रहा है. हिंद युग्म ने महसूस किया कि जिस तरह हमने उभरते हुए कवियों,कथाकारों और बाल साहित्य सृजकों को एक मंच दिया क्यों न इन नए गीतकारों,संगीतकारों और गायकों को भी हम एक ऐसा आधार दें जहाँ से ये बिना किसी बड़े निवेश के अपनी कला का नमूना दुनिया के सामने रख सकें.चूँकि इन्टनेट जुडाव का माध्यम था तो दूरियां कोई समस्या ही नही थी. कोई भी कहीं से भी एक दूसरे से जुड़ सकता था बस कड़ी जोड़नी थी हिंद युग्म के साथ. सिलसिला शुरू हुआ तो एक से बढ़कर एक कलाकार सामने आए. मात्र तीन महीने में युग्म ने १० गीत रच डाले, इन्हें १० कविताओं की चाशनी में डूबोकर हमने बनाया इन्टरनेट गठबन्धनों के माध्यम से तैयार पहला सुरीला एल्बम "पहला सुर".


इस एल्बम में युग्म परिवार के १० कवियों की शिरकत थी, तो ४ गीतकारों, ७ संगीतकारों और ९ गायकों ने अपनी प्रतिभा दुनिया के सामने रखी. हिन्दी ब्लॉग्गिंग जगत पहली बार किसी ब्लॉग ने अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले जैसे बड़े मंच पर अपनी प्रस्तुति का विमोचन किया. "पहला सुर" जिसके भी हाथ में गया उसने मुक्त कंठ से इस महाप्रयास की सराहना की. हिंद युग्म ने संगीत और पॉडकास्ट के लिए एक अलग शाखा के तौर पर "आवाज़" की शुरुआत की. आवाज़ ने अपने प्रयास और तेज़ किए, मुश्किल परिस्तिथियों से जूझते हुए भी हिंद युग्म के कर्णधारों ने अभूतपूर्व योजनाओं को अंजाम दिया. वो फ़िर कवियों और पाठकों को पुरस्कृत करने का अद्भुत विचार हो या फ़िर दूरभाष के माध्यम से हिन्दी टंकण की निशुल्क शिक्षा प्रदान करने का काम हो, पहल हमेशा हिंद युग्म ने की और औरों के लिए प्रेरणा बना. आवाज़ पर भी दूसरे संगीत सत्र की शुरुआत हुई जुलाई में, जिसके तहत हर शुक्रवार एक नए गीत को हम दुनिया के सामने रख रहे हैं, अब तक १७ गीत प्रकाशित हो चुके हैं और अब इस संगीत परिवार में ५० से अधिक नए कलाकार जुड़ चुके हैं. पॉडकास्ट कवि सम्मलेन का मासिक आयोजन आवाज़ पर हो रहा है ये भी अपने आप में एक नायाब प्रयास है. साहित्यिक रचनाओं को ऑडियो फॉर्मेट में उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से शुरू हुई योजना "सुनो कहानी" जिसके तहत हर शनिवार एक ताज़ा कहानी का पॉडकास्ट हम लोगों तक पहुंचा रहे हैं. हाल ही हुए ऑनलाइन पुस्तक विमोचन से "आवाज़" ने साबित किया है इन्टरनेट पर उपलब्ध इस ब्लॉग रुपी मंच का बहुयामी उपयोग सम्भव है. फिल्मकारों के लिए भी अब आवाज़ के दरवाज़े खुले हैं, अब तक दो लघु फिल्मों का प्रसारण हम कर चुके हैं. संगीत से जुड़ी तमाम तरह की जानकारियों को हिन्दी में उपलब्ध करवाने की आवाज़ की पहल में आज ब्लॉग्गिंग जगत से जुड़े भाषा और संगीत की सेवा में समर्पित कई बड़े नामी ब्लॉगर अपना अनमोल समय देकर हमारा साथ दे रहे हैं.
मीडिया बहुत कुछ लिख चुका है हिंद युग्म के बारे में, हमारे साथी ब्लोग्गेर्स भी इसे एक "फिनोमिना" मान चुके हैं. पर युग्म की असली ताक़त तो युग्म के जोशीले, कर्मठ, और समर्पित सदस्य हैं, जो दिन रात अपने इस खूबसूरत सपने को सजाने सँवारने की योजनाओं पर काम करते रहते हैं. इतने नाम हैं कि सब का जिक्र बेहद मुश्किल होगा, चूँकि आज हम अपने उस बीज रुपी गीत "सुबह की ताजगी" का ब्लॉग पर जन्मदिवस मना रहे हैं, तो बस संगीत से जुड़े कलाकारों पर बात करेंगे. शुरुआत इस ऑनलाइन पार्टी की होनी चहिये उसी शानदार गीत से. अनुरोध है सुबोध साठे से कि एक बार फ़िर अपनी मधुर आवाज़ में छेड़े "सुबह की ताजगी" का तराना.



सुबोध हमेशा की तरह हंसमुख है आज की पार्टी में, हमने जाना चाहा सुबोध से -
“सुबोध नए सत्र में बहुत से नए कलाकार आए हैं इनमें से अधिकतर आपको रोल मॉडल मानते हैं, आप बताएं इनमें से आपके पसंदीदा गायक और संगीतकार कौन कौन है ?”
सुबोध का जवाब था "सबसे पहले तो हिंद युग्म को बधाई, मुझे गायक के तौर पर कृष्ण कुमार बहुत पसंद आए, उनके गीत का संगीत पक्ष कुछ कमजोर था पर गायकी और आवाज़ बहुत जबरदस्त लगी. संगीतकारों में "संगीत दिलों का उत्सव है..." वाले निखिल बहुत प्रतिभाशाली लगे."सुबोध के आग्रह पर हम अनुरोध कर रहे हैं कृष्ण कुमार से वो सुनाएँ अपना गीत "राहतें सारी.."



वाकई कृष्ण कुमार का भविष्य काफी उज्जवल नज़र आ रहा है....इसी बीच हमने पकड़ा ज़रा से शर्मीले और ज़रा से एकांतप्रिये युग्म के पहले संगीतकार ऋषि एस को, दरअसल जहाँ तक आज हम पहुंचें हैं वह सम्भव नही होता अगर ऋषि एस का हमें साथ नही मिलता, ऋषि युग्म के वार्षिक अंशदाता भी हैं. यानी कि वो युग्म की सोच और योजनाओं से बेहद आत्मीयता से जुड़े हैं. ऋषि से भी हमने वही सवाल किया जो सुबोध से किया था. तो जवाब मिला -
"मेरा अब तक का सबसे पसंदीदा गीत है सुबोध का गाया "खुशमिजाज़ मिटटी". इसका मुखडा कमाल का है और जिस स्केल पर ये गाया गया है वो उसकी आवाज़ के लिए बिल्कुल परफेक्ट है. मुझे सुबोध की आवाज़ हमेशा से ही पसंद रही है और इस गीत में उनकी संगीत रचने की क्षमता भी बखूबी उभर कर सामने आई है. मेरे पहले ३ गीत सुबोध ने ही गाये थे, और उम्मीद करता हूँ कि आगे भी हम साथ काम करेंगे.
मैं हिन्दी साहित्य की बहुत अधिक जानकारी नही रखता तो किसी गीतकार की समीक्षा करना जरा मुश्किल काम है. पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे सजीव का लिखा "जीत के गीत" बहुत पसंद है, सजीव शायद दिए हुए धुन पर बेहतर लिखते हैं, मेरे आखिरी दो गीत (जीत और मैं नदी ) के बोलों की बेहद तारीफ हुई है, बनिस्पत मेरे पिछले गीतों से जो पहले लिखे गए और बाद में स्वरबद्ध हुए. मैं सभी ग़ज़लकारों को भी बधाई देना चाहता हूँ, मैं ग़ज़लों का दीवाना हूँ, पर शायद ग़ज़ल को स्वरबद्ध करना अभी is not my cup of tea, i guess."
ऋषि ने बहुत इमानदारी से जो बात कही है वो हम सब जानते हैं. ग़ज़लों को स्वरबद्ध करना और गाना दोनों ही कलायें विलक्षण क्षमता की मांग करती है. युग्म पर अब तक बहुत सी बेमिसाल ग़ज़लें आई हैं और हमारे कलाकारों ने हमेशा ही श्रोताओं के दिलों को जीतने में कामयाबी हासिल की है. दोस्तों, तो क्यों न इन खूबसूरत ग़ज़लों का एक बार फ़िर से आनंद लिया जाए. स्वागत करें महफ़िल में, आभा मिश्रा, रुपेश ऋषि, प्रतिष्ठा, निशांत अक्षर, और रफीक शेख का.

इन दिनों - आभा मिश्रा



ये ज़रूरी नही - रुपेश व् प्रतिष्ठा



चले जाना - रुपेश



तेरे चेहरे पे - निशांत अक्षर



सच बोलता है - रफ़ीक शेख



ग़ज़लों का दौर चला तो हमें झूमती हुई दिखी शिवानी जी, शिवानी का आवाज़ परिवार विशेष आभारी है. इनका सहयोग हर कदम पर हम सब के साथ रहा है. अब तक इनकी ३ ग़ज़लें आवाज़ पर आ चुकी हैं, शिवानी जी जाहिर है अपनी ग़ज़लें आपको प्रिय होंगी, पर उसके अलावा कोई और गीत जो आपको विशेष प्रिय हो बताएं. जवाब शिवानी जी अपनी मधुर आवाज़ में दिया "आवाज़ की पहली सालगिरह पर मैं हिंद युग्म और आवाज़ के सभी श्रोतागण को बधाई देना चाहती हूँ !हिंद युग्म और आवाज़ अपने श्रोताओं और पाठकों के सहयोग से ही अपनी बुलंदियों को छूने जा रहा है !आवाज़ पर आये सभी गीत ,ग़ज़ल और कवितायें भिन्न भिन्न प्रकार के फूलों के रूप में एकत्र हो कर एक महकता गुलदस्ता बन गए हैं !सभी की अपने बोल ,गीत और संगीत से अपनी अलग पहचान है !परन्तु यदि किसी एक को चुनना हो तो मेरे विचार से `मुझे दर्द दे ' मेरा पसंदीदा गीत है ! सजीव जी ने बहुत खूबसूरत गीत लिखा है ,बोल लाजवाब हैं हर कोई सूफी गीत नहीं लिख सकता !गीत में ठहराव है ! संगीत दिल को सुकून देता है !शुरुआत बहुत खूबसूरत है !अमनदीप और सुरेंदर जी की आवाज़ में गहराई और अमन कायम है !गीतकार, गायक और संगीतकार में बहुत अच्छा सामंजस्य है !मेरी नज़र में इन्ही सब खूबियों के कारण ये मेरा पसंदीदा गीत है ! इस गीत की पूरी टीम को एक बार फिर मेरी शुभकामनायें !धन्यवाद !"
अब जब शिवानी जी ने इतनी तारीफ की है तो क्यों न सुन लिया जाए उनका पसंदीदा गीत, स्वागत करें लुधिआना पंजाब के पेरुब और उनके साथ जोगी और अमनदीप का, साथ में आमंत्रित हैं बेहद प्रतिभाशाली कृष्णा पंडित और उनके साथी भी अपनी ताज़ा सूफी रचना के साथ. तो दोस्तों आनंद लें इस सूफी गुलदस्ते का.

मुझे दर्द दे - जोगी व् अमनदीप



डरना झुकना - जोगी व् अमनदीप



सूरज चाँद सितारे - कृष्णा पंडित



पार्टी में लेट लतीफ़ आए हैं परिवार के सबसे छोटे सदस्य मात्र १७ साल के नौजवान कोलकत्ता से सुभोजित. आते ही हमने घेर लिया उन्हें भी और किया वही सवाल. तो मिला बस एक लाइन का जवाब-
"हाँ मुझे पसंद है निखिल का गीत... मेरे ख्याल से “संगीत दिलों का उत्सव है” युग्म का अब तक का सर्वश्रेष्ट गीत है." तभी उनके पास चल कर आए UK से आए हमारे नए सनसनीखेज गायक बिस्वजीत भी, हमने पूछा कि क्या वो सहमत हैं सुभोजित से तो बिस्वजीत का जवाब था,"मुझे मानसी की आवाज़ बहुत पसंद आयी, “मैं नदी” गीत को उन्होंने बहुत खूब गया है, चूँकि संगीत सीखा हुआ होने के कारण वो हरकतें बहुत सहज रूप से ले लेती है और गाने में नई जान फूंक देती है"
अब बिस्वजीत सामने हो तो हम उन्हें ऐसे कैसे छोड़ सकते है. तो पहले सुन लेते हैं उनकी आवाज़, और फ़िर हम पेश करेंगे सुभोजित और बिस्वजीत के पसंदीदा गीत भी. स्वागत करें बिस्वजीत, मानसी, चार्ल्स और मिथिला का.

जीत के गीत - बिस्वजीत



मेरे सरकार - बिस्वजीत



संगीत दिलों का उत्सव है - चार्ल्स व् मिथिला



मैं नदी - मानसी




दोस्तों महफिल शबाब पर है. आईये आवाज़ की अब तक की टीम का एक संक्षिप्त परिचय लिया जाए -
संगीत परिवार -

गीतकार के रूप में - अलोक शंकर, गौरव सोलंकी, मोईन नज़र, सजीव सारथी, विश्व दीपक "तन्हा", शिवानी सिंह, अज़ीम राही, निखिल आनंद गिरी, मोहिंदर कुमार, मनुज मेहता, और संजय द्विवेदी.

गीतकार संगीतकार और गायक के रूप में - सुनीता यादव, और सुदीप यशराज.

संगीतकार के रूप में - ऋषि एस, सुभोजित, चेतन्य भट्ट, अनुरूप, निखिल वर्गीस और पेरुब.

संगीतकार और गायक के रूप में - सुबोध साठे, रुपेश ऋषि, निरन कुमार, जे एम् सोरेन, कृष्ण राज, कृष्णा पंडित, रफ़ीक शेख, आभा मिश्रा और शिशिर पारखी.

गायक के रूप में - जोगी सुरेंदर, अमन दीप कौशल, प्रतिष्ठा, चार्ल्स, मिथिला, निशांत अक्षर, मानसी पिम्पले, जयेश शिम्पी, बिस्वजीत, अभिषेक, और रुद्र प्रताप.

आवाज़ की टीम - सजीव सारथी (संपादक), शैलेश भारतवासी, अनुराग शर्मा, और तपन शर्मा चिन्तक (सह-संपादक),प्रशेन , राहुल पाठक (डिजाईन व् साज सज्जा),संजय पटेल, अशोक पाण्डेय, मृदुल कीर्ति, पंकज सुबीर, युनुस खान, सागर नाहर, मनीष कुमार, सुरेश चिपनकुर, दिलीप कवठेकर, रंजना भाटिया, शोभा महेन्द्रू, शिवानी सिंह, अनीता कुमार, अमिताभ मीत, पारुल, विश्व दीपक तन्हा और अन्य साथी सहयोगी.

इससे पहले की हम आवाज़ रुपी इस सोच की शुरुआत के एक वर्ष मुक्कमल होने की खुशी में केक काटें, ईश्वर की स्तुति कर लें, याद करें उस परम पिता को जिसके आदेश के बिना एक पत्ता भी नही हिलता. हमारे संगीत समूह में सबसे अनुभवी शिशिर पारखी जी से अनुरोध है कि वो एक मन को छू लेने वाला भजन सुनाएँ -

भजन (अप्रकाशित) - शिशिर पारखी



चलिए दोस्तों अब पार्टी का आनंद लें -



मौका भी है और दस्तूर भी, कुछ झूम लिया जाए कुछ नाच लिया जाए, पेश है एक बार फ़िर सुबोध, अपने आवारा दिल के साथ -



सोरेन जो अब तक चुप चाप खड़े हैं अब आपको रॉक करने वाले हैं अपने दमदार "ओ मुनिया" गीत के साथ.



और अंत में आईये हम सब मिलकर दोहराएँ वो मूल मन्त्र जिसने हमें एक सूत्र में बांधा है -

हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन,
हिन्दी मेरी आवाज़ है.
बढे चलो....पेश है जयेश, मानसी और ऋषि की आवाजों में -



आशा है आप सब मेहमानों ने इस ऑनलाइन संगीत महफिल का जम कर आनंद लिया होगा. हिंद युग्म और आवाज़ के साथ आपकी दोस्ती, आपका प्यार और आप सब का सहयोग युहीं बना रहे यही दुआ है. धन्येवाद.

Thursday, September 25, 2008

लता मंगेशकर- संगीत की देवी

लता मंगेशकर का जीवन परिचय

लता का परिवार
लता मंगेशकर का जन्म इंदौर, मध्यप्रदेश में सितम्बर २८, १९२९ को हुआ। लता मंगेशकर का नाम विश्व के सबसे जानेमाने लोगों में आता है। इनका जन्म संगीत से जुड़े परिवार में हुआ। इनके पिता प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे व उनकी एक अपनी थियेटर कम्पनी भी थी। उन्होंने ग्वालियर से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। दीनानाथ जी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे पाँच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता अमान अली खान, साहिब और बाद में अमानत खान के साथ भी पढ़ीं। लता मंगेशकर हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज़, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी। जब १९४२ में उनके पिता की मृत्यु हुई तब वे परिवार में सबसे बड़ी थीं इसलिये परिवार की जिम्मेदारी उन्हें के ऊपर आ गई। अपने परिवार के भरण पोषण के लिये उन्होंने १९४२ से १९४८ के बीच हिन्दी व मराठी में करीबन ८ फिल्मों में काम किया। उनके पार्श्व गायन की शुरुआत १९४२ की मराठी फिल्म "कीती हसाल" से हुई। परन्तु गाने को काट दिया गया!!

वे पतली दुबली किन्तु दृढ़ निश्चयी थीं। उनकी बहनें हमेशा उनके साथ रहतीं। मुम्बई की लोकल ट्रेनों में सफर करते हुए उन्हें आखिरकार "आप की सेवा में (’४७)" पार्श्व गायिका के तौर पर ब्रेक मिल गया। अमीरबाई , शमशाद बेगम और राजकुमारी जैसी स्थापित गायिकाओं के बीच उनकी पतली आवाज़ ज्यादा सुनी नहीं जाती थी। फिर भी, प्रमुख संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने लता में विश्वास दिखाते हुए उन्हें मजबूर और पद्मिनी(बेदर्द तेरे प्यार को) में काम दिया जिसको थोड़ी बहुत सराहना मिली। पर उनके टेलेंट को सच्ची कामयाबी तब मिली जब १९४९ में उन्होंने तीन जबर्दस्त संगीतमय फिल्मों में गाना गाया। ये फिल्में थीं- नौशाद की "अंदाज़", शंकर-जयकिशन की "बरसात" और खेमचंद प्रकाश की "महल"। १९५० आते आते पूरी फिल्म इंडस्ट्री में लता की हवा चल रही थी। उनकी "हाई-पिच" व सुरीली आवाज़ ने उस समय की भारी और नाक से गाई जाने वाली आवाज़ का असर खत्म ही कर दिया था। लता की आँधी को गीता दत्त और कुछ हद तक शमशाद बेग़म ही झेल सकीं। आशा भोंसले भी ४० के दशक के अंत में आते आते पार्श्व गायन के क्षेत्र में उतर चुकीं थी।

आशा, मीना, लता, हृदयनाथ और ऊषा मंगेशकर
शुरुआत में लता की गायिकी नूरजहां की याद दिलाया करती पर जल्द ही उन्होंने अपना खुद का अंदाज़ बना लिया था। उर्दू के उच्चारण में निपुणता प्राप्त करने हेतु उन्होंने एक शिक्षक भी रख लिया! उनकी अद्भुत कामयाबी ने लता को फिल्मी जगत की सबसे मजबूत महिला बना दिया था। १९६० के दशक में उन्होंने प्लेबैक गायकों के रायल्टी के मुद्दे पर मोहम्मद रफी के साथ गाना छोड़ दिया। उन्होंने ५७-६२ के बीच में एस.डी.बर्मन के साथ भी गाने नहीं गाये। पर उनका दबदबा ऐसा था कि लता अपने रास्ते थीं और वे उनके पास वापस आये। उन्होंने ओ.पी नैय्यर को छोड़ कर लगभग सभी संगीतकारों और गायकों के साथ ढेरों गाने गाये। पर फिर भी सी.रामचंद्र और मदन मोहन के साथ उनका विशेष उल्लेख किया जाता है जिन्होंने उनकी आवाज़ को मधुरता प्रदान करी। १९६०-७० के बीच लता मजबूती से आगे बढ़ती गईं और इस बीच उन पर इस क्षेत्र में एकाधिकार के आरोप भी लगते रहे।

उन्होंने १९५८ की मधुमति फिल्म में "आजा रे परदेसी..." गाने के लिये फिल्म फेयर अवार्ड भी जीता। ऋषिकेष मुखर्जी की "अनुराधा" में पंडित रवि शंकर की धुनों पर गाने गाये और उन्हें काफी तारीफ़ मिली। उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू लता के गैर फिल्मी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों..." से अति प्रभावित हुए और उन्हें १९६९ में पद्म भूषण से भी नवाज़ा गया।

७० और ८० के दशक में लता ने तीन प्रमुख संगीत निर्देशकों लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन और कल्याण जी-आनंदजी के साथ काम किया। चाहें सत्यम शिवम सुंदरम हो, शोले या फिर मुकद्दर का सिकंदर, तीनों में लता ही केंद्र में रहीं। १९७४ में लंदन में आयोजित लता के "रॉयल अल्बर्ट हॉल" कंसेर्ट से बाकि शो के लिये रास्ता पक्का हो गया। ८० के दशक के मध्य में डिस्को के जमाने में लता ने अचानक अपना काम काफी कम कर दिया हालांकि "राम तेरी गंगा मैली" के गाने हिट हो गये थे। दशक का अंत होते होते, उनके गाये हुए "चाँदनी" और "मैंने प्यार किया" के रोमांस भरे गाने फिर से आ गये थे। तब से लता ने अपने आप को बड़े व अच्छे बैनरों के साथ ही जोड़े रखा। ये बैनर रहे आर. के. फिल्म्स (हीना), राजश्री(हम आपके हैं कौन...) और यश चोपड़ा (दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे, दिल तो पागल है, वीर ज़ारा) आदि। ए.आर. रहमान जैसे नये संगीत निर्देशक के साथ भी, लता ने ज़ुबैदा में "सो गये हैं.." जैसे खूबसूरत गाने गाये।

आजकल, लता मास्टर दीनानाथ अस्पताल के कार्यों में व्यस्त हैं। वे क्रिकेट और फोटोग्राफी की शौकीन हैं। लता, जो आज भी अकेली हैं, अपने आप को पूरी तरह संगीत को समर्पित किया हुआ है। वे अभी भी रिकॉर्डिंग के लिये जाने से पहले कमरे के बाहर अपनी चप्पलें उतारती हैं। लता मंगेशकर जैसी शख्सियतें विरले ही जन्म लेती हैं। लता जी को जन्मदिन की अग्रिम बधाई...

२६ सितम्बर को हेमन्त कुमार की १९वीं पुण्यतिथि है, तो क्यों न इस अवसर हेमन्त कुमार द्वारा संगीतबद्ध लता मंगेशकर की आवाज़ में 'खामोशी' (१९६९) फिल्म अमर गीत 'हमने देखी हैं इन आँखों की महकती खुश्बू' सुन लिया जाय। यह एक महान संगीतकार-गायक को हमारी श्रद्दाँजलि होगी। इस अमर गीत को गुलज़ार ने लिखा है।



प्रस्तुति- तपन शर्मा चिंतक
स्रोत- अंग्रेजी विकिपीडिया तथा अन्य इंटरनेटीय सजाल

आशा, मीना, लता, हृदयनाथ और ऊषा मंगेशकर
लता, आशा, ऊषा, मीना और शिवाजी गणेशन की विवाह की एक पॉर्टी के मौके पर


चित्र साभार- हामराफोटोज़

Tuesday, September 23, 2008

सुनिए 'हाहाकार' और 'बालिका से वधू'

सूखी रोटी खायेगा जब कृषक खेत में धरकर हल,
तब दूँगी मैं तृप्ति उसे बनकर लोटे का गंगाजल।
उसके तन का दिव्य स्वेदकण बनकर गिरती जाऊँगी,
और खेत में उन्हीं कणों से मैं मोती उपजाऊँगी।
फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदी से जग की अमा मिटा जाऊँ।-विश्चछवि ('रेणुका' काव्य-संग्रह से)


उपर्युक्त पंक्तियाँ पढ़कर किस कवि का नाम आपके दिमाग में आता है? जी हाँ, जिसने खुद जैसे जीव की कल्पना की जीभ में भी धार होना स्वीकारा था। माना था कि कवि के केवल विचार ही बाण नहीं होते वरन जिसके स्वप्न के हाथ भी तलवार से लैश होते हैं। आज यानी २३ सितम्बर २००८ को पूरा राष्ट्र या यूँ कह लें दुनिया के हर कोने में हिन्दी प्रेमी उसी राष्ट्रकवि रामधारी दिनकर की १००वीं जयंती मना रहे हैं। आधुनिक हिन्दी काव्य राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का शंखनाद करने वाले युग-चारण नाम से विख्यात, "दिनकर" का जन्म २३ सितम्बर १९०८ ई. को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया घाट नामक गाँव में हुआ था. इन की शिक्षा मोकामा घाट के स्कूल तथा फिर पटना कॉलेज से हुई जहाँ से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बी. ए. (ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की. एक विद्यालय के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जन-संपर्क विभाग के उप निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया. साहित्य-सेवाओं के लिए उन्हें डी. लिट. की मानक उपाधि, विभिन्न संस्थाओं ने उनकी पुस्तकों पर पुरस्कार ( साहित्य अकादमी तथा ज्ञानपीठ ) और भारत सरकार ने पद्मभूषण के उपाधि प्रदान कर उन्हें समानित किया.

कभी इसी कवि ने कहा था-

प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों के शृंगार माँगता हूँ। -- 'आग की भीख' ('सामधेनी' से)


इसी सप्ताह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अग्रयुवक शहीद भगत सिंह की भी जयंती है। क्या संयोग है कि एक ही सप्ताह में राष्ट्रकवि और राष्ट्रपुत्र का जन्मदिवस है! शायद राष्ट्रकवि ने भगत सिंह के सम्मान में और उनके जैसे वीरों में देशप्रेम की आग भरने के लिए ही कहा होगा-

यह झंडा, जिसको मुर्दे की मुट्ठी जकड़ रही है,
छिन न जाय, इस भय से अब भी कसकर पकड़ रही है,
थामो इसे, शपथ लो, बलि का कोई क्रम न रुकेगा,
चाहे जो हो जाय, मगर यह झण्डा नहीं झुकेगा।
इस झण्डे में शान चमकती है मरनेवालों की,
भीमकाय पर्वत से मुट्ठी भर लड़नेवालों की। --- 'सरहद के पार' से ('सामधेनी' से)


इस राष्ट्रकवि ने कविता को परिभाषित करते हुए कहा था-

बड़ी कविता कि जो इस भूमि को सुंदर बनाती है,
बड़ा वह ज्ञान जिससे व्यर्थ की चिन्ता नहीं होती।
बड़ा वह आदमी जो जिन्दगी भर काम करता है,
बड़ी वह रूह जो रोये बिना तन से निकलती है।---- 'स्वप्न और सत्य' ('नील कुसुम' से)



"दिनकर" के कुछ काव्य संकलन :

१ रश्मिरथी
२ कुरुक्षेत्र
३ चक्रवाल
४ रसवंती
५ नीम के पत्ते
६ संचयिता
७ आत्मा की आँखें
८ उर्वशी
९ दिनकर की सूक्तियां
१० मुक्ति - तिलक
११ सीपी और शंख
१२ दिनकर के गीत
१३ हारे को हरिनाम
१४ राष्मिलोक
१५ धुप और धुंआ
१६ कोयला और कवित्व ..... इत्यादि ..

हम रामधारी जी के साहित्य की मीमांसा करें तो छोटी मुँह बड़ी बात होगी। हमने सोचा कि आवाज़ के माध्यम से इस महाकवि को कैसे श्रद्धासुमन अर्पित करें। जिन खोजा, तिन पाइयाँ, अमिताभ मीत मिले, जो साहित्यकारों में सबसे अधिक दिनकर से प्रभावित हैं। मीत का परिवार भी साहित्य का रसज्ञ था। मीत को बचपन में इस राष्ट्रकवि का सानिध्य भी मिला। मीत का सपना ही है कि दिनकर की 'रश्मिरथी' को इस मंच से दुनिया के समक्ष 'आवाज़' के रूप में लाया जाय।

मीत ने दिनकर की दो प्रसिद्ध कविताओं 'हाहाकार' ('हुंकार' कविता-संग्रह से) और 'बालिका से वधू' ('रसवन्ती' कविता-संग्रह से) अपनी आवाज़ दी है। सुनें और राष्ट्रकवि को अपनी श्रद्धाँजलि दें।

हाहाकार


बालिका से वधू




प्रस्तुति- अमिताभ 'मीत'


कविता पृष्ठ पर पढ़ें वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश रावतानी की कलम से 'दिनकर-चंद स्मृतियाँ'


कलम आज उनकी जय बोल- शोभा महेन्द्रू की प्रस्तुति

Monday, September 8, 2008

वह कभी पीछे मुडकर नहीं देखती, इसीलिए वह आशा है

सजय पटेल ने दो बरस पहले ख्यात गायिका आशा भोंसले से उनके जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले बात की थी.उसी गुफ़्तगू की ज़ुगाली आज आवाज़ पर....

संघर्ष हर एक के जीवन में हमेशा ही रहता है, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर देखना नहीं सीखा और शायद इसीलिए वह सिर्फ़ नाम की आशा नहीं, ज़िंदगी का वो फ़लसफ़ा हैं जिसमें "निराशा' शब्द के लिए कोई जगह नहीं। वह वैसा फूल भी नहीं हैं जिसे कल मुरझाना है, वह ऐसी ख़ुशबू हैं जिसकी महक में उल्लास है, ख़ुशी है, ज़ज़्बा है।ये सारे शब्द उस आवाज़ के लिये यहाँ झरे हैं, जो साठ बरसों से मादकता, मदहोशी और मुस्कान का मीठा सिलसिला पेश करती आई हैं, आशा भोंसले।

दो बरस पहले टेलीफ़ोन पर उनसे जब चर्चा हुई थी तब आशाजी ने कहा- जीवन ताल और लय में होना ज़रूरी है। सुर उतरा तो चढ़ जाएगा, लेकिन ताल बिगड़ी तो समझिए संगीत का समॉं ही बिगड़ गया। मनुष्य के लिए "चाल-ढाल और गाने वालों के लिए ताल' बहुत ज़रूरी है। मैंने न जाने कितने संगीतकारों के साथ काम किया तो उसे अपना एक विनम्र कर्तव्य माना। कभी काम करके थकान नहीं महसूस की मैंने। मानकर चली कि संगीत का काम भी एक इबादत है, उसे तो करना ही है।

बातचीत में ज़ेहन में उनके सैकड़ों गीत उभरे लेकिन मैंने उनसे दो ख़ास प्रोजेक्ट की चर्चा की। एक उस्ताद अली अकबर ख़ॉं के साथ किए शास्त्रीय संगीत के एलबम की और दूसरे ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली द्वारा रचे गए ग़ज़लों के एलबम की। आशाजी ने बताया कि उस्ताद अली अकबर ख़ॉं साहब अपने एलबम के लिए क्लासिकल मौसिक़ी के कई बड़े नाम आज़मा चुके थे। लेकिन बात इसलिए नहीं बन रही थी कि वो जो चाहते वह बनता नहीं। गाने वाला अपना रंग उसमें उड़ेल देता। मैं ठहरी "प्लेबैक सिंगर' सो जैसा उन्होंने बताया, मैंने गाया। उनका सबसे बढ़िया कॉम्प्लीमेंट मेरे लिए यह था कि आशाबाई आपने बाबा के संगीत को पुनर्जीवित कर दिया। न जाने कौन-कौन से कैसे-कैसे क्लिष्टतम राग और बंदिशें थीं उसमें। लेकिन बस पन्द्रह दिन ख़ॉं साहब के साथ बैठी और रिकॉर्ड कर दिया। ग़ुलाम अली साहब के साथ भी पहले गाने में घबरा रही थी, पर मेरी बेटी वर्षा ने कहा - आप कीजिए। रात को एक कम्पोज़िशन गाकर सोई और सुबह दिमाग़ में धुन मुकम्मिल हो गई। बस बाकी तो आप संगीतप्रेमी जानते ही हैं कि वह एलबम लोगों को कितना पसंद आया।

जन्मदिन बिताने की तैयारी क्या है, पूछने पर उन्होंने कहा - अब जन्मदिन या जीवन की सारी ख़ुशियॉं मैं अपने नाती-पोतों में तलाशती हूँ। यह पूछने पर कि क्या यह कहना बेहतर होगा कि भारत में पॉप की साम्राज्ञी आप हैं, तो आशाजी ने ठहाके के साथ कहा कि मैंने अण्णा (संगीतकार सी.रामचंद्र) के साथ "इना मीना डीका' गाया था। वहॉं से पॉप को एक नई पहचान मिली। अब "रंग रंग रंगीला' तक सारा सिलसिला पॉप और मस्ती का ही तो है। उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में कहा- लोगों के जीवन में जैसे "पाप' है वैसे ही मेरे जीवन में "पॉप' है।आशा जी बोले जा रहीं थीं और मेरे दिलों-दिमाग़ में सुरों का समंदर उमड़ता आ रहा था. यक़ीन जाने लें मुझ जैसे कानसेन के लिये इस सुरगंध से बतियाना लगभग एक क़िस्म से हिप्नॉटाइज़ हो जाने जैसा था.



आशा जी ने बताया कि लता मंगेशकर की छोटी बहन होना हमेशा से फ़ख़्र का विषय रहा है और हमने हमेशा एक व्यावसायिक अनुशासन को क़ायम रखा है. वे (दीदी)हमेशा एक महान गुलूकारा रहीं है और न जाने कितने गायक-गायिकाओं ने उनसे प्रेरणा ली है तो मेरे लिये तो वे बड़ी बहन और एक प्यारी सखी रहीं हैं.आशाजी ठीक कहतीं हैं.और बुरा न मानें जब भी कोई इन दो स्वर-महारानियों में तुलता करता है तो मुझे बेहद अफ़सोस होता है. देखा जाए तो दोनों एक तरह एक ध्वनि-मुद्रिका दो साइड हैं.बताइये कैसे करें तुलना. एक तरफ़ कोई गीत अधिक अच्छा है , दूसरी तरफ़ कोई दूसरा अच्छा.

आशा भोंसले गायकी में विविधता का दूसरा नाम है. ज़रा ग़ौर फ़रमाइये इस छोटी सी फ़ेहरिस्त पर : अब के बरस भेज भैया को बाबुल,रंग,रंग,रंगीला,दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये,दम मारो दम,आगे भी जाने न तू,पीछे भी जाने तू, जो भी है बस वही एक पल है,चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया,सुन सुन दीदी तेरे लिये एक रिश्ता आया है;कितनी विविधता है इन गीतों के मूड में और यहीं आकर आशाजी अपवाद हो जातीं है.वे वैरायटी का सरमाया हैं.

आशा भोंसले अपनी निजी ज़िन्दगी में बहुत टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़रीं हैं,लेकिन अपने नाम की तरह उन्होंने अपने आप को साबित किया है.समय की अदला-बदली चलती रहेगी,तहज़ीब छुपा-छाई खेलती रहेगी,ज़ुबान के तेवर बदलेंगें लेकिन आशा भोंसले हर दौर में प्रासंगिक होंगी.इस सर्वकालिक महान गायिका को ज़िन्दगी की पिचहत्तरवीं पायदान पर हम सब संगीतपेमियों का प्रेमल सलाम !

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(चित्र में आशा जी एक कंसर्ट में गाती हुईं, संगीत दे रहे हैं, मरहूम संगीतकार और पति आर डी बर्मन साहब)
चित्र साभार - हमाराफोटोस

Saturday, September 6, 2008

यही वो जगह है - आशा, एक परिचय

बहुमुखी प्रतिभा-यही शब्द हैं जो आशा भोंसले के पूरे कैरियर को अपने में समाहित करते है। और कौन ऐसा है जो गर्व कर सके, जिसने व्यापक तौर पर तीन पीढ़ियों के महान संगीतकारों के साथ काम किया हो। चाहें ५० के दशक में ऒ.पी नय्यर का मधुर संगीत हो या आर.डी.बर्मन के ७० के दशक के पॉप हों या फिर ए.आर.रहमान का लयबद्ध संगीत- आशा जी ने सभी के साथ भरपूर काम किया है। गायन के क्षेत्र में प्रयोग करने की उनकी भूख की वजह से ही उनमें विविधता आ पाई है। उन्होंने १९५० के दशक में हिन्दी सिने जगत के पहले रॉक गीतों में से एक "ईना, मीना, डीका.." गाया। उन्होंने महान गज़ल गायक गुलाम अली व जगजीत सिंह के साथ कईं गज़लों में भी काम किया, और बिद्दू के पॉप व बप्पी लहड़ी के डिस्को गीत भी गाये।

मंगेशकर बहनों में से एक, आशा भोंसले का जन्म ८ सितम्बर १९३३ को महाराष्ट्र के मशहूर अभिनेता व गायक दीनानाथ मंगेशकर के घर छोटे से कस्बे "गोर" में हुआ। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की तरह इन्होंने भी बचपन से ही गाना शुरु कर दिया था। परन्तु अपने पिता से शास्त्रीय संगीत सीखने के कारण वे जल्द ही पार्श्व गायन के क्षेत्र में कूद पड़ी। अप्रैल १९४२ में इनके पिताजी का देहांत हो गया जिसके बाद इनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और बाद में मुम्बई जा बसा। करीबन १० वर्ष की उम्र में इन्होंने अपना पहला गीत मराठी फिल्म "माझा बाल" के लिये गाया। आशा अपने जन्म-स्थल को आज भी याद करती हैं और कहती हैं-"मैं अब भी संगली में बिताये अपने बचपन के दिन याद करती हूँ क्योंकि मेरी वजह से ही लता दी स्कूल से भागतीं थीं। मैं संगली को कभी नहीं भूल सकती क्योंकि वहाँ मेरा जन्म हुआ था"।

हम सबकीं आशा
आशा ने पार्श्व गायन की शुरुआत १९४८ में फिल्म "चुनरिया" से कर दी थी। किन्तु उन्हें अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा। १९४९ का अंत होते होते लाहौर, बरसात, अंदाज़ और महल जैसी फिल्में आईं और लता मंगेशकर संगीतकारों की पहली पसंद बन गईं थीं। आशा, लता दी जितनी ही प्रतिभाशाली होने के बावजूद अपना सही हक नहीं ले पा रहीं थी। ऐसे भी कईं संगीतकार थे जो लता के बाद शमशाद बेगम और गीता दत्त से गवाने के बारे में सोचते थे। जिसकी वजह से फिल्मी जगत में आशा की जगह न के बराबर थी। काफी हल्के बजट की फिल्में या वो फिल्में जिनमें लता न गा पा रहीं हों, वे ही उन्हें मिल पा रहीं थी। मास्टर कृष्ण दयाल, विनोद, हंसराज बहल, बसंत प्रकाश, धनीराम व अन्य संगीतकार थे जिन्होंने आशा जी के शुरुआती दिनों में उन्हें काम दिया। "चुनरिया" के अलावा १९४९ में आईं "लेख" और "खेल" ही ऐसी फिल्में रहीं जिनमें आशा जी ने गाना गाया। "लेख" में उन्होंने मास्टर कृष्ण दयाल के संगीत से सजा एक एकल गीत गाया व मुकेश के साथ एक युगल गीत -'ये काफिला है प्यार का चलता ही जायेगा..." गाया। १९५३ में "अरमान" के बाद ही उन्हें कामयाबी मिलनी शुरु हुई। एस.डी.बर्मन द्वारा संगीतबद्ध मशहूर गाना-"चाहें कितना मुझे तुम बुलावो जी, नहीं बोलूँगी, नहीं बोलूँगी...' गाया। यही गाना उन्होंने तलत महमूद के साथ भी गाया।

उसके बाद रवि ने उन्हें १९५४ में "वचन" में काम दिया। जहाँ उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ फिल्म में एकमात्र गीत गाया-"जब लिया हाथ में हाथ..."। ये अकेला गीत ही उन्हें प्रसिद्धि दिला गया और उन्होंने अपने पैर जमाने शुरु कर दिये। लेकिन एक दो तीन (१९५२), मुकद्दर(१९५०), रमन(१०५४), सलोनी (१९५२), बिजली(१९५०), नौलखा हार(१९५४) और जागृति(१९५३) जैसी कुछ फिल्में ही थी जिनमें उन्होंने एक या दो गाने गाये और यही उनके गाते रहने की उम्मीद थी।

१९५७ उनके लिये एक नईं किरण ले कर आया जब ओ.पी नय्यर जी ने उनसे "तुमसा नहीं देखा" और " नया दौर" के गीत गाने को कहा। उसी साल एस.डी.बर्मन और लता के बीच में थोड़ी अनबन हुई। उधर गीता दत्त भी शादी के बाद परेशान थीं और उपलब्ध नहीं रहती थीं। नतीजतन एस.डी.बर्मन ने भी आशा जी को अपनी फिल्म में लेने का निश्चय किया। उससे अगले साल उन्होंने हावड़ा ब्रिज, चलती का नाम गाड़ी और लाजवंती के कईं सुपरहिट गाने गाये। उसके बाद तो १९७० के दशक तक ओ.पी. नय्यर के लिये आशा जी पहली पसंद बनी रहीं। उसके बाद इन दोनों की जोड़ी में दरार आई। १९६० के दशक में ओ.पी नय्यर के संगीत में आशा जी ने एक से बढ़कर एक बढ़िया गाने गाये। १९७० का दशक उन्हें आर.डी. बर्मन के नज़दीक ले कर आया जिन्होंने आशा जी से कईं मस्ती भरे गीत गवाये। पिया तू अब तो आजा(कारवाँ), दम मारो दम(हरे राम हरे कृष्णा) जैसे उत्तेजक और नईं चुनौतियों भरे गाने भी उन्होंने गाये। जवानी दीवानी (१९७२) के गीत "जाने जां...." में तो उन्होंने बड़ी आसानी से ही ऊँचे और नीचे स्केल में गाना गाया। १९८० में तो उन्होंने गज़ल के क्षेत्र में कमाल ही कर दिया। "दिल चीज़ क्या है..", " इन आँखों की मस्ती..", " ये क्या जगह है दोस्तों..", "जुस्तुजू जिसकी थी.." जैसी सदाबहार गज़लें उनकी उम्दा गायकी निशानी भर हैं। इजाज़त (१९८७) में उन्होंने "मेरा कुछ सामान..: गाना गाया, जिसके लिये उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। ये गाना सबसे मुश्किल गानों में से एक गिना जाता है क्योंकि ये पद्य न हो कर गद्य के रूप में है। ९० के दशक में तो आशा ही छाईं रहीं। चाहें पॉप फिल्मी गीत हो, या पाश्चात्य संगीत की एल्बम हो सभी में आशा जी ही दिखाई पड़ती थीं। वैसे तो उन्होंने गाने गाने कम कर दिये हैं पर आज भी उर्मिला या ऐश्वर्या को रंगीला (१९९४) व ताल ('९९) में आशा जी के गानों पर थिरकते हुए देखा जा सकता है।

आज उनकी आवाज़ पहले से बेहतर और विविधता भरी हो गई है। यदि हम उन्हें संदीप चौटा के "कम्बख्त इश्क.." से पहले आर.डी.बर्मन "तेरी मेरी यारी बड़ी पुरानी.." गाते हुए सुन लें तो भी प्रत्यक्ष तौर पर दोनों आवाज़ों में अंतर करना बहुत कठिन होगा.. जबकि दोनों गानों में ३० बरस का अंतर है!!

दो दिन बाद आशा जी अपना ७५ वां जन्मदिन मनायेंगी, इस अवसर पर संजय पटेल का विशेष आलेख अवश्य पढियेगा, फिलहाल सुनते हैं फ़िल्म "ये रात फ़िर न आयेगी" फ़िल्म का ये मधुर गीत आशा जी की आवाज़ में -



जानकारी स्रोत - इन्टनेट
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"

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