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Wednesday, March 21, 2012

"दिल आने के ढंग निराले हैं" - वाक़ई निराला था ख़ुर्शीद अनवर का संगीत जिनकी आज १०१-वीं जयन्ती है!


पूरे पंजाब विश्वविद्यालय में एम.ए दर्शनशास्त्र में प्रथम आने के बाद प्रतिष्ठित ICS परीक्षा के लिखित चरण में सफल होने के बावजूद साक्षात्कार चरण में शामिल न होकर संगीत के क्षेत्र को चुना था ख़ुर्शीद अनवर ने। अपनी मेधा को संगीत क्षेत्र में ला कर अत्यन्त कर्णप्रिय धुनें उन्होंने बनाई। २१ मार्च १९१२ को जन्मे ख़ुर्शीद अनवर की आज १०१-वीं जयन्ती है। इस उपलक्ष्य पर उनके द्वारा रचे एक गीत से जुड़ी बातें सुजॉय चटर्जी के साथ 'एक गीत सौ कहानियाँ' की १२-वीं कड़ी में...


एक गीत सौ कहानियाँ # 12

1947 में देश के विभाजन के बाद बहुत से कलाकार भारत से पाक़िस्तान जा बसे और बहुत से कलाकार सरहद के इस पार आ गए। उस पार जाने वालों में एक नाम संगीतकार ख़ुर्शीद अनवर का भी है। ख्वाजा ख़ुर्शीद अनवर का जन्म २१ मार्च १९१२ को मियाँवाली, पंजाब (अब पाक़िस्तान) में हुआ था। उनके नाना ख़ान बहादुर डॉ. शेख़ अट्टा मोहम्मद सिविल सर्जन थे और उनके पिता ख्वाजा फ़िरोज़ुद्दीन अहमद लाहौर के एक जानेमाने बैरिस्टर। पिता को संगीत का इतना ज़्यादा शौक था कि उनके पास ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स का एक बहुत बड़ा संग्रह था। इस तरह से बेटे ख़ुर्शीद को घर पर ही संगीत का माहौल मिल गया। बेटे की संगीत में दिलचस्पी के मद्देनज़र उनके पिता ने उन्हें ख़ानसाहिब तवक्कल हुसैन के पास संगीत सीखने भेज दिया। दूसरी तरफ़ ख़ुर्शीद अपने नाना और पिता की ही तरह मेधावी भी थे। वे गवर्णमेण्ट कॉलेज, लाहौर के एक मेधावी छात्र रहे। पूरे पंजाब विश्वविद्यालय में एम.ए दर्शनशास्त्र में प्रथम आने के बाद प्रतिष्ठित ICS परीक्षा के लिखित चरण में सफल होने के बावजूद साक्षात्कार चरण में शामिल न होकर संगीत के क्षेत्र को चुना था ख़ुर्शीद अनवर ने। अपनी मेधा को संगीत क्षेत्र में ला कर अत्यन्त कर्णप्रिय धुनें उन्होंने बनाई। नौशाद, रोशन, शंकर जयकिशन जैसे संगीतकार ख़ुर्शीद अनवर को पाँचवे दशक के सर्वोत्तम संगीतकारों में मानते थे। यह भी एक रोचक तथ्य है कि पंजाब विश्वविद्यालय के पुरस्कार वितरण समारोह में ख़ुर्शीद अनवर मौजूद नहीं थे। जब उनका नाम घोषित किया गया, तो विश्वविद्यालय के ब्रिटिश चान्सेलर, जो छात्रों को मेडल प्रदान कर रहे थे, ने यह टिप्पणी की कि जो छात्र अपना मेडल लेना भी भूल जाता है वह वाक़ई सच्चा दार्शनिक है। इस टिप्पणी पर वहाँ मौजूद सभी लोग हँस पड़े थे।

ए. आर. कारदार की पंजाबी फ़िल्म 'कुड़माई' (१९४१) से शुरुआत करने के बाद खुर्शीद अनवर ने 'इशारा' (१९४३), 'परख' (१९४४), 'यतीम' (१९४५), 'आज और कल' (१९४७), 'पगडंडी' (१९४७) और 'परवाना' (१९४७) जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। स्वाधीनता मिलने के बाद १९४९ में फिर उनके संगीत से सजी एक फ़िल्म आई 'सिंगार'। दरसल देश-विभाजन के बाद वो पाक़िस्तान चले गए थे जहाँ जनवरी १९४८ में उनका विवाह हुआ। अपने घनिष्ठ मित्र व फ़िल्म निर्माता जे. के. नन्दा के बुलावे पर मध्य १९४८ में पुन: बम्बई आकर फ़िल्म 'सिंगार' में संगीत दिया जो १९४९ में जाकर प्रदर्शित हुई। 'सिंगार' के मुख्य कलाकार थे जयराज, मधुबाला और सुरैया। जहाँ एक तरफ़ सुरैया ने अपने उपर फ़िल्माए गानें ख़ुद ही गाए, वहीं दूसरी तरफ़ मधुबाला के पार्श्वगायन के लिए गायिका सुरिन्दर कौर को चुना गया। ख़ुर्शीद अनवर ने सुरिन्दर कौर से इस फ़िल्म में कुल पाँच गानें गवाए।

ऐसा सुना जाता है कि ख़ुर्शीद अनवर इस फ़िल्म में मधुबाला के लिए लता मंगेशकर की आवाज़ लेना चाहते थे। पर उनका यह सपना सपना ही बनकर कैसे रह गया, इसकी भी एक रोचक कहानी है। पंकज राग की किताब 'धुनों की यात्रा' में इस कहानी का वर्णन कुछ इस तरह से मिलता है - दरअसल ख़ुर्शीद अनवर ने लता को उनकी मशहूरियत के दिनों के पहले एक फ़िल्म के गीत की रिहर्सल के लिए बुलाया था। लता जब पहुँची तो ख़ुर्शीद अनवर नहीं थे और कमरे में एक हारमोनियम वादक और एक सारंगी वादक बैठे थे। कुछ देर बाद हारमोनियम वादक ने लता को गाना सीखने के लिए बुलाया। लता ने पूछा कि वे अगर ख़ुर्शीद अनवर नहीं हैं तो वे गाना कैसे सिखा सकते हैं। इस पर हारमोनियम वादक ने उन्हें उत्तर में बताया कि ख़ुर्शीद अनवर स्वयं न तो हारमोनियम बजा सकते थे और न ही गाते थे, वे तो सिर्फ़ धुनें कम्पोज़ करते थे। लता के लिए यह आश्चर्यजनक था और यह कहते हुए कि वे उस संगीतकार के लिए नहीं गा सकतीं जो स्वयं गीत नहीं सिखा सकते, वे लौट आईं। इस वाक़ये पर ख़ुर्शीद अनवर के कुछ चहेतों ने आपत्ति लेते हुए इसे ग़लत भी बताया है। पर सच्चाई यह है कि लता कभी ख़ुर्शीद अनवर के लिए न गा सकीं।

खुर्शीद अनवर की पहली हिन्दी फ़िल्म 'इशारा' और 'सिंगार' में यह समानता है कि दोनों फ़िल्मों में उन्होंने हरियाणा के लोक संगीत का शुद्ध रूप से प्रयोग किया है। 'इशारा' में "पनघट

पे मुरलिया बाजे" और "सजनवा आजा रे खेलें दिल के खेल" जैसे गीत थे तो 'सिंगार' में "चंदा रे मैं तेरी गवाही लेने आई" और "नया नैंनो में रंग" जैसी मधुर रचनाएँ थीं। इस फ़िल्म के संगीत के लिए ख़ुर्शीद अनवर को पुरस्कृत भी किया गया था। फ़िल्म 'सिंगार' में रोशन ने बतौर सहायक काम किया था। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था सुरिन्दर कौर का गाया "दिल आने के ढंग निराले हैं"। ख़ुर्शीद अनवर के बारे में सुरिन्दर कौर ने एक बार बताया था कि इस फ़िल्म के गीतों के रेकॉर्डिंग् के समय ख़ुर्शीद अनवर यह चाहते थे कि सुरिन्दर कौर गाने के साथ-साथ हाव-भाव भी प्रदर्शित करें, पर उन्होंने असमर्थता दिखाई कि वे भाव आवाज़ में ला सकती हैं, एक्शन में नहीं। यह काम मधुबाला ने कर दिखाया जिन पर यह गीत फ़िल्माया गया था।

"दिल आने के ढंग निराले हैं" गीत को लिखा था नख़शब जारचवी ने। मज़ेदार बात है कि बिल्कुल इन्हीं बोलों पर १९४८ की फ़िल्म 'मेरी कहानी' में सुरेन्द्र का भी गाया हुआ एक गीत है, और उस फ़िल्म में संगीतकार थे दत्ता कोरेगाँवकर। दोनों गीतों में बस इतना फ़र्क है कि दूसरे अंतरे की पहली दो पंक्तियाँ दोनों गीतों में अलग है, बाकी सब कुछ बिल्कुल एक है। ये रहे दोनों गीतों के बोल...

फ़िल्म - सिंगार, गायिका - सुरिन्दर कौर

दिल आने के ढंग निराले हैं,
दिल से मजबूर सब दिलवाले हैं।

कभी अखियाँ मिलाने पे आता है दिल,
कभी अखियाँ बचाने पे आता है दिल,
वो ही अखियाँ जिन्हें हमसे मतलब नहीं,
अखियों पे हम मतवाले हैं, दिल आने के ढंग....

तुमको देखा तो दुनिया बदलने लगी,
नज़रे बहकीं तबीयत मचलने लगी,
दिल की धड़कन इशारों पे चलने लगी,
बड़ी हिम्मत से काबू में रखा है दिल,
बड़ी मुश्किल से होश सम्भाले हैं, दिल आने के ढंग....

फ़िल्म - मेरी कहानी, गायिका - सुरेन्द्र

दिल आने के ढंग निराले हैं,
दिल से मजबूर सब दिलवाले हैं।

कभी अखियाँ मिलाने पे आता है दिल,
कभी अखियाँ बचाने पे आता है दिल,
वो ही अखियाँ जिन्हें हमसे मतलब नहीं,
अखियों पे हम मतवाले हैं, दिल आने के ढंग....

प्यारी सूरत का जब सामना हो गया,
हम पे लाखों अदायों ने हमला किया,

बड़ी हिम्मत से काबू में रखा है दिल,
बड़ी मुश्किल से होश सम्भाले हैं, दिल आने के ढंग....

यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि दो अलग अलग फ़िल्मों में एक ही गीत कैसे हो सकता है। हिन्दी फ़िल्म गीत कोश में नज़र दौड़ाने पर पता चलता है कि इन दोनों फ़िल्मों के निर्माता और निर्देशक अलग अलग हैं, संगीतकार भी अलग हैं। ऐसे में नख़शब ने कैसे अपना एक ही गीत दो फ़िल्मों के लिए दे दिया, यह आश्चर्य में डालने वाली ही बात है। ख़ैर, जो भी है, गीत सुन्दर व कर्णप्रिय है। आज ख़ुर्शीद अनवर की १०१-वीं जयन्ती पर इस गीत को याद करते हुए दिल जैसे उस गुज़रे हुए ज़माने में पहुँच गया है जब फ़िल्म-संगीत अपने पूरे शबाब पर हुआ करती थी। वाक़ई निराला था उस दौर का फ़िल्म-संगीत, वाक़ई निराले थे ख़ुर्शीद अनवर जैसे संगीतकार।

सुरिन्दर कौर और सुरेन्द्र के गाए "दिल आने के ढंग निराले हैं" को एक के बाद सुनने के लिए नीचे प्लेयरों पर क्लिक करें।




तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Thursday, April 7, 2011

मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है.....और मोहब्बत के भेद बताते बताते यूं हीं एक दिन अचानक सहगल साहब अलविदा कह गए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 630/2010/330

सुर-सम्राट कुंदन लाल सहगल को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'मधुकर श्याम हमारे चोर' की अंतिम कड़ी में आप सभी का स्वागत है। कल हमारी बातचीत १९४६ की यादगार फ़िल्म 'शाहजहाँ' पर आकर रुकी थी। इसी साल लाल मोहम्मद के संगीत में मुरारी पिक्चर्स की फ़िल्म आयी 'ओमर ख़ैयाम', जिसमें सहगल साहब एक बार फिर सुरैया के साथ नज़र आये। और फिर आया भारत के इतिहास का सुनहरा वर्ष १९४७। हालाँकि यह सुनहरा दिन १५ अगस्त को आया, इस साल की शुरुआत एक ऐसी क्षति से हुई जिसकी फिर कभी भरपाई नहीं हो सकी। १८ जनवरी को सहगल साहब चल बसे। पूरा देश ग़म के सागर में डूब गया। एक युग जैसे समाप्त हो गया। आपको शायद पता होगा कि उस दौरान लता मंगेशकर संघर्ष कर रही थीं और फ़िल्मों में अभिनय किया करती थीं अपने परिवार को चलाने के लिए। लता ने अपनी कमाई में से कुछ पैसे बचाकर एक रेडिओ ख़रीदा और घर लौट कर उसे 'ऒन' किया और आराम से बिस्तर पर लेट गईं। और तभी रेडियो पर सहगल साहब के इंतकाल की ख़बर आई। लता इतनी हताश हुईं कि उस रेडियो को जाकर वापस कर आईं। लता के उस वक़्त की मनोस्थिति का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं क्योंकि लता सहगल साहब को सब से ज़्यादा मानती थीं। विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में लता जी ने कहा था, "स्वर्गीय श्री के. एल. सहगल, वैसे तो उनसे सीखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ, मगर उनके गानें सुन सुन कर ही मुझमें सुगम संगीत गाने की इच्छा जागी। मेरे पिताजी, श्री दीनानाथ मंगेशकर, जो अपने ज़माने के माने हुए गायक थे, उनको सहगल साहब की गायकी बहुत पसंद थी। वो अक्सर मुझ सहगल साहब का कोई गीत सुनाने को कहते।"

सहगल साहब के गुज़र जाने के बाद १९४७ में उनकी अंतिम फ़िल्म प्रदर्शित हुई - 'परवाना'। 'जीत प्रोडक्शन्स' निर्मित इस फ़िल्म में एक बार फिर सुरैया नज़र आईं सहगल साहब के साथ। डी. एन. मधोक ने फ़िल्म के गानें लिखे और संगीतकार थे ख़ुरशीद अनवर। "डूब गये सब सपने मेरे", "ये फूल हँसके बाग में कलियाँ खिलाये जा", "उस मस्त नज़र पे जो पड़ी नज़र", "कौन बुझावे हे रामा हो" और "मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है" जैसे सहगल साहब के गीतों नें इस फ़िल्म की शोभा बढ़ाई। आइए आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी में सुनें "मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है, तबीयत और घबराती है जब बहलायी जाती है, झिझक के गुफ़्तगूँ करना है अपना राज़ कह देना, इसी पर्दे के पीछे तमन्ना पायी जाती है, मोहब्बत दिल में छुप सकती है आँखों में नहीं छुपती, ज़ुबाँ ख़ामोश है लेकिन नज़र शरमाई जाती है"। और इसी के साथ इस अज़ीम और अमर गायक-अभिनेता कुंदन लाल सहगल पर केन्द्रित 'मधुकर श्याम हमारे चोर' शृंखला यहीं सम्पन्न होती है। सहगल साहब के गाये बहुत से गीत छूट गये, जिन्हें हम आगे चलकर समय समय पर सुनवाएँगे। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सफ़र में आप युंही हमारा हमसफ़र बनें रहिए। इस स्तंभ के लिये अपनी राय और सुझाव oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। शनिवार की शाम विशेषांक के साथ फिर हाज़िर होंगे, तब तक के लिए दीजिए इजाज़त, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि कुंदन लाल सहगल के बेटे का नाम है मदन मोहन, और दो बेटियाँ हैं नीना और बीना। अफ़सोस की बात यह कि इनमें से कोई भी आज जीवित नहीं हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 1/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एस डी बर्मन का है संगीत.

सवाल १ - किस अभिनेता ने पार्श्वगायन किया है इस गीत में - 3 अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - 2 अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
खैर इस बार मुकाबला सख्त और पहेलियाँ भी बेहद विविदास्पद रही. मगर फिर भी अमित जी अनजाना जी से मात्र एक अंक अधिक लेकर छटी बार विजेता बन गए हैं. अब तक श्याम कान्त जी ४ बार, शरद जी २ बार और अनजाना जी एक बार विजेता बने हैं. नयी श्रृंखला के लिए सभी को शुभकामनाये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, June 17, 2010

"धड़क धड़क तेरे बिन मेरा जियरा" - दो नामी गायिकाएँ लेकिन उनकी दुर्लभ जोड़ी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 420/2010/120

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम पिछले नौ दिनों से सुन रहे हैं दुर्लभ गीतों से सजी लघु शृंखला 'दुर्लभ दस'। इन गीतों को सुनते हुए आपने महसूस किया होगा कि ये सभी बेहद कमचर्चित फ़िल्मों के गानें हैं। बस 'बिलवा मंगल' को छोड़ कर बाकी सभी फ़िल्में बॊक्स ऒफ़िस पर असफल रहीं, जिनमें अधिकतर धार्मिक और स्टण्ट फ़िल्में हैं। आपने यह भी महसूस किया होगा कि इन गीतों के गायक भी कमचर्चित गायकों में से ही थे। लेकिन आज इस शृंखला की दसवीं और अंतिम कड़ी के लिए हमने जिस गीत को चुना है, वह गीत है तो दुर्लभ और भूला बिसरा, लेकिन इसमें दो ऐसी आवाज़ें शामिल हैं जिन्होने अपार शोहरत व सफलता हासिल की है अपने अपने करीयर में। इन दोनों गायिकाओं ने असंख्य लोकप्रिय गीत हमें दिए हैं, जिनकी फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि अगर हिसाब लगाने बैठें तो न जाने कितने दिन गुज़र जाएँगे। लेकिन अगर आपसे हम यह कहें कि इन दोनों गायिकाओं के साथ में गाए हुए गीतों के बारे में बताइए, तो शायद आप झट से कोई गीत याद ही न कर पाएँ। तभी तो यह जोड़ी एक दुर्लभ जोड़ी है और आज के कड़ी की शान है यह जोड़ी। यह जोड़ी है फ़िल्म संगीत संसार के दो बेहद महत्वपूर्ण आवाज़ों की - सुरैय्या और आशा भोसले की। जी हाँ, इन दोनों ने बहुत ही कम गीत साथ में गाए हैं, और हमने जिस गीत को खोज निकाला है, वह है १९४९ की फ़िल्म 'सिंगार' का - "धड़क धड़क तेरे बिन मेरा जियरा...तेरे बिन चैन न आए रे"। फ़िल्म मे संगीत दिया था ख़ुरशीद अनवर ने, और गानें लिखे थे डी. एन. मधोक, नक्शब जराचवी और शक़ील बदायूनी ने। प्रस्तुत गीत मधोक साहब का लिखा हुआ है। जयराज, मधुबाला व सुरैय्या अभिनीत 'सिंगार' में सुरैय्या की आवाज़ में एकल गीत "नया नैनों में रंग नई ऊँची उमंग जिया बोले मीठी बानी, एक तुम हो साथ दूजे हाथ में हाथ तीजे शाम सुहानी" गीत लोकप्रिय हुआ था। सुरिंदर कौर ने भी इस फ़िल्म में पाँच गीत गाए थे।

संगीतकार ख़ुरशीद अनवर पर 'लिस्नर्स बुलेटिन' पत्रिका में सन् १९८५ के अगस्त महीने के अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ था कैयुम अज़ीज़ का लिखा हुआ। उसी लेख का एक अंश आज यहाँ पेश कर रहे हैं। "भारत विभाजन के बाद विशुद्ध व्यावसायिकता को दृष्टिगत रखते हुए पाकिस्तान जा बसने वाले, अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकार ख़ुरशीद अनवर का ३० अक्तुबर १९८४ को लाहौर में दुखद निधन हो गया। वे लगभग ७० वर्ष के थे। ख़ुरशीद अनवर ने अपने संगीत जीवन की शुरुआत आल इण्डिया रेडियो के संगीत विभाग में प्रोड्युसर-इन-चार्ज की हैसियत से की थी। फ़िल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में पहली बार उन्हें पंजाबी फ़िल्म 'कुड़माई' में सन् १९४१ में संगीत देने का अवसर मिला जिसमें वास्ती, जगदीश, राधारानी, जीवन आदि कलाकारों ने अभिनय किया था। निर्देशक थे जे. के. नन्दा। उनके मधुर संगीत से सजी पहली हिंदी फ़िल्म थी 'इशारा' जो सन् १९४३ में प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म के डी. एन. मधोक लिखित सभी ९ गीतों को सुरैय्या के गाए "पनघट पे मुरलिया बाजे" तथा गौहर सुल्ताना के गाए "शबनम क्यों नीर बहाए" विशेष लोकप्रिय हुए थे। अभिनेत्री वत्सला कुमठेकर ने भी फ़िल्म में दो गीत गाए थे - "दिल लेके दगा नहीं देना" तथा "इश्क़ का दर्द सुहाना"।" ख़ुरशीद अनवर के शुरुआती फ़िल्मों के बारे में हमने आपको जानकारी दी, उनसे जुड़ी कुछ और बातें हम आगे चलकर फिर कभी देंगे जब भी कभी उनका स्वरब्द्ध किया हुआ गीत इस महफ़िल में पेश होगा। फिलहाल वक़्त हो चला है सुरैय्या, आशा भोसले और साथियों के गाए फ़िल्म 'सिंगार' के इस गीत को सुनने का। और इसके साथ ही 'दुर्लभ दस' शृंखला को समाप्त करने की दीजिए हमें इजाज़त, अपनी राय व वि़चारों का हम oig@hindyugm के पते पर इंतज़ार करेंगे। नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि पाकिस्तान में ख़ुरशीद अनवर की जो फ़िल्में मशहूर हुईं थीं उनमें शामिल हैं 'ज़हरे-इश्क़', 'घुंघट', 'चिंगारी', 'इंतज़ार', 'कोयल', 'शौहर', 'चमेली', 'हीर रांझा' इत्यादि।।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस संगीतकार जोड़ी के एक पार्टनर का जन्मदिन ३० जून को आता है, कौन सी है ये जोड़ी -३ अंक.
२. १९५९ में आई इस फिल्म के इस मशहूर गीत में इन्होने उस वाध्य का प्रमुखता से इस्तेमाल किया था, जिसे बजा कर वो कभी संगीत की दुनिया पे छा गए थे, फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
३. इस युगल गीत में एक आवाज़ मुकेश की है, गीतकार का नाम बताएं - २ अंक.
४. मुखड़े में शब्द है "नज़रें" - गीत के बोल बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत अच्छे, इंदु जी और शरद जी ने तीन -तीन अंक बाँट लिए, बहुत बढ़िया

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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