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मंगलवार, 23 नवंबर 2010

सुजॉय जी को शादी का तोहफ़ा देने आ गए हैं सलीम-सुलेमान और अमिताभ भट्टाचार्य "बैंड बाजा बारात" के साथ

अभी वक़्त है अपने नियमित ताज़ा सुर ताल का.. ताज़ा सुर ताल यानि कि टी एस टी, जिसके मेजबान मुख्य रूप से सुजॉय जी हुआ करते हैं। मुख्य रूप से इसलिए कहा क्योंकि हर मंगलवार के दिन समीक्षा के दौरान उनसे बातचीत होती है, अब ये बातचीत मैं करूँ या फिर सजीव जी करें... पिछली मर्तबा ये बागडोर सजीव जी ने संभाली थी और उसके पहले कई हफ़्तों तक बातचीत का वो सिरा मेरे हाथ में था.. लेकिन दूसरा सिरा हमेशा हीं सुजॉय जी थामे रहते हैं। आज के दिन और आज के बाद दो-तीन और हफ़्तों तक स्थिति अलग-सी रहने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुजॉय जी घर गए हुए हैं.. अपनी ज़िंदगी के उस सिरे को संभालने जिसका दूसरा सिरा उनकी अर्धांगिनी के हाथों में है। जी हाँ, कल हीं सुजॉय जी की शादी थी। शादी बड़ी धूमधाम से हुई और होती भी क्यों नहीं, जब हम सब दोस्तों और शुभचिंतकों की दुआएँ उनके साथ थीं। हम सब तक की तरफ़ से सुजॉय जी को शादी की शुभकामनाएँ, बधाईयाँ एवं बहुत-बहुत प्यार .. (बड़ों की तरफ़ से आशीर्वाद भी).. हम नहीं चाहते थे कि इन मंगल घड़ियों में उन्हें थोड़ा भी तंग किया जाए, इसलिए कुछ हफ़्तों तक ताज़ा सुर ताल मैं अकेले हीं (या फिर कभी-कभार सजीव जी के साथ) हीं संभालने वाला हूँ। आपसे उसी प्रोत्साहन की उम्मीद रहेगी, जो सुजॉय जी को हासिल होती है। धन्यवाद! चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का शुभारंभ करते हैं।

इसे इत्तेफ़ाक़ हीं कहेंगे कि शादी की बातें करते-करते हम जिस फिल्म की समीक्षा करने जा रहे हैं, वह फिल्म भी शादियों को हीं ध्यान में रख कर बनी है। यशराज बैनर्स के तहत आने वाली इस फिल्म का निर्देशन किया है मनीष शर्मा ने, कहानी भी उन्हीं की है, जबकि पटकथा लिखी है हबीब फैजल ने। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह। फिल्म १० दिसम्बर २०१० को रीलिज होने वाली है। इस फिल्म में संगीत है पार्श्व-संगीत के दम पर हिन्दी-फिल्मों में अपनी पहचान बनाने वाले "सलीम-सुलेमान" बंधुओं का और गीत लिखे हैं "अमित त्रिवेदी" के खासम-खास "अमिताभ भट्टाचार्य" ने (देव-डी, उड़ान)।

फिल्म का पहला गाना है "ऐं वैं.. ऐं वैं".. आवाज़ें हैं सलीम मर्चैंट और सुनिधि चौहान की। गाने की धुन ऐसी है कि पहली बार में हीं आपके मन पर छा जाए और संयोजन भी कमाल का है। गीत सुनकर डान्स-फ्लोर पर उतरने को जी करने लगता है। चूंकि गाने के माध्य्म से पंजाबी माहौल तैयार किया गया है, इसलिए पार्श्व में बैंजो और बांसुरी को आराम से महसूस किया जा सकता है। अमिताभ के बोल बाकी नियमित पंजाबी गानों (भांगड़ा) से काफी अलग हैं। "चाय में डुबोया बिस्किट हो गया" या फिर "गुड़ देखा, मक्खी वहीं फिट हो गया".. जैसी पंक्तियाँ विरले हीं सुनने को मिलती है। मुझे यह गाना बेहद भाया। इस गाने का एक "दिल्ली क्लब मिक्स" भी है, जिसमें मास्टर सलीम ने सलीम मर्चैंट का स्थान लिया है। मास्टर सलीम के आने से "माँ दा लाडला" वाली फिलिंग आ जाती है। थोड़ी कोशिश करने पर आप आवाज़ में इस परिवर्तन को महसूस कर सकते हैं। दोनों हीं गाने अच्छे हैं।

गीत - ऐं वैं


गीत - ऐं वैं (दिल्ली क्लब मिक्स)


अब बढते हैं अगले गाने की ओर। यह गाना है "तरकीबें", जिसे गाया है बेन्नी दयाल ने और उनका बेहतरीन तरीके साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। सलीम-सुलेमान और बेन्नी दयाल की जोड़ी "पॉकेट में रॉकेट" के बाद एक बार फिर साथ आई है। कहीं कहीं यह गाना उसी गाने का एक्सटेंशन लगता है। बेन्नी दयाल एक बार फिर सफल हुए हैं, अपनी आवाज़ का जादू चलाने में। लेकिन मेरे हिसाब से इस गाने की सबसे खूबसूरत बात है, इसके बोल। "अनकन्वेशनल राईटिंग" की अगर बात आएगी, तो इस गाने को उसमें जरूर शुमार किया जाएगा। "कंघी हैं तरकीबें" या फिर "हौसलें सेंक ले" जैसे विचार आपको सोचने पर और सोचकर खुश होने पर मजबूर करते हैं।

गीत - तरकीबें


अगला गाना है "श्रेया घोषाल" की आवाज़ में "आधा इश्क़"। आजकल यह कहावत चल पड़ी है कि श्रेया कभी गलत नहीं हो सकती और श्रेया का गाया गाना कभी बुरा नहीं हो सकता। तो फिर "आधा इश्क़" को खूबसूरत होना हीं है। कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि "आधा इश्क़" भी कुछ होता है क्या?.. उन लोगों को शायद यह पता नहीं कि एकतरफ़ा इश्क़ तो आधा हीं हुआ ना.. यह मेरा ख्याल है, लेकिन ख्याल कोई भी हो.. जब ज़िंदगी "दस ग्राम" की हो सकती है तो इश्क़ "आधा" क्यों नहीं हो सकता। क्या कहते हैं आप लोग?

गीत - आधा इश्क़


चलिए तो बात को आगे बढागे हुए एलबम के चौथे गाने की ओर आते हैं। यह गाना है बेन्नी दयाल और हिमानी कपूर की आवाज़ो में "दम-दम"। इस गाने को सुनने के बाद मुझे यही लगा कि सलीम-सुलेमान ने "दम" भरे गाने के लिए बेन्नी को चुनकर गलती कर दी। गाने में जब तक अंतरा नहीं आता, तब तक दम जैसी कोई बात हीं नज़र नहीं आती। अब जबकि इस गाने को एक आईटम सॉंग जैसा होना है तो आवाज़ से भी वो जोश झलकना चाहिए ना। अंतरे के पहले (यानि कि मुखरे में) धुन भी थोड़ी सुस्त है। अंतरे में यह गाना जोर पकड़ता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। "दम-दम" में दम नहीं है मेरे भाई!! "दम-दम" का एक सूफ़ी-मिक्स है जिसे सुखविंदर ने गाया है.. सभी जानते हैं कि "जोश" का दूसरा नाम है "सुखविंदर" और ऊपर से मिक्स यानि कि "पेसी ट्युन" तो सूफ़ी-मिक्स हर मामले में बढिया है "दम-दम" से। मेरी यही चाहत है कि फिल्म में "सूफ़ी-मिक्स" हो, तभी मज़ा आएगा।

गीत - दम दम


गीत - दम दम (सूफ़ी मिक्स)


अगले गाने "मितरा" में गायकी की कमान संभाली है खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने और उनका साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। यह गाना हर मामले में बेहतरीन है। इस गाने में "अमित त्रिवेदी" की झलक मिलती है, शायद इसीलिए अमिताभ भी माईक के पीछे आने को राजी हुए हैं। सलीम की आवाज़ हर तरह के गाने में काम करती है, इसलिए वे यहाँ भी अपना असर छोड़ जाते हैं। मितरा के बाद बारी है एक नियमित भांगड़े की, जो हर पंजाबी शादी के लिए एक रस्म-सा माना जाता है। लेकिन यह भांगड़ा दूसरे पंजाबी भांगड़ों से थोड़ा अलग है। इस भांगड़े का नाम यूँ तो "बारी बरसी" हीं है, लेकिन इसमें "खट के" कोई हीर या रांझा नहीं लाते, बल्कि "पिज़्ज़ा" , "गोंद" और "खजूर" लाते हैं। इस गाने को सुनकर आप अपने पेट और मुँह पर हाथ रखकर "हँसी" रोकने की कोशिश करेंगे तो वहीं अपनी कदमों को काबू में रखकर यह कोशिश करेंगे कि कहीं "नाच न निकल जाए"। चूँकि यह गाना मस्ती के लिए बना है और एक नियमित पैटर्न पर बना है, इसलिए इसे अच्छा या खराब निर्धारित करने का कोई तुक नहीं बनता। चलिए तो अब सुनते हैं "मितरा" और "बारी बरसी"।

गीत - मितरा


गीत - बारी बरसी


कुल मिलाकर मुझे "सलीम-सुलेमान" की यह पेशकश अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। चलते-चलते इस फिल्म का "थीम सॉंग" सुन लेते हैं, जिसे गाया है सलीम मर्चैंट और श्रद्धा पंडित ने। छोटा-सा गाना है, लेकिन चूँकि यह थीम है तो मेरे हिसाब से फिल्म में एक से ज्यादा बार बजेगा जरूर।



आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: तरकीबें और मितरा

लुंज-पुंज गीत: दम-दम

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

संगीत समीक्षा : गुजारिश - संगीत निर्देशन में भी अव्वल साबित हुए संजय लीला भंसाली...तुराज़ के शब्दों ने रचा एक अनूठा संसार

दोस्तों आज टी एस टी मैं आप मुझे देखकर हैरान हो रहे होंगें, दरअसल सुजॉय छुट्टी पर हैं, और मैंने वी डी को पटा कर ये मौका ढूंढ लिया कि मैं आपको उस अल्बम के संगीत के बारे में बता सकूँ जिसने मेरे दिलो जेहन पर इन दिनों जादू सा कर दिया है.

जब बात संगीत की चलती है, और जब कोई मुझसे पूछता है कि मुझे किस तरह का संगीत पसंद है तो मैं बड़ी उलझन में फंस जाता हूँ, क्योंकि मुझे लगभग हर तरह का संगीत पसंद आता है, पुराने, नए, शास्त्रीय, हिप होप, ग़ज़ल सभी कुछ तो सुनता हूँ मैं, फिर किसे कहूँ कि ये मुझे नापसंद नहीं....खैर पसंद भी कई तरह की होती है, कुछ गीतों के शब्द हमें भा जाते हैं (मसलन गुलाल) तो कुछ उसके खालिस संगीत संयोजन की वजह से मन को लुभा जाते (जैसे रोबोट और अजब प्रेम की गजब कहानी) हैं....हाँ पर ऐसी अल्बम्स तो मैं उँगलियों पे गिन सकता हूँ जिसने मुझे संगीत की सम्पूर्ण संतुष्ठी दी है. ऐसा संगीत जिसे सुन तन मन और आत्मा भी संतुष्ट हो जाए.....संजय लीला बंसाली एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फ़िल्में रुपहले पर्दे पर कविता लिखती है, वो शुद्ध भारतीय सोच के निर्देशक हैं जो बिना गीत संगीत के फिल्मों की कल्पना नहीं करते (ब्लैक एक अपवाद है). मुझे उनकी फिल्मों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है क्योंकि उनकी दो फिल्मों का संगीत (हम दिल दे चुके सनम और देवदास) मेरे “सम्पूर्ण संतुष्ठी अल्बम” की श्रेणी में निश्चित ही आता है. दोनों ही फिल्मों में इस्माईल दरबार का संगीत था, देवदास के बाद कुछ मतभेदों के चलते निर्देशक-संगीतकार की ये जोड़ी अलग हो गयी, जो अगर साथ रहती तो शायद हमें और भी बहुत से मास्टर पीस अल्बम्स सुनने को मिल सकते थे. ब्लैक बिना गीत संगीत के बनी भारतीय फिल्म थी, जो कामियाब भी रही, पर संजय लौट आये अपने नैसर्गिक फॉर्म में “संवरिया” के साथ. मोंटी का था संगीत इसमें जिन्होंने देवदास का शीर्षक संगीत भी रचा था. संगीत के हिसाब से अल्बम बुरी तो नहीं थी, पर संजय के अन्य फिल्मों के टक्कर की भी नहीं थी. इसी फिल्म में हमें संजय का एक नया रूप दिखा जब एक गीत को उन्होंने खुद संगीतबद्ध किया “थोड़े बदमाश हो तुम”. एक लंबे अंतराल के बाद संजय लौटे हैं उसी जेनर की फिल्म लेकर जिसमें उन्हें महारथ हासिल है. ख़ामोशी, देवदास, ब्लैक आदि सभी फ़िल्में व्यक्तिगत अक्षमताओं (शारीरिक और मानसिक) से झूझते और उनपर विजय पाते किरदारों पर है. “गुज़ारिश” भी उसी श्रेणी में आती है, और बतौर संगीतकार संजय लीला बंसाली ने इस बार पूरी तरह से कमान संभाली है....ऐसे में कुछ शंकाएं संभव है, मगर उनकी फिल्मों से अपेक्षाएं हमेशा ही बढ़ चढ कर रहती है, वो कुछ भी कम स्तरीय करेंगें ऐसी इस जीनियस से उम्मीद नहीं की जा सकती.....चलिए इस लंबी भूमिका के बाद अब जरा “गुज़ारिश" के संगीत की चर्चा की जाए.

बरसते पानी की आवाज़ और पार्श्व से आ रहे कुछ संवादों से अल्बम की शुरूआत होती है. ये है फिल्म का शीर्षक गीत, के के की डूबी और डुबो देने वाली आवाज़ में “इसमें तेरी बाहों में मर जाऊं...” सुनकर वाकई मर जाने का जी करता है....सचमुच किसी गीत में इतनी मासूम गुज़ारिश, शब्द जैसे भेद जाते हैं गहरे तक...और के के .....मेरे ख्याल से वो इस कालजयी गीत के लिए एक अदद राष्ट्रीय सम्मान का हक तो रखते ही हैं. वोइलिन के स्वरों में इतना दर्द बहुत अरसे बाद सुनाई दिया है.....ऐ एम् तुराज़ की बतौर गीतकार ये शायद पहली फिल्म होगी, मगर उनका आगाज़ बहुत ही शानदार है. इस पहले गीत से ही संजय अपने साथ सुनने वालों को जोड़ लेते हैं.

गीत - गुज़ारिश


“सौ ग्राम जिंदगी” जब शुरू होता है तो “यादें” (सुभाष घई कृत) का शीर्षक गीत याद आता है जो हरिहरन ने गाया था...नगमें हैं किस्से हैं....पर अंतरे तक आते आते कुणाल गांजावाला इस गीत को अपने नायाब गायन से एक अलग ही मुकाम पर ले जाते हैं....शब्द सुनिए – देर तक उबाली है, प्याली में डाली है, कड़वी है नसीब सी, ये कॉफी गाढ़ी काली है...चमच्च भर चीनी हो बस इतनी सी मर्जी है.....वाह....यहाँ गीतकार हैं विभु पूरी, एक और नयी खोज जो निश्चित ही बधाई के हकदार हैं. संगीत संयोजन यहाँ भी जबरदस्त है. कम से कम वाध्य हैं पर जो हैं उनको संजय ने बहुत ही “संभाल के खर्चा” है. LIFE IS GOOD....सुनिए...

गीत - सौ ग्राम ज़िंदगी


तीसरा गीत “तेरा जिक्र” तो जैसे पूरी तरह से एक कविता (गीतकार तरुज़) है, जिसमें हल्का सा सूफी अंदाज़ भी पिरोया गया है, शैल के साथ राकेश पंडित ने दिया है सूफी स्टाईल में. “तेरा जिक्र है या इत्र है, जब जब करता हूँ महकता हूँ....”. अलग अंदाज़ का गीत है और एक दो बार सुनते ही नशे की तरह सर चढ जाता है. चौथा गीत “सायबा” गोवा के किसी क्लब में ले चलेगा आपको, वैभवी जोशी ने गहरे भाव से इसे गाया है, संगीत संयोजन और शब्द यहाँ भी उत्कृष्ट है (तारुज़). फ्रांसिस कास्तिलेनो और शैल ने कोरस की भूमिका निभायी है यहाँ, जो गीत को और रंग भरा बनाता है. अल्बम के अधिकतर गीतों की तरह ये गीत भी एक अंतरे का है, संजय ने इस तरह के छोटे छोटे गीतों का प्रयोग ख़ामोशी, HDDCS, और देवदास में भी किये हैं.

गीत - तेरा ज़िक्र


गीत - सायबा


“जागती आँखों में भी अब कोई सोता है....जब कोई नहीं होता, तब कोई होता है...” के के की आवाज़ में इतनी गहराई है कि ऑंखें बंद करके सुनो तो मन उड़ने लगता है, ये भी एक छोटा सा मगर सुंदर सा गीत है. छटा गीत “उडी” एक अलग ही कलेवर का है, और अल्बम के बहतरीन गीतों में से एक है, सुनिधि चौहान की मदमस्त आवाज़ और गोवा के लोक रंग का तडका, यक़ीनन “उडी” आपको लंबे समय तक याद रहेगा...

गीत - जाने किसके ख्वाब


गीत - उड़ी


“कह न सकूँ मैं इतना प्यार” में शैल एक बार फिर सुनाई देते हैं. पियानो की स्वरलहरियों में प्रेम की बेबसी कहीं कहीं देवदास के “वो चाँद जैसी लड़की” की याद दिला जाती है. अच्छा गाया है. दिल से गाया है मन को छूता है. अगला गीत हर्षदीप कौर की आवाज़ में हैं, रियल्टी शोस से निकली इस लड़की की आवाज़ में गहराई है, यहाँ भी शब्द बहुत खूबसूरत है, कहीं कहीं गुलज़ार साहब याद आ जाते हैं – चाँद की कटोरी है, रात ये चटोरी है....वाह...”रिश्ते झीने मलमल के”, “मोहब्बत का स्वटर”, “हाथ का छाता” जैसे शब्द युग्म वाकई सिहरन सी उठा जाते है. गीतकार विभु पूरी को बधाई. सेक्सोफोन का एक पीस है इंटरल्यूड में, सुनिए क्या खूब है. एक और शानदार गीत.

गीत - कह न सकूँ


गीत - चाँद की कटोरी


“दायें बाएं” में एक बार फिर के के को सुनकर सकून मिलता है, यहाँ गीटार है पार्श्व में, मधुर रोमांस की तरंगें, जहाँ दर्द भी सोया सोया है, उभरता है मगर जैसे चाहत उसे फिर सुला देती हो....प्यार के सुरीले अहसास को मधुरता से सहलाता है ये गीत. “धुंधुली धुंधली शाम” अंतिम गीत है....पंछियों के स्वर, झील का किनारा....डूबती शाम, एक पूरा चित्र आँखों के सामने उभर आता है.....”तुम्हारे बाद हमारा हाल कुछ ऐसा है..कि जैसे साज़ के सारे तार टूट जाते हैं....” मुझे न जाने क्यों रबिन्द्र नाथ टैगोर याद आ गए. शंकर महादेवन ने संभाला है यहाँ माईक.....बहरहाल...

गीत - दाएँ बाएँ


गीत - धुंधली धुंधली


"गुज़ारिश" मेरी राय में इस वर्ष की सबसे बढ़िया अल्बम है....शायद “ओमकारा” के बाद ये पहली अल्बम है जिसने मुझे वो “सम्पूर्ण संतुष्टी” दी है. (“मैं” शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि मैं नहीं जानता कि आप मेरी इस राय से सहमत होंगे या नहीं) वैसे तो टी एस टी के वाहक तन्हा जी और सुजॉय जी ने रेटिंग बंद करवा दी है है पर फिर भी मैं इस अल्बम को ५/५ की रेटिंग देना चाहूँगा.....आप सब भी सुनिए और बताईये कि आपको कैसे लगे “गुज़ारिश” के गीत.

मंगलवार, 8 जून 2010

रब्बा लक़ बरसा.... अपनी फ़िल्म "कजरारे" के लिए इसी किस्मत की माँग कर रहे हैं हिमेश भाई

ताज़ा सुर ताल २१/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़े अंक के साथ हम हाज़िर हैं। विश्व दीपक जी, इस शुक्रवार को 'राजनीति' प्रदर्शित हो चुकी हैं, और फ़िल्म की ओपनिंग अच्छी रही है ऐसा सुनने में आया है, हालाँकि मैंने यह फ़िल्म अभी तक देखी नहीं है। 'काइट्स' को आशानुरूप सफलता ना मिलने के बाद अब देखना है कि 'राजनीति' को दर्शक किस तरह से ग्रहण करते हैं। ख़ैर, यह बताइए आज हम किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं।

विश्व दीपक - आज हम सुनेंगे आने वाली फ़िल्म 'कजरारे' के गानें।

सुजॊय - यानी कि हिमेश इज़ बैक!

विश्व दीपक - बिल्कुल! पिछले साल 'रेडियो - लव ऑन एयर' के बाद इस साल का उनका यह पहला क़दम है। 'रेडियो' के गानें भले ही पसंद किए गए हों, लेकिन फ़िल्म को कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली थी। देखते हैं कि क्या हिमेश फिर एक बार कमर कस कर मैदान में उतरे हैं!

सुजॊय - 'कजरारे' को पूजा भट्ट ने निर्देशित किया है, जिसके निर्माता हैं भूषण कुमार और जॉनी बक्शी। फ़िल्म के नायक हैं, जी हाँ, हिमेश रेशम्मिया, और उनके साथ हैं मोना लायज़ा, अमृता सिंह, नताशा सिन्हा, गौरव चनाना और गुल्शन ग्रोवर। संगीत हिमेश भाई का है और गानें लिखे हैं हिमेश के पसंदीदा गीतकार समीर ने। तो विश्व दीपक जी, शुरु करते हैं गीतों का सिलसिला। पहला गीत हिमेश रेशम्मिया और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में। इस गीत को आप एक टिपिकल हिमेश नंबर कह सकते हैं। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल हुआ है। हिमेश भाई के चाहनेवालों को ख़ूब रास आएगा यह गीत।

गीत: कजरा कजरा कजरारे


विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने की शुरुआत मुझे पसंद आई। जिस तरह से "सुनिधि चौहान" ने "कजरा कजरा कजरारे" गाया है, वह दिल के किसी कोने में एक नटखटपन जगा देता है और साथ हीं सुनिधि के साथ गाने को बाध्य भी करता है। मुझे आगे भी सुनिधि का यही रूप देखने की इच्छा थी, लेकिन हिमेश ने अंतरा में सुनिधि को बस "चियर लिडर" बना कर रख दिया है और गाने की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली है। हिमेश की आवाज़ इस तरह के गानों में फबती है, लेकिन शब्दों का सही उच्चारण न कर पाना और अनचाही जगहों पर हद से ज्यादा जोर देना गाने के लिए हानिकारक साबित होते हैं। हिमेश "उच्चारण" संभाल लें तो कुछ बात बने। खैर अब हम दूसरे गाने की ओर बढते हैं।

सुजॊय - अब दूसरा गीत भी उसी हिमेश अंदाज़ का गाना है। उनकी एकल आवाज़ में सुनिए "रब्बा लक बरसा"। इस गीत में महेश भट्ट साहब ने वायस ओवर किया है। गाना बुरा नहीं है, लेकिन फिर एक बार वही बात कहना चाहूँगा कि अगर आप हिमेश फ़ैन हैं तो आपको यह गीत ज़रूर पसंद आएगा।

विश्व दीपक - जी आप सही कह रहे हैं। एक हिमेश फ़ैन हीं किसी शब्द का बारंबार इस्तेमाल बरदाश्त कर सकता है। आप मेरा इशारा समझ गए होंगे। हिमेश/समीर ने "लक लक लक लक" इतनी बार गाने में डाला है... कि "शक लक बूम बूम" की याद आने लगती है और दिमाग से यह उतर जाता है कि इस "लक़" का कुछ अर्थ भी होता है। एक तो यह बात मुझे समझ नहीं आई कि जब पूरा गाना हिन्दी/उर्दू में है तो एक अंग्रेजी का शब्द डालने की क्या जरूरत थी। मिश्र के पिरामिडों के बीच घूमते हुए कोई "लक लक" बरसा कैसे गा सकता है। खैर इसका जवाब तो "समीर" हीं दे सकते हैं। हाँ इतना कहूँगा कि इस गाने में संगीत मनोरम है, इसलिए खामियों के बावजूद सुनने को दिल करता है। विश्वास न हो तो आप भी सुनिए।

गीत: रब्बा लक़ बरसा


सुजॊय - अब इस एल्बम का तीसरा गीत और मेरे हिसाब से शायद यह इस फ़िल्म का सब से अच्छा गीत है। हिमेश रेशम्मिया के साथ इस गीत में आवाज़ है हर्षदीप कौर की। एक ठहराव भरा गीत है "आफ़रीन", जिसमें पारम्परिक साज़ों का इस्तेमाल किया गया है। ख़ास कर ढोलक का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है गीत में। भले ही हर्षदीप की आवाज़ मौजूद हो गीत के आख़िर में, इसे एक हिमेश रेशम्मिया नंबर भी कहा जा सकता है।

विश्व दीपक - जी यह शांत-सा, सीधा-सादा गाना है और इसलिए दिल को छू जाता है। इस गाने के संगीत को सुनकर "तेरे नाम" के गानों की याद आ जाती है। हर्षदीप ने हिमेश का अच्छा साथ दिया है। हिमेश कहीं-कहीं अपने "नेजल" से अलग हटने की कोशिश करते नज़र आते हैं ,लेकिन "तोसे" में उनकी पोल खुल जाती है। अगर हिमेश ऐसी गलतियाँ न करें तो गीतकार भी खुश होगा कि उसके शब्दों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि यह गाना एल्बम के बाकी गानों से बढिया है। तो लीजिए पेश है यह गाना।

गीत: आफ़रीन


सुजॊय - फ़िल्म का चौथा गीत भी एक युगल गीत है, इस बार हिमेश का साथ दे रहीं हैं श्रेया घोषाल। गीत के बोल हैं "तुझे देख के अरमान जागे"। आपको याद होगा अभी हाल ही में फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' में एक गीत आया था "वाल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा"। तो भई हम तो यहाँ पर यही कहेंगे कि वाल्युम कम कर नहीं तो पूरा मोहल्ला जग जाएगा। जी हाँ, "तुझे देख के अरमान जागे" के शुरु में हिमेश साहब कुछ ऐसी ऊँची आवाज़ लगाते हैं कि जिस तरह से उनके "झलक दिखला जा" गीत को सुन कर गुजरात के किसी गाँव में भूतों का उपद्रव शुरु हो गया था, अब की बार तो शायद मुर्दे कब्र खोद कर बाहर ही निकल पड़ें! ख़ैर, मज़ाक को अलग रखते हुए यह बता दूँ कि आगे चलकर हिमेश ने इस गीत को नर्म अंदाज़ में गाया है और श्रेया के आवाज़ की मिठास के तो कहने ही क्या। वो जिस गीत को भी गाती हैं, उसमें मिश्री और शहद घोल देती हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्यों न लगे हाथों पांचवाँ गीत भी सुन लिया जाए| क्योंकि यह गीत भी हिमेश रेशम्मिया और श्रेया घोषाल की आवाजों में हीं है, और अब की बार बोल हैं "तेरीयाँ मेरीयाँ"। दोस्तों, जिस गीत में "ँ" का इस्तेमाल हो और अगर उस गाने में आवाज़ हिमेश रेशम्मिया की हो, तो फिर तो वही सोने पे सुहागा वाली बात होगी ना! नहीं समझे? अरे भई, मैं हिमेश रेशम्मिया के नैज़ल अंदाज़ की बात कर रहा हूँ। इस गीत में उन्हे भरपूर मौका मिला है अपनी उस मनपसंद शैली में गाने का, जिस शैली के लिए वो जाने भी जाते हैं और जिस शैली की वजह से वो एकाधिक बार विवादों से भी घिर चुके हैं। जहाँ तक इस गीत का सवाल है, संतूर की ध्वनियों का सुमधुर इस्तेमाल हुआ है। वैसे यह मैं नहीं बता सकता कि क्या असल में संतूर का प्रयोग हुआ है या उसकी ध्वनियों को सीन्थेसाइज़र के ज़रिये पैदा किया गया है। जो भी है, सुरीला गीत है, लेकिन श्रेया को हिस्सा कम मिला है इस गानें में।

गीत: तुझे देख के अरमान जागे


गीत: तेरीयां मेरीयां


सुजॊय - विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगता है कि हिमेश रेशम्मिया जब भी कोई फ़िल्म करते हैं, तो अपने आप को ही सब से ज़्यादा सामने रखते हैं। बाके सब कुछ और बाकी सब लोग जैसे पार्श्व में चले जाते हैं। यह अच्छी बात नहीं है। अब आप उनकी कोई भी फ़िल्म ले लीजिए। वो ख़ुद इतने ज़्यादा प्रोमिनेन्स में रहते हैं कि वो फ़िल्म कम और हिमेश रेशम्मिया का प्राइवेट ऐल्बम ज़्यादा लगने लगता है। दूसरी फ़िल्मों की तो बात ही छोड़िए, 'कर्ज़', जो कि एक पुनर्जन्म की कहानी पर बनी कामयाब फ़िल्म का रीमेक है, उसका भी यही हाल हुआ है। ख़ैर, शायद यही उनका ऐटिट्युड है। आइए अब इस फ़िल्म का अगला गीत सुनते हैं "वो लम्हा फिर से जीना है"। हिमेश और हर्षदीप कौर की आवाज़ें, फिर से वही हिमेश अंदाज़। एक वक़्त था जब हिमेश के इस तरह के गानें ख़ूब चला करते थे, देखना है कि क्या बदलते दौर के साथ साथ लोगों का टेस्ट भी बदला है या फिर इस गीत को लोग ग्रहण करते हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने के साथ हीं क्यों न हम फ़िल्म का अंतिम गाना भी सुन लें| हिमेश और सुनिधि की आवाज़ें, और एक बार फिर से हिमेश का नैज़ल अंदाज़। ढोलक के तालों पर आधारित इस लोक शैली वाले गीत को सुन कर आपको अच्छा लगेगा। जैसा कि अभी अभी आपने कहा कि आजकल हिमेश जिस फ़िल्म में काम करते हैं, बस वो ही छाए रहते हैं, तो इस फ़िल्म में भी वही बात है। हर गीत में उनकी आवाज़, हर गाना वही हिमेश छाप। अपना स्टाइल होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन अगर विविधता के लिए थोड़ा सा अलग हट के किया जाए तो उसमें बुराई क्या है? ख़ैर, मैं अपना वक्तव्य यही कहते हुए समाप्त करूँगा कि 'कजरारे' पूर्णत: हिमेश रेशम्मिया की फ़िल्म होगी।

गीत: वो लम्हा फिर से जीना है


गीत: सानु गुज़रा ज़माना याद आ गया


"कजरारे" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***

सुजॊय - हिमेश के चाहने वालों को पसंद आएँगे फ़िल्म के गानें, और जिन्हे हिमेश भाई का गीत-संगीत अभी तक पसंद नहीं आया है, उन्हें इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, मैं तो ये कहूँगा की उन्हें इस एल्बम से दूर ही रहना चाहिए|

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मुझे यह लगता है कि हमें इस एल्बम को सिरे से नहीं नकार देना चाहिए, क्योंकि संगीत बढ़िया है और कुछ गाने जैसे कि "रब्बा लक़ बरसा", "कजरारे" और "आफरीन" खूबसूरत बन पड़े हैं| हाँ इतना है कि अगर हिमेश ने अपने अलावा दूसरों को भी मौक़ा दिया होता तो शायद इस एल्बम का रंग ही कुछ और होता| लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हिमेश भाई और पूजा भट्ट को जो पसंद हो, हमें तो वही सुनना है| मैं बस यही उम्मीद करता हूँ कि आगे चलकर कभी हमें "नमस्ते लन्दन" जैसे गाने सुनने को मिलेंगे... तब तक के लिए "मिलेंगे मिलेंगे" :)

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६१- "शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम", इस गीत के साथ हिमेश रेशम्मिया का क्या ताल्लुख़ है?

TST ट्रिविया # ६२- "आपको कैसा लगेगा अगर मैं आपको नए ज़माने का एक गीत सुनाऊँ जिसमें ना कोई ख़त, ना इंतेज़ार, ना झिझक, ना कोई दर्द, बस फ़ैसला है, जिसमें हीरो हीरोइन को सीधे सीधे पूछ लेता है कि मुझसे शादी करोगी?" दोस्तॊम, ये अल्फ़ाज़ थे हिमेश रेशम्मिया के जो उन्होने विविध भारती पर जयमाला पेश करते हुए कहे थे। तो बताइए कि उनका इशारा किस गाने की तरफ़ था?

TST ट्रिविया # ६३- गीतकार समीर के साथ जोड़ी बनाने से पहले हिमेश रेशम्मिया की जोड़ी एक और गीतकार के साथ ख़ूब जमी थी जब उनके चुनरिया वाले गानें एक के बाद एक आ रहे थे और छा रहे थे। बताइए उस गीतकार का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. पेण्टाग्राम
२. सोना महापात्रा
३. "give me some sunshine, give me some rain, give me another chance, I wanna grow up once again".

आलोक, आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए, इसलिए आपको पुरे अंक मिलते हैं| सीमा जी, इस बार आप पीछे रह गईं| खैर कोई बात नहीं, अगली बार......

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