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Saturday, April 11, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 1)


ज़िन्दगी की आख़िरी सच्चाई है मृत्यु। जो भी इस धरती पर आता है, उसे एक न एक दिन इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर जाना ही पड़ता है। लेकिन कुछ लोग यहाँ से जा कर भी नहीं जाते, हमारे दिलों में बसे रहते हैं, हमेशा हमेशा के लिए, और जिनकी यादें हमें रह रह कर याद आती हैं। अपनी कला और प्रतिभा के ज़रिये ऐसे लोग कुछ ऐसा अमिट छाप छोड़ जाते हैं इस दुनिया में कि जो मिटाये नहीं मिट सकते। उनका यश इतना अपार होता है कि सूरज चाँद की तरह जिनकी रोशनी युगों युगों तक, बल्कि अनंतकाल तक प्रकाशमान रहती है। ऐसे ही एक महान कलाकार, फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध निर्माता एवं निर्देशक शक्ति सामंत अब हमारे बीच नहीं रहे। गत ९ अप्रैल को मुंबई में ८३ वर्ष की आयु में उन्होने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह कर अपनी अनंत यात्रा पर चले गये। लेकिन वो हमेशा जीवंत रहेंगे, हमारे दिलों में सदा राज करेंगे अपनी अनगिनत मशहूर फ़िल्मों और उन 'हिट' फ़िल्मों के सुमधुर गीतों के ज़रिये। मेरी तरफ़ से, 'आवाज़' की तरफ़ से, और 'आवाज़' के सभी पाठकों तथा श्रोताओं की तरफ़ से स्वर्गीय शक्ति सामंत को हम श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं।

गीत: सारा प्यार तुम्हारा मैने बांध लिया है आँचल में (आनंद आश्रम)


शक्ति सामंत का जन्म बंगाल के बर्धमान में हुआ था। उनके पिता एक इंजिनीयर थे जिनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस वक़्त शक्तिजी केवल डेढ़ साल के थे। पढ़ाई के लिए उन्हे उत्तर प्रदेश के बदायुँ में उनके चाचा के पास भेज दिया गया। देहरादून से अपनी 'इंटरमिडीयट' पास करने के बाद उन्होने कलकत्ते जाकर 'इंजिनीयरिंग एंट्रान्स' की परीक्षा दी और अव्वल भी आये। लेकिन जब वो भर्ती के लिए गये तो उन्हे यह कह कर वापस कर दिया गया कि वह परीक्षा केवल बंगाल, बिहार और ओड़िसा के छात्रों के लिए थी और वो यु.पी से आये हुए थे। दुर्भाग्य यहीं पे ख़तम नहीं हुई। जब वो वापस यु.पी गये तो वहाँ पर सभी कालेजों में भर्ती की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। उनका एक साल बिना किसी वजह के बरबाद हो गया। उनके चाचा के कहने पर शक्ति उनके साथ उनके काम में हाथ बँटाने लग गये। साथ ही साथ वो थियटर और ड्रामा के अपने शौक को भी पूरा करते रहे। एक रात जब वो थियटर के रिहर्सल से घर देर से लौटे तो उनके चाचा ने उन्हे कुछ भला बुरा सुनाया। उन्हे उनका वह बर्ताव पसंद नहीं आया और उन्होने अपने चाचा का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया।

गीत: काहे को रोये चाहे जो होये सफल होगी तेरी आरधना (आराधना)


अपने चाचा के घर से निकलने के बाद शक्ति मुंबई के आस-पास काम की तलाश कर रहे थे क्युंकि उन्हे पता था कि उनका अंतिम मुक़ाम यह कला-नगरी ही है। उन्हे दापोली में एक 'ऐंग्लो हाई स्कूल' में नौकरी मिल गई। यहाँ से मुंबई स्टीमर से एक घंटे में पहुँची जा सकती थी। उस स्कूल के छात्र ज़्यादातर अफ़्रीकन मुस्लिम थे और २३-२४ साल की आयु के थे, जब कि वो ख़ुद २१ साल के थे। शक्ति ने देखा कि स्कूल में छात्रों की चहुँमुखी विकास के लिए साज़-ओ-सामान का बड़ा अभाव है। उन्होने स्कूल के प्रिन्सिपल से इस बात का ज़िक्र किया और छात्रों के लिए खेल-कूद के कई चीज़ें खरीदवाये। छात्र शक्ति के इस अंदाज़ से मुतासिर हुए और उनके अच्छे दोस्त बन गये। अपने चाचा के साथ काम करते हुए शक्ति को महीने के ३००० रुपय मिलते थे, जब कि यहाँ उन्हे केवल १३० रुपय मिलते। उसमे से ३० रुपय खर्च होते और १०० रुपय वो बचा लेते। फ़िल्म जगत में कुछ करने की उनकी दिली तमन्ना उन्हे हर शुक्रवार मुंबई खींच ले जाती। शुक्रवार शाम को वो स्टीमर से मुंबई जाते, वहाँ पर काम ढ़ूंढ़ते और फिर सोमवार की सुबह वापस आ जाते। वो कई फ़िल्म निर्मातायों से मिले, लेकिन वह राजनैतिक हलचल का समय था। देश के बँटवारे के बाद बहुत सारे कलाकार पाक़िस्तान चले गये थे। फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए बुरा वक़्त चल रहा था। शक्ति अंत में जाकर दादामुनि अशोक कुमार से मिले, जो उनके पसंदीदा अभिनेता भी थे, और जो उन दिनो 'बॊम्बे टॊकीज़' से जुड़े हुए थे। दादामुनि ने उन्हे इस शर्त पर सहायक निर्देशक के तौर पर 'बॊम्बे टॊकीज़' में रख लिया कि उन्हे कोई तनख्वाह नहीं मिलेगी, सिवाय दोपहर के खाने और चाय के। शक्ति राज़ी हो गये। यु.पी में रहने की वजह से उनकी हिंदी काफ़ी अच्छी थी। इसलिए वहाँ पर फनी मजुमदार के बंगला में लिखे चीज़ों को वो हिंदी में अनुवाद किया करते। इस काम के लिए उन्हे पैसे ज़रूर दिये गये। कुछ दिनो के बाद शक्ति ने अशोक कुमार से अपने दिल की बात कही कि वो मुंबई दरसल अभिनेता बनने आये हैं। पर उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व को समझकर दादामुनि ने उनसे अभिनय में नहीं बल्कि फ़िल्म निर्माण के तक़नीकी क्षेत्र में हाथ आज़माने के लिए कहा। दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि शक्ति सामंत ने सबसे पहली बार किस फ़िल्म की 'शूटिंग' देखी थी? वह एक गाना था फ़िल्म 'मशाल' का। जब उन्होने देखा कि एक तांगे को एक टेबल के उपर स्थिर रखा गया है और 'फ़्रेम' में सिर्फ़ घूमते हुए पहिये को दिखाया जा रहा है तो उन्हे बड़ी हैरत हुई। क्या आप सुनना नहीं चाहेंगे इस गीत को? सुनिये मन्न डे की आवाज़ में "ऊपर गगन विशाल" इसी फिल्म मशाल से.

गीत: ऊपर गगन विशाल (मशाल)


अभिनय करने कि चाहत अभी पूरी तरह से बुझी नहीं थी शक्ति सामंत के दिल में। वो फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल निभाकर इस शौक को पूरा कर लेते थे। उनके अनुसार उन्हे हर फ़िल्म में पुलिस इंस्पेक्टर का रोल दे दिया जाता था और एक ही संवाद हर फ़िल्म में उन्हे कहना पड़ता कि "फ़ॊलो कार नम्बर फ़लाना, इंस्पेक्टर फ़लाना स्पीकींग"। फ़िल्म जगत से जुड़े रहने की वजह से कई बड़ी हस्तियों से उनकी जान-पहचान होने लगी थी। दो ऐसे बड़े लोग थे गुरु दत्त और लेखक ब्रजेन्द्र गौड़। गौड़ साहब को फ़िल्म 'कस्तुरी' निर्देशित करने का न्योता मिला, लेकिन किसी दूसरी कंपनी की फ़िल्म में व्यस्त रहने की वजह से इस दायित्व को वो ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे थे। इसलिए उन्होने शक्ति सामंत से उन्हे इस फ़िल्म मे उनकी मदद करने को कहा। सामंत साहब ने इस काम के २५० रुपय लिए थे। किसी फ़िल्म से यह उनकी पहली कमाई थी। 'कस्तुरी' १९५४ की फ़िल्म थी जिसमें संगीत था पंकज मल्लिक का। शक्ति सामंत की कहानी को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते चलें इसी फ़िल्म का एक गीत पंकज मल्लिक की आवाज़ में जिसे ब्रजेन्द्र गौड़ ने ही लिखा था।

गीत: काहे हुआ नादान मनवा (कस्तुरी)


गीतकार और निर्माता एस. एच. बिहारी तथा लेखक दरोगाजी 'इंस्पेक्टर' नामक फ़िल्म के निर्माण के बारे में सोच रहे थे। फ़िल्म को 'प्रोड्यूस' करवाने के लिए वो लोग नाडियाडवाला के पास जा पहुँचे। नाडियाडवाला ने कहा कि इस कहानी पर सफल फ़िल्म बनाने के लिए मशहूर और महँगे अभिनेतायों जैसे कि अशोक कुमार, प्राण वगैरह को लेना पड़ेगा। बजट का संतुलन बिगड़ न जाये इसलिए उन लोगों ने इस फ़िल्म के लिए किसी नये निर्देशक को नियुक्त करने की सोची ताकी निर्देशक के लिए ज़्यादा पैसे न खर्चने पड़े। और इस तरह से शक्ति सामंत ने अपनी पहली फ़िल्म 'इंस्पेक्टर' का निर्देशन किया जो रिलीज़ हुई सन १९५६ में पुष्पा पिक्चर्स के बैनर तले। फ़िल्म 'हिट' रही और इस फ़िल्म के बाद उन्हे फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। इस फ़िल्म के गाने भी ख़ासा पसंद किये गये। इस फ़िल्म के संगीतकार थे हेमन्त कुमार। उन्ही की आवाज़ में इस फ़िल्म का एक सदाबहार नग्मा यहाँ पर पेश है - "दिल छेड़ कोई ऐसा नग़मा जिसे सुन ज़माना खो जाये, ये आह मेरी दुनिया के लिये सपनों का तराना हो जाये"। इस गीत का एक एक शब्द जैसे शक्ति सामंत के लिए ही उस वक़्त लिखी गई थी। उनकी फ़िल्मों को देख कर ज़माना उनमें आज भी खो जाता हैं, उनकी फ़िल्मों के मधुर गीतों में आज भी अपने दिल का कोई तराना ढ़ूंढ़ते हैं लोग।

गीत: दिल छेड़ कोई ऐसा नग्मा (इंस्पेक्टर)


शक्ति सामंत ने काम तो पहले 'इंस्पेक्टर' का ही शुरु किया था लेकिन उनकी दूसरी फ़िल्म 'बहू' पहले प्रदर्शित हो गई। साल था १९५५। करण दीवान और उषा किरण अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार भी हेमन्त कुमार ही थे। तलत महमूद और गीता दत्त की आवाज़ों में इस फ़िल्म का एक युगलगीत आपको सुनवाये बग़ैर मैं आगे नहीं बढ़ सकता क्युंकि यह गीत इतना ख़ूबसूरत है कि एक बहुत लम्बे अरसे के बाद इस गीत को सुनने का मौका आप भी छोड़ना नहीं चाहेंगे।

गीत: ठंडी हवाओं में तारों की छायों में आज बलम मेरा डोले जिया (बहू)


'बहू' और 'इंस्पेक्टर' में शक्ति सामंत के निर्देशन की काफ़ी प्रशंसा हुई और वो सही माईने मे दुनिया के नज़र में आये। पुष्पा पिक्चर्स ने 'इंस्पेक्टर' की कामयाबी से ख़ुश होकर शक्ति सामंत को अपनी अगली फ़िल्म 'हिल स्टेशन' को निर्देशित करने का फिर एक बार मौका दिया। इस फ़िल्म में मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और बीना राय। और एक बार फिर हेमन्त कुमार का संगीत। १९५७ की इस फ़िल्म का एक बहुत ही मीठा, बहुत ही सुरीला गीत गाया था लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार ने। सुनते चलिये इस गीत को।

गीत: नयी मंज़िल नयी राहें नया है महरबान अपना (हिल स्टेशन)


"नयी मंज़िल नयी राहें नया है मेहरबान अपना, न जाने जाके ठहरेगा कहाँ यह कारवाँ अपना", दोस्तों, शक्ति सामंत के जीवन का कारवाँ तो ठहर गया है हमेशा हमेशा के लिए, लेकिन जैसा कि शुरु में ही मैने कहा था कि कला और कलाकार कभी नहीं मरते, कला कालजयी होता है, वक्त उसको छू भी नहीं सकता। शक्ति सामंत की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्तों, बहुत जल्द इस लेख और शक्ति-दा के फ़िल्मों के कुछ और सुमधुर गीतों के साथ हम फिर वापस आयेंगे।


(पढ़िए-सुनिए इस संगीतमयी आलेखमाला की दूसरी किस्त)


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Friday, January 23, 2009

यादें जी उठी....मन्ना डे के संग


"दिल का हाल सुने दिलवाला..." की मस्ती हो, या "एक चतुर नार..." में किशोर से नटखट अंदाज़ में मुकाबला करती आवाज़ हो, "ऐ भाई ज़रा देख के चलो.." के अट्टहास में छुपी संजीदगी हो, या "पूछो न कैसे मैंने रैन बितायी...", "लागा चुनरी में दाग...", "केतकी गुलाब जूही..." और "आयो कहाँ से घनश्याम..." जैसे राग आधारित गीतों को लोकप्रिय अंदाज़ में प्रस्तुत करना हो, एक मुक्कमल गायक है जो हमेशा एक "परफेक्ट रेंडरिंग" देता है. जी हाँ आपने सही अंदाजा लगाया. हम बात कर रहे हैं, एक और एकलौते मन्ना डे की.


मन्ना डे का जन्म १ मई १९१९ को पूर्णचंद्र और महामाया डे के यहाँ हुआ। अपने माता-पिता के अलावा वे अपने चाचा संगीताचार्य के.सी. डे से बहुत अधिक प्रभावित थे और वे ही उनके प्रेरणास्रोत भी थे। मन्ना ने अपने छुटपन की पढ़ाई एक छोटे से स्कूल "इंदु बाबुर पाठशाला" से हुई। स्कॉटिश चर्च कालिजियेट स्कूल व स्कॉटिश चर्च कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने विद्यासागर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूरी की। अपने बचपन से ही मन्ना को कुश्ती और मुक्केबाजी का शौक रहा और उन्होंने इन दोनों खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उनका काफी हँसमुख छवि वाला व्यक्तित्व रहा है और अपने दोस्तों व साथियों से के साथ मजाक करते रहते हैं।

अपने स्कॉटिश चर्च कॉलेज के दिनों में उनकी गायकी की प्रतिभा लोगों के सामने आया। तब वे अपने साथ के विद्यार्थियों को गा कर सुनाया करते थे और उनका मनोरंजन किया करते थे। वे अपने अंकल कृष्ण चंद्र डे और उस्ताद दाबिर खान से गायन की शिक्षा लिया करते थे। यही वो समय था जब उन्होंने तीन साल तक लगातार अंतर-महाविद्यालय गायन-प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान पाया।

१९४२ में मन्ना डे, कृष्णचंद्र के साथ मुंबई आये। वहाँ उन्होंने एक सहायक के तौर अपना काम सम्भला। पहले वे के.सी डे के साथ थे फिर बाद में सचिन देव बर्मन के सहायक बने। बाद में उन्होंने और भी कईं संगीत निर्देशकों के साथ काम किया और फिर अकेले ही संगीत निर्देशन करने लगे। कईं फिल्मों में संगीत निर्देशन का काम अकेले करते हुए भी मन्ना डे ने उस्ताद अमान अली और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेना जारी रखा।

मन्ना डे ने १९४३ की "तमन्ना" से पार्श्व गायन के क्षेत्र में कदम रखा। संगीत का निर्देशन किया था कॄष्णचंद्र डे ने और मन्ना के साथ थीं सुरैया। १९५० की "मशाल" में उन्होंने एकल गीत "ऊपर गगन विशाल" गाया जिसको संगीत की मधुर धुनों से सजाया था सचिन देव बर्मन ने।१९५२ में मन्ना डे ने बंगाली और मराठी फिल्म में गाना गाया। ये दोनों फिल्म एक ही नाम "अमर भूपाली" और एक ही कहानी पर आधारित थीं। इसके बाद उन्होंने पार्श्वगायन में अपने पैर जमा लिये।

सुनिए -

"उपर गगन विशाल...."


तू प्यार का सागर है...


ऐ भाई ज़रा देख के चलो...


ज़िन्दगी कैसी है पहेली ...


आयो कहाँ से घनश्याम...


मन्ना डे ने महान शास्त्रीय संगीतकार भीमसेन जोशी के साथ मशहूर गाना,"केतकी गुलाब जूही..." गाया। किशोर कुमार के साथ भी अलग अलग शैली के कईं गीत गाये। जिनमें शामिल हैं "ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे (शोले)" व "एक चतुर नार (पड़ोसन)"। मन्ना डे ने गायक/संगीतकार हेमंत कुमार के साथ बंगाली फिल्मों में कईं गाने एक साथ गाये। फिल्म "संख्यबेला" में उन्होंने लता मंगेशकर के साथ मशहूर गीत "के प्रोथोम कच्चे एसेची" गाया। इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिये अगर हम ये कहें कि मन्ना डे ने ही भारतीय संगीत में एक नई शैली की शुरुआत की जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत का पॉप संगीत के साथ मिश्रण किया गया। मन्ना की बहुमुखी प्रतिभा रवींद्र संगीत तक फैली।

उनके पाश्चात्य संगीत के साथ किये गये प्रयोगों से कईं न भूलने वाले गीत तैयार हुए हैं। उन्होंने ३५०० से अधिक गाने रिकार्ड किये हैं। १८ दिसम्बर १९५३ को मन्ना डे ने केरल की सुलोचना कुमारन से विवाह किया। इनकी दो बेटियाँ हुईं। शुरोमा का जन्म १९ अक्टूबर १९५६ और सुमिता का २० जून १९५८ को हुआ।

मुम्बई में ५० साल रहने के बाद मन्ना डे आज बंग्लुरु के कल्याणनगर में रहते हैं। आज भी उनका कोलकाता में घर है और वे आज भी विश्व भर में संगीत के कार्यक्रम करते रहते हैं।

वर्ष २००५ में आनंदा प्रकाशन ने बंगाली उनकी आत्मकथा "जिबोनेर जलासोघोरे" प्रकाशित की। उनकी आत्मकथा को अंग्रेज़ी में पैंगुइन बुक्स ने "Memories Alive" के नाम से छापा तो हिन्दी में इसी प्रकाशन की ओर से "यादें जी उठी" के नाम से प्रकाशित की। मराठी संस्करण "जिबोनेर जलासाघोरे" साहित्य प्रसार केंद्र, पुणे द्वारा प्रकाशित किया गया।

मन्ना डे के जीवन पर आधारित "जिबोनेरे जलासोघोरे" नामक एक अंग्रेज़ी वृतचित्र ३० अप्रैल २००८ को नंदन, कोलकाता में रिलीज़ हुआ। इसका निर्माण "मन्ना डे संगीत अकादमी द्वारा" किया गया। इसका निर्देशन किया डा. सारूपा सान्याल और विपणन का काम सम्भाला सा रे ग म (एच.एम.वी) ने।

रफी साहब ने एक बार प्रेस को कहा था: "आप लोग मेरे गाने सुनते हैं, मैं मन्ना डे के गाने सुनता हूँ"। सचिन देव बर्मन और अनिल बिस्वास जैसे संगीतकारों ने कहा था कि मन्ना डे किसी के भी गाये हुए गाने सरलता से गा सकते हैं। फिर चाहें मोहमम्मद रफी हों, किशोर कुमार, मुकेश या फिर तलत महमूद।

उनके बारे में अधिक जानकारी अगले अंक में--- फिलहाल सुनिये और देखिये उनका यह रोमांटिक गीत फिल्म रात और दिन से।
दिल की गिरह खोल दो.....


(जारी...)

प्रस्तुति - तपन शर्मा "चिन्तक"

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