Showing posts with label ek parichay. Show all posts
Showing posts with label ek parichay. Show all posts

Saturday, October 25, 2008

मैं हर एक पल का शायर हूँ....साहिर लुधियानवी

अमर शायर / गीतकार साहिर लुधायनवी की २८वीं बरसी

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते

साहिर ने जब लिखना शुरू किया तब इकबाल, जोश, फैज़, फ़िराक, वगैरह शायरों की तूती बोलती थी, पर उन्होंने अपना जो विशेष लहज़ा और रुख अपनाया, उससे न सिर्फ उन्होंने अपनी अलग जगह बना ली बल्कि वे भी शायरी की दुनिया पर छा गये। प्रेम के दुख-दर्द के अलावा समाज की विषमताओं के प्रति जो आक्रोश हमें उनकी शायरी में मिलता है, एक ऐसा शायर जो खरा बोलता है दो टूक पर ख्वाब देखने की भी हिम्मत रखता है. जो तल्खियों को सीने में समेटे हुए भी कहता है कि आओ कोई ख्वाब बुनें. साहिर के शब्दों में अगर कहें तो -

दुनिया के तजुरबातो-हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है, लौटा रहा हूँ मैं


अब्दुलहयी ‘साहिर’ 1921 ई. में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में पैदा हुए । उनकी माँ के अतिरिक्त उनके वालिद की कई पत्नियाँ और भी थीं। किन्तु एकमात्र सन्तान होने के कारण उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। मगर अभी वह बच्चा ही था कि सुख-वैभव के जीवन के दरवाज़े एकाएक उस पर बन्द हो गए। पति की ऐयाशियों से तंग आकर उसकी माता पति से अलग हो गई और चूँकि ‘साहिर’ ने कचहरी में पिता पर माता को प्रधानता दी थी, इसलिए उसके बाद पिता से और उसकी जागीर से उनका कोई सम्बन्ध न रहा और इसके साथ ही जीवन की ताबड़तोड़ कठिनाइयों और निराशाओं का दौर शुरू हो गया। ऐशो-आराम का जीवन छिन तो गया पर अभिलाषा बाकी रही। नौबत माता के ज़ेवरों के बिकने तक आ गई, पर दम्भ बना रहा और चूँकि मुक़दमा हारने पर पिता ने यह धमकी दे दी थी कि वह ‘साहिर’ को मरवा डालेगा या कम से कम माँ के पास न रहने देगा, इसलिए ममता की मारी माँ ने रक्षक क़िस्म के ऐसे लोग ‘साहिर’ पर नियुक्त कर दिए जो क्षण-भर को भी उसे अकेला न छोड़ते थे। इस तरह घृणा-भाव के साथ-साथ उसके मन में एक विचित्र प्रकार का भय भी पनपता रहा।

साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। सन् 1939 में जब वे गवर्नमेंट कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा । कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे और अमृता इनकी प्रशंसक । लेकिन अमृता के घरवालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब । बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया। जीविका चलाने के लिये उन्होंने तरह तरह की छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं।

कॉलेज से निकाले जाने के बाद साहिर ने अपनी पहली क़िताब पर काम शुरू कर दिया। 1943 में उन्होंने ‘तल्ख़ियां’ नाम से अपनी पहली शायरी की किताब प्रकाशित करवाई। ‘तल्ख़ियां’ से साहिर को एक नई पहचान मिली। इसके बाद साहिर ‘अदब़-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के संपादक बने। साहिर प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से भी जुड़े रहे थे। ‘सवेरा’ में छपे कुछ लेख से पाकिस्तान सरकार नाराज़ हो गई और साहिर के ख़िलाफ वारंट जारी कर दिया दिया। 1949 में साहिर दिल्ली चले आए। कुछ दिन दिल्ली में बिताने के बाद साहिर मुंबई में आ बसे।

फिल्मों में उनकी शुरुआत हुई १९४८ में आई फ़िल्म "आजादी की राह पर" से, यह फ़िल्म असफल रही और उसके गीत भी, साहिर को प्रसिद्धी मिली १९५१ में आई फ़िल्म "नौजवान" के गीत "ठंडी हवाएं लहराके आए ..." से. संगीतकार थे एस डी बर्मन साहब, मगर जिस फ़िल्म ने उन्हें इंडस्ट्री में स्थापित किया वो थी गुरुदत्त के निर्देशन की पहली फ़िल्म "बाज़ी". यहाँ भी संगीत बर्मन साहब का था, इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद मकबूल हुए. साहिर और बर्मन साहब की जोड़ी भी चल निकली, याद कीजिये "ये रात ये चांदनी फ़िर कहाँ..." (जाल), "जाए तो जाए कहाँ...(टैक्सी ड्राईवर), "जीवन के सफर में राही..." (मुनीमजी), और १९५७ में आई फ़िल्म प्यासा के एक से बढ़कर एक गीत. मगर न जाने इस फ़िल्म के बाद दोनों के बीच कैसी गलतफहमियां पैदा हुईं कि दोनों ने अपनी अपनी अलग राह पकड़ ली.

साहिर ने सबसे अधिक काम संगीतकार एन दत्ता के साथ किया. दत्ता साहब साहिर के जबरदस्त प्रशंसक थे. १९५५ में आई मिलाप के बाद मेरिन ड्राइव, लाईट हाउस, भाई बहन, साधना, धूल का फूल, धरम पुत्र और दिल्ली का दादा जैसी फिल्मों में इस जोड़ी ने "तंग आ चुके हैं कश्मकशे जिंदगी से हम...", "मेरे नदीम, मेरे हमसफ़र उदास न हो...", "तू न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा...", और "औरत ने जन्म दिया मर्दों को..." जैसे बेमिसाल गीत रचे. ७० के दशक में उनका काम यश चोपड़ा कैंप तक सीमित रहा. फ़िल्म कभी-कभी से उन्होंने शानदार वापसी की. फ़िल्म ताजमहल के बाद इस फ़िल्म ने दिलाया उन्हें उनका दूसरा फ़िल्म फेयर अवार्ड.

साहिर बेहद संवेदनशील होने साथ ही बेहद स्वाभिमानी भी थे। वे अक्सर इस बात पर अड़ जाते थे कि पहले मैं गाने लिखूंगा उसके बाद गाने के आधार पर धुन बनाई जाएगी। साहिर ने फिल्म इंडस्ट्री में गीतकारों को एक नई जगह दिलाई। साहिर की लोकप्रियता काफी थी और वे अपने गीत के लिए लता मंगेशकर को मिलने वाले पारिश्रमिक से एक रुपया अधिक लेते थे। इसके साथ ही ऑल इंडिया रेडियो पर होने वाली घोषणाओं में गीतकारों का नाम भी दिए जाने की मांग साहिर ने की जिसे पूरा किया गया। इससे पहले किसी गाने की सफलता का पूरा श्रेय संगीतकार और गायक को ही मिलता था।

साहिर ने शादी नहीं की और उनकी जिंदगी बेहद तन्हा रही। साहिर का साथ किसी ने नहीं दिया मगर वे नगमों से लोगों की वाहवाहियां लूटते रहे। तन्हाई और प्रेम के अभाव में साहिर का स्वभाव विद्रोही हो गया था। पहले अमृता प्रीतम के साथ प्यार की असफलता और इसके बाद गायिका और अभिनेत्री सुधा मल्होत्रा के साथ भी एक असफल प्रेम से जमीन पर सितारों को बिछाने की हसरत अधूरी रह गई। इसका जिक्र साहिर के इस गाने में पूरी तरह उभरता है ‘तुम अगर साथ देने का वादा करो... ‘ मैं अकेला बहुत देर चलता रहा, अब सफर ज़िंदगानी का कटता नहीं’। साहिर अपने अकेलेपन और फिक्र को शराब और सिगरेट के धुंए में उड़ाते चले गए। अंतत: 25 अक्टूबर 1980 को हार्ट अटैक होने से साहिर लुधियानवी हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गए।

आइये याद करें साहिर साहब को उनके कुछ यादगार गीतों को सुनकर -


Saturday, September 6, 2008

यही वो जगह है - आशा, एक परिचय

बहुमुखी प्रतिभा-यही शब्द हैं जो आशा भोंसले के पूरे कैरियर को अपने में समाहित करते है। और कौन ऐसा है जो गर्व कर सके, जिसने व्यापक तौर पर तीन पीढ़ियों के महान संगीतकारों के साथ काम किया हो। चाहें ५० के दशक में ऒ.पी नय्यर का मधुर संगीत हो या आर.डी.बर्मन के ७० के दशक के पॉप हों या फिर ए.आर.रहमान का लयबद्ध संगीत- आशा जी ने सभी के साथ भरपूर काम किया है। गायन के क्षेत्र में प्रयोग करने की उनकी भूख की वजह से ही उनमें विविधता आ पाई है। उन्होंने १९५० के दशक में हिन्दी सिने जगत के पहले रॉक गीतों में से एक "ईना, मीना, डीका.." गाया। उन्होंने महान गज़ल गायक गुलाम अली व जगजीत सिंह के साथ कईं गज़लों में भी काम किया, और बिद्दू के पॉप व बप्पी लहड़ी के डिस्को गीत भी गाये।

मंगेशकर बहनों में से एक, आशा भोंसले का जन्म ८ सितम्बर १९३३ को महाराष्ट्र के मशहूर अभिनेता व गायक दीनानाथ मंगेशकर के घर छोटे से कस्बे "गोर" में हुआ। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की तरह इन्होंने भी बचपन से ही गाना शुरु कर दिया था। परन्तु अपने पिता से शास्त्रीय संगीत सीखने के कारण वे जल्द ही पार्श्व गायन के क्षेत्र में कूद पड़ी। अप्रैल १९४२ में इनके पिताजी का देहांत हो गया जिसके बाद इनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और बाद में मुम्बई जा बसा। करीबन १० वर्ष की उम्र में इन्होंने अपना पहला गीत मराठी फिल्म "माझा बाल" के लिये गाया। आशा अपने जन्म-स्थल को आज भी याद करती हैं और कहती हैं-"मैं अब भी संगली में बिताये अपने बचपन के दिन याद करती हूँ क्योंकि मेरी वजह से ही लता दी स्कूल से भागतीं थीं। मैं संगली को कभी नहीं भूल सकती क्योंकि वहाँ मेरा जन्म हुआ था"।

हम सबकीं आशा
आशा ने पार्श्व गायन की शुरुआत १९४८ में फिल्म "चुनरिया" से कर दी थी। किन्तु उन्हें अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा। १९४९ का अंत होते होते लाहौर, बरसात, अंदाज़ और महल जैसी फिल्में आईं और लता मंगेशकर संगीतकारों की पहली पसंद बन गईं थीं। आशा, लता दी जितनी ही प्रतिभाशाली होने के बावजूद अपना सही हक नहीं ले पा रहीं थी। ऐसे भी कईं संगीतकार थे जो लता के बाद शमशाद बेगम और गीता दत्त से गवाने के बारे में सोचते थे। जिसकी वजह से फिल्मी जगत में आशा की जगह न के बराबर थी। काफी हल्के बजट की फिल्में या वो फिल्में जिनमें लता न गा पा रहीं हों, वे ही उन्हें मिल पा रहीं थी। मास्टर कृष्ण दयाल, विनोद, हंसराज बहल, बसंत प्रकाश, धनीराम व अन्य संगीतकार थे जिन्होंने आशा जी के शुरुआती दिनों में उन्हें काम दिया। "चुनरिया" के अलावा १९४९ में आईं "लेख" और "खेल" ही ऐसी फिल्में रहीं जिनमें आशा जी ने गाना गाया। "लेख" में उन्होंने मास्टर कृष्ण दयाल के संगीत से सजा एक एकल गीत गाया व मुकेश के साथ एक युगल गीत -'ये काफिला है प्यार का चलता ही जायेगा..." गाया। १९५३ में "अरमान" के बाद ही उन्हें कामयाबी मिलनी शुरु हुई। एस.डी.बर्मन द्वारा संगीतबद्ध मशहूर गाना-"चाहें कितना मुझे तुम बुलावो जी, नहीं बोलूँगी, नहीं बोलूँगी...' गाया। यही गाना उन्होंने तलत महमूद के साथ भी गाया।

उसके बाद रवि ने उन्हें १९५४ में "वचन" में काम दिया। जहाँ उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ फिल्म में एकमात्र गीत गाया-"जब लिया हाथ में हाथ..."। ये अकेला गीत ही उन्हें प्रसिद्धि दिला गया और उन्होंने अपने पैर जमाने शुरु कर दिये। लेकिन एक दो तीन (१९५२), मुकद्दर(१९५०), रमन(१०५४), सलोनी (१९५२), बिजली(१९५०), नौलखा हार(१९५४) और जागृति(१९५३) जैसी कुछ फिल्में ही थी जिनमें उन्होंने एक या दो गाने गाये और यही उनके गाते रहने की उम्मीद थी।

१९५७ उनके लिये एक नईं किरण ले कर आया जब ओ.पी नय्यर जी ने उनसे "तुमसा नहीं देखा" और " नया दौर" के गीत गाने को कहा। उसी साल एस.डी.बर्मन और लता के बीच में थोड़ी अनबन हुई। उधर गीता दत्त भी शादी के बाद परेशान थीं और उपलब्ध नहीं रहती थीं। नतीजतन एस.डी.बर्मन ने भी आशा जी को अपनी फिल्म में लेने का निश्चय किया। उससे अगले साल उन्होंने हावड़ा ब्रिज, चलती का नाम गाड़ी और लाजवंती के कईं सुपरहिट गाने गाये। उसके बाद तो १९७० के दशक तक ओ.पी. नय्यर के लिये आशा जी पहली पसंद बनी रहीं। उसके बाद इन दोनों की जोड़ी में दरार आई। १९६० के दशक में ओ.पी नय्यर के संगीत में आशा जी ने एक से बढ़कर एक बढ़िया गाने गाये। १९७० का दशक उन्हें आर.डी. बर्मन के नज़दीक ले कर आया जिन्होंने आशा जी से कईं मस्ती भरे गीत गवाये। पिया तू अब तो आजा(कारवाँ), दम मारो दम(हरे राम हरे कृष्णा) जैसे उत्तेजक और नईं चुनौतियों भरे गाने भी उन्होंने गाये। जवानी दीवानी (१९७२) के गीत "जाने जां...." में तो उन्होंने बड़ी आसानी से ही ऊँचे और नीचे स्केल में गाना गाया। १९८० में तो उन्होंने गज़ल के क्षेत्र में कमाल ही कर दिया। "दिल चीज़ क्या है..", " इन आँखों की मस्ती..", " ये क्या जगह है दोस्तों..", "जुस्तुजू जिसकी थी.." जैसी सदाबहार गज़लें उनकी उम्दा गायकी निशानी भर हैं। इजाज़त (१९८७) में उन्होंने "मेरा कुछ सामान..: गाना गाया, जिसके लिये उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। ये गाना सबसे मुश्किल गानों में से एक गिना जाता है क्योंकि ये पद्य न हो कर गद्य के रूप में है। ९० के दशक में तो आशा ही छाईं रहीं। चाहें पॉप फिल्मी गीत हो, या पाश्चात्य संगीत की एल्बम हो सभी में आशा जी ही दिखाई पड़ती थीं। वैसे तो उन्होंने गाने गाने कम कर दिये हैं पर आज भी उर्मिला या ऐश्वर्या को रंगीला (१९९४) व ताल ('९९) में आशा जी के गानों पर थिरकते हुए देखा जा सकता है।

आज उनकी आवाज़ पहले से बेहतर और विविधता भरी हो गई है। यदि हम उन्हें संदीप चौटा के "कम्बख्त इश्क.." से पहले आर.डी.बर्मन "तेरी मेरी यारी बड़ी पुरानी.." गाते हुए सुन लें तो भी प्रत्यक्ष तौर पर दोनों आवाज़ों में अंतर करना बहुत कठिन होगा.. जबकि दोनों गानों में ३० बरस का अंतर है!!

दो दिन बाद आशा जी अपना ७५ वां जन्मदिन मनायेंगी, इस अवसर पर संजय पटेल का विशेष आलेख अवश्य पढियेगा, फिलहाल सुनते हैं फ़िल्म "ये रात फ़िर न आयेगी" फ़िल्म का ये मधुर गीत आशा जी की आवाज़ में -



जानकारी स्रोत - इन्टनेट
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ