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Saturday, January 31, 2015

"महलों का राजा मिला..." - इस गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि दी रोशन साहब की पत्नी ने उन्हें



एक गीत सौ कहानियाँ - 51
 

महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 51वीं कड़ी में आज जानिए फ़िल्म 'अनोखी रात' के मशहूर गीत "महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। 



हिन्दी फ़िल्म संगीत जगत में कई संगीतकार ऐसे हुए हैं जो अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बावजूद बहुत ज़्यादा अन्डर-रेटेड रहे। एक से एक बेहतरीन रचना देने के बावजूद इंडस्ट्री और पब्लिक ने उनकी तरफ़ उतना ध्यान नहीं दिया जितना कुछ गिने-चुने और "सफल" संगीतकारों की तरफ़ दिया करते थे। ऐसे एक अन्डर-रेटेड संगीतकार थे रोशन। 40 के दशक में रोशन साहब की प्रतिभा और कला से प्रभावित होकर निर्माता-निर्देशक और संगीतकार ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर, जो बाद में देश-विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये थे, उन्होंने रोशन को All India Radio Delhi में नौकरी दिलवा दी बतौर इन्स्ट्रूमेण्टलिस्ट। और वहीं रोशन साहब की मुलाक़ात हुई कलकत्ता की इरा मोइत्रा से। इरा जी उनके साथ ही काम करने लगीं। दोनों ही कला और संगीत के प्रेमी थे। ऐसे में दोनो का एक दूसरे के निकट आना, प्रेम का पुष्प खिलना बहुत ही प्राकृतिक और सामान्य बात थी। रोशन और इरा के बीच प्यार हो गया और दोनो ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद रोशन साहब मुम्बई (तब बम्बई) आ गये और ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के साथ म्युज़िक ऐसिस्टैन्ट के रूप में काम करने लगे। एक लम्बे संघर्ष और कई चुनौतियों को पार करने के बाद उन्हें स्वतंत्र फ़िल्में मिलने लगी। जिन फ़िल्मों में संगीत देकर उन्होंने हिन्दी फ़िल्म संगीत संसार में अपने नाम की छाप छोड़ दी, वो फ़िल्में थीं 'बावरे नैन', 'बरसात की रात', 'आरती', 'ताज महल', 'ममता', 'बहू बेग़म', 'दिल ही तो है', 'दूज का चाँद', 'चित्रलेखा', 'भीगी रात', 'देवर' और 'अनोखी रात'। रोशन ने लगभग 94 फ़िल्मों में स्वतंत्र रूप से संगीत दिया और उसके अलावा भी कई ऐसी फ़िल्में की जिनमें उन्होंने दो या तीन गीतों का संगीत तैयार किया जब कि उन फ़िल्मों में कोई और मुख्य संगीतकार थे।


रोशन दम्पति
1968 में रोशन साहब जब 'अनोखी रात' फ़िल्म का संगीत बना रहे थे, उसी दौरान उनकी तबीयत नासाज़ हो गई। हार्ट की प्रॉबलेम हो गई थी। फिर भी उन्होंने ऐसी हालत में भी 'अनोखी रात के लगभग सभी गीत रेकॉर्ड कर लिये, पर एक गाना रेकॉर्ड होना अभी बाक़ी था। और दुर्भाग्यवश दिल का दौरा पड़ने से रोशन साहब चले गये 16 नवम्बर के दिन। उनके इस आकस्मिक निधन से इस फ़िल्म का संगीत अधूरा ही रह गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कुछ समय बाद 'अनोखी रात' फ़िल्म के निर्देशक असित सेन ने यह फ़ैसला किया वो बचा हुआ जो एक गीत है इस फ़िल्म का, उसे सलिल चौधरी से कम्पोज़ और रेकॉर्ड करवायेंगे। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि किसी किसी जगह इस बात का उल्लेख है कि 'अनोखी रात' फ़िल्म के इस अन्तिम गीत को रोशन साहब के गुज़र जाने के बाद उनके मुख्य सहायक श्याम राज और सोनिक (संगीतकार जोड़ी सोनिक-ओमी के) ने रेकॉर्ड करवाया था। पर शायद यह सच्चाई नहीं है। तो साहब, जब रोशन साहब की पत्नी इरा जी को इस बात का पता चला कि असित दा सलिल दा से वह आख़िरी गाना बनवाना चाह रहे हैं, तो उनके मन में कुछ और ही बात चल रही थी।   वो उस मातम के दौर में भी असित सेन के पास गईं और उनसे कहा कि फ़िल्म का यह जो एक बचा हुआ गाना है, उसे वो अपनी देख रेख में रेकॉर्ड करवाना चाहती हैं। यह गीत एक श्रद्धांजलि होगी एक वियोगी पत्नी की अपने स्वर्गीय पति के लिए। यह सुन कर असित सेन चौंक उठे। उन्हें यह तो मालूम था कि इरा जी एक गायिका हैं, पर इसका ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो इस तरह का संगीत संयोजन और पूरे रेकॉर्डिंग का संचालन कर कर पायेंगी। उन्होंने इरा जी से पूछा कि आप ये सब कुछ कर पायेंगी? जवाब था "हाँ"। और तब दादा असित सेन ने इरा जी की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस बचे हुए गीत की रेकॉर्डिंग की ज़िम्मेदारी उनको दे दी।


राजेश रोशन
"महलों का राजा मिला, हमारी बेटी राज करेगी, ख़ुशी ख़ुशी कर दो विदा, हमारी बेटी राज करेगी...", यह था वह गीत। गीत की धुन रोशन साहब ने पहले से ही तैयार की हुई थी। इरा जी ने पूरे गाने को अरेंज करके, इस धुन को फ़ाइन ट्यून करके, रेकॉर्ड करवाया, और इस तरह से यह मास्टरपीस कम्पोज़िशन बनी एक श्रद्धांजलि, एक वियोगी पत्नी की तरफ़ से अपने स्वर्गवासी पति के लिए। और क्या लिखा है कैफ़ी साहब ने कि गीत सुनते ही आँखें भर आती हैं! और सिचुएशन भी क्या थी, मुसाफ़िरों का एक दल एक रात के लिए एक रेस्ट-हाउस में आसरा लेता है। एक व्यापारी पिता (तरुन बोस) और उनकी पुत्री (ज़हिदा) उस दल का हिस्सा हैं। यह सामने आता है कि पिता अपनी पुत्री का किसी से विवाह करवाना चाहते हैं पर पुत्री इस रिश्ते से ख़ुश नहीं हैं। तभी बारिश शुरू होती है और एक डाकू (संजीव कुमार) भी उसी बिल्डिंग में शरण लेने घुस आते हैं। वो उस लड़की की तरफ़ जब एक दृष्टि से देखने लगता है तो लड़की इसका कारण पूछती है। और वो कहता है कि उनकी शक्ल बिल्कुल उसके स्वर्गवासी पत्नी से मिलती है, और इस तरह से अपनी पूरी कहानी बताता है। इस गीत में दर्द है एक बेटी का। पर आश्चर्य की बात है कि इसी धुन का इस्तेमाल रोशन साहब के बेटे और अगले दौर के संगीतकार राजेश रोशन ने फ़िल्म 'ख़ुदगर्ज़' में किया और बना डाला एक ख़ुशी का गीत। शत्रुघ्न सिन्हा और अमिता सिंह पर फ़िल्माया हुआ तथा नितिन मुकेश व साधना सरगम का गाया वह गीत था "यहीं कहीं जियरा हमार, ए गोरिया गुम होई गवा रे..."। यह गीत भी अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। राजेश रोशन ने कई बार दूसरों की धुनों से प्रेरित होकर अपने गीत बनाये हैं और उन पर धुन चुराने के आरोप भी जनता ने लगाये हैं, पर इस गीत के लिए यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने पिता की धुन का सहारा लिया है। क्या पिता की सम्पत्ति पुत्र की सम्पत्ति नहीं है? क्या इसे भी चोरी ही कहेंगे आप?

फिल्म - अनोखी रात : 'महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...' : लता मंगेशकर : संगीत - रोशन : गीत - कैफी आज़मी



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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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