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Sunday, November 24, 2019

राग श्री : SWARGOSHTHI – 444 : RAG SHRI






स्वरगोष्ठी – 444 में आज


पूर्वी थाट के राग – 4 : राग श्री


विदुषी श्रुति सडोलिकर से राग श्री में दो खयाल और पारुल घोष से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी श्रुति सड़ोलिकर
पारुल घोष
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट पूर्वी है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम पूर्वी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में पूर्वी थाट के जन्य राग श्री पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के इस चौथे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी श्रुति सडोलिकर से इस राग में निबद्ध दो खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत पारुल घोष के स्वर में सुनवाएँगे। 1951 में प्रदर्शित फिल्म “आन्दोलन” से इन्दीवर रचित और पण्डित पन्नालाल घोष का संगीतबद्ध किया एक गीत – ““प्रभु चरणों में आया पुजारी...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



राग श्री पूर्वी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल तथा मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है जबकि अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है। वादी स्वर कोमल ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का चौथा अर्थात अन्तिम प्रहर माना जाता है। राग श्री के शास्त्रीय पक्ष को समझने के लिए अब हम आपके लिए इस राग में दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी श्रुति सडोलिकर के स्वर में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह आडियो क्लिप हमने अलबम “इवनिंग रागाज, भाग 1” से साभार लिया है। प्रस्तुत की जाने वाली खयाल रचनाओं में पहले आप विलम्बित खयाल “कहाँ मैं ढूंढन जाऊँ...” और फिर द्रुत खयाल “सुमिर कर ले आज गुरु को...” का रसास्वादन कर सकते है।

राग श्री : विलम्बित और द्रुत खयाल रचनाएँ : विदुषी श्रुति सडोलिकर


राग श्री एक प्राचीन राग है। प्राचीन काल में जब राग-रागिनी पद्धति प्रचलित थी, तब चारो मतों से राग श्री को एक मुख्य राग माना गया है। यह गम्भीर प्रकृति का राग है। इसकी गणना सन्धिप्रकाश रागों में होती है। राग श्री में कोमल ऋषभ और पंचम स्वरों की पुनरावृत्ति बार-बार की जाती है, किन्तु कोमल ऋषभ स्वर की पुनरावृत्ति करते समय गान्धार स्वर का स्पर्श भी किया जाता है। राग का यह नियम है कि वादी और संवादी स्वरों में षडज-पंचम अथवा षडज-मध्यम संवाद अवश्य होनी चाहिए। राग श्री के वादी-संवादी स्वरों में इन दोनों में से कोई भाव नहीं है। यदि हम इस राग के स्वरूप को ध्यान में रख कर वादी-संवादी चुनने का प्रयास करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इसमें कोमल ऋषभ और पंचम के अलावा अन्य कोई स्वर वादी-संवादी नहीं हो सकते। अतः राग मारवा के समान राग श्री के वादी-संवादी के स्वरों को भी राग नियम का अपवाद माना गया है। राग श्री पर आधारित फिल्मी गीत के लिए हमने 1951 में प्रदर्शित फिल्म “आन्दोलन” का एक गीत चुना है। गीत के बोल है; “प्रभु चरणों में आया पुजारी...”। इस गीत को इन्दीवर ने लिखा और सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष ने स्वरबद्ध किया है। गीत में पारुल घोष और साथियों ने स्वर दिया है।

राग श्री : “प्रभु चरणों में आया पुजारी...” : पारुल घोष व साथी : फिल्म – आन्दोलन



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 444वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 30 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक अपने पते के साथ भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 446 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 442वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बसन्त, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और महेन्द्र कपूर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

पण्डित श्रीकुमार मिश्र
मित्रों, आज के अंक में सबसे पहले आपको एक शोक-सन्तप्त सूचना देना चाहता हूँ। लखनऊ के जाने-माने संगीतज्ञ, “स्वरगोष्ठी” के सबसे बड़े सहयोगी, सलाहकार और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र गत सप्ताह संगीत-प्रेमियों और बड़ी संख्या में अपने शिष्य-शिष्याओं को छोड़ कर स्वर्गारोहण कर गए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में डॉ. लालमणि मिश्र और पण्डित प्रदीप दीक्षित ‘नेहरंग’ द्वारा उन्हें संगीत की दीक्षा मिली। वह संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के अनुयायी रहे और उनकी संगीत-शिक्षा का पालन भी करते रहे। इसराज वादन की शिक्षा उन्हें अपने पिता से और सुप्रसिद्ध वादक कनक राय त्रिवेदी से मिली। संगीत-शिक्षा पूर्ण करने के बाद उनकी नियुक्ति उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में संगीत सर्वेक्षक के पद पर हो गई। सेवाकाल के ही दौरान श्रीकुमार जी ने प्राचीन संगीत ग्रन्थों का अध्ययन कर लखनऊ के वाद्य-यंत्र निर्माणकर्त्ता बादशाह खाँ से प्राचीन मयूर वीणा का निर्माण कराया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने “दुर्लभ वाद्य संगीत कला केन्द्र” की स्थापना की और साधन-विहीन गरीब बच्चों को संगीत-शिक्षा देते रहे। आकाशवाणी और दूरदर्शन के ‘ए’ श्रेणी के कलाकर श्री मिश्र को इस वर्ष दिसम्बर में आयोजित होने वाले समारोह में अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया था। गत वर्ष 3 जून से लेकर 16 सितम्बर तक उनकी लिखी 14 कड़ियों की श्रृंखला “राग से रोगोपचार” का “स्वरगोष्ठी” पर प्रकाशन किया जा चुका है। “स्वरगोष्ठी” परिवार और सभी संगीत-प्रेमियों की ओर से दिवंगत साधक पण्डित श्रीकुमार मिश्र को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित है।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने पूर्वी थाट के जन्य राग श्री का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात विदुषी श्रुति सडोलिकर के स्वर में इस राग में दो खयाल रचनाओं का रसास्वादन किया। राग श्री पर आधारित रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए पारुल घोष के युगल स्वर में फिल्म “आन्दोलन” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला का शुभारम्भ करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग श्री : SWARGOSHTHI – 444 : RAG SHRI : 24 नवम्बर, 2019

Saturday, November 16, 2019

राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 443 : RAG BASANT






स्वरगोष्ठी – 443 में आज


पूर्वी थाट के राग – 3 : राग बसन्त


पं. भीमसेन जोशी से राग बसन्त में खयाल और आशा भोसले व महेन्द्र कपूर से फिल्मी गीत सुनिए





पण्डित भीमसेन जोशी
महेन्द्र कपूर और आशा भोसले
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट पूर्वी है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम पूर्वी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में पूर्वी थाट के जन्य राग बसन्त पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के इस तीसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी से इस राग में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत आशा भोसले और महेन्द्र कपूर के स्वर में सुनवाएँगे। 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से भरत व्यास रचित और सी. रामचन्द्र का संगीतबद्ध किया एक गीत – “बसन्त है आया रंगीला...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।


राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है। यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में छह और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किया जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और दोनों मध्यम स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग के आरोह में पंचम स्वर वर्जित होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि के चतुर्थ प्रहर में 3 बजे से साढ़े 4 बजे के मध्य है। परन्तु बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। इस राग के बाद ललित, भैरव आदि रागों का समय आरम्भ होता है। अब हम आपको राग बसन्त की एक रचना पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में सुनवाते हैं। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं; ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न के स्वर में एक रचना सुनते हैं। अब आप सुनिए; पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम तलवलकर ने संगति की है।

राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स, ग, म॑, ध(कोमल), नि, सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं, नि, ध, प, म॑, ग, रे, स। इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है। अब आप राग बसन्त पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनिए। वर्ष 1961 में वी. शान्ताराम की फिल्म “स्त्री” का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म का एक गीत; “बसन्त है आया रंगीला...” राग बसन्त पर आधारित है। गीत को स्वर दिया है आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों और संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बसन्त : “बसन्त है आया रंगीला...” : आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी : फिल्म - स्त्री




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 443वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1951 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पुरानी पार्श्वगायिका का मुख्य स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 445 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 441वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूरिया धनाश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, डोम्बिबली, महाराष्ट्र से श्रीपाद बावडेकर, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने पूर्वी थाट के जन्य राग बसन्त का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में इस राग की एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। राग बसन्त पर आधारित रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए आशा भोसले और महेन्द्र कपूर के युगल स्वर में फिल्म “स्त्री” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम पूर्वी थाट के एक अन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है।
“फेसबुक” पर हमारी एक पाठक राजश्री चालसे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखती है; Rajashree Chalse सर तुम्हाला follow करते। तुमच्या रागांबद्दलच्या पोस्टस् खुप छान असतात।   
हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 443 : RAG BASANT : 17 नवम्बर, 2019


Sunday, November 10, 2019

राग पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 442 : RAG PURIYA DHANASHRI






स्वरगोष्ठी – 442 में आज


पूर्वी थाट के राग – 2 : राग पूरिया धनाश्री


उस्ताद राशिद खाँ से राग पूरिया धनाश्री में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत सुनिए




उस्ताद राशिद खाँ
उस्ताद अमीर खाँ
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पाँचवाँ थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम पूर्वी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में पूर्वी थाट के जन्य राग पूरिया धनाश्री पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के इस दूसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ से इस राग में निबद्ध एक रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुनवाएँगे। 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से शकील बदायूनी रचित और नौशाद का संगीतबद्ध किया एक गीत – “तोरी जय जय करतार...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, ध(कोमल), प, नि, सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल), नि, ध, प, म॑(तीव्र), ग, म॑(तीव्र), रे, ग, रे, सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। अब आप रामपुर सहसवान घराने की गायकी में दक्ष उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग पूरिया धनाश्री, तीनताल में निबद्ध एक लोकप्रिय खयाल रचना; “पायलिया झनकार मोरी...” सुनिए। इस प्रस्तुति में तबले पर विजय घाटे और हारमोनियम पर सुधीर नायक ने संगति की है।

राग पूरिया धनाश्री : “पायलिया झनकार मोरी...” : उस्ताद राशिद खाँ


अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - बैजू बावरा




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 442वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका का मुख्य स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 16 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 444 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 440वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूर्वी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – वाणी जयराम

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हमारे एक नए प्रतिभागी किसी अज्ञात स्थान से श्रीपाद बावडेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने पूर्वी थाट के जन्य राग पूरिया धनाश्री का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायक उस्ताद रशीद खाँ से इस राग में एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में फिल्म “बैजू बावरा” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम पूर्वी थाट के नए राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 442 : RAG PURIYA DHANASHRI : 10 नवम्बर, 2019

Sunday, November 3, 2019

राग पूर्वी : SWARGOSHTHI – 441 : RAG PURVI






स्वरगोष्ठी – 441 में आज

पूर्वी थाट के राग – 1 : राग पूर्वी

पण्डित अजय चक्रवर्ती से राग पूर्वी में शास्त्रीय रचना और वाणी जयराम से फिल्मी गीत सुनिए





पण्डित अजय चक्रवर्ती
वाणी जयराम
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आरम्भ हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पाँचवाँ थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम पूर्वी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में पूर्वी थाट के आश्रय अथवा जनक राग “पूर्वी” पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के पहले अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती से इस राग में निबद्ध एक रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत वाणी जयराम के स्वर में सुनवाएँगे। 1979 में प्रदर्शित फिल्म “मीरा” से भक्त कवयित्रि मीराबाई रचित और पण्डित रविशंकर का संगीतबद्ध किया एक गीत – “करुणा सुनो श्याम मोरी...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



आज हम पूर्वी थाट और इस थाट के जनक राग पूर्वी के विषय में परिचय प्राप्त करेंगे। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि। इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र और ऋषभ तथा धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। पूर्वी थाट का जनक अथवा आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सा, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, ध(कोमल), नि, सां और अवरोह के स्वर- सां, नि, ध(कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग ‘पूर्वी’ का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। आज हमारी चर्चा में थाट और राग पूर्वी है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे पण्डित अजय चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने राग पूर्वी की इस रचना को ध्रुपद के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ और सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष से प्राप्त हुई है। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग पूर्वी की यह रचना। इस प्रस्तुति में सारंगी पर भारतभूषण गोस्वामी ने और पखावज पर माणिक मुण्डे ने संगति की है। कुछ विद्वान इस ध्रुपद को तानसेन की रचना मानते हैं।

राग पूर्वी : ‘कर कपाल लोचन त्रय...’ पण्डित अजय चक्रवर्ती


राग पूर्वी पर आधारित फिल्मी गीत के लिए अब हम आपको 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’ से एक भक्तिपद, गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। मीराबाई का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-सन्तों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्तिधारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमारे बीच आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘करुणा सुनो श्याम मोरी...’। गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह एक भक्ति रचना है। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग पूर्वी के स्वरों का चयन किया था। “फिल्मी गीतों में रागों का प्रभाव” विषयक शोधकर्त्ता के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग पूरिया धनाश्री का स्पर्श भी है। आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना सितारखानी ताल में निबद्ध है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पूर्वी : ‘करुणा सुनो श्याम मोरी...’ : वाणी जयराम : संगीत – पं. रविशंकर : फिल्म – मीरा



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 441वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। “स्वरगोष्ठी” के 450वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 443 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 439वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – गुणकली (साथ ही राग भैरव का स्पर्श भी है), दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – चौताल व कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुहम्मद रफी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आरम्भ हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने पूर्वी थाट और इसके जनक राग पूर्वी का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती से इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। राग पूर्वी के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर का स्वरबद्ध किया और गायिका वाणी जयराम के स्वर में फिल्म “मीरा” का एक गीत प्रस्तुत किया। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग पूर्वी : SWARGOSHTHI – 441 : RAG PURVI : 3 नवम्बर, 2019

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