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Friday, November 1, 2013

बुलट राजा आये हैं तमंचे पे डिस्को कराने

त्योहारों का मौसम गर्म है, यही वो समय होता है जब सभी नाम चीन सितारे जनता के दरबार में उतरते हैं अपने अपने मनोरंजन का पिटारा लेकर.  इस बार दिवाली पर हृतिक क्रिश का चोगा पहनेगें तो क्रिसमस पर अमीर धूम मचाने की तैयारी कर रहे हैं. शाहरुख, सलमान, अक्षय और अजय देवगन कुछ छुट्टी के मूड में थे तो उनकी कमी को भरने मैदान में उतरेगें शाहिद (आर...राजकुमार), इमरान (गोरी तेरे प्यार में) जैसे नए तीरंदाज़ तो सैफ (बुलट राजा) और सन्नी देओल (सिंह साहेब द ग्रेट) जैसे पक्के खिलाड़ी भी अपना जौहर लेकर दर्शकों के मनोरजन का पूरा इंतजाम रखेंगें. इन सभी फिल्मों के संगीत की हम बारी बारी चर्चा करेगें, तो चलिए आज जिक्र छेड़ते हैं सैफ अली खान और सोनाक्षी सिन्हा की बुलट राजा के सगीत की.

तिन्ग्मान्शु धुलिया पान सिंह तोमर और साहेब बीवी और गैंगस्टर जैसी लीक से हटकर फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, पर जहाँ तक बुलट राजा का सवाल है, ऐसा लग रहा है कि ये बॉलीवुड व्यावसायिक फिल्मों की तरफ मसालों से भरी पूरी होने वाली है. संदीप नाथ, कौसर मुनीर, शब्बीर एहमद और रफ़्तार के हैं शब्द और प्रमुख संगीतकार हैं साजिद वाजिद, एक गीत देकर अतिथि संगीतकार की भूमिका निभा रहे हैं मशहूर पॉप बैंड RDB. 

बुलट राजा की संगीत एल्बम RDB के दनदनाते तमंचे पे डिस्को से खुलता है. गीत में निंदी कौर भी हैं RDB के साथ. गीत में पर्याप्त मस्ती है और रिदम भी कदम थिरकाने वाला है. शब्द बेतरतीब हैं जिनका जिक्र जरूरी नहीं है, गीत का उद्देश्य कदम थिरकाना और मौज मस्ती लुटाना है जिसमें गीत कामियाब है. 

श्रेया घोषाल की मधुर आवाज़ है गीत सामने है सवेरा में. गीत बेहद मधुर है, और साजिद वाजिद की चिरपरिचित छाप लिए हुए है. पुरुष स्वर है वाजिद की इस युगल गीत में. गीत में बोन्नी चक्रवर्ति का गाया एक छोटा सा बांग्ला पीस भी है जिसके साथ श्रेया के स्वर बेहद खूबसूरती से घुलमिल गए हैं. कह सकते है कि ये एल्बम का सबसे यादगार गीत होने वाला है. 

बहुत दिनों बाद सुनाई दिए नीरज श्रीधर, जो इन दिनों प्रीतम कैम्प से कुछ गायब से हैं. गीत है हरे गोविंदा हरे गोपाला. नीरज का ठप्पा है पूरे गीत में. यूँ भी वो सैफ के लिए बहुत से हिट गीतों में पार्श्व गायन कर चुके हैं. शब्द चुटीले हैं और धुन भी बेहद कैची है. गीत का फिल्मांकन इसे लोकप्रिय बनाने में मदद करेगा.  

ममता शर्मा के लेकर एक और मुन्नी सरीखा आईटम रचने की कोशिश की है साजिद वाजिद ने डोंट टच माई बॉडी में. ममता ने जरूरी उन्ह आह भरा है गीत में (कन्फुज शब्द का उच्चारण बेहद चुटीला लगता है). पर शब्दों की तुकबंदी बेअसर है, धुन और संयोजन में भी कोई नयापन नहीं मिलता. ममता जैसी गायिका से कुछ और भी तरह के गीत गवा लीजिए साजिद वाजिद भाई, और मुन्नी के हैंगओवर से बहार आ जाईये. 

कीर्ति सगाथिया ने सुखविंदर के अंदाज़ में गाया है बुलट राजा का शीर्षक गीत. गीत की रिदम और ताल बेशक जबरदस्त है. पर गीत साजिद वाजिद के दबंग और दबंग २ के शीर्षक गीतों से कुछ अलग और बेहतर पेश नहीं करता. हुर्र...चुर्र मुर्र...सब मसाले ज्यों के त्यों मौजूद हैं यहाँ भी. 

सटाके ठोको फिर एक ऐसा गीत है जहाँ बस एक पंच शब्द युग्म पर गीत परोसा गया है. कीर्ति सगाथिया ने अच्छा निभाया है गीत का. शब्दों में भी यहाँ कुछ विविधता है, और वाजिद वाजिद ने संयोजन भी सिचुएशन के हिसाब से बढ़िया किया है. गीत परदे पर बेहद बढ़िया लगेगा, हाँ फिल्म के जाने के बाद इसे याद रखा जायेगा या नहीं, कहना मुश्किल है.

एल्बम के बहतरीन गीत - सामने है सवेरा, तमंचे पे डिस्को, हरे गोविदा हरे गोपाला...
हमारी रेटिंग - ३.४/५ 

Tuesday, August 17, 2010

"तेरे मस्त-मस्त दो नैन" गाता हुआ हुड़हुड़ाता आ पहुँचा है एक दबंग, जिसके लिए मुन्नी भी बदनाम हो गई..

ताज़ा सुर ताल ३१/२०१०

विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के इस अंक में हम सभी का स्वागत करते हैं। सुजॊय जी, अब ऐसा लगने लगा है कि साल २०१० के हिट गीतों की फ़ेहरिस्त ने रफ़्तार पकड़ ली है; एक के बाद एक फ़िल्म आती जा रही है और हर फ़िल्म का कोई ना कोई गीत ज़रूर हिट हो रहा है।

सुजॊय - हिट गीतों की अगर बात करें तो कभी कभी कामयाब गीतों का फ़ॊरमुला फ़िल्मकारों और कुछ हद तक अभिनेता पर भी निर्भर करता है, ऐसा अक्सर देखा गया है। अब सलमान ख़ान को ही लीजिए, शायद ही उनका कोई फ़िल्म ऐसा होगा, जिसके गानें हिट ना हुए होंगे। वैसे तो उनकी फ़िल्में भी ख़ूब चलती हैं, लेकिन उनके फ़्लॊप फ़िल्मों के गानें भी कम से कम चल पड़ते हैं।

विश्व दीपक - ठीक कहा, इसी साल उनकी फ़िल्म 'वीर' बॉक्स ऑफ़िस पर नाकामयाब रही, लेकिन फ़िल्म के गाने चल पड़े थे, ख़ास कर "सलाम आया" गीत तो बहुत पसंद किया गया। पिछले कुछ सालों से सलमान ख़ान की फ़िल्मों में साजिद-वाजिद संगीत दे रहे हैं। 'तेरे नाम' की अपार कामयाबी के बावजूद सल्लु मिया ने हिमेश रेशम्मिया से साजिद वाजिद पर स्विच-ओवर कर लिया था। पिछले साल 'वाण्टेड' और इस साल जनवरी में प्रदर्शित 'वीर' के बाद अब सलमान और साजिद-वाजिद की तिकड़ी लेकर आए हैं फ़िल्म 'दबंग', और आज 'टी.एस.टी' में इसी फ़िल्म के गानें।

सुजॊय - 'दबंग' अभिनव कश्यप निर्देशित फ़िल्म है जिसमें सलमान ख़ान की नायिका बनी हैं नवोदित अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा। साथ मे हैं अरबाज़ ख़ान, सोनू सूद, विनोद खन्ना, डिम्पल कपाडिया, महेश मांजरेकर और ओम पुरी। यानी कि एक ज़बरदस्त स्टार-कास्ट है इस फ़िल्म में। साजिद वाजिद के धुनों पर गानें लिखे हैं जलीश शेरवानी ने। लेकिन एक गीत ललित पण्डित ने लिखा और स्वरबद्ध किया है। फ़ैज़ अनवर ने भी एक गीत लिखा है।

विश्व दीपक - कहते हैं सौ सुनार की एक लुहार की, तो यहाँ भी वही बात है, फ़ैज़ साहब ने जो एक गीत लिखा है, वही फ़िल्म के बाक़ी सभी गीतों पर भारी है। सुनते हैं राहत फ़तेह अली ख़ान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में वही गीत।

गीत - तेरे मस्त मस्त दो नैन


सुजॊय - वाह! अच्छा लगा। सूफ़ी क़व्वाली अंदाज़ का यह गीत राहत साहब के फ़िल्मी गायन करीयर का एक और यादगार गीत बनने जा रहा है। 'वीर' के "सुरीली अखियों वाली" के बाद, साजिद-वाजिद के लिए फिर एक बार उन्होंने अपने आप को सिद्ध किया है इस गीत में। साजिद वाजिद के कम्पोज़िशन्स की अच्छी बात यह लगती है कि वो भारतीय साज़ों की ध्वनियों का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं जिससे गीत ज़्यादा कर्णप्रिय बन जाता है।

विश्व दीपक - और रही बात इस गीत के बोलों की, तो फ़ैज़ अनवर, जो एक अनुभवी फ़िल्मी गीतकार रहे हैं और ९० के दशक में बहुत सारे हिट गीत दिए हैं, उन्होंने काव्यात्मक शैली अख़्तियार करते हुए इस गीत में लिखा है "माही वे आप सा, दिल ये बेताब सा, तड़पा जाए तड़पा तड़पा जाए, नैनों के झील में, उतरा था युंही दिल, डूबा जाए डूबा डूबा जाए..."। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि यह गीत हर लिहाज़ से सुपरहिट होने का स्तर रखता है। इस गीत के दो वर्ज़न हैं, हमने राहत साहब और श्रेया का युगल वर्ज़न सुना, राहत साहब का एकल वर्ज़न भी है। लगे हाथों उसे भी सुन लते हैं।

गीत - तेरे मस्त मस्त दो नैन (एकल)


सुजॊय - फ़िल्म का तीसरा गीत, या युं कहिए कि ऐल्बम का तीसरा गीत है "मुन्नी बदनाम" जिसे लिखा व स्वरबद्ध किया है जतिन ललित के ललित पण्डित ने। यह एक आइटम नंबर है जिसे ममता शर्मा और ऐश्वर्या ने गाया है। यह गीत मास के लिए है, क्लास के लिए नहीं। चलिए, इसे भी सुनते चलें....

गीत - मुन्नी बदनाम


विश्व दीपक - "मुन्नी बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए", आइटम नंबर होने के साथ इसमें कॊमिक एलीमेण्ट्स भी डाले गए हैं, जैसे कि "ले झंडु बाम हुई डारलिंग तेरे लिए", "शिल्पा सा फ़िगर, बेबो सी अदा" वगेरह। वैसे क्या आपको पता है कि यह गाना "उत्तर प्रदेश" के एक पुराने लोक-गीत "लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए" से प्रेरित है। इसी लोक-गीत का इस्तेमाल बप्पी-लाहिड़ी भी एक फिल्म "रॉक डांसर" में कर चुके हैं, जहाँ "लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए" के बोल पर "जावेद जाफ़री" थिड़कते हुए नज़र आए थे। मुझे यह जानकारी मिलिब्लॉग और आईटूएफ़एस के कार्तिक से हासिल हुई है।

सुजॊय - बड़ी हीं अनूठी जानकारी है। खैर, इस मास नंबर के बाद बेहतर यही होगा कि हम अगले गीत की तरफ़ बढ़ें। ऐल्बम का चौथा गीत है सोनू निगम और श्रेया घोषाल का गाया एक नर्मोनाज़ुक रोमांटिक डुएट "चोरी किया रे जिया"। आइए सुनते हैं।

गीत - चोरी किया रे जिया


विश्व दीपक - वैसे तो सोनू और श्रेया के गाए कई यादगार डुएट्स हैं, इस गीत में वैसे कोई नई बात नहीं है, लेकिन गीत का रीदम और संगीत संयोजन अपीलिंग है। गिटार की मेलोडियस स्ट्रिंग्स और उस पर कैची बीट्स सुनने वाले को गीत के साथ जोड़े रखते हैं। सोनू और श्रेया की आवाज़ों ने फिर एक बार साबित किया कि आज के दौर में ये ही दो अव्वल नंबर पर हैं। साजिद-वाजिद ने बहुत से ऐसे रोमांटिक डुएट्स हमें दिए हैं जब भी उन्हें मौका दिया गया है। इस गीत को लिखा है जलीश शेरवानी ने जिन्होंने फ़िल्म 'मुझसे शादी करोगी' में भी "लाल दुपट्टा", "रब करे तुझको भी प्यार हो जाए" जैसे सफल रोमांटिक गीत लिख चुके हैं।

सुजॊय - अब बढ़ते हैं अगले गीत की तरफ़ जो है फ़िल्म का शीर्षक गीत, "हुड़ हुड़ दबंग"। विश्व दीपक जी, आपको "दबंग" शब्द का अर्थ पता है?

विश्व दीपक - हाँ, "दबंग" यानी "निडर" या "निर्भय", जिसे अंग्रेज़ी में "fearless" कह सकते हैं। लेकिन कहीं भी दबंग शब्द का इस्तेमाल पोजिटीव सेन्स में नहीं होता। हम जिस किसी को भी दबंग के विशेषण से नवाज़ते हैं तो इसका मतलब ये होता है कि वह इंसान शक्तिशाली है और दूसरों को दबा कर रखता है। आज भी गाँवों में जमींदारों को इसलिए दबंग कहते हैं क्योंकि वे गरीब जनता का हक़ मारते हैं और जनता उनसे डरी हुई रहती है। "दबंग" और "दलित" एक दूसरे के पूरक हैं। वह जो लोगों को अपनी जूतों तल दबा कर रखे वह "दबंग" और वह जो "दबा" हुआ हो वह "दलित"। इसलिए "दबंग" का अर्थ "निडर" होते हुए भी यह एक निगेटिव वर्ड है। मेरे हिसाब से फिल्म में भी इसी नकारात्मक अर्थ को दर्शाया गया है।

सुजॊय - अच्छा! तो चलिए यह गीत सुन लेते हैं जिसे सुनते हुए मुझे यकीन है आप सब को फ़िल्म 'ओमकारा' का शीर्षक गीत ज़रूर याद आ जाएगा। वैसे इस गीत में भी आवाज़ सुखविंदर सिंह की ही है जिन्होंने 'ओमकारा' का वह गीत गाया था; और इस गीत में सुखविंदर के साथ वाजिद ने भी आवाज़ मिलायी है। "हुड़ हुड़ दबंग" फ़िल्म में सलमान ख़ान के किरदार को वर्णित करता होगा, ऐसा प्रतीत होता है।

गीत - हुड़ हुड़ दबंग


विश्व दीपक - कुछ हेवी ड्रम्स और वायलिन्स का ज़बरदस्त इस्तेमाल हुआ है; लोक शैली में बनाया गया है गीत वाक़ई "ओमकारा" से मिलता जुलता है। लेकिन बोलों के लिहाज़ से "ओमकारा" इससे बहुत उपर ही रहेगा। ख़ैर, गीत बुरा नहीं है। और आइए अब फ़िल्म का अंतिम गीत सुन लिया जाए, यह एक क़व्वाली है वाजिद, मास्टर सलीम, शबाब साबरी और साथियों की आवाज़ों में। "हमका पीनी है" एक ग्रामीण लोक शैली वाला गीत है जो पूरी तरह से सिचुएशनल है। जलीश शेरवानी के बोल।

सुजॊय - फिर एक बार शायद मास नंबर है, ना कि क्लास। ढोलक का मुख्य रूप से इस्तेमाल है, लीजिए आप भी सुनिए।

गीत - हमका पीनी है


सुजॊय - इन छह गीतों को सुन कर यही कह सकता हूँ कि "तेरे मस्त मस्त दो नैन" ही ऐल्बम का सर्वोत्तम गीत है.. असल में दोनों वर्जन्स हीं कमाल के हैं। जैसा कि शुरु में आपने कहा था "सौ सुन्हार की, एक लुहार की", अब मैं भी सहमत हो गया हूँ आप से। सोनू-श्रेया का "चोरी किया रे जिया" भी कर्णप्रिय रहा। विश्व दीपक जी, आज हम 'दबंग' के साथ साथ 'वी आर फ़मिली' के भी कुछ गानें सुनवाने वाले थे। लेकिन 'वी आरे फ़मिली' के गीतों को जब मैंने सुना तो मुझे लगा कि इस फ़िल्म के सभी गीतों को सुनवाना चाहिए। इसलिए अगर संभव हुआ तो अगले हफ़्ते हम 'वी आर फ़ैमिली' के गानें लेकर हाज़िर होंगे। क्या ख़याल है?

विश्व दीपक - जी, आपने सही कहा। वास्तव में मैने अभी तक "वी आर फ़ैमिली" के गाने नहीं सुने, इसलिए प्रोमोज़ में गाने सुनकर मुझे लगा कि कुछ हीं गाने सुनने लायक हैं। और यही कारण है कि पिछले टीएसटी में मैंने यह कह दिया था कि दोनों फिल्मों के गाने साथ करेंगे। लेकिन चूँकि आपने गाने सुने हैं और आपको वे गाने पसंद आए हैं, तब दोनों एलबमों की समीक्षा साथ करने का कोई प्रश्न हीं नहीं उठता। तो अगली टीएसटी "वी आर फ़ैमिली" पर हीं सजेगी। अलग बात है कि उस वक़्त आपके साथ मैं नही सजीव जी रहेंगे, क्योंकि मैं दस दिनों के लिए नदारद होने वाला हूँ.. घर जा रहा हूँ "रक्षा बंधन" के लिए। २९ को लौटूँगा, उसके बाद मैं फिर से आपके साथ आ जाऊँगा। ठीक है? :) जहाँ तक "दबंग" का सवाल है, तो मेरे हिसाब से गाने "मास" के लिए इस कारण से हैं क्योंकि फिल्म हीं "मास" के लिए है। यह फिल्म "वांटेड" की तर्ज़ पर बनाई गई मालूम होती है। जिस तरह वांटेड के गाने क्रिटिक्स ने एलबम सुनने के बाद नकार दिए थे, लेकिन फिल्म रीलिज होने पर उन्हीं गानों ने धूम मचा दी थी। मेरे हिसाब से इस फिल्म के गाने भी फिल्म आने के बाद उसी तरह का कमाल करने वाले हैं। शायद सलमान खान ने "साज़िद-वाज़िद" को ऐसी हिदायत हीं दी हो कि भाई गाने ऐसे बनाओ कि लोग झूम उठे.. वे गाने कितने दिन चलेंगे, इसका ख्याल रखने की कोई जरूरत नहीं। नहीं तो साज़िद-वाज़िद सुमधुर गाने देने में भी उस्ताद हैं। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का समापन करते हैं। जाते-जाते स्वतंत्रता दिवस की बधाईयाँ भी लेते जाईये। जय हिन्द!

आवाज़ रेटिंग्स: दबंग: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९१- संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद इन दिनों किस रियल्टी शो में नज़र आ रहे हैं?

TST ट्रिविया # ९२- फ़ैज़ अनवर का एक बड़ा ही मशहूर गीत है जो आया था २००१ की एक फ़िल्म में। गीत के एक अंतरे की पंक्ति है "फूल सा खिल के महका है ये दिल, फिर तुझे छू के बहका है ये दिल"। गीत का मुखड़ा बताइए।

TST ट्रिविया # ९३- 'दबंग' और 'वी आर फ़मिली' के साउंडट्रैक में आप दो समनाताएँ बताएँ।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. तुलसी कुमार... एल्बम का नाम - "लव हो जाये"
२. रॉकफ़ोर्ड .. उस गाने को "के के" ने गाया था।
३. सलीम-सुलेमान

सीमा जी, आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। तीसरे सवाल में शायद आप संगीतकार और प्रोगामर में कन्फ़्युज़ हो गईं। अगर जवाब "जतिन-ललित" होता तो हम पूँछते हीं क्यों? :) और वैसे भी टी०एस०टी० के किसी भी अंक में पूछा गया कोई भी सवाल उसी अंक से संबंधित होता है। तो फिर इस सवाल का जवाब तो "सलीम-सुलेमान" हीं होना था, क्योंकि सवाल में इस अंक के किसी और शख्स का तो नाम हीं नहीं आया था। आगे से ऐसे "हिंट्स" पर ध्यान रखिएगा। :)

Monday, January 11, 2010

जब साजिद वाजिद जोड़ी को मिला गुलज़ार साहब का साथ, तो रचा गया एपिक "वीर" का संगीत

ताज़ा सुर ताल ०२/ २०१०

सजीव - 'ताज़ा सुर ताल' की इस साल की दूसरी कड़ी में सभी का हम स्वागत करते हैं। पिछली बार 'दुल्हा मिल गया' की गीतों की चर्चा हुई थी और गानें भी हमने सुनें थे, आज बारी है एक महत्वपूर्ण फ़िल्म की, जिसकी चर्चा शुरु हुए साल बीत चुका है।

सुजॊय - चर्चा शुरु हुए साल बीत चुका है और अभी तक फ़िल्म बाहर नहीं आई, ऐसी तो मुझे बस एक ही फ़िल्म की याद आ रही है, सलमान ख़ान का 'वीर'।

सजीव - बिल्कुल सही पहचाना तुमने! आख़िर अब इस फ़िल्म के गानें रिलीज़ हो चुके हैं, और फ़िल्म के प्रोमोज़ भी आने शुरु हो गए हैं। आज फ़िल्म 'वीर' की बातें और 'वीर' का संगीत 'ताज़ा सुर ताल' पर।

सुजॊय - तो सजीव, जब 'वीर' की बात छिड़ ही गई है तो बात आगे बढ़ाने से पहले इस फ़िल्म का मशहूर गीत "सलाम आया" सुन लेते हैं और श्रोताओं को भी सुनवा देते हैं, उसके बाद इस गीत के बारे में चर्चा करेंगे और 'वीर' की बातों को आगे बढ़ाएँगे।

सजीव - ज़रूर! बस इतना बता दें कि इस फ़िल्म के संगीतकार हैं साजिद-वाजिद और गीतकार हमारे गुलज़ार साहब।

गीत - सलाम आया...Salaam aaya (veer)


सुजॊय - रूप कुमार राठोड़, श्रेया घोषाल और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में यह सुरीला गीत हमने सुना। बहुत दिनों के बाद ऐसा ख़ूबसूरत गीत आया है, क्यों?

सजीव - बिल्कुल! पीरियड फ़िल्मों की अगर बात करें तो 'जोधा अक़बर' के बाद यही पहला पीरियड फ़िल्म रिलीज़ होने जा रहा है। फ़िल्म 'वीर' के इस गीत को सुनते हुए फ़िल्म 'जोधा अक़बर' का "कहने को जश्न-ए-बहारा है" की याद आ जाती है जैसे!

सुजॊय - हाँ, अंदाज़ कुछ कुछ उसी तरह का है। एक चीज़ आपने ग़ौर की है आजकल, कि शुद्ध युगल गीत होते ही नहीं हैं इन दिनों। दो मुख्य गायक गायिका के साथ एक तीसरी आवाज़ को भी शामिल कर लिया जाता है कुछ चुनिंदा बोलों और आलापों को गाने के लिए। यह एक ट्रेंड सी जैसे चल पड़ी है।

सजीव - अगर ऐसा ही चलता रहा तो प्योर डुएट्स तो ख़त्म ही हो जाएँगे! ख़ैर, जब तक गाना अच्छा है, तब तक चाहे दो लोग गाएँ या तीन, बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। और बताओ इस गीत के बारे में और क्या ऒब्ज़र्वेशन है तुम्हारी?

सुजॊय - इसका जो संगीत संयोजन हुआ है, जिसे हम अरेन्जमेंट कहते हैं, वह भारतीय साज़ों के आधार पर किया गया है। अब ये ध्वनियाँ हो सकता है कि सीन्थेसाइज़र से निकले होंगे, लेकिन सितार और बाँसुरी की मीठी तानें बहुत दिनों के बाद किसी फ़िल्मी गीत में सुनने को मिला है।

सजीव - साथ ही कोरस का और स्ट्रिंग् इन्स्ट्रुमेंट्स जैसे कि वायलिन्स का भी सुंदर प्रयोग मिलता है। और अरे भई गीतकार का ज़िक्र तो हमने किया ही नहीं। गुलज़ार साहब के बोलों ने भी तो उतना ही कमाल किया है!

सुजॊय - कोई शक़ नहीं इसमें। और इससे एक और बात साबित हो जाती है कि अगर बोल अच्छे हों तो आज के दौर के संगीतकार भी मधुर संगीत दे सकते हैं। साजिद वाजिद अब तक चलताऊ किस्म के गानें ही बनाते आए हैं, लेकिन देखिए सुलज़ार के बोल पाकर कितना अच्छा गाना बना कर दिखाया है! अच्छा, अब दूसरा गाना कौन सा सुनवा रहे हैं?

सजीव - दूसरा गाना है सोनू निगम का गाया हुआ, मुखड़े के बोल हैं "मेहरबानियाँ"।

गीत - मेहरबानियाँ..meharbaaniyan (veer)


सजीव - यह गाना कैसा लगा?

सुजॊय - हाँ, एक अलग ही अंदाज़ का गाना है, लेकिन अगर इस पीरियड फ़िल्म के पार्श्व की बात करें तो मुझे ऐसा लगा कि गा्ने का रीदम और अंदाज़ थोड़ा ज़्यादा मॊडर्ण सा बन गया है। अगर किसी को यह न बताया जाए कि यह एक पीरियड फ़िल्म का गीत है, तो इसे सुन कर लगेगा कि कॊलेज के लड़कों पर फ़िल्माया गया है जो फ़िल्म की नायिका के साथ मस्ती कर रहे हैं।

सजीव - और एक बात नोटिस की है तुमने? गीत का जो शुरुआती संगीत है और शुरुआती रीदम है वह फ़िल्म 'दिल चाहता है' के सोनू निगम के ही गाए "तन्हाई" गीत के रीदम से बहुत मिलता जुलता है।

सुजॊय - वाक़ई! अब अगला गाना सुनने से पहले ज़रा इस फ़िल्म की बातें हो जाएँ?

सजीव - ज़रूर! 'वीर' फ़िल्म के निर्माता हैं विजय गलानी। निर्देशक हैं अनिल शर्मा। कहानी और स्क्रीनप्ले शैलेश वर्मा और सलमान ख़ान ने मिलकर लिखा है। सल्लु मियाँ के अलावा फ़िल्म में नायिका की भूमिका में है लिज़ा लज़रुस। साथ में हैं मिथुन चक्रबर्ती, जैकी श्रोफ़ और शाहरुख़ ख़ान भी हैं इस फ़िल्म में। किसी भी पीरियड फ़िल्म में सिनेमाटोग्राफ़ी का महत्वपूर्ण पक्ष होता है, तो इस फ़िल्म में यह विभाग सम्भाला है गोपाल शाह ने।

सुजॊय - चलिए, फ़िल्म के कास्ट और क्रू से तो आपने हमारा परिचय करा दिया, अब एक गीत सुनने की बारी है। बताइए अब कौन सा गाना सुना जाए?

सजीव - अब हम सुनेंगे मिली जुली आवाज़ों में "ताली मार दो हत्थी वीरा", जिसे गाया है सुखविंदर सिंह, राहत फ़तेह अली ख़ान, वाजिद और नोमान पिंटो ने।

गीत - ताली मार...taali maar (veer)


सुजॊय - इस गीत में भी नयापन है। साजिद-वाजिद का ख़ास ट्रेडमार्क इस गीत में सुनने को मिलता है। इस गीत के मुखड़े को अगर आप ने ग़ौर से सुना है तो आपको २००९ की उनकी फ़िल्म 'वांटेड' के गीत "लव मी बेबी लव मी" की याद आ जाएगी।

सजीव - सच कहा तुमने। इस गीत का संगीत संयोजन अच्छा हुआ है। तालियाँ बजाकर गीत का पूरा रिदम खड़ा किया गया है। पिछले गीत में हमें जिस पीरियड अंदाज़ की कमी लग रही थी, वह इस गीत में कुछ हद तक पूरा हुआ है।

सुजॊय - अच्छा सजीव, हम बार बार 'पीरियड पीरियड' कह रहे हैं, क्या आपको कुछ अंदाज़ा है कि किस पीरियड की यह फ़िल्म है। कहानी का मूल क्या है?

सजीव - जहाँ तक मैंने सुना है या पढ़ा है कहीं पे, यह उस समय की कहानी है जब अंग्रेज़ इस देश में अपना शासन चलाया करते थे। उनके 'डिवाइड ऐंड रूल' पॊलिसी की वजह से कई राजा महाराजा और नवाब झांसे में आ गए और अपना बहुमूल्य राजपाठ उन फ़िरंगियों के हाथों सौंप दिया। लेकिन एक जाती ऐसी भी थी जिन्होने मौत को ग़ुलामी से बेहतर माना। और यह जाती थी पिंडरी। पिंडरियों के रगों में वो ख़ून था जो अपने अंतिम साँसों तक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध करते थे। और पिंडरियों में सब से साहसी, सब से ज़्यादा शक्तिशाली पिंडरी का नाम था 'वीर'। वीर ने अंग्रेज़ों की ग़ुलामी स्वीकार नहीं की, जिसकी वजह से अंग्रेज़ों के अलावा माधवगढ़ के राजा से भी दुश्मनी मोल ली। दूसरी तरफ़ वीर प्रेम करता था उसी राजा की पुत्री यशोधरा से। वीर के पिता की बेइज़्ज़ती का बदला दाव पर था, उसका प्यार दाव पर लग चुका था, उसका अपना अस्तित्व भी दाव पर था। तलवारें टकराईं,एक के बाद एक शव गिरने लगे युद्ध भूमि पर। क्या होता है फ़िल्म के अंत में? यही देखना है हमें जैसे ही यह फ़िल्म रिलीज़ होती है।

सुजॊय - यानी की हिन्दुस्तानी "ग्लादियेटर" हैं सल्ल्लू मियां यहाँ. चलिए हमें और हमारे पाठकों को एक अंदाज़ा हो गया फ़िल्म के बारे में। अब देखना है कि जनता किस तरह से फ़िल्म को ग्रहण करती है। ख़ैर, अब आज के चौथे गीत की बारी। अब मैं आपको सुनवाउँगा राहत फ़तेह अली ख़ान और सुज़ेन डी'मेलो कई आवाज़ों में एक नर्मोनाज़ुक गीत, "सुरीली अखियों वाले"। "सलाम आया" गाने की तरह यह गीत भी बेहद कोमल और प्यार भरा है, जिसे सुन कर सही मायने में अच्छा लगता है। और राहत साहब का सुफ़ीयाना अंदाज़ गीत में अच्छा रंग ले आया है। इंटर्ल्युड म्युज़िक में कोरस का अच्छा इस्तेमाल हुआ है।

सजीव - और एक बार फिर गुलज़ार साहब के बोलों ने गीत को एक अलग मुकाम तक पहुँचाया है। लेकिन यह बताना मुश्किल है कि सुज़ेन डी'मेलो ने जिन अंग्रेज़ी बोलों को गाया है उन्हे भी गुलज़ार साहब ने ही लिखे हैं या फिर कोई और!

सुजॊय - गीत सुनने से पहले इस गीत से मिलता जुलता एक गीत का ज़िक्र मैं करना चाहूँगा। गीत है फ़िल्म 'लगान' का "ओ री छोरी मान भी ले बात मोरी"। इस गीत में जहाँ उदित और अल्का गीत को गाते है, वहीं दूसरी तरफ़ एक ब्रिटिश लड़की वसुंधरा दास की आवाज़ में अंग्रेज़ी के बोल गाती हैं। और 'वीर' के इस गीत में भी ऐसा ही लगता है कि कोई अंग्रेज़ लड़की ने सुज़ेन वाले पोर्शन गाए होंगे!

गीत - सुरीली आँखों वाले...surili akhiyon waale (veer)


सजीव - और अब माहौल को थोड़ा और बदलते हुए एक ठुमरी सुनते हैं "कान्हा बैरन हुई बांसुरी, कान्हा क्यो तेरे अधर लगी"।

सुजॊय - वाह, क्या बात है!

सजीव - बिल्कुल, और वह भी रेखा भारद्वाज की गाई हुई। 'ओम्कारा' और 'दिल्ली-६' के बाद रेखा भारद्वाज एक मशहूर गायिका के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी हैं। और इस ठुमरी को भी क्या ख़ूब अंजाम दिया है उन्होने! बेग़म अख़्तर की ठुमरी वाला अंदाज़ जैसे यकयक ज़हन में आ जाता है।

सुजॊय - इस ठुमरी में तबले से रिदम तैयार किया गया है जैसा कि होना ही चहिए था। और रेखा जी के साथ में आवाज़ मिलाई है तोशी साबरी, शरीब साबरी और शबाब साबरी ने। देखना यह है कि क्या यह गीत भी "ससुराल गेंदाफूल" की तरह लोकप्रिय होती है या नहीं!

सजीव - देखो जिस तरह से तुमने "मेहेरबानियाँ" गीत में "तन्हाई" और "ताली" गीत में "लव मी बेबी" गीत की झलक पाई थी, वैसे ही इस ठुमरी में भी मैं एक और गीत के सुर ढूंढ़ पाया हूँ।

सुजॊय - कौन सा?

सजीव - रेखा भारद्वाज जब दूसरी बार "कान्हा" गाती हैं, तब उसके साथ "मितवा, कहे धड़कनें तुझसे क्या" गीत के "मितवा" वाले अंश की धुन से मेल महसूस की जा सकती है।

गीत - कान्हा बैरन हुई बांसुरी...kaanha (veer)


सुजॊय - तो कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि इस फ़िल्म का संगीत अच्छा है, क्यों सजीव?

सजीव - हाँ, कम से कम साजिद वाजिद आज तक जिस तरह का संगीत देते आए हैं, उस लिहाज़ से तो यह उनका सब से बेहतरीन ऐल्बम माना जाना चाहिए इसे। जिस तरह से हिमेश भाई का 'तेरे नाम' फिर कभी नहीं बना पाया, वैसे ही हो सकता है कि 'वीर' के साथ भी साजिद वाजिद का नाम वैसे ही जुड़ जाए। यह तो वक़्त ही बताएगा।

वीर के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
रेखा भारद्वाज के गाये गीत के अलावा अन्य गीतों की बहुत अधिक शेल्फ वेल्यू नहीं नज़र आती, कुछ बार सुनने के बाद आप कुछ बोरियत महसूस करेंगें, पर जहाँ तक गीतों के स्तर का सवाल है, निराशा नहीं हाथ लगती. "सलाम आया","सुरीली अखियों वाले" (सुंदर बोल), और कान्हा जैसे गीतों के चलते ये अल्बम २०१० की हिट परेड में विशेष महत्त्व रखेगी. आवाज़ ने दिए ४ तारे.


अब पेश है आज के तीन सवाल.

TST ट्रिविया # ०४-"सलाम आया" और "रफ़्ता रफ़्ता देखो आँख मेरी लड़ी है" गीत में आप क्या समानता खोज सकते हैं?

TST ट्रिविया # ०५-साजिद-वाजिद की पहली ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम और पहली फ़िल्मी ऐल्बम का नाम बताइए।

TST ट्रिविया # ०६- संगीतकार साजिद-वाजिद ने गीतकार आनंद बक्शी साहब के साथ एक फ़िल्म में काम किया था। कौन सी थी वह फ़िल्म?


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी दो सही जवाबों के साथ ४ अंक अर्जित कर लिए.याद रहे आप लोग रेटिंग देकर भी १ अंक कम सकते हैं, इन नए गीतों पर आपकी राय हम जानना चाहते हैं.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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