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Monday, June 3, 2013

राम संपथ सफल रहे 'फुकरों' संग एक बार फिर कुछ नया करने में

ताज़ा  सुर ताल - फुकरे

मित त्रिवेदी की ही तरह राम सम्पंथ भी एक और ऐसे संगीतकार जिनके काम से हमेशा ही नयेपन की उम्मीद रहती है. राम की नयी एल्बम है फिल्म फुकरे  का संगीत. आईये आज की इस महफ़िल में चर्चा करें इसी एल्बम की. यहाँ गीतकार हैं विपुल विग और मुन्ना धिमान. गौरतलब है कि विपुल फिल्म के स्क्रीन लेखक भी हैं. 

शीर्षक गीत की रफ़्तार, राम के रचे डी के बॉस  जैसी है, यहाँ भी भूत  है जो लँगोटी लेके भाग  रहा है, पर शाब्दिक रूप से गीत का फ्लेवर काफी अलग है. एक नए गायक अमजद भगडवा की ताज़ी ताज़ी आवाज़ में है ये गीत और शीर्षक गीत अनुरूप पर्याप्त मसाला है गीत में. अमजद की आवाज़ प्रभावी है. 

क्लिंटन सेरेजो की दमदार आवाज़ में है अगला गीत रब्बा, जो शुरू तो होता है बड़े ही नर्मो नाज़ुक अंदाज़ में होता है जिसके बाद गीत का रंग ढंग पूरी तरह से बदल जाता है, शब्द बेहद ही खूबसूरत है, और संगीत संयोजन में विविधता भरपूर है जिससे श्रोता पूरे समय गीत से जुड़ा ही रहता है 

संगीत  संयोजन की यही विविधता ही अगले गीत जुगाड  की भी शान है, जहाँ धुन कव्वाली नुमा है और बेहद सरल है. जुबान पर चढ़ने में सहज है और तीन अंतरे का ये गीत भी पूरे समय श्रोताओं की दिलचस्पी बरकरार रखता है. शब्द एकदम सामयिक हैं, वास्तव में यही आज की तस्वीर भी है, बेहद सरल शब्दों में गीतकार बहुत कुछ कह गए हैं यहाँ. जुगाड  के इस काल में ये गीत किसी एंथम से कम नहीं है. और हाँ गायक के रूप में कैलाश खेर से बेहतर चुनाव और कौन हो सकता था, कीर्ति सगाथिया ने भी उनका अच्छा साथ निभाया है.

आंकड़ों की बात की जाए तो मिका  सिंह का कोई तोड़ नहीं है, शायद ही उनका कोई गीत कम चर्चित रह जाता होगा. अगले गीत में मिका के साथ हैं खुद राम सम्पंथ और तरन्नुम मलिक. बेडा  पार  नाम के इस गीत में भी राम ने विविधता से सजाया है, पर गीत उतना प्रभावी नहीं बन पाया. गीत का कैच भी उतना जबरदस्त नहीं है जितना उपरोक्त दो गीतों में था. 

लग  गयी लॉटरी  एक और मजेदार गीत हैं, राम संपथ और तरन्नुम मालिक के युगल स्वरों में ये गीत अपनी सरल धुन के चलते जुबाँ पे चढ़ने लायक है. गीत बहुत लंबा नहीं है इसलिए विविधताओं के अभाव में भी गीत बढ़िया लगता है. 

राम संपथ की एल्बम हो और सोना महापात्रा की आवाज़ में कोई गीत न हो कैसे संभव है ? अम्बर सरिया  (अमृतसर के मुंडे ) को संबोधित ये गीत बेहद मधुर है. हालाँकि धुन कुछ कुछ हिमेश के रचे नमस्ते  लन्दन  के रफ्ता रफ्ता  गीत से काफी हद तक मिलती जुलती है पर फिर भी सोना ने इसे एक अलग ही रूप दे डाला है. मुन्ना धिमान के पंजाबी जुबान की चाशनी में डूबे शब्द इसकी मधुरता में जरूरी इजाफा करते हैं.  एल्बम का सबसे बढ़िया गीत है ये और राम के बहतरीन गीतों में से निश्चित ही एक.

हमारी राय में एल्बम के बहतरीन गीत -

जुगाड, रब्बा , और अम्बर सरिया 

हमारी रेटिंग - ३.७ / ५  

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
   

Wednesday, January 18, 2012

"सैगल ब्लूज़" - सहगल साहब की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजली एक नए अंदाज़ में


कुंदनलाल सहगल को इस दुनिया से गए आज ६५ वर्ष हो चुके हैं, पर उनकी आवाज़ आज भी सर चढ़ के बोल रहा है। फ़िल्म 'डेल्ही बेली' में राम सम्पत और चेतन शशितल नें सहगल साहब को श्रद्धांजली स्वरूप जिस गीत की रचना की है, उसी की चर्चा सुजॉय चटर्जी के साथ, 'एक गीत सौ कहानियाँ' की तीसरी कड़ी में...

एक गीत सौ कहानियाँ # 3

हिन्दी सिनेमा के प्रथम सिंगिंग् सुपरस्टार के रूप में कुंदनलाल सहगल के नाम से हम सभी भली-भाँति वाक़िफ़ हैं। फ़िल्म-संगीत की जब शुरुआत हुई थी, तब वह पूर्णत: शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और नाट्य संगीत से प्रभावित थी। कुंदनलाल सहगल और न्यु थिएटर्स के संगीतकारों नें फ़िल्म-संगीत को अपनी अलग पहचान दी, और जनसाधारण में अत्यन्त लोकप्रिय बनाया। जब भी कभी फ़िल्म-संगीत का इतिहास लिखा जाएगा, सहगल साहब का नाम सबसे उपर स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। सहगल साहब की आवाज़ और गायकी का ३० और ४० के दशकों में कुछ ऐसा क्रेज़ था कि अगली पीढ़ी के नवोदित गायक उन्हीं की शैली को अनुकरण कर संगीत के मैदान में उतरते थे। तलत महमूद, मुकेश और किशोर कुमार तीन ऐसे बड़े नाम हैं जिन्होंने अपनी शुरुआत सहगल साहब को गुरु मान कर की थी। पर बाद में अपना अलग स्टाइल ज़रूर अख़्तियार कर लिया था। लेकिन अगर किसी गायक नें ता-उम्र सहगल साहब की शैली में गाते रहे, तो वो थे सी. एच. आत्मा। सिर्फ़ वो ही नहीं, उनके बेटे चन्द्रू आत्मा नें भी सहगल अंदाज़ में गीत गाए।

कुंदनलाल सहगल को गुरु मानने वाले या उनसे मुतासिर होने वालों की फ़ेहरिस्त तलत, मुकेश, किशोर, सी. एच. आत्मा और चन्द्रू आत्मा पर आकर ही समाप्त नहीं हो जाती, आज भी सहगल साहब के चाहने वालों की संख्या हज़ारों, लाखों में है। और इनमें एक हैं इस दौर के संगीतकार राम सम्पत। 'आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स' की २०११ की चर्चित फ़िल्म 'डेल्ही बेली' में राम सम्पत नें कुंदनलाल सहगल को श्रद्धांजली स्वरूप एक गीत कम्पोज़ किया है "सैगल ब्लूज़" (Saigal Blues) शीर्षक से। सहगल को दर्द का पर्याय माना जाता है, इसलिए 'सैगल ब्लूज़' भी टूटे हुए दिल की ही पुकार है। सहगल शैली का आधुनिक रूप कहा जा सकता है 'सैगल ब्लूज़' को। सहगल शैली और ब्लूज़ जौनर का फ़्युज़न है यह गीत जिसे राम सम्पत और चेतन शशितल नें मिलकर लिखा है और चेतन शशितल नें बिल्कुल सहगल अंदाज़ में गाया है। गीटार पर कमाल किया है रूडी वलांग और हितेश धुतिया नें। जब भी इस तरह का कोई नवीन प्रयोग किया जाता है, और ख़ास कर किसी महान कलाकार का अनुकरण किया जाता है, तो उस पर मिली-जुली प्रतिक्रियायें मिलती हैं; इस गीत के साथ भी यही हुआ। यूं तो अधिकतर लोगों और समालचकों नें इस गीत को "थम्स-अप" ही दिया, पर कुछ लोगों को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। उन्हें यह सहगल का अपमान महसूस हुआ। इन्टरनेट को खंगालने पर मुझे इसके दो कारण हाथ लगे - पहला यह कि गायक नें सहगल के नैज़ल अंदाज़ की नकल की है, और दूसरी, सहगल शैली के गीत को पाश्चात्य रंग देकर (फ़्युज़न के ज़रिए) सहगल जौनर को दूषित किया है।

"दुनिया में प्यार जब बरसे, न जाने दिल यह क्यों तरसे, हाय, इस दिल को कैसे समझाऊँ, पागल को कैसे मैं मनाऊँ, इस दर्द की न है दवाई, मजनूं है या तू है कसाई...", यही है 'सैगल ब्लूज़' गीत के बोल। जब इसके संगीतकार राम सम्पत से इस बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था - "मैं के. एल. सहगल साहब का बहुत बड़ा फ़ैन हूँ। मैं समझता हूँ कि सहगल साहब भारत का सबसे महान "ब्लूज़ सिंगर" हैं। मैंने 'डेल्ही बेली' फ़िल्म के निर्देशक अभिनय देव और गायक-गीतकार चेतन शशितल से इस बारे में कई साल पहले ही बात की थी कि मैं सहगल साहब को एक "ब्लूज़ ट्रिब्युट" देना चाहता हूँ। पर कोई सिचुएशन या फ़िल्म ऐसी नहीं बन रही थी जिसमें मेरा यह सपना सच हो सके। 'डेल्ही बेली' इस गीत को लौंच करने के लिए सटीक माध्यम मुझे महसूस हुआ। फ़िल्म का साउण्डट्रैक इस गीत के लिए पर्फ़ेक्ट था और आमिर ख़ान जैसे निडर निर्माता के होते मुझे किस बात की फ़िक्र थी! आमिर ख़ान को पुराने समय और इतिहास से बहुत लगाव है। मेरे इस सुझाव को उन्होंने हाथोंहाथ स्वीकार कर लिया। मुझे आशा है कि इस गीत के माध्यम से हम लोगों को, ख़ास कर इस पीढ़ी के लोगों को के. एल. सहगल की गायकी से अवगत करा पाएंगे।" एक अन्य इन्टरव्यू में राम सम्पत नें बताया कि यूं तो 'डेल्ही बेली' के कई गीत हिट हुए हैं जैसे कि "भाग डी के बोस", "स्विट्टी स्विट्टी", "आइ हेट यू", "बेदर्दी राजा", "जा चुड़ैल", लेकिन जो गीत उनके दिल के सबसे करीब है, वह है "सैगल ब्लूज़"। "मुझे ख़ास तौर से 'सैगल ब्लूज़' पर गर्व है क्योंकि लोग यह समझ रहे हैं कि यह सहगल साहब का ही गाया हुआ कोई गीत है जिसका रीमिक्स हुआ है, जबकि हक़ीक़त यह कि यह मेरा ऑरिजिनल कम्पोज़िशन है और गीत के बोल भी बिल्कुल नए हैं", राम सम्पत नें एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में बताया। सम्पत नें यह भी बताया कि इस फ़िल्म के संगीत निर्माण में आमिर ख़ान का भी बड़ा योगदान रहा है।

उधर चेतन शशितल का नाम बहुत अधिक लोगों नें नहीं सुना होगा। आपको याद होगा २००४ में ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेरॉय की फ़िल्म आई थी 'क्यों.. हो गया न!', जिसमें एक गीत था "बात समझा करो", उस गीत में चेतन की आवाज़ थी शंकर महादेवन और जावेद अली के साथ। उसी साल 'दि किंग ऑफ़ बॉलीवूड' फ़िल्म के लिए भी उन्होंने गाया था। उसके बाद चेतन एक बार फिर से गुमनामी में चले गए, पर 'सैगल ब्लूज़' के साथ जैसे रातों रात वो छा गए। हालाँकि इस गीत को वह लोकप्रियता नहीं मिली, या यूं कहे कि इस गीत को फ़िल्म के दूसरे गीतों के मुकाबले कम प्रोमोट किया गया, पर इस फ़िल्म के संगीत से जुड़े सभी कलाकारों को यह गीत अत्यन्त प्रिय है। चेतन शशितल नें बताया कि इस गीत को उन्होंने दो साल पहले ही रेकॉर्ड कर लिया था। चेतन बताते हैं, "राम (सम्पत) 'डेल्ही बेली' के बैकग्राउण्ड पर काम कर रहे थे और वो मुझसे कुछ प्रयोगधर्मी चीज़ चाहते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि क्यों न मैं सहगल साहब की आवाज़ में गाऊँ? उस वक़्त हमें ज़रा सा भी अन्दाज़ा नहीं था कि यह बात हमें किस मुकाम तक ले जायेगी। शुरुआत में जब यह गीत रेकॉर्ड हुआ तो केवल वोकल और ड्रम्स का इस्तमाल हुआ था, पर सम्पत नें बाद में इसे जो रूप दिया, मैं तो हैरान रह गया। मुझे तो अन्त तक यह मालूम ही नहीं था कि इस गीत को 'डेल्ही बेली' के साउण्डट्रैक में शामिल कर लिया गया है। जब भी मेरी राम सम्पत से मुलाक़ात होती तो मैं यह ज़रूर पूछता कि अपने गाने का क्या हुआ? एक दिन उन्होंने मुझे आकर बताया कि आमिर ख़ान और अभिनय देव नें इस गीत को सुना है और उन्हें पसन्द भी आया है। मैंने जब गीत का फ़ाइनल वर्ज़न सुना तो वह बिल्कुल अलग ही बन चुका था।"

चेतन शशितल ख़ुद एक अच्छे गायक हैं, जो पिछले १७ वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत सीख रहे हैं। शशितल नें यह साफ़ बताया कि इस गीत को गाते हुए उनका यह कतई उद्देश्य नहीं था कि सहगल साहब जैसे महान कलाकार की नकल कर उन पर कोई व्यंग किया जाये या उनका मज़ाक उडाया जाये! यह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक श्रद्धांजली थी उस पूरे दौर के नाम। "यह गीत सुनने में बिल्कुल सहगल की शैली का लगता है। उस दौर की यही ख़ास बात थी कि गानें इसी अंदाज़ में गाए जाते थे। उस दौर के अन्य गायक, जैसे जगमोहन, श्याम और सुरेन्द्र, भी इसी अंदाज़ में गाया करते थे। अगर आप इस गीत को सुनें, तो शायद आपको सहगल साहब की याद आये, पर मेरे लिए यह गीत केवल सहगल साहब को ही नहीं, बल्कि उस पूरे दौर को श्रद्धांजली है। For me it was more about recreating the voice of that era. अफ़सोस की बात है कि जब लोग नकल करते हैं, तो वो उस कलाकार के कमी को ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं, और तब ऐसा लगता है जैसे उस कलाकार का व्यंग किया जा रहा हो। पर हमने ऐसा नहीं किया।" आज जहाँ सहगल की आवाज़ केवल 'विविध भारती' के 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में ही सुनाई देती है, ऐसे में आज की युवा पीढ़ी को सहगल से मिलवाने में 'डेल्ही बेली' का यह गीत शायद ज़्यादा कारगर होगा। आज सहगल को गए ६५ वर्ष बीत चुके हैं, पर उनकी आवाज़ का जादू आज भी सर चढ़ कर बोलता है, और इसका प्रमाण है 'डेल्ही बेली' का "दुनिया में प्यार जब बरसे"।

फ़िल्म 'डेल्ही बेली' से "दुनिया में प्यार जब बरसे..." सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, अनुमति दीजिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

Friday, June 10, 2011

डेल्ही बेल्ली - एकदम फ्रेश, अनुसुना, और नए मिजाज़ का संगीत

Taaza Sur Taal (TST) - 17/2011 - DELHI BELLY

फिल्म "खाकी" का वो खूबसूरत गीत आपको याद ही होगा – 'वादा रहा प्यार से प्यार का....". एक बेहद युवा संगीतकार राम संपत ने रचा था इस गीत को. "खाकी" की सफलता के बावजूद राम अभी उस कमियाबी को नहीं छू पाए थे जिसके कि वो निश्चित ही हकदार हैं. आमिर खान की "पीपली लाईव" के महंगाई डायन गीत को जमीनी गीत बनाने में भी उनका योगदान रहा था. शायद वहीँ से प्रभावित होकर आमिर ने अपनी महत्वकांक्षी फिल्म "डेल्ही बेल्ली" में उन्हें बतौर संगीतकार चुना. आईये आज बात करें "डेल्ही बेल्ली" में राम के संगीत की.

कहते हैं फ़िल्में समाज का आईना होते हैं. इस नयी सदी का युवा जिन परेशानियों, कुंठाओं और भावनाओं से उलझ रहा है जाहिर है यही सब आज की फिल्मों में, गीतों में दिखाई सुनाई देगा. अब जो कहते हैं कि आज संगीत बदल गया है कोई उनसे पूछे कि आज दुनिया कितनी बदल गयी है. संगीत भी तो उसके पेरेलल ही चलेगा न. बहरहाल हम आपको बता दें कि डेल्ही बेल्ली एक पूरी तरह से "एक्सपेरिमेंटल" अल्बम है, यानी एक दम कुछ नया ताज़ा, अगर आपके कान इसके लिए तैयार हों तभी इस अल्बम को सुनें. उदाहरण के लिए पहला ही गीत "भाग भाग डी के बोंस" कुछ ऐसा है जो पहली सुनवाई में ही आपको चौका देगा. खुद राम ने इसे अपनी आवाज़ दी है. प्रस्तुत गीत में वो सभी उलझनें, मुश्किलातें, कुंठाएं समाहित है जिसका कि हम ऊपर जिक्र कर चुके हैं. रोक्क् शैली के इस गीत की रिदम बेहद तेज है ऐसा लगेगा जैसे आप किसी रोलर कोस्र्टर में बैठे हैं और भागे जा रहे हैं, गीत के बोल भी तो आखिर भागने की सलाह दे रहे हैं. कुल मिलाकर ये गीत एक चार्ट बस्टर है इसमें कोई शक नहीं.

डैडी मुझे बोला तू गलती है मेरी,
तुझपे जिंदगानी गिल्टी है मेरी,
साबुन की शकल में निकला तू तो झाग....


खुद पर पड़े माँ बाप की भारी भरकम उम्मीदों के बोझ को आज का युवा और किन शब्दों में व्यक्त करेगा....अल्बम की खासियत है इसकी विविधता, अगला गीत "नक्कड़ वाले डिस्को" एकदम अलग पेस का है. सड़क छाप शब्दों से बुना गया है इस गीत को, जिसे गाया है कीर्ति सगाथिया ने. संगीत संयोजन गीत की जान है. इस गीत को हास्य जोनर का कह सकते हैं. पर है कानों के लिए एक नया अनुभव. मुझे तो मज़ा आया.

चेतन शशितल आपको हैरान करते हैं जब सहगल अंदाज़ में गीत की शुरुआत करते है, गीत का नाम ही "सहगल ब्ल्यूस" है. लाउंज म्यूजिक और सहगल का रेट्रो अंदाज़. २०११ में में १९४१ का मज़ा. "इस दर्द की न है दवाई, मजनूं है या है तू कसाई..." हा हा हा...गजब का संगीत संयोजन, एकदम नया इस्टाईल है राम का.

अगर अल्बम के अब तक के गीत आपको फ्रेश लगे हों तो लीजिए पेश है नए अंदाज़ में बॉलीवुड का तडका मार के, पुरविया संगीत का जादू अगले गीत बेदर्दी राजा में जिसे आवाज़ से संवारा है सोना महापात्रा ने. हारमोनियम के स्वरों को हमने कितना मिस किया है इस नए दशक में, भरपूर आनंद देगा आपको ये गीत अगर आपको ठेठ भारतीय संगीत पसंद है तो.

अगला गीत आपको भारत से सीधे अमेरिका ले जायेगा "गन्स एंड रोसेस" और "मेटालिका" स्टाईल का हार्ड रोक्क् गीत है "जा चुड़ैल". नए दौर की लड़कियां भी नयी है. और लड़के अगर इन्हें समझने में भूल करे तो आश्चर्य क्या. ऐसे में "चुड़ैल" जैसे शब्द स्वाभाविक ही जुबान पे आते है और मुझे लगता है कि लड़कियों को भी अब इन नए संबोधनों से कोई परेशानी नहीं है(बेहद व्यक्तिगत राय है). वैसे सूरज जगन अब इस शैली में मास्टर हो गए हैं. गीत हार्ड रोक्क् से चहेतों को ही अधिक भाएगा.

अगला गीत एक सोफ्ट रोमांटिक गीत है खुद राम और तरन्नुम मालिक की युगल आवाजों में. तरन्नुम आपको याद होगा कभी आवाज़ के इसी मंच पर आई थी गीत "एक धक्का दो" लेकर जिसे आप सब श्रोताओं का भरपूर प्यार भी मिला था. हमें लगा इस गीत के बारे में क्यों न कुछ तरन्नुम से ही पूछा जाए. लीजिए पेश है ये संक्षिप्त सा इंटरव्यू-
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सजीव – राम का संगीत इस अल्बम में बेहद "एक्सपेरिमेंटल" है, कैसा रहा उनके साथ काम करना ?

तरन्नुम – मैंने उनके साथ कुछ जिंगल्स भी किये हैं और उनके साथ काम करना हमेशा ही एक रेफ्रेशिंग तजुर्बा रहा है, अब उनके साथ इस फिल्म में काम करना मेरी खुशकिस्मती रही. वो बहुत जबरदस्त संगीतकार है और एक अच्छे इंसान भी.

सजीव – अगर मै पूछूं "तेरे सिवा" के आलावा आपका पसंदीदा गीत कौन सा है फिल्म का ?

तरन्नुम – ये बेहद मुश्किल सवाल है, क्योंकि हर गीत यहाँ बेहद अलग है, "डी के बॉस" एक रोक्क् गीत है जबकि "बेदर्दी राजा" एक आइटम गीत है. जिसे सोना ने बहुत ही बढ़िया गाया है. और देखा जाए तो "तेरे सिवा" इकलौता रोमांटिक गीत है, तो मैं इस अल्बम के गीतों को एक दूसरे से कम्पेयर नहीं कर सकती, मुझे इसके सभी गीत पसंद है क्योंकि सभी बेहद यूनिक हैं.

सजीव – अच्छा इस गीत से जुडी हुई कोई बात जो याद आती हो ?

तरन्नुम – राम ने मुझे फोन किया और अपने स्टूडियो आने को कहा. सबसे बढ़िया बात ये रही कि राम ने मुझे मात्र १० मिनट में ये गीत समझा दिया सिखा दिया, और सिर्फ २५ मिनट बाद मैं डब्बिंग रूम से बाहर थी और गाना पूरा हो चुका था.
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अल्बम में २ गीत और हैं – स्वीटी तेरा प्यार और आई हेट यू लईक आई लव यू....दोनों ही गीत एक दूसरे से एकदम अलग है हैं और अल्बम की विविधता को बढाते हैं. सभी गीत अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं, शाब्दिक लिहाज से गीत और बढ़िया हो सकते थे, पर शायद फिल्म की जरुरत के हिसाब से उन्हें ऐसा रखा गया हो, बहरहाल लंबे समय बाद राम संपत कुछ ऐसे देने में कामियाब रहे हैं जिसकी उनके जैसे बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार से हमेशा ही उम्मीद रहती है. मुझे व्यक्तिगत तौर पर "डी के बॉस" "सहगल ब्ल्यूस" और "बेदर्दी राजा" बेहद पसंद आये. फिर वही बात कहूँगा ये अल्बम आपके लिए है अगर वाकई कुछ अनसुना, अनूठा सुनने की चाहत रखते हों तो.

आवाज़ रेटिंग - 8.5/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, July 27, 2010

महंगाई डायन को दुत्कारकर बाहर किया "पीपलि" वालों ने और "खट्टे-मीठे" पलों को कहा नाना ची टाँग

ताज़ा सुर ताल २८/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत है इस स्तंभ में, और विश्व दीपक जी, आपको भी नमस्कार!

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! आज की कड़ी में हम दो फ़िल्मों के गानें सुनने जा रहे हैं। भले ही इन दो फ़िल्मों की कहानी और संगीत में कोई समानता नज़र ना आए, लेकिन इन दो फ़िल्मों में एक समानता ज़रूर है कि इनके निर्माता फ़िल्म जगत के अनूठे फ़िल्मकार के रूप में जाने जाते हैं, और इन दोनों की फ़िल्मों में कुछ अलग हट के बात ज़रूर होती है। अपने अपने तरीके से और अपने अपने मैदानों में ये दोनों ही अपने आप को परफ़ेक्शनिस्ट सिद्ध करते आए हैं। इनमें से एक हैं प्रियदर्शन और दूसरे हैं आमिर ख़ान। जी हाँ, वही अभिनेता आमिर ख़ान जो हाल के समय से निर्माता भी बन गए हैं अपने बैनर 'आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स' से ज़रिए।

सुजॊय - प्रियदर्शन की फ़िल्म 'खट्टा-मीठा' और आमिर ख़ान की 'पीपलि लाइव' की संगीत-समीक्षा के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। पहले कुछ 'खट्टा-मीठा' हो जाए! इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं अक्षय कुमार, त्रिशा कृष्णन और राजपाल यादव। प्रीतम का संगीत है, गानें लिखे हैं इरशाद कामिल, शहज़ाद रॊय और नितिन रायकवार ने। विश्व दीपक जी, आपने इन दो फ़िल्मों की समानता की बात कही तो मुझे ऐसा लगता है, हालाँकि मैं पूरी तरह से श्योर तो नहीं हूँ, कि इन दोनों फ़िल्मों की कहानियों में हास्य रस का अंश शायद ज़्यादा है किसी और पक्ष के मुक़ाबले। कम से कम प्रोमोज़ से तो ऐसा ही लग रहा है!

विश्व दीपक - हो सकता है। 'खट्टा-मीठा' प्रियदर्शन की मलयालम फ़िल्म 'वेल्लानकलुडे नाडु' का रीमेक है। अक्षय कुमार की यह छठी फ़िल्म है प्रियदर्शन के साथ, और त्रिशा कृष्णन का हिंदी फ़िल्मों में यह पदार्पण है। तो आइए सुना जाए 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का पहला गीत "नाना चि टांग"।

गीत - त्याचा नाना चि टांग


सुजॊय - बहुत दिनों के बाद कुणाल गांजावाला की आवाज़ सुनने को मिली। मैं कुछ दिनों से सोच ही रहा था कि कुणाल कहाँ ग़ायब हो गए, और लीजिए वो आ गए वापस! इससे पहले शायद उनकी आवाज़ हमने 'सावरिया' फ़िल्म में सुनी थी। "नाना चि टांग" एक पेप्पी नंबर है जैसा कि हमने अभी अभी सुना। कैची रीदम है और लगता है कि यह चार्ट-बस्टर साबित होगी। गीत के आरंभ में और इंटरल्युड में भी आपने महसूस किया होगा मराठी रैप का जिसे गाया यू.आर.एल ने। हिंदी-मराठी रैप का संगम और उसके साथ रॊक शैली का संगीत, एक बिल्कुल ही नया प्रयोग। प्रीतम, कीप इट अप!

विश्व दीपक - ड्रम्स और गिटार का जम के इस्तेमाल हुआ है और धुन कुछ ऐसी है कि जल्द ही सुनने वाला आकर्षित हो जाता है और तन-मन थिरकने लगता है। कुणाल की आवाज़ बहुत दिनों के बाद एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आई है और कोई शक़ नहीं कि यह गीत एक लम्बी पारी खेलने वाला है। अच्छा सुजॊय जी, इस गीत में जिन मराठी शब्दों का प्रयोग हुआ है, वो ग़ैर-मराठी लोगों को समझ कैसे आएगी?

सुजॊय - मुझे ऐसा लगता है कि बहुत ध्यान से अगर सुना जाए तो कुछ कुछ ज़रूर समझ में आ ही जाता है, जैसे कि "जिथे मी जाते तिथे तू दिस्ते, हवात तुझे सुगंध पसरते, मनात तू माझ्या ध्यानात तू, चार दिशाणा तू च तू..."। इसे पढ़ते हुए कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि इसका अर्थ है कि जहाँ भी मैं जाता हूँ, वहीं तू दिखती है, हवा में तेरी ख़ुशबू है, मेरे मन में तू ही तू है, हर दिशा में तू ही तू है। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, सुनते हैं एक प्यारा सा डुएट के.के और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में।

गीत - सजदे किए हैं लाखों


विश्व दीपक - जिसे हम कह सकते हैं कि पूरी तरह से इस मिट्टी की ख़ुशबू लिए हुए था यह गीत, और इन दोनों अभिज्ञ गायकों ने अपना अपना कमाल दिखाया। प्रीतम की मेलोडी बरकरार है, इरशाद कामिल ने भी ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं इस गीत के लिए। गीत की विशेषता है इसका सादापन, जिसे एक बार सुनते ही दिल अपना बना लेता है और मन ही मन हम दिन भर गुनगुनाने लग पड़ते हैं। पहले गीत के मुक़ाबले बिल्कुल ही अलग अंदाज़। गी की धुन सुन कर ऐसा लग रहा है कि किसी लोक गीत से प्रेरित होगा।

सुजॊय - मेरा भी यही ख़याल है क्योंकि आपको याद होगा राहुल देव बर्मन ने एक गीत बनाया था फ़िल्म 'बरसात की एक रात' फ़िल्म के लिए - "नदिया किनारे पे हमरा बगान, हमरे बगानों में झूमे आसमान"। लताजी के गाए इस गीत की धुन "सजदे किए" से मिलती जुलती है। हो सकता है उत्तर बंगाल के चाय बगानों के किसी लोक धुन पर आधारित होगा! वैसे हमारी यह सोच बेबुनियाद नहीं है, क्योंकि एलबम के सीडी पर इस गाने के लिए किसी पारंपरिक धुन को क्रेडिट दिया गया है। लगता हैं प्रीतम धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। इस गीत में हिंदुस्तानी साज़ों जैसे कि बांसुरी, तबला, सितार, और पायल की ध्वनियाँ सुनाई देती है जो गीत को और भी ज़्यादा मधुर बनाते हैं। उम्मीद है यह गीत इस साल के सब से लोकप्रिय युगल गीत की लड़ाई में सशक्त दावेदार सिद्ध होगा। प्रीतम और अक्षय कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो 'सिंह इज़ किंग' में "तेरी ओर" गीत की तरह इस गीत को भी उतनी ही लोकप्रियता हासिल हो, यही हम कामना करते हैं, और सुनते हैं 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का एक और गीत।

गीत - आइ ऐम ऐलर्जिक टू बुल-शिट


विश्व दीपक - भले ही गीत के शीर्षक से गीत के बारे में लोग ग़लत धारणा बना लें, लेकिन गीत को सुनते हुए पता चलता है कि दर-असल यह गीत फ़िल्म का थीम सॉंग है जो राजनीति और सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार और घूसखोरी जैसी मुद्दों की तरफ़ व्यंगात्मक उंगली उठाता है। इस गीत को लिखा है शहज़ाद रॉय ने, उन्होने ही गाया है और संगीत तय्यार किया है शनि ने।

सुजॊय - दर-असल इस गीत को सुन कर ही मैंने यह अनुमान लगाया था कि फ़िल्म में कॊमेडी का बहुत बड़ा हाथ होगा। यह एक पूरी तरह से सिचुएशनल गीत है जो लोगों की ज़ुबान पर तो नहीं चढ़ेगा, लेकिन फ़िल्म की नैरेशन में महत्वपूर्ण किरदार अदा करेगा। "मुझे फ़िकर यह नहीं कि देश कैसे चलेगा, मुझे फ़िकर यह है कि ऐसे ही ना चलता रहे", "यहाँ बोलने की आज़ादी तो है, पर बोलने के बाद आज़ादी नहीं है", इस तरह के संवाद आज के राजनीति पर व्यंगात्मक वार करती है। वैसे क्या आपको पता है कि यह गाना "शहज़ाद रॉय" के हीं गानों "लगा रह" और "क़िस्मत अपने हाथ में" गानों का एक रीमेक मात्र है। शनि ने ओरिज़िनल गानों के संगीत में ज्यादा परिवर्त्तन न करते हुए, उसमें बस बॉलीवुड का तड़का डाला है, बाकी का जादू तो शहज़ाद रॉय का है। चलिए अब अगले गीत की ओर रूख करते हैं।

विश्व दीपक - 'खट्टा-मीठा' का चौथा और अंतिम गीत है "आइला रे आइला" दलेर मेहंदी और कल्पना पटोवारी की आवाज़ों में जो एक मराठी उत्सव गीत है। यह एक थिरकता हुआ गीत है नितिन रायकवार का लिखा हुआ। मराठी अंदाज़ का नृत्य गीत है। नितिन ने अपने शब्दों से मराठी माहौल को ज़िंदा कर दिया है तो वहीं दलेर मेंहदी ने यह साबित किया है कि वे बस भांगड़ा के हीं उस्ताद नहीं, बल्कि मराठी गीतों को भी ऐसा गा सकते हैं कि सुनने वाले के मुँह से "आइला" निकल जाए।

गीत- आइला रे आइला


विश्व दीपक - अब हम बढ़ते हैं 'पीपलि लाइव' के संगीत पर। आमिर ख़ान निर्मित इस फ़िल्म की निर्देशिका हैं अनुषा रिज़्वी। फ़िल्म का अनूठा संगीत तैयार किया है इण्डियन ओशन, राम सम्पत, भडवई गाँव मंडली और नगीन तनवीर ने; और गानें लिखे हैं स्वानंद किरकिरे, संजीव शर्मा, नून मीम रशीद और गंगाराम सखेत ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रघुवीर यादव, ओम्कार दास माणिकपुरी, मलैका शेनोय, नसीरुद्दिन शाह और आमिर बशीर।

सुजॊय - जैसा कि आजकल प्रोमोज़ में दिखाया जा रहा है, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 'पीपलि लाइव' की कहानी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है, और इसी वजह से इसका संगीत भी बिल्कुल ग्राम्य है, लोक संगीत की मिठास के साथ साथ एक रूखापन (रॊवनेस) भी है जो फ़िल्म की कहानी और कथानक को और ज़्यादा सजीव बनाता है। सुन लेते हैं फ़िल्म का पहला गीत "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू", फिर उसके बाद बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

गीत - देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन के अपने स्टाइल का गाना था; इस बैण्ड की जानी पहचानी आवाज़ें और साज़ें। इकतारा, तबला, मृदंग, सितार जैसे भारतीय साज़ों के साथ साथ बेस गिटार की भी ध्वनियाँ आपने महसूस की होंगी इस अनोखे गीत में। देश भक्ति गीत होते हुए भी यह बिल्कुल अलग हट के है। इस गीत के लिए संजीव शर्मा और स्वानंद किरकिरे को ही सब से ज़्यादा क्रेडिट मिलना चाहिए क्योंकि इस गीत की जान इसके बोल ही हैं।

सुजॊय - बिलकुल सही! "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू, घाट घाट यहाँ घटता जादू, कहीं पहाड़ है कंकड़ शंकड़, बात है छोटी बड़ा बतंगड़, इण्डिया सर ये चीज़ धुरंधर, रंग रंगीला परजातंतर"। इसी गीत का एक और वर्ज़न भी है जिसमें थोड़ी कॊमेडी डाली गई है और पहले के मुक़ाबले बोलों में गम्भीरता थोड़ी कम है। फ़िल्म की पृष्ठभूमि के हिसाब से बिलकुल परफ़ेक्ट है यह गीत और इस ग़ैर पारम्परिक फ़िल्मी रचना को सुन कर दिल-ओ-दिमाग़ जैसे ताज़ा हो गया।

विश्व दीपक - अब फ़िल्म का दूसरा गीत "सखी स‍इयाँ तो खूबई कमात है, महँगाई डायन खाए जात है"। यह पूर्णत: एक लोक गीत है रघुवीर यादव और साथियों की आवाज़ों में। भडवई गाँव मंडली ने इस गीत की स्वरबद्ध किया है। पहले गीत का आनंद लीजिए, फिर इस पर और चर्चा करेंगे।

गीत - महँगाई डायन खाए जात है


सुजॊय - बिना कोई मिक्सिंग किए, बिना किसी ऒरकेस्ट्रेशन के इस्तेमाल के, इस गीत को बिलकुल ही लाइव लोक संगीत की तरह रेकोर्ड किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर मध्य भारत के गाँवों में लोक गीत गाए जाते हैं। रघुवीर यादव की लोक शैली वाली आवाज़ ने गीत में जान डाल दी है। हारमोनियम, ढोलक, और कीर्तन मंडली के साज़ों का वैसे ही इस्तेमाल हुआ है जैसे कि इस तरह की मंडलियाँ लोक गीतों में करती हैं। और एक बार फिर स्वानंद किरकिरे ने अपने शब्दों का लोहा मनवाया है। मनोज कुमार की फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के गीत "बाकी कुछ बचा तो महँगाई मार गई" की याद भी करा जाता है।

विश्व दीपक - पहले गीत में भी देश के कुछ समस्याओं की तरफ़ इशारा किया गया था, इस गीत में तो आज की सब से बड़ी समस्या, महँगाई की समस्या की तरफ़ आवाज़ उठाया गया है थो़ड़े हल्के फुल्के अंदाज़ में। खड़ी बोली और अवधी भाषा में यह गीत है।

सुजॊय - और सब से बड़ी बात यह कि लता मंगेशकर को यह गीत इतना पसंद आया कि उन्होने ट्विटर पर आमिर ख़ान को ट्वीट भेज कर इस गीत की तारीफ़ें भेजीं और फ़िल्म की सफलता के लिए उन्हे शुभकामनाएँ भी दी हैं। इस मज़ेदार लोक गीत के बाद अब आइए थोड़ा सा सीरियस हो जाएँ और सुनें "ज़िंदगी से डरते हो"।

गीत - ज़िंदगी से डरते हो


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन की आवाज़ और संगीत था इस गीत में। रॊक शैली में बना यह गीत एक प्रेरणादायक रचना है जो निकले हैं नून मीम रशीद की कलम से। कुल ७ मिनट के इस गीत को पार्श्व संगीत के रूप में इस्तेमाल किया गया होगा ऐसा लगता है। फ़िल्म 'लगान' में "बार बार हाँ बोलो यार हाँ" गीत की तरह इसमें भी समूह स्वरों का विशेष इस्तेमाल किया गया है।

सुजॊय - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत नगीन तनवीर की आवाज़ में सुनवाते हैं - "चोला माटी के राम"। इस गीत को सुनते हुए आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि कैसी रूहानी आवाज़ है इस थिएटर आरटिस्ट की। नगीन तनवीर कभी हबीब तनवीर थिएटर ग्रूप की सदस्या हुआ करती थीं। नगीन का नाम हबीब तनवीर से इसलिए भी जुड़ा है, क्योंकि नगीन हबीब तनवीर की सुपुत्री हैं। नगीन लोक गीत गाती हैं और इस गीत को भी क्या अंजाम दिया है उन्होने। गंगाराम सखेत के लिखे इस गीत की भाषा छत्तीसगढ़ी है।

विश्व दीपक - इसकी धुन उत्तर और मध्य भारत के विदाई गीत की तरह है। बांसुरी और इकतारे का क्या सुंदर प्रयोग हुआ है, जिन्हे सुनते हुए हम जैसे किसी सुदूर ग्रामांचल में पहुँच जाते हैं। एक इंटरनेट साइट पर किसी ने लिखा है इस गीत के बारे में - "चोला माटी के राम की भाषा निन्यानवे फ़ीसदी छत्तीसगढी हीं है। इसके संगीत में भी छत्तीसगढ के लोग धुन "करमा" की छाप है। करमा एक लोक-नृत्य है, जो गाँवों में लगने वाले मेलों और उत्सवों का विशेष आकर्षण होता है। इन उत्सवों के दौरान गाँव के सारे मर्द सजते-सँवरते हैं और "लुगरा" धारण करते हैं। फिर गाँव की जनता एक गोल चक्कर बना लेती है, जिसके केंद्र में नर्त्तक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। ये सारे नर्त्तक "मांदर" (यह छत्तीसढ का खास साज़ है... ढोल-ताशों का एक प्रकार) की धुन पर बिना रूके बिना थके नाचते जाते हैं। ऐसे अवसरों पर कम से कम पाँच या छह मांदरों के बिना तो काम हीं नहीं चलता।"

सुजॊय - यह अच्छी जानकारी थी। इकतारे का जिस तरह का प्रयोग हुआ है, ठीक ऐसा ही प्रयोग बंगाल के बाउल भटियाली गायक भी करते हैं। इसलिए इस गीत को सुनते हुए बंगाल के गाँवों की भी सैर हो जाती है। तो देखिए एक ही गीत है लेकिन कितने प्रदेशों के लोक संगीत से मेल खाती है। इसी को तो हम कहते हैं 'अनेकता मे एकता' और यही इस देश की शक्ति का राज़ है। एक और बात यह कि इसकी धुन जैसा कि आपने कहा विदाई धुन है, तो इस लोक धुन का प्रयोग थोड़े से तेज़ अंदाज़ में कल्याणजी-आनंदजी ने किया था फ़िल्म 'दाता' के गीत "बाबुल का यह घर बहना, कुछ दिन का ठिकाना है" में। तो आइए इस भजन को सुनते हैं।

गीत - चोला माटी के राम


सुजॊय - वाह! नगीन तनवीर की आवाज़ ने तो आँखें नम कर दी। हाँ तो विश्व दीपक जी, आज की दोनों फ़िल्मों के गानें तो हमने सुन लिए, अब बारी है अंतिम विचारों की। जहाँ तक 'खट्टा-मीठा' का सवाल है "नाना चि टांग" और "सजदे किए हैं लाखों", ये दो गीत मुझे पसंद आए और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ५ में ३.५ की रेटिंग। और 'पीपलि लाइव', भई इससे पहले कि मैं अपनी रेटिंग दूँ, सब से पहले तो मैं नतमस्तक होकर आमिर ख़ान को सलाम करना चाहूँगा, उन्होने एक बार फिर से साबित किया कि वो अलग हैं, नंबर वन हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि पर और भी तो कई फ़िल्में हाल के सालों में बनी हैं, लेकिन ऐसा जादूई संगीत किसी में भी सुनने को नहीं मिला। आज के फ़िल्मकार अक्सर क्या करते हैं कि जब भी ऐसे किसी लोक गीत की बारी आती है तो लोक गीत के बहाने किसी सस्ते और अश्लील गीत की रचना कर बैठते हैं। 'पीपलि लाइव' के गीतों को सुन कर ऐसा लगा कि अगर हमारे फ़िल्मकार, संगीतकार और गीतकार चाहें तो आज भी फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर वापस आ सकता है। युं तो इस फ़िल्म के सभी गानें मुझे अच्छे लगे लेकिन यह जो अभी अभी हमने "चोला माटी के राम" सुना, इस गीत का तो मैं दीवाना हो गया। नगीन तनवीर की आवाज़ ने दिल को ऐसा छुआ है कि अभी तक उनकी आवाज़ कानों में गूँज रही है। मेरी तरफ़ से 'पीपलि लाइव' को ४.५ की रेटिंग्‍ और ख़ास इस गीत को १० में १०। आमिर ख़ान को ढेरों शुभकामनाएँ कि उनकी यह फ़िल्म सफल हो और वो इसी तरह से फ़िल्मों और फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करते रहें।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं क्या कहूँ.. आपने तो सब कुछ हीं कह दिया है। आपने सही कहा कि अगर कोई दूसरा इंसान होता तो पीपलि लाइव का संगीत शायद ऐसा नहीं होता, जैसा अभी सुनने को मिल रहा है। वो कहते हैं ना कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी भी चीज को हाथ में ले तो उसे सोना बनाकर हीं दम लेते हैं। आमिर खान भी वैसे हीं इंसान हैं। एक कम-बज़ट की फिल्म, जिसमें कोई भी पहचान का कलाकार न हो और जिसमें किसी "गंभीर" मुद्दे को उठाया गया हो, उसे कोई भी हाथ में लेना नहीं चाहता। आमिर के आगे आने से ये अच्छा हुआ कि फिल्म को पहचान मिली और फिल्म के गाने भी लोगों की नज़रों में आ गए। निर्माता/निर्देशिका ने गीतकारों, संगीतकारों और गायको का चुनाव बड़े हीं ध्यान से किया है। "रघुवीर यादव" और "नगीन" को सुनने के बाद हर किसी को इस चुनाव की दाद देनी होगी। वैसे हाल में यह फिल्म अपने गाने "सखी सैंया" के कारण विवाद में भी आई थी, जिसका ज़िक्र सजीव जी पहले हीं कर चुके हैं,इसलिए मैं दुहराऊँगा नहीं। जहाँ तक इस एलबम की बात है तो यकीनन "पीपलि लाइव" "खट्टा-मीठा" से "इक्कीस" पड़ती है। "खट्टा-मीठा" चूँकि पूरी तरह से एक मनोरंज़क फिल्म है तो उसमें "पीपलि लाइव" जैसा संगीत देने की कोई गुंजाईश भी नहीं थी। फिर भी प्रीतम और शनि ने हर-संभव कोशिश की है। इसलिए मुझे "खट्टा-मीठा" से कोई शिकायत नहीं। चलिए तो इस तरह दो अच्छे और बेहतर एलबमों को सुनने के बाद इस समीक्षा पर ब्रेक लगाई जाए। अगली बार कौन-सी फिल्म होगी? यही सोच रहे हैं ना? चूँकि पिछली दो समीक्षाओं से हम बताते आ रहे हैं तो इस बार भी राज़ से पर्दा हटा हीं देते हैं। "लफ़ंगे परिंदे" या फिर "दबंग" या फिर दोनों। यह जानने के लिए अगली भेंट तक का इंतज़ार कीजिए।

आवाज़ रेटिंग्स: खट्टा-मीठा: ***१/२, पीपलि लाइव: ****१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८२- 'भूल भुलै‍या' और 'खट्टा-मीठा' फ़िल्मों में कम से कम तीन समानताएँ बताइए।

TST ट्रिविया # ८३- आपका जन्म २८ नवंबर १९६४ को हुआ था। आप ने पंजाब युनिवर्सिटी चण्डीगढ़ से म्युज़िक की मास्टर डिग्री हासिल की सुलोचना बृहस्पति की निगरानी में। आपकी माँ का नाम मोनिका है। बताइए हम किनकी बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८४- २००९ की एक फ़िल्म में रघुवीर यादव ने अपनी आवाज़ के जल्वे दिखाए थे एक गीत में। बताइए उस फ़िल्म का नाम, गीत के बोल और सहगायकों के नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "इकतारा" (वेक अप सिड)।
२. "जा रे, जा रे उड़ जा रे पंछी" (माया)।
३. इस गीत को लिखा था मशहूर शायर मजाज़ लखनवी ने जो जावेद अख़्तर के मामा थे।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

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