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Tuesday, March 9, 2010

गुनगुनाते लम्हे में अमृता-इमरोज़ के प्यार की दास्तां

अभी कुछ दिन पहले आपने मशहूर चित्रकार इमरोज़ का विशेष इंटरव्यू पढ़ा जिसे आप सबके लिए लाया था रश्मि प्रभा ने। इस बार के 'गुनगुनाते लम्हे' में भी रश्मि प्रभा गीतों के माध्यम से अमृता-इमरोज़ की अमर प्रेम-कहानी लेकर आई हैं। बिना किसी विशेष भूमिका के हम आपको सुनवा रहे हैं 'प्यार की दास्ताँ'-



'गुनगुनाते लम्हे' टीम
आवाज़/एंकरिंग/कहानीतकनीक
Rashmi PrabhaKhushboo
रश्मि प्रभाखुश्बू



आप भी चाहें तो भेज सकते हैं कहानी लिखकर गीतों के साथ, जिसे देंगी रश्मि प्रभा अपनी आवाज़! जिस कहानी पर मिलेगी शाबाशी (टिप्पणी) सबसे ज्यादा उनको मिलेगा पुरस्कार हर माह के अंत में 500 / नगद राशि।

हाँ यदि आप चाहें खुद अपनी आवाज़ में कहानी सुनाना, तो भी आपका स्वागत है....


1) कहानी मौलिक हो।
2) कहानी के साथ अपना फोटो भी ईमेल करें।
3) कहानी के शब्द और गीत जोड़कर समय 35-40 मिनट से अधिक न हो, गीतों की संख्या 7 से अधिक न हो।।
4) आप गीतों की सूची और साथ में उनका mp3 भी भेजें।
5) ऊपर्युक्त सामग्री podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल करें।

Sunday, March 7, 2010

ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है, पर तेरे साथ....एक चित्रकार, एक कवि और इन सबसे भी बढ़कर मोहब्बत की जीती जागती मिसाल है इमरोज़ - एक खास मुलाकात

दोस्तों, कभी कभी कुछ विशेष व्यक्तियों से मिलना, बात करना जीवन भर याद रह जाने वाला एक अनुभव बन रह जाता है, अपना एक ऐसा ही अनुभव आज हम सब के साथ बांटने जा रही हैं, रश्मि प्रभा जी, तो बिना कुछ अधिक कहे हम रश्मि जी और उनके खास मेहमान को सौंपते हैं आपकी आँखों को, हमें यकीन है कि ये गुफ्तगू आपके लिए भी उतनी यादगार होने वाली है जितनी रेशमी जी के लिए थी...

आज मैं रश्मि प्रभा आपकी मुलाकात प्यार के जाने-माने स्तम्भ इमरोज़ से करवाने जा रही हूँ...
प्यार कभी दर्द, कभी ख़ुशी, कभी दूर, कभी पास के एहसास से गुजरता है. हर प्यार करनेवालों का यही रहा अफसाना.
पर इन अफसानों से अलग एक प्यार- जहाँ कोई गम, कोई दूरी नहीं हुई, कोई इर्ष्या नहीं उठी, बस एक विश्वास की लौ रोशन रही ...विश्वास - जिसका नाम है इमरोज़ !

अमृता के इमरोज़ या इमरोज़ की अमृता - जैसे भी कह लें, एक ही अर्थ है.

तो मिलाती हूँ आप सबों को इमरोज़ से.

“नमस्कार इमरोज़ जी,..........शुरू करें हम अपनी बातें ख़ास?..........शुरू करती हूँ बातें उम्र के उस मोड़ से जहाँ आप एक युवक थे...वहाँ चढ़ते सूरज सी महत्वाकांक्षाएं होंगी...”
कूची और कैनवास से आपकी मुलाकात कब हुई ?


इमरोज़ - बचपन मैंने पंछियों के साथ
तितलियों के साथ उड़कर देखा था
पर ख्यालों के साथ में
स्कूल में ड्राइंग कहीं भी नहीं थी
न प्राइमरी स्कूल में न हाई स्कूल में
पर मेरे हाथों में ड्राइंग थी
अपने आप आई हुई

मैं स्कूल की हर कॉपी पर
कुछ न कुछ बनाता रहता था
ब्रश के साथ मेरी मुलाकात
लाहौर के आर्ट स्कूल में हुई थी
आर्ट स्कूल में वाटर कलर के रंगों से
मैं तीन साल खूब खेला था
वो खेल अब भी जारी है...

कैनवस के साथ मेरी मुलाकात
ज़िन्दगी के स्कूल में हुई आर्टिस्ट होकर
जब रंगों से दोस्ती हुई अमृता से भी दोस्ती हो गई
कैनवस पर पहली पेंटिंग
मैंने अमृता के लिए ही बनाई थी.........

ख़्वाबों की लकीरों से परे अमृता कब कैनवस पर उतरीं ?

इमरोज़ - अमृता मेरे ख़्वाबों में नहीं आई
सीधी ज़िन्दगी में आ गई
वो बात और है
कि वो ख्वाब जैसी ज़िन्दगी है
उससे मिलकर मैं ज़िन्दगी को भी मिलता रहा
और साथ अपने आपको भी मिलता रहा
साथ मिलकर चलते चलते
अपने आप ज़िन्दगी राह भी होती रही
और मंजिल भी
एक दिन चलते चलते उसने पूछा
तेरा क्या ख्याल है
ज़िन्दगी सच है कि सपना
मैंने उसकी बोलती आँखों को देखकर कहा
ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है
पर तेरे साथ .....

उसके आने पर
मुझे लिखना आया
और उसको देख देख लिखा ...

तू अक्षर अक्षर कविता
और कविता कविता ज़िन्दगी ....
कभी कभी खूबसूरत ख्याल
खूबसूरत बदन भी धर लेते हैं ....

अमृता नज़्म बनकर आईं या ज़िन्दगी ?

इमरोज़ - अमृता ज़िन्दगी बनकर आई
और कविता बनकर मिली
एक खूबसूरत माहौल बनाकर
सुबह शाम करती रही
रसोई करती तो वो भी मज़े से करती
वो ज़िन्दगी के सपने देखती
और सपने उसकी नज्में लिखते .....

कैसा लगता है इमरोज़ जी जब आपको प्यार का स्तम्भ कहा जाता है ?

इमरोज़ - जिन्होंने ये कहा है मेरे बारे में
उन सब मेहरबान लोगों का
बहुत-बहुत शुक्रिया

आज की भागती ज़िन्दगी में आप क्या सोचते हैं? क्या महसूस करते हैं?

इमरोज़ - सुकून उसमें है जो आपके पास है
और जो मिला हुआ है
वो ज़िन्दगी का सुकून बन जाता है
पर जो भाग रहे हैं
वे बहुत कुछ चाहते हैं
बहुत कुछ
चाहत की दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती
ये ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है
खाना सेहत बनाता है
पर ज़रूरत से ज्यादा खाना
ज़हर भी बन जाता है

आपकी चित्रकला का मुख्य केंद्र अमृता प्रीतम के अलावा और क्या रहा ?

इमरोज़ - मैं रंगों से खेलता हूँ
और रंग मुझसे
रंगों से खेलते खेलते
मैं भी रंग हो जाता हूँ
कुछ बनने ना बनने से
बेफिक्र बेपरवाह
कभी कभी खेलते खेलते
कुछ अच्छा भी बन जाता है
वो ही अच्छा मेरी पेंटिंग बन जाती है
मैं अपने लिए अपने आपको
पेंट करता हूँ

लोगों को सोचकर
मैंने कभी कुछ नहीं बनाया
लोगों को सोचकर कभी भी पेंटिंग नहीं हो पाती

एक प्रेमी से अलग आपकी क्या सोच रही?

इमरोज़ - मेरी सोच....
किताबें पढ़ने से लिखना पढना आ जाता है
और ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
प्यार होने से प्यार का पता लगता है

सिंगलिंग्रों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है. सिंगलिंग्रों की लड़की जवान होकर जिसके साथ जी चाहें चल-फिर सकती हैं, दोस्ती कर सकती हैं और जब वो अपना मर्द चुन लेती हैं. एक दावत करती हैं, अपना मर्द चुनने की ख़ुशी में. अपने सारे दोस्तों को बुलाती हैं और सबसे कहती हैं कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई और उसका मनचाहा सबसे हाथ मिलाता है, फिर सब जश्न मानते हैं.

कुछ दिनों से ये दावत और ये जीने की दलेरी ये साफगोई मुझे बार बार याद आ रही है.
मेरे एक दोस्त को उम्र के आख़री पहर में मोहब्बत हो गई. एक सयानी उम्र की खूबसूरत औरत से, जो खूबसूरत कवि भी है, दोस्त आप भी मशहूर शायर है...मोहब्बत के बाद दोस्त की शायरी में एक खूबसूरती बढ़ने लगी है पर उसके घर की खूबसूरती कम होनी शुरू हो रही है !

जब किसी का घर से बाहर ध्यान लग जाता है, तो उसके घर का ध्यान टूट जाता है. वो पत्नी के पास बैठा भी, पत्नी के पास नहीं होता घर में होकर भी घर में नहीं होता अब घर भी घर नहीं लगता, पत्नी भी पत्नी नहीं लगती ! रिश्ता अपने आप छूट गया है, पर संस्कार नहीं छूंट रहे वो माना हुआ सयाना है , कॉलेज में फिलोसफी पढ़ाता रहा है - कई साल !

आस-पास के लोगों की मुश्किलें आसान कर देनेवाले को आज अपनी मुश्किल का हल मिलना मुश्किल हो गया है... ज़िन्दगी दूर खड़ी हैरान हो रही है !

मोहब्बत करनेवालों को जाने की राह नहीं नज़र आ रही ! राह तो सीधी है, पर संस्कारों के अँधेरे में नज़र नहीं आ रही! जब से पत्नी को मर्द की मोहब्बत का पता लगा है, वह हैरान तो है, मगर उदास नहीं !

पूछा सिर्फ हाजिर से जा सकता है, गैर हाजिर पति से क्या पूछना ? वह चुपचाप हालात को देख रही है और अपने अकेले हो जाने को मानकर अपने आपके साथ जीना सीख रही है !

मोहब्बत यह इलज़ाम कबूल नहीं करती कि वो घर तोडती है ! मोहब्बत ही घर बनाती है, ख्यालों से भी खूबसूरत घर... सच तो ये है कि मोहब्बत बगैर घर बनता ही नहीं.

पत्नी अब एक औरत है अपने आप की आप- जिम्मेदार और बदमुख्तियार चारों तरफ देखती है, घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है !कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी और एक अजीब ख़ामोशी भी ....वह सब बिखरा हुआ बहा देती है !

और चीजों को संवारती है, सजाती है और सिंग्लिरी लड़की की तरह एक दावत देने की तैयारी करती है !

मर्द को विदा करने के लिए और विदा लेने के लिए जा रहे मर्द की मर्जी का खाना बनाती है, मेज़ फूलों से सजाती है, सामने बैठकर खाना खिलाती है.... वो ऑंखें होते हुए भी ऑंखें नहीं मिलाता !

जाते वक़्त औरत ने पैरों को हाथ लगाने की बजाय मर्द से पहली बार हाथ मिलाया और कहा- पीछे मुड़कर न देखना, आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है और 'आज' में है, अपने आप का ख्याल रखना, मेरे फिकर अब मेरे हैं !

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है. पर आज ने रोज़ आना है ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी , आदर के साथ विदा लेने के लिए भी ....

अब बहुत कुछ बदल गया है , अब आपकी दिनचर्या क्या होती है ?

इमरोज़ - उसकी धूप में
और अपनी छाँव में बैठा
मैं अपनी फकीरी करता रहता हूँ ...
पता नहीं ये फकीरी मुझे ज़िन्दगी ने दी है
कि ज़िन्दगी देनेवाले ने...

अमृता जी के लिए क्या कहना चाहेंगे ?

इमरोज़ - सपना सपना होकर
औरत हुई
और अपने आपको
अपनी मर्जी का सोचा ...
फिक्र फिक्र होकर
कवि हुई
वारिस शाह को जगाया
और कहा- देख अपना पंजाब लहुलुहान ...
मोहब्बत मोहब्बत होकर
एक राबिया हुई
किसी से भी नफरत करने से
इनकार किया
और अपने वजूद से बताया
कि मोहब्बत किसी से भी नफरत नहीं करती

ज़िन्दगी ज़िन्दगी होकर
वो मनचाही हुई
मनचाहा लिखा भी
और मनचाहा जिया भी....
मैं अमृता पर
कितना भी बोल लूँ
अमृता अनलिखी रह जाती है ....

वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज़्म नज़र आती है

मैं उस अनलिखी नज़्म को
कई बार लिख चुका हूँ
वो फिर भी अनलिखी ही रह जाती है

हो सकता है
ये अनलिखी नज़्म
लिखने के लिए हो ही ना,

सिर्फ जीने के लिए ही है ....

जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?

इमरोज़ - हर जगह आदर
पहली तालीम होनी चाहिए
जो इस वक़्त कहीं नहीं
ना सोच में ना घर में ना ज़िन्दगी में
माँ बाप बच्चों के लिए आदर जानते ही नहीं
आदर करनेवाले माँ बाप हुकम कभी नहीं करते
स्कूलों में टीचर बच्चों के साथ
थप्पड़ों से गुस्से से
बच्चों का निरादर करते रहते हैं
आदर ना टीचरों में है ना किसी स्कूल के कोर्स में
आदर ज़िन्दगी का
एक खूबसूरत रंग भी है
हर मेल मिलाप हर रिश्ते का
लाजमी रंग और ज़रूरी अंग भी है
यहाँ तक कि
एक-दूसरे से विदा
होने के लिए भी आदर ज़रूरी है
और एक दूजे को विदा करने के लिए भी ज़रूरी ....
किसी को भी फूल देते वक़्त
कुछ खुशबू अपने हाथों को भी लगी रह जाती है ....
आदर रिश्तों की खुशबू है

आप तो आम लोगों से बिल्कुल अलग हैं, शांत,स्थिर ..... फिर भी जानना चाहूँगी क्या ज़िन्दगी में क्षणांश के लिए भी कोई शिकायत आपके मन को नहीं हुई?

इमरोज़ - एक छोटी सी शिकायत
जो बता सकते हैं
वो लोगों को क्यूँ नहीं बताते
कि पाप सोच करती है
जिस्म नहीं
गंगा जिस्म साफ़ करती है
सोच नहीं

शिकायत के लहजे में
कोई मुझसे पूछता है
कि मैं अपनी पेंटिंग पर
अपना नाम क्यूँ नहीं लिखता ?

मैंने कहा
मेरा नाम मेरी पेंटिंग का
हिस्सा नहीं बनता इसलिए......

वैसे किसी भी पेंटर का नाम
उसकी पेंटिंग का हिस्सा
कभी नहीं बना
जब कभी भी
मैंने शब्द तो बोले
पर अर्थ नहीं जिए

तब अपने आप से शिकायत होती रही है....

दूसरों से शिकायत करना
गुस्सा ही है
अपने से शिकायत अपनत्व

यह मुलाकात अविस्मरणीय, अद्भुत, ज्ञानवर्धक रही ........... इस मुलाकात के दरम्यान मैंने जाना इमरोज़ प्यार का स्तम्भ ही नहीं, हम जिसे खुदा कहते हैं, उसकी परछाईं हैं.......विदा लेने से पहले कुछ झलकियाँ देखिये उस घर की, जहाँ आज भी अमृता की खुशबू है, हर कमरे, हर दीवार, हर कोने में सशरीर न होते हुए भी अमृता मौजूद है, और मौजूद है इमरोज़ और उनकी बे-इन्तेहाई मोहब्बत.

Saturday, October 17, 2009

एक ऑडियो-वीडियो पुस्तक अमृता-इमरोज़ के नाम

रश्मि प्रभा
अमृता-इमरोज़ के प्रेम-सम्बन्धों को अमृता की कविताओं और इमरोज़ की पेंटिंगों के माध्यम से देखने वालों ने जितना महसूसा है, वह उन्हें भावातिरेक से उपजी यूटोपिया पर पहुँचा देता है, जहाँ जिस्मानी आकर्षण का ज़ादू भी आध्यात्मिक प्यार की डगर की तरह दिखता है। अमृता की कविताओं के रसज्ञ कविताओं को पढ़कर न तो अपनी बेचैनी ज़ाहिर कर पाते हैं और न किसी तरह का सुकूँन महसूस कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि घर की दीवारें, हवा, पानी मौसम, दिन-रात सब तरफ अमृता-इमरोज़ के किस्सों के साये हैं।

प्यार के रुहानी सफर की प्रसंशक यदि कोई महिला हो और वह भी कवि हृदयी, तो यह लगभग तयशुदा बात है कि अमृता की नज्मों में वह खुद को उतारने लगती है। अमृता-इमरोज के सम्बंधों में उसे हर तरह के आदर्श प्रेम संबंधों की छाया दिखती है। अमृता की हर अभिव्यक्ति उसे अपनी कहानी लगती है और इमरोज़ की पेंटिंगों से भी कोई न कोई आत्मिक सम्बंध जोड़ लेती है।

इसी तरह की एक अति सम्वेदनशील कवयित्री रश्मि प्रभा की आडियो-पुस्तक का विमोचन आज हम अपने श्रोताओं के हाथों करा रहे हैं। रश्मि प्रभा की कविताओं के इस संग्रह (कुछ उनके नाम) की ख़ास बात यही है कि इसकी हर कविता अमृता और इमरोज़ को समर्पित है। इनकी कविताओं में प्रेम का विहान है, सुबह है, दोपहर, शाम और रात है और इसके बाद शुरू होती प्रेम की अनंत यात्रा के संकेत हैं।

रश्मि की दृष्टि में अमृता के जीवन के किसी भी आयाम का हर सफहा इमरोज़ के नाम है। इमरोज़ अमृता का बिस्तर भी है, भोजन भी है, खुदा भी है, आदि भी है और अंत भी।

मेरा मानना है कि अमृता की कविताएँ प्रेम की जो दुनिया बनाती हैं, लगभग उसी दुनिया का विस्तार प्रस्तुत ऑडियो-बुक की नज़्मों में हमें मिलता है।

--शैलेश भारतवासी


कविता-प्रेमियो,

आज आप इसी ऑडियो-किताब का लोकार्पण अपने हाथों कीजिए। माउस को कैची समझकर नीचे दिख रहे एलबम का फीता काटिए॰॰॰



हमने अमृता-इमरोज़ को और अधिक समझने के लिए अमृता की कविताओं और इमरोज़ की पेंटिंगों को नज़दीक से महसूसने वालीं रंजना भाटिया और जेन्नी शबनम से संपर्क किया। रंजना भाटिया एक प्रसिद्ध ब्लॉगर हैं और 'अमृता प्रीतम की याद में' नाम से एक ब्लॉग चलाती हैं। जेन्नी शबनम इमरोज़ से अक्सर मिलती रहती हैं और इमरोज़-अमृता के रुहानी सफर की चश्मदीद भी हैं, शायद जेन्नी इमरोज़ की पेंटिंगों के संदेशों को बहुत अच्छे से समझती हैं। तो पढ़िए इन दोनों के विचार॰॰॰


जेन्नी शबनम
अमृता जी और इमरोज़ जी मेरे साहित्य सफ़र के प्रेरणा-स्रोत हैं। इमरोज़ जी की वजह से आज यहाँ मैं अपनी रचनाएँ सार्वजनिक रूप से प्रेषित करने का साहस कर सकी हूँ। मेरी ये चंद पँक्तियाँ जो कभी मैं उनके बारे में लिखी थी और सबसे पहले इमरोज़ जी को सुनाई थी-

बहुत तलाशी हूँ,
कोई और अमृता नहीं मिलती,
न कोई और इमरोज़ मिलता।
एक युग में,
एक ही अमृता-इमरोज़ होते,
कोई दूसरा नहीं होता।
प्यार, दोस्ती, नाते, रिश्ते,
सारे बंधनों से परे,
दो रूहानी हमसफ़र...
अमृता और इमरोज़।


-----जेन्नी शबनम
रंजना भाटिया
हर बार अमृता जी के लिखे को पढ़ना एक नया अनुभव दे जाता है ..और एक नई सोच ..वह एक ऐसी शख्सियत थी जिन्होंने ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी ..एक किताब में उनके बारे में लिखा है कि हीर के समय से या उस से पहले भी वेदों-उपनिषदों के समय से गार्गी से लेकर अब तक कई औरतों ने अपनी मर्जी से जीने और ढंग से जीने की जरुरत तो की पर कभी उनकी जरुरत को परवान नहीं चढ़ने दिया गया और अंत दुखदायी ही हुआ! आज की औरत का सपना जो अपने ढंग से जीने का है वह उसको अमृता-इमरोज़ के सपने सा देखती है ..ऐसा नहीं है कि अमृता अपनी परम्पराओं से जुड़ी नहीं थीं ..वह भी कभी-कभी विद्रोह से घबरा कर हाथों की लकीरों और जन्म के लेखो जोखों में रिश्ते तलाशने लगती थीं, और जिस समय उनका इमरोज़ से मिलना हुआ उस वक्त समाज ऐसी बातों को बहुत सख्ती से भी लेता था ..पर अमृता ने उसको जी के दिखाया ..

वह ख़ुद में ही एक बहुत बड़ी लीजेंड हैं और बंटवारे के बाद आधी सदी की नुमाइन्दा शायरा और इमरोज़ जो पहले इन्द्रजीत के नाम से जाने जाते थे, उनका और अमृता का रिश्ता नज्म और इमेज का रिश्ता था। अमृता की नज़में पेंटिंग्स की तरह खुशनुमा हैं, फिर चाहे वह दर्द में लिखी हों या खुशी और प्रेम में वह और इमरोज़ की पेंटिंग्स मिल ही जाती है एक दूजे से !!

मुझे उनकी लिखी इस पर एक कविता याद आई ..

तुम्हें ख़ुद से जब लिया लपेट
बदन हो गए ख्यालों की भेंट
लिपट गए थे अंग वह ऐसे
माला के वो फूल हों जैसे
रूह की वेदी पर थे अर्पित
तुम और मैं अग्नि को समर्पित
यूँ होंठो पर फिसले नाम
घटा एक फिर धर्मानुष्ठान
बन गए हम पवित्र स्रोत
था वह तेरा मेरा नाम
धर्म विधि तो आई बाद !!


अमृता जी ने समाज और दुनिया की परवाह किए बिना अपनी ज़िंदगी जी। उनमें इतनी शक्ति थी की वह अकेली अपनी राह चल सकें। उन्होंने अपनी धारदार लेखनी से अपन समय की सामजिक धाराओं को एक नई दिशा दी थी!!बहुत कुछ है उनके बारे में लिखने को ....पर जितना लिखा जाए उतना काम है ...

अभी उन्हीं की लिखी एक सुंदर कविता से अपनी बात को विराम देती हूँ ..

मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए
सितारों की मुट्ठियाँ भरकर
आसमान ने निछावर कर दीं

दिल के घाट पर मेला जुड़ा,
ज्यूँ रातें रेशम की परियाँ
पाँत बाँध कर आईं......

जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
काग़ज़ के ऊपर उभर आयीं
केसर की लकीरें

सूरज ने आज मेहंदी घोली
हथेलियों पर रंग गयी,
हमारी दोनो की तकदीरें


--रंजना भाटिया


कवयित्री की ही आवाज़ में सुनिए सम्पूर्ण पुस्तक-


आवाज़ की इंजीनियर खुश्बू ने पूरी पुस्तक का चित्रों से भरा एक वीडियो बनाया है। आशा है यह भी आपको पसंद आयेगा।

Friday, January 9, 2009

"अमृता - इमरोज़"- रंजना भाटिया की नज़र में


पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा (अंक २)

अमृता इमरोज
लेखिका – उमा त्रिलोक
मूल्य – 120
प्रकाशक – पेंगुइन बुक्स इंडिया प्रा. लि. भारत
आईएसबीएन नं. – 0-14-309993-0


उमा त्रिलोक की किताब को पढ़ना मुझे सिर्फ़ इस लिए अच्छा नही लगा कि यह मेरी सबसे मनपसंद और रुह में बसने वाली अमृता के बारे में लिखी हुई है ..बल्कि या मेरे इस लिए भी ख़ास है कि इसको इमरोज़ ने ख़ुद अपने हाथो से हस्ताक्षर करके मुझे दिया है ...उमा जी ने इस किताब में उन पलों को तो जीवंत किया ही है जो इमरोज़ और अमृता की जिंदगी से जुड़े हुए बहुत ख़ास लम्हे हैं साथ ही साथ उन्होंने इस में उन पलों को समेट लिया है जो अमृता जी की जीवन के आखरी लम्हे थे. और उन्होंने हर पल उस रूहानी मोहब्बत के जज्बे को अपनी कलम में समेट लिया है

फ़िर सुबह सवेरे
हम कागज के फटे हुए टुकडों की तरह मिले
मैंने अपने हाथ में उसका हाथ लिया
उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया

और फ़िर हम दोनों एक सेंसर की तरह हँसे
और फ़िर कागज को एक ठंडी मेज पर रख कर
उस सारी नज़्म पर लकीर फेर दी !

मैंने इस किताब को पढ़ते हुए इसके हर लफ्जे को रुह से महसूस किया एक तो मैं उनके घर हो कर आई थी यदि कोई न भी गया हो तो वह इस किताब को पढ़ते हुए शिद्दत से अमृता के साथ ख़ुद को जोड़ सकता है ...उनके लिखे लफ्ज़ अमृता और इमरोज़ की जिंदगी के उस रूहानी प्यार को दिल के करीब ला देते हैं ..जहाँ वह लिखती है इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता जी की कविताओं में, किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ दिखायी देता है ..एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे सामजिक मंजूरी की जरुरत नही पड़ती है ...

मैं एक लोकगीत
बेनाम ,हवा में खड़ा
हवा का हिस्सा
जिसे अच्छा लगूं
वो याद कर ले
जिसे और अच्छा लगूं
वो अपना ले --
जी में आए तो गा भी ले
में एक लोकगीत
जिसको नाम की
जरुरत नही पड़ी...


प्यार के कितने रंग हैं और कितनी दिशाएँ और कितनी ही सीमायें हैं...कौन जान सकता है...

उमा जी का हर बार अमृता जी के यहाँ जाना रिश्तो की दुनिया का एक नया सफर होता...यह उन्होंने न केवल लिखा है बलिक इस को उनके लिखे में गहराई से महसूस भी किया जा सकता है...इस किताब में अमृता का अपने बच्चो के साथ रिश्ता भी बखूबी लिखा है उन्होंने..और इमरोज़ से उनके बच्चो के रिश्ते को बखूबी दर्शाया है लफ्जों के माध्यम से..उमा उनसे आखरी दिनों में मिली जब वह अपनी सेहत की वजह से परेशान थी तब उमा जी जो की रेकी हीलर भी है इस मध्याम से उनके साथ रहने का मौका मिला जिससे वह हर लम्हे को अपनी इस किताब में लिख पायी अपने आखरी दिनों की कविता "मैं तेनु फेर मिलांगी" जो उन्होंने इमरोज़ के लिए लिखी थी उसका अंगेरजी में अनुवाद करने को बोला था

इमरोज़ के भावों को उस आखरी वक्त के लम्हों को बहुत खूबसूरती से उन्होंने लिखा है...सही कहा है उमा जी ने की प्यार में मन कवि हो जाता है वह कविता को लिखता ही नही कविता को जीता है तभी उमा के संवेदना जताने पर इमरोज़ कहते हैं कि एक आजाद रुह जिस्म के पिंजरे से निकल कर फ़िर से आज़ाद हो गई...

अमृता इमरोज़ के प्यार को रुह से महसूस करने वालों के लिए यह किताब शुरू से अंत तक अपने लफ्जों से बांधे रखती है...और जैसे जैसे हम इस के वर्क पलटते जाते हैं उतने ही उनके लिखे और साथ व्यतीत किए लम्हों को ख़ुद के साथ चलता पाते हैं...

आज से कुछ साल पहले अमृता इमरोज़ ने समाज को धता बता कर साथ रहने का फैसला किया था. यह दस्तावेज है उनकी जुबानी उनकी कहानी का..इमरोज़ कहते हैं..."एक सूरज आसमान पर चढ़ता है. आम सूरज सारी धरती के लिए. लेकिन एक सूरज ख़ास सूरज सिर्फ़ मन की धरती के लिए उगता है,इस से एक रिश्ता बन जाता है,एक ख्याल,एक सपना,एक हकीक़त..मैंने इस सूरज को पहली बार एक लेखिका के रूप में देखा था,एक शायरा के रूप में,किस्मत कह लो या संजोग,मैंने इस को ढूंढ़ कर अपना लिया,एक औरत के रूप में,एक दोस्त के रूप में,एक आर्टिस्ट के रूप में,और के महबूबा के रूप में !"

कल रात सपने में एक
औरत देखी
जिसे मैंने कभी नही देखा था
इस बोलते नैन नक्श बाली को
कहीं देखा हुआ है ..

कभी कभी खूबसूरत सोचे
खूबसूरत शरीर भी धारण कर लेती है...




प्रस्तुति -रंजना भाटिया

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