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Tuesday, December 7, 2010

सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे.. "नो वन किल्ड जेसिका" के संगीत की कमान संभाली अमित-अमिताभ ने

सुजॉय जी की अनुपस्थिति में एक बार फिर ताज़ा-सुर-ताल की बागडोर संभालने हम आ पहुँचे हैं। जैसा कि मैंने दो हफ़्ते पहले कहा था कि गानों की समीक्षा कभी मैं करूँगा तो कभी सजीव जी। मुझे "बैंड बाजा बारात" के गाने पसंद आए थे तो मैंने उनकी समीक्षा कर दी, वहीं सजीव जी को "तीस मार खां" ने अपने माया-जाल में फांस लिया तो सजीव जी उधर हो लिए। अब प्रश्न था कि इस बार किस फिल्म के गानों को अपने श्रोताओं को सुनाया जाए और ये सुनने-सुनाने का जिम्मा किसे सौंपा जाए। अच्छी बात थी कि मेरी और सजीव जी.. दोनों की राय एक हीं फिल्म के बारे में बनी और सजीव जी ने "बैटन" मुझे थमा दिया। वैसे भी क्रम के हिसाब से बारी मेरी हीं थी और "मन" के हिसाब से मैं हीं इस पर लिखना चाहता था। अब जहाँ "देव-डी" और "उड़ान" की संगीतकार-गीतकार-जोड़ी मैदान में हो, तो उन्हें निहारने और उनका सान्निध्य पाने की किसकी लालसा न होगी।

आज के दौर में "अमित त्रिवेदी" एक ऐसा नाम, एक ऐसा ब्रांड बन चुके हैं, जिन्हें परिचय की कोई आवश्यकता नहीं। अगर यह कहा जाए कि इनकी सफ़लता का दर (सक्सेस-रेट), सफ़लता का प्रतिशत... शत-प्रतिशत है, तो कोई बड़बोलापन न होगा। "आमिर" से हिन्दी-फिल्म-संगीत में अपना पदार्पण करने वाले इस शख्स ने हर बार उम्मीद से बढकर (और उम्मीद से हटकर) गाने दिए हैं। इनके संगीत से सजी अमूमन सारी हीं फिल्में चली हैं, लेकिन अगर फिल्म फ़्लॉप हो तब भी इनके गानों पर कोई उंगली नहीं उठती, गाने तब भी उतने हीं पसंद किए जाते हैं। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों ने "एडमिशन्स ओपन" नाम की फिल्म देखी है... मैंने नहीं देखी, लेकिन इसके गाने ज़रूर सुने हैं और ये मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इस फिल्म के गाने कई सारी बड़ी (और सफ़ल) फिल्मों के गानों से बढकर हैं। ऐसा कमाल है इस इंसान के सुर-ताल में... इसके वाद्य-यंत्रों में..

जहाँ लोग "अमित त्रिवेदी" के नाम से इस कदर परिचित हैं, वहीं एक शख्स है (अमिताभ भट्टाचार्य), जो हर बार अमित के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता रहा है, अब भी चल रहा है, लेकिन उसे बहुत हीं कम लोग जानते हैं। इतना कम कि अंतर्जाल पर इनके बारे में कहीं भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है (विकिपीडिया भी मौन है)। यह वो इंसान है, जिसने देव-डी का "नयन तरसे" लिखा, "इमोसनल अत्याचार" के रूप में युवा-पीढी को उनका ऐंथम दिया, जिसने उड़ान के सारे गाने लिखे ("आज़ादियाँ", "उड़ान", "नया कुछ नया तो ज़रूर है", "कहानी खत्म है"), जिसने अमित के साथ मिलकर "आमिर" में उम्मीदों की "एक लौ" जलाई, जिसने "वेक अप सिड" में रणबीर का दर्द अपने शब्दों और अपनी आवाज़ के जरिये "इकतारा" से कहवाये... (ऐसे और भी कई उदाहरण हैं)। बुरा लगता है यह जानकर कि इस इंसान को कुछ गिने-चुने लोग हीं पहचानते हैं। कहीं इसकी वज़ह ये तो नहीं कि "यह इंसान" एक गीतकार है.. संगीतकार या गायक होता तो लोग इसे हाथों-हाथ लेते... गाने में एक गीतकार का महत्व जाने कब जानेंगे लोग!!

अमित और अमिताभ की बातें हो गईं.. अब सीधे चला जाए आज की फिल्म और आज के गानों की ओर। मुझे उम्मीद है कि हमारे सभी पाठक और श्रोता "जेसिका लाल हत्याकांड" से वाकिफ़ होंगे, किस तरह उनकी हत्या की गई थी, किस तरह उनकी बहन शबरीना ने मीडिया का सहयोग लेकर न्याय पाने के लिए एंड़ी-चोटी एक कर दी और किस तरह आखिरकार न्यायपालिका ने हत्याकांड के मुख्य आरोपी "मनु शर्मा" को अंतत: दोषी मानते हुए कठिनतम सज़ा का हक़दार घोषित किया। ये सब हुआ तो ज़रूर, लेकिन इसमें दसियों साल लगे.. इस दौरान कई बार शबरीन टूटी तो कई बार मीडिया। "केस" के शुरूआती दिनों में जब सारे गवाह एक के बाद एक मुकर रखे थे, तब खुन्नस और रोष में "टाईम्स ऑफ़ इंडिया" ने यह सुर्खी डाली थी- "नो वन किल्ड जेसिका"। राजकुमार गुप्ता" ने यही नाम चुना है अपनी अगली फिल्म के लिए।

चलिए तो इस फिल्म का पहला गाना सुनते हैं। अदिति सिंह शर्मा, श्रीराम अय्यर और तोची रैना की अवाज़ों में "दिल्ली, दिल्ली"। "परदेशी" के बाद तोची रैना अमित के लिए नियमित हो गए हैं। अदिति सिंह शर्मा भी देव-डी से हीं फिल्मों में नज़र आनी शुरू हुईं। अमित की "दिल्ली-दिल्ली" रहमान की "ये दिल्ली है मेरे यार" से काफी अलग है। "मेरा काट कलेजा दिल्ली.. अब जान भी ले जा दिल्ली" जहाँ दिल्ली में रह रहे एक इंसान का दर्द बयान करती है (भले हीं तेवर थोड़े मज़ाकिया हैं), वहीं "ये दिल्ली है मेरे यार" में दिल्ली (विशेषकर दिल्ली-६) की खूबियों के पुल बाँधे गए थे। संगीत के मामले में मुझे दोनों गाने एक जैसे हीं लगे.. "पेप्पी".. जिसे आप गुनगुनाए बिना नहीं रह सकते। "दिल्ली.. दिल्ली" आप ज्यादा गुनगुनाएँगे क्योंकि इसके शब्द जमीन से अधिक जुड़े हैं.. दिल्ली की हीं भाषा में "दिल्ली-दिल्ली" के शब्द गढे गए हैं (दिल्ली-६ में प्रसून जोशी दिल्ली का अंदाज़ नहीं ला पाए थे)। इस गाने का एक "हार्डकोर वर्सन" भी है, जिसमें संगीत को कुछ और झनकदार (चटकदार) कर दिया गया है। मुझे इसके दोनों रूप पसंद आए। आप भी सुनिए:

दिल्ली


दिल्ली हार्डकोर


अमिताभ भट्टाचार्य जब भी लिखते हैं, उनकी पूरी कोशिश रहती है कि वे मुख्यधारा के गीतकारों-सा न लिखें। वे हर बार अपना अलग मुकाम बनाने की फिराक में रहते हैं और इसी कारण "अन-कन्वेशनल" शब्दों की एक पूरी फौज़ उनके गानों में नज़र आती है। "बैंड बाजा बारात" के सभी गाने उनकी इसी छाप के सबूत हैं। मुमकिन है कि दूसरे संगीतकारों के साथ काम करते वक़्त उन्हें इतनी आज़ादी न मिलती हो, लेकिन जब अमित त्रिवेदी की बात आती है तो लगता है कि उनकी सोच की सीमा हीं समाप्त हो गई है। "जहाँ तक और जिस कदर सोच को उड़ान दे सकते हो, दे दो" - शायद यही कहना होता है अमित का, तभी तो "आली रे.. साली रे", जैसे गाने हमें सुनने को नसीब हो रहे हैं। "भेजे में कचूंबर लेकिन मुँह खोले तो गाली रे", "राहु और केतु की आधी घरवाली रे".. और ऐसे कितने उदाहरण दूँ, जो मुझे अमिताभ का मुरीद बनने पर बाध्य कर रहे हैं। यहाँ अमित की भी दाद देनी होगी, जिस तरह से उन्होंने गाने को "ढिंचक ढिंचक" से शुरू किया है और कई मोड़ लेते हुए "पेपर में छपेगी" पर खत्म किया है.. एक साथ एक हीं गाने में इतना कुछ करना आसान नहीं होता। मुझे इस गाने में "सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे" ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। चूँकि यह गाना रानी मुखर्जी पर फिल्माया गया है जो एक "न्यूज़ रिपोर्टर" का किरदार निभा रही हैं तो वह रिपोर्टर "सुर्खियों" (सुर्खियों में...) से हीं अपने आस-पास की दुनिया बुनेगी। है ना?

आली रे


चलिए अब तीसरे गाने की ओर चलते हैं। इस गाने को अपनी आवाज़ें दी हैं जानेमाने लोकगायक "मामे खान" और जानेमाने रॉकस्टार "विशाल दादालनी" ने। इन दोनों का साथ दिया है रॉबर्ट ओमुलो (बॉब) ने। लोकगायक और रॉकस्टार एक साथ..कुछ अजीब लगता है ना? इसी को तो कहते हैं प्रयोग.. मैं पक्के यकीन के साथ कह सकता हूँ कि अमित इस प्रयोग में सफ़ल हुए हैं। अंग्रेजी बोलों के साथ रॉबर्ट गाने की शुरूआत करते हैं, फिर विशाल "पसली के पार हुआ ऐतबार", "चूसे है खून बड़ा खूंखार बन के" जैसे जोशीले और दर्दीले शब्दों को गाते हुए गाने की कमान संभाल लेते हैं और अंत में "दिल ऐतबार करके रो रहा है.. " कहते-कहते मामे खान गाने को "फ़ोक" का रंग दे देते हैं। गाने में वो सब कुछ है, जो आपको इसे एकाधिक बार सुनने पर मजबूर कर सकता है। तो आईये शुरूआत करते हैं:

ऐतबार


फिल्म का चौथा गाना है अमिताभ भट्टाचार्य, जॉय बरुआ, मीनल जैन (इंडियन आईडल फेम) और रमन महादेवन की आवाज़ों में "दुआ"। ये अलग किस्म की बेहतरीन दुआ है। "खोलो दिल की चोटों को भी" .. "खुदा के घर से, उजालें न क्यों बरसे" जैसे बेहद उम्दा शब्दों के सहारे "अमित-अमिताभ" ने लोगों से ये अपील की है कि रास्ते रौशन हैं, तुम्हें बस आगे बढने की ज़रूरत है, अपने दिल के दर्द को समझो, हरा करो और आगे बढो। और अंत में "मीनल जैन" की आवाज़ में "दुआ करो - आवाज़ दो" की गुहार "सोने पे सुहागा" की तरह काम करती है। आईये हम सब मिलकर यह दुआ करते हैं:

दुआ


देखते-देखते हम अंतिम गाने तक पहुँच गए हैं। "आमिर" के "एक लौ" की तरह हीं शिल्पा राव "ये पल" लेकर आई हैं। "एकल गानों" में शिल्पा राव का कोई जवाब नहीं होता। यह बात ये पहले भी कई बार साबित कर चुकी हैं। इसलिए मेरे पास नया कुछ कहने को नहीं है। अमित और अमिताभ का कमाल यहाँ भी नज़र आता है। "मृगतृष्णा" जैसे शब्दों का इस्तेमाल लोग विरले हीं गानों में करते हैं। "रेंगते केंचुओं से तो नहीं थे".. अमिताभ इस गाने में भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं। अमित का "हूँ हूँ" गाने को एक अलग हीं लेवल पर ले जाता है। इस तरह से, एक पल क्या... हर पल में उसी शांति, उसी चैन का माहौल तैयार करने में ये तीनों कामयाब हुए हैं।

ये पल


तो इस तरह से मुझे "अमित-अमिताभ" की यह पेशकश बेहद अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। नमस्कार!

Tuesday, September 14, 2010

ज़िंदगी का फलसफा समझा कर माधोलाल कीप वाकिंग की जोरदार एवं असरदार अपील की है नायब राजा ने

ताज़ा सुर ताल ३५/२०१०


सुजॊय - सभी दोस्तों को हमारा नमस्कार! दोस्तों, आज हम एक ऐसी फ़िल्म के गीतों की चर्चा करने जा रहे हैं जो पैरलेल सिनेमा की श्रेणी में आता है। कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो व्यावसायिक लाभों से परे होती हैं, जिनका उद्देश्य होता है क्रीएटिव सैटिस्फ़ैक्शन। ये फ़िल्में भले ही सिनेमाघरों में ज़्यादा देखने को ना मिले, लेकिन अच्छे फ़िल्मों के दर्शक इन्हें अपने दिलों में जगह देते हैं और एक लम्बे समय तक इन्हें याद रखते हैं।

विश्व दीपक - लेकिन यह अफ़सोस की भी बात है कि आज फ़िल्मों का हिट होना उसकी मारकेटिंग पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गया है। पैसे वाले प्रोड्युसर हर टीवी चैनल पर अपनी नई फ़िल्म का प्रोमो बार बार लगातार दिखा दिखा कर लोगों के दिमाग़ पर उसे बिठा देते हैं और एक समय के बाद लोगों को भी लगने लगता है कि वह हिट है। गीतों को भी इसी तरह से आजकल हिट करार दिया जाता है। लेकिन जिन प्रोड्युसरों के पास पैसे कम है, वो इस तरह के प्रोमोशन नहीं कर पाते, जिस वजह से उनकी फ़िल्म सही तरीक़े से लोगों तक नहीं पहुँच पाती। जब लोगों को मालूम ही नहीं चल पाता कि ऐसी भी कोई फ़िल्म बनी है, तो उन्हें उस फ़िल्म के ना देखने पर दोष तो नहीं दिया जा सकता।

सुजॊय - बिलकुल सही बात है। अब पिछले दिनों हमारे सजीव सारथी जी से ही मुझे पता चला कि 'माधोलाल कीप वाकिंग्‍' नाम से भी कोई फ़िल्म आई है। उन्होंने कहा कि बहुत दिनों के बाद किसी फ़िल्म ने उन्हें रुलाया है। झूठ नहीं बोलूँगा, लेकिन मैंने इस फ़िल्म का नाम सुन ही नहीं था। अब इसमें ग़लती मेरी है या इस व्यवस्था की, इस तर्क में नहीं जाउँगा, लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि अगर सजीव जी इस फ़िल्म की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करते तो शायद आज हम किसी और फ़िल्म के गानें लेकर उपस्थित हुए होते।

विश्व दीपक - तो दोस्तों, जैसा कि आपने पढ़ा, आज हम आपको सुनवा रहे हैं 'माधोलाल कीप वाकिंग' फ़िल्म के गानें। इस फ़िल्म की चर्चा हम आगे जारी रखेंगे, पहले इस फ़िल्म का पहला गाना सुन लेते हैं।

गीत - नैना लागे तोसे (भुपेन्द्र)


सुजॊय - हमारी यह ख़ुशक़िस्मती है कि 'ताज़ा सुर ताल' में भुपेन्द्र जैसे गायक की आवाज़ हम शामिल कर सके हैं। हम बात कर रहे थे पैरलेल सिनेमा की, इस संदर्भ में यह बताना ज़रूरी है कि 'टाइम्स म्युज़िक' समय समय पर इस तरह की फ़िल्मों के संगीत को बढ़ावा देने के लिए सामने आता रहा है, और 'माधोलाल कीप वाकिंग्‍' के गीतों को जारी करने का ज़िम्मा भी इसी कंपनी ने लिया है। इस फ़िल्म का निर्माण ड्रीमकट्स के बैनर तले हुआ है और निर्देशक हैं जय टैंक। संगीत का पक्ष सम्भाला है नवोदित संगीतकार जोड़ी नायब और राजा ने। इस पहले गीत को सुनकर ही आप ने अंदाज़ा लगा लिया होगा कि इस ऐल्बम से हम अच्छी उम्मीद रख सकते हैं। और जब भुपेन्द्र, मिताली, अल्ताफ़ राजा, और राजा हसन जैसे गायकों ने गीत गाए हों तो निश्चित रूप से आशाएँ बढ़ जाती हैं।

विश्व दीपक - बहुत दिनों के बाद भुपेन्द्र जी की आवाज़ किसी फ़िल्मी गीत में सुन कर बहुत ही अच्छा लगा, और बड़ी बात तो यह है कि ७१ वर्ष की आयु में भी कितना अच्छा उन्होंने इस गीत को निभाया है। वही मख़मली आवाज़, वही सुरीलापन, गीत को सुनते हुए जैसे वही 'किनारा' और 'परिचय' के गानें एक दम से याद आ गए। बहरर्हाल यह बता दें कि इस गीत को लिखा था सानी अस्लम ने। नवोदित संगीतकार नायब-राजा ने अच्छा कैची ट्युन सोचा है इस गीत के लिए और यक़ीनन यह गीत उन्हें बहुत आगे ले जाएगी।

सुजॊय - इस गीत के कुल तीन वर्ज़न हैं। पहला वर्ज़न भुपेन्द्र की आवाज़ में जिसका शीर्षक रखा गया है 'माधोलाल्स थीम'; दूसरा वर्ज़न है 'वाइफ़्स थीम', जिसे परवीना ने गाया है। आइए यह वर्ज़न यहाँ पर अब सुन लिया जाए।

गीत - नैना लागे तोसे (परवीना)


विश्व दीपक - और अब लगे हाथ 'डॉटर्स थीम' भी सुन लें, जिसे मिताली सिंह ने गाया है। धुन तो वही है, लेकिन इन तीनों के शब्दों में फेर बदल है। और मज़े की बात है कि भुपेन्द्र ने 'माधोलाल्स वर्ज़न' गाया था, इस हिसाब से 'वाइफ़्स थीम' मिताली से गवाया जाना था :-), लेकिन मिताली से बेटी वाला वर्ज़न गवाया गया। आइए सुन लेते हैं मिताली की आवाज़ में यह वर्ज़न।

गीत - नैना लागे तोसे (मिताली)


सुजॊय - शास्त्रीय रंग में रंगे इन तीनों गीतों को सुन कर एक अच्छी फ़ीलिंग सी आ रही है। फ़िल्म तो नहीं देखी मैंने, लेकिन इस गीत को सुन कर फ़िल्म के बारे में एक अच्छा फ़ील सा आ रहा है। मौका मिला तो ज़रूर देखूँगा। और आइए अब बढ़ते हैं आगे। भुपेन्द्र, मिताली और परवीना के बाद अब अल्ताफ़ राजा की आवाज़ की बारी। बिलकुल अल्ताफ़ साहब के अंदाज़ का गाना है "फ़लसफ़ा ये ज़िंदगी का कोई भी ना अब तक समझा"। उनके पहले के ग़ैर फ़िल्मी गीतों में वो जिस तरह से बीच बीच में शेर कहते थे, ठीक वैसे ही इस गीत के शुरु में उसी अंदाज़ में वो कहते हैं "ये मसअला ही ऐसा था कि हल ना कर सका, ऐ ज़िंदगी मैं तुझको मुकम्मल ना कर सका"।

विश्व दीपक - इस गीत को भी सानी अस्लम ने लिखा है। वैसे आपको बता दें कि इस फ़िल्म में दो गीतकार हैं, दूसरे गीतकार हैं साहिल फ़तेहपुरी। और फ़िल्म के मुख्य किरदारों में हैं सुब्रत दत्त, नीला गोखले, प्रणय नारायण, स्वर भास्कर और वर्णिता अगवाले। बहुत दिनों के बाद अल्ताफ़ राजा की आवाज़ में इस गीत को सुन कर भी उतना ही अच्छा लगेगा जितना भुपेन्द्र के गीत को सुन कर लगा है, ऐसा हमारा ख़याल है, आइए सुनते हैं।

गीत - फ़लसफ़ा ये ज़िंदगी का


सुजॊय - वाह! स्वीट ऐण्ड सिम्पल जिसे कहते हैं। साज़ों की ज़्यादा तामझाम नहीं है, हारमोनियम की विशुद्ध धुन एक अरसे के बाद सुनने को मिली है। इस दार्शनिक गीत के बोल भी विचारोत्तेजक हैं, और एक निराशावादी होते हुए भी जैसे एक संदेश दे जाते हैं जीवन के प्रति। एक आम आदमी के जीवन की कहानी को कितने सीधे सरल तरीके से कहा है गीतकार सानी अस्लम ने कि "लम्बे सफ़र की ख़ातिर युं तो सब के सब आते हैं, कई मुसाफ़िर रस्ते में ही चुप से उतर जाते हैं, उड़ जाता है रूह का पंछी मिल जाए मौका जो ज़रा सा"।

विश्व दीपक - वाक़ई एक छाप छोड़ने वाला गीत है और एक बार सुनने के बार एक और बार सुनने का दिल करता है। नायब और राजा ने भी इस गीत के लिए ऐसी धुन चुनी है जो सुनने वाले को उस पर टिकाए रखती है। बेशक़ यह गीत अल्ताफ़ राजा के असंख्य चाहनेवालों को ही नहीं, बल्कि अच्छे गीत-संगीत के क़द्रदानों को भी ख़ूब भाएगा। इस गीत की खासियत ही है अल्ताफ़ राजा का अंदाज़-ए-बयाँ। यह पूरी तरह से उन्हीं का गीत है जिसे कोई दूसरा नहीं गा सकता। आइए अब अगले गीत पर आते हैं जो कि एक क़व्वाली है अस्लम साबरी और साथियों की अवाज़ों में।

सुजॊय - इस क़व्वाली की शुरुआत अल्ताफ़ राजा के स्टाइल में एक शेर से होती है, लेकिन अल्ताफ़ राजा की आवाज़ में नहीं। ख़ुद ही सुनिए और इस क़व्वाली का मज़ा लें।

गीत - ख़ुदा के वास्ते


विश्व दीपक - "दर्द सीने में तो आँखों में समुंदर देखा, ज़िंदगी हमने तेरा कैसा मुक़द्दर देखा", इस शेर से क़व्वाली की शुरुआत होती है। अस्लम साबरी, जो एक मशहूर क़व्वाल हैं, उनके बारे में और क्या कहें, वो तो इसे ख़ूबसूरत अंजाम देंगे ही, लेकिन तारीफ़ नायब और राजा की करनी ही पड़ेगी जिन्होंने इस फ़िल्म में एक से एक उम्दा गीत रचा है।

सुजॊय - इस क़व्वाली की ख़ासियत यह है कि यह ना तो सूफ़ी या धार्मिक अंदाज़ का है और ना ही यह हुस्न-ओ-इश्क़ की कव्वाली है, बल्कि यह इंसानियत की क़व्वाली है, और यह प्रेरणा देती है कि जो पिछड़े वर्ग हैं उनके लिए हमें कुछ करना चाहिए, हर इंसान समान है, "ख़ुदा के वास्ते मिटा दे फ़ासले"। बहुत दिनों के बाद ऐसी क़व्वाली सुनने को मिली है, बल्कि ऐसा भी कह सकते हैं कि इस तरह की क़व्वाली कभी फ़िल्मों में आई ही नहीं है।

विश्व दीपक - फ़िल्म 'सरफ़रोश' में जो क़व्वाली थी "ज़िंदगी मौत ना बन जाए", उसमें भी कुछ कुछ ऐसी बात थी, लेकिन उसमें मुल्क की बात थी, इसमें इंसानियत की बात है। हैट्स ऒफ़ टू सानी अस्लम फिर से एक नायाब रचना के लिए।

सुजॊय - कुल मिलाकर अब तक जितने भी गीत हमने सुनें हैं हर के गीत के लिए मेरा "थम्प्स अप"! आइए अब अगले गीत की ओर बढ़ा जाए। यक़ीनन यह गीत भी हमें निराश नहीं करेगा।

गीत - ये धरती


विश्व दीपक - राजा की आवाज़ में यह गीत था, लेकिन इसकी धुन तो बिलकुल "सूरज की गरमी से तपते हुए तन को" गीत जैसी ही लगी। लेकिन अंतरे की धुन बिलकुल अलग है। पता नहीं उस धुन का इस्तेमाल क्यों किया गया जब कि नायब-राजा बहुत अच्छा ही काम कर रहे थे, एक और ऒरिजिनल धुन बनाना क्या बहुत ज़्यादा मुश्किल काम था?

सुजॊय - ख़ैर, राजा की आवाज़ में इस गीत को सुन कर अच्छा लगा, ३ मिनट ४५ सेकण्ड्स का यह गाना था और एक बार फिर से संदेशात्मक बोल, "ज़रा सी तुझपे मुसीबत जो आए, तो मेरी तरफ़ तुमने आँखें दिखाए, कभी ग़ौर से देखो सूरज को मेरे, जो ख़ुद को जला कर अंधेरे मिटाये"। पार्श्व में बजने वाले सीन्थेसाइज़र के बीट्स ने भी गीत को अच्छा सहारा दिया है।

विश्व दीपक - और अब इस ऐल्बम का अंतिम गीत। गीत, ग़ज़ल, क़व्वाली के बाद अब हार्ड रॊक की बारी गायक राजा हसन की आवाज़ में। जी हाँ, वही राजा हसन जो हाल में रियल्टी शो से उभरे हैं। राजा हसन ज़्यादातर दूसरे क़िस्म के गानें गाते रहे हैं, उनसे इस तरह का रॊक नंबर गवाना भी अपने आप में एक प्रयोग है। यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है और इस बार गीतकार साहिल फ़तेहपुरी हैं। बस यही कह सकते हैं कि इस ऐल्बम का जिस तरह से एक सुरीली शुरुआत हुई थी, वैसा ही एक रॊकिंग समापन हो रहा है। लीजिए इस आख़िरी गीत को भी सुन लीजिए।

सुजॊय - इस ऐल्बम में "राजा" शब्द बार बार आया है, एक बार सिर्फ़ राजा, एक बार अल्ताफ़ राजा, और एक बार राजा हसन। अल्ताफ़ राजा की तो बात अलग है, लेकिन क्या राजा और राजा हसन भी दो अलग अलग नाम हैं? पहले पहले मुझे लगा कि संगीतकार नायब-राजा के राजा हीं राजा हसन हैं। लेकिन जब एक ही ऐल्बम पर एक बार राजा और एक बार राजा हसन के नाम से दो अलग अलग गीत आए हैं तो निश्चित ही ये अलग अलग शख्सियत होंगे। आइए यह गीत सुना जाए।

गीत - माधोलाल कीप वाकिंग


सुजॊय - अब और ज़्यादा कुछ कहने को नहीं बचा है मेरे लिए, मुझे जो गानें अच्छे लगे हैं वो हैं "नैना लागे (भूपेन्द्र), "फ़लसफ़ा ये ज़िंदगी का" तथा "ख़ुदा के वास्ते"। और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३.५ की रेटिंग्ग।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, गानों में जिस रूह की जरूरत होती है, मेरे हिसाब से गीतकार, संगीतकार और गायक-गायिकाओं ने अपनी तरफ़ से उसमें थोड़ी भी कमी नहीं होने दी है। आपको तो पता हीं होगा कि किसी भी गीत में मेरा सबसे ज्यादा ध्यान उसके बोलों पर होता है, और जिस गीत के बोल मुझे प्रभावित कर जाते हैं, वह गीत खुद-ब-खुद मेरा पसंदीदा हो जाता है। अमूमन हर समीक्षा में मैं शब्दों के पैमानों पर हीं गीत या एलबम को तौलता हूँ.. इसलिए तो बोल न पसंद आने पर या फिर यह महसूस होने पर कि गीतकार ने मेहनत नहीं की है, बल्कि महज़ "कन्नी काटा" है या "खानापूर्ति" की है, मैं आपके दिए हुए रेटिंग से कुछ अंक हटा भी देता हूँ। मुझे खुशी है कि इस एलबम में वैसा कुछ करने की नौबत नहीं आएगी.. इसलिए आपके दिए हुए रेटिंगे को बरकरार रखते हुए मैं एक बार फिर से सजीव जी का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, जिनकी बदौलत हम इस नायाब एलबम को सुन सकें। तो चलिए इन्हीं सब बातों और गानों के साथ हम आज की समीक्षा समाप्त करते हैं। अगली बार कौन-सी एलबम होगी , यह तो मुझे भी नहीं पता... लेकिन इतना यकीन दिलाता हूँ कि आप सबों के लिए हम कुछ अच्छा हीं चुन कर लाएँगे... तब तक लिए इज़ाज़त दीजिए..

आवाज़ रेटिंग्स: माधोलाल कीप वाकिंग: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १०३- भूपेन्द्र ने एक फ़िल्म में एक युगल गीत गाया था जिसके बोल थे "मुझे प्यार से आवाज़ देना मेरा नाम लेकर"। आपको बताना है फ़िल्म का नाम और किस गायिका के साथ यह युगल गीत उन्होंने गाया था।

TST ट्रिविया # १०४- "दरसल मेरी पैदाइश नागपुर की है, मेरे पिताजी रत्नागिरि से ताल्लुख़ रखते हैं, जो कोंकण कोस्ट में हैं, जहाँ के अल्फ़ोन्सो आम बहुत मशहूर है। और हमारी माताजी फ़र्रुख़ाबाद से ताल्लुख़ रखती हैं। मम्मी का नाम है रबी रूपलता और पिताजी का नाम है इब्राहिम इक़बाल।" तो दोस्तों, बताइए कि ये कौन से फ़नकार अपने माता पिता के बारे में बता रहे हैं?

TST ट्रिविया # १०५- क़व्वाली की बात चली है आज और आवाज़ अस्लम साबरी की है, तो बताइए कि वह कौन सी क़व्वाली थी जिसे लता मंगेशकर ने फ़रीद साबरी और सईद साबरी के साथ मिल कर गाया था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "फ़लक तक चल साथ मेरे" (टशन)
२. 'इश्क़ क़यामत'।
३. "क्यों आगे पीछे डोलते हो भँवरों की तरह" (गोलमाल)

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