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Tuesday, September 8, 2009

दीपक राग है चाहत अपनी, काहे सुनाएँ तुम्हें... "होशियारपुरी" के लफ़्ज़ों में बता रही हैं "शाहिदा"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४३

यूँतो पिछली महफ़िल बाकी के महफ़िलों जैसी हीं थी। लेकिन "प्रश्न-पहेली" के आने के बाद और दो सवालों के जवाब देने के क्रम में कुछ ऐसा हुआ कि एकबारगी हम पशोपेश में पड़ गए कि अंकों का बँटवारा कैसे करें। इससे पहले हमारी ऐसी हालत कभी नहीं हुई थी। तो हुआ यूँ कि सीमा जी ने प्रश्नों का जवाब तो सबसे पहले दिया लेकिन दूसरे प्रश्न में उनका आधा जवाब हीं सही था। इसलिए हमने निश्चय कर लिया था कि उन्हें ३ अंक हीं देंगे। फिर शरद जी सही जवाबों के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए। इस नाते उनको २ अंक मिलना तय था(और है भी)। लेकिन शरद जी के बाद सीमा जी फिर से महफ़िल में तशरीफ़ लाईं और इस बार उन्होंने उस आधे सवाल का सही जवाब दिया। अब स्थिति ऐसी हो गई कि न उन्हें पूरे अंक दे सकते थे और न हीं ३ अंक पर हीं छोड़ा जा सकता था। इसलिए "बुद्ध" का मध्यम मार्ग निकालते हुए हम उन्हें आधे जवाब के लिए आधा अंक देते हैं। इस तरह सीमा जी को मिलते हैं ३.५ अंक और शरद जी को २ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की| आज की कड़ी से हम नियमों में थोड़ा बदलाव कर रहे हैं। तो ये रहे प्रतियोगिता के बदले हुए नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) "नेशनल ज्योग्राफ़िक" के कवर पर आने वाली वह फ़नकारा जिनकी बहन का निक़ाह एक पाकिस्तानी सीनेटर से हुआ है। उस फ़नकारा का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि हम किस सीनेटर की बातें कर रहे हैं।
२) "मदन मोहन" के साथ काम करने की चाहत में बंबई आने वाले एक फ़नकार जिन्होंने "भीम सेन" की एक फ़िल्म में गीत लिखकर पहली बार शोहरत का स्वाद चखा। फ़नकार के नाम के साथ उस गीत की भी जानकारी दें।


आज हम जिस फ़नकारा से आपको मुखातिब कराने जा रहे हैं उनकी माँ खुद एक गायिका रह चुकी थीं। चूँकि उनकी माँ को संगीत की समझ थी इसलिए वे चाहती थीं कि उनकी बेटी उन गुरूओं की शागिर्दगी करे जिनका नाम पूरी दुनिया जानती है और जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। आगे बढने से पहले अच्छा होगा कि हम आपको उनकी माँ का नाम बता दें। तो हम बातें कर रहे हैं "ज़ाहिदा परवीन" जी की। ज़ाहिदा जी को संगीत की पहली तालीम मिली थी बाबा ताज कपूरथलावाले सारंगीवाज़ और हुसैन बख्श खान सारंगीवाज़ से। कुछ सालों के बाद वे उस्ताद आशिक़ अली खां की शागिर्द हो गईं जो पटियाला घराने से संबंध रखते थे। ज़ाहिदा जी यूँ तो कई तरह के गाने गाती थीं, लेकिन "काफ़ी" गाने में उनका कोई सानी न था। "काफ़ी" के अलावा गज़ल, ठुमरी, खयाल भी वो उसी जोश और जुनूं के साथ गातीं थी। "ज़ाहिदा" जी के बाद जब उनकी बेटी "शाहिदा परवीन" का इस क्षेत्र में आना हुआ तो "ज़ाहिदा" जी ने अपनी बेटी के गुरू के तौर पर उस्ताद अख्तर हुसैन खां को चुना, जो उस्ताद अमानत अली खां और उस्ताद फतेह अली खां के पिता थे। उस्ताद अख्तर हुसैन खां के सुपूर्द-ए-खाक़ होने के बाद "शाहिदा" ने उस्ताद छोटे गुलाम अली खां की शागिर्दगी की , जो "क़व्वाल बच्चों का घराना" से ताल्लुकात रखते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि "क़व्वाल बच्चों के घराने" में कबीर को गाने की परंपरा रही है। १९७५ में ज़ाहिदा परवीन की मौत के बाद शाहिदा को यह सफ़र अकेले हीं तय करना था। शाहिदा को उनके रियाज़ और उनके गायन के बदौलत वह मुकाम हासिल हो चला था कि लोग उन्हें "रोशन आरा बेगम" के समकक्ष मानने लगे थे। फिर जब "रोशन आरा" भी इस दुनिया में नहीं रहीं तब तो शाहिदा हीं एक अकेली क्लासिकल गायिका थीं जो उनकी कमी को पूरा कर सकती थीं। लेकिन ऐसा न हुआ। कुछ तो वक्त का तकाज़ा था तो कुछ शाहिदा में अकेले आगे बढने की हिम्मत की कमी। जबकि वो मुल्तानी( इस राग को गाना या कहिए निबाहना हीं बड़ा कठिन होता है क्योंकि इसमें रिखब के नुआंसेस सही पकड़ने होते हैं) बड़े हीं आराम से गा सकती थी, फिर भी न जाने क्यों मंच से वो बागेश्वरी, मेघ या मालकौंस हीं गाती थीं, जो कि अमूमन हर कोई गाता है। शाहिदा ने अपने आप को अपनी माँ के गाए काफ़ियों तक हीं सीमित रखा। इसलिए संगीत के कुछ रसिक उनसे नाराज़ भी रहा करते थे। पर जो भी उनके रहने तक यह उम्मीद तो थी कि कोई है जो "रोशन आरा" की तरह गा सकती है, लेकिन १३ मार्च २००३ को उनके दु:खद निधन के बाद यह उम्मीद भी खत्म हो गई।

"शाहिदा" के बारें में कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन वो सब बातें कभी अगली कड़ी में करेंगे। अब हम आज की गज़ल के शायर "हफ़ीज़ होशियारपुरी" की तरफ़ रूख करते हैं। यूँ तो अभी हम जिन बातों का ज़िक्र करने जा रहे हैं उनका नाता सीधे तौर पर हफ़ीज़ साहब से नहीं है, फिर भी चूँकि उन बातों में इनका भी नाम आता है, इसलिए इसे सही वक्त माना जा सकता है। "बाज़ार की एक रात" के लेखक और एक समय में पेशावर रेडियो स्टेशन के स्क्रीप्ट राईटर रह चुके मुशर्रफ़ आलम ज़ौकी साहब सआदत हसन "मंटो" को याद करते हुए अपने एक लेख "इंतक़ाल के पचास बरस बाद मंटो ज़िंदा हो गया" में लिखते हैं: रेडियो पाकिस्तान से मंटो का अफ़साना ‘नया क़ानून’ सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया कि ये वही हमारी कौमी रेड़ियो सर्विस है जिसने अपने यहाँ मंटो की रचनाओं को बन्द कर रखा था। क़यामे-पाकिस्तान के बाद जब मंटो लाहौर गया तो उसे विश्वास था कि उसकी साहित्यिक ख़िदमत में कोई कमी नहीं होगी। लेकिन इस ख़ुशफ़हमी का अन्त होते देर न लगी। लाहौर आकर उसने रोज़ी-रोटी के सिलसिले में काफ़ी मेहनत की लेकिन ‘अश्लील लेखक मंटो’ किसी भी मरहले में सफल न हो सका। मैं भी 1948 में पेशावर छोड़ कर लाहौर आ गया और मंटो से करीब-करीब रोज़ाना मुलाक़ात रही। लेकिन मैं भी उसी की तरह बेरोज़गार था। एक बेरोज़गार दूसरे बेरोज़गार की क्या मदद करता। उन्हीं दिनों मर्कज़ी हुकूमत के वजीर इत्तलाआत व नशरियात और प्रसिद्ध लेखक एस. एम. एकराम साहब लाहौर आए और जनाब हफ़ीज़ होशियारपुरी को, जो स्टेशन डायरेक्टर या असिस्टेंट डायरेक्टर थे, मेरे पास भेजा कि शाम की चाय मेरे साथ पियो। मुझे आश्चर्च अवश्य हुआ लेकिन पैग़ाम लाने वाले मेरे दोस्त और मशहूर शायर हफीज़ होशियारपुरी थे। और निमत्रण देने वाले अनेक श्रेष्ठ ऐतिहासिक पुस्तकों के लेखक थे। मैं हाज़िर हुआ तो एकराम साहब बड़ी मुहब्बत से मिले। मुझे इस मुहब्बत पर कुछ आश्चर्य भी हुआ कि मुझको तो दूसरे बहुत से लेखकों के साथ उनके विभाग ने "बैन" कर रखा था। उन्होंने गुफ़्तुगू का आग़ाज़ ही इस बात से किया कि मेरे सम्मान में केवल मुझ पर से पाबन्दी हटा रहे हैं। मैं उठ खड़ा हुआ और अर्ज़ किया कि आप जैसे विद्वान व्यक्ति से मुझे इस तरह की पेशकश की आशा नहीं थी। मैं अपने दोस्तों को धोखा देने के बारे में सोच भी नहीं सकता जबकि मेरे दोस्तों में मंटो जैसे महान रचनाकार भी मौजूद हैं। मैं ये कहकर वहाँ से चला आया। बाद में हफीज़ साहब से इस ज़्यादती का शिकवा किया तो उन्होंने क़समें खाकर बताया कि उन्हें एकराम साहब के प्रोग्राम का पता नहीं था। अब आज का हाल देखिए कि जब मंटो नहीं रहा तो उसकी किस तरह से कद्र बढ गई है। मेरी समझ में एक बात कभी नहीं आई कि जो दुनिया छोड़ कर चले गए, उनके बारे में सिर्फ़ अच्छा क्यों लिखा जाता है। उनके ज़िंदा रहते में तो कोई उन्हें पूछने तक नहीं आता। इस तरह से "मंटो" के बहाने हीं सही, लेकिन ज़ौकी साहब ने बड़ा हीं महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। कभी आप भी इस पर विचार कीजिएगा। उससे पहले हफ़ीज़ साहब के इस शेर पर जरा गौर फ़रमा लिया जाए:

आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोलकर देखा किए,
एक हीं लम्हे में जैसे उम्र-भर देखा किए।


कुछ बड़ी हीं ज़रूरी बातों के बाद अब वक्त है आज की गज़ल का। तो लीजिए पेश है "शाहिदा" की मधुर आवाज़ में यह गज़ल:

दीपक राग है चाहत अपनी, काहे सुनाएँ तुम्हें,
हम तो सुलगते हीं रहते हैं, क्यों सुलगाएँ तुम्हें।

तर्क-ए-मोहब्बत, तर्क-ए-तमन्ना कर चुकने के बाद,
हम पे ये मुश्किल आन पड़ी है, कैसे बुलाएँ तुम्हें।

सन्नाटा जब तन्हाई के ज़हर में बुझता है,
वो घड़ियों क्यों कर कटती हैं, कैसे बताएँ तुम्हें।

जिन बातों ने प्यार तुम्हारा नफ़रत में बदला,
डर लगता है वो बातें भी भूल न जाएँ तुम्हें।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

___ की हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोया


आपके विकल्प हैं -
a) शहर, b) वतन, c) बस्ती, d) मोहल्ले

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "बाम" और शेर कुछ यूं था -

तुझ पे भी बरसा है उस बाम से मेह्ताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है..

"फ़ैज़" की इस नज़्म को सबसे पहले सही पहचाना सीमा जी ने। आपने फ़ैज़ की वह नज़्म भी महफ़िल में पेश की जिससे ये दो मिसरे लिए गए हैं। शरद जी ने सही फ़रमाया था कि आपने शेरों और नज़्मों की वह दीवार खड़ी कर दी थी कि किसी और का सेंध लगाना नामुमकिन था। शायद यही वज़ह है कि हम भी निश्चित नहीं कर पा रहे कि कौन-सा शेर यहाँ पेश करें और कौन-सा छोड़ें। फिर भी कुछ शेर जो हमारे दिल को छू गएँ:

जब भी गुज़रा वो हसीं पैकर मेरे इतराफ़ से,
दी सदा उसको हर एक दर ने हर एक बाम ने

ज़रा सी देर ठहरने दे ऐ ग़म-ए-दुनिया
बुला रहा है कोई बाम से उतर के मुझे (नासिर काज़मी)

माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशाँ किये हुए (मिर्ज़ा ग़ालिब)

ये हिन्दियों के फ़िक्र-ए-फ़लक रस का है असर
रिफ़त में आसमाँ से भी ऊँचा है बाम-ए‍-हिन्द (इक़बाल)

हवा के ज़ोर से पिंदार-ए-बाम-ओ-दार भी गया
चिराग़ को जो बचाते थे उन का घर भी गया (अहमद फ़राज़)

सीमा जी की किलाबंदी को भेदते हुए महफ़िल में हाज़िर हुए "शामिख फ़राज़"। आपने न सिर्फ़ उर्दू/हिंदी के शेर कहे बल्कि ब्रजभाषा (जहाँ तक मुझे मालूम है) की भी एक रचना पेश की। यह रही आपकी पेशकश:

मुरली सुनत बाम काम-जुर लीन भई (देव)

हर बाम पर रोशन काफ़िला - ए - चिराग़
हर बदन पर कीमती चमकते हुए लिबास

बाम-ऐ-मीना से माहताब उतरे
दस्त-ए-साकी में आफताब आये

सुमित जी महफ़िल में आए तो लेकिन चूँकि उन्हें बाम का अर्थ मालूम न था तो वो सही से कुछ सुना न सके। मंजु जी ने न सिर्फ़ सुमित जी का कुतूहल शांत किया बल्कि कुछ स्वरचित पंक्तियाँ(दोहा) भी पेश की:

हिमालयराज की पुत्री ,ने सहा खूब ताप .
हुयी थी शादी शिव की, पाया शिव का बाम।

आप दोनों के बाद महफ़िल में हाज़िरी लगाई कुलदीप जी ने। ये रहे आपकी तरकश के तीर:

कितना सितमज़रीफ़ है वो साहिब-ऐ-जमाल
उस ने दिया जला के लब-ऐ-बाम रख दिया

देख कर अपने दर -ओ -बाम लरज़ उठाता हूँ
मेरे हमसाये में जब भी कोई दीवार गिरे

अंत में हमारी महफ़िल में नज़र आईं रचना जी। यह रहा आपका पेश किया हुआ शेर:

बाम-ऐ-शोहरत से एक शाम चुरा के देखो
दर्द किसी और का दिल में उठा के देखो

मनु जी इतने से काम नहीं चलेगा। आपके शेर को तभी उद्धृत करूँगा जब आप थोड़ा वक्त यहाँ गुजारेंगे। हमारी तरफ़ एक कहावत है कि "हड़बड़ का काम गड़बड़ हीं होता है"। सोचिए..यह आप पर कितना फिट बैठता है!

चलिए इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, September 1, 2009

फिर तमन्ना जवां न हो जाए..... महफ़िल में पहली बार "ताहिरा" और "हफ़ीज़" एक साथ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४१

ज से फिर हम प्रश्नों का सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं। इसलिए कमर कस लीजिए और तैयार हो जाईये अनोखी प्रतियोगिता का हिस्सा बनने के लिए। पिछली प्रतियोगिता के परिणाम उम्मीद की तरह तो नहीं रहे(हमने बहुतों से प्रतिभागिता की उम्मीद की थी, लेकिन बस दो या कभी किसी अंक में तीन लोगों ने रूचि दिखाई) लेकिन हाँ सुखद ज़रूर रहे। हमने सोचा कि क्यों न उसी ढाँचे में इस बार भी प्रश्न पूछे जाएँ, मतलब कि हर अंक में दो प्रश्न। हमने इस बात पर भी विचार किया कि चूँकि "शरद" जी और "दिशा" जी हमारी पहली प्रतियोगिता में विजयी रहे हैं इसलिए इस बार इन्हें प्रतियोगिता से बाहर रखा जाए या नहीं। गहन विचार-विमर्श के बाद हमने यह निर्णय लिया कि प्रतियोगिता सभी के लिए खुली रहेगी यानि सभी समान अधिकार से इसमें हिस्सा ले सकते हैं, किसी पर कोई रोक-टोक नहीं। तो यह रही प्रतियोगिता की घोषणा और उसके आगे दो प्रश्न: आज से ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। लेकिन अगर ऐसा हो जाए कि १० कड़ियों के बाद हमें एक से ज्यादा विजेता मिल रहे हों तो ५१वीं कड़ी ट्राई ब्रेकर का काम करेगी, मतलब कि उन विजेताओं में से जो भी पहले ५१वीं कड़ी के एकमात्र मेगा-प्रश्न का जवाब दे दे,वह हमारा फ़ाईनल विजेता होगा। एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) "वे अपने गुरु (बाल गंगाधर तिलक) से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी...." यह किसने और किसके लिए कहा था?
२) एक फ़नकारा जिन्हें अपनी गज़लों की पहली एलबम की रोयाल्टी के तौर पर सत्तर हज़ार का चेक दिया गया था और जो अपने चाहने वालों के बीच "नादिरा" नाम से मक़बूल हैं। उस फ़नकारा का वास्तविक नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि वह एलबम कब रीलिज हुई थी।


सवालों की झड़ी लगाने के बाद अब वक्त है आज की महफ़िल को रंगीं करने का। आज की गज़ल कई लिहाज़ से खास है। पहला तो यह कि महफ़िल-ए-गज़ल की पिछली ४० कड़ियों में कभी भी ऐसा नहीं हुआ है कि हमें किसी गज़ल/नज़्म के रचनाकार का नाम तो मालूम हो लेकिन एक हीं नाम के दो-दो जनाब हाज़िर हो जाएँ। आज की गज़ल का हाल उन सारी गज़लों/नज़्मों से अलहदा है। हमने जब इस गज़ल के गज़लगो का नाम मालूम करना चाहा तो "हफ़ीज़" नाम हर जगह मौजूद पाया। दिक्कत तो तब आई जब एक जगह पर हफ़ीज़ होशियारपुरी का नाम दर्ज़ था तो दूसरी जगह पर हफ़ीज़ जालंधरी का(इन्हें अबु-उल-असर के नाम से भी जाना जाता है)। होशियारपुरी साहब का नाम था तो बस एक हीं जगह लेकिन वह श्रोत कुछ ज्यादा हीं विश्वसनीय है (अधिकांश शायरों की जानकारी हमें वहीं से हासिल हुई है), वहीं जालंधरी साहब का नाम एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज़ था, उदाहरण के लिए, यहाँ। अब हमें यह समझ नहीं आया कि किसी मानें और किसे छोड़ें, इसलिए अंतत: हमने यह निर्णय लिया कि हम दोनों की बातें आपसे शेयर कर लेते हैं, फिर आपकी मर्ज़ी (या आपका शोध) कि आप किसे इस गज़ल का गज़लगो मानें। आज से पहले हमने एक कड़ी में होशियारपुरी साहब की "मोहब्बत करने वाले कम न होंगे" सुनवाया था जिसे अपनी आवाज़ से सजाया था इक़बाल बानो ने। वहीं जालंधरी साहब की भी एक नज़्म "अभी तो मैं जवान हूँ" हमारी महफ़िल की शोभा बन चुकी है। हमें पूरा विश्वास है कि आप अब तक उस नज़्म के असर से उबरे नहीं होंगे। उस नज़्म में आवाज़ थी आज की फ़नकारा की अम्मीजान मल्लिका पुखराज की। अब अगर आज की गज़ल की बात करें तो यह गज़ल मल्लिका पुखराज का भी संग पा चुकी है। असलियत में, मल्लिका की ऐसी कई सारी गज़लें हैं ("अभी तो मैं जवान हूँ" भी उस फ़ेहरिश्त में शामिल है) जिन्हें उनके बाद उनकी बेटी ने अपनी आवाज़ से सराबोर किया है। उसी फ़ेहरिश्त से चुनकर हम लाए हैं आज की गज़ल।

अभी तक तो आप जान हीं चुके होंगे कि हम किनकी बात कर रहे थे। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के जानेमाने टी०वी० के शख्सियत और वकील जनाब नईम बोखारी की पत्नी और उस्ताद अख्तर हुसैन की शिष्या मोहतरमा ताहिरा सय्यद की। सय्यद अपने भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। भाई-बहनों में इनके अलावा इनके चार भाई और हैं। इनकी बहन तस्नीम का निकाह पाकिस्तान के सीनेटर एस० एम० ज़फ़र से हुआ है। १९९० में सय्यद अपने पति नईम बोखारी से अलग हो गईं, तब से वे अपने दो बच्चों(एक बेटा और एक बेटी, दोनों हीं वकील हैं) के साथ रह रहीं हैं। यह तो हुई ताहिरा सय्यद की निजी ज़िंदगी की बातें, अब कुछ उनकी गायकी पर भी रोशनी डालते हैं। १९६८-६९ में रेडियो पाकिस्तान पर अपनी आवाज़ बिखेरने के बाद इनकी प्रसिद्धि दिन पर दिन बढती हीं गई। १२ वर्ष की नाजुम उम्र से गायिकी शुरू करने वाली इन फ़नकारा को १९८५ में "नेशनल ज्योग्राफ़िक" के कवर पर भी स्थान दिया गया(ऐसा सम्मान पाने वाली वे सबसे कम उम्र की शख्सियत थीं), जो अपने आप में एक गर्व की बात है। इन्होंने बहुत सारी खुबसूरत गज़लों और नज़्मों को अपनी आवाज़ दी है। ऐसी हीं एक गज़ल है "परवीन शाकिर" की लिखी "बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना"। समय आने पर हम यह गज़ल आपको ज़रूर सुनवायेंगे। उस समय "ताहिरा" की और भी बातें होंगी।

अब चूँकि हमें पक्का पता नहीं है कि कौन से हफ़ीज़ साहब आज की गज़ल के गज़लगो हैं। इसलिए अच्छा यही होगा कि हम दोनों महानुभावों का एक-एक शेर आपकी खिदमत में पेश कर दें। तो लीजिए पहले हाज़िर है हफ़ीज़ होशियारपुरी साहब का यह शेर:

तेरी मंजिल पे पहुँचना कोई आसान न था
सरहदे अक्ल से गुज़रे तो यहाँ तक पहुंचे।


इसके बाद बारी है हफ़ीज़ जालंधरी साहब के शेर की। तो मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

तुम हीं न सुन सके अगर, क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन,
किसकी ज़ुबां खुलेगी फिर, हम ना अगर सुना सके।


इसी पशोपेश में कि आज की गज़ल के शायर कौन हैं, हम आज की गज़ल की ओर रुख करते हैं। वैसे एक-सा नाम होना कितना बुरा होता है, इसका पता इसी गज़ल से चल जाता है। मक़ते में "हफ़ीज़" तो है लेकिन तब भी कोई फ़ायदा नहीं। वैसे हम आपसे यह दरख्वास्त करेंगे कि इस गज़ल के शायर की खोज़ में(दो हीं विकल्प हैं, इसलिए ज़्यादा दिक्कत नहीं आनी चाहिए) हमारी मदद करें। उससे पहले आराम से सुन लें यह गज़ल :

बे-ज़बानी ज़बां न हो जाए,
राज़-ए-उल्फ़त अयां न हो जाए।

इस कदर प्यार से न देख मुझे,
फिर तमन्ना जवां न हो जाए।

लुत्फ़ आने लगा ज़फ़ाओं में,
वो कहीं मेहरबां न हो जाए।

ज़िक्र उनका जबान पर आया,
ये कहीं दास्तां न हो जाए।

खामोशी है जबान-ए-इश्क़ "हफ़ीज़"
हुस्न अगर बदगुमां न हो जाए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

भूले हैं रफ्ता रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम,
___ में खुदखुशी का मज़ा हम से पूछिए ...


आपके विकल्प हैं -
a) सदमों, b) बरसों, c) किश्तों, d) सालों

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "फासले" और शेर कुछ यूं था -

फासले ऐसे भी होंगें ये कभी सोचा न था,
सामने भी था मेरे और वो मेरा न था..

सही जवाब के साथ हमारी महफ़िल में पहली बार नज़र आए "निखिल" जी। जनाब आपका इस महफ़िल में बेहद स्वागत है। आपने एक शेर भी पेश किया:

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो..

इनके बाद बारी आई शामिख साहब की। हुज़ूर यह क्या, आप आएँ लेकिन इस बार आपका अंदाज़ कुछ अलग था। आपने तो हमें उस गज़ल की जानकारी हीं नहीं दी जिससे यह शेर लिया गया है। खैर कोई बात नहीं। आपने "फ़ासले" शब्द पर कुछ शेर हमारी महफ़िल में कहे, जिनमें एक शेर जनाब जैदी ज़फ़र रज़ा साहब का था। बानगी देखिए:

ये राह्बर हैं तो क्यों फासले से मिलते हैं
रुखों पे इनके नुमायाँ नकाब सा क्यों है

यह गिला है आपकी निगाहों से
फूल भी हो दरमियाँ तो यह फासले हुए.

पूजा जी, बहुत दिनों बाद आपका हमारी इस महफ़िल में आना हुआ। आपने कैफ़ी आज़मी साहब का लिखा एक शेर हमसे शेयर किया:

इक ज़रा हाथ बढाये तो पकड़ ले दामन,
उसके सीने में समा जाए हमारी धड़कन,
इतनी कुरबत है तो फिर फासला इतना क्यों है???

चाहे जो भी...लेकिन हमारी पिछली महफ़िल की शान रहीं सीमा जी। सीमा जी, आपने तो दिल खुश कर दिया। ये रहे आपके शेर:

तुम गुलसितां से आए ज़िक्र खिज़ां हिलाए,
हमने कफ़स में देखी फासले बहार बरसों

तकरार से फासले नहीं मिटते
जब भी शिकवे हुये हम हम ना रहे

लिख मैंने कैसे, तय किये ये फासले
है कैसे गुजरा, मेर ये सफर लिख दे

सीमा जी के बाद महफ़िल में नज़र आए पिछले महफ़िल के मेजबान(पिछली गज़ल उन्हीं की पसंद की थी ना!)। शरद जी ने एक स्वरचित शेर महफ़िल में पेश किया:

मेरे बच्चे जब अधिक पढ़ते गए
फासले तब और भी बढ़ते गए।

मंजु जी, हमारी यह कोशिश रहती है कि हम उन फ़नकारों से लोगों को अवगत कराएँ,जिन्हें लोग कम जानते हैं या फिर भूलते जा रहे हैं। इसीलिए शायरों से हमें कुछ ज्यादा हीं प्यार रहता है। वैसे आपका शेर हमें पसंद आया:

रात-दिन के फासलें की तरह है वो,
कभी अमावस्या है तो कभी पूर्णिमा की तरह है वो !

सुमित जी, आपने भी कमाल के शेर कहे। वैसे "अदीब" का मतलब होता है- "शायर"। यह रहा आपका शेर:

फाँसला इस कदर नसीब ना हो,
पास रहकर भी तू करीब ना हो।

शन्नो जी, देर आयद , दुरूस्त आयद। अरे आपके पास शेरों की किताब नहीं तो क्या हुआ, शायराना मिज़ाज़ तो है, हमारी महफ़िल के लिए वही काफ़ी है। आपने यह शेर पेश किया:

अच्छा लगा यह आपका अंदाज़ शायराना
फासले थे कुछ ऐसे न महफ़िल में हुआ आना.

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, July 17, 2009

तेरी आवाज़ आ रही है अभी.... महफ़िल-ए-शाइर और "नासिर"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३०

"महफ़िल-ए-गज़ल" के २५वें वसंत (यूँ तो वसंत साल में एक बार हीं आता है, लेकिन हम ने उसे हफ़्ते में दो बार आने को विवश कर दिया है) पर हमने कुछ नया करने का सोचा, सोचा कि क्यों ना अपनी और अपने पाठकों की याद्दाश्त की मालिश की जाए। गौरतलब है कि हम हर बार एक ऐसी गज़ल या गैर फिल्मी नज़्म लेकर हाज़िर होते हैं, जिसे जमाना भुला चुका है या फिर भुलाता जा रहा है। आज कल नए-नए वाद्ययंत्रों की बाढ-सी आ गई है और उस बाढ में सच्चे और अच्छे शब्द गुम होते जा रहे हैं। इन्हीं शब्दों, इन्हीं लफ़्ज़ों को हमें संभाल कर रखना है। तो फिर गज़लों से बढिया खजाना कहाँ मिलेगा, जहाँ शुद्ध संगीत भी है, पाक गायन भी है तो बेमिसाल लफ़्ज़ भी हैं। इसलिए हमारा यह फ़र्ज़ बनता है कि ऐसी गज़लों, ऐसी नज़्मों को न सिर्फ़ एक बार सुने बल्कि बार-बार सुनते रहें। फिर जिन फ़नकारों ने इन गज़लों की रचना की है,उनके बारें में जानना भी तो ज़रूरी है और बस जानना हीं नहीं उन्हें याद रखना भी। अब हम तो एक कड़ी में एक फ़नकार के बारे में बता देते हैं और फिर आगे बढ जाते हैं। अगर हमें उन फ़नकारों को याद रखना है तो कुछ अंतराल पर हमें पीछे भी मुड़ना होगा और बीती कड़ियों की सैर करनी होगी। यही एक वज़ह थी कि हमने २५वें एपिसोड से पिछले एपिसोड तक प्रश्नों की श्रृंखला चलाई थी और यकीन मानिए, उन प्रश्नों का हमें बहुत फ़ायदा हुआ..यकीनन आप सबको भी असर तो दिखा हीं होगा। तो इन पाँच कड़ियों के बीत जाने के बाद हमें अपना विजेता भी मिल गया है। हमने तो यह सोचा था कि विजेता एक होगा, जिससे हम तीन गज़लों की माँग करेंगे और उन गज़लों को ३१वें एपिसोड से ३५वें एपिसोड के बीच में सुनवाएँगे। लेकिन यहाँ तो दो-दो लोग जीत गए हैं। इसलिए हम अपनी पुरानी बात पर अडिग तो नहीं रह सकते,लेकिन वादा भी तो नहीं तोड़ा जा सकता। सारी स्थिति को देखते हुए, हमने यह निर्णय लिया है कि "शरद" जी और "दिशा" जी हमें अपनी पसंद की पाँच-पाँच गज़लों का नाम(हो सके तो एलबम का नाम या फिर फ़नकार का नाम भी) भेज दें, हाँ ध्यान यह रखें कि उन गज़लों में कुछ न कुछ भिन्नता जरूर हो ताकि हर एपिसोड में हमें एक हीं बात न लिखनी पड़े(आखिर उन गज़लों के बारे में हमें जानकारी भी तो देनी है) , फिर उन ५-५ गज़लों में से हम ३-३ उन गज़लों का चुनाव करेंगे जो आसानी से हमें उपलब्ध हो जाएँ और इस तरह जमा हुए इन ६ गज़लों को ३२वें से ४०वें एपिसोड के बीच महफ़िल-ए-गज़ल में पेश करेंगे। तो हम अपने दोनों विजेताओं से यह दरख्वास्त करते हैं कि वे गज़लों (या कोई भी गैर फ़िल्मी नज़्म) की फ़ेहरिश्त hindyugm@gmail.com पर जितनी जल्दी हो सके, मेल कर दें। गज़लें किस क्रम में पोस्ट की जाएँगी, इसका निर्णय पूर्णत: हमारा होगा, ताकि कुछ न कुछ तो सरप्राइज एलिमेंट बचा रहे।

चलिए अब हम अपने पुराने रंग में वापस आते हैं और एक नई गज़ल से अपनी इस महफ़िल को सजाते हैं। आज की गज़ल को हमने जिस एलबम से लिया है उसका नाम है "चंद गज़लें, चंद गीत"। इस एलबम में एक से बढकर एक गज़लें हैं,लेकिन हमने उस गज़ल का चुनाव किया है जो औरों-सी होकर भी औरों से अलग है। ऐसा क्यों है, वह आप खुद समझ जाएँगे। आज की गज़ल को अगर आप गुनगुनाएँगे तो आपको कुछ सालों पहले रीलिज हुई एक हिंदी फ़िल्म "दिल का रिश्ता" के शीर्षक गाने की याद आ जाएगी- "दिल का रिश्ता बड़ा ही प्यारा है,कितना पागल ये दिल हमारा है।" ना ना- हम अर्थ में समानता की बात नहीं कर रहे, बल्कि इस गाने की धुन उस गज़ल से हू-ब-हू मिलती है, आखिर मिले भी क्यों ना, जब उसी से उठाई हुई है। नदीम-श्रवण साहबान पाकिस्तानी गीतों और गज़लों के जबर्दस्त प्रशंसक रहे हैं और इसका प्रमाण उनके कई सारे गानों की धुनों में छुपा है। मसलन "मुसर्रत नज़ीर" के "चले तो कट हीं जाएगा सफ़र" को इन दोनों ने बना दिया "तुम्हें अपना बनाने की कसम खाई है", "नुसरत" साहब के "सानु एक पल चैन न आए", "किस्सेन दा यार न विछड़े" और "किन्ना सोणा" को इन दोनों फ़नकारों ने क्रमश: "मुझे एक पल चैन न आए", "किसी का यार न बिछड़े" और "कितना प्यारा तुझे रब ने बनाया" का रूप दे दिया। गज़लों से तो इन दोनों का खासा लगाव रहा है। मल्लिका-ए-तरन्नुम "नूरजहां" के "वो मेरा हो न सका", "बेगम अख्तर" के "ऐ मोहब्बत तेरे अंज़ाम पर रोना आया" और "मेहदी हसन" साहब के "ना कोई गिला" को नए रूप में जब ढाला गया तो ये बन गए क्रमश: "दिल मेरा तोड़ दिया उसने" , "कितना प्यारा है ये चेहरा जिसपे हम मरते हैं" और "गा रहा हूँ इस महफ़िल में" । इतनी बेदर्दी से इन गज़लों का दोहन किया गया है कि सुन कर शर्म आती है, लेकिन क्या कीजिएगा पैसों की इस दुनिया में ईमानदारी का क्या मोल। और पहले तो छुप-छुपकर चोरियाँ होती थीं, लेकिन आज तो संगीतकार खुले-आम कहते हैं कि हम नहीं चाहते थे कि किसी अंग्रेजी गाने से धुन की नकल करें,क्योंकि लोगों ने वह गाना सुना होता है, इसलिए हमने यह धुन तुर्की से उठाई है तो यह धुन स्पेन से। वैसे हम भी कहाँ उलझ गए, आज की गज़ल की बात करते-करते न जाने किस भावावेश में बह निकले। जिस गज़ल को लेकर हम प्रस्तुत हुए हैं उसे अपनी आवाज़ से मक़बूल किया है "गुलाम अली" साहब ने। शायद संगीत भी उन्हीं का है। वैसे "गुलाम अली" साहब पर एक कड़ी लेकर हम पहले हीं हाज़िर हो चुके हैं, इसलिए आज की कड़ी को गज़लगो के सुपूर्द करते हैं।

८ दिसम्बर १९२५ को अंबाला में जन्मे "सैय्यद नासिर रज़ा काज़मी" छोटी बहर की गज़लों के बेताज़ बादशाह माने जाते हैं। १९४० में इन्होंने जनाब "अख्तर शेरानी" के अंदाज़ में रूमानी कविताएँ और नज़्मों की रचना शुरू की। आगे चलकर जनाब "हाफ़िज़ होशियारपुरी"(इनकी बात हमने महफ़िल-ए-गज़ल की १८वीं कड़ी में की थी, जब हमने इक़बाल बानो की आवाज़ में "मोहब्बत करने वाले कम न होंगे" सुनवाया था) की शागिर्दगी में इन्होंने गज़ल-लेखन शुरू किया। "मीर तक़ी मीर" की गज़लों का इन पर गहरा असर था, इसलिए इनकी गज़लों में "अहसास-ए-महरूमी" को आसानी से महसूस किया जा सकता है। "हाफ़िज़" साहब का प्रकृति प्रेम इनकी लेखनी में भी उतर गया था। "याद के बे-निशां जज़ीरों से, तेरी आवाज़ आ रही है अभी"- इस पंक्ति में "जज़ीरों" का प्रयोग देखते हीं बनता है। "नासिर काज़मी" के बारे में कहा जाता है कि ये गज़लों को न सिर्फ़ कलम और कागज़ देते थे, बल्कि अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा भी उनके साथ पिन कर देते थे। इन्होंने ज़िन्दगी की छोटी-छोटी अनुभूतियों को ग़ज़ल का विषय बनाया और अपनी अनुभव सम्पदा से उसे समृद्ध करते हुए एक ऐसे नये रास्ते का निर्माण किया, जिस पर आज एक बड़ा काफ़िला रवाँ-दवाँ है। इनके जीवन काल में इनका सिर्फ़ एक ही ग़ज़ल संग्रह ‘बर्ग-ए-नै’ सन् १९५२ में प्रकाशित हो सका, जिसकी ग़ज़लों ने सभी का ध्यान आकृष्ट किया। इनका दूसरा और महत्वपूर्ण संग्रह ‘दीवान’ इनके निधन के कुछ महीनों बाद प्रकाशित हुआ, जिसकी ग़ज़लों ने उर्दू जगत में धूम मचा दी। एक ही जमीन में कही गयी इनकी पच्चीस ग़ज़लों का संग्रह ‘पहली बारिश’ भी इनकी मृत्यु के बाद ही सामने आया। इन्होंने न सिर्फ़ गज़लें लिखीं बल्कि एक ऐसा दौर भी आया, जब गज़लों से इन्हें हल्की विरक्ति-सी हो गई । उस दौरान इन्होंने "सुर की छाया" नामक एक नाटिका की रचना की, जो पूरी की पूरी छंद में थी। गज़लों और नाटिकाओं के अलावा इन्हें दूसरी भाषाओं की पुस्तकों का तर्ज़ुमा करना भी पसंद था। "वाल्ट विटमैन" के "क्रासिंग ब्रुकलिन फ़ेरि" का अनुवाद "ब्रुकलिन घाट के पार" उर्दू भाषा की एक मास्टरपिश मानी जाती है। इनके बारे में बातें करने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन आज बस इतना हीं। चलिए आगे बढने से पहले, इन्हीं का लिखा एक शेर देख लेते हैं, जिन्हें कितनों ने "गुलाम अली" साहब की आवाज़ में कई बार सुना होगा:

अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ।


गुलाम अली साहब की आवाज़ की मिठास को ज्यादा देर तक थामे रखना संभव न होगा। इसलिए ज़रा भी देर किए बिना आज की गज़ल से मुखातिब होते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

दिल में इक लहर-सी उठी है अभी,
कोई ताज़ा हवा चली है अभी।

शोर बरपा है खाना-ए-दिल में,
कोई दीवार-सी गिरी है अभी।

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी,
और ये चोट भी नई है अभी।

याद के बे-निशां जज़ीरों से,
तेरी आवाज़ आ रही है अभी।

शहर की बे-चराग़ गलियों में,
ज़िंदगी तुझको ढूँढती है अभी।


कुछ शेर जो इस गज़ल में नहीं हैं:

सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी

भरी दुनिया में दिल नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमीं है अभी

वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कहीं नहीं कोई ___, धुंआ धुंआ है फिज़ा,
खुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो...

आपके विकल्प हैं -
a) दीपक, b) चाँद, c) सूरज, d) रोशनी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "वहशत" औए शेर कुछ यूं था -

तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया...

सबसे पहले सही जवाब दिया दिशा जी ने, बधाई हो. दिशा जी ने कुछ शेर भी फरमाए -

वहशत इस कदर इंसा पर छायी है
कि जर्रे जर्रे में दहशत समायी है
कहाँ से लाऊँ अब मैं अमन का पानी
ये मुसीबत खुद ही तो बुलायी है...

बहुत खूब दिशा जी...
शरद जी ज़रा से देरी से आये पर इस शेर को सुनकर समां बाँध दिया आपने -

ग़म मुझे, हसरत मुझे, वहशत मुझे, सौदा मुझे,
एक दिल देके खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे ।

वाह...
शमिख जी आपने बिलकुल सही पहचाना, साहिर साहब को सलाम...वाह क्या ग़ज़ल याद दिलाई आपने ख़ास कर ये शेर तो लाजवाब है -

फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं

मंजू जी ने अपने शेर में महफिल-ए-ग़ज़ल की ही तारीफ कर डाली, शुक्रिया आपका...और अंत में हम आपको छोड़ते हैं वहशत शब्द पर कहे मनु जी के बड़े अंकल और हम सबके चाचा ग़ालिब के इस सदाबहार शेर के साथ...

इश्क मुझको नहीं 'वहशत' ही सही
मेरी 'वहशत' तेरी शोहरत ही सही...

वाह....मनु जी आप बीच का एक एपिसोड भूल गए...अरे जनाब कहाँ रहता है आपका ध्यान आजकल.....चलिए अब आनंद लीजिये आज की महफिल का, और हमें दीजिये इजाज़त अगले मंगलवार तक.खुदा हाफिज़.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, June 5, 2009

तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे..... पेश है ऐसी हीं एक महफ़िल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१८

मुमकिन है कि मेरी इस बात पर कईयों की भौंहें तन जाएँ, कई सारे लोग मुझे देशभक्ति का सबक सिखाने को आतुर हो जाएँ तो कई सारे लोग इस पंक्ति से आगे हीं न पढें, लेकिन आज मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ, वह कई दिनों से मेरे सीने में दबा था और मुझे लगा कि आज का दिन हीं सबसे सटीक दिन है जिस दिन इस बात की चर्चा की जा सकती है। चूँकि हम सब संगीत के पुजारी हैं, संगीत के भक्त हैं और संगीत के देवी-देवताओं की खोज में रहा करते हैं,इसलिए जिस ओर भी हमें सुर और ताल की भनक लगती है, उसी ओर रूख कर लेते हैं। इसी संगीत की आराधना के लिए हमने महफ़िल-ए-गज़ल के इस अंक को भी सजाया है। अब इसे संयोग कहिए या फिर ऊपर वाले की कोई जानी-पहचानी साजिश कि आज की गज़ल से जो दो फ़नकार जुड़े हुए हैं,उनका हमारे मुल्क और हमारे पड़ोसी मुल्क से बड़ा हीं गहरा नाता है। और यही कारण है कि मैं कुछ लीक से हटकर कहने पर आमादा हुआ जा रहा हूँ। जब भी मैं गुलाम अली, मेहदी हसन जैसे फ़नकारों को सुनता हूँ या फिर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,अहमद फ़राज़ जैसे शायरों को पढता हूँ तो मेरे दिल से यह आह उठती है कि काश हिन्दुस्तान का बँटवारा न हुआ होता, काश दोनों मुल्क एक होते तो फिर हम बड़े हीं फ़ख्र से कहते हैं कि नु्सरत फ़तेह अली खान साहब हिन्दुस्तान की शान हैं। बँटवारे का दर्द तब और भी गहरा हो जाता है जब हमें यह मालूम हो कि अमूक शख्स को बँटवारे के दौरान या फिर उसी इर्द-गिर्द अपना सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान की ओर रूख करना पड़ा था। उस ओर से हिन्दुस्तान आने वालों पर भी यही बात लागू होती है। आज हम जिन दो फ़नकारों की बात करने जा रहे हैं, उन दोनों में एक बात खास है और वह यह कि दोनों ने हीं बँटवारे के दर्द को महसूस किया है। पहली शख्सियत एक फ़नकारा हैं जिनका जन्म पंजाब के रोहतक में हुआ था तो दूसरे शख्स एक फ़नकार, एक शायर हैं जिनका जन्म पंजाब के हीं होशियारपुर में हुआ था और दोनों ने हीं पाकिस्तान में अपनी अंतिम साँसें लीं। चलिए उनके बारे में विस्तार से जानकारी लेते हैं।

आज से महज़ ४४ दिन पहले यानी कि २१ अप्रैल को हीं वह बदकिस्मत घड़ी आई थी, जब हमें उस फ़नकारा को अंतिम विदाई देनी पड़ी। हम जिन फ़नकारा की बात कर रहे हैं,उन्हें कुछ लोग पाकिस्तान की "बेग़म अख्तर" भी कहा करते हैं। तो कुछ लोगों का यह भी कहना है कि "अगर नूरजहाँ ने ’मुझसे पहली-सी मोहब्बत’, मेहदी हसन ने ’गुलों में रंग भरे’ और इन फ़नकारा ने ’लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ न गाया होता " तो ’फ़ैज़’ को उतना फ़ैज़ नसीब न होता"। इन फ़नकारा ने "फ़ैज़ अहमद फ़ैज़" को जितना गाया है, उतना शायद हीं किसी और ने गाया होगा। "फ़ैज़" साहब के अलावा "अहमद फ़राज़" की गज़लों को मक़बूल करने में भी इनका बड़ा हाथ था। न जाने ऐसी कितनी हीं गज़लें हैं जो प्रसिद्धि की मुकाम पर तब हीं पहुँचीं जब उन्हें इनकी आवाज़ का सहारा मिला। ये जब तक ज़िंदा रहीं, तब तक इनका इक़बाल बुलंद रहा और हो भी क्यों न हो जब इनका नाम हीं "इक़बाल" था। जी हाँ , हम गज़ल-गायकी की अज़ीम-उस-शान शख्सियत "इक़बाल बानो" की बात कर रहे हैं और यह भी बता दें कि इनका इक़बाल हमेशा हीं बुलंद रहने वाला है। "इक़बाल" साहिबा,जिन्होंने संगीत की तालीम दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खान से ली थी, को अपने फ़न का प्रदर्शन करने का पहला मौका "आल इंडिया रेडियो" के दिल्ली स्टेशन में मिला था। यह सन् ५० के भी पहले की बात है। तब तक वह एक स्टार हो चुकी थीं। कुछ हीं महीनों में उन्हें पाकिस्तान की ओर पलायन करना पड़ा, जहाँ महज सतरह साल की उम्र में उनकी शादी एक जमींदार से कर दी गई। इसे उन्हें चाहने वालों की दुआ कहिये या फिर खुशकिस्मती कि शादी के बाद भी उनका अंदाज कमतर न हुआ और उन्होंने गाना जारी रखा। ५४ से ५९ के बीच उन्होंने लगभग छह उर्दू फिल्मों में गाने गाए, जिनमें "गुमनाम", "क़ातिल", "सरफ़रोश" प्रमुख हैं। पाकिस्तानी संगीत में बेशकिमती योगदान देने के कारण १९७४ में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें तमगा-ए-इम्तियाज़ से नवाजा। "इक़बाल" साहिबा के लिए नवाजिश और अवाम में अवाम का ओहदा ज्यादा बड़ा था और इसीलिए १९८० में जब पाकिस्तान की गद्दी पर फ़ौज़ काबिज थी और जनरल ज़िया उल हक़ का उत्पात चरम पर था, तब उन्होंने लोगों को जगाने के लिए "फ़ैज़" के क्रांतिकारी कलाम गाने शुरू कर दिए। सरकार की कठोर नीतियों और उनके गाने पर लगी पाबंदी का भी उन पर कोई असर न हुआ। ऐसी जिगर वाली थीं हमारी आज की फ़नकारा। उस पुर-असर आवाज़ की मल्लिका ने अपने पति की मौत के बाद लाहौर को अपनी कर्मभूमि की तौर पर चुना और अपनी अंतिम साँस भी वहीं ली। यह तो हुई पहली फ़नकारा की बात, अब हम आज के दूसरे फ़नकार की और रूख करते हैं।

१९१२ में "पंजाब" के होशियारपुर में जन्मे "अब्दुल हाफ़िज़ सलीम" के बारे में अंतर्जाल पर बमुश्किल हीं कोई जानकारी मौजूद है। जिससे भी पूछो, वह आपको उनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त थमाकर खुश हो जाता है और आपको भी उतने से हीं संतुष्ट होना होता है। मेरी खुशकिस्मती है कि मैं उनके बारे में इससे ज्यादा कुछ पता कर पाया हूँ। एक तो यह कि "इक़बाल" साहिबा की तरह उन्हें भी बँटवारे में पाकिस्तान जाना पड़ा था। इसके अलावा यह कि सिंध प्रांत के हैदराबाद शहर को उन्होंने अपनी कर्मभूमि की तौर पर स्वीकार किया था। वहाँ पर "रेडियो पाकिस्तान" में वे "पत्रकार" और "उद्धोषक" का फ़र्ज़ अदा करते रहे और जब "रिटायर" होने का निश्चय किया तब वे "डिप्टी डायरेक्टर जनरल" के पद को सुशोभित कर रहे थे। शायरी के शौक ने उन्हें एक तखल्लुस भी दिया था। और मेरी मानें तो शायद हीं कोई होगा, जो उन्हें उनके मूल नाम से जानता होगा। जी हाँ, शायर और शायरी के प्रशंसक उन्हें "हाफ़िज़ होशियारपुरी" के नाम से जानते हैं। अपनी जन्मस्थली से इस तरह प्यार करने के उदाहरण आज कल कम हीं मिलते हैं। "हाफ़िज़" साहब का तखल्लुस जानने के बाद शायद अब आपने भी उन्हें पहचान लिया होगा। बरसों तक "हैदराबाद" में रहने वाले "हाफ़िज़" साहब ने ६१ साल की उम्र में अपनी अंतिम साँस "कराची" में ली। उनकी गज़लें जो बेहद मक़बूल हुईं, उनमें से कुछ हैं: १)तेरी तलाश में हम जब कभी निकलते हैं, २)कुछ इस तरह से नज़र से गुजर गया कोई , ३)कहीं देखी है शायद तेरी सूरत इससे पहले भी , ४)आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोलकर देखा किए , ५)दीपक राग है चाहत अपनी काहे सुनाए तुम्हें। सारी गज़लें एक से बढकर एक हैं और उन गज़लों की तरह हीं एक और गज़ल है, जो हम आपको आज सुनाने जा रहे हैं। लेकिन उस गज़ल को सुनाने से पहले हम "हाफ़िज़" साहब का हीं एक शेर आपके सामने अर्ज करना चाहते हैं। मुलाहजा फ़रामाईयेगा:

मेरी किस्मत कि मैं इस दौर में बदनाम हुआ वरना,
वफ़ादारी थी शर्त्त-ए-आदमियत इससे पहले भी।


मुआफ़ कीजिएगा, आज कुछ ज्यादा हीं इंतज़ार करा दिया आपको। क्या करें, फ़नकार हीं कुछ ऐसे थे। वैसे आज की गज़ल के बारे में तो कुछ भी नहीं कहा। कहूँ क्या? छोड़िये, ज्यादा कहूँगा तो मज़ा चला जाएगा, इसलिए आप खुद हीं इसका लुत्फ़ उठाईये:

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे।

ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म,
ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे।

दिलों की उलझने बढती रहेंगी,
अगर कुछ मशवरे बा-हम न होंगे।

अगर तू इत्तेफ़ाक़न मिल भी जाए,
तेरी फ़ुर्कत के सदमें कम न होंगे।

"हाफ़िज़" उनसे मैं जितना बदगुमां हूँ,
वो मुझसे इस क़दर बरहम न होंगे।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

इसीलिए तो ___ है मैकदे में बहुत,
यहाँ घरों को जला कर शराब पीते हैं...


आपके विकल्प हैं -
a) बसेरा, b) अँधेरा, c) सवेरा, d) उजाला

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफ़िल का शब्द था -"तबस्सुम" और शेर कुछ यूं था -

मुझे गुस्सा दिखाया जा रहा है,
तबस्सुम को चबाया जा रहा है..

सही जवाब देकर मैदान जीता स्वप्न मंजूषा शैल जी ने, और देखिये क्या खूब शेर भी अर्ज किया उन्होंने -

वो तबस्सुम से अपना ग़म दबाये जाए है
ये कैसी ख़लिश कि सुकूँ मुझे आये जाए है...

सुमित जी और मनु जी भी आये सही जवाब के साथ और दोनों को ही याद हो आये कुछ यादगार फ़िल्मी गीत. मनु जी ने एक शेर भी फरमाया पर जहाँ बात होनी थी तबस्सुम की वहां दर्द का जिक्र क्यों मनु जी :) कुलदीप अंजुम साहब भी आये कुछ यूं फरमाते हुए -

चुरायेंगे किसी का दिल, हम शेर को चुराएं क्या
चुरायेंगे एक खुशी मुफलिसी के दरमियाँ |
मुस्कुरा रहे हैं सब, हम अभी से मुस्कुराएं क्या
मुस्कुरायेंगे कभी खुदखुशी के दरमियाँ ||

वाह वाह.....वैसे आप अपनी सामग्री हमें hindyugm@gmail.com पर भेज सकते हैं. शमिक फ़राज़ जी आपका भी जवाब जाहिर है सही है पर यहाँ की परंपरा है आप अपना या किसी अन्य शायर का कोई शेर भी याद दिलायें जिसमें वो ख़ास शब्द आता हो. अब आप सब आज की महफ़िल का आनंद लें.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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