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Wednesday, March 3, 2010

रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ.. नूरजहां की काँपती आवाज़ में मचल पड़ी ग़ालिब की ये गज़ल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७३

लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और,
तनहा गये क्यों अब रहो तनहा कोई दिन और।

ग़ालिब की ज़िंदगी बड़ी हीं तकलीफ़ में गुजरी और इस तकलीफ़ का कारण महज़ आर्थिक नहीं था। हाँ आर्थिक भी कई कारण थे, जिनका ज़िक्र हम आगे की कड़ियों में करेंगे। आज हम उस दु:ख की बात करने जा रहे हैं, जो किसी भी पिता की कमर तोड़ने के लिए काफ़ी होता है। ग़ालिब पर चिट्ठा(ब्लाग) चला रहे अनिल कान्त इस बारे में लिखते हैं:
ग़ालिब के सात बच्चे हुए पर कोई भी पंद्रह महीने से ज्यादा जीवित न रहा. पत्नी से भी वह हार्दिक सौख्य न मिला जो जीवन में मिलने वाली तमाम परेशानियों में एक बल प्रदान करे. इनकी पत्नी उमराव बेगम नवाब इलाहीबख्शखाँ 'मारुफ़’ की छोटी बेटी थीं. ग़ालिब की पत्नी की बड़ी बहन को दो बच्चे हुए जिनमें से एक ज़ैनुल आब्दीनखाँ को ग़ालिब ने गोद ले लिया था.

वह बहुत अच्छे कवि थे और 'आरिफ' उपनाम रखते थे. ग़ालिब उन्हें बहुत प्यार करते थे और उन्हें 'राहते-रूहे-नातवाँ' (दुर्बल आत्मा की शांति) कहते थे. दुर्भाग्य से वह भी भरी जवानी(३६ साल की उम्र) में मर गये. ग़ालिब के दिल पर ऐसी चोट लगी कि जिंदगी में उनका दल फिर कभी न उभरा. इस घटना से व्यथित होकर उन्होंने जो ग़ज़ल लिखी उसमें उनकी वेदना साफ़ दिखाई देती है. कुछ शेर :

आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ,
माना कि नहीं आज से अच्छा कोई दिन और।
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे,
क्या ख़ूब? क़यामत का है गोया कोई दिन और।
दिल पर पड़ती और पड़ चुकी कई सारी चोटों की वज़ह से ग़ालिब अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव के आते-आते अपनी मौत की दुआएँ करने लगे थे। हर साल अपनी मौत की तारीख निकाला करते थे और यह देखिए कि हर साल वह तारीख गलत साबित हो जाती थी। एक बार ऐसी हीं किसी तारीख का ज़िक्र जब उन्होंने अपने एक शागिर्द से किया तो शागिर्द के मुँह से बरबस हीं यह निकल पड़ा कि "इंशा अल्लाह, यह तारीख भी ग़लत साबित होगी।" लाख ग़मों में गर्त होने के बावजूद ग़ालिब अपने मजाकिया लहज़े से कहाँ बाज़ आने वाले थे। फिर ग़ालिब ने भी कह डाला कि "देखो साहब! तुम ऐसी फ़ाल मुँह से न निकालो। अगर यह तारीख ग़लत साबित हुई तो मैं सिर फोड़कर मर जाउँगा।" इसे कहते हैं मौत में ज़िंदगी के मज़े लेना या फिर मौत के मज़े लेना। अब जबकि मौत की हीं बात निकल पड़ी है तो क्यों न एक और वाकये का ज़िक्र कर दिया जाए। एक बार जब दिल्ली में महामारी पड़ी तो ग़ालिब के मित्र मीर मेहदी हसन ’मज़रूह’ ने उनका हाल जानने के लिए उन्हें खत लिखा। ग़ालिब ने महामारी की बात तो की लेकिन महामारी को महामारी मानने से इंकार करते हुए यह जवाब भेजा कि "भई, कैसी वबा? जब एक सत्तर बरस के बुड्ढे और सत्तर बरस की बुढ़िया को न मार सकी।" जवाब पढकर मज़रूह लाजवाब हो गए। यह थी ग़ालिब की अदा जो गमों को भी सकते में डाल देती थी कि भाई हमने किससे पंगा लिया है।

ग़ालिब ने अपने इस हालात पर कई सारे शेर कहे हैं। अपनी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में ग़ालिब अपने एक शेर का यह मिसरा गुनगुनाया करते थे:
ऐ मर्गे-नागहाँ ! तुझे क्या इंतज़ार है ?

ग़ालिब के गमों की बातें तो हो गईं, अब क्यों न ग़ालिब की हाज़िर-जवाबी की बात कर ली जाए। ग़ालिब अव्वल दर्ज़े के हाज़िर-जवाब थे। मौके को परखना और संभालना उन्हें खूब आता था और संभालते वो भी कुछ इस तरह थे कि सामने वाले को इसकी भनक भी नहीं लगती थी। इस बारे में उस्ताद ज़ौक़ से जुड़ा एक किस्सा हम आपसे बाँटना चाहेंगे जिसे गुलज़ार साहब ने बड़ी हीं खूबसूरती से अपने सीरियल "मिर्ज़ा ग़ालिब" में पेश किया है। यह तो सबको पता है कि ग़ालिब और ज़ौक़ में एक अनबन-सी ठनी रहती थी। तो हुआ यूँ कि:

उस्ताद ज़ौक़ की पालकी मिर्ज़ा के पास गुज़री। उनके मुलाज़िम पालकी के पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। ग़ालिब ने पालकी देखकर तंज़ किया।

हुआ है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता।

ग़ालिब के पास खड़े दो-एक अशख़ास ने दाद दी। "वाह-वाह... मिर्ज़ा मुकर्रर- इरशाद फ़रायें।" पास खड़े लोगों ने मिसरा दोहराया।

उस्ताद ज़ौक़ जब अपनी हवेली पहुँचे तो वे ग़ालिब की फ़िकरेबाज़ी पर काफ़ी नाराज़ थे। उनके सारे शागिर्दों ने अपने-अपने अंदाज़ में नाराज़गी ज़ाहिर की। बातचीत के बाद यह निर्णय लिया गया कि इस वाकये का ज़िक्र बहादुरशाह ज़फ़र से की जाए और किसी भी तरह ग़ालिब को किले में बुलाया जाए। एक शागिर्द ने कहा - "आती जुमेरात मुशायरा है।" दूसरे ने कहा- "बुलवा लीजिए किले में। मट्टी पलीद करके भेजेंगे।" आखिरकार ग़ालिब को दावतनामा भेजा गया।

कि़ले के अंदर- मुशायरे की शाम थी। शायरों में ज़ौक़ के बग़ल में वली और ज़फ़र, ग़ालिब, मुफ़ती वग़ैरह बैठे थे। ज़फ़र ने मुशायरा शुरू होने से पहले हाज़रीन की तरफ़ देखकर कहा -
"हम मश्कुर हैं उन तमाम शोरा और उन सुख़नवर हज़रात के जो आज के मुशायरे में शरीक हो रहे हैं। लेकिन मुशायरे के इफ़तता होने से पहले हम एक बात वाज़य कर देना चाहते हैं कि कुछ शोरा हज़रात शायद हमारे उस्ताद शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ से नालां हैं और सरेराह उनपर जुमले कसते हैं, जो उनके अपने वक़ार को ज़ेब नहीं होता। हम चाहते हैं कि वह ऐसा न करें और आइंदा बाहमी आपसी आदाब-ओ इख़लाक़ की पाबंदी में रहें।"

ग़ालिब समझ गए कि बात किसकी हो रही है। ’यास’ ने सामने आकर ग़ालिब पर वार किया - "मिर्ज़ा नौशा ने सरेराह उस्ताद की शान में जुमला कसा और कहा।" सभी ग़ालिब की तरह देखने लगे। आज़रदा ने पूछा - "क्या कहा.... " ’यास’ ने वह मिसरा दुहरा दिया।

ज़फ़र ने सीधे ग़ालिब से मुख़ातिब होकर पूछा- "क्या यह सच है मिर्ज़ा नौशा?"
ग़ालिब ने इक़बाले जुर्म किया- "जी हुजूर, सच है| मेरी गज़ल के मक़ता का मिसरा-उला(पहली पंक्ति) है।" नाज़रीन चौकन्न हो गए।
आज़रदा ने पूछा- "मक़्ता इरशाद फ़रमायेंगे आप?"

ग़ालिब ने अबु ज़फ़र की तरफ़ देखा, एक लंबी साँस ली और शेर पूरा किया-

वगरना शहर में ’ग़ालिब’ की आबरू क्या है।

अब याद के चौंकने की बारी थी। आज़रदा ने बेअख्तियार दाद दी। ज़फ़र ने ज़ौक़ की तरफ़ देखा। ज़ौक़ ने बात आगे बढाई - "अगर मक़्ता इतना ख़ूबसूरत है तो पूरी गज़ल क्या होगी, सुनी जाए।"
ज़फ़र ने ग़ालिब से गुजारिश की - "मिर्ज़ा अगर ज़हमत न हो तो पूरी गज़ल सुनाएँ। आज के मुशायरे का आगाज इसी गज़ल से किया जाए।"
रावी ने एलान किया- "शमा महफ़िल असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब के सामने लाई जाती है।"

मिर्ज़ा ने जेब टटोली, काग़ज़ निकालकर उँगलियों में रखा और तरन्नुम से अपनी गज़ल पेश की-
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है।

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख से हीं न टपका तो फिर लहू क्या है।


मुशायरे में नई जान आ गई। चारों तरफ़ मिर्ज़ा ग़ालिब की वाह-वाह होने लगी} ख़ुद अबु जफ़र भी दाद देते रहे। ज़ौक़ भी इस शेर पर दाद दिये बगैर न रह सके।
मुफ़ती सदरूद्दीन ग़ालिब के पास हीं बैठे थे। उन्होंने झुककर ग़ालिब के सामने काग़ज़ पर लिखी गज़ल को देखा। काग़ज़ बिलकुल कोरा। उधर नाज़रीन वाह-वाह कर रहे थे। मुकर्रर-मुकर्रर... की आवाज़ें आ रहीं थीं।

यूँ हीं नहीं लोग ग़ालिब के अंदाज़-ए-बयाँ की कद्र करते हैं, मिसालें देते हैं। अगर आपको अब तक यकीन न आया हो तो इन दो शेरों पर जरा गौर कर लें:

मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती


ग़ालिब के बारे में आज बहुत कुछ कहा और बहुत कुछ सुना और अब महफ़िल-ए-गज़ल की रवायतों को मद्देनज़र रखते हुए ग़ालिब की गज़ल सुनने का वक़्त हो चला है। आज की गज़ल जिस फ़नकारा की आवाज़ में है, वो किसी भी नाम की मोहताज़ नहीं हैं। हम इनके ऊपर पहले भी एक कड़ी पेश की थी जिसमें हमने इन्हें तफ़शील से जाना था। जी हाँ, आपने सही पहचाना हम मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की बात कर रहे हैं। तो लीजिए पेश है नूरजहाँ की आवाज़ में यह गज़ल जिसे हमने उनके एलबम "ज़मीन" से लिया है:

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आये क्यूँ
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं ____ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफ़िल में जिन श्रोताओं ने हिस्सा लिया उन सब का आभार, आज हम समय की कमी के चलते सब के नाम के साथ चर्चा नहीं कर पा रहे हैं, माफ़ी चाहेंगें, पर अगली बार दुगनी बातचीत होगी ये वादा है

खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Sunday, April 5, 2009

निगाहें मिलाने को जी चाहता है...एक श्रेष्ठ फ़िल्मी कव्वाली

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 43

हाँ तक फिल्मी क़व्वालियों का सवाल है, तो फिल्म संगीत में क़व्वाली को लोकप्रिय बनाने में संगीतकार रोशन का महत्वपूर्ण और सराहनीय योगदान रहा है. यूँ तो उनसे पहले भी फिल्मों में कई क़व्वालियाँ आईं, लेकिन उनमें फिल्मी रंग की ज़रा कमी सी थी जिसकी वजह से वो आम जनता में लोकप्रिय तो हुए लेकिन वो मुकाम हासिल ना कर सके जो दूसरे साधारण गीतों ने किये. रोशन ने क़व्वालियों में वो फिल्मी अंदाज़, वो फिल्मी रंग भरा जो सुननेवालों के दिलों पर ऐसा चढा कि आज तक उतरने का नाम नहीं लेता. हुआ यूँ कि एक बार रोशन ने पाकिस्तान में एक क़व्वाली सुन ली "यह इश्क़ इश्क़ है". यह उन्हे इतनी पसंद आई कि अनुमति लेकर उन्होने इस क़व्वाली को अपनी अगली फिल्म "बरसात की रात" में शामिल कर लिया. यह क़व्वाली इतना लोकप्रिय हुई कि अगली फिल्म "दिल ही तो है" में निर्माता ने उनसे एक और ऐसी ही क़व्वाली की माँग कर बैठे. और एक बार फिर से रोशन ने अपने इस हुनर का जलवा बिखेरा "निगाहें मिलाने को जी चाहता है" जैसी क़व्वाली बनाकर. जी हाँ, आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में सुनिए यही मशहूर क़व्वाली.

फिल्म "दिल ही तो है" बनी थी सन् 1963 में. बी एल रावल निर्मित और सी एल रावल और पी एल संतोषी निर्देशित इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे राज कपूर और नूतन. इस फिल्म का संगीत बेहद मक़बूल हुआ और मन्ना डे का गाया "लागा चुनरी में दाग" तो एक मील का पत्थर है इस गीत से जुडे हर एक कलाकार के संगीत सफ़र की. आशा भोंसले और साथियों का गाया "निगाहें मिलाने को जी चाहता है" एक मशहूर क़व्वाली के रूप में आज भी याद किया जाता है. इस क़व्वाली को लिखा था साहिर लुधियानवी ने, जिन्होने बरसात की रात की क़व्वाली भी लिखी थी. फिल्म "दिल ही तो है" की इस क़व्वाली के फ़िल्मांकन की अगर हम बात करें तो नूतन ने अपना बहुत ही अलग और खूबसूरत अंदाज़ इसमें पेश किया है. नूतन नृत्यांगना नहीं थी और ना ही इस तरह के पात्र उन्होने निभाए थे. बावजूद इसके, उन्होने बहुत ही अच्छे तरीके से इस जमीला बानो के चरित्र को निभाया जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया. अब शायद आपका भी "जी चाह रहा" होगा इस क़व्वाली को सुनने का, तो पेश-ए-खिदमत है...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सी रामचंद्र के संगीत में किशोर की आवाज़.
२. कमर जलालाबादी ने बोल लिखे हैं और परदे पर किशोर कुमार ने निभाया है गीत को.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द से -"मुखड़े पे..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पारुल जब भी आती है बाजी मार ले जाती है, मनु और नीरज जी आप सब को भी बधाई, सही कहा आपने रोशन साहब हिंदी फिल्म संगीत के कव्वाली किंग हैं. आचार्य जी आशा के कुछ गीत ऐसे हैं जिन्हें उनके आलावा कोई दूसरा गा ही नहीं सकता.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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