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Saturday, June 13, 2009

चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे...अमर कर दिया है रफी साहब ने इस गीत को अपनी आवाज़ से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 110

न् १९६४ की फ़िल्म 'दोस्ती' संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के करीयर की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म रही है। सत्येन बोस निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुधीर कुमार और सुशील कुमार जिन्होने इस फ़िल्म में दो अपाहिज दोस्तों के किरदार अदा किये थे। इस फ़िल्म का लता मंगेशकर का गाया एकमात्र गीत हम आपको इस शृंखला में पहले ही सुनवा चुके हैं। फ़िल्म के बाक़ी सभी गीत (मेरे ख़याल से ६ में से ५ गीत) रफ़ी साहब की एकल आवाज़ मे हैं। "जानेवालों ज़रा मुड़के देखो मुझे, एक इंसान हूँ मैं तुम्हारी तरह", "कोई जब राह न पाये, मेरे संग आये और पग पग दीप जलाये, मेरी दोस्ती मेरा प्यार", "राही मनवा दुख की चिंता क्युं सताती है, दुख तो अपना साथी है", "मेरा तो जो भी क़दम है तुम्हारी राहों में है" जैसे गीत ज़ुबाँ ज़ुबाँ पर चढ़ गये थे, लेकिन सबसे ज़्यादा जिस गीत को ख्याती मिली थी वह गीत था "चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी कभी अब नाम को तेरे, आवाज़ मैं न दूँगा", और यही गीत आज आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। कहा जाता है कि शुरु में यह गीत लताजी गाने वाली थीं और मजरूह साहब ने बोल भी नायिका की दृष्टि से लिखे हुए थे। लेकिन गीत की धुन सभी को इतनी अच्छी लगी कि इस गीत को फ़िल्म के नायक पर फ़िल्माने का निर्णय लिया गया क्यूंकि यह नायक प्रधान फ़िल्म थी। लता का स्वर तो इस गाने मे नहीं गूँज पाया लेकिन रफ़ी साहब की आवाज़ कमाल कर गयी।

प्यारेलाल ने एक बार कहा था कि १९६३ में प्रदर्शित उनकी पहली कामयाब फ़िल्म 'पारसमणि' के लिए उन्हे कुछ ४००० रूपए मिले थे, लेकिन उसके अगले ही साल आयी फ़िल्म 'दोस्ती' के लिए उन्होने लिया था १०,००० रूपए, जो उन दिनों के हिसाब से काफ़ी बड़ी रकम थी। यह तो आपको पता ही होगा दोस्तों कि फ़िल्म 'दोस्ती' के लिये लक्ष्मी-प्यारे को उस साल के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार मिला था। लेकिन इस पुरस्कार को पाने के लिए उन्होने क्या किया था, यह आप पढ़िये ख़ुद प्यारेलालजी के ही शब्दों में, विविध भारती के सौजन्य से - "१०,००० रूपए हमने लिया था, और फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड के लिए ६५,००० रुपयों का हमने लोन लिया था। फ़िल्म-फ़ेयर में वो भरने के लिए, फ़िल्म-फ़ेयर के फ़ार्म भरने के लिए ६५,००० रूपए हमने लगाये। फ़िल्म-फ़ेयर की एक कापी ख़रीदनी पड़ती थी, उसमें एक फ़ार्म होता था, उसमें आपको 'बेस्ट म्युज़िक' के अंदर अपना नाम लिखना पड़ता था। यह उस ज़माने में होता था, वही आज भी चल रहा है। इसमें कोई बुरी बात नहीं है, यह 'बिज़नस' है, जब तक आप कुछ करेंगे नहीं तो 'बिज़नस' चलेगा नहीं। आप बहुत सत चलेंगे तो नहीं चल पायेंगे। तो हमने फ़िल्म-फ़ेयर की कापी लेकर 'हीरो', 'हीरोइन', 'डायरेक्टर', सब ख़रीद लिए, रकम तो मुझे याद नहीं लेकिन लाख दो लाख रूपया होगा। तो हमने, मान लीजिये २५,००० फ़िल्म-फ़ेयर की प्रतियाँ ख़रीदी, उसमें हर प्रति में एक फ़ार्म है, तो सब में 'बेस्ट म्युज़िक डिरेक्टर' में अपना नाम लिख कर भेज दिया। वैसे ही 'हीरो' के लिए, 'डिरेक्टर' के लिए। इसमें फ़ायदा कुछ नहीं है, बस हमको शौक था।" तो देखा दोस्तों, प्यारेजी ने किस इमानदारी से यह बात पूरे देश की जनता को बता दी। आपको बता दें कि उस साल प्रतियोगिता में मदन मोहन की 'वो कौन थी' और शंकर जयकिशन का 'संगम' इसी पुरस्कार की दौड़ में शामिल थे। लेकिन इसमें भी कोई शक़ नहीं कि 'दोस्ती' के गीत भी यह पुरस्कार जीतने के उतने ही क़ाबिल थे जितने कि इन दोनों फ़िल्मों के गीत। तो सुनते हैं अब यह गीत और उससे पहले आपको यह भी बता दें कि रफ़ी और मजरूह साहब ने भी इसी फ़िल्म के लिए फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार जीते थे।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कल विश्व बाल श्रम दिवस था, ये गीत बच्चों पर फिल्माए गए बेहतरीन गीतों में एक है.
२. गीतकार शैलेन्द्र ने इस फिल्म में एक छोटी सी भूमिका भी की थी.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"भीख".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी एक बार फिर बधाई, लगता है आप इतने आगे निकल जायेंगें कि दूसरों के लिए आपको पकड़ पाना मुश्किल हो जायेगा, आपके अंक हो गए बढ़ कर -१६. मनु जी, मंजू जी, तपन जी और शमिख जी सबके जवाब सही पर हमेशा की तरह इस बार भी आप सब ज़रा सा पिछड़ गए.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Friday, March 6, 2009

गुडिया हमसे रूठी रहोगी...कब तक न हंसोगी...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 15

दोस्तों, कभी आप ने किसी रूठे हुए बच्चे को मनाया है? बच्चे जितनी जल्दी रूठ जाते हैं उतनी ही जल्दी उन्हे मना भी सकते हैं. मन के बहुत ही सच्चे होते हैं यह मासूम बच्चे. निदा फाजली ने ठीक ही कहा है कि "घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए". जी हाँ, रोते हुए बच्चे को हंसाना किसी इबादत से कम नहीं. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' के लिए हमने एक ऐसा ही गीत चुना है जिसमें एक छोटी सी नन्ही सी गुडिया को हंसाने की कोशिश की जा रही है.

सन 1964 में एक फिल्म आई थी दोस्ती.सत्यन बोस ने इस फिल्म का निर्देशन किया था और सुधीर कुमार और सुशील कुमार ने इस फिल्म में दो अपाहिज किरदार निभाए थे जो एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे. संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और गायक मोहम्मद रफ़ी को इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया था. रफ़ी साहब ने इस फिल्म में कुछ ऐसे गीत गाए हैं जो कालजयी बनकर रह गये हैं. "चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे", "जानेवालों ज़रा मुड्के देखो मुझे", "मेरी दोस्ती मेरा प्यार", "मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राह में है", और "राही मनवा दुख की चिंता क्यूँ सताती है" जैसे गाने आज भी कहीं ना कहीं से सुनने को मिल जाते हैं. लेकिन इस फिल्म में लता मंगेशकर ने भी एक गीत गाया था जिसे आज हम इस श्रृंखला में शामिल कर रहे हैं. राग पहाड़ी पर आधारित यह प्यारा सा गीत "गुडिया हमसे रूठी रहोगी" सुनकर आपके चेहरे पर भी खुशी की किरण लहरा जाएगी ऐसा हम उम्मीद करते हैं. इस गाने को सुनते हुए आप में से कुछ लोगों को शायद "मिलन" फिल्म का वो गीत भी याद आ जाए "गुज़र जाए सुख से तेरी दुख भरी रतिया", भाई मुझे तो इन दोनो गीतों की धुनों में थोड़ी बहुत समानता महसूस होती है. तो लीजिए आप भी सुनिए और अगर आप के घर में छोटी सी नन्ही सी गुडिया रानी है तो अगली बार जब वो रूठ जाए तो इसी गाने से उसे मनाईएगा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. पी एल संतोषी के बोल और सी रामचंद्र का संगीत.
२. सारंगी वादक पंडित राम नारायण का नाम जुडा है इस गीत से.
३. लता की मधुर आवाज़ है इस दर्द भरे गीत में.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी ने लडखडाते हुए ही सही पर जवाब दिया. उज्जवल ने भी हामी भरी. जी हाँ जवाब सही है...बधाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, December 10, 2008

वो जब याद आए बहुत याद आए...

जब सोनू निगम ने जलाए गीतों के दीप एल पी के लिए

हिन्दी फ़िल्म संगीत के सबसे सफलतम संगीत जोड़ी के लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल का एक साधारण स्तर से उठ कर इतने बड़े मुकाम तक पहुँचने की दास्तान भी कम दिलचस्प नही है. दोनों लगभग १०-१२ साल के रहे होंगे जब मंगेशकर परिवार द्वारा बच्चों के लिए चलाये जाने वाले संगीत संस्थान, सुरील कला केन्द्र में वो पहली बार एक दूसरे के करीब आए (हालांकि वो एक स्टूडियो में पहले भी मिल चुके थे). दरअसल लक्ष्मीकांत को एक कंसर्ट में मँडोलिन बजाते देख प्रभावित हुई लता दी ने ही उन्हें इस संस्था में दाखिल करवाया था. वहीँ प्यारेलाल ने अपने गुरु पंडित राम प्रसाद शर्मा से trumpet और गोवा के अन्थोनी गोंसाल्विस (जी हाँ ये वही हैं जिनके लिए उन्होंने फ़िल्म अमर अकबर एंथोनी का वो यादगार गीत समर्पित किया था) से वोयालिन बजाना सीखा वो भी मात्र ८ साल की उम्र में. वोयालिन के लिए उनका जनून इस हद तक था कि वो दिन में ८ से १२ घंटे इसका रियाज़ करते थे. दोनों बहुत जल्दी दोस्त बन गए दोनों का जनून संगीत था और दोनों के पारिवारिक और वित्तीय हालात भी लगभग एक जैसे थे. लता जी ने उन्हें नौशाद साहब, एस डी बर्मन, और सी रामचंद्र जैसे संगीतकारों के लिए बजाने का काम दिलवा दिया. दोनों घंटों साथ स्टूडियो में समय बिताते, एक दूसरे के लिए काम की तलाश करते, और यदि मौका लगे तो एक साथ बजाते. उनके मित्रों में अब जुबिन मेहता, शिव कुमार शर्मा और हरी प्रसाद चौरसिया भी थे. प्यारेलाल ने जुबिन के साथ विदेश पलायन करने का मन बना लिया. पर दोस्ती ने उन्हें भारत में ही रोक लिया. उन्होंने लक्ष्मीकांत के साथ जोड़ी बनाई और किस्मत ने उन्हें संगीतकार जोड़ी कल्यानजी आनंद जी का सहायक बना दिया.

संघर्ष के इन दिनों में एस डी बर्मन के सुपुत्र आर डी बर्मन से उनकी दोस्ती हुई. वो भी अपने लिए एक बड़े ब्रेक का इंतज़ार कर रहे थे. आर डी को जब पहली फ़िल्म मिली "छोटे नवाब" तो उन्होंने संगीत संयोजन का काम सौंपा एल पी को. इससे पहले एल पी ने एस डी फ़िल्म "जिद्दी" का भी संगीत संयोजन किया था. कहते हैं एस डी ने परखने के लिए इस फ़िल्म के एक गीत का अंतरा एल पी और आर डी को अलग अलग दिया बनाने के लिए और अंत में उन्होंने वही मुखडा फ़िल्म में रखा जो एल पी ने बनाया था. इस बीच एक बी ग्रेड फ़िल्म मिली जो प्रर्दशित नही हो पायी. ५०० धुनों का खजाना था एल पी के पास जब उन्हें उनकी पहली प्रर्दशित नॉन स्टारर फ़िल्म "पारसमणि" मिली. आर डी ने उन्हें हिदायत दी कि इस फ़िल्म को न करें, ये उनके कैरिअर को बुरी शुरआत दे सकता है, पर एल पी हाथ आए इस सुनहरे मौके को नही छोड़ना चाहते थे. आज भी इस फ़िल्म को सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके सुपर हिट संगीत के लिए याद किया जाता है. लता और कमल बारोट का गाया "हँसता हुआ नूरानी चेहरा", रफी साहब का गाया "सलामत रहो" और "वो जब याद आए" जैसे गीतों ने धूम मचा दी. अगली बड़ी फ़िल्म थी राजश्री की "दोस्ती". इंडस्ट्री के सभी बड़े संगीतकारों ने इस नए बिल्कुल अनजान कलाकारों को लेकर बनाई जाने वाली फ़िल्म को ठुकरा दिया तो फ़िल्म एल पी की झोली में गिरी. गीतकार थे मजरूह सुल्तानपुरी. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना. फ़िल्म ने ८ फ़िल्म फेयर और सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का रास्ट्रीय पुरस्कार जीता. कौन भूल सकता है - "जाने वालों जरा", "चाहूँगा मैं तुझे" और "राही मनवा" जैसे अमर गीत.

प्रसाद प्रोडक्शन की फ़िल्म "मिलन" के लिए जब मुकेश की आवाज़ में "मैं तो दीवाना" रिकॉर्ड हुआ निर्देशक कुछ ख़ास प्रभावित नही लगे. पर जब अगला गाना "सवान का महीना" रिकॉर्ड हुआ तो जैसे स्टूडियो में बहार आ गयी. इस गीत के गीतकार आनंद बख्शी बताते हैं कि जब वो एक रेल यात्रा के दौरान किसी स्टेशन पर उतरे और वहां उन्होंने एक बेहद गरीब और साधारण से रिक्शा चालक को ये गीत गुनगुनाते हुए सुना तो उन्हें समझ आ गया कि उनका काम सार्थक हुआ है. लक्ष्मी प्यारे अब घर घर में पहचाने जाने लगे थे. यहीं से उन्हें मिला गीतकार आनंद बख्शी साहब का साथ. जो लगभग 250फिल्मों का रहा. हिन्दी फ़िल्म संगीत में गीतकार संगीतकार की ये सबसे सफल जोड़ी है अब तक.

व्यवसायिक रूप से आमने सामने होकर भी आर डी और उनकी दोस्ती में खलल नही पड़ा. फ़िल्म "दोस्ती" में जहाँ आर डी ने उनके लिए "माउथ ओरगन" बजाया तो लक्ष्मीकांत ने आर डी की फ़िल्म "तेरी कसम" के गीत "दिल की बात" में बतौर संगीतकार अतिथि रोल किया.पर बाद में जब फ़िल्म "देशप्रेमी" के लिए आर डी से गाने की गुजारिश की एल पी ने तो आर डी ने कुछ मजबूरियों के चलते मना कर दिया, ये गीत तब लक्ष्मीकांत के ख़ुद गाया अपनी आवाज़ में. पर तमाम व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते भी दोनों महान संगीतकारों के रिश्ते अन्तिम समय तक भी दोस्ताना रहे.२५-०५-१९९८ को जोडीदार लक्ष्मीकांत को खोने के बाद प्यारेलाल ने थोड़ा बहुत काम ज़रूर किया पर फ़िर बहुत अधिक सक्रिय नही रह पाये. प्यारेलाल जी ने एक ख़ास इंटरव्यू में बहुत सी नई बातों का खुलासा किया. ये इंटरव्यू हम आपके लिए लेकर आयेंगें इस शृंखला की अन्तिम कड़ी में. फिलहाल देखिये इस विडियो में,आज के सबसे सफल गायक सोनू निगम द्वारा संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को दिया गया ये संगीत भरा तोहफा.


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