bhimsain khurana लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
bhimsain khurana लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

चित्रकथा - 65: भीमसेन को श्रद्धांजलि - 40 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है फ़िल्म ’घरौंदा’

अंक - 6५

फ़िल्मकार भीमसेन को श्रद्धांजलि

40 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है फ़िल्म ’घरौंदा’ 






17 अप्रैल 2018 को जानेमाने फ़िल्मकार भीमसेन का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। भारत में ऐनिमेशन के भीष्म-पितामह का दर्जा रखने वाले भीमसेन 70 के दशक में समानान्तर सिनेमा का आंदोलन छेड़ने वाले फ़िल्मकारों में भी एक सम्माननीय नाम हैं। मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान में) में वर्ष 1936 में जन्में भीमसेन खुराना देश विभाजन के बाद लखनऊ स्थानान्तरित हो गए थे। कलाकारों के परिवार से ताल्लुख़ रखने की वजह से संगीत और कला उन्हें विरासत में ही मिली। ललित कला और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त करने की वजह से जीवन भर वो एक अच्छी जगह पर बने रहे। 1961 में भीमसेन ने बम्बई का रुख़ किया और Films Division में बैकग्राउंड पेन्टर की नौकरी कर ली। वहीं पर उन्होंने ऐनिमेशन कला की बारीकियाँ सीख ली। 1971 में भीमसेन स्वतंत्र रूप से फ़िल्म-निर्माण के कार्य में उतरे और अपनी पहली ऐनिमेटेड लघु फ़िल्म ’The Climb' बनाई जिसके लिए उन्हें Chicago Film Festival में "Silver Hugo award" से सम्मानित किया गया। इस फ़िल्म की कामयाबी से प्रेरित होकर उन्होंने ’Climb Films' के नाम से अपनी बैनर बनाई और फिर पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा। 1974 की उनकी ’एक अनेक एकता’ ऐनिमेशन फ़िल्म को आज भी भारत के लोकप्रियतम ऐनिमेटेड फ़िल्मों में गिना जाता है। अनगिनत लघु फ़िल्म, वृत्तचित्र, टीवी सीरीज़, और ऐनिमेटेड फ़िल्मों के साथ-साथ भीमसेन ने दो बॉलीवूड फ़िल्मों का भी निर्माण किया - 1977 में ’घरौंदा’ और 1979 में ’दूरियाँ’। 16 राष्ट्रपति प्रदत्त राष्ट्रीय पुरस्कारों व कई अन्तराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भीमसेन भारतीय फ़िल्म-निर्माण के एक लौहस्तंभ रहे हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में बातें करें फ़िल्म ’घरौंदा’ की। 40 वर्ष पूर्व निर्मित यह फ़िल्म आज के दौर में भी पूरी तरह से प्रासंगिक है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय भीमसेन की पुण्य स्मृति को!



ज जब भी हम ऊंचे-ऊंचे निर्माणाधीन हाउसिंग् कॉमप्लेक्स के सामने से गुज़रते हैं, या जब भी अपना नया फ़्लैट ख़रीदने के बारे में सोचते हैं, तो यकायक हमें फ़िल्म ’घरौंदा’ याद आ जाती है। जहाँ अपने जीवन की सारी जमा पूंजी लगा देनी हो, वहाँ सावधानी बरतना बहुत ज़रूरी होता है। शायद इसीलिए फ़िल्म ’घरौंदा’ का वह दृश्य आँखों के सामने आ जाता है जिसमें बिल्डर फ़्लैट ख़रीदारों के सारे पैसे लेकर फ़रार हो जाता है और जिस वजह से कई ख़रीदार आत्महत्या भी कर लेते हैं। इस दृश्य का ख़याल आते ही जैसे पूरे शरीर में एक कंपन सी दौड़ जाती है। 40 साल पहले, 1977 में यह फ़िल्म बनी थी, उस समय यह फ़िल्म जितनी प्रासंगिक थी, शायद आजे के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी ज़्यादा बढ़ गई है। आज इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक भीमसेन हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी यह फ़िल्म बार बार याद आ रही है और आज की शहरी ज़िन्दगी की सच्चाई से हमारा एक बार फिर से परिचय करवा रही है।

’घरौंदा’ कहानी है मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुख़ रखने वाले एक लड़के और एक लड़की की। सुदीप (अमोल पालेकर) और छाया (ज़रीना वहाब) मुंबई में एक ही दफ़्तर में नौकरी करते हैं। छाया अपनी एक रूम के फ़्लैट में अपने छोटे भाई और बड़े भाई व भाभी के साथ रहती हैं। सुदीप तीन और लोगों के साथ एक भाड़े के कमरे में रहते हैं। सुदीप और छाया एक दूसरे से प्यार करते हैं और जल्दी ही शादी करके अपनी अलग नई दुनिया बसाना चाहते हैं। वो अपने नए घर का सपना देखने लगते हैं। अपनी अपनी तंख्वा से पैसे काट काट कर पैसे जमाते हैं और एक दिन दोनों मिल कर एक निर्माणाधीन बिल्डिंग् में अपने बजट के अनुसार एक फ़्लैट ख़रीद लेते हैं। जब जब वो अपने निर्माणाधीन फ़्लैट को देखने जाते हैं तो उसमें उन्हें अपना सुन्दर छोटा सा घर-संसार नज़र आने लगता है। लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर होता है। सारे ख़रीदारों के पैसे लेकर बिल्डर (या जाली बिल्डर) फ़रार हो जाता है। इस हादसे से सदमे में सुदीप के एक रूम पार्टनर (जिसने वहाँ फ़्लैट ले रखी थी) आत्महत्या कर लेता है। ना वो बिल्डिंग् बन पाती है और ना ही किसी को घर मिल पाता है। सुदीप और छाया हताश हो जाते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या करें। इतने सारे पैसे डूब जाने के बाद फिर से शुरू से शुरू करना उनके लिए संभव नहीं। शादी के सपने को सपना ही रख कर वो फिर से अपनी अपनी नौकरी में लग जाते हैं। उन्हीं दिनों उनके दफ़्तर के मालिक मिस्टर मोदी (श्रीराम लागू) छाया की तरफ़ आकर्षित होते हैं और उन्हें विवाह का प्रस्ताव देते हैं। मोदी एक अमीर और अधेड़ उम्र के विधुर हैं, जो एक दिल के मरीज़ भी हैं। छाया को शादी का यह प्रस्ताव बिल्कुल अच्छा नहीं लगा, लेकिन सुदीप को इसमें एक बहुत बड़ी संभावना नज़र आई। सुदीप छाया को समझाते हैं कि मोदी दिल के गंभीर मरीज़ होने की वजह से उनकी आयु अब कुछ ही महीने की है। उनकी मृत्यु के बाद सुदीप और छाया शादी कर लेंगे और मोदी की सारी सम्पत्ति के मालिक भी बन जाएंगे। अपनी अनिच्छा के बावजूद छाया सुदीप की बात मान लेती हैं इस वजह से भी कि इससे उसे अपने भाई को स्थापित करने में मदद मिलेगी। छाया मोदी से विवाह कर लेती हैं। जल्द ही छाया एक ज़िम्मेदार पत्नी के रूप में उभर आती हैं। उधर सुदीप भी लगातार छाया से मिलते रहते हैं और मोदी के स्वास्थ्य की भी ख़बर रखते हैं। उसे धक्का पहुँचता है जब मोदी को वो स्वस्थ होते हुए देखता है। छाया से शादी के बाद मोदी ख़ुश रहने लगते हैं और इस वजह से उनकी शारीरिक बीमारी भी ठीक होने लगती है। लेकिन एक दिन जब छाया और सुदीप में बहस हो रही होती है, मोदी उनकी बात सुन लेते हैं और सदमे से उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है। इससे सुदीप ख़ुश हो जाता है लेकिन छाया बड़े प्यार और अपनी पत्नी की ज़िम्मेदारी निभाते हुए मोदी को स्वस्थ कर देती हैं। छाया सुदीप को समझा देती है कि वो मोदी को धोखा नहीं दे सकती। सुदीप अपनी अलग राह पर चल निकलता है। बस इतनी सी है ’घरौंदा’ की कहानी।

1977 के गृष्मकाल में कई बड़े बैनरों की फ़िल्में प्रदर्शित हुई थीं। ’अमर अकबर ऐन्थनी’, ’परव्रिश’, ’हम किसी से कम नहीं’, ’चाचा भतीजा’, ’आदमी सड़क का’, ’दुल्हन वही जो पिया मन भाये’ और ’दूसरा आदमी’ जैसी चर्चित फ़िल्में धूम मचा रही थीं। समानान्तर सिनेमा में भी उस साल सत्यजीत रे की ’शतरंज के खिलाड़ी’ और श्याम बेनेगल की ’भूमिका’ जैसी फ़िल्में आ चुकी थीं। इन सब फ़िल्मों के बीच बड़ी ख़ामोशी से आई भीमसेन की फ़िल्म ’घरौंदा’। अख़्बारों और फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं ने भी ज़्यादा ग़ौर नहीं किया इस फ़िल्म पर। लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शित होते ही दर्शकों की संख्या सिनेमाघरों में बढ़ने लगी और इस फ़िल्म 50 दिन (और फिर 100 दिन) पूरे किए। समीक्षकों ने इस फ़िल्म को "a realistic romance in urban India" कह कर संबोधित किया, या यूं कहें कि भीमसेन को सम्मानित किया। भीमसेन ने यह दिखा दिया कि बिना बड़े सितारों के, बिना बड़े निर्देशक के, और बिना बड़े संगीतकार के भी किस तरह से किसी फ़िल्म को आम दर्शकों में ख़ास बनाया जा सकता है! शहरीकरण और शहरी जीवन की कई समस्याओं को इस फ़िल्म में जगह दी गई जैसे कि बेरोज़गारी, अपने नए घर का सपना, पैसे कमाने के लिए नैतिक मूल्यों को भूल जाना, और सबकुछ गंवा कर आत्महत्या कर लेना। फ़िल्म के गीतों की बात करें तो इसमें बस तीन ही गाने थे लेकिन तीनों असरदार। सुदीप और छाया के घर ढूंढ़ने और अपनी नई दुनिया के सपने देखने को गुलज़ार ने बड़ी ख़ूबसूरती से "दो दीवाने शहर में, रात में और दोपहर में..." गीत के ज़रिए उभारा है। "आब-ओ-दाना" (पानी और रोटी/खाद्य) के फ़िल्मी गीत में इस पहले इस्तमाल से गीत में एक चमक आई है। इसी गीत का निराश संस्करण "एक अकेला इस शहर में..." सुदीप के अकेलेपन और हताशा को ज़ाहिर करता है। इस गीत में गुलज़ार लिखते हैं - "जीने की वजह तो कोई नहीं, मरने का बहाना ढूंढ़ता है..." जो कुछ हद तक शहरयार के लिखे "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है" से मिलता-जुलता है जो अगले ही साल (1978 में) फ़िल्म ’गमन’ के लिए लिखा गया था। तीसरा गीत नक्श ल्यालपुरी का लिखा हुआ है - "तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है...", जो सुदीप और छाया की दोस्ती से लेकर प्यार तक की दूरी को मिटाने का काम करता है। जयदेव के संगीत में भूपेन्द्र और रुना लैला के गाए ये तीन गीत आज सदाबहार बन चुके हैं। वैसे ’घरौंदा’ के गीत फ़िल्म की कथानक के विपरीत भी सुनाई देते हैं। फ़िल्म के बाहर अगर इन गीतों को सुना जाए तो फ़िल्म के बारे में एक अलग ही धारणा बनती है। भीमसेन ने इस गीतों के लिए फ़िल्म में एक आसान सा रवैया रखा जिसमें कोई नाटकीयता नहीं, कोई आंत संबंधी अर्थ नहीं। 

’घरौंदा’ फ़िल्म की पूरी टीम पर ग़ौर करें तो यह ’छोटी सी बात’ और ’रजनीगंधा’ क़िस्म की फ़िल्म प्रतीत होती है। जिस फ़िल्म में अमोल पालेकर और ज़रीना वहाब हों, उस फ़िल्म से दर्शकों को एक "feel-good entertainment" की उम्मीद रहती है, जबकि ’घरौंदा’ की कहानी इसके विपरीत है। हाँ, फ़िल्म का पार्श्व ज़रूर ’छोटी सी बात’ या ’रजनीगंधा’ जैसा शहरी है, लेकिन कहानी बिल्कुल अलग। यह फ़िल्म वास्तविकता से हमारा परिचय कराता है, और यह बताता है कि यह दुनिया सिर्फ़ अच्छे लोगों से ही नहीं बना है, बल्कि अच्छे लोगों के भी  बुरे ख़यालात हो सकते हैं। शहर के लोग किस तरह से अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हुए भी महत्वाकांक्षी हो सकते हैं, या फिर भयभीत होते हुए भी क्रूर हो सकते हैं, यही सीख इस फ़िल्म से हमें मिलती है। दूसरों की ज़िन्दगी की परवाह किए बिना सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने बारे में सोचना, शायद यही आज शहरों की रवायत हो गई है। मुंबई जैसे एक बड़े आधुनिक शहर में क्रूर मानव इच्छाओं और जल्दी से कुछ बड़ा करने की उम्मीद करने वालों की एक अंधकार व निराशावादी कहानी है ’घरौंदा’ जो हमें श्याम बेनेगल या गोविन्द निहलानी जैसे फ़िल्मकारों की फ़िल्मों की याद दिला जाती है।

’घरौंदा’ फ़िल्म में बहुत सी चीज़ें अपरम्परागत हैं। फ़िल्म के नायक सुदीप का चरित्र भी मिला-जुला है। यह सच है कि वो छाया से सचमुच प्यार करता है, लेकिन उसका चरित्र धूध का धुला हुआ नहीं है। वो जिस कमरे में रहता है, उसका एक रूम-मेट आय दिन उस कमरे में वेश्या ले आता है। सुदीप भी जब पहली बार छाया को उस कमरे में ले आया था, तब उसके इरादे भी कुछ ख़ास नेक नहीं थे। उधर अधेड़ उम्र के मोदी का छाया के प्रति नज़रिया भी आपत्तिजनक माना जा सकता है इसलिए कि छाया उनकी बेटी की उम्र की लड़की है। ऐसा आमतौर पर नहीं देखा जाता हमारे समाज में। छाया का मोदी से विवाह के बाद सुदीप का पूरी दुनिया से मतभेद और अपने आप की उपेक्षा भी किसी साधारण हिन्दी फ़िल्मी नायक की छवि के विपरीत है। देवदास का शहरी संस्करण बने सुदीप और वेश्याओं के पास भी उसके जाने का उल्लेख फ़िल्म में मिलता है। उधर छाया का अपने पिता के उम्र के पति से इतनी जल्दी मित्रता और बिना किसी शिकायत के एक आदर्श पत्नी बन जाना भी फ़िल्म की कहानी की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। इस तरह से फ़िल्म के तीनों मुख्य चरित्र संदिग्ध हैं और शायद यही वजह है जो इस फ़िल्म को अपने समय की एक अनोखी फ़िल्म बनाती है। सुदीप की भूमिका में अमोल पालेकर ने इस तरह का नकारात्मक चरित्र पहली बार निभा रहे थे, इसलिए दर्शकों को हज़म करने में थोड़ी दिक्कत हुई। फ़िल्म समालोचकों ने यह भी कहा कि ज़रीना वहाब की जगह शबाना आज़्मी छाया का किरदार बेहतर निभा सकती थीं। इसी तरह से लोगों का कहना था कि श्रीराम लागू की जगह संजीव कुमार या अमजद ख़ान मोदी के चरित्र को बेहतर साकार कर पाते। ख़ैर, ये होता तो ऐसा होता, वो होता तो वैसा होता, ये सब अब कोई मायने नहीं रखती। बस सच्चाई यही है कि भीमसेन ने ’घरौंदा’ के रूप में फ़िल्म जगत को एक अनमोल भेंट दी है जो आनेवाले समय में भी समानान्तर या बेहतर शब्दों में "middle of the road" सिनेमा के शौकीनों को चमत्कृत करती रहेगी और फ़िल्मकारों को अच्छी वास्तविक जीवन की फ़िल्में बनाने के लिए प्रेरित करती रहेगी। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करती है स्वर्गीय भीमसेन को सलाम!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ