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सोमवार, 29 सितंबर 2008

लता संगीत पर्व- महीने भर चला संगीत प्रेमियों का उत्सव

आवाज़ पर आयोजित लता संगीत उत्सव पर एक विशेष रिपोर्ट और सुनें लता जी के चुने हुए २० गीत एक साथ.

जब हमने लता संगीत उत्सव की शुरुवात की थी इस माह के पहले सप्ताह में, तब दो उद्देश्य थे, एक भारत रत्न और संगीत के कोहिनूर लता मंगेशकर पर हिन्दी भाषा में कुछ सहेजनीये आलेखों का संग्रह बने और दूसरा लता दी के चाहने वाले इंटरनेटिया श्रोताओं को हम प्रेरित करें की वो लता जी के बारे में हिन्दी भाषा में लिखें. जहाँ तक दूसरे उद्देश्य का सवाल है, हमें बहुत अधिक कमियाबी नही मिल पायी है. कुछ लिखते लिखते रह गए तो कुछ जब तक लिखना सीख पाते समय सीमा खत्म हो चली. प्रतियोगिता की दृष्टि से मात्र एक ही प्रवष्टि हमें मिली जिसे हम आवाज़ पर स्थान दे पाते. नागपुर के २२ वर्षीय अनूप मनचलवार ने अपनी मुक्कम्मल प्रस्तुति से सब का मन मोह लिया, सुंदर तस्वीरें और slide शो से अपने आलेख को और सुंदर बना दिया. हमारे माननीय निर्णायक श्री पंकज सुबीर जी ने अनूप जी को चुना है लता संगीत पर्व के प्रथम और एक मात्र विजेता के रूप में, अनूप जी को मिलेंगीं ५०० रुपए मूल्य की पुस्तकें और "पहला सुर" एल्बम की एक प्रति. अनूप जी का आलेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं. अनूप मनचलवार जी को बधाई देते हुए हम आगे बढ़ते हैं, अगर हम अपने पहले उद्देश्य की बात करें तो हम इस आयोजन को एक बहुत बड़ी सफलता कहेंगे. पेश है इस सफर की कुछ झलकियाँ-



किसी भी सफल आयोजन के लिए जरूरी है एक सफल शुरुवात. और ये शुरुवात हमें मिली जब आयोजन के कर्णधार और हमारे प्रिये पंकज सुबीर भाई ने लता जी की आवाज़ में रूह की वादियों में बह रही दिलरुबा नदी से मिलवाया. लता जी की मुंहबोली बहन और स्वर्गीय कवि/गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह ने जब लता जी के साथ बीते उनके व्यक्तिगत जीवन के कुछ मधुर क्षणों को याद किया तो पाठकों की आँखें सजल हो उठीं.

फ़िर आमद हुई इस आयोजन में संजय पटेल भाई की, जो लाये साथ में लता जी का सुगम संगीत. कुछ ऐसी ग़ज़लें और नगमें जिन्हें सिर्फ़ सुनना काफ़ी नही उन्हें समझना भी जरूरी है, लता जी के गायन की उंचाईयों की झलक पाने के लिए. संजय भाई ने जिस खूबी से इसे अपने पहले और दूसरे आलेख में प्रस्तुत किया उसे पढ़ कर और सुनकर हमरे श्रोताओं ने हमें ढेरों बधाईयाँ भेजीं, जिसे हम सादर संजय भाई को प्रेषित कर रहे हैं. फ़िर लौटे पंकज भाई अपनी शीग्र प्रकाशनीये कहानी में लता जी का जिक्र लेकर. हिंद युग्मी तपन शर्मा ने जानकारीपूर्ण आलेख दिया सुर की देवी के नाम, वहीँ लता जी के जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर संजय भाई ने पेश की माया गोविन्द की एक अद्भुत कविता,स्वर कोकिला को समर्पित. और कल यानी जब लता जी ने अपने परिवार के साथ अपना ७९ वां जन्मदिन मना रही थी, तब यहाँ हिंद युग्म पर संजय भाई ने एलान किया कि प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर. इससे बेहतर भेंट हम संगीत प्रेमी क्या दे सकते थे साक्षात् माँ सरस्वती का रूप लेकर धरती पर आयी इस आवाज़ को, जिसका नाम है लता मंगेशकर. इस सफल आयोजन के लिए हिंद युग्म आवाज़ परिवार आप सब का एक बार फ़िर आभार व्यक्त करता है. चलते चलते संजय भाई ने जो कहा लता जी के लिए उसे दोहरा दें क्योंकि यही हम सब के मन की दुआ है -

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.

सुनिए आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए २० नायाब गीत लता जी के, एक साथ. हमने कोशिश की है कि लता जी के हर अंदाज़ की एक झलक इन गीतों में आपको मिले, आनंद लें -

रविवार, 28 सितंबर 2008

प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर !

लता मंगेशकर का जन्मदिन हर संगीतप्रेमी के लिये उल्लास का प्रसंग है. फ़िर हमारे प्रिय चिट्ठाकार संजय पटेल के लिये तो विशेष इसलिये है कि वे उसी शहर इन्दौर के बाशिंदे हैं जहाँ दुनिया की सबसे सुरीली आवाज़ का जन्म हुआ था. लताजी और उनका संगीत संजय भाई के लिये इबादत जैसा है. वे लताजी के गायन पर लगातार लिखते और अपनी अनूठी एंकरिंग के ज़रिये बोलते रहे हैं.आज आवाज़ के लिये लता मंगेशकर पर उनका यह भावपूर्ण लेख लता –मुरीदों के लिये एक विशिष्ट उपहार के रूप में पेश है.

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.



आप शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत या चित्रपट या सुगम संगीत के पूरे विश्व इतिहास पर दृष्टि डाल लीजिये, किंतु आप निराश ही होंगे यह जानकर कि एक भी नाम ऐसा नहीं है जो अमरता का वरदान लेकर इस सृष्टि में आया हो; एक अपवाद छोड़कर और वह नाम है स्वर-साम्राज्ञी भारतरत्न लता मंगेशकर। लताजी के जन्मोत्सव की बेला में मन-मयूर जैसे बावला-सा हो गया है। दिमाग पर ज़ोर डालें तो याद आता है कि लताजी अस्सी के अनक़रीब आ गईं.श्रोताओं की चार पीढ़ियों से राब्ता रखने वाली लता मंगेशकर के वजूद को अवाम अपने से अलग ही नहीं कर सकता। यही वजह है कि जीवन की अस्सी वीं पायदान पर आ रही स्वर-कोकिला देखकर वक्त की बेरहमी पर गुस्सा-सा आता है कि कमबख़्त तू इतना तेज़ी से क्यों चलता है ?

बहरहाल २८ सितम्बर संगीतप्रेमियों की पूरी जमात के जश्न मनाने का दिन होता है. कुदरत के इस नायाब हीरे पर कौन फ़ख्र नहीं करेगा। दुनिया के दिग्गज देश अपनी इकॉनामी, प्राकृतिक सुंदरता, सकल उत्पादन और उच्च शिक्षा पर नाज़ करते हैं। डींगें मारते हैं बड़ी-बड़ी कि हमारे पास फलॉं चीज़ है, दुनिया में किसी और के पास नहीं। किबला! मैं आपसे पूछता हूँ- क्या आपके पास लता मंगेशकर हैं ? हिन्दुस्तान के ख़ज़ाने का ऐसा कोहिनूर जिसकी कीमत अनमोल है, जिसकी चमक बेमिसाल है।



लता मंगेशकर से सिर्फ़ अज़ीम मौसिक़ारों का संगीत, गीतकारों के शब्द ही रोशन नहीं; उनकी आवाज़ से अमीर का महल और किसी फटेहाल गरीब का झोपड़ा दोनों ही आबाद हैं। लताजी सिर्फ़ होटल ताज, संसद भवन, षणमुखानंद या अल्बर्ट हॉल तक महदूद नहीं, वे गॉंव की पगडंडियों, गाड़ी-गडारों और पनघट पर किलकती तितली हैं। वे शास्त्र का महिमागान नहीं; आम आदमी के होठों पर थिरकता एक प्यारा-सा मुखड़ा हैं, जिसमें ज़िंदगी के सारे ग़म और तमाम ख़ुशियॉं आकर एक निरापद आनंद पा जाती हैं। लताजी का स्वर है तो ज़िंदगी का सारा संघर्ष बेमानी है और सारी कामयाबियॉं द्विगुणित। लता की आवाज़ से मोहब्बत करने के लिए आई.आई.एम से एम.बी.ए. करने की ज़रूरत नहीं, आप अनपढ़ ही भले। आपके तमाम हीनभावों और अशिक्षा को धता बताकर लता की आवाज़ आपको इस बात का गौरव प्रदान कर सकती है कि आप लता के संगीत के दीवाने हैं और आपका यही दीवानापन आपकी बड़ी काबिलियत है।

लता की आवाज़ में जीवन के सारे रस और प्रकृति की सारी गंध सम्मिलित है। आदमी की हैसियत, उसका रुतबा, उसका सामर्थ्य माने नहीं रखता; माने यह बात रखती है कि क्या उसने लता मंगेशकर के गीत सुने हैं; गुनगुनाया है कभी उनको, यदि हॉं तो मूँगफली खाता एक गरीब लता का गीत गुनगुनाते हुए अपने आपको रायबहादुर समझने का हक रखता है। आप हिन्दुस्तान के किसी भी प्रदेश में चले जाइए; आपको लता मंगेशकर एक परिचित नाम मिलेगा। "ब्रांडनेम' की होड़ के ज़माने में लता मंगेशकर भारत का एक निर्विवाद ब्रांड है पचास बरसों से। ऐसा ब्रांड जिस पर भारत की मोनोपाली है और जिसका मार्केट-शेयर शत-प्रतिशत है। इस ब्रांड का जलवा ऐसा है कि संगीतप्रेमियों के शेयर बाज़ार में इसका सेंसेक्स सबसे ऊपर रहता है कभी वह नीचे गिरा ही नहीं।

अपने आपको ताज़िंदगी विद्यार्थी समझने वाली लता मंगेशकर का संघर्ष, तप और समर्पण विलक्षण है। उनका करियर ऐसी ख़ूबियों से पटा पड़ा है, जिस पर रचनाकारों और संगीत सिरजने वालों को फ़ख्र है। जीते जी लता मंगेशकर ऐसी किंवदंती बन गई हैं कि उनकी आवाज़ को पाकर शब्द अमर हो जाते हैं; धुन निहाल हो जाती है; नायिकाएं सुरीली हो जाती हैं और श्रोता बिना धेला दिए मालामाल। यहोँ अनायास इस मालवी-जीव को दादा बालकवि बैरागी रचित फ़िल्म "रेशमा और शेरा' का गीत तू चंदा मैं चॉंदनी' याद हो आता है। संगीतकार जयदेव और बैरागीजी को इस गीत ने जो माइलेज दिया है वह बेमिसाल है। बैरागीजी की क़लम की ताब और लताजी के सुरों की आब इस गीत के विभिन्न शेड्स आपके मन को बावरा बनाकर रेगिस्तान में नीम के दरख्त की छॉंह मिल जाए वैसी अनुभूति देते हैं।

( ख़ुद ही अनुभव करें )



आज परिवारों में आपको ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे जहॉं परदादा ने, दादा, पिता और पुत्र ने लता के गायनामृत का रसपान किया होगा। लताजी के गाए गीत पूरे मुल्क की अमानत हैं। इसलिए यह कहने में गर्व है कि हमें इस बात से क्या लेना-देना कि हमारे राष्ट्रीय कोष में कितने ख़रबों रुपए हैं; हमें इस बात का अभिमान है कि हज़ारों गीतों ने लता के स्वर का आचमन किया है। सदियॉं गुज़र जाएँगी, आदमी ख़ूब आगे बढ़ जाएगा, दुनिया विशालतम होती जाएगी लेकिन लता के स्वरों का जादू कभी फीका नहीं पड़ेगा। सृष्टि के पंचभूतों में छठा तत्व है "लता', जो अजर-अमर है। संगीत के सात सुरों का आठवॉं सुर है लता मंगेशकर। मैं कम्प्यूटर युग में प्रगति का ढोल बजा रही पीढ़ी से गुज़ारिश करना चाहूँगा; दोस्तों ! गफ़लत छोड़ो और इस बात का मद पालो कि तुम उस भारत में पैदा हुए हो जहॉं लता मंगेशकर ने संगीत साधना की; अपने स्वरों से इस पूरी कायनात का अभिषेक किया; इंसान के मन-मंडप में अपने संगीत के तोरण बॉंधे। ज़िंदगी के रोने तो चलते ही रहेंगे, जश्न मनाओ कि लता हमारे बीच हैं. कहते हैं प्रलय के बाद मनुष्य नहीं बचेगा, लेकिन यदि कुछ बचेगा तो सिर्फ़ लता मंगेशकर की आवाज़ क्योंकि उसने संगीत को दिया है अमरता का अमृत।


लता carricature - कुलदीप दिमांग

शनिवार, 27 सितंबर 2008

स्वर कोकिला लता मंगेशकर के लिये एक अदभुत कविता-तुम स्वर हो,स्वर का स्वर हो

माया गोविंद देश की जानी मानी काव्य हस्ताक्षर हैं.हिन्दी गीत परम्परा को मंच पर स्थापित करने में मायाजी ने करिश्माई रचनाएँ सिरजीं हैं.आवाज़ पर भाई संजय पटेल के माध्यम से हमेशा नई – नई सामग्री मिलती रही है.लता दीदी के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले आवाज़ पर प्रस्तुत है समर्थ कवयित्री माया गोविंद की यह भावपूर्ण रचना.


तुम स्वर हो, तुम स्वर का स्वर हो
सरल-सहज हो, पर दुष्कर हो।
हो प्रभात की सरस "भैरवी'
तुम "बिहाग' का निर्झर हो।

चरण तुम्हारे "मंद्र सप्तकी'
"मध्य सप्तकी' उर तेरा।
मस्तक "तार-स्वरों' में झंकृत
गौरवान्वित देश मेरा।
तुमसे जीवन, जीवन पाए
तुम्हीं सत्य-शिव-सुंदर हो।
हो प्रभात की...

"मेघ मल्हार' केश में बॉंधे
भृकुटी ज्यों "केदार' "सारंग'।
नयन फागुनी "काफ़ी' डोले
अधर "बसंत-बहार' सुसंग।
कंठ शारदा की "वीणा' सा
सप्त स्वरों का सागर हो।
हो प्रभात की...

सोलह कला पूर्ण गांधर्वी
लगती हो "त्रिताल' जैसी।
दोनों कर जैसे "दो ताली'
"सम' जैसा है भाल सखी।
माथे की बिंदिया "ख़ाली' सी
"द्रुत लय" हो, गति मंथर हो।
हो प्रभात की...

"राग' मित्र, "रागिनियॉं'सखियॉं
"ध्रुपद-धमार' तेरे संबंधी।
"ख़याल-तराने' तेरे सहोदर
"तान' तेरी बहनें बहुरंगी।
"भजन' पिता, जननी "गीतांजलि'
बस स्वर ही तेरा वर हो।
हो प्रभात की...

ये संसार वृक्ष "श्रुतियों' का
तुम सरगम की "लता' सरीखी।
"कोमल' "शुद्ध' "तीव्र' पुष्पों की
छंद डोर में स्वर माला सी।
तेरे गान वंदना जैसे

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

लता मंगेशकर- संगीत की देवी

लता मंगेशकर का जीवन परिचय

लता का परिवार
लता मंगेशकर का जन्म इंदौर, मध्यप्रदेश में सितम्बर २८, १९२९ को हुआ। लता मंगेशकर का नाम विश्व के सबसे जानेमाने लोगों में आता है। इनका जन्म संगीत से जुड़े परिवार में हुआ। इनके पिता प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे व उनकी एक अपनी थियेटर कम्पनी भी थी। उन्होंने ग्वालियर से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। दीनानाथ जी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे पाँच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता अमान अली खान, साहिब और बाद में अमानत खान के साथ भी पढ़ीं। लता मंगेशकर हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज़, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी। जब १९४२ में उनके पिता की मृत्यु हुई तब वे परिवार में सबसे बड़ी थीं इसलिये परिवार की जिम्मेदारी उन्हें के ऊपर आ गई। अपने परिवार के भरण पोषण के लिये उन्होंने १९४२ से १९४८ के बीच हिन्दी व मराठी में करीबन ८ फिल्मों में काम किया। उनके पार्श्व गायन की शुरुआत १९४२ की मराठी फिल्म "कीती हसाल" से हुई। परन्तु गाने को काट दिया गया!!

वे पतली दुबली किन्तु दृढ़ निश्चयी थीं। उनकी बहनें हमेशा उनके साथ रहतीं। मुम्बई की लोकल ट्रेनों में सफर करते हुए उन्हें आखिरकार "आप की सेवा में (’४७)" पार्श्व गायिका के तौर पर ब्रेक मिल गया। अमीरबाई , शमशाद बेगम और राजकुमारी जैसी स्थापित गायिकाओं के बीच उनकी पतली आवाज़ ज्यादा सुनी नहीं जाती थी। फिर भी, प्रमुख संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने लता में विश्वास दिखाते हुए उन्हें मजबूर और पद्मिनी(बेदर्द तेरे प्यार को) में काम दिया जिसको थोड़ी बहुत सराहना मिली। पर उनके टेलेंट को सच्ची कामयाबी तब मिली जब १९४९ में उन्होंने तीन जबर्दस्त संगीतमय फिल्मों में गाना गाया। ये फिल्में थीं- नौशाद की "अंदाज़", शंकर-जयकिशन की "बरसात" और खेमचंद प्रकाश की "महल"। १९५० आते आते पूरी फिल्म इंडस्ट्री में लता की हवा चल रही थी। उनकी "हाई-पिच" व सुरीली आवाज़ ने उस समय की भारी और नाक से गाई जाने वाली आवाज़ का असर खत्म ही कर दिया था। लता की आँधी को गीता दत्त और कुछ हद तक शमशाद बेग़म ही झेल सकीं। आशा भोंसले भी ४० के दशक के अंत में आते आते पार्श्व गायन के क्षेत्र में उतर चुकीं थी।

आशा, मीना, लता, हृदयनाथ और ऊषा मंगेशकर
शुरुआत में लता की गायिकी नूरजहां की याद दिलाया करती पर जल्द ही उन्होंने अपना खुद का अंदाज़ बना लिया था। उर्दू के उच्चारण में निपुणता प्राप्त करने हेतु उन्होंने एक शिक्षक भी रख लिया! उनकी अद्भुत कामयाबी ने लता को फिल्मी जगत की सबसे मजबूत महिला बना दिया था। १९६० के दशक में उन्होंने प्लेबैक गायकों के रायल्टी के मुद्दे पर मोहम्मद रफी के साथ गाना छोड़ दिया। उन्होंने ५७-६२ के बीच में एस.डी.बर्मन के साथ भी गाने नहीं गाये। पर उनका दबदबा ऐसा था कि लता अपने रास्ते थीं और वे उनके पास वापस आये। उन्होंने ओ.पी नैय्यर को छोड़ कर लगभग सभी संगीतकारों और गायकों के साथ ढेरों गाने गाये। पर फिर भी सी.रामचंद्र और मदन मोहन के साथ उनका विशेष उल्लेख किया जाता है जिन्होंने उनकी आवाज़ को मधुरता प्रदान करी। १९६०-७० के बीच लता मजबूती से आगे बढ़ती गईं और इस बीच उन पर इस क्षेत्र में एकाधिकार के आरोप भी लगते रहे।

उन्होंने १९५८ की मधुमति फिल्म में "आजा रे परदेसी..." गाने के लिये फिल्म फेयर अवार्ड भी जीता। ऋषिकेष मुखर्जी की "अनुराधा" में पंडित रवि शंकर की धुनों पर गाने गाये और उन्हें काफी तारीफ़ मिली। उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू लता के गैर फिल्मी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों..." से अति प्रभावित हुए और उन्हें १९६९ में पद्म भूषण से भी नवाज़ा गया।

७० और ८० के दशक में लता ने तीन प्रमुख संगीत निर्देशकों लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन और कल्याण जी-आनंदजी के साथ काम किया। चाहें सत्यम शिवम सुंदरम हो, शोले या फिर मुकद्दर का सिकंदर, तीनों में लता ही केंद्र में रहीं। १९७४ में लंदन में आयोजित लता के "रॉयल अल्बर्ट हॉल" कंसेर्ट से बाकि शो के लिये रास्ता पक्का हो गया। ८० के दशक के मध्य में डिस्को के जमाने में लता ने अचानक अपना काम काफी कम कर दिया हालांकि "राम तेरी गंगा मैली" के गाने हिट हो गये थे। दशक का अंत होते होते, उनके गाये हुए "चाँदनी" और "मैंने प्यार किया" के रोमांस भरे गाने फिर से आ गये थे। तब से लता ने अपने आप को बड़े व अच्छे बैनरों के साथ ही जोड़े रखा। ये बैनर रहे आर. के. फिल्म्स (हीना), राजश्री(हम आपके हैं कौन...) और यश चोपड़ा (दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे, दिल तो पागल है, वीर ज़ारा) आदि। ए.आर. रहमान जैसे नये संगीत निर्देशक के साथ भी, लता ने ज़ुबैदा में "सो गये हैं.." जैसे खूबसूरत गाने गाये।

आजकल, लता मास्टर दीनानाथ अस्पताल के कार्यों में व्यस्त हैं। वे क्रिकेट और फोटोग्राफी की शौकीन हैं। लता, जो आज भी अकेली हैं, अपने आप को पूरी तरह संगीत को समर्पित किया हुआ है। वे अभी भी रिकॉर्डिंग के लिये जाने से पहले कमरे के बाहर अपनी चप्पलें उतारती हैं। लता मंगेशकर जैसी शख्सियतें विरले ही जन्म लेती हैं। लता जी को जन्मदिन की अग्रिम बधाई...

२६ सितम्बर को हेमन्त कुमार की १९वीं पुण्यतिथि है, तो क्यों न इस अवसर हेमन्त कुमार द्वारा संगीतबद्ध लता मंगेशकर की आवाज़ में 'खामोशी' (१९६९) फिल्म अमर गीत 'हमने देखी हैं इन आँखों की महकती खुश्बू' सुन लिया जाय। यह एक महान संगीतकार-गायक को हमारी श्रद्दाँजलि होगी। इस अमर गीत को गुलज़ार ने लिखा है।



प्रस्तुति- तपन शर्मा चिंतक
स्रोत- अंग्रेजी विकिपीडिया तथा अन्य इंटरनेटीय सजाल

आशा, मीना, लता, हृदयनाथ और ऊषा मंगेशकर
लता, आशा, ऊषा, मीना और शिवाजी गणेशन की विवाह की एक पॉर्टी के मौके पर


चित्र साभार- हामराफोटोज़

जितनी सुरीली हैं ग़ालिब की ग़ज़लें; गाने में दोगुना तप मांगती हैं

आज एक बार फ़िर आवाज़ पर हमारे प्रिय संगीत समीक्षक और जानेमाने चिट्ठाकार संजय पटेल तशरीफ़ लाए हैं और बता रहे हैं लता मंगेशकर की गायकी की कुछ अदभुत ख़ासियतें.हमें उम्मीद है कि इस पोस्ट को पढ़कर संगीत विषय से जुड़े विद्यार्थी,गायक,संगीतकार बहुत लाभान्वित होंगे.आशा है आवाज़ पर जारी सुगम समारोह में सुनी और सराही जा रही ग़ालिब की ग़ज़लों का आनंद बढ़ाने वाली होगी संजय भाई की ये समीक्षा.मुलाहिज़ा फ़रमाएँ......



एक बात को तो साफ़ कर ही लेना चाहिये कि लता मंगेशकर अपने समय की सबसे समर्थ गायिका हैं.मीरा के भजन,डोगरी,मराठी,गुजराती,और दीगर कई भाषाओं के लोकगीत,भावगीत,भक्तिगीत और सुगम संगीत गाती इस जीवित किंवदंती से रूबरू होना यानी अपने आपको एक ऐसे सुखद संसार में ले जाना है जहाँ सुरों की नियामते हैं और संगीत से उपजने वाले कुछ दिव्य मंत्र हैं जो हमारे मानस रोगों और कलुष को धो डालने के लिये इस सृष्टि में प्रकट हुआ हैं.

लता मंगेशकर के बारे में गुलज़ार कहते हैं कि लताजी के बारे में कोई क्या कह सकता है.उनके बारे में कोई बात करने की ज़रूरत ही नहीं है बल्कि उनको एकाग्र होकर सुनने की ज़रूरत है. उनके गायन के बारे में कोई अपनी राय नहीं दे सकता,सिर्फ़ अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है. ख़ाकसार की प्रतिक्रिया है कि लता मंगेशकर दुनिया की सबसे बेहतरीन गायिका तो हैं ही, सबसे अव्वल विद्यार्थी भी हैं. उन्होंने जिस तरह से अपने संगीतकारों को सुना,गुना और गाया है वह कितना सहज और सरल है ; ऐसा कह देना बेहद आसान है लेकिन ज़रा अपने कानों को इन बंदिशों की सैर तो करवाइये,आप जान जाएंगे किस बला का नाम लता है.

ग़ालिब को गाते वक़्त लता मंगेशकर पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर की विद्यार्थी हैं.सुन रहीं है,किस किस लफ़्ज़ पर वज़न देना है,कहाँ कितनी हरकतें है और कहाँ आवाज़ को हौले से साधना है और कहाँ देनी है परवाज़.ज़रा यह भी समझते चलें कि शास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत में हर बार आप नया रच सकते हैं.जैसे बागेश्री गा रहे हैं तो इस बार तानों को थोड़ा छोटा कर लें,विलम्बित को ज़रा जल्द ख़त्म कर द्रुत पर आ जाएं,सरगम लें ही नहीं सिर्फ़ तानों से सजा लें पूरा राग. लोक-संगीत की रचनाओं को किसी सुर विशेष में बांधने की ज़रूरत नहीं,लय-घटाएँ,बढ़ाएँ;चलेगा.लेकिन हुज़ूर ये जो सुगम संगीत नाम की विधा है और ख़ास कर रेकॉर्डिंग का मामला हो तो सुगम से विकट कोई दूसरी आफ़त नहीं है. समय है कि बांध दिया गया है....तीन मिनट में ही कीजिये पूरी ये ग़ज़ल या भजन या गीत.आभूषण सारे चाहिये गायन के प्रस्तुति में.और बंदिश है संगीतकार या कम्पोज़र की कि ऐसा ही घुमाव चाहिये. सबसे बढ़कर यह कि गायकी की श्रेष्ठता के साथ संगीतकार या गीतकार/शायर चाहता है कि जो शब्द लिखे गए हैं उनकी अदायगी स्पष्ट हो,उच्चारण एकदम ख़ालिस हों और गायकी के वैभव के साथ ग़ज़ल या गीत का भाव जैसा लिखा गया है उसे दूगुना करने वाला हो.ये सारी भूमिका मैने इसलिये बांध दी है कि लता मंगेशकर की गायकी पर बहस करना बहुत आसान है ; उन प्रेशर्स को महसूस करना बहुत मुश्किल जो ग़ालिब या दीगर एलबम्स को रेकॉर्ड करते वक़्त लताजी ने जिये हैं.

लता मंगेशकर ने कहा है कि संगीतकार सज्जाद और ह्र्दयनाथ मंगेशकर के कम्पोज़िशन्स गाते हुए वे विशेष रूप से सतर्क हो जाती हैं,बात सही भी है. इन दोनो संगीतकारों ने अपने समय से अलग हटकर संगीत रचा है. आज जो बात मैंने लता मंगेशकर के बारे में कही है वह संभवत: पहली बार आवाज़ के ज़रिये ही कह पाया हूँ और उम्मीद करता हूँ कि ग़ालिब जैसा क्लिष्ट और लीक के हट कर रचा गया एलबम सुनते वक़्त आप मेरी बातों का स्मरण बनाए रखेंगे. तो सुनिए जनाब...लता+हृदयनाथ जुगलबंदी का करिश्मा.......ग़ालिब.

कभी नेकी भी उसके जी में गर....(ये ग़ज़ल आशा ने भी गई बाद में, जो आपको फ़िर कभी सुनवायेंगे)



नक्श फरियादी है...



हजारों ख्वाहिशें ऐसी...



बाज़ीच-ऐ-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे...



फ़िर मुझे दीदा-ऐ-दर याद आया...



रोने से और इश्क में बेबाक हो गए... (इस ग़ज़ल की धुन को हृदयनाथ मंगेशकर ने बरसों बाद फ़िल्म लेकिन में भी इस्तेमाल किया)


एक दुर्लभ चित्र स्मृति :आज आवाज़ पर नज़र आ रहे चित्र में -एक रेकॉर्डिंग के दौरान बतियाते हुए लताजी और उनके संगीतकार अनुज ह्र्दयनाथजी

सोमवार, 22 सितंबर 2008

पंकज सुबीर की कहानी "शायद जोशी" में लता मंगेशकर

(ये आलेख नहीं है बल्कि मेरी एक कहानी ''शायद जोशी'' का अंश है ये कहानी मेरे कहानी संग्रह ''ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी'' की संभावित कहानियों में से एक है ।)

- पंकज सुबीर

अचानक उसे याद आया कल रात को रेडियो पर सुना लता मंगेशकर का फिल्म शंकर हुसैन का वो गाना 'अपने आप रातों में' । उसे नहीं पता था कि शंकर हुसैन में एक और इतना बढ़िया गाना भी है वरना अभी तक तो वो 'आप यूं फासलों से गुज़रते रहे' पर ही फिदा था । हां क्या तो भी शुरूआत थी उस गाने की 'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं, चौंकते हैं दरवाज़े सीढ़ियाँ धड़कती हैं' उफ्फ क्या शब्द हैं, और कितनी खूबसूरती से गाया है लता मंगेशकर ने ।

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और उस पर खैयाम साहब का संगीत, कोई भारी संगीत नहीं, हलके हल्‍के बजते हुए साज और बस मध्यम मध्यम स्वर में गीत । और उसके बाद 'अपने आप' शब्दों को दोहराते समय 'आ' और 'प' के बीच में लता जी का लंबा सा आलाप उफ्फ जानलेवा ही तो है । एक तो फिल्म का नाम ही कितना विचित्र है 'शंकर हुसैन' पता नहीं क्या होगा इस फिल्म में । काश वो इसे देख पता । कुछ चीज़ें होती हैं न ऐसी, जिनको लेकर आप हमेशा सोचते रहते हैं कि काश आप इसे देख पाते । बचपन में जब इतिहास के टीचर इतिहास पढाते थे तब उसकी बहुत इच्छा होती थी कि काश उसे एक बार सिकंदर देखने को मिल जाए । वो छूकर देख पाए कि अच्छा ऐसा है सिकंदर । ऐसा ही कुछ वो काश्मीर में खिलने वाले क्वांग पोश, दामपोश फूलों के बारे में भी सोचता था । शंकर हुसैन को लेकर भी उसको ऐसी ही उत्सुकता है कि क्या होगा इस फिल्म में । और शंकर के साथ हुसैन कैसे लग गया ।

मुखडे क़े बाद जो अंतरा शुरू होता है वो भी कमाल का ही था

'एक अजनबी आहट आ रही है कम कम सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम सी
बिन किसी की याद आए दिल के तार हिलते हैं
बिन किसी के खनकाए चूडियां खनकती हैं
अपने आप.........'

पहले तो उसने पक्का सोच लिया था कि ये गीत गुलज़ार का ही है । वही लिखते हैं इस तरह शब्दों के साथ खेल खेल कर । खामोशी का गीत 'हमने देखी है उन आंखों की....' भी तो इसी तरह का है । उत्सुकता के साथ उसने गीत के खत्म होने का इंतज़ार किया था और जब गीतकार का नाम लिया गया था तो चौंक गया था वो । कैफ भोपाली....? उनका गीत था ये......? थोडा अच्छा भी लगा था उसे, अपने ही शहर वाले ने लिखा है इतना सुंदर गीत ।

दूसरा मुखडा तो पहले से भी यादा अच्छा था

'कोई पहले दिन जैसे घर किसी को जाता हो
जैसे खुद मुसाफिर को रास्ता बुलाता हो
पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं
और छम छमा छम छम पायलें छनकती हैं
अपने आप........'

आश्चर्य चकित रह गया था वो, इतना सुंदर गीत उसने आज तक सुना क्यों नही था। कितनी सीधी सीधी सी बात कही है । पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं । जाने किस जानिब और वो भी बेउठाए ....। क्या बात कही है ये गीत छुपा कहाँ था अब तक ? कितने मशहूर गीत सुन चुका है वो अब तक, फिर ये गीत कहाँ छुपा था ? वैसे कैफ भोपाली और लता मंगेशकर की जुगलबंदी में पाकीज़ा के सारे गाने उसे पंसद हैं । विशेषकर 'यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते ' वो तो अद्भुत गीत है ।

गाने का तीसरा अंतरा शायद पूरी शिद्दत के साथ लिखा गया था । उसी अज्ञात की तरफ बार बार इशारा करते हुए शब्दों को पिरोया गया है जो शायद उन सबके जीवन में होता है जिनके सारे स्वपन अभी स्थगित नहीं हुए हैं । एक अज्ञात, जो होता है पर दिखाई नहीं देता । सारी समस्याओं का मूल एक ही है, जीवन से अज्ञात की समाप्ति । जब तक आपको लगता है कि न जाने कौन है, पर है ज़रूर, तब तक आप सपने देखते हैं । सपने देखते हैं, उस न जाने कौन के सपने। वो न जाने कौन आपके आस पास फिरता है, मगर दिखता नहीं है । वही आपको जिन्दा रखता है । जैसे ही आपको यकीन हो जाता है कि हम तो इतने दिन से फिज़ूल ही परेशान हैं, कोई भी नहीं है, उसी दिन आपको सपने आने भी बंद हो जाते हैं (स्थगित हो जाते हैं) ।

'जाने कौन बालों में उंगलियां पिरोता है
खेलता है पानी से तन बदन भिगोता है
जाने किसके हाथों से गागरें छलकती हैं
जाने किसी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं
अपने आप.......'


क्या डिफाइन किया है अज्ञात को । 'जाने कौन बालों में उंगलिया पिरोता है' ज्ञात और अज्ञात के बीच एक महीन से सूत बराबर गुंजाइश को छोड़ा गया है, यह कह कर कि जाने किसकी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं। कैफ भोपाली ऐसा ही लिखते थे 'फिरते हैं हम अकेले बाँहों में कोई ले ले....' । कौन ले ले....? कुछ पता नहीं हैं । बस वही, जो है, पर नहीं है । यहाँ पर भी उसकी बांहों से बिजलियाँ लपक रही हैं। पता नहीं ये शंकर हुसैन अब उसको देखने को मिलेगी या नहीं । क्या होगा जब वो मर रहा होगा? क्या ये तब तक भी उसको परेशान करेगी ? कशमीर के क्वांगपोश और दामपोश फूलों की तरह । क्या सचमुच इतने सारे अनुत्तरित प्रश्नों को साथ लेकर ही मरेगा वो ? फिर उन प्रश्नों का होता क्या होगा जो उस आदमी के साथ जीवन भर चलते आए हैं, जो अभी अभी मर गया है ।

आखिर में एक बार फिर लता मंगेशकर की आवाज़ उसी मुखड़े को दोहराती है....

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और विस्मय में डूबा हुआ छोड़कर गीत खत्म भी हो जाता है ।



प्रस्तुति - - पंकज सुबीर


लता संगीत उत्सव की एक और कड़ी

रविवार, 21 सितंबर 2008

ग़ालिब का कलाम और लता का अंदाज़ - क़यामत

लता संगीत उत्सव की एक और पेशकश - लता सुगम समारोह, पढ़ें और सुनें संजय पटेल की कलम का और लता की आवाज़ का जादू 28 सितम्बर तक लता मंगेशकर की ग़ैर-फ़िल्मी रचनाओं के इस सुगम समारोह में.




लता मंगेशकर इस बरस पूरे ८० बरस की हो जाएंगी.सुरों की इस जीती-जागती किंवदंती का हमारे बीच होना हम पर क़ुदरत का एक अहसान है.आवाज़ के आग्रह पर हमारे चिर-परिचित संगीत समीक्षक श्री संजय पटेल ने हमारे लिये लताजी की कुछ ग़ैर-फ़िल्मी रचनाएँ,जिनमें ज़्यादातर उर्दू महाकवि ग़ालिब की ग़ज़लें शुमार हैं पर विशेष समीक्षाएँ की हैं .लताजी की इन रचनाओं पर संजय भाई २८ सितम्बर तक नियमित लिखेंगे.

लता मंगेशकर द्वारा स्वरबध्द और पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर द्वारा संगीतबध्द ग़ालिब की रचनाओं को सुनना एक चमत्कारिक अनुभव है. आज संगीत में जिस तरह का शोर बढ़ता जा रहा है उस समय में इन क्लासिकी ग़ज़लों को सुनना किसी रूहानी अहसास से गुज़रना है. चूँकि यह प्रस्तुतियाँ सुगम संगीत की अनमोल अमानत हैं; हमने इसे लता सुगम समारोह नाम दिया है...... आइये आज से प्रारंभ करते हैं लता सुगम समारोह.
उम्मीद है आवाज़ की ये सुरीली पेशकश आपको पंसद आएगी.


दुर्लभ रचनाओं को सिलसिला : लता सुगम समारोह : पहली कड़ी:


ग़ालिब,लता मंगेशकर और पं.ह्रदयनाथ मंगेशकर यानी सारा मामला ही कुछ अदभुत है.आवाज़ के भाई सजीव सारथी ने जब इस पेशकश पर अपनी बात कहने का इसरार किया तो मन रोमांचित हो उठा.सर्वकालिक महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के प्रभावशाली रचनाकार थे.उन्हें फ़ारसी शायरी पर बहुत फ़ख्र था किंतु उन्हें लोकप्रियता मिली उर्दू शायरी की बदौलत.वे न केवल एक बेजोड़ शायर थे लेकिन एक ज़िन्दादिल इंसान भी.उनके कई शेर ख़ुद अपने आप पर व्यंग्य करते हैं जिनमें वे तत्कालीन शायरी परिदृश्य को भी फ़टकार लगाते नज़र आते हैं.बहादुर शाह ज़फ़र(1854) ग़ालिब से इतने प्रभावित थे कि ज़िन्दगी भर उनको अपना उस्ताद मानते रहे.प्रेम ग़ालिब की शायरी का स्थायी भाव था लेकिन साथ ही तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति और निजी ज़िन्दगी की तल्ख़ियों को भी उन्होनें अपने लेखन में ख़ूबसूरती से शुमार किया.


सत्तर के दशक में पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर ने ग़ालिब एलबम रचा.बता दें कि ह्र्दयनाथ जी उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के गंडाबंद शागिर्द रहे हैं और पूरे मंगेशकर कुटुम्ब के कलाकरों को संगीत का संस्कार अपने दिवंगत पिता पं.दीनानाथ मंगेशकर जी से मिला जो अपने समय के महान रंगकर्मी और गायक थे.जब यह एलबम रचा गया है तब सुगम संगीत की लोकप्रियता के लिये एकमात्र माध्यम आकाशवाणी और विविध भारती थे. संगीत को पत्रिकाओं और अख़बारों में कोई ख़ास जगह नहीं मिलती थी. समझ लीजिये संगीतप्रेमी अपने प्रयत्नों से इस तरह के एलबम्स को जुगाड़ते थे. ये ग़ज़ले विविध भारती के रंग-तरंग कार्यक्रम में ख़ूब बजी हैं और जन जन तक पहुँचीं है.ह्र्दयनाथजी बहुत परिश्रम से इस एलबम पर काम किया है. इनके कम्पोज़िशन्स को एक ख़ास मूड और टेम्परामेंट के हिसाब से रचा गया है जिसमें न केवल सांगीतिक उकृष्टता है बल्कि अठारहवीं शताब्दी के कालखंण्ड की प्रतिध्वनि भी है.राग-रागिनियों का आसरा लेकर ह्र्दयनाथजी ने लताजी से समय के पार का गायन करवा लिया है.सारंगी दरबार की शान हुआ करती थी इसलिये सुगम समारोह में ग़ालिब एलबम से जो भी ग़ज़लें हम सुनेंगे उनमें ये साज़ प्रधानता से बजा है,बल्कि ये भी कह सकते हैं कि लताजी के बाद सारंगी ही सबसे ज़्यादा मुखर हुई है. तबला भी एक ख़ास टोनल क्वालिटी के साथ बजा है और उसे ऊँचे स्वर(टीप) में मिला कर बजवाया गया है.किसी भी एलबम की सफलता में गायक और संगीतकार की आपसी ट्यूनिंग ही कमाल करती है, इस बात को ग़ालिब एलबम सुनकर सहज ही महसूस किया जा सकता है.यह एलबम संगीत की दुनिया का बेशक़ीमती दस्तावेज़ है.

लता मंगेशकर के बारे में अगली पोस्ट्स में तफ़सील से चर्चा करेंगे,लेकिन आज सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा कि लता जी ने संख्या की दृष्टि से कितना गाया यह मह्त्वपूर्ण नहीं , क्या गाया है यह अधिक महत्वपूर्ण है. जो हरक़ते उनके गले से इस एलबम में निकलीं है वे बेमिसाल हैं.इस एलबम को यदि एक बैठक में सुन लिया जाए तो लता जी के आलोचक भी सिर्फ़ ग़ालिब गायन के लिये इस सर्वकालिक महान गायिका को भारतरत्न दे सकते हैं.सत्तर के दशक में लताजी की आवाज़ जैसे एक संपूर्ण गायक की आवाज़ थी.रचना के साथ स्वर का निबाह करना तो कोई लताजी से सीखे.वे इस एलबम को गाते गाते स्वयं ग़ालिब के दौर में पहुँच गईं हैं और अपने सुरों की घड़ावन से ऐसा अहसास दे रही हैं मानो इस एलबम की रेकॉर्डिंग दिल्ली दरबार में ही हुई हो.बिला शक यह कह सकता हूँ कि यदि ग़ालिब भी लता जी को सुन रहे होते तो उनके मुँह से वाह बेटी ;वाह ! सुभानअल्लाह निकल ही जाता ।

आग़ाज़ करते हैं ग़ालिब की इन दो ग़ज़लों से..........

दर्द मिन्नत कशे दवा ना हुआ...



हर एक बात पे कहते हो तुम...

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

कोई ना रोको दिल की उड़ान को...

लता संगीत उत्सव की नई प्रस्तुति

प्रस्तावना: लता दीदी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ। लता दीदी की प्रसंशा में बहुत कुछ कहा गया है। फिर भी तारीफें अधूरी लगती हैं। मैंने दीदी के लिए सही शब्द ढूँढ़ने की कोशिश की तो शब्दकोष भी सोच में पड़ गया। कहते है, "लोग तमाम ऊँचाइयों तक पहुँचे हैं...पर जिस मुकाम तक लताजी पहुँची हैं...वहाँ तक कोई नहीं पहुँच सकता..." दीदी से रु-ब-रु होने का सौभाग्य तो अब तक प्राप्त नहीं हुआ, पर दीदी के गीत हमेशा साथ रहते है। लता दीदी वो कल्पवृक्ष हैं जो रंग-बिरंगी मीठे मधुर मनमोहक गीत-रूपी फूल बिखीरती रहती है. दीदी के देशभक्ति गीत सुनकर हौसले बुलंद होते हैं, अमर गाथा सुनकर आखों में पानी भर आता है, लोरी सुन कर ममता का एहसास होता है, खुशी के गीत सुनकर दिल को सुकून मिलता है, दर्द-भरे नगमे दिल की गहराई को छू जाते हैं, भजन सुनकर भक्ति भावना अपने शिखर तक पहुँचती है, और प्रेम गीत सुनकर लगता है जैसे प्रेमिका गा रही हो. जब भी लताजी के गीत सुनता हूँ तो मेरा दिल तो कहने लगता है ... "आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है..."


"कोई ना रोको दिल की उड़ान को..."



लता दीदी के साथ वहीदा रहमान
दीदी के हज़ारों गीतों में "...काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल" मेरी रूह को छू जाता है। गीत के बोल शैलेंद्र ने लिखे हैं और संगीत में पिरोया है एस॰ डी॰ बर्मन ने। मन की मुक्ति को और लताजी की महकती हुई आवाज़ को परदे पर बेहतरीन तौर से निभाया है रोजी यानी वहीदा रहमान ने। 1965 में नवकेतन इंटरनेशनल्स के बैनर तले बननी फिल्म गाइड, आर के लक्ष्मण के उपन्यास 'द गाइड' पर आधारित है। राजू यानी देव आनंद की एक साधारण गाइड से जैल तक, फिर एक सन्यासी से जीवन-मुक्ति तक की अजीब कहानी और रोजी का नृत्या-कला का दीवानापन हमें ज़िंदगी के तमाम पहलुओं से मुखातिर करता है.


इस फिल्म में नृत्या-कला की महानता को बड़ी ही सुंदर सरल और सहज तरीके से प्रस्तुत किया है। जब रोजी दुनियादारी के सारे बंधन तोड़कर अपने-आप को आज़ाद महसूस करती है तो झूमते हुए कहती है .. कोई ना रोको दिल की उड़ान को...दिल हो चला.. हा॰॰हा॰॰॰हा॰॰॰॰आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है. रोजी का मन आज़ाद होने का भाव शायद इससे अकचे शब्दों में बयान नहीं हो सकता था। वहीदा रहमान के चेहरे के हाव-भाव इस गीत में रंग भर देते हैं। बर्मन-दा ने इस गीत में ढोलकी का विशेष प्रयोग किया है...जिससे कि गीत की लय और भी सुरीली हो जाती है।


गीत की मिठास, गीत का एहसास, गीत का संदेश, और शब्दों की महत्ता को मुककमल करती है लता दीदी की मखमली आवाज़। दीदी अलाप से शुरू करती है ... "आऽ आ...काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल

कोई ना रोको दिल की उड़ान को, दिल हो चला
आज फिर जीने की तमन्ना हैं
आज फिर मरने का इरादा है..."


दीदी के आवाज़ की स्पष्टता और उच्चारण शफ़क-पानी की तरह साफ है. यही वजह हो सकती है की लोग दीदी को माँ सरस्वती भी कहते हैं. गीत उसी गति से आगे बढ़ता है..और दीदी गाती है:


गाइड फिल्म का पोस्टर
अपने ही बस में नहीं मैं, दिल हैं कहीं तो हूँ कहीं मैं
जाने क्या पा के मेरी जिंदगी ने, हँस कर कहा
आज फिर ...

मैं हूँ गुबार या तूफान हूँ, कोई बताए मैं कहा हूँ
डर हैं सफ़र में कहीं खो ना जाऊँ मैं, रस्ता नया
आज फिर ...

कल के अंधेरों से निकल के, देखा हैं आँखे मलते-मलते
फूल ही फूल जिंदगी बहार हैं, तय कर लिया
आज फिर ...


गाने के अंतिम स्वर को अलाप का रूप दिया है, जो लताजी की आवाज़ में और भी मीठा लगता है; जैसे:

...दिल वो चला आ आ आ आआ
...हँस कर कहा आ आ आ आआ
...रस्ता नया आ आ आ आआ
...तय कर लिया आ आ आ आआ


ये उन अनकहे शब्दों को दर्शता जो रोजी का मन और शैलेंद्र की कलम दोनों नहीं बता पाते..और फिर तुरंत "आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है..." लता दीदी का मानो जादू है.


बर्मन-दा संगीत तैयार करने से पहले हमेशा उस संगीत को तब तक सुनते थे जब तक कि उब ना जाए. किसी ने पूछा ऐसा क्यूँ, तो दादा ने अपनी बांग्ला-हिन्दी में कहा "...हम तुबतक सुनता है, जब तक हम बोर नहीं होता..अगर बोर हुआ तो हम गाना नही बोनाता" ... यकीन मानिए, हज़ारों बार सुन कर भी बोर होने का ख़याल तक नहीं आता. बल्कि ये गीत और लता दीदी की सुरीली तान, मन को सातवें आसमान तक पहुँचा देती है; मानो इससे अच्छा कुछ नहीं. या अरबी में "सुभान अल्लाह!"

गीत सुनें और वीडियो देखें


फिल्म से जुड़ी कुछ और बातें:

गाइड फिल्म हिन्दुस्तान की 25 महान फ़िल्मो में शामिल है. फिल्म इतनी मशहूर हुई कि इससे हॉलीवुड में फिर बनाया गया; जो कुछ ख़ास नहीं कर पाई. क्यूँकि बर्मन-दा का संगीत, देव आनंद और वहीदा रहमान का अभिनय, और लता दीदी की आवाज़ इस फिल्म से अलग होती है तो ये फिल्म महज़ एक उपन्यास ही बनी रहती है। फ़िल्मफेयर अवॉर्ड्स में इस फिल्म को 7 अवॉर्ड्स मिले. गाइड फिल्म का सदाबहार संगीत, संगीत—जगत में एक मिसाल बन चुका है.


दीदी के लिए दो शब्द:

बड़ा गर्व महसूस होता है ये जानकार की हम उसी धरती पर पैदा हुए जहाँ लताजी है। दीदी की आवाज़ सुनकर लगता है जैसे ज़िंदगी में सबकुछ हासिल हो गया। और मेरा दिल भी गाने लगता है... कोई ना रोको दिल की उड़ान को, दिल हो चला ....हा हा हाऽऽ आ; आज फिर जीने की तम्मना है..ऽ आज फिर मरने का इरादा है..."

लेखक के बारे में-
22 वर्षीय अनूप मनचलवार नागपुर, महाराष्ट्र के रहवासी है. साहित्य, समाज-सेवा, राजनीति, और कला में विशेष रूचि रखते हैं। इनके बारे में इतना कहना काफ़ी है कि ये लता दीदी के फैन है.
ईमेल-: manchalwar@gmail.com
पता- जानकी निवास, कोरदी रोड, मांकपुर, नागपुर – 440 030


अनूप द्वारा अभिकल्पित लता दीदी की स्लाइड

मंगलवार, 9 सितंबर 2008

लता संगीत उत्सव ( २ ) - लावण्या शाह

आज भी कहीं कुरमुरा देख लेतीं हैं उसे मुठ्ठी भर खाए बिना वे आगे नहीं बढ़ पातीं..

लता संगीत उत्सव की दूसरी कड़ी के रूप में हम आज लेकर आए हैं, लता जी की मुंहबोली छोटी बहन और मशहूर कवि गीतकार, स्वर्गीय श्री पंडित नरेन्द्र शर्मा (जिन्होंने नैना दीवाने, ज्योति कलश छलके, और सत्यम शिवम् सुन्दरम जैसे अमर गीत रचे हैं) की सुपुत्री, लावण्या शाह का यह आलेख -

पापाजी और दीदी, २ ऐसे इंसान हैं जिनसे मिलने के बाद मुझे ज़िंदगी के रास्तों पे आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिली है -
सँघर्ष का नाम ही जीवन है। कोई भी इसका अपवाद नहीं- सत्चरित्र का संबल, अपने भीतर की चेतना को प्रखर रखे हुए किस तरह अंधेरों से लड़ना और पथ में कांटे बिछे हों या फूल, उनपर पग धरते हुए, आगे ही बढ़ते जाना ये शायद मैंने इन २ व्यक्तियों से सीखा। उनका सानिध्य मुझे ये सिखला गया कि अपने में रही कमजोरियों से किस तरह स्वयं लड़ना जरुरी है- उनके उदाहरण से हमें इंसान के अच्छे गुणों में विश्वास पैदा करवाता है।

पापा जी का लेखन,गीत, साहित्य और कला के प्रति उनका समर्पण और दीदी का संगीत, कला और परिश्रम करने का उत्साह, मुझे बहुत बड़ी शिक्षा दे गया।

उन दोनों की ये कला के प्रति लगन और अनुदान सराहने लायक है ही परन्तु उससे भी गहरा था उनका इंसानियत से भरापूरा स्वरूप जो शायद कला के क्षेत्र से भी ज्यादा विस्तृत था। दोनों ही व्यक्ति ऐसे जिनमें इंसानियत का धर्म कूटकूट कर भरा हुआ मैंने बार बार देखा और महसूस किया ।

जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है, उसे किसी भी रूप में उठालो, वह समान रूप से दमकता मिलेगा वैसे ही दोनों को मैंने हर अनुभव में पाया। जिसके कारण आज दूरी होते हुए भी इतना गहरा सम्मान मेरे भीतर पैठ गया है कि दूरी महज एक शारीरिक परिस्थिती रह गयी है। ये शब्द फिर भी असमर्थ हैं मेरे भावों को आकार देने में --

दीदी ने अपनी संगीत के क्षेत्र में मिली हर उपलब्धि को सहजता से स्वीकार किया है और उसका श्रेय हमेशा परमपिता ईश्वर को दे दिया है। पापा और दीदी के बीच, पिता और पुत्री का पवित्र संबंध था जिसे शायद मैं मेरे संस्मरण के द्वारा बेहतर रीत से कह पाऊँ -

हम ३ बहनें थीं - सबसे बड़ी वासवी, फिर मैं, लावण्या और मेरे बाद बांधवी.

हाँ, हमारे ताऊजी की बिटिया गायत्री दीदी भी सबसे बड़ी दीदी थीं जो हमारे साथ-साथ अम्मा और पापाजी की छत्रछाया में पलकर बड़ी हुईं। पर सबसे बड़ी दीदी, लता दीदी ही थीं- उनके पिता पण्डित दीनानाथ मंगेशकर जी के देहांत के बाद १२ वर्ष की नन्ही सी लडकी के कन्धों पे मंगेशकर परिवार का भार आ पड़ा था जिसे मेरी दीदी ने बहादुरी से स्वीकार कर लिया और असीम प्रेम दिया अपने बाई बहनों को जिनके बारे में, ये सारे किस्से मशहूर हैं। पत्र पत्रिकाओं में आ भी गए हैं--उनकी मुलाक़ात, पापा से, मास्टर विनायक राव जो सिने तारिका नंदा के पिता थे, के घर पर हुई थी- पापा को याद है दीदी ने "मैं बन के चिड़िया, गाऊँ चुन चुन चुन" ऐसे शब्दों वाला एक गीत पापा को सुनाया था और तभी से दोनों को एक-दूसरे के प्रति आदर और स्नेह पनपा--- दीदी जान गयी थीं पापा उनके शुभचिंतक हैं- संत स्वभाव के गृहस्थ कवि के पवित्र हृदय को समझ पायी थीं दीदी और शायद उन्हें अपने बिछुडे पिता की छवि दीखलाई दी थी। वे हमारे खार के घर पर आयी थीं जब हम सब बच्चे अभी शिशु अवस्था में थे और दीदी अपनी संघर्ष यात्रा के पड़ाव एक के बाद एक, सफलता से जीत रहीं थीं-- संगीत ही उनका जीवन था-गीत साँसों के तार पर सजते और वे बंबई की उस समय की लोकल ट्रेन से स्टूडियो पहुंचतीं जहाँ रात देर से ही अकसर गीत का ध्वनि-मुद्रण सम्पन्न किया जाता चूंकि बंबई का शोर-शराबा शाम होने पे थमता- दीदी से एक बार सुन कर आज दोहराने वाली ये बात है !

कई बार वे भूखी ही, बाहर पड़ी किसी बेंच पे सुस्ता लेती थीं, इंतजार करते हुए ये सोचतीं "कब गाना गाऊंगी पैसे मिलेंगें और घर पे माई और बहन और छोटा भाई इंतजार करते होंगें, उनके पास पहुँचकर आराम करूंगी!" दीदी के लिए माई कुरमुरों से भरा कटोरा ढँक कर रख देती थी जिसे दीदी खा लेती थीं पानी के गिलास के साथ सटक के ! आज भी कहीं कुरमुरा देख लेती हैं उसे मुठ्ठी भर खाए बिना वे आगे नहीं बढ़ पातीं :)

ये शायद उन दिनों की याद है- क्या इंसान अपने पुराने समय को कभी भूल पाया है? यादें हमेशा साथ चलती हैं, ज़िंदा रहती हैं-- चाहे हम कितने भी दूर क्यों न चले जाएँ --

फ़िर समय चक्र चलता रहा - हम अब युवा हो गए थे -- पापा आकाशवाणी से सम्बंधित कार्यों के सिलसिले में देहली भी रहे .फिर दुबारा बंबई के अपने घर पर लौट आए जहाँ हम अम्मा के साथ रहते थे, पढाई करते थे। हमारे पड़ौसी थे जयराज जी- वे भी सिने कलाकार थे और तेलगु, आन्ध्र प्रदेश से बंबई आ बसे थे। उनकी पत्नी सावित्री आंटी, पंजाबी थीं (उनके बारे में आगे लिखूंगी ) -- उनके घर फ्रीज था सो जब भी कोई मेहमान आता, हम बरफ मांग लाते शरबत बनाने में ये काम पहले करना होता था और हम ये काम खुशी-खुशी किया करते थे ..पर जयराज जी की एक बिटिया को हमारा अकसर इस तरह बर्फ मांगने आना पसंद नही था- एकाध बार उसने ऐसा भी कहा था "आ गए भिखारी बर्फ मांगने!" जिसे हमने , अनसुना कर दिया। :-))... आख़िर हमारे मेहमान का हमें उस वक्त ज्यादा ख़याल था ...ना कि ऐसी बातों का !!
बंबई की गर्म, तपती हुई जमीन पे नंगे पैर, इस तरह दौड़ कर बर्फ लाते देख लिया था हमें दीदी नें .....
और उनका मन पसीज गया !

- जिसका नतीजा ये हुआ के एक दिन मैं कॉलिज से लौट रही थी,बस से उतर कर, चल कर घर आ रही थी ... देखती क्या हूँ कि हमारे घर के बाहर एक टेंपो खड़ा है जिसपे एक फ्रिज रखा हुआ है रस्सियों से बंधा हुआ।

तेज क़दमों से घर पहुँची, वहाँ पापा, नाराज, पीठ पर हाथ बांधे खड़े थे। अम्मा फिर जयराज जी के घर-दीदी का फोन आया था-वहाँ बात करने आ-जा रहीं थीं ! फोन हमारे घर पर भी था, पर वो सरकारी था जिसका इस्तेमाल पापा जी सिर्फ़ काम के लिए ही करते थे और कई फोन हमें, जयराज जी के घर रिसीव करने दौड़ कर जाना पड़ता था। दीदी, अम्मा से मिन्नतें कर रहीं थीं "पापा से कहो ना भाभी, फ्रीज का बुरा ना मानें। मेरे भाई-बहन आस-पड़ौस से बर्फ मांगते हैं ये मुझे अच्छा नहीं लगता- छोटा सा ही है ये फ्रीज ..जैसा केमिस्ट दवाई रखने के लिए रखते हैं ... ".अम्मा पापा को समझा रही थीं -- पापा को बुरा लगा था -- वे मिट्टी के घडों से ही पानी पीने के आदी थे। ऐसा माहौल था मानो गांधी बापू के आश्रम में फ्रीज पहुँच गया हो!!

पापा भी ऐसे ही थे। उन्हें क्या जरुरत होने लगी भला ऐसे आधुनिक उपकरणों की? वे एक आदर्श गांधीवादी थे- सादा जीवन ऊंचे विचार जीनेवाले, आडम्बर से सर्वदा दूर रहनेवाले, सीधे सादे, सरल मन के इंसान !

खैर! कई अनुनय के बाद अम्मा ने, किसी तरह दीदी की बात रखते हुए फ्रीज को घर में आने दिया और आज भी वह, वहीं पे है ..शायद मरम्मत की ज़रूरत हो ..पर चल रहा है !

हमारी शादियाँ हुईं तब भी दीदी बनारसी साडियां लेकर आ पहुँचीं ..अम्मा से कहने लगीं, "भाभी,लड़कियों को सम्पन्न घरों से रिश्ते आए हैं। मेरे पापा कहाँ से इतना खर्च करेंगें? रख लो ..ससुराल जाएँगीं, वहाँ सबके सामने अच्छा दीखेगा" -- कहना न होगा हम सभी रो रहे थे ..और देख रहे थे दीदी को जिन्होंने उमरभर शादी नहीं की पर अपनी छोटी बहनों की शादियाँ सम्पन्न हों उसके लिए साड़ियां लेकर हाजिर थीं ! ममता का ये रूप, आज भी आँखें नम कर रहा है जब ये लिखा जा रहा है ...मेरी दीदी ऐसी ही हैं। भारत कोकीला और भारत रत्ना भी वे हैं ही ..मुझे उनका ये ममता भरा रूप ही,याद रहता है --



फिर पापा की ६०वीं साल गिरह आयी-- दीदी को बहुत उत्साह था कहने लगीं- "मैं,एक प्रोग्राम दूंगीं,जो भी पैसा इकट्ठा होगा, पापा को भेंट करूंगी।"

पापा को जब इस बात का पता लगा वे नाराज हो गए, कहा- "मेरी बेटी हो, अगर मेरा जन्मदिन मनाना है, घर पर आओ, साथ भोजन करेंगें, अगर मुझे इस तरह पैसे दिए, मैं तुम सब को छोड़ कर काशी चला जाऊंगा, मत बांधो मुझे माया के फेर में।"

उसके बाद, प्रोग्राम नहीं हुआ- हमने साथ मिलकर, अम्मा के हाथ से बना उत्तम भोजन खाया और पापा अति प्रसन्न हुए।
आज भी यादों का काफिला चल पड़ा है और आँखें नम हैं ...इन लोगों जैसे विलक्षण व्यक्तियों से, जीवन को सहजता से जीने का, उसे सहेज कर, अपने कर्तव्य पालन करने के साथ, इंसानियत न खोने का पाठ सीखा है उसे मेरे जीवन में कहाँ तक जी पाई हूँ, ये अंदेशा नहीं है फिर भी कोशिश जारी है .........

- लावण्या

(चित्र - स्वर कोकिला सुश्री लता मंगेशकर पँडित नरेन्द्र शर्मा की " षष्ठिपूर्ति " के अवसर पर, माल्यार्पण करते हुए)

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