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Sunday, October 13, 2019

राग विभास : SWARGOSHTHI – 438 : RAG VIBHAS






स्वरगोष्ठी – 438 में आज

भैरव थाट के राग – 4 : राग विभास

पं. उल्हास कशालकर से राग विभास में खयाल और सुरेश वाडकर से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित उल्हास कशालाकर
सुरेश वाडकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “विभास” पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के चौथे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में राग विभास में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुरेश वाडकर के स्वर में सुनवाएँगे। 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” से वसन्त देव का लिखा और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का संगीतबद्ध किया एक गीत – “साँझ ढले गगन तले...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



राग विभास का सम्बन्ध भैरव थाट से माना जाता है। इसमें मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। केवल पाँच स्वर होने से राग की जाति औड़व-औड़व होती है। ऋषभ और धैवत स्वर कोमल इस्तेमाल होता है और शेष स्वर शुद्ध इस्तेमाल किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग विभास का गायन-वादन दिन के पहले प्रहर में सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। यह राग उत्तरांग प्रधान है, अतः इसका चलन मध्य सप्तक के उत्तर अंग और तार सप्तक के पूर्व अंग में अधिक होता है। राग विभास के तीन प्रकार होते हैं। भैरव थाट के अलावा अन्य दो प्रकार पूर्वी और मारवा थाट जन्य राग होते है। तीनों विभास राग एक दूसरे से अलग होते हैं। परन्तु भैरव थाट जन्य राग विभास का प्रचलन अधिक है। इस राग की प्रकृति शान्त और गम्भीर होती है। इसमें धैवत स्वर पर सावकाश आन्दोलन किया जाता है। राग विभास में ऋषभ स्वर कोमल और गान्धार स्वर शुद्ध होता है, अतः यह प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश राग माना जाता है। पूर्वी थाट जन्य राग रेवा में राग विभास के ही स्वरे लगते हैं। अन्तर यह है कि राग रेवा पूर्वांग प्रधान राग है और इसका गायन-वादन समय सायंकाल सन्धिप्रकाश का है, जबकि विभास भैरव थाट जन्य उत्तरांग प्रधान प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में आपको राग विभास, तीनताल में निबद्ध एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं। खयाल के बोल हैं – “कहे कुम्हरवा जायल हमरा...”

राग विभास : “कहे कुम्हरवा जायल हमरा...” : पण्डित उल्हास कशालकर


आज का राग है, विभास। इस राग पर आधारित 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” का एक गीत हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इस फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। इसी वर्ष लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के ही संगीत निर्देशन में बनी एक और फिल्म, “सुर संगम” के राग आधारित गीत हम “स्वरगोष्ठी” के पिछले कुछ अंकों में प्रस्तुत कर चुके हैं। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल उन बिरले संगीतकारों में थे, जिनकी पहली फिल्म “पारसमणि” का संगीत लोकप्रियता की कसौटी पर खरा उतरा। उनकी लोकप्रियता का आधार राग आधारित अथवा लोकसंगीत आधारित रचनाओं की धुनें हैं। उनके संगीत में तालों का अनूठा प्रयोग परिलक्षित होता है। फिल्म “उत्सव” एक संस्कृत नाटक के आधार पर प्राचीन पाटलीपुत्र के परिवेश में बनी फिल्म है। इसके सभी गीत रागों का आधार लिये हुए है। फिल्म में राग विभास पर आधारित दो गीत हैं, -“साँझ ढले गगन तले...” और –“नीलम के नभ...”। आज के अंक में हमने पार्श्वगायक सुरेश वाडकर के स्वर में गाया गया गीत –“साँझ ढले गगन तले...” का चयन हमने आपके लिए किया है। वसन्त देव की गीत रचना को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने राग विभास के स्वरों में निबद्ध किया है। आप यह रचना सुनिए और मुझे “स्वरगोष्ठी” के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग विभास : “साँझ ढले गगन तले...” : सुरेश वाडकर : फिल्म – उत्सव



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 438वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 19 अक्तूबर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 440 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 436वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जोगिया, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – कमल बारोट और महेन्द्र कपूर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने भैरव थाट के जन्य राग विभास का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में इस राग की एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। राग विभास के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध गायक सुरेश वाडकर के स्वर में फिल्म “उत्सव” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम भैरव थाट के एक अन्य जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग विभास : SWARGOSHTHI – 438 : RAG VIBHAS : 13 अक्तूबर, 2019


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