Saturday, October 9, 2010

ओल्ड इस गोल्ड - सफर अब तक

'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का फिर एक बार स्वागत है। दोस्तों, अभी परसों ही हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ५००-वें पड़ाव पर आ कर रुके हैं, और कल से यह सुरीला कारवाँ फिर से चल पड़ेगा अपने १०००-वें पड़ाव की तरफ़। इस उपलब्धि पर आप सब ने जिस तरह से हमें बधाई दी है, जिस तरह से हमारे प्रयास को स्वीकारा और सराहा है, हम अपनी व्यस्त ज़िंदगी से बहुत ही मुश्किल से समय निकाल कर इस स्तंभ को प्रस्तुत करते हैं, लेकिन आप सब के इतने प्यार और सराहना पाकर हमें वाक़ई ऐसा लगने लगा है कि हम अपनी मक़सद में कामयाब हुए हैं। और इंदु जी ने तो बिल्कुल सही कहा है कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की बदौलत हम जैसे एक परिवार में बंध गये हैं। हम एक दूसरे को जानने और पहचानने लगे हैं। और ये पुराने सुमधुर गानें ही जैसे एक डोर से हमें आपस में बांधे हुए हैं। तो दोस्तों, कल से इस सुरीले सफ़र पर फिर से चल निकलने से पहले क्यों ना आज हम पीछे मुड़ कर एक बार फिर से गुज़रें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पीछे छोड़ आये उन सुरीले गलियारों से। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के कई ऐसे श्रोता व पाठक हैं जो हम से इस स्तंभ के पहले अंक से अब तक जुड़े हुए हैं, और बहुत से साथी ऐसे भी हैं जो बाद में हमसे जुड़े, और कुछ साथी तो अभी हाल ही में जुड़े हैं। तो आप सभी के लिए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं यह विशेषांक 'ओल्ड इज़ गोल्ड - सफ़र अब तक'। इस आलेख को पढ़ने के बाद हमारे नये साथियों को एक अंदाज़ा हो जाएगा कि किस तरह से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का सफ़र अब तक हमने तय किया है, किस तरह के गानें इसमें बजे हैं, और कैसी रही अब तक की यह सुमधुर यात्रा।

२० फ़रवरी २००९ को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का पहला अंक प्रस्तुत हुआ था जिसमें बजा था फ़िल्म 'नीला आकाश' का गीत "आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है"। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी के गाये इस युगल गीत से इस शृंखला का आग़ाज़ हुआ था, इसलिए आपको लगे हाथ यह भी बताते चलें कि आशा-रफ़ी के कुल १० युगल गीत अब तक इस स्तंभ में बज चुके हैं और ये बाकी के ९ गानें हैं - "रात के हमसफ़र थक के घर को चले", "देखो क़सम से कहते हैं तुमसे हाँ", नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है", "बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी", "ज़मीं से हमें आसमाँ पर", दीवाना मस्ताना हुआ दिल", "ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली", "आप युही अगर हमसे मिलते रहे" और "राज़ की बात कहदूँ तो जाने महफ़िल में फिर क्या हो"। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का ५०-वाँ अंक हमने समर्पित किया फ़िल्म जगत के पहले सिंगिंग सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल साहब को और हमने बजाया फ़िल्म 'शाहजहाँ' से "ग़म दिये मुस्तक़िल कितना नाज़ुक है दिल"। दोस्तों, जब 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शुरु हुआ था, उस समय हम इसे लघु शृंखलाओं में नहीं बाँटा करते थे। १००-वें अंक तक हम इसमें मिले-जुले गानें ही बजाते रहे। १००-वाँ हमने मनाया 'मुग़ल-ए-आज़म' की मशहूर रचना "प्यार किया तो डरना क्या" के साथ।

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के १०० अंक हो जाने पर हमें लगा कि अब इसमें कुछ बदलाव करना ज़रूरी है। इसी के मद्देनज़र हमनें तय किया कि मिले जुले गानों के साथ साथ बीच बीच में कुछ लघु शंखलाएँ भी चलाई जाए जो केन्द्रित हो किसी कलाकार विशेष पर। इस राह पर हमारी पहली प्रस्तुति थी राज कपूर विशेष', जिसके तहत हमने कुल ७ गीत बजाये 'बरसात', 'आवारा', 'जागते रहो', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'श्री ४२०',और 'मेरा नाम जोकर' फ़िल्मों से। क्योंकि उन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' रोज़ाना पेश होता था, इसलिए इन लघु शृंखलाओं को हम ७ कड़ियों में सीमित करते थे। 'राज कपूर विशेष' के बाद करीब करीन १ महीने के अंतराल के बाद हमारी दूसरी लघु शृंखला आयी संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजी हुई। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के १५०-वें अंक के लिए हमने चुना अनोखे संगीतकार सज्जाद साहब का स्वरबद्ध गीत "ये हवा ये रात ये चांदनी", फ़िल्म 'संगदिल' से। ३१ जुलाई को रफ़ी साहब के याद का दिन होता है और ४ अगस्त हमारे किशोर दा का जन्मदिवस। तो इन दोनों अज़ीम फ़नकारों के नाम हमने एक के बाद एक दो लघु शृंखलाएँ समर्पित किए - पहली शृंखला थी 'दस चेहरे और एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' तथा 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़ - किशोर कुमार'। जैसे कि इन शीर्षकों से साफ़ ज़ाहिर है, अब ये शृंखलाएँ १० कड़ियों के बन चुके थे। किशोर दा के इस शृंखला के तुरंत बाद १५ अगस्त २००९ के अवसर पर हमने एक के बाद एक तीन देश भक्ति गीत शामिल किए - "ताक़त वतन की तुमसे है", "छोड़ो कल की बातें", और "मेरे देश की धरती सोना उगले"।

'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ का एक ख़ास आकर्षण होता है 'पहेली प्रतियोगिता'। हर रोज़ हम आपको कुछ सूत्र देते हैं अगले दिन के गीत के बारे में और आपको अंदाज़ा लगाना पड़ता है उस गीत का। तो इस प्रतियोगिता के पहले विजेयता बने थे शरद तैलंग जी, और उन्हें इनाम स्वरूप हमने उन्हें मौका दिया था अपने पसंद के पाँच गीत बजाने का। उनके पसंद के पाँच गानें बजे थे १७६ से लेकर १८० कड़ी के बीच। २७ अगस्त २००९ को मुकेश की पुण्यतिथि के अवसर पर हमने मुकेश जी के ही पसंद के १० गीतों को चुन कर प्रस्तुत की लघु शृंखला 'दस गीत जो थे मुकेश को प्रिय'। फिर बारी आयी ८ सितंबर को गायिका आशा भोसले को जन्मदिन की बधाई देने की। बधाई स्वरूप हमने आयोजित की लघु शृंखला 'दस गायक और एक आपकी आशा'। आशा भोसले के साथ १० अन्य गायकों के गाये युगल गीतों की यह शृंखला सम्पन्न हुई 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के २००-वें अंक पर और उस दिन हमने बजाया था "दीवाना मस्ताना हुआ दिल", फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' से। फिर हमें मिली 'पहेली प्रतियोगिता' की दूसरी विजेयता स्वप्न मंजुषा शैल 'अदा' और हमने उनके भी पसंद के पाँच गानें सुनवाए। आज अदा जी हमारी महफ़िल में नहीं पधारतीं, लेकिन वो जहाँ कहीं भी हैं हमारी शुभकामनाएँ उनके साथ हैं।

सितंबर के महीने का आख़िरी सप्ताह हो और हम लता जी के गीतों को याद ना करें ऐसा भला कैसे हो सकता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि लता के गाये किन १० गीतों को चुने? अगर उनके गाये लोकप्रिय गीतों को चुनने की बात है तो फिर किन १० गीतॊं को चुना जाए यह एक बेहद मुश्किल और नामुमकिन सा सवाल खड़ा हो जाता है। इसलिए हमने तय किया कि लता जी के गाये १० दुर्लभ गीतों को आपके साथ बाँटा जाए। हमारे इस प्रयास में सहयोग के लिए सामने आए नागपुर के श्री अजय देशपाण्डे, जिन्होंने लता जी के गाए कुछ बेहद दुर्लभ गीत हमें चुन कर भेजे और जिनसे सजाकर हमने पेश की 'मेरी अवाज़ ही पहचान है'। यह तो थी सन् २००९ की। अजय जी ने इस साल भी उससे भी ज़्यादा दुर्लभ गीतों की एक और सीरीज़ हमें भेजी और इस साल भी हाल ही में हमने उन्हें आप तक पहुँचाया 'लता के दुर्लभ दस' लघु शृंखला के तहत। इस तरह से २००९ और २०१०, दोनों साल हमने बहुत ही ख़ास तरीके से मनाया लता जी का जन्मदिन।

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के २२०-वे अंक से हमने फिर एक बार अपना रुख़ ज़रा सा मोड़ा। अब तक हम लघु शृंखलाएँ केवल कलाकारों पर केन्द्रित ही करते आये थे, लेकिन अब हमें लगा कि कुछ अन्य विषयों पर भी ऐसी शृंखलाएँ चलाई जाएँ ताकि फ़िल्म संगीत के विभिन्न पक्षों पर और गहराई और करीबी से नज़र डाल सकें। इस प्रयास में पहली शृंखला पेश हुई 'दस राग दस रंग', जिसमें १० शास्त्रीय रागों पर आधारित १० गीत आपको सुनवाए। अक्तुबर २००९ के अंतिम सप्ताह के आसपास साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन, दोनों की ही पुण्यतिथि आती है, और इत्तेफ़ाक़ की बात है कि इन दोनों ने साथ साथ बहुत काम किए हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने साहिर साहब के लिखे और बर्मन दादा के स्वरबद्ध किए १० गीतों की एक लघु शृंखला आयोजीत की 'जिन पर नाज़ है हिंद को'। "जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं?" इसी नज़्म के साथ पूरी हुई थी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की २५०-वीं कड़ी।

२५१ से लेकर २५५ अंकों में हमने बजाये थे पहेली प्रतियोगिता की तीसरी विजेयता पूर्वी जी के पसंद के पाँच गानें। फिर उसके बाद बाल दिवस के आसपास हमने सुनें बच्चों के कुछ गानें 'बचपन के दिन भुला ना देना' शृंखला के अंतर्गत। इसमें "नानी तेरी मोरनी", "नन्हा मुन्ना राही हूँ", "बच्चे मन के सच्चे", "मास्टरजी की आ गई चिट्ठी", "इचक दाना बीचक दाना", "चक्के पे चक्का", "दादी अम्मा मान जाओ", "है ना बोलो बोलो", "तेरी है ज़मीं" और "लकड़ी की काठी" जैसे लोकप्रिय गानें हमने शामिल किए थे। उसके बाद आई लघु शृंखला 'गीतांजली', यानी कि गायिका गीता दत्त के गाए १० गीत जो फ़िल्माये गये हैं १० अलग अलग अभिनेत्रियों पर। और इन्हें और इन गीतों के बारे में तमाम जानकारियाँ इकत्रित कर हमें भेजा था गीता जी के परम भक्त श्री पराग सांकला जी ने। गीत दत्त के तुरंत बाद हमने आयोजित की गीतकार शैलेन्द्र की रचनाओं पर केन्द्रित शृंखला 'शैलेन्द्र - आर.के.फ़िल्म्स के इतर भी'। शीर्षक से ही स्पष्ट है कि इसमें कुछ ऐसे गानें बजे होंगे जो राज कपूर निर्मित फ़िल्में नहीं थीं। पराग सांकला जी का एक बार फिर से ज़िक्र करना ज़रूरी है क्योंकि वो ही बने थे हमारे पहेली प्रतियोगिता के चौथे विजेयता और उनके पसंद के पाँच गानें हमने सुने थे २९१ से २९५ कड़ियों के बीच। और २९६ से ३०० कड़ियों में हमने एक बार फिर से बजाये शरद तैलंग जी के पसंद के गानें जो एक बार फिर से पहेली प्रतियोगिता के विजेयता बने थे। इस तरह से शरद जी को हमने महागुरु की उपाधि दे दी। और इसी के साथ साल २००९ का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का सफ़र पूरा हो गया।

चंद रोज़ के अंतराल के बाद १ जनवरी २०१० से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का सफ़र फिर से शुरु हुआ और क्योंकि ४ जनवरी को आर.डी.बर्मन की पुण्यतिथि होती है, इसलिए उन्ही पर केन्द्रित शृंखला से यह सफ़र शुरु हुआ। 'पंचम के दस रंग' शृंखला के बाद श्रद्धांजली के सिलसिले को बरकरार रखते हुए हमने आयोजित की शृंखला 'स्वरांजली' जिसके तहत हमने उन कलाकारों को श्रद्धांजली अर्पित की जिनका जनवरी के महीने में जन्मदिवस या पुण्यतिथि होती है। जिन कलाकारों को हमने इसमें शामिल किया था वो हैं येसुदास, सी. रामचन्द्र, जयदेव, चित्रगुप्त, कैफ़ी आज़्मी, ओ.पी.नय्यर, जावेद अख़्तर, कुंदन लाल सहगल, क़मर जलालाबादी और महेन्द्र कपूर। "ऐसिच हूँ मैं" कहकर सबका दिल जीतने वाली हमारी प्यारी दोस्त इंदु जी बनीं 'ओल्ड इज़ गोल्ड पहेली प्रतियोगिता' की अगली विजेयता और उन्होंने हमे सुनवाये अपने पसंद के पाँच लाजवाब गानें ३२१ से ३२५ अंकों में। साल २००९ के अंतिम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी, यानी कि ३००-वीं कड़ी में हमने पूछा था एक महासवाल, जिसमें कुल १० सवाल थे। इन दस सवालों में सब से ज़्यादा सही जवाब दिया शरद तैलंग जी ने और बनें इस महासवाल प्रतियोगिता के महाविजेयता। इसलिए इंदु जी के पाँच गीतों के बाद हमने उनकी पसंद के भी चार गीत सुनें, और ३३० वीं कड़ी में ३० जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को श्रद्धा सुमन स्वरूप हमने बजाया था फ़िल्म 'जागृति' का गीत "साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल"।

फिर उसके बाद हमने एक के बाद एक दो ऐसी शृंखलाएँ प्रस्तुत कीं जिनमें थे भूले बिसरे रंग। पहली शृंखला थी 'हमारी याद आयेगी' जिसमें हमने दस कमचर्चित गायिकाओं के गानें शामिल किए, और दूसरी शृंखला थी 'प्योर गोल्ड' जिसमें ४० के दशक के १० सालों के एक एक गीत बजाये गये। इस तरह से हम पहुँच गये ३५० वीं मंज़िल पर। तलत महमूद के गाये दस ग़ज़लों से कारवाँ फिर आगे बढ़ा और हमने मनायी होली दस रंगीन गीतों के साथ शृंखला 'गीत रंगीले' के माध्यम से। 'दस गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला को भी लोगों ने पसंद किया और उसके बाद हम गीतकार आनंद बक्शी साहब के लिखे गीतों का आनंद लिया 'मैं शायर तो नहीं' शृंखला में। 'सखी सहेली', फ़ीमेल डुएट्स पर केन्द्रित इस शृंखला के अंतिम गीत के रूप में हमने चुना था लता और आशा का गाया "मन क्यों बहका री बहका" और वह था 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का अंक क्रमांक - ४००। इस मंज़िल तक पहुँचने के बाद हमें लगा कि अब बिना किसी शर्त के, बिना किसी प्रतियोगिता के हमारे दोस्तों को मौका देना चाहिए अपने पसंदीदा गीत को सुनने का। इसलिए आमंत्रित किए आप ही के फ़रमाइशी गानें और इस तरह से चल पड़ी शृंखला 'पसंद अपनी अपनी'।

४१० एपिसोड्स हो जाने के बाद हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को करीब करीब डेढ़ महीने के लिए बंद रखा, लेकिन हम आपसे दूर नहीं गये। बल्कि हमने शुरु की 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल', जिसके तहत नये गायक गायिकाओं के गाये पुराने गीतों के कवर वर्ज़न शामिल किए गए। मिली-जुली प्रतिक्रिया रही,. लेकिन ज़्यादातर लोगों को अच्छा ही लगा। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पुराने स्वरूप में हम फिर वापस आये 'दुर्लभ दस' शृंखला के साथ जिसमें कुछ बेहद दुर्लभ गीतों और जानकारियों को सजाकर आपके समक्ष रख दिया। इसे भी ख़ूब सराहना मिली थी। कल्याणजी-आनंदजी पर केन्द्रित 'दिल लूटने वाले जादूगर' शृंखला के बाद आयी सावन का स्वागत करती 'रिमझिम के तराने'। 'गीत अपना धुन पराई', 'सहरा में रात फूलों की', 'मुसाफ़िर हूँ यारों', 'मजलिस-ए-क़व्वाली', और 'रस माधुरी' शृंखलाओं से गुज़रती हुई 'ओल्ड इज़ गोल्ड' आ पहुँची अपने ५०० वे पड़ाव पर।

तो दोस्तों, यह था 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का अब तक का सफ़र। और अब चलते चलते कुछ आँकड़ें आपको बता दिए जाएँ।

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में अब तक -

३५२ एकल, १३५ युगल और १३ अन्य गीत बजे हैं।
४० के दशक के ४३, ५० के दशक के १५६, ६० के दशक के १८६, ७० के दशक के ८५, और ८० के दशक के २८ गीत बजे हैं।
सब से ज़्यादा गीत लता मंगेशकर के शामिल हुए हैं। एकल, युगल और समूह मिला कर लता जी के कुल १५४ गीत बजे हैं जो कि लगभग ३१ % है।
संगीतकारों में शंकर जयकिशन के ४९, सचिन देव बर्मन के ४७, और राहुल देव बर्मन के ३३ गीत बजे हैं।
गीतकारों में शैलेन्द्र के ५७, मजरूह सुल्तानपुरी के ५६, और साहिर लुधियानवी के ४७ गीत बजे हैं।


हाँ तो दोस्तों, यह था 'ओल्ड इज़ गोल्ड - सफ़र अब तक'। कल से हम फिर चल निकलेंगे अपनी इस सुरीले सफ़र पर। चलते चलते बस यही कहेंगे कि "तुम अगर साथ देने का वादा करो, हम युंही मस्त नग़में लुटाते रहें"। आप सभी को नवरात्री की ढेरों शुभकामनाएँ। तो लीजिए इसी अवसर पर आज सुनिए गरबा के रंग में रंगा फ़िल्म 'सरस्वतीचंद्र' का यह मशहूर गीत लता मंगेशकर और साथियों की आवाज़ों में। कहा जाता है यह पहली फ़िल्मी रचना है जो गरबा नृत्य पर आधारित है। इंदीवर और कल्याणजी-आनंदजी का कमाल है। सुनिये और हमें इजाज़त दीजिये, नमस्कार!

गीत - मैं तो भूल चली बाबुल का देस (सरस्वतीचंद्र)


एक खास निवेदन - हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी)को.

प्रस्तुति: सुजॊय

2 comments:

इंदु पुरी गोस्वामी said...

लो आज एक नई शुरु शुरुआत'गरबों'के दिनों में.हिंदी फिल्म से गरबे पर आधारित पहला गाना..वो भी... ???
कितनी ही उम्र हो जाये हम औरतों के इस दर्द को कौन समझेगा कि बाबुल का देस छोड़ने के बाद भी वो हमसे कभी नही छूटता,चमड़ी की तरह जीवन भर चिपका रहता है.मौत के बाद जैसे चमड़ी धीरे धीरे शरीर से अलग होती है उसी तरह पिता घर का,वो दहलीज,वो गलियाँ छूटती होगी.'पिया' का घर...उसमे देह और आत्मा बस जाती है पर....'पिया का घर'..
पिता का घर??नन्हे कदमों के निशान से लेके युवा पद-चिन्हों'तक बसे होते हैं जहाँ फिर भी 'पिता का घर'..और जीवन भर ढूंढते हैं मेरा घर..???
कौन सा घर मेरा???कहोगे 'दोनों'आपके.
पर क्या हर औरत के भाग्य में होता है?पति के घर से त्याग दी गई औरत का घर कौन सा होता है सुजॉय?मुझे बहुत तकलीफ होती है उन औरतों का सोच कर जिन्हें जीवन साथी अच्छे नही मिलते.जो शादी के जूए में सब हार जाती है.यही पुरुष पर भी लागु होता है.
आपका ये गाना ...हर बहिन,हर बेटी और हर औरत के लिए एक शुभ कामना है और इश्वर से मेरी प्रार्थना भी कि हर औरत के जीवन में ऐसा ही पति और ससुराल हो कि वो अंतर्मन से कहे ...'मैं तो भूल चली बाबुल का देस,पिया का घर...'
हा हा हा
गोस्वामीजी जैसा प्यार करने वाला और समझने वाला पति नसीब हो सबको.

बंटी "द मास्टर स्ट्रोक" said...

ताऊ पहेली ९५ का जवाब -- आप भी जानिए
http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_9974.html

भारत प्रश्न मंच कि पहेली का जवाब
http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_8440.html

अगर सही जवाब अभी भी समझ नहीं आया तो .... कल सुबह का इंतजार करे .... कल स्पष्ट जवाब पोस्ट कर दिया जायेगा

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