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Wednesday, September 26, 2012

रबिन्द्र संगीत (पहला भाग) - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट (१४)

रबिंद्रसंगीत एक विशिष्ट संगीत पद्धति के रूप में विकसित हुआ है। इस शैली के कलाकार पारंपरिक पद्धति में ही इन गीतों को प्रस्तुत करते हैं। बीथोवेन की संगीत रचनाओं(सिम्फनीज़) या विलायत ख़ाँ के सितार की तरह रबिंद्रसंगीत अपनी रचनाओं के गीतात्मक सौन्दर्य की सराहना के लिए एक शिक्षित, बुद्धिमान और सुसंस्कृत दर्शक वर्ग की मांग करता है। १९४१ में गुरूदेव की मृत्यु हो गई परन्तु उनका गौरव और उनके गीतों का प्रभाव अनन्त है। उन्होंने अपने गीतों में शुद्ध कविता को सृष्टिकर्त्ता, प्रकृति और प्रेम से एकीकृत किया है। मानवीय प्रेम प्रकृति के दृश्यों में मिलकर सृष्टिकर्त्ता के लिए समर्पण (भक्ति) में बदल जाता है। उनके 2000 अतुल्य गीतों का संग्रह गीतबितान(गीतों का बागीचा) के रूप में जाना जाता है। (पूरा टेक्स्ट यहाँ पढ़ें )

आईये आज के ब्रोडकास्ट में शामिल होईये संज्ञा टंडन के साथ, रविन्द्र संगीत पर इस चर्चा के पहले भाग में. स्क्रिप्ट है सुमित चक्रवर्ती की और आवाज़ है संज्ञा टंडन की   
या फिर यहाँ से डाउनलोड करें

Sunday, April 22, 2012

हिन्दी फिल्मी गीतों में रवीद्र संगीत - एक शोध

स्वरगोष्ठी – ६७ में आज
रवीन्द्र-सार्द्धशती वर्ष में विशेष

‘पुरानो शेइ दिनेर कथा...’


हाँ एक ओर फ़िल्म-संगीत का अपना अलग अस्तित्व है, वहीं दूसरी ओर फ़िल्म-संगीत अन्य कई तरह के संगीत पर भी आधारित रही है। शास्त्रीय, लोक और पाश्चात्य संगीत का प्रभाव फ़िल्म-संगीत पर हमेशा रहा है और आज भी है। उधर बंगाल की संस्कृति में रवीन्द्र संगीत एक मुख्य धारा है, जिसके बिना बांग्ला संगीत, नृत्य और साहित्य अधूरा है। समय-समय पर हिन्दी सिने-संगीत-जगत के कलाकारों ने रवीन्द्र-संगीत को भी फ़िल्मी गीतों का आधार बनाया है। इस वर्ष पूरे देश मेँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५०वीं जयन्ती मनायी जा रही है। इस उपलक्ष्य मेँ हम भी उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।

‘स्वरगोष्ठी’ के सभी संगीत रसिकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! इस स्तम्भ के वाहक कृष्णमोहन जी की पारिवारिक व्यस्तता के कारण आज का यह अंक मैं सुजॉय चटर्जी प्रस्तुत कर रहा हूँ। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लिखे गीतों का, जिन्हें हम "रवीन्द्र-संगीत" के नाम से जानते हैं, बंगाल के साहित्य, कला और संगीत पर जो प्रभाव पड़ा है, वैसा प्रभाव शायद शेक्सपीयर का अंग्रेज़ी जगत में भी नहीं पड़ा होगा। ऐसा कहा जाता है कि टैगोर के गीत दरअसल बंगाल के ५०० वर्ष के साहित्यिक और सांस्कृतिक मंथन का निचोड़ है। धनगोपाल मुखर्जी ने अपनी किताब 'Caste and Outcaste' में लिखा है कि रवीन्द्र-संगीत मानव-मन के हर भाव को प्रकट करने में सक्षम हैं। कविगुरु में छोटे से बड़ा, गरीब से धनी, हर किसी के मनोभाव को, हर किसी की जीवन-शैली को आवाज़ प्रदान की है। गंगा में विचरण करते गरीब से गरीब नाविक से लेकर अर्थवान ज़मिंदारों तक, हर किसी को जगह मिली है रवीन्द्र-संगीत में। समय के साथ-साथ रवीन्द्र-संगीत एक म्युज़िक स्कूल के रूप में उभरकर सामने आता है। रवीन्द्र-संगीत को एक तरह से हम उपशास्त्रीय संगीत की श्रेणी में डाल सकते हैं। अपने लिखे गीतों को स्वरबद्ध करते समय कविगुरु ने शास्त्रीय संगीत, बांग्ला लोक-संगीत और कभी-कभी तो पाश्चात्य संगीत का भी सहारा लिया है।

पंकज मलिक 
रवीन्द्र-संगीत पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित "विश्वभारती विश्वविद्यालय" का नियंत्रण था। इस विश्वविद्यालय की अनुमति के बिना कोई रवीन्द्र-संगीत का गायन अथवा अन्य रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता था। फ़िल्मों में रवीन्द्र-संगीत की धारा को लाने में पहला क़दम उठाया था संगीतकार-गायक पंकज मल्लिक ने। १९३७ की फ़िल्म 'मुक्ति' के बांग्ला संस्करण में मल्लिक बाबू नें कविगुरु की रचनाओं का बृहद्‍ स्तर पर इस्तेमाल किया। अधिकांश धुनें कविगुरु की थीं, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "दिनेर शेषे घूमेर देशे..." की धुन मल्लिक बाबू नें ख़ुद बनाई थी। इस फ़िल्म के बाद भी पंकज मल्लिक रवीन्द्र-संगीत का इस्तेमाल व्यापक रूप से करते रहे और कविगुरु की रचनाओं को बंगाल के बाहर पहुँचाया। 'मुक्ति' के हिन्दी संस्करण में कानन देवी के स्वर में "साँवरिया मन भाया रे..." गीत रवीन्द्र-संगीत की छाया लिए हुए था जो न केवल बहुत लोकप्रिय हुआ बल्कि कानन देवी के गाये अति लोकप्रिय गीतों में से एक है। १९४८ की फ़िल्म 'अंजानगढ़' में पंकज मल्लिक और उत्पला सेन का गाया एक गीत था "संसार के आधार पर दया हम पे दिखाओ..." जो रवीन्द्रनाथ रचित "सर्बा खर्बा तार दाहे..." गीत पर आधारित था। यूँ तो इस फ़िल्म के संगीतकार थे रायचन्द बोराल, पर इस गीत का संगीत-संयोजन पंकज मल्लिक ने किया था। फ़िल्म के बांग्ला संस्करण में इस गीत को हेमन्त मुखर्जी और उत्पला सेन नें गाया है। रायचन्द बोराल ने १९४५ की फ़िल्म 'हमराही' (जो विमल राय निर्देशित प्रथम हिन्दी फ़िल्म थी) में रवीन्द्रनाथ रचित " मधुगन्धे भरा मधु स्निग्ध छाया..." को उसके मूल बांग्ला रूप में प्रस्तुत कर सुनने वालों को चमत्कृत कर दिया था।

फिल्म – हमराही : "मधुगन्धे भरा मधु स्निग्ध छाया..." : स्वर - हेमन्त मुखर्जी, बिनोता राय


अनिल विश्वास
न्यू थिएटर्स के संगीतकार पंकज मल्लिक और रायचन्द बोराल की जब बात चल ही रही है, तो वहाँ के तीसरे संगीतकार अर्थात्‍ तिमिर बरन का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। पंकज बाबू की तरह तिमिर बरन ने संगीत का प्रयोग ज़्यादा तो नहीं किया पर १९५४ की 'बादबान' (एस.के. पाल के साथ) फ़िल्म में "कैसे कोई जिए, ज़हर है ज़िन्दगी आया तूफ़ान" (हेमन्त कुमार-गीता दत्त) को रवीन्द्र-संगीत ("तारे ना जानी...") पर आधारित कर ऐसा कम्पोज़ किया कि जिसे ख़ूब सराहना मिली। रबीन्द्र-संगीत का इस्तेमाल करने वाले न्यू थिएटर्स के बाहर के संगीतकारों में पहला नाम है अनिल बिस्वास का। बिस्वास ने मूल गीत के शब्दों को नहीं, बल्कि उनकी धुनों का प्रयोग किया। और उनके बाद भी तमाम संगीतकारों ने केवल रबीन्द्र-संगीत के धुनों का ही सहारा लिया। उपर्युक्त "मधुगंधे भरा..." गीत की धुन का प्रयोग अनिल बिस्वास ने अपनी १९६० की फ़िल्म 'अंगुलिमाल' में किया था, मीना कपूर और साथियों के गाये "मेरे चंचल नैना मधुरस के भरे..." गीत में। अनिल बिस्वास द्वारा स्वरबद्ध रवीन्द्र-संगीत पर आधारित सबसे लोकप्रिय रचना है, १९५४ की फ़िल्म 'वारिस' का "राही मतवाले, तू छेड़ एक बार मन का सितार..." गीत। तलत महमूद और सुरैया की आवाज़ों में यह गीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय तो हुआ पर बंगाल के बाहर जनसाधारण को यह पता भी नहीं चला कि दरसल इस गीत की धुन कविगुरु रचित "ओ रे गृहबाशी..." पर आधारित थी जो एक होली गीत है। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कविगुरु होली के त्योहार को एक विशेष उत्सव की तरह गीत-संगीत-नृत्य के माध्यमों से मनाते थे और आज भी यह परम्परा विश्वभारती में कायम है।

रवीन्द्र-गीत : "ओ रे गृहबाशी..." : स्वर – श्रावणी सेन



संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने रवीन्द्र-संगीत का हू-ब-हू प्रयोग ज़्यादा गीतों में नहीं किया। यह ज़रूर है कि उनके द्वारा स्वरबद्ध कई गीतों में रवीन्द्र-संगीत की छाया मिलती है। रवीन्द्र-संगीत पर आधारित दादा बर्मन का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है १९७३ की फ़िल्म 'अभिमान' का "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." जो रवीन्द्रनाथ रचित "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." गीत पर आधारित है। इसे सुनिए और याद कीजिए "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." गीत को।

रवीन्द्र-गीत : "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." : स्वर – राघव चट्टोपाध्याय



१९५० की देव आनन्द-सुरैया अभिनीत फ़िल्म 'अफ़सर' में सुरैया का गाया लोकप्रिय गीत "नैन दीवाने एक नहीं माने..." भी एक रवीन्द्र-रचना "शेदिन दुजोने दुलेछिलो बोने..." पर आधारित है। रवीन्द्र-संगीत की छाया लिये दादा बर्मन द्वारा स्वरबद्ध कुछ और गीत हैं "जायें तो जायें कहाँ..." (टैक्सी ड्राइवर), "मेरा सुन्दर सपना बीत गया..." (दो भाई), "मेघा छाये आधी रात..." (शर्मीली)। सचिन दा के बेटे राहुलदेव बर्मन ने बंगाल और नेपाल के लोक-संगीत का ख़ूब प्रयोग किया है, अपने गीतों में, पर एक-आध बार रवीन्द्र-संगीत की तरफ़ भी झुके हैं। फ़िल्म 'जुर्माना' में लता के गाये "छोटी सी एक कली खिली थी एक दिन बाग़ में..." गीत के लिए पंचम ने जिस रवीन्द्र-रचना को आधार बनाया, उसके बोल हैं "बसन्ते फूल गान्थलो आमार जयेर माला..."। इस मूल रवीन्द्र-रचना को १९४४ की बांग्ला फ़िल्म 'उदयेर पथे' में शामिल किया गया था। 'उदयेर पथे' दरसल बांग्ला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म थी, जिसका हिन्दी में 'हमराही' के नाम से निर्माण हुआ था। इस फ़िल्म के एक गीत की चर्चा हम उपर कर चुके हैं।

राहुलदेव बर्मन ने १९८२ की फ़िल्म 'शौकीन' में आशा-किशोर से "जब भी कोई कंगना बोले..." गीत गवाया था जो रवीन्द्रनाथ रचित "ग्राम छाड़ा ओइ रांगा माटीर पथ..." की धुन पर आधारित था। '१९४२ ए लव स्टोरी' में कविता कृष्णमूर्ति का गाया "क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन..." को भी रवीन्द्र-संगीत से प्रेरित पंचम ने ही एक साक्षात्कार में बताया था पर मूल रवीन्द्र-रचना की पहचान नहीं हो पायी है। इसी अंश का प्रयोग पंचम ने बरसों पहले 'हीरा-पन्ना' के शीर्षक गीत "पन्ना की तमन्ना..." के अन्तरे की पंक्ति "हीरा तो पहले ही किसी और का हो गया..." में किया था।

हेमन्त कुमार 
हेमन्त कुमार की आवाज़ में एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना है "मोन मोर मेघेरो शोंगी उड़े चोले दिग दिगन्तेरो पाने..."। हेमन्त कुमार ने ही इस गीत की धुन पर १९६४ की हिन्दी फ़िल्म 'माँ बेटा' में एक गीत कम्पोज़ किया था "मन मेरा उड़ता जाए बादल के संग दूर गगन में, आज नशे में गाता गीत मिलन के रे, रिमझिम रिमझिम रिमझिम..."। लता मंगेशकर का गाया यह गीत ज़्यादा सुनाई तो नहीं दिया पर इसे सुनने का अनुभव एक बहुत ही सुकूनदायक अनुभव है। इस गीत के फ़िल्मांकन में निरुपा रॉय सितार हाथ में लिए गीत गाती हैं और एक नर्तकी इस पर नृत्य कर रही हैं। इस बात का उल्लेख हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस नृत्य शैली को "रबीन्द्र-नृत्य" के नाम से जाना जाता है।

रवीन्द्र-गीत : "मोन मोर मेघेरो शोंगी..." : स्वर – हेमन्त मुखोपाध्याय


फिल्म – माँ बेटा : "मन मेरा उड़ता जाये...” : स्वर – लता मंगेशकर



बंगाल से ताल्लुक रखने वाले संगीतकारों में एक नाम बप्पी लाहिड़ी का भी है। यूँ तो बप्पी दा 'डिस्को किंग' के नाम से जाने जाते हैं, पर उन्होंने भी कई शास्त्रीय और लोक संगीत पर आधारित गीत रचे हैं। रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग उन्होंने कम से कम दो बार किया है। १९८५ की फ़िल्म 'झूठी' में उन्होंने "चन्दा देखे चन्दा तो वो चन्दा शर्माये..." को उसी "जोदी तारे नाइ गो चीनी..." पर आधारित किया जिस पर सचिन दा ने "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." को कम्पोज़ किया था। दोनों ही गीत लता-किशोर के गाए हुए हैं, और दोनों ही फ़िल्मों के निर्देशक हैं ऋषिकेश मुखर्जी। क्या पता वो 'झूठी' के गीत में 'अभिमान' के उस गीत को पुनर्जीवित करना चाहते होंगे! १९८४ की फ़िल्म 'हम रहे न हम' में बप्पी दा ने एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना "पुरानो शेइ दिनेर कथा भूलबो की रे..." के शुरुआती अंश का प्रयोग कर एक सुन्दर गीत कम्पोज़ किया "रोशन रोशन रातें अपनी, दिन भी रोशन, जब से जीवन में तुम आये, तब से ऐसा जीवन..."। आशा-किशोर की युगल आवाज़ों में यह गीत था। वैसे यह भी एक रोचक तथ्य है कि मूल रवीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा..." की संगीत-रचना स्कॉटलैण्ड की एक धुन ‘Auld Lang Syne’ से मिलती-जुलती है। यह शोध का विषय होगा कि इन दोनों में से किस रचना ने पहले जन्म लिया।

मूल स्कॉटीश गीत : ‘Auld Lang Syne’



रबीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा" –



फ़िल्म - हम रहे न हम : "रोशन रोशन रातें अपनी...” : संगीत - बप्पी लाहिड़ी



बप्पी लाहिड़ी के संगीत में १९८६ की फ़िल्म 'अधिकार' में किशोर कुमार का गाया "मैं दिल तू धड़कन, तुझसे मेरा जीवन..." गीत भी रवीन्द्र-संगीत शैली में ही स्वरबद्ध एक रचना थी। दोस्तों, अब तक हिन्दी फ़िल्म-संगीत में रवीन्द्र-संगीत के प्रयोग की जितनी चर्चा हमने की है, उसमें जितने भी संगीतकारों का नाम आया है, वो सब बंगाल से ताल्लुक रखने वाले थे। बंगाल के बाहर केवल राजेश रोशन ही एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग कई बार अपने गीतों में किया। वैसे राजेश रोशन का बंगाल से रिश्ता तो ज़रूर है। उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं। १९८१ की फ़िल्म 'याराना' में राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा..." का मुखड़ा रवीन्द्रनाथ रचित "तोमार होलो शुरू, आमार होलो शाड़ा..." से प्रेरित था। यूँ तो इस रवीन्द्र-रचना को कई गायकों ने गाया, पर किशोर कुमार का गाया संस्करण सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था, और राजेश रोशन ने भी अपने गीत को किशोर दा से ही गवाया। भले राजेश रोशन ने केवल मुखड़े की धुन को ही प्रयोग किया था, पर कलकत्ते की जनता को क्रोधित करने में यही काफ़ी था। दरअसल राजेश रोशन ने इस धुन के इस्तेमाल के लिए विश्वभारती से अनुमति नहीं ली थी, जिस वजह से बंगाल में यह हंगामा हुआ। पर बंगाल के बाहर इस गीत ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि राजेश रोशन को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने १९८४ की फ़िल्म 'इन्तहा' में फिर एक बार इसी धुन की छाया तले कम्पोज़ किया एक और गीत "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल...", और इसे भी किशोर कुमार से ही गवाया। १९९७ की फ़िल्म 'युगपुरूष' में राजेश रोशन ने दो गीतों में रवीन्द्र-संगीत की छटा बिखेरी। इनमें एक था आशा भोसले का गाया "कोई जैसे मेरे दिल का दर खटकाए..." (मूल रवीन्द्र रचना - "तुमि केमोन कोरे गान कोरो हे गुणी...") और दूसरा गीत था प्रीति उत्तम का गाया "बन्धन खुला पंछी उड़ा..." (मूल रवीन्द्र-रचना - "पागला हावा बादल दिने पागोल आमार मोन नेचे ओठे...")। "पगला हावार..." एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना है और बंगाल के बहुत सारे कलाकारों ने समय-समय पर इसे गाया है।

रवीन्द्र संगीत : "पागला हावार बादल दिने..." : स्वर - किशोर कुमार



फिल्म – युगपुरुष : "बन्धन खुला पंछी उड़ा..." : स्वर – प्रीति उत्तम


कहते हैं कि नौशाद द्वारा स्वरबद्ध लता-शमशाद का गाया "बचपन के दिन भुला न देना..." भी किसी रवीन्द्र-संगीत से प्रेरित है, ऐसा विश्वभारती का दावा है, पर वह कौन सा गीत है इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। ऐसे कई गानें हैं जिन्हें रवीन्द्र-संगीत शैली में कम्पोज़ किया गया है, पर सही-सही कहा नहीं जा सकता कि मूल रचना कौन सी है। फ़िल्म 'सुजाता' का "जलते हैं जिसके लिए, मेरी आँखों के दिये..." को भी रवीन्द्र-संगीत पर आधारित होने का दावा विश्वभारती ने किया है। इस तरह से हमने देखा कि हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रवीन्द्र-संगीत की महक हमें कई बार मिली हैं। इसके लिए हिन्दी के संगीतकारों को श्रेय तो नहीं मिला, पर इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जब-जब रवीन्द्र-संगीत हिन्दी फ़िल्मी गीतों में सुनाई दिया है, वो सभी गीत बेहद मधुर व कर्णप्रिय बने हैं। रवीन्द्र-संगीत इस देश की अनमोल धरोहर है जिसे हमें सहेज कर रखना है। जिन-जिन संगीतकारों ने रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग अपने गीतों में किया है, और इस तरह से इसे बंगाल के बाहर पहुँचाने में योगदान दिया है, उन्हें हमारा सलाम।

आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, १९५९ की एक हिन्दी फिल्म के गीत का अंश। इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।


१ – यह गीत किस राग पर आधारित है? आपको राग का नाम बताना है।

२ – गीत का ताल पहचानिए और हमें ताल का नाम भी बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६९वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६५वें अंक में हमने आपको १९६६ मेँ प्रदर्शित फिल्म ‘साज और आवाज़’ के एक गीत का अंश सुनवाकर दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारवा और दूसरे का उत्तर है- संगीतकार नौशाद। इस बार दोनों प्रश्नों के सही उत्तर हमारे तीन नियमित पाठकों- पटना की अर्चना टण्डन, इंदौर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डा. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। इनके अलावा हमारे एक और नियमित पाठक बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने संगीतकार को तो सही पहचाना किन्तु राग पहचानने में भूल कर दी। इन सभी प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर हार्दिक बधाई। इनके साथ ही उन सभी संगीत-प्रेमियों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को पसन्द किया।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, आगामी १ मई को हिन्दी, बांग्ला सहित अनेक भारतीय भाषाओं और बोलियों के पार्श्वगायक मन्ना डे का ९४वाँ जन्मदिवस है। उन्होने हिन्दी फिल्मों में सर्वाधिक राग-आधारित गीत गाये हैं। उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आगामी रविवार की सुबह ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे और मन्ना डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

सुजॉय चटर्जी

Sunday, September 18, 2011

'गीतांजलि' ने मानव मन में एक स्निग्ध, स्नेहिल स्पर्श दिया - माधवी बंद्योपाध्याय

सुर संगम - 35 -रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष-२०११ पर श्रद्धांजलि (तीसरा भाग)

बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से कृष्णमोहन मिश्र की रवीन्द्र साहित्य और उसके हिन्दी अनुवाद विषयक चर्चा
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पहला भाग
दूसरा भाग
भी संगीत-प्रेमियों का ‘सुर संगम’ के आज के अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आपको स्मरण ही है कि इन दिनों हम कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के १५०वें जयन्ती वर्ष में रवीन्द्र-साहित्य की विदुषी माधवी बंद्योपाध्याय से बातचीत कर रहे हैं। माधवी जी ने रवीद्रनाथ के अनेक गद्य और पद्य साहित्य का हिन्दी अनुवाद किया है। यह सभी अनुवाद सदा साहित्य जगत में चर्चित रहे। इस वर्ष रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सार्द्धशती वर्ष में माधवी जी द्वारा अनूदित रवीन्द्रनाथ ठाकुर की लोकप्रिय कहानियों के संग्रह का प्रकाशन उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया है। गद्य साहित्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है रवीन्द्रनाथ के गीतों का हिन्दी अनुवाद। माधवी जी द्वारा किये गीतों का अनुवाद केवल शाब्दिक ही नहीं है बल्कि स्वरलिपि के अनुकूल भी है। इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम माधवी जी से रवीन्द्र संगीत और साहित्य के हिन्दी अनुवाद के विषय में चर्चा करेंगे।

कृष्णमोहन– माधवी जी, नमस्कार! और एक बार फिर ‘सुर संगम’के मंच पर आपका स्वागत है। आज हम आपसे रवीन्द्र साहित्य के हिन्दी अनुवाद पर चर्चा करना चाहते हैं। आपने भी रवीन्द्रनाथ की अनेक रचनाओं का हिन्दी अनुवाद किया है। आप द्वारा अनूदित ‘वर्षामंगल’ सहित कुछ अन्य कृतियों की मंच-प्रस्तुतियों में मैं भी सहभागी और साक्षी रहा हूँ। इस विषय में हमारे पाठकों को कुछ बताएँ।

माधवी दीदी- इसमें कोई सन्देह नहीं है कि रवीन्द्र साहित्य को अनेक भाषाओं में अनूदित किया गया है परन्तु हम रवीन्द्र संगीत के विषय में ऐसा नहीं कह सकते है। रवीन्द्र-संगीत सुधा का रसास्वादन केवल बंगभाषी ही कर रहे है। मेरी यह इच्छा रही है कि बांग्ला भाषा के निकटतम भाषा हिन्दी में इसका अनुवाद अवश्य होना चाहिये, इससे हिन्दी वलय के श्रोता भी इसका रसास्वादन कर सकेंगे। मैंने स्वयं संगीत के अनुवाद कार्य करने की धृष्टता की है। मैंने प्रयास किया है कि गीतों का केवल शाब्दिक अथवा गीत के भावों का ही अनुवाद न हो। आप जानते ही हैं कि रवीन्द्रनाथ के गीत, संगीत प्रधान होते हैं। यदि मूल गीत की स्वरलिपि में ही हिन्दी अनुवाद को गाया जा सके तो यह रवीन्द्र संगीत के प्रति एक न्यायसंगत प्रयास होगा। स्वरलिपि के अनुकूल अनुवाद से कोई भी हिन्दीभाषी स्वरलिपि पढ़ कर गानों को गा सकता है। हिन्दी भाषा का चलन बंगला से अलग होता है, उस चलन को बरकरार रखने के लिए मैंने गीतों के ठहराव में एकाध मात्राओं का परिवर्तन किया है, परन्तु स्वरलिपि में कहीं भी परिवर्तन नहीं है। मैंने ‘वर्षामंगल’’ तथा ‘‘ऋतुरंग’’ का ऐसे ही अनुवाद किया है। इसके अलावा मैंने उनके और भी अनेक गीतों तथा कविताओं के अनुवाद का प्रयास किया है। मुझे इस कार्य में कितनी सफलता मिली है, इसका मूल्यांकन तो पाठक और आप जैसे समीक्षक ही करेंगे।

कृष्णमोहन– माधवी दी’, आपके रचना संसार का अवलोकन कर मैं तो मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ। आपका रवीन्द्र संगीत का हिन्दी अनुवाद तो वन्दनीय है ही, परन्तु आपने गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ का अवधी से बांग्ला में जो अनुवाद किया है, वह भी कम अनूठा नहीं है। आपने इस कृति के बांग्ला अनुवाद में मूल कृति के दोहे, चौपाई, सोरठा आदि छन्दों की मात्राओं का पूरा ध्यान रखा है।

माधवी दीदी- कृष्णमोहन जी, आप जानते ही हैं कि मेरा जन्म मर्यादपुरुषोत्तम राम की नगरी अयोध्या में हुआ था। मैं मानती हूँ कि मेरा यह प्रयास ईश्वरीय कृपा से ही सम्भव हुआ है। थोड़ा विषयान्तर तो होगा, परन्तु अपने पाठकों और श्रोताओं को क्या आप बांग्ला और अवधी में ‘रामचरितमानस’ के समानान्तर गायन के अंश को सुनवा सकते हैं?

कृष्णमोहन- अवश्य, आपकी इच्छानुसार हम अपने पाठकों/श्रोताओं को ‘रामचरितमानस’ से बालकाण्ड के रामजन्म का प्रसंग, आपके बांग्ला अनुवाद और मूल अवधी में समानान्तर गायन प्रस्तुत कर रहे हैं। संगीत निर्देशन प्रोफ़ेसर कमला श्रीवास्तव ने किया है। आरम्भ में प्रसंग का परिचय माधवी बंद्योपाध्याय की आवाज़ में है।

रामचरितमानस (बांग्ला/अवधी) : “बालकाण्ड – रामजन्म प्रसंग” : अनुवाद – माधवी बंद्योपाध्याय


कृष्णमोहन- बांग्ला अनुवाद का यह एक उत्कृष्ठ उदाहरण है। माधवी दी’, अब हम विश्वकवि की कालजयी कृति ‘गीतांजलि’ पर थोड़ी चर्चा करेंगे।

माधवी दीदी- कृष्णामोहन जी, विश्व में ऐसा कोई प्रबुद्ध व्यक्ति शायद ही हो जो रवीन्द्रनाथ की ‘गीतांजली’ से परिचित न हो। ‘गीतांजलि’ के कारण ही रवीन्द्रनाथ नोबेल पुरस्कार से भूषित हुए थे और हर भारतवासी का मस्तक गर्व से ऊँचा हो गया था। रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के विश्व-जय करने की कहानी सभी ने सुनी है। एशियावासी के रूप में साहित्य में प्रथम नोवेल पुरस्कार हासिल करना एक बहुत बड़ा कृतित्व था। उस समय के बारे में भी सोचना चाहिये, जिस समय ‘गीतांजलि’ काव्य-ग्रन्थ इतना अधिक लोकप्रिय हुआ था। वह प्रथम विश्वयुद्ध का समय था, देश भर में चारों ओर खून की नदी बह रही थी, राजनैतिक क्षेत्र में भयंकर हलचल मचा हुआ था। उस समय रवीन्द्रनाथ की यह संवेदनशील ‘गीतांजलि’ ने मानव मन में एक स्निग्ध, स्नेहिल स्पर्श दिया, प्रलेप लगाया।

अब आज के समाज को ही ले लीजिए- आज समाज में आतंकवाद का बोलबाला है, आदमी आदमी का शिकार कर रहा है, तो आज तो ‘गीतांजलि’ मानव मन में उस काल से भी अधिक सकून देगा। समाज के इस रक्तपात के वातावरण में ‘गीतांजलि’ के प्रत्येक गीत हमारे लिए अमृत है, अमर कविता है, अविनाशी गान है। इसीलिए आज ‘गीतांजलि’ को लोग अधिक श्रद्धा से वक्ष में ले रहे हैं। ‘गीतांजलि’ काव्य को हम अध्यात्मवादी नाम भी दे सकते है। गौर कीजिए कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी सभी रचनाओं को किसी न किसी को अर्पित किया है। पर ‘गीतांजलि’ को उन्होंने किसी को भी अर्पित नहीं किया। ‘गीतांजलि’ को हम ईश्वरीय उदगार कह सकते हैं। उन्होंने लिखा है- “हे निभृत, प्रण के देवता, ब्रज के वंशी-वादक, अब मुझे ग्रहण करो नाथ, मम अन्तर को विकसित कर दो.... -इन सब पंक्तियों में कवि जिन्हें सम्बोधित कर रहे हैं, यही है ‘गीतांजलि’ की ईश्वर-चेतना। यदि ध्यान दिया जाय तो समझ में आयेगा कि कविगुरु के ईश्वर मानव में ही बसे हुए हैं। ‘गीतांजली’ में ईश्वर के लिए एक मौलिक चेतना विद्यमान है और साथ ही साथ नर देवता के प्रति कविगुरु का अपार श्रद्धा बोध।

कृष्णमोहन- बहुत-बहुत धन्यवाद माधवी दीदी, आपने ‘गीतांजलि’ के गुणों की अत्यन्त प्रेरक अभिव्यक्ति हम सब के लिए की है। आइए, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सार्द्धशती (१५०वें) जयन्ती वर्ष मे आयोजित इस श्रृंखला के समापन से पूर्व चर्चित रवीन्द्र-गीत –"चोखेर आलोए देखे छिलाम..." के मूल बांग्ला और फिर उसके हिन्दी अनुवाद का रसास्वादन कराते हैं।

रवीद्र संगीत : "चोखेर आलोए देखे छिलाम, चोखेर बाइरे..." : बांग्ला गीत


रवीद्र संगीत : "आँखों की ज्योति से देखा अब तक..." : हिन्दी रूपान्तरण


कृष्णमोहन- इस मधुर गीत के साथ ही हम ‘हिन्दयुग्म’ परिवार की ओर से रवीद्र साहित्य और संगीत की विदुषी माधवी बंद्योपाध्याय के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। माधवी दीदी, आप हमारे इस मंच पर आईं और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साहित्य और संगीत पर सार्थक चर्चा की, हम आपको हार्दिक धन्यवाद देते हैं।

माधवी दीदी- आपके इस मंच के माध्यम से मुझे भी कविगुरु को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का अवसर मिला, इसके लिए आपको भी धन्यवाद ज्ञापन करती हूँ। नमस्कार!


प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, September 11, 2011

उपन्यास में वास्तविक जीवन की प्रतिष्ठा हुई रविन्द्र युग में - माधवी बंधोपाध्याय

सुर संगम - 34 -रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष-२०११ पर श्रद्धांजलि (दूसरा भाग)

बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से कृष्णमोहन मिश्र की रवीन्द्र साहित्य और उसके हिन्दी अनुवाद विषयक चर्चा
पहला भाग पढ़ें
‘सुर संगम’ के आज के अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। दोस्तों, गत सप्ताह के अंक में हमने आपको बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से रवीन्द्र-साहित्य पर बातचीत की शुरुआत की थी। पिछले अंक में माधवी जी ने रवीन्द्र-साहित्य के विराट स्वरूप का परिचय देते हुए रवीन्द्र-संगीत की विविधता के बारे में चर्चा की थी। आज हम उससे आगे बातचीत का सिलसिला आरम्भ करते हैं।

कृष्णमोहन- माधवी दीदी, नमस्कार और एक बार फिर स्वागत है,"सुर संगम" के मंच पर। पिछले अंक में आपने रवीन्द्र संगीत पर चर्चा आरम्भ की थी और प्रकृतिपरक गीतों की विशेषताओं के बारे में हमें बताया। आज हम आपसे रवीन्द्र संगीत की अन्य विशेषताओं के बारे में जानना चाहते हैं।

माधवी दीदी- सभी पाठकों को नमस्कार करती हुई आज मैं विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के देशात्मबोधक गीतों पर कुछ चर्चा करना चाहती हूँ। सन् १९०५ में बंगभग आन्दोलन के समय उन्होंने बहुत सारे देशात्मबोधक गीतों की रचना की थी जिसने देशवासियों के मन को देशप्रेम से ओत-प्रोत कर दिया था। केवल यही नहीं उन्होंने दो राष्ट्रों के लिए दो राष्ट्रगीत भी लिखे। भारत के लिए "जन गण मन..." और बांग्लादेश के लिए "ओ आमार देशेर माटि..."।

कृष्णमोहन- माधवी दी’, भारतीय संगीत की विधाओं में रवीन्द्र संगीत को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि रवीन्द्र संगीत में रागों का महत्त्व कितना होता है?

माधवी दीदी- रवीन्द्रनाथ, शास्त्रीय संगीत तथा रागों के पूर्ण रूप से ज्ञाता थे। पर उनके संगीत को राग-रागिनी ने एक सीमा तक ही प्रभावित किया। रवीन्द्र संगीत की मर्मवाणी है, भाषा, भाव और रस। रागों को रवीन्द्रनाथ, अपने संगीत में एक सीमा तक व्यवहार करते थे। यह सीमा वहीं तक है कि राग शब्द, भाव और रस पर आरोपित न हो, बल्कि भावभिव्यक्ति में वह सहायक हो। वे कहते थे कि यदि रवीन्द्र संगीत पूर्णतया रागों पर आधारित कर दिया जाय तो संगीत पूर्णतया शास्त्रगत तथा व्याकरण-सम्मत बन जायगा और इसका भाव, रस और सुर-माधुर्य लुप्त हो जायगा। यद्यपि रवीन्द्रनाथ स्वररोपण करते समय अपने सुर के साथ एक नहीं कई रागों का मिश्रण कर देते थे, उसके बावजूद उसमें ऐसा प्राण-संचार होता था कि वह रागाश्रयी होने की जगह भावाश्रयी बनकर कानों में गूँजते हैं और हृदय को स्पर्श करते हैं।

कृष्णमोहन- माधवी जी, आपने रवीन्द्र संगीत के विषय में बहुत अच्छी जानकारी दी। यहाँ थोड़ा रुक कर हम अपने पाठकों/श्रोताओं को रवीन्द्र संगीत का एक ऐसा उदाहरण सुनवाते हैं, जो मूल बांग्ला का हिन्दी काव्यान्तरण है। इस गीत को स्वर दिया है, "विश्वभारती विश्वविद्यालय" के संगीत विभाग के प्राध्यापक मोहन सिंह खंगूरा ने। आइए, सुनते हैं, बांग्ला गीत –"आजि झोरेर राते तोमार अभिसार...." का हिन्दी अनुवाद-

रवीद्र संगीत (हिन्दी अनुवाद) : "आज आँधी की रात..." : स्वर – मोहन सिंह खंगूरा


कृष्णमोहन- माधवी जी, अत्यन्त मधुर गीत सुनने के बाद अब मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के कथा-साहित्य के विषय में कुछ बताइए।

माधवी दीदी- कृष्णमोहन जी, रवीन्द्रनाथ की विशाल साहित्य-परिधि के विषय में जितना कहा जाय उतना ही कम है। कथा-साहित्य के क्षेत्र में विगत शताब्दी के प्रथमार्द्ध को रवीन्द्र-युग कहा जाता है। बंकिम युग के पश्चात् रवीन्द्रनाथ ने उपन्यास में नये युग की अवतारणा की। उन्होंने उपन्यास में आधुनिक युग की स्थापना की। रवीन्द्र-युग की दो विशेषताएँ है- एक, बंकिमचन्द्र के ऐतिहासिक युग का तिरोभाव और दूसरा- सामाजिक उपन्यास के रूप में एक सूक्ष्मतर और व्यापक वास्तविकता का प्रवर्त्तन। बंकिमचन्द्र का उपन्यास, इतिहास और अपूर्व कल्पनाशक्ति का द्योतक था। उन्होंने इतिहास का सिंहद्वार खोलकर उसमें जान फूँक दिया था। पर रवीन्द्र-युग के उपन्यास में इतिहास और कल्पना हट गई और सामाजिकता तथा वास्तविकता ने सम्पूर्ण रूप से स्थान ग्रहण कर लिया। उपन्यास में वास्तविक जीवन की प्रतिष्ठा हुई। वैसे रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बहुत सारे उत्कृष्ट उपन्यासो की रचना की है-‘चोखेर बालि’, ‘विषवृक्ष’, घरे बाहिरे, ‘गोरा’, ‘नवनीत’, ‘चार अध्याय’, ‘जोगाजोग’, ‘चतुरंग’, ‘शेषेर कविता’ इत्यादि। पर उनका ‘गोरा’ उपन्यास सर्वश्रेष्ठ है। कल्पना जगत से निकलकर यथार्थवाद को आधार बनाकर जो सर्वश्रेष्ट उपन्यास उन्होंने लिखा, वह है ‘गोरा’। १९०९ में लिखे गए इस उपन्यास का विस्तार और परिधि एक साधारण उपन्यास से बहुत अधिक है। इसमें एक महाकाव्य की विशेषता और महाकाव्य के लक्षण दिखते हैं। इसमें जितने में चरित्र लिये गये हैं, उनकी केवल व्यक्तिगत जीवन की या साधारण जीवन की छवि ही अंकित नहीं की गयी है। उन्हें हम तरह-तरह के आन्दोलन में, धर्मगत् संघर्ष में, राजनैतिक भावनाओं में प्रतिनिधित्व करते हुए पाते हैं। जीवन के ये सारे संघर्ष, उनके जीवन-आदर्श की कहानी उन्हें एक वृहत्तर संस्था के रूप में पाठकों के सामने स्थापित करती हैं।

गोरा, सुचरिता, विनय, ललिता, परेश बाबू, आनन्दमयी, इन सभी के चरित्र-विस्तार में, क्रियाकलाप में, संकल्प से, उस समय के बंगदेश में, उस विशिष्ट्य युग-सन्धिक्षण में फैला हुआ समस्त विक्षोभ, आलोड़ल और चांचल्य की छवि परिस्फुट होती है। उस समय धर्म-विप्लव एक विशेष समस्या के रूप में सामने आया था। इस उपन्यास के चरित्रों के संकल्पों के माध्यम से पता चलता है कि उन दिनों समाज में सनातनपन्थ तथा नवीनपन्थ दो धर्ममार्ग विद्यमान थे। लोग अपने-अपने विचार तथा युक्तितर्क द्वारा उसकी पुष्टि करते थे। इसमें एक भावना को और उजागर किया गया है- मानव का देशात्म-बोध और नारी की जागरूकता। गोरा की जन्म-कथा तो उपन्यास की रूपरेखा है। समस्त धार्मिक विचारों के ऊपर मानव सत्य है। गोरा को एक आइरिसमैन के रूप में अंकित करना रवीन्द्रनाथ ठाकुर का लेखन कौशल ही तो था, जिसके द्वारा उन्होंने साबित किया कि मानव का स्थान सर्वोपरि है।

कृष्णमोहन- माधवी दी’ आज हमें यहीं पर विराम लेना पड़ेगा। परन्तु विराम लेने से पहले हम अपने पाठको/श्रोताओं के लिए रवीन्द्र संगीत का एक अनूठा प्रयोग प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे हिन्दी फिल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने फिल्म "अभिमान" में शामिल किया था। मूल रवीन्द्र संगीत और उसी धुन पर आधारित फिल्म ‘अभिमान’ का गीत आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं- साशा घोषाल। आप यह गीत सुनिए और माधवी दीदी के साथ मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। अगले रविवार को प्रातःकाल इस श्रृंखला की तीसरी और समापन कड़ी लेकर हम पुनः उपस्थित होंगे।

रवीद्र संगीत (हिन्दी/बांग्ला) : “तेरे मेरे मिलन की ये रैना.../जोदि तारे नाईं छिलिगो...” : स्वर – साशा घोषाल



संलग्न चित्र परिचय :- माधवी जी की मौलिक बाँग्ला कृति 'गल्पो संकलन' का विमोचन करते हुए तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकान्त शास्त्री.

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, September 4, 2011

वे (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) असाधारण गीतकार तथा संगीतकार थे - माधवी बंद्योपाध्याय

सुर संगम - 33 -रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष-२०११ पर श्रद्धांजलि (पहला भाग)


बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से कृष्णमोहन मिश्र की रवीन्द्र साहित्य और उसके हिन्दी अनुवाद विषयक चर्चा
त कर देना शीश को प्रभु, चरण कमल रज के तल में।

मेरे अहं को सतत डुबोना, मेरे वचन अश्रु-जल में।




‘सुर संगम’ का आज का अंक हमने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता के हिन्दी अनुवाद से किया है।‘गीतांजलि’ के इस पद का हिन्दी काव्यानुवाद विदुषी माधवी बंद्योपाध्याय ने किया है। १२ सितम्बर, १९३७ को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक प्रवासी बंगाली परिवार में माधवी जी का जन्म हुआ था। पारिवारिक संस्कार और स्वाध्याय से उन्होने बांग्ला भाषा और साहित्य का गहन अध्ययन किया। अँग्रेजी विषय में उन्होने स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की। माधवी जी को बाल्यावस्था से कविता, कहानी, निबन्ध आदि लिखने में पर्याप्त रुचि थी। विवाह के उपरान्त पति श्री दिलीप कुमार बनर्जी के सहयोग और प्रोत्साहन से बांग्ला और हिन्दी की मौलिक तथा अनूदित कृतियाँ एक के बाद एक प्रकाशित होती रहीं। अब तक माधवी जी की लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हमारे आग्रह पर माधवी दीदी ने‘सुर संगम’के लिए रवीन्द्र-संगीत, साहित्य और उनके हिन्दी अनुवाद पर चर्चा करने की सहर्ष सहमति दी। हम उनके प्रति आभार प्रकट करते हुए इस बातचीत का सिलसिला आरम्भ करते हैं।



कृष्णमोहन- आदरणीया माधवी दीदी, नमस्कार! और‘सुर संगम’के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। यद्यपि यह स्तम्भ शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित है किन्तु इस अंक में हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर के १५० वें जयन्ती वर्ष के उपलक्ष्य में रवीन्द्र संगीत के साथ-साथ उनके समग्र साहित्य पर आपसे चर्चा करेंगे।



माधवी दीदी- नमस्कार! कृष्णमोहन जी आपको और ‘सुर संगम’के सभी पाठकों का आभार प्रकट करती हूँ कि आपने मुझे विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष में उनको श्रद्धांजलि अर्पण करने का अवसर दिया।



कृष्णमोहन- माधवी जी, आपने रवीन्द्र साहित्य का न केवल गहन अध्ययन किया है, बल्कि उनकी अनेक कृतियों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। सर्वप्रथम हमें यह बताएँ कि विश्वकवि और उनका साहित्य आपकी दृष्टि में किस प्रकार उल्लेखनीय है?



माधवी दीदी- विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर आज हमारे बीच सशरीर उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनकी पवित्र आत्मा सदा हमारे बीच विद्यमान है। वह हमारी अन्तरात्मा के साथ इस प्रकार घुलमिल गए हैं कि अब उन्हें स्वयं से अलग करना सम्भव नहीं है। वायु-प्रकाश सदैव हमारे साथ लिप्त रहते हैं। उनके बिना हम एक पल नहीं जी सकते। हम उन्हें हर समय अनुभव नहीं करते है फिर भी ये दोनों तत्व अनजाने में ही हमारे साथ बने रहते हैं। कविगुरु भी इसी प्रकार अनजाने में सदा हमारे मन में विद्यमान रहते हैं। यद्यपि हम उन्हें हर समय स्मरण नहीं करते हैं पर, वह हमारे मन में इस प्रकार बसे हुए है कि हम उन्हें कभी भूलते भी नहीं हैं। रवीन्द्रनाथ को हम एक शब्द में महामानव कह सकते हैं। उनके गुणों की परिधि की विशालता उनके ६ विराट कर्मकाण्ड तथा उनकी विविधता के बारे में हम निर्वाक होकर केवल सोचते ही रहते है।



एक तरफ है उनकी साहित्यिक कृतियों के अन्तर्गत- कथा साहित्य में उपन्यास, लघुकथाएँ, प्रबन्ध आदि अत्यन्त रोचक है। नाट्य साहित्य में उनके नाटक, नृत्य नाटिकाएँ वास्तव में मनोगुग्धकारी है। कविताओं की जितनी प्रशंसा करें, कम हैं। ‘गीतांजलि’ में उन्होंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया था, जो हर भारतवासी के लिये गर्व की बात है। रवीन्द्रनाथ का प्रबन्ध अपनी एक अलग गभ्भीरता रखता है। यदि उनके संगीत के बारे में कहा जाय तो वह रस और भाव से भरा हुआ है। वे असाधारण गीतकार तथा संगीतकार थे। स्वयं गीत लिखते थे और स्वयं ही उसकी स्वरलिपि बनाते थे। रवीन्द्र संगीत का एक अलग ही वैशिष्ट्य होता है। गाने से पूरे परिवेश में वह सुर छा जाता है। गीत सुनकर ही पता चल जाता है कि वह रवीन्द्र संगीत है।




कृष्णमोहन- इससे पहले कि हम आपसे रवीन्द्र संगीत की विशेषताओं के बारे में कुछ और प्रश्न करें, हम अपने पाठकों/श्रोताओं को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ही आवाज़ में कुछ काव्य-पंक्तियाँ सुनवाना चाहते हैं।



माधवी दीदी- अवश्य सुनवाइए कृष्णमोहन जी, स्वयं कविगुरु की आवाज़ में उन्हीं की कविता को सुनना मेरे लिए भी दुर्लभ क्षण होगा।



कविता का शीर्षक ‘प्रोश्नों’ : स्वर – रवीन्द्रनाथ ठाकुर





माधवी दीदी- इस आवाज़ को सुनवा कर आपने मेरे कानों को तृप्त कर दिया। अब मैं आपके प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करती हूँ। रवीन्द्र संगीत में ऐसी विशेषताएँ होती हैं कि इसे भारतीय संगीत के क्षेत्र में एक अलग विधा के रूप में मान्यता भी प्राप्त हो चुकी है। रवीन्द्र संगीत, स्वर तथा भाव प्रधान होता है और सादगी में सुन्दरता इसकी विशेषता है। रवीन्द्रनाथ अपने संगीत को तान-तरानों से नहीं सजाते थे। वाद्य संगति में भी सादगी होती है। मात्र स्वर और ताल के लिए एक-एक वाद्य संगति के लिए पर्याप्त होता है। खुले हुए कण्ठ में रवीन्द्र संगीत गाना चाहिए। काव्य के भावों के अनुकूल रागों का चयन और स्वर के साथ-साथ अपनी आत्मा को संतुष्टि देना ही इस संगीत का वैशिष्ट्य है। गाते समय केवल कण्ठ का ही नहीं बल्कि आत्मा की आवाज भी सुनाई देती है। रवीन्द्र संगीत कई पर्वों में विभाजित है। प्रकृति पर्व, प्रेम पर्व, पूजा पर्व, देशात्मबोधक संगीत, भानु सिंह की पदावलि इत्यादि उनके संगीत की विविधता है। एक और विशेषता यह है कि उनका प्रेमपर्व और पूजापर्व मानों एक ही साथ घुल-मिल गया है। यदि वे गीत में प्रेमी को सम्बोधित करते है तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह ईश्वर के उद्देश्य से बोल रहे है। ईश्वर ही उनका प्रेमी है।



इसके साथ ही कविगुरु प्रकृति-प्रेमी थे। प्रत्येक ऋतु के अनुकूल उन्होंने गीत रचना की है। वर्षा ऋतु पर उनके सबसे अधिक गीत हैं। उनका मानना था कि वर्षा ऋतु का प्रभाव सीधे मनुष्य के मन पर पड़ता है। बरसात की ध्वनि में जो विविधता होती है वह व्यक्ति की मानसिकता पर अलग-अलग प्रभाव का विस्तार करती है। कभी प्रेम तो कभी विरह जगाता है, कभी मन उदास होकर दूर आसमान में उड़ने लगता है, कभी-कभी वर्षा की ध्वनि मनुष्य को बावरा सा बना देता है, उसे घर में, या फिर किसी काम में मन नहीं लगता है। उन्होंने वर्षा ऋतु पर बहुत सारे गीत लिखे और भाष्य के साथ ‘वर्षामंगल’ नामक धारा-भाष्य लिखा है। ‘ऋतुरंग’ उनका दूसरा धारा-भाष्य है।



कृष्णमोहन- माधवी दी’ आपने अभी ‘वर्षामंगल’ की चर्चा की है। यहाँ थोड़ा विराम लेकर हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कालजयी रचना ‘वर्षामंगल’ का एक ऋतु आधारित गीत अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाते हैं।



रवीन्द्र संगीत : "एसो श्यामलो सुन्दरो..." (वर्षामंगल) : स्वर – आशा भोसले





दोस्तों, इस गीत के साथ आज के अंक को यहीं विराम देता हूँ। ‘सुर संगम’ के अगले अंक में भी हम रवीन्द्र साहित्य की विदुषी माधवी वंद्योपाध्याय से की गई यह चर्चा जारी रखेंगे। आप सभी संगीत प्रेमियों की हमें अगले रविवार को प्रतीक्षा रहेगी।



संलग्न चित्र परिचय :- भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान/प्रदर्शन करती हुई श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय.



प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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